December 06, 2016

खेल खेल में -------mangopeople




                                                                     करीब चार महीने पहले बेटी का चुनाव इंटर स्कूल खेल प्रतियोगिता के लिए हुआ । स्कूल में तो वो मैडल जीतती रहती थी ये पहली बार स्कूल से बाहर जा रही थी । हम भी खुशी ख़ुशी वह पहुंचे वहा का नजारा कुछ देर देखने के बाद लगा जैसे ओलंपिक में आ गये है । कुछ बच्चे से जिनके अपने नीजि प्रशिक्षक थे , पैरो में महंगे स्पोर्ट शूज जो खेल के लिए बने थे , कपडे भी खेल के लिए बने खास ,वो महंगे स्कूलों से थे । कुछ क्लब के लोग ग्रुप में थे सभी के एक जैसे कपडे , कपड़ो पर क्लब का नाम , खेल के तमाम इंस्टूमेंट भी उनके पास थे । लगा जैसे वो यूरोप , अमेरिका की टीमें , बिलकुल प्रेक्टिस करते दिख रहे थे की खिलाडी है उनके सामने हमारी ये भारतीय टीम कहा टिकेगी । हमारे ५ बच्चो ने स्कूल पीटी ड्रेस पहन रखी थी कॉटन के सफ़ेद पैंट और शर्ट और पैरो में सफेद पीटी वाले जुते । माथा ठोक लिया सारे हालात को देख और सोच कर , खुद हमें एक दिन पहले पता चला की हमारे बच्चे किस किस प्रतियोगिता में थे , ५० और २०० मीटर की रेस के लिए उनका प्रशिक्षण था जाओ मैदान के २० चक्कर लगा लो । मैंने बच्चो से सवाल किया क्या कभी तुम्हारी खेल टीचर ने तुम्हारे रेस का टाइम आदि देखा एक दूसरे से रेस करवाई , जवाब था नहीं । लगा २० चक्कर लगाव के टीचर क्या मैराथन की तैयारी करवा रही थी और २०० मीटर में मेरी बेटी को ले लिया वो हमेसा ५० और १०० में स्कूल में भाग लेती है ।

                                                                 वैसे हमारी भारतीय टीम अकेली नहीं थी कुछ और एशियाई और अफ़्रीकी टाइप टीम भी थी , पर इन सब में एक टीम चाइना भी थी जो कम संसाधन के बाद भी अच्छे प्रशिक्षण के कारण कई प्रतियोगिता जीती कोई बहुत छोटा स्कूल था । हम भी अपने बच्चो के अपने लेबल पर तैयारी करवा सकते थे किन्तु हमें तो जानकारी तक नहीं थी । ५० से ६० बच्चो के बीच हमारे बच्चे दो के सेमीफाइनल और रीले रेस के फ़ाइनल में पहुंची किन्तु मैडल नहीं जीती । बच्चे बहुत उदास हुए और एक तो रोने ही लगी जो सबसे धीमी थी और उसके चयन पर भी आश्चर्य हो रहा था ,हमने उन्हें सांत्वना दे काम चलाया । अब कुछ दिन पहले फिर से एक दो दिन पहले हमें खबर कर दिया गया , नतीजा वही निकाला इस बार तो ७० से ८० बच्चे थे किन्तु हमारे बच्चे उदास नहीं थे , वो दूसरी बार में ही हार के आदि हो गये और वह ४ दिन की पिकनिक मना कर चले आये । इस बार हम सब ने तय कर लिया की स्कुल में इस बात की शिकायत की जाएगी की बच्चो का स्तर दूसरे स्कूलो से प्रतियोगिता के लायक हो तभी उन्हें भेज जाये केवल हार का अनुभव लेने और उसकी आदत पड़ने के लिए न भेजे । जितने की संभावना होने पर ही लोग और मेहनत करते है किन्तु जहाँ जितने की उम्मीद ही न हो तो जरुरी मेहनत भी नहीं की जाती ।

                                                                 लगा ऐसे ही हमारी भारतीय टीम भी जाती होगी बड़े खेल प्रतियोगिताओ में , न ढंग का प्रशिक्षण , न संसाधन , न ढंग के खिलाड़ियों का चयन और न जितने का जज्बा । ये ठीक है प्रतियोगिता में भाग लेने से आप का अनुभव बढ़ता है और हर कोई जीत नहीं सकता किन्तु वहा से आने के बाद उनके खेल का आंकलन होता है ,क्या ये देखा जाता है की उनका प्रदर्शन पिछली बार से बेहतर हुआ है तब उन्हें आगे भेजा जाये । यहाँ होती है राजनीति और अब तो साजिस कर खिलाडी को फंसा कर प्रतियोगिता से बहार करने का भी प्रयास होने लगे । जब पहले स्तर पर बच्चो की प्रतियोगिताओ का ये हाल है की जितने और हारने वालो में एक बड़ा अंतर है तो वो जितने वालो को बड़ी चुनौती नहीं देता है और न जितने वाले का स्तर बढ़ता है । फिर ये भी देखा की जो आयोजक ये प्रतियोगिता करा रहे थे उनको जीतने वालो या कुछ प्रतिभावान बच्चो से कोई मतलब नहीं था , उनको आगे बढ़ाने या अच्छा प्रशिक्षण देने में उनकी कोई रूचि नहीं थी , जो होना था वो अपने स्तर पर होना था । जो इस लायक है वो अपने बच्चो को खेलो में ज्यादातर भेजते नहीं और जिन्हें भेजना है उनके पास संसाधन नहीं ।

November 30, 2016

सोशल मिडिया - लब खोल कुछ बोल ---------mangopeople



                                                                संभवतः मैं नौंवी में रही होंगी जब राजनीति पर अपनी राय रखना शुरू किया था , सामने पापा होते थे ज्यादातर , जब बात क्रिकेट की हो तो छोटका दादा और स्कूल के मुश्किल से एक या दो मित्र , खाना और सामजिक मुद्दों पर ज्यादातर मम्मी , महिलाओं पर तो कॉलेज के बाद कोई मिला जिस पर बात कर सकती थी और न जाने उस ज़माने में कितने ही मुद्दों पर बोलने की इच्छा होती थी किन्तु ज्यादातर उसके लायक लोग ही नहीं मिलते थे बात करने के लिए । फिर कई बार अपनी बात खुल कर कहने में शर्म आती कई बार सामने वाले के विचारो पर सवाल नहीं उठा सकते थे , कभी बड़े बुजुर्ग , तो कभी कही उसको बुरा न लग जाये , कही सामने वाला नाराज न हो जाये , मेरी बातो का गलत मतलब न निकाल ले , पता नहीं वो मेरे बारे में ये सुन कर क्या सोचे , कही हमारा रिश्ता न ख़राब हो जाये आदि इत्यादि न जाने कितने ही कारण थे की मुंह खोलने और बोलने से पहले सौ बार सोचना पड़ता था , न जाने कितनी बाते दिल ही दिल में रह गई । कोई भाई , दोस्त,मामा, चाचा , माँ , मौसी , गुरु शिष्य न जाने कितनो के लिहाज ने मुंह पर ताला लगा दिया । कोफ़्त होती थी टीवी आदि में उन बड़के बड़के लोगो को देख कर जिनसे पत्रकार माईक घुस घुसा पूछा करते की इस विषय में आप की क्या राय है । उफ्फ हमारे पास भी तो कितना कुछ है कहने को कोई नहीं आता जिससे सूना सके बतिया सके ।

                                                जमाना बदला तकनीक ने हमें सोशल मिडिया दिया , दिल ने कहा वाह वाह वाह ! क्या बात है किसी माईक की जरुरत नहीं किसी प्रत्रकार की जरुरत नहीं किसी का शर्म लिहाज , किसी का सम्मान आड़े नहीं , छोटे बड़े सभी की दीवारे गिरी , विषयो का तो अंबार ही लग गया , रोज नई बाते रोज नये विषय , कुछ अपनी कहो कुछ दुसरो की सूनो , विचारो के आदान प्रदान के लिए अथाह समंदर मिला , कोई समर्थक कोई विरोधी मिला , समर्थको से अपना पक्ष मजबूत हुआ तो विरोधियो ने दूसरे पक्ष को और सही से देखने में मदद की । सोशल मिडिया ने हर एक आम को आवाज दी और उनके विचारो को एक औकात दी , मुंह में जुबान दी , गुगो को भी बोलना सीखा दिया । मन को ताकत दी , विरोध की ताकत दी , गलत को गलत कहने की ताकत दी , इस ताकत ने दुनिया को बदलना शुरू किया , क्रांतियों का रूप बदल दिया , लोगो के सोचने के तरीको को बदल दिया । वाह वाह वाह !

                                              पर मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और हम भारतीय तो सबसे ज्यादा , सो हमने इस काल्पनिक दुनिया में भी अपना समाज बनाया , कोई दोस्त बना तो कोई हमदर्द , कोई मामा - काका , चाचा - ताऊ , माँ - मौसी , गुरु शिष्य , दीदी भैया सब बने , जो समाज पीछे छोड़ आये उस समाज को भी यहाँ बसा लिया , कितनी ही बार तो विश्वास न हुआ कि ये दुनिया उस दुनिया से अलग है , सब एकाकार हो गया । फिर शुरू हुआ उस समाज की तकलीफे इस समाज में , कोई बुरा मान गया कोई नाराज हो गया , कोई विचारो की सहमति न होने से झगड़ पड़ा तो दूसरे ने उस झगड़े तो दिल से लिया और अपराधबोध में जीने लगा , बड़े बुजुर्गो का , बड़े छोटे लिखको का लिहाज होने लगा , कही भाषा से नियंत्रण छूटा तो कही किसी ने अपने बातो में ही नियंत्रण ला दिया । हम घूम फिर कर वही पहुँच गये जिसे छोड़ कर यहाँ आये थे , जुबानो पर फिर ताले लगने लगे ।
                                        
                                          शुक्र है कि जो तीसरे पैर में कहा वो मैंने कभी नहीं किया , अच्छे खासे प्लेटफार्म का सत्यानाश नहीं किया , इस दुनियां को उस दुनियां से सदा अलग रखा , उसकी मुसीबते सदा यहाँ से दूर रखा , दिमाग वाले इस दुनियां को बेवजह दिल से नहीं लिया । इसलिए अपनी जुबा आज भी आज़ाद है , दुसरो के नियंत्रण से आज़ाद है , अपने नियंत्रण में लेने वाले कुछ शातिर दिमागों से आजाद है । मेरी सोच , मेरे विचार , मेरा दिमाग आज भी मेरे अपने है । मुझे आज भी अपने विचार लिखते समय किसी और का विचार नहीं करना पड़ता , और आप को ?



October 15, 2016

आओ नास्तिको सोहर गाये नये धर्म का जन्म होने वाला है - - - - - - mangopeople

आओ नास्तिको सब मिल सोहर गाये अपने देश में एक नये धर्म का जन्म होने वाला है ।

                                                         अभी तक देश दुनिया के नास्तिक अनाथ टाइप के थे बिखरे थे अब उन सभी को एक करने का प्रयास शुरू हो गये है ताकि वो भी अपनी शक्ति और नास्तिकता के प्रति अपनी भक्ति दिखा सके । बिन शक्ति सब सून ॥ इसलिए सभी को इकठ्ठा कर उसे शक्ति के रूप में दिखाना जरुरी है , एक दूसरे के तर्क सून अपनी अपनी भक्ति को बढ़ाना है । कुछ दिन बाद नास्तिकता भी अपने आप में धर्म होगा जैसे अब तक लोग कहते आये की मैं हिन्दू मुस्लिम आदि इत्यादि हु उसी प्रकार धर्म के कालम में नास्तिक भरेंगे । अन्य धर्मो की तरह नास्तिकता का भी प्रचार प्रसार किया जायेगा ज्यादा से ज्यादा लोगो को इस महान धर्म से अवगत करा कर उन्हें शांति के पथ पर बढ़ाया जायेगा ।
                                                  फिर उनकी बढती संख्या देख उन्हें संभालने के लिए नियम कायदों की एक किताब बनेगी जिसे बाद में नास्तिको का धर्म ग्रन्थ मान लिया जायेगा । जिसमे बताया जायेगा की एक नास्तिक को कैसे रहना सहना चाहिए , कैसे खाना पीना चाहिए और कैसे पकड़े पहनने चाहिए । स्त्रियों के लिए वहाँ भी अलग से सबका वर्णन होगा , स्त्रियां ज्यादा खुश न हो यहाँ भी उनका दर्जा दोयम ही होगा ।
                                                           इन ग्रंथो को लिखने वाले महान तर्कवादियों को उच्च दर्जा मिलेगा वो ब्राह्मण समान होंगे और उसे पालन कराने वाले क्षत्रिय , उसका अर्थ से प्रचार प्रसार करने वाले वैश्य और हम जैसे नास्तिक जो दुसरो की आस्था पर बे मतलब के सवाल न उठाते हो वो शुद्रो के समान हिकारत की नजरो से देखे जायेंगे और उन्हें धर्म भ्रष्ट करने वालो में रखा जायेगा । नास्तिकता पर बड़े बड़े तर्क देने वाले भाषण बाजो को बाबा माना जायेगा वो हमें बताएँगे की दूसरे धर्मो में क्या क्या खामिया है और अपना धर्म कितना महान। बहुसंख्यक धर्म की बुराई बताने वाला अच्छा और सभी धर्म में सामान रूप से बुराई देखेने वालो को सेक्युलर नास्तिक होने ही गाली दी जायेगी । पुरे साल दुसरो के भगवान के अस्तित्व को नकारा जायेगा और तीज त्यौहारो पर उनके भगवान की बुराइयो को गिनाया जायेगा ।
                                                                फिर इतिहास को खंगाल महान नास्तिको को निकाल उन्हें पूजा जायेगा उनसे मन्नते मांगी जाएगी और उन्हें पूरा होने पर उन्हें उनका चमत्कार घोषित कर उन्हें नास्तिको का भगवान बनाया जायेगा । वामपंथियो और गैर वामपंथी नास्तिको में इस बात पर तर्क होगा की वामपंथियो को ही नास्तिक होने के कारण अपना राजनितिक दल घोषित कर दे या अपना नया राजनीतिक दल बना अपने लोगो को सत्ता तक पहुंचाया जाये । बिन सत्ता शक्ति सून ॥
नास्तिको का अपना धर्म होगा अपनी धार्मिक किताब होंगे अपने भगवान होंगे और उन्हें पूजने के अपने कर्मकांड । एक दिन ये सब बहुत बढ़ जायेगा , धर्म और राजनीति का घालमेल हो जायेगा , दोनों जगह सत्ता का संघर्ष चरम पर होगा , फिर एक दूसरा सुधारक निकलेगा और बतायेगा सब गलत हो रहा है , यहाँ आडम्बर बहुत बढ़ गए है हम दूसरा पंथ बनाएंगे । नास्तिक धर्म के दो पंथ हो जायेंगे आस्तिक नास्तिक और दूसरे उसमे से बाहर आये नास्तिक नास्तिक ।
                                                                 अभी ये जन्म न हो सका क्योकि कल तक जो बहुसंख्यक कुछ अल्पसंख्यको को तलाक विवाह आदि पर देश के संविधान कानून को सर्वोपरी रख सभी के लिए समान कानून और कानून का सम्मान करने की सिख दे रहे थे वो आज खुद कानून हाथ में ले हाजिर थे इस जन्म को रोकने अपना झंडा विथ डंडा लिए ।

October 07, 2016

भंवरे ने खिलाया फूल , फूल को दे रहे खाद पानी राजकुँवर - - - - - mangopeople


                                                           जिस दिन सर्जिकल स्ट्राइक हुई उसके दूसरे दिन रविस ने अपने प्राइम टाइम में बताया की कैसे सरकार की तरफ से इस मामले में सब आज चुप है और सामान्य तरीके से काम कर रहे है जैसे कुछ हुआ ही नहीं है । सन्देश साफ था की इस मामले को ज्यादा तूल नहीं देना है । हा छूट भैये नेता और भक्तगड़ जरूर लगे हुए थे , सीन फुलाने नापने और स्तुति गान में किन्तु ये कितने दिन चलता बहुत हुआ तो हफ्ते दस दिन फिर कोई नया मुद्दा मिल जाता और सर्जिकल स्ट्राइक सिर्फ चुटकुलों में बचा रहता । किन्तु हमारे यहाँ लोग कुल्लहाणी को पैर पर नहीं मारते पैर ही कुल्लहाणी पर दे मारते है , जो मुद्दा अपने आप ही समाप्त हो जाने वाला था उस पर नकारात्मक बयानबाजी करके उसे खाद पानी दे जीवित रखने का काम किया , पहले अरविन्द और अब राहुलगांधी ने ।

                                                              मोदी ने हमेसा एक रणनीति पर काम किया है कि लोगो को अपने दिए मुद्दे में उलझा कर रखो ताकि लोग उसी पर बात करते रहे और वो अपने मुद्दे उठाना तो दूर उसे याद भी न रख पाये । कई बार लोग उनकी रणनीति में फंसे है किन्तु इस बार तो लोग खुद ब खुद उनके जाल में घुस रहे है वो भी जबरजस्ती । इतनी लंबी किसान यात्रा करके आये राहुल किसानों पर बोल अपने मुद्दे उठाने की जगह सर्जिकल स्ट्राइक पर बेतुका बयान दे बैठे , किसने सलाह दी थी, दिग्विजय सिंह ने क्या उसके पहले पीके से पूछा था जिन्होंने उनके इस किसान रैली की सारी रणनीति बनाई थी ,( बेचारे पीके को भगवान ये सब सहने की शक्ति दे, उसका अपना कैरियर दांव पर है ) होना ये चाहिए था कि , जय जवान जय किसान का नारा लगाते हुए कहना चाहिए था की जवानों का बदला ले लिया अब किसानों की बात की जाये , अपने मुद्दों का केंद्र में लाना था पर किया उसका उलटा अपना मुद्दा पीछे छोड़ वो मोदी पोलिटिकली ज्यादा फायदा न उठा ले इस चक्कर में पड उनके मुद्दों में उलझ पड़े । प्यास क्या चाहे दो घुट पानी लीजिये अब मोदी और उनके भक्तो को और मौका मिल गया इस सारे मामले को और लंबा खीचने और इस पर चर्चा करने का ।

                                                            किसी सैनिक कार्यवाही पर वोट नहीं पडते ये बात शायद इन नेताओ को समझ नहीं आती । याद कीजिये ७१ का युद्ध जितने के कुछ साल बाद भी इंदिरा गाँधी को देश में आपातकाल लगने की नौबत आ गई , अटल जी के साथ बुद्धा मुस्कराने और कारगिल के बाद भी क्या हुआ पता है सभी को । यू पी के किसी गांव में जब आप कहेंगे की हमें किसी की जमीन नहीं हड़पनी तो वो बोलेंगे की आप मत हड़पो किन्तु यहाँ दबंगो की पूरी फ़ौज है जो हमारी जमीने हड़प रहा है उसकी बात करो , गोवा वाला बोलेगा ये क्या युद्ध का मौहाल बना दिया सारे पर्यटक ही गायब हो गए , और तमिलनाडु कर्नाटक वालो बोलेंगे कौन सा सिंधु जल यहाँ हम अपने कावेरी में उलझे है उसकी बात करो । आज भी भारत में आतंकवाद और पाकिस्तान जैसे मुद्दे बड़े और कुछ छोटे शहरो के उन लोगो तक ही सीमित है जो टीवी अख़बार और सोशल मिडिया से जुड़े है , उसके बाहर के ज्यादातर भारतीयों के लिए ये कोई मुद्दा ही नहीं है और न जाने किस अदृश्य राजनीतिक फायदे के लिए हमारे महान नेतागड़ इस मामले को लंबा और लंबा खीचते जा रहे है ।


                                                            मोदी को इतना बड़ा बनाने में उनके काम से ज्यादा फायदा उनके खिलाफ जगह जगह नकारात्मक बोलने और लिखे जाने से हुआ है , ये पहले भी हुआ है और अब फिर से होने जा रहा है । ये नकारात्मकता सकरात्मक और सही सवालो को दबा देती है , वो जवाबो से बच जाते है और पीड़ित से नजर आते है । जिससे उनके वोटो का ध्रुवीकरण आसानी से होता है । धन्यवाद मोदी की तरफ से राहुल , कांग्रेस और अरविन्द को ।

October 05, 2016

अ सर्जिकल स्ट्राइक टोल्ड बट अनवॉच स्टोरी


 रिक्रिएट :- कई बार पुलिस सबूतों के लिए या घटना की सभी कड़ी को ठीक से जोड़ने के लिए घटना ,एनकाउंटर, अपराध आदि को फिर से वैसे ही दुबारा उसी घटना स्थल पर फिर से करती है जैसे वास्तव में हुआ था ।
मेडिकल टूरिजम :- घूमने फिरने के लिए यात्री हमारे देश आते रहते है किन्तु करीब एक दसक से ज्यादा भारत में लोग अपना ईलाज करने भी भारत आते रहे है ।
                                       जिन जिन लोगो को सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत चाहिए सेना को उन सभी को सीमा पर ले जा कर और सीमा के उस पर भेज कर वापस से उन सभी चीजो को वैसे ही रिक्रिएट करके सबूत दे देने चाहिए । जिन्होंने लोगो को खूब स्टिंग करने का प्रवचन दिया है वो अपने साथ अपना स्टिंग कैमरा भी ले जा सकते है , और और पाकिस्तान क्या दुनिया को सबूत दिखा कर जितना चाहे पोलिटिकल माइलेज ले सकते है ।


                                     हमने देर कर दी किन्तु पाकिस्तान ने सर्जिकल स्ट्राइक टूरिजम शुरू भी कर दिया और देश विदेश के पत्रकारों को टूर भी करा दिया , जबकि सारा काम किया हमने था । किन्तु अभी भी देर नहीं हुई है , हम भी वहा जा कर अपनी आँखों से सब कुछ देखने की इच्छा रखने वालो के लिए ये एक एडवेंचर टूर शुरू कर सकते है और वहाँ की सैर करा सकते है खासकर आतंकी कैम्पो की और उनकी ट्रेनिग की और टी एस दराल जी के अनुसार कुछ दिन "पाकिस्तानी और आतंकी हॉस्पिटेलिटी " का आन्नद लेने का मौका दे सकते है । चाहे तो पूरा पैकेज दे सकते है पहले आने वालो को अगली बार किसी सर्जिकल स्ट्राइक या एनकाउंटर मुठभेड़ में उन्हें साथ ले जाया जायेगा , ताकि वो सब कुछ न केवल लाइफ देख सके बल्कि उसमे साथ में सहयोग भी कर सकते है ।

                                                   किसी फिल्म डायरेक्टर को कम्प्लेमेंट्री टूर दे सकते है जिससे वो बाद में एक फिल्म बना सके "अ सर्जिकल स्ट्राइक टोल्ड बट अनवॉच स्टोरी " ताकि बाकि लोग जो वहाँ न जा सके क्योकि वो सबूत मांगने वालो जैसे महान बहादुर न थे और वहाँ जा कर कुछ देखने की हिम्मत नहीं कर सके , वो उसके नाटकीय रूप को देख खुश हो सके ।

October 01, 2016

भारत और पाकिस्तानी सर्जिकल स्ट्राइक





                                           भारत की सर्जिकल स्ट्राइक तो सफल हो गई किन्तु भारतीय  सीमा से लोगो को क्यों हटाया जा रहा है समझ से परे है । हम सभी को पता है की पाकिस्तान प्रत्यक्ष  युद्ध की जगह अप्रत्यक्ष युद्ध भारत से करता रहा है , फिर ये क्यों समझा जा रहा है कि वो सीमा पर कुछ करेगा । ये हमला भारत का पाकिस्तान पर नहीं था , बल्कि भारतीय सेना और ख़ुफ़िया एजेंसियों का पाकिस्तानी सेना और पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी और आतंकवादियो पर था ।  अब ये उनके अस्तित्व की बात है , तो उनका रिएक्शन सीमा पर नहीं होने वाला , आम लोगो के बीच होगा , और किसी भी रूप में हो सकता है | हम भारतीय पहले से ही किसी भी तरीके के पाकिस्तानी सर्जिकल स्ट्राइक को सफल बनाने के लिए बिलकुल तैयार है । हम अभी से इस बात पर झगड़ रहे है कि किसको किस तरह समर्थन देना चाहिए और किस तरह के बयान देना चाहिए , लोगो की गिनती धर्म के हिसाब से शुरू हो गई है । हम सामने से बता रहे है जी लो  ये देखो ये रहा हमारा लांच पैड हम यहाँ इकठ्ठा है , बस एक अफवाह , एक फर्जी वीडियो , कुछ नहीं तो गाय,  सूअर ,  कुछ भी दागो हम दंगे कर तुम्हारे सर्जिकल स्ट्राइक को कामयाब करने के लिए तैयार है । तुम्हे अपने कमांडो यहाँ भेज कर उनकी जान जोखिम में डालने की कोई जरुरत नहीं है , तुम्हे बस हमारे अपने सबसे जरुरी मसलो झगड़ो के आगे एक दिया सलाई और कही कही तो बस पंखा रखने की जरुरत है , हम खुद आपस में मर कट लेंगे  । कोई बम ब्लास्ट की भी जरुरत नहीं है उसमे भी तुम्हारे लोगों के पकड़े जाने का डर है ।  बस एक पहले से मरी गाय भी रख दोगे, या कोई सूअर मरा हुआ , तो काफी है , । देखो ताको किसी ने बूढी होने पर ऐसे ही सड़क पर छोड़ दी होगी , या खरीद लो दूध न देने वाली गाय को लोग आराम से पिंड छुटाने के लिए किसी को भी बेंच देते है , और सूअर कहा फेकना है तुम्हे पता है । वो न मिले तो बोलो दूसरे धर्म की लड़की छेड़ दो , अपने धर्म का तेजाब डाल दे , जीना मुहाल कर दे लड़की का, चलता है ,कोई नहीं आता बचाने साथ देने, पर दूसरी धर्म वाला करे तो सब अपने धरम वाले मिल जाते है कुछ भी करने के लिए । आओ जल्दी आओ मौका है नवरात्र में चूक गये तो मुहर्रम पर मत चूकना , हमें पता है तुमने तो रमजान की भी कदर नहीं की , मुहर्रम की क्या करोगे । उसके बाद चुनाव भी तो है सभी को अपना खास वोट भी तो पक्का करना है साथ देने के लिए तुम्हारा यहाँ बहुत लोग है उसकी चिंता चिंता न करो  हमने तो खूब मजे लिए  इस मौके के इतने दिनों बाद तुम्हे ठीक से मजा चखाया है ,  पर अफसोस की पाकिस्तान के  लोगो को ये मजा न मिल पायेगा , क्योकि तुम अपने लोगो को बता न पाओगे सीना ठोक कर की हर बार की तरह इस बार भी तुम्हारी सर्जिकल स्ट्राइक सफल रही ।  

September 27, 2016

आम नेता की किस्मे





रिपोर्टर :-  आज हम आप को मिलवाते है एक ऐसे व्यक्ति से जो आमो की नई नई किस्मे  बनाने के लिए मशहूर है , आज उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के नाम का एक नये किस्म को बनाया है । हा जी तो बताइये इस आम का स्वाद कैसा है । 
आम विशेषज्ञ :- यह एक बहुत खास तरह का आम है , इस आम की रंगत को देखिये वही आप को सबसे खास दिखेगी ये दो रंगों में रंग हुआ है ऊपर का हिस्सा आप को हरा दिखेगा और निचे का आप देख सकते है ये पिला है और इसकी खुशबू का तो कहना ही क्या, पका हुआ क्या कच्चा भी होगा तो दूर तक इसकी खुशबू जाएगी -------
रिपोर्टर बीच में टोकते हुए :- जी अच्छी बात है इस आम का स्वाद कैसा है । 
आम विशेषज्ञ :- जी हा जी है वही बता रहा हु अब जरा इस आम के आकार को देखिये , लंगड़े की तरह नोकीला दशहरी की तरह लंबा -----
रिपोर्टर :- जी जी ठीक है ठीक है  इसका स्वाद -----
आम विशेषज्ञ :- और आप को एक सबसे खास बात बताऊ की इसका छिलका देखिये इतना पतला और अंदर बिना रेशे वाला गुदा , मतलब आदमी देखते ही खरीदने के लिए आतुर हो जायेगा । 
रिपोर्टर:- जी देखिये हमारे पास समय कम है तो ये बताइये इसका स्वाद कैसा है । 
आम विशेषज्ञ :-  जी वो को कोई खास नहीं है । 
 रिपोर्टर:- क्या मतलब । 
 आम विशेषज्ञ :- अब आप को क्या लगा इसका नाम मोदी क्यों रखा है । 
 हडबडाया रिपोर्टर:-जी जी समझ गया तो आप ने देखा लिया मोदी आम अब दर्शको से विदा ले.---------  एक मिनट ठहरिये । मैं दर्शको को दिखाना चाहता हूँ एक बहुत है खास आम मुझे यहा मेज पर रखा दिख रहा है । रिपोर्टर आम विशेषज्ञ को किनारे हटाते हुए आगे बढ़ जाता है । ये देखिये ये एक खास आम यहाँ रखा है इसकी खुशबू ही इतने तेज है की मैं तो खीचा चला आया इसके पास इसकी रंगत तो देखिये हल्का पीलापन लिए कितना सुन्दर आम है तो मैंने आज तक नहीं देखा , बिलकुल लाजवाब आम दिख रहा है ये , मैं  कहता हु की ये आम बाजार में आया तो तहलका मच जायेगा ।  ये कहते हुए उसने आम को हाथ में उठा लिया । 
तभी आम विशेषज्ञ लपक कर उससे आम लेकर मेज पर रख देता है । 
रिपोर्टर :- इस खास आम को आप ने कहा छुपा रखा था और इसको आप ने क्या नाम दिया है । 
आम विशेषज्ञ :- जी ये ऐसा ही आम मैंने बनाया है की मिडिया वाले और लोग देखते है खुद बा खुद इसकी तारीफ करने लग जायेंगे । ये उन लोगो के लिए है जो दुनिया को दिखाना चाहते है की उनके घर में भी अच्छी किस्म का आम है , इसे मैंने राहुल नाम दिया है । 
रिपोर्टर :- लेकिन एक बात बताइये जब मैंने इसे उठाया तो ये काफी हल्का था । ये इतना हल्का क्यों है । 
आम विषयज्ञ :- क्योकि ये सिर्फ दिखाने के लिए है खाने के लिए नहीं , ये प्लास्टिक का है , इसे मैंने रंग कर आम की खुशबू का सेंट डाला है । 
सकपकाया सा रिपोर्टर बात संभालने की कोशिश करने लगा । अच्छा ये बताइये आप ने देश के बड़े बड़े नेताओ के नाम कर आम की किस्मे ईजाद की है , एक और नेता आज कल देश में बहुत प्रसिद्द है । केजरीवाल जी उनके नाम का कोई आम ईजाद नहीं किया है , क्या बाद में करेंगे । 
आम विशेषज्ञ ने मुंह बिचकाते हुए कहा भाई साहब मैं आम की किस्मे बनाता हु "रायते" का नहीं ;)  



नोट :- तकनीकि  समस्या के कारण किसी और के ब्लॉग और स्वयं के ब्लॉग पर भी टिपण्णी नहीं कर पा रही हूँ । इन दो सालो में तकनीक में कुछ फेर बदल हुआ है , क्या गूगल प्लस आदि पर भी अकाउंट बनाना होगा । 

September 23, 2016

स्मार्ट फोन से ज्यादा स्मार्ट




                                                         लोगो को इतना तो स्मार्ट होना ही चाहिए  जितना की उनका फोन है , किन्तु ऐसा होता नहीं है । कल दो बच्चो ने मुम्बई के पास संदिग्ध लोगो को देखने की सूचना क्या दी , स्मार्ट फोन का सही प्रयोग करना सभी ने शुरू कर दिया । बच्चो ने स्कुल का नाम भी लिया था , नतीजा आधी रात तक सभी स्कुल के व्हाट्सएप्प के ग्रुप में यही चर्चा चलती रही की फला फला स्कुल ने बंद डिक्लेयर कर दिया है , मुम्बई हाई अलर्ट पर है अपने स्कुल का क्या ।  लाख समझाने के बाद भी की कुछ नहीं हुआ है फिर भी किसी को शंका हो तो सुबह स्कुल में फोन कर पता कर ले , हर नई माँ स्कुल बंद डिक्लेयर करने वाले नये स्कुलो की लिस्ट ला कर वही सवाल दोहरा देती थी । ये हाल लगभग पूरी मुम्बई का था और नया भी नही था । पिछले साल भी मुम्बई में एक अफवाह  फैली की एक स्कुल के बाहर से कुछ लोग बच्चे उठा कर गये , एक ही फारवर्ड खबर में कई अलग अलग स्कुलो के नाम बारी बारी लिए गए , एक स्कुल का नाम देख मेरी एक मित्र ने टोका भी कि उस स्कुल में उनका बेटा पढता है और वहाँ ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है , बल्कि वहा से भी उन्हें ये फारवर्ड न्यूज़ मिली है किन्तु उसमे स्कुल का नाम दूसरा था । हम दोनों की बहस भी हो गई लोगो से की इस तरह की अफवाह फ़ैलाना बंद करे  और कुछ भी भेजने से पहले अपना भेजा प्रयोग किया करे । हालात ये हो गये की पुलिस कमिश्नर को सामने आ कर लोगो को बताना पड़ा की ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है । लोगो के पास स्मार्ट फोन तो आ गये पर उसको प्रयोग करने की स्मार्टनेस अभी तक नहीं आई , दोनों  बार मैंने लोगों को टीवी या किसी न्यूज़ साईट पर जा कर अपनी खबर पक्की करने के लिए कहा किन्तु ज्यादातर ने इसकी जरूरत नहीं समझी , जबकि स्मार्ट फोन का सही प्रयोग यही था । 
                                     
                                                            ऐसे ही एक बार स्कुल प्रोजेक्ट  के समय कई मातापिता  एप्प पर सवाल के जवाब दुसरो मांग रहे थे , दे कोई नहीं  रहा था , घंटो से प्लीज प्लीज किये पड़े थे मेरी नजर जब उस पर पड़ी तो मैंने तुरंत कहा  यही सवाल यदि आप ने अभी तक गूगल पर किया होता तो जवाब कब का मिल गया होता , बाद में लोगो ने वही किया । नई तकनीक लोगो को स्मार्ट बनाना तो छोड़िये मुझे लग रहा है और ज्यादा मुर्ख और अन्धविश्वासी बना रहा है । हर खबर पर आँख मूंद कर भरोशा कर बड़ा ही परोपकारी भाव में उसे आगे भी भेज देने में लोग जरा भी कोताही नहीं करते । इसे ११ लोगो को भेजिये से लेकर , तुरंत इन्हें खून की जरुरत है , गरीब के बच्चे को पैसे चाहिए ईलाज के लिए लिए , या मेरे दोस्त का ये बच्चा खो गया है जैसे एक ही फारवर्ड खबर सालो तक चलती है और घूम घाम कर साल में एक बार आप के पास आ जाती है , उन लोगो की कृपा से जिन्होंने कुछ समय पहले ही स्मार्ट फोन लिया है । ये सब करने में जाति , धर्म , अमीर , गरीब , छोटे , बड़े आदि आदि का कोई फर्क नहीं होता सब बराबर शामिल है । 
                                     लोग करे भी क्या जब आज सुबह ६ बजे फोन की घंटियां भी घनघनाने लगी की स्कुल चालू है की नहीं तो लगा की एक बार टीवी ऑन की कर लेते है , पर ये क्या सुबह ६ बजे तो वहा अलग की स्यापा चल रहा था , " पाकिस्तान युद्ध को तैयार , पाकिस्तान युद्धाभ्यास कर रहा है ,  लड़ाकू विमान उड़ते रहे कल रात पाकिस्तान में, ब्रेकिंग न्यूज़ , हद है किसी का कुछ नहीं हो सकता फोन जाने दीजिये इनका तो पालतू भी इनसे स्मार्ट होगा ।




  

December 27, 2013

चाय से ज्यादा केतली गर्म - - - - - -mangopeople




                                                                                बिटिया को जब भी दूध का ग्लास पकड़ाती हूँ तो , वो चीखती है की ग्लास इतना गर्म है की पकड़ा नहीं जा रहा है , दूध कितना गर्म होगा मै  उसे कैसे पी सकती हूँ और मै  उन्हें हर बार समझाती हूँ कि ग्लास के गर्म होने से दुध के गर्म होने का अंदाजा उसे नहीं लगाना चाहिए दूध गर्म नहीं है उससे ज्यादा ग्लास गर्म है :) । यही हाल हमारी राजनीतिक पार्टियो के समर्थको का है , नेता जितना नहीं बोलते है उससे कही ज्यादा उनके समर्थक बोल पड़ते है । इधर "आप" विधायक बिन्नी केजरीवाल के घर से मीटिंग छोड़ कर बाहर आये उधर समर्थक चिल्लाना शुरू कर दिए की कल पोल खोलने वाली पार्टी कि ही पोल उनके माननीय नेता जी खोलेंगे , दूसरे दिन मामला सुलटने के बाद बेचारे नेता जी को अपने ही समर्थको की बातो का जवाब नहीं देते बन पड रहा था , केजरीवाल ने अभी शपथ भी नहीं लिया किन्तु उनके समर्थक राम राज्य लाने के सपने दिखाने लगे है , चार राज्यो के  बुरी गत करने के बाद कांग्रेस और जीत की रथ पर सवार बीजेपी भी अपनी हार जीत  को भूल आगे की राजनीति में लग गई , नए समीकरण तलाशने लग गई किन्तु समर्थक आज भी वही अटके पड़े है और सोशल मिडिया में पानी पी पी कर " आप " को गालिया दे रहे है उसे घेरने का प्रयास कर रहे है । इधर राहुल उनसे कुछ सीखने की बात करते है , अपने नेताओ को "आप" की तरह जनता से जुड़ने की नसीहत देते है ,कांग्रेस उसे समर्थन दे रही है तो उधर कुछ उसके ही खिलाफ मोर्चे ले कर निकल रहे है और गिन गिन कर उनके वादे याद  दिला उन्हें पूरा होने के लिए असम्भव बता रहे है । सही भी है जब ६६ सालो में हम नहीं कर पाये तो ये क्या करेंगे, किन्तु वो नहीं कर पाएंगे उस बात पर भी पूरा विश्वास नहीं है , डर में है कि सच में पञ्च साल में पूरा न कर दे इसलिए पञ्च साल का भी समय देने को तैयार नहीं है कहते है की सब ६ महीने में ही कर के दिखा दीजिये नहीं तो आप फेल है। बीजेपी के शीर्ष नेता कब के विवादित मुद्दो को ठन्डे बक्से में डाल कर भूल गई है किन्तु समर्थको को उसका भान भी नहीं है , मोदी कहते है देवालय से पहले शौचालय , सही बात है देवालय जैसे मुद्दो से कही ज्यादा जरुरी हर घर तक विकास शिक्षा और प्राथमिक जरुरतो को पूरा करना है , नेता जानते है कि दिल्ली की कुर्सी का रास्ता विकास की रोड से जाता है सभी को ले कर चलने से मंजिल मिलती है ,न की किसी एक समुदाय को लेकर बोलने से ,आखिर वो इतने शीर्ष पर अपनी उसी काबलियत और बुद्धि से पहुंचे है  कि  कब क्या बोलना है और कब किन मुद्दो को गायब कर देना है ,  वो तो जम्मू भी जाते है तो कश्मीरी पंडितो पर एक लाईन भी नहीं बोलते है किन्तु समर्थक ये सब समझते ही नहीं है और ऐसी ऐसी बाते बाहर बोलते है उनसे उम्मीद करते है कि बेचारे नेता की छवि लाख चाहने प्रयास करने के बाद भी नहीं बदल पाती है । नेता वही सही और सफल है जो समय के साथ बदले और जनता के इच्छानुसार मुद्दे उठाये, कहते है की काठ की हांड़ी बार बार नहीं चढ़ती है , मझा नेता बार बार एक ही संवेदनशील और भावनात्मक मुद्दो को नहीं उठाता है ।  अब देखिये जिस मनरेगा ने गरीबो की भलाई वाली स्कीम ने यु पी ए को दूसरी बार चुनाव जिताया , वही दूसरी गरीबो की स्कीम भोजन का अधिकार और कैश ट्रांसफर उसे चार राज्यो में जीत क्या सम्मान जनक सीट भी नहीं दिला सकी , उसका भ्रष्टाचार सब स्कीम पर भारी पड़ा। बीजेपी भी जानती है की उसकी हिंदूवादी छवि न कभी उसे सरकार दिला पाई है और न आगे दिला पायेगी , वो उसे सीटे तो दिला सकती है किन्तु सत्ता नहीं , सही समय पर उसने अडवाणी को किनारे किया और वाजपेयी को आगे , मोदी ने सही समय पर सिखा और अपनी छवि विकास पुरुष की बना ली । किन्तु समर्थक राजनीति की इन हकीकतो को समझते नहीं है और उसी पुराणी छवि को पकड़ कर अपने ही नेता को मुसीबतो में डालते रहते है ।

                                               सोसल मिडिया हो या अन्य जगह दिल्ली और " आप " को लेकर ऐसी ऐसी राजनीतिक चालो का वर्णन है कि समझ नहीं आ रहा है की शिकारी कौन है और शिकार कौन , लगा बीजेपी सरकार बनाएगी किन्तु उसने " आप" की नैतिकता वाली चाल चल दी और गेंद " आप" के पाले में इस उम्मीद में डाल दी कि वो तो सरकार बनाएंगे नहीं ६ महीने विधान सभा स्थगित हो जायेगी फिर लोकसभा चुनावो के बाद कांग्रेसियो की अंतरात्मा जगा कर सरकार बना ली जायेगी  , लगे हाथ कांग्रेस ने भी समर्थन इस उम्मीद में दे दिया कि वो तो लेंगी ही नहीं हम दोनों चचेरे भाई उसे भगोड़ा घोषित कर देंगे और मामला फिलहाल लोकसभा चुनावो तक टाल देंगे और सरकार न बनाने पर "आप " वालो की जम कर खबर लेंगे ताकि वो लोकसभा चुनावो में ज्यादा कुछ न कर पाये , किन्तु हाय रे हाय जो " आप " वाले एक समय फसंते दिख रहे थे उन्होंने ने तो फिर से वोटिंग करा कर सरकार बनाने की ठान ली और अपने वादो को पूरा करने की भी , लो जी अब तो कांग्रेस और बीजेपी दोंनो की ही चाल उलटी पड़ती दिखने लगी , नतीजा दोनों की ही तल्खी और बढ़ गई " आप " के प्रति , बीजेपी के तो मुंह से निवाला चला गया , और अब कांग्रेस को डर है कि पिछले १५ सालो में जो खाया है दिल्ली में वो कही बाहर न आ जाये , जो थोड़ा बाहर आया है उससे तो ये हाल है जब और आयेगा तो आगे क्या होगा । अब दोनों उम्मीद लगाये बैठे है कि उनका तारण हार दिल्ली की बाबू ब्रिगेट करेगी , एक भी फाईल आगे नहीं बढ़ने देगी एक भी काम नहीं होने देगी , किन्तु उनकी इस उम्मीद पर भी तुषारपात होता दिख रहा है , अब खबर या अफवाहे जो भी आ रही है कि बाबू ब्रिगेट तो खुद ही अपनी जान बचाने में लगी है , कोई फाईले फड़वा रहा है तो कोई ट्रांसफर ले रहा है तो कोई आफिस में ताले लगा कर काम कर रहा है । एक हंसी मुझे तब आई थी जब टीवी चैनलो में मैंने अपने जीवन में पहली बार ( शायद दुसरो ने भी ) कांग्रेस और बीजेपी को गलबहिये करते एक दूसरे की पीठ थपथपाते और एक दूसरे की हा में हां मिलाते देखा लोकपाल के मुद्दे पर वो भी खुलम खुल्ला , चोरी छुपे तो दोनों ये करती ही आई थी , दूसरी हंसी अब आ रही है इस बाबू ब्रिगेट का हाल देख कर , मुझे कमल हासन की फ़िल्म इन्डियन याद आ रही है जिसमे वृद्ध स्वतंत्रता सेनानी बने थे और रिश्वतखोरो को सजा देते है उनका डर सब में इतना हो जाता है कि उनके जाने के बाद भी दूसरे लोग उनके जैसी बेल्ट पहन कर ही लोगो को डरा देते है ।


                                                                समझ नहीं आता की अरविन्द से लोगो को इतना डर और चिढ क्यों है क्यों उनकी पार्टी बनाने से दोनों बड़ी पार्टिया इतनी खीजे हुई है , शरद पवार , राजठाकरे , देवगौड़ा , जगन मोहन , येदुरप्पा , कल्याण सिंह , उमा भारती जैसे न जाने कितने लोगो ने पार्टी तोड़ कर या नई राजनीतिक दलो को खड़ा किया , सभी ने किसी न किसी का वोट काटा और राजनीति में अपने लिए जगह बनाई या हार कर ख़त्म हो गए , उनके लिए ये तल्खी कभी भी इन दो बड़ी पार्टियो ने नहीं दिखाई जो वो आज "आप " के लिए दिखा रही है । शायद ये पहला मौका है जब उन्हें लग रहा है कि " आप " राजनीति में उनके बनाये नियमो के तहत नहीं काम कर रही है , लोकतंत्र का जो रूप उन्होंने आज तक जनता में फैला दिया था  जिसमे से लोक ही गायब है " आप " फिर से उस लोकतंत्र में लोक को सामिल करके उनका खेल बिगाड़ रही है , वो राजनीति करने के तरीके को बदल रही है , वो आम लोगो में अपने अधिकारो के प्रति जागने की जो भावना बैठा रही है वो आगे उन्हें परेशान करने वाले है , वो उनमे से ही एक नहीं है , जो सत्ता पैसे ताकत के लिए हर तरीके से समझौते कर लेती है , ये जिद्दी लोगो का वो गुट है जो सच में कुछ बदलने का ठान के आई है । इतना विश्वास तो खुद मुझे भी नहीं है "आप " पार्टी पर ,मै  मानती हूँ कि अरविन्द और उनके आस पास के कुछ लोग बदलाव के मकसद से काम कर रहे है जिसमे सत्ता का लालच नहीं है , क्योकि वो खुद एक बड़ा पद जो काफी ताकतवर होता है को छोड़ कर आये है और जमीनी रूप से काफी काम किया है कित्नु जिस बदलाव की वो बात कर रहे है वो ये काम अकेले नहीं कर सकते है , समग्र विकाश के लिए और ऐसे लोग की फौज वो कहा से लायेंगे , उनकी पार्टी में लगभग सभी नए है जिनमे से कई तो सता की ताकत को कभी महसूस ही नहीं किया है , वो उसे त्यागते हुए कैसे अपनाएंगे । इसके लिए तो भारतीयो का डी एन ए ही बदलना पडेगा जो भ्रटाचार का नमक खा खा कर उसका आदि हो गया है :)) ।

                                            राजनीति के इस बिसात में राजनीतिज्ञो और बाबू के बाद नंबर आएगा आम लोगो का जो कटिया डाल कर बिजली लेते है , मीटर में गड़बड़ी करके बिल कम करते है , ट्रैफिक रूल नहीं मानते है ,  जो पुरे कागजात न होने के बाद भी चाहते है कि कुछ ले दे कर उनका काम हो जाये , जो सरकारी दफ्तरों की लम्बी लाइनो से बचने के लिए दलालो का सहारा लेते है , जो घर बैठे ही ड्राइविंग लाइसेंस ले लेना चाहते है , जो अपने घरो में अवैध निर्माण करते है , पानी का गलत कनेक्शन लेते है आदि आदि क्या वो आम आदमी सुधरने के लिए तैयार है , कही ऐसा न हो जो आम आदमी वोट दे कर अरविन्द को उस गद्दी पर बैठाया है वही उनकी कड़ाई से उब कर खुद ही उन्हें गद्दी से उतार दे या ये हो सकता है कि आम आदमी ने पिछले ६६ वर्षो से जो गलती की है , उसे फिर से न दोहराए , इन दलो को फिर से अपने मुद्दो से भागने न दे,  जो सुधर गए है उन्हें बिगड़ने न दे , अपने नेताओ पर नजर रखे , अपने अधिकारो के प्रति सजग रहे , सिर्फ वोट डी कर पञ्च साल के लिए अपने हाथ न कटा ले , अपने नेताओ से सवाल करता रहे और लोकतंत्र से फिर से लोक को गायब होने का मौका न दे । तो लोगो से निवेदन है कि अपना दिल और दिमाग खुला रखे राजनीति को राजनीति की तरह ही ले सही को सही ओए गलत को गलत कहे ।


चलते चलते

               कुछ्महिनो पहले एक ब्लॉग पर पढा की सभी न्यूज चैनल हिन्दू विरोधी है और बीजेपी की खबर नहीं दिखाते है , मैंने भी अपनी गन्दी आदत के अनुसार वहा टिप्पणी दे दिया की भाई कोई भी तीज त्यौहार हो या ग्रह नक्षत्र की गड़बड़ी हिंदी न्यूज चैनलो तो इन्ही खबरो से भरेपड़े है , १५ अगस्त को जब आँख खुली और टीवी खोला तो एक बार तो मै कन्फ्यूज ही हूँ गई लगा की मै  कोमा से बाहर आई हूँ , मोदी जी प्रधानमत्री बन गए है और भाषण दे रहे है हर न्यूज चैनल पर  भाषण सीधा आ रहा था , वो कही रैली करे और उसका सीधा प्रसारण ये चैनल न करे से तो सम्भव ही नहीं है और कितना प्रसारण चाहते है । भाई साहब नाराज हो गए कह दिया कि मुझे हिन्दू धर्म छोड़ देना चाहिए हिन्दू होने के लायक नहीं हूँ , और तो और मै  देश द्रोही हूँ गद्दार हूँ , तब से दुखी थी की कोई मोदी समर्थक मिल जाये और मुझे राष्ट्रभक्ति का सटिफिकेट दे दे नहीं तो कम से कम हिन्दू होने का तो देदे मै  दोनों से निकल बाहर हो गई हूँ किन्तु वो मिल नहीं रहा था , कारण आज पता चला कि मै तो कामरेड हूँ ;-) अपने लिए ये सम्बोधन सुन कर अच्छा लगा गर्व सा हुआ बिटिया कई बार पूछ चुकी है कि मै बड़ी हो कर क्या बनूँगी क्या बताऊ उन्हें कि कुछ नहीं बनी बस उसकी मम्मी भर हूँ , अब कह सकती हूँ कि मै कामरेड बन गई :) वैसे हद है यार दुनिया की खबर लेने के चक्कर में मुझे ये भी नहीं पता चला की मै  कब से नारीवादी के साथ कामरेड भी बन गई । ब्लॉग जगत में आ कर बहुत सारे तत्व ज्ञान अपने बारे में पता चल रहा है , पता नहीं अब तक कैसे जी रही थी । निवेदन है की बताये की ये कामरेड किस धर्म जाति और देश का निवासी होता है , अपने बारे में इतनी तो  जानकारी हो :))))


नोट :-चलते चलते की बात अपने ऊपर यु ही किये गए टिप्पणी को हँसने हँसाने के लिए मजाक में लिखी गई है उसे कटाक्ष का गम्भीरता से न ले , ऐसा मेरी सहज बुद्धि कहती है ;-)

                                       





December 10, 2013

रणनीति या मौके की नजाकत - - - - -mangopeople



                                        शायद ये हमारे भारतीय राजनीति  का ऐतिहासिक समय  है ,जो न तो आजादी के बाद से आज तक आया है और न ही आगे के ६०० सालो तक आयगा जब दो राजनीतिक  दल कुर्सी और सत्ता खुद लेने के लिए नहीं बल्कि उसे न लेने के लिए बहस कर रहे  है , ये शायद पहला मौका है जब  राजनीतिक  दल पक्ष की  जगह विपक्ष में बैठने के लिए लड़ रहे है , शायद ये पहला मौका है जब पक्ष में कोई है ही नहीं और विपक्ष के लिए दो दो पार्टिया खड़ी है । किन्तु जिस तरह इस संसार में कुछ भी स्थाई नहीं है उसी तरह ये समय काल और व्यवहार भी स्थाई नहीं है , निश्चित रूप से इस त्याग के पीछे ६ महीने बाद होने वाला लोकसभा चुनाव है , जिसमे सभी साफ सुथरे दिखाई देना चाहते है ,साथ में एक  डर और भी है , भले सीडी और स्टिंग के किंग जेल में है किन्तु उनके अर्जुन एकलव्य जैसे शिष्य बाहर है क्या पता सामने वाला बिकने की  जगह   सीडी बना रहा है , आखिर अभी लोकसभा चुनाव भी तो जीतने  है , जहा कांग्रेस को बी जे पी के खिलाफ कुछ ऐसे ही सबुत चाहिए जैसे एक बार उनके पास छत्तीसगड़ में अजित जोगी के खिलाफ था , और "आप" को भी बीजेपी के लिए वैसे ही अभियान चला कर जितना है जैसा उन्होंने कांग्रेस के खिलाफ जीता है , भ्रष्टाचार के आरोप लगा कर । सो बीजेपी भी फूंक फूंक कर कदम रख रही है और एक राज्य में सरकार बनाने ,जो अंततः उसकी ही होने वाली है ,के  लिए वो अपने उस खेल में पानी नहीं फेरना चाहती है जो वो देश में सरकार बनाने के लिए खले रही है । ये बात " आप " भी जानती है सो वो भी चुचाप तमाशा देख रही है और अति उत्साहित मिडिया की जमात  की तरह व्यवहार नहीं कर रही है । इन दोनों के सामने कुछ साल पहले के बिहार राज्य का उदहारण भी है की कैसे त्रिशंकु विधान सभा को रात के २ बजे भंग किया गया और नितीश की सरकार नहीं बनने दी गई और परिणाम स्वरुप हुए चुनावो में नितीश को प्रचंड बहुमत मिल गया । मजेदार स्थिति है दोनों ही बड़ी पार्टी एक ही दाव खेल रही है , देखना होगा अंत में जीत किसके हाथ लगेगी , यदि दुबारा चुनाव हुए तो । "आप " चुप है कि जब एक साल में यहाँ आ गए तो ६ महीने और बिना किसी जिम्मेदारी ( सरकार चलाने ) के वो अपना सारा समय और ऊर्जा लोकसभा के चुनावो की  तैयारी और  दूसरे राज्यो में अपनी पहुंच को बढाने के लिए कर सकते है , और बीजेपी ये दिखाने की सोच रही है की देखिये कांग्रेस के विकल्प के लिए हम सही है सच्चे ईमानदार तीसरे विकल्प की  जरुरत ही क्या है ।

                                               " आप " इतने कम समय में दिल्ली में जो जगह बनाने में कामयाब रही है उसके लिए बधाई के पात्र किन्तु याद रखिये की सत्ता के बाहर रह कर सिद्धांतो और उसूलो की बात करना आसान है किन्तु जब सत्ता हाथ में आ जाये तो उस ताकत के साथ अपना व्यवहार सामान्य रखना आसान नहीं होता है , ये सत्ता की ताकत कइयो को अपने नशे के लपेटे में ले लेती है , और ये शुरू भी हो गया , जब उनके एक विधायक ने शानदार विजय जुलुस निकाल दिया ( जहा उनका हांरे कांग्रेसी विधायक से झगड़ा भी हो गया और उन पर हारे विधायक की पत्नी से छेड़छाड़ का केस भी दर्ज हो गया  ) हा बाद में मनीष सिसोदिया ने उन्हें ऐसा न करने के लिए कह दिया , किन्तु " आप " को ये बात ध्यान में रखनी होगी की हम सभी के खून में पारम्परिक  राजनीतिक दलो  ने ऐसी बातो को भर दिया है की हम उन आडम्बरो और ताकत प्रदर्शन को भी लोकतंत्र का हिस्सा मानने लगे है । अब उनके ऊपर और जिम्मेदारी आ गई है की खुद को आम आदमी कहने वाले और अब खास बन चुके ये लोग अपना व्यवहार भी आम आदमी जैसा ही रखे और उसी नैतिक मूल्यो और सिद्धांतो की बात पर कायम रहे , जिसके दम पर वो यहाँ आये है । कुछ को छोड़ दे तो आम भारतीय इस व्यवस्था परिवर्तन और सरकारो के बदले व्यवहार के लिए तैयार है ,गेंद अब उनके पाले में है , निभा ले गए तो बड़े बन जायेंगे नहीं निभा पाये तो उनका हाल भी बाकि विकल्प बन कर उभरी तीसरी शक्तियो जैसा ही होगा । वैसे " आप " की जीत ने पुराने राजनीतिक दलो पर ये दबाव तो बना ही दिया की भ्रष्टाचारी , बाहुबली और अपराधियो को टिकट देना अब उनके लिए आसान नहीं होगा और उन्हें चुनावो में साफ सुथरी छवि वाले उम्मीदवारो को खड़ा करना होगा । देखते है की कितने राजनीतिक दल इस सबक को सिखते है ।
                                                                 

                                  बीजेपी दुखी है वो तिन राज्यो में चुनाव जीत गई उसके बाद भी मिडिया का फोकस उन पर न हो कर आम आदमी पार्टी की तरफ है , दुखी होना लाजमी है , मोदी को मीडिया का सारा एटेंशन लेनी की आदत हो गई थी अब उसका फोकस बदलना दुखी कर रहा है , और डर भी पैदा कर रहा है की कही जो लहर ,हवा चलने की बात वो अपने लिए कर रहे थे , वो कही किसी और की तरफ से न बहने लगे । डरना भी चाहिए , क्योकि वो भी कांग्रेस का विकल्प बन कर , बदलाव की बात कर और खुद को डिफरेंट कह कर इस राजनीतिक मैदान में कूदे थे , और आज स्थिति ये है कि उनका भी कांग्रेसीकरण हो गया है , नतीजा आज फिर उन्ही बातो को कह कर कोई और भी मैदान में है जो उनका खेल बुरी तरह बिगाड़ सकता है । वो तो सोच बैठे थे की बिल्ली के भाग से छीका टुटा और लोकपाल आंदोलन में बढ़ चढ़ कर अपने लोगो को हिस्सा लेनी दिया उसे कांग्रेस विरोधी  आंदोलन बनाया , किन्तु पता न था कि एक दिन वही आंदोलन उनके खिलाफ भी चला  जायेगा ,बीजेपी के लिए तो ये भष्मासुर जैसा हो गया । वैसे चाहे तो वो अभी से सबक सिख सकती है वैसे उसने प्रयास भी शुरू कर दिया था , और दिल्ली  में हर्षवर्धन जैसे साफ दिखने वाले व्यक्ति को अपना मुख्यमंत्री घोषित करके लेकिन देर से , अब ये देरी उसे लोकसभा के चुनावो में नहीं करनी चाहिए और कम से कम तब तक के लिए ये अपने कांग्रेसी चोले को उतार कर उससे अलग दिखना शुरू कर देना चाहिए ताकि दोनों को एक ही तराजू में न तौला जा सके ।

                                                 कांग्रेस तो निश्चित रूप से इस समय शॉक की स्थिति में है और उसके लिए अब बहुत देर भी हो चुकी है न केवल ६ महीने बाद होने वाले आम चुनावो के लिए बल्कि उसके बाद होने वाले कुछ अन्य राज्य के चुनावो के लिए भी जहा उसकी ही सरकार है । ये ठीक है की आत्मविश्वास बनाये रखने के लिए हम सभी सामने खड़ी चुनौती को अनदेखा करते है और दिखाते है की कुछ है ही नहीं किन्तु सच में ऐसा नहीं मान बैठते है , यही पर कांग्रेस ने गलती कर दी उसने तो कहने के साथ ही ये मान भी लिया था की मोदी और अरविंद उसके लिए कुछ है ही नहीं , ये अहंकार उसे ले डूबा और आगे भी ले डूबेगा ये तय है । राहुल आज भी सिख ही रहे है , हद हो गई अब वो साल पहले बनी पार्टी से भी सिख रहे है, उनका ये रवैया उन्हें भी ले डूबेगा और जल्द ही कांग्रेसी प्रियंका प्रियंका के नारे लगाते दिखेंगे , अच्छा हो वो जल्द सिख कर उसे आजमाना शुरू करे और पुराने घाघ कांग्रेसियो को रिटायर करके कमान पूरी तरह से अपने हाथ में ले ताकि जो वो कहते है उसे अपनी पार्टी में लागु करवाने में उन्हें कोई परेशानी न हो और हर बार कांग्रेस के विकल्प के रूप में न कोई उभरे और न उसे राजनैतिक वनवास पर जाना पड़े। अच्छा होगा की २०१४ -१९ को छोड़ उन्हें अब २०२४ की तैयारी करनी चाहिए , कांग्रेस इससे ज्यादा सत्ता से दूर नहीं रहती है और हर बार की तरह पलट कर वापस आएगी , यदि बीजेपी ने खुद से कांग्रेस को बाहर नहीं निकाला , यदि अरविंद अपने सिद्धांतो पर नहीं टिके रहे तो ।


                      व्यक्ति पूजा शायद इंसानी स्वभाव है जिसे हम कभी भी नहीं बदल सकते है , आजादी से आज तक हम यही करते रहे है , हमेसा एक चहरे के पीछे भागते है , वैसे ये चलन हमारे देश तक ही सिमित नहीं है हाल हर जगह का यही है ।  चाहे नेहरु ,इन्दिरा हो या वाजपेयी ,मोदी या  जेपी और अब अरविंद , हम  अपने ढरे पर चल रहे है । ईमानदारी से हम बता सकते है की वोट उम्मीदवारो को नहीं अरविंद , शिवराज, वसुंधरा , रमन , मोदी और चुनाव चिन्हो को पड़े । हम  लोकतंत्र के उस मौजूदा रूप के लिए नहीं बने है जो इस समय देश में लागु है । इसे देखते हुई लगता है कि वाकई समय आ गया है की इस बात पर विचार किया जाये कि क्यों न जनता अपने प्रतिनिधियो के साथ ही अपने  प्रधानमत्री या मुख्यमंत्री का चुनाव  खुद ही करे न कि उसके चुने प्रतिनीधि जो की वास्तव में भी करते नहीं है , चुने गए प्रतिनीधि सदन के नेता का चुनाव करेंगे जैसी बाते केवल संविधान में लिखा भर है असल में क्या होता है ये हम सभी को पता है । जब जनता नेता और चुनाव चिन्हो को ही वोट देती है तो उसे ही ये अधिकार मिलना चाहिए की वही सीधे अपना सर्वोच्च नेता क्यों न चुने जैसे कई अन्य देशो में चुना जाता है , कम से कम आज दिल्ली में जैसी हालत है वो तो न होगी , चुनाव के बाद ही दूसरे चुनावो की बात होने लगी एक सरकार तो बन ही जायेगी और देश को उसके पसंद का नेता मिलेगा ।

                                   कहते है की एक झूठ बार बार बोला जाये तो वही सच बन जाता है , वही हाल हम भारतीयो का है । जोड़ तोड़, खरीद फरोख्त , दल बदल , मौका परस्ती , हर हाल में सत्ता की चाहते, उसूल सिद्धांत नैतिकता बेमतलब  और राजनीति में सब जायज है जैसी बाते हम इतना देखते आ रहे है की अब  हमें वो सब भी लोकतंत्र का ही एक हिस्सा लगने लगा है । आज कितने ही आराम से हम सब और मिडिया भी खुले आम ये बाते कर रहे है की कोई भी किसी से भी समर्थन ले ले कोई किसी को भी खरीद ले और सरकार बना ले , " आप " और बीजेपी  पार्टी की नैतिकता वाली बात तो हमें हजम ही नहीं हो रही है और लोग साफ कह रहे है कि ये क्या बकवास है चुपचाप सरकार बनाओ जो भी समर्थन दे , ये तो हाल है अपने देश का और बात करते है राजनैतिक व्यवस्था को बदलने की ।

चलते चलते 

                      बीजेपी को सरकार नहीं बनानी है उसे विपक्ष में बैठना है " आप " को भी सरकार नहीं बनानी है उसे भी विपक्ष में ही बैठना है और कांग्रेस सोच रही है कि  कम्बखत दोनों को विपक्ष में ही बैठना था तो मेरी सरकार ही क्या बुरी थी , मेरा ये हाल क्यों किया । 



                                           








November 27, 2013

पुरुषो का कोई चरित्र नहीं होता है ? - - - - -mangopeople

                                 


                                                            तेजपाल के बयान के बाद एक सवाल मन में उठा रहा है कि,  क्या पुरुषो का कोई चरित्र नहीं होता है । तेजपाल के ऊपर रेप के आरोप लगने के बाद उन्होंने अपने बचाव में ये घटिया दलील दी कि , हा जो लड़की कह रही है वो हुआ किन्तु जो भी हुआ वो सहमति से हुआ । सोचती हूँ की  हम किस तरह के समाज में रह रहे है जहा एक विवाहित पुरुष अपने से आधी आयु की लड़की , अपनी बेटी की मित्र और अपने मित्र की बेटी के साथ एक सार्वजनिक जगह पर इस तरह के सम्बन्ध बनाने को कितने आराम से स्वीकार कर रहा है , किस उम्मीद में की उसके इस बयान पर समाज उसके चरित्र पर कोई उंगलिया नहीं उठाएगा , उसे अपराधी नहीं माना जायेगा , नैतिकता के सवाल नहीं खड़े कियी जायेंगे और समाज में वो,  ये स्वीकार करने के बाद भी उसी तरह स्वीकारा जायेगा जैसे कुछ हुआ ही नहीं है , क्योकि वो पुरुष है । क्या पुरुषो का कोई चरित्र ही नहीं होता मतलब चरित्र जैसी चीजे क्या उनसे जुडी हुई नहीं है ये मात्र महिलाओ के एक अंग जैसा है , जो पुरुषो में नहीं पाया जाता । अब कल्पना कीजिये की  कोई स्त्री इस बात को स्वीकारे तो समाज का क्या रवैया होगा , लोगो की सोच क्या होगी , हमारे भाषायी किताबो में ऐसी महिलाओ के लिए शब्दो की कमी नहीं है और आज से नहीं हमेसा से है , जबकि पुरुषो के लिए ये एक तरह का सामाजिक मान्यता प्राप्त सम्बन्ध जैसे है , जिसके कारण हर दूसरा आरोपी पुरुष यौन शोषण , बलात्कार के आरोप लगते ही ये घटिया दलील देने लगता है की दोनों के बिच जो हुआ वो सहमति से हुआ , यदि सामाजिक रूप से ऐसे सम्बन्धो को लेकर पुरुषो को ये छूट न मिली होती तो ऐस दलील देने से पहले भी आरोपी हजार बार सोचते ।


                                  अरुंधति राय का लेख पढ़ा जिसमे वो कहती है कि मै  अभी तक चुप थी क्योकि क्योकि एक गिरते हुए मित्र पर क्या वार करना , किन्तु अब जिस तरीके से लड़की पर फांसीवादीयो से मिल कर साजिश  करने , और सब कुछ सहमति से होने की बात कर दूसरी बार उस का रेप किया जा रहा है , तो अब चुप रहना मुश्किल है , और अब समय है की सच के साथ खड़ा हुआ जाये । मै  उनकी बात से सहमत हूँ  , ऐसे मामलो में पीड़ित के लिए शिकायत करने के बाद  दर्द , परेशानी और समस्याओ का एक नया और उससे भी बड़ा दौर शुरू होता है , जो उसने पहले सहा है और जिससे लड़ना ज्यादा कठिन होता है , जब पीड़ित के ही चरित्र पर उंगलिया उठाई जाने लगती है और आरोपी के सहयोगी ज्यादा सक्रिय हो जाते है , आरोपी को बचाने के लिए , इसलिए जरुरी है की ऐसे समय में चुप रह कर मौन सहयोग की जगह हम  सभी को खुल कर पीड़ित के पक्ष में खड़ा होना चाहिए , ताकि उसे भी लगे की एक ताकतवर और अमिर आरोपी के मुकाबले में उसे जन सहयोग मिला है , समाज में भी लोग है जो उस पर विश्वास  करते है और उसके साथ खड़े है ,ताकि उसकी हिम्मत न टूटे और वो आगे अपनी लड़ाई लड़ सके । मामला कोर्ट में है जांच हो रही है इसलिए इस पर क्या कहे जैसे बेकार के बहाने बनाने की जरुरत नहीं है , खुद तेजपाल की  स्वीकृति और एक के बाद एक तहलका से अलग होते कर्मचारियो की बढती लिस्ट खुद सच को बया कर रही है ।

                                                 इस केस से एक विचार और मन में आया है कि अक्सर हम कहते है कि जीतनी ज्यादा महिलाए लडकिया काम करने के लिए बाहर आयेंगी वो उतनी ज्यादा ही सुरक्षित होती जाएँगी  , समाज की लडकियो के प्रति सोच बदलेगी , पीड़ित लडकियो  की  ताकत बनेगी और दूसरे लडकियो में भी आत्मविश्वास पैदा करेंगी ,  अब तो ये सोच गलत सी लगती है ।  पीड़ित ने न्याय के लिए जिस सोमा चौधरी से शिकायत की वो एक बार भी उसके पक्ष में खड़ा होना तो दूर उन्होंने सच को ठीक से जानने का प्रयास और कोई भी उचित कार्यवाही ही नहीं की ,  बल्कि मामले को दबाने और लीपा पोती का प्रयास किया , वो चाहती तो किसी का भी पक्ष लिए बिना तटस्थ रह कर कमिटी बना जाँच उसके हाथ में दे देती किन्तु उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया और अपने मित्र ,गॉडफादर को बचाने के प्रयास करने लगी । इस प्रकरण से क्या समझा जाये  की भले ही स्त्री कितनी भी स्वतंत्र को जाये उंचाइयो को छू ले वो पुरुष सत्ता से टकराने से डरती है , उसके प्रभाव से बाहर नहीं आ पाती है  या उसका व्यवहार भी उन्ही आम घरेलु स्त्रियो सा होता है जो अपने बेटे, भाई ,पिता ,पति के बड़े से बड़े गलतियों को छुपाने का उसे बचाने का प्रयास करती है या उसका व्यवहार भी अन्य सामान्य लोगो की तरह होता है जो हर हाल में अपने अपनो का करीबियों का ही साथ देते है चाहे वो कितने भी गलत हो , या उनका व्यवहार उस समाज की तरह ही है जो हमेसा लडकियो को ही दोष देता है जो लडकियो को ऐसे मामले में चुप रहने, ज्यादा न बोलने और जो मिला उसमे ही संतुष्ट रहने की सलाह देता है । अब सोचिये की सोमा ने जो व्यवहार किया है उससे लड़किया का आत्मविश्वास कम नहीं होगा , जब उन्हें लगेगा की एक स्त्री हो कर भी वो किसी अन्य स्त्री की परेशानी उसके आरोपो की गम्भीरता को नहीं समझा उसको सच नहीं माना , क्या अब कोई भी लड़की अपने आफिस या कही भी यदि इस तरह की परेशानी से गुजरती है तो क्या वो कभी भी अपने महिला बाँस , महिला अधिकारी या अन्य महिला से इस बात की शिकायत करने की हिम्मत कर पायेगी ।शोमा ने इस प्रकरण में बहुत ही गलत उदाहरण सामने रखा है और वो भी तब जब उनके न जाने कितने ही इंटरव्यू हम देख चुके है जिसमे वो लडकियो के यौन शोषण , बलात्कार , छेड़छाड़ के खिलाफ बोलते हुए और उनके सुरक्षा की बात करती नजर आ चुकी है , यहा तक की वो उस सम्मलेन में भी इस विषय पर विचार विमर्स कर रही थी जहा पर लड़की के साथ ये सब हुआ ।

                                                              कुल मिला कर इस प्रकरण से समाज और लोगो के खोखलेपन को और उजागर ही किया है , बताया है की नैतिकता की बड़ी बड़ी बाते करने भर से कोई चरित्रवान नहीं हो जाता है , समाज का कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं है जहा लडकिया सुरक्षित है , समाज में किसी भी वर्ग की लड़की इस तरह के अपराध से सुरक्षित नहीं  है , अब वो समय आ गया है जब लडकियो को किसी भी व्यक्ति पर भरोषा नहीं करना चाहिए और अब जरुरत ये है की लडकिया  बिना किसी शर्म , लिहाज से इतनी जोर से प्रतिरोध  करे,  ऐसे कृत्य को न कहे की किसी भी व्यक्ति की हिम्मत आगे बढ़ने की न हो , वरना आप के हलके शब्द उसकी आयु और सम्बन्धो का लिहाज और आप की शर्म आरोपी को बाद में उसे आप की सहमति का नाम देने में देर नहीं लगेगी ।


चलते चलते 
               
                 पति ने पूछा ऐसे प्रकरणो में लडकिया जोरदार तरीके से तुरंत ही विरोध क्यों नहीं करती उसे पिट दे, उसकी आँख नाक फोड़ दे  , टीवी पर महाभारत आ रहा था , मैंने कहा की पांडवो के साथ क्या क्या नहीं हुआ कितना अपमान सहना  पड़ा किन्तु उसके बाद भी युद्ध भूमि में अर्जुन कमजोर पड  गए अपनो के सामने , एक लड़की के लिए ऐसी हरकत बहुत ही डराने वाला होता है और तब तो डर और भी बढ़ जता है जब सामने कोई अपना , कोई परचित या ऐसा व्यक्ति हो जिससे आप इस चीज की उम्मीद ही न करे , फिर उनके प्रति लिहाज और उसकी और आप की इज्जत और  इस बात का डर की कोई भी आप की बात का विश्वास नहीं करेगा की आप का अपना ही कोई आप के साथ ये कर सकता है या ये व्यक्ति आप के साथ ऐसा कर सकता है , साथ ही अपराधी की बड़ी आयु , आप का उससे सम्बन्ध और समाज में उसकी हैसियत भी प्रतिरोध को प्रतिक्रिया को प्रभावित करता है , किसी अनजान के प्रति हम जल्दी आक्रमक हो सकते है जबकि जानने वाले के प्रति हम आक्रमक नहीं हो पाते है ।   आरुषि केस में एक नौकर को अपनी बेटी के कमरे में देख कर जो आक्रमकता पिता तलवार ने दिखाई वही प्रतिक्रिया वो तब नहीं दे पाते यदि उसकी जगहा उनकी भतीजा , भांजा या परचित या संबंधी जैसा कोई होता , यहाँ तक की बेटी की जगह बेटे के कमरे में नौकरानी को देखते तब भी उनकी ये प्रतिक्रिया न होती , इसमे सम्बन्धो का लिहाज भी है , समाज का डर भी और स्त्री, पुरुष बेटी , बेटी  के बिच का फर्क भी ।                                   












                                             

                                                 

November 18, 2013

खेल, सचिन , राजनीति और भारतरत्न - - - - -mangopeople

 


कुछ खबरे

१- सचिन को राज्य सभा के लिए चुना गया ।
२- "सचिन मौजूदा ५ राज्यो के चुनावो में , कांग्रेस के लिए चुनाव प्रचार करेंगे " - कांग्रेस के कई बड़े नेता ।
३- सचिन का किसी भी चुनाव प्रचार में आने से इंकार ।
४- राजीव शुक्ला ने कहा की सोनिया जी ने सचिन को राज्यसभा के लिए चुना ।
५- २६ जनवरी २०१४ को सचिन को भारतरत्न देने की  सम्भावना ।
६- रिटायमेंट के साथ ही सचिन को भारत रत्न दिए जाने की घोषणा ।

इस खबरो से आप को अंदाजा लग ही गया होगा की मामला क्या है

नहीं समझ आया दो और खबर

७ - लता जी ने मोदी की  तारीफ की
८- कांग्रेसी नेता ने लता जी से भारत रत्न वापस करने के लिए कहा  ।

इन खबरो के बाद कांग्रेस हाय हाय के नारे लगाने वालो के लिए भी दो खबर

९- अमर्त्य सेन ने मोदी को अयोग्य कहा
१० - बी जे पी नेता ने अमर्त्य सेन से भारतरत्न वापस लेने की बात कही ।


                                            लो जी भारत रत्न भारत सरकार की  नहीं कांग्रेस और बी जे पी की निजी बपौती है , जिसे वो देना चाहे दे और लेने वाला उनका गढ़ गुलाम हुआ जो आगे से उनकी स्तुति वंदना के सिवा और कुछ नहीं बोल सकता है , उनके खिलाफ और उनके विरोधी के पक्ष में तो बिलकुल भी नहीं । जीतनी जल्दबाजी सचिन को भारत रत्न देने की कि गई उससे तो साफ लगता है की २०१४ के चुनावो से पहली ये दे कर सचिन से उसकी कीमत मांगी जायेगी और क्या , ये बताने की जरुरत नहीं है । बिना सचिन से पूछे उनकी इजाजत लिए जिस तरह कांग्रेसी नेता कैमरो पर सचिन के अपने पक्ष में चुनाव प्रचार करने की बात कह रहे थे उससे साफ था कि , सचिन को राज्य सभा का सदस्य बना कर उन पर जैसे अहसान किया गया था और अब उसकी कीमत मांगी गई थी । जैसे सचिन ने कांग्रेस के राज्य सभा की सदस्य बनने की बात मान कर कांग्रेस की सदस्यता स्वीकार कर ली हो , जब बात नहीं बनी तो कीमत और बढ़ा दी गई , और  उसके पहले बताया गया सार्वजनिक रूप से कि कैसे राज्यसभा के लिए सोनिया जी ने सचिन का नाम सुझा कर उन पर एहसान किया , जैसे वो तो इस काबिल नहीं थे  । मुझे तो नहीं लगता की सचिन के पुरे कैरियर में कही भी राज्यसभा की  सदस्यता या भारतरत्न के बिना अधूरे थे , ये दो चीज उनके जीवन में नहीं होते तो भी उनके जीवन ,मान सम्मान , उपलब्धियों में , उनके चाहने वालो के प्यार में और उनके खले के मुरीद लोगो को एक रत्ती का भी कोई फर्क पड़ता,  । यदि भारत रत्न दिए जाने के नियमो में बदलाव किया किया गया तो ये उन पर एहसान नहीं था,  ये तो उनका खेल था , उनकी खेल की दुनिया में उपलब्धि थी जिसने ऐसा करने के लिए सरकार को मजबूर किया ।  वैसे दावे से तो ये नहीं कह सकती क्या पता यु पी  ए ने काफी पहले ही इस राजनीतिक लाभ को समझा हो और उसके तहत ही ये बदलाव किये गए हो ताकि चुनावी मौसम में कुछ फायदा इस से उठाया जा सके या सचिन को अपने पाले में लाया जा सके या कम से कम लता  जी की तरह विपक्ष की बढ़ाई  करने से तो रोक ही लिया जाये :)) । जब खेलो को भी भारत रत्न के पैमाने में शामिल करने की बात हुई तब से ही ये मुद्दा छाया था की पहले किस खिलाडी को भारत रत्न दिया जाये क्रिकेट के मौजूदा महान खिलाडी सचिन को या  फिर हाकी के जादूगर ध्यान चंद को  अंत में सब इस बात पर सहमत हुए कि जब दिया जाये तो दोनों को एक साथ ही दे दिया जाये बात बराबर की विवाद ख़त्म , किन्तु अब जब नाम सामने आये तो वहा ध्यानचंद का नाम ही नहीं था , कारण क्या ध्यान चंद को पुरुस्कार देने से कोई फायदा था , कोई चुनावी माइलेज मिल रहा था , क्या वो चुनावो में कांग्रेस के पक्ष में चुनाव प्रचार कर सकते थे , जवाब नहीं नहीं नहीं तो फिर काहे का पुरस्कार  ।  हम सभी जानते है की सरकारी पुरस्कारो और पदो  का वितरण कैसे और क्यों होता है और उसका पैमाना क्या होता है , भारत रत्न भी उससे अछूता नहीं है , इसमे भी राजनीतिक माइलेज के लिए खास लोगो को देने का आरोप लगता रहा है , और इसमे कोई भी राजनीतिक दल पीछे नहीं है , अब बी जे पी भी कांग्रेस की बुराई करते हुए खुद कांग्रेसगिरी पर उतर आई और कहा दिया कि जब हमारी सरकार आएगी तो अटल जी को सम्मान दिया जायेगा । जैसे भारतरत्न पुरस्कार न हुआ अंधे के हाथ लगी रेवड़ी हो गई ।


                             मामला केवल उस राजनीति तक नहीं सिमित है , उस राजनीति में जहा मामला सचिन को अपने लपेटे में ले लेने का , उन्हें पदो पर बिठा देने का , अपने पाले में ले लेने का है वही ,खेल की  राजनीति , खेल में हो रही राजनीति , खेल में हो रही पदो की राजनीति , खिलाड़ियो के चुनावो की  राजनीति आदि आदि से उन्हें दूर रखने का भी है । सोचिये कल्पना कीजिये जरा,  सचिन बी सी सी आई में आ जाये तो , राम राम राम श्रीनिवासन का क्या होगा,  पवार साहब का क्या होगा , खेल , खिलाडी से हो रही राजनीति का क्या होगा , खिलाड़ियो के चुनाव का क्या होगा , बी सी सी आई में आ रहे अरबो रुपये का क्या होगा , आई पी एल के नाम पर बी सी सी आई में बैठे लोग जो अरबो कमा रहे है पीछे से उसका क्या होगा , और टीमो के मालिक सट्टा लगा कर , खिलाड़ियो को भरमा कर जो कमा रहे है उसका क्या होगा । दृश्य बड़ा भयानक है , उससे तो अच्छा है कि सचिन को सीढी  से ऊपर चढ़ा दो और फिर नीचे से सीढ़ी हटा दो , भाई अब तुम बहुत ऊपर चले गए है ये छोट मोटे काम हम छोटे मोटे लोगो पर छोड़ दो । जैसे राजीनीति में किसी नेता को सक्रिय राजनीति से भगाने के लिए राज्यपाल और राष्ट्रपति का ऊँचा पद दे दिया जाता है । खेल का भला होगा , किन्तु आज खेल और खिलाड़ियो के ठेकेदारो का क्या होगा उनकी तो दूकान बंद हो जायेगी , जो आज तक कहते रहे की भारतीय टीम भारत के लिए नहीं बी सी सी आई के लिए खेलती है , वो भारत की  नहीं बी सी सी आई की टीम है , जिन्होंने बी सी सी आई को हर पारदर्शिता से दूर रखा , उसके हर काम को गोपनीय बना दिया । , क्या होगा यदि सचिन वहा चले जाये ।

                                                  पर ऐसा कुछ नहीं होगा और होना भी नहीं चाहिए मै  कभी नहीं चाहूंगी की  सचिन आपनी सकरात्मक ऊर्जा इस गन्दी , घटिया गिरी हुई राजनीति में व्यर्थ करे ,जहा उन्हें कभी कुछ करने ही न दिया जाये और वो सारा समय व्यवस्था में फैली गन्दगी को ही साफ करने में बिता दे , एक ऐसी गन्दगी का ढेर जो उनके कद से भी बड़ा है जो उन्हें भी डूबा देगा जिसका कोई छोर नहीं है ,  अच्छा हो वो पहले के जैसे ही इन सब से दूर रहे , और अपनी ऊर्जा अपने ही जैसे महान खिलाड़ियो के निर्माण में लगाये , जो न केवल खेल में बल्कि व्यक्तित्व में भी उनकी उपलब्धियों और महानता को छुए और अपने खेल से लोगो को इतना मजबूर कर दे कि कोई उनके साथ कोई राजनीति , क्षेत्रवाद या भेदभाव न कर सके । किन्तु इस राजनीति से दूर रहना भी उनके लिए बहुत आसान नहीं होगा , सोचिये की सुप्रीमो के फरमान को अनसुना करने का क्या अंजाम होगा , अमिताभ से लेकर खेमका तक सैकड़ो उदाहरण पड़े है जब आप सरकारो की  बात नहीं मानते है  या उनके विरुद्ध जाते है , या दूसरे पीला में जाते है, तो आप के साथ क्या क्या हो सकता है , सारी  महानता उपलब्धिया धरी कि धरी रहा जाती है , वैसे भी हैम अपने महान लोगो को लाइम लाइट से जाते ही भुला देने में माहिर है ।

                                     सचिन ने अपने जीवन में कई मुश्किल दौर देखे है और उससे बहादुरी से बाहर भी आये है बिना अपनी गरिमा को गिराए , अब सचिन के लिए अपने जीवन का एक सबसे मुश्किल दौर देखना है और हम देखेंगे की सचिन उसे कितनी बहादुरी नम्रता और अपनी गरिमा को कायम रखते हुए सुलझाते है । और नेताओ से अपील की कृपया करके अपने फायदे के लिए देश के बड़े सम्मानो , पुरस्कारो और महान हस्तियों को इस्तेमाल न करे आप की तो कोई गरिमा नहीं है कम से कम उसकी गरिमा का तो ख्याल रखे ।


चलते चलते 

                     जब कालेज में थी तो मित्र ने कहा कि सचिन पर कुछ लिखो मैंने जवाब दिया मै कभी भी सचिन पर कुछ भी नहीं लिखूंगी , कारण ये कि एक तो उन पर बहुत कुछ लिखा गया है अब कुछ बाकि नहीं है लिखने के लिए , दूसरे जिस जगह वो है उसके लायक मेरे पास शब्द नहीं है , तीसरे कुछ चीजे बस महसूस करने के लिए होती है थोड़ी निजी टाइप भावना, सब कुछ शब्दो में लिख पाना और लिखा देना जरुरी नहीं है । पता न था की  एक दिन सचिन और राजनीति के कॉकटेल पर लिखूंगी , उफ़ ये राजनीति क्या न करवा दे । 

मुझे बड़ी खीज होती थी हमेसा जब लोग सचिन से हर बार सेंचुरी की उम्मीद करते थे ,उससे कम की तो बात ही नहीं होती थी , आखरी पारी में भी वही उम्मीद , लोग हद कर देते है । उनकी बिदाई वाले दिन फेसबुक पर लिखा कि  "  चलो सचिन आज से आप आजाद है १२१ करोड़ उम्मीदो से , उम्मीद है आप अब हजारो सचिन का निर्माण करेंगे देश के लिए "  लो फिर से सचिन से एक और उम्मीद :))) सच में हम सब कितने एक जैसे है ।