August 12, 2018

माँ बापगिरी के मुश्किल फंडे ------ mangopeople


एक मित्र  ने एक मुद्दा उठाया बच्चो को फोन देना चाहिए की नहीं | आखिर हम सब बिना मोबाईल फोन के ही पले  बढे है तो हमारे बच्चे वो कैसे नहीं कर सकते है | मेरा मानना है कि बच्चों की सुरक्षा के लिए उन्हें एक समय बाद फोन देना ही चाहिए । आज बच्चे अकेले कई जगहों पर जाते है किसी मुसीबत मे फंस गये तो हमे 

कैसे फोन करेगे । खुद हमे उनसे बात करनी हुई उनकी चिंता हुई तो क्या करेगे । ज्यादा हुआ तो स्मार्ट फोन 
नहीं देगे फोन करने लायक साधारण फोन देगें ।

                                                                        हमारे और हमारे बच्चो के जीवन में जमीन आसमान का फर्क हैं | हम केवल स्कूल के लिए  निकलते और उसके बाद सीधा घर | बाकि जगह परिवार के साथ,  हमारा अपना कोई जीवन नहीं था | कहीं गए भी तो अँधेरा घर वापसी का सिग्नल होता | बिटिया का जीवन इससे कही ज्यादा अलग है |  सुबह छ बजे उन्हें बास्केटबॉल के सलेक्शन के लिए लेकर गई घर आ नाश्ता कर तुरंत पेंटिंग क्लास के लिए फिर वहां से आ कर फिर प्रोजेक्ट के सामान के लिए बाजार फिर वापस से पेंटिंग क्लास क्योकि अगले महीने परीक्षा है | कल बैडमिंटन का सलेक्शन था | रोज स्कूल भी छोड़ने जाना होता है गेम्स  के लिए | दोस्तों की बर्थडे पार्टी में रात नौ दस बजते है | शुक्र है अभी टियूशन नहीं लगाया वरना वहां तो रोज ही जाना होगा |  अभी छोटी है तो भाग रहीं हूँ लेकिन कब तक , एक दिन अकेले छोड़ना ही पड़ेगा इन सब भाग दौड़ के लिए फिर उनसे कनेक्ट रहने के लिए फोन देना ही होगा | बिजनेस शुरू किया तो उन्हें अकेले घर में छोड़ कई बार जाना हुआ | कुछ हुआ तो मुझे कैसे फोन करती लैंड लाइन का जमाना गया फोन तो देना ही पड़ा | दर्जन भर उनके स्कूल , क्लास, प्रोजेक्ट , गेम , स्कूल वैन के व्हाट्सप्प समूह है | पहले सब मै देखती थी  अब मैंने वो हैंडिल करना छोड़ दिया है | बिटिया का काम है देखे और अपना काम खुद करे |  ख़राब कोई आधुनिक चीज नहीं होती हम उनका प्रयोग गलत करते है  |
                                                        हमें बच्चो को चीजों का मिस यूज गलत प्रयोग न करने के लिए समझाना चाहिए | वो क्या कर रहे है उन पर नजर रखनी चाहिए | हम खुद फोन का प्रयोग कम करेंगे तो बच्चे भी उसका प्रयोग कम करेंगे | मै किसी को गुडमार्निंग के मैसेज , फिजूल के चुटकुले , वीडियो फॉरवर्ड करना , फालतू की चैटिंग , सेल्फी लेना जैसे काम नहीं करती बिटिया भी ये नहीं करती है |   फोन के जितने भी गलत प्रयोग हो सकते है उनके बारे में जैसे ही सुनती हूँ तो तुरंत बातो बातो में उन्हें उसके नुकशान के बारे में बता देतीं हूँ | अभी महीने भर पहले वो सभी अपना डांस वीडियो यूट्यूब पर देने के बारे में पूछ रहीं  थीं |  तुरंत उसके बारे में उन्हें समझाया उनसे ये भी पूछा की वो ऐसा करना ही क्यों चाहतीं है  | फिर उसके जरुरत और दुष्प्रभावों के बारे में उनसे और उनकी दोस्तों से भी बात किया ,वो सब समझ भी गई और मान भी गई | जबकि ढंग की चीजों के लिए कोई मनाही भी नहीं है | दर्जनो  कलाकारी , क्राफ्ट बनाना , पेंटिंग करना , कीबोर्ड बजाना , हेयर स्टाइल बनाना , जादू के ट्रिक करना , नेल आर्ट , पहेलियाँ बनाना बूझना , बाँसुरी की अनेको धुन सीखना जैसे कितनी ही चीजे बीटिया ने यूट्यूब से सीखे  और हमें भी सिखाया है | मोबाईल के पियानो पर कई गाने मुझे सीखाया  | अभी हाल में बिटिया ने बांसुरी पर हीरो की धुन बजाना भी सिखाया है ,वो स्कूल बैंड में बाँसुरी बजाती है | मै उन्हें कई गेम्स भी खेलने देतीं हूँ जो हिंसक ना हो और जिसमे उनके हर चीज पर ध्यान देने की आदत भी पड़े थोड़ा दिमाग भी तेज चले | कितनी ही बार तो टीचर बोलती है नेट पर ये देख लो | ये सब करने के लिए उन्हें फोन कंप्यूटर आदि ना दे तो जरुरत के समय वो अनाड़ी ना रह जाए |

                                                     इन सब को छोड़ भी दे तो कई अन्य जरुरी चीजें भी है जो दुसरो के लिए जरुरी है | जैसे  हमारे स्टॉप से बच्ची जाती है सिंगल मदर है शाम को वैन पालना घर में छोड़ती है माँ फोन पर उसके स्कूल से निकलने से पहले और पहुंचने के तुरंत बाद  फोन करती है | स्कूल में फोन ले जाने की इजाजत नहीं है इसलिए वह फोन जमा करना पड़ता है और छुट्टी के बाद उन्हें मिलता है | मुंबई में ऐसे हजारो बच्चे है जो घर अकेले पहुंचते है या सभी जगह उन्हें अकेले ही जाना पड़ता है माँ बाप के लिए फोन ही संपर्क बनाये रखने में सहायता देता है | कुछ चीजे वक्त की जरुरत होती है जिन्हे समय के साथ अपना लेने में कोई बुराई मुझे नहीं लगता है | बाकि ये भी सही है कि जरुरी तो कुछ भी नहीं है , देश के हजारो लाखो बच्चे इसके बिना भी जी ही रहे है | इसलिए इस मामले में सभी माँ बाप की अपनी सोच हो सकती है | क्योंकि बच्चे पालने का कोई एक फंडा नहीं होता |

July 03, 2018

छठवांवेद ---------mangopeople


              भाग दो
धार्मिक न होने के कारण धार्मिक किताबो को देखने का नजरिया मेरा बाकियों से अलग है मेरे लिए वो नैतिक शिक्षा देने वाले साहित्य है इससे ज्यादा कुछ नहीं |                 

                          एक समय ऐसा आया जब हिंदू धर्म की हर शाखा ,हर विचारधारा , दर्शन सिर्फ और सिर्फ मोक्ष की ही बात करते और उसे ही जीवन का अंतिम लक्ष्य मानते | उन सभी के अनुसार मनुष्य जीवन का एक मात्र लक्ष्य  मोह माया और सुख दुःख के बंधनो से मुक्त हो मोक्ष प्राप्त करना है और हर व्यक्ति को उसी को प्राप्त करने का  प्रयत्न करना चाहिए |  कर्म को उन्होंने सभी मोह , बंधन , दुःखों  का कारण माना और मनुष्य को उससे मुक्त हो मोक्ष अर्थात बंधन मुक्ति की और बढ़ने के लिए प्रेरित किया | संभवतः इस कारण समाज में अव्यवस्था , कर्महीनता ही स्थिति बनी होगी | सोचिये यदि मनुष्य अपने कर्म करना छोड़ दे तो वो समाज में दूसरे लोगों को कितना प्रभावित कर सकता है |  किसान अनाज उत्पादन करना छोड़ दे , व्यापारी व्यापर करना , सैनिक रक्षा करना , राजा राज काज करना आदि आदि | सब कर्म करने की जगह मोक्ष  के लिए सिर्फ  ईश्वर को याद करने लगे तो संसार में कोई व्यवस्था ही न होगी | ये कर्म हीनता संसार के चक्र को ही रोक देगा | शायद उसी समय किसी कृष्ण ने कर्म की महत्ता को समझा होगा और मनुष्य को फिर से कर्म के मार्ग  की और मोड़ने के लिए महाभारत और गीता की रचना की होगी | 

                                       गीता में कृष्ण ने कर्म को दुःखो का कारण नहीं बल्कि कर्म करने के बाद उसके फल की चिंता को दुःख का कारण  बताया और उससे दूर रहने , आगे क्या होगा की चिंता से मुक्त रहने को कहा | उन्होंने मोक्ष की अवधारणा को ख़ारिज नहीं किया और ना ही उसे महत्वहीन बताया | शायद इसका कारण ये रहा हो की मोक्ष की अवधारणा तब तक भारतीय जनजीवन में इतने गहराई से बैठ गया था कि उसे आम लोगो के दिल और दिमाग से निकालना एक मुश्किल सा कार्य रहा होगा | उसे हटाने में अपना समय बर्बाद करने की बजाये कृष्ण ने माध्यम मार्ग अपना और मोक्ष प्राप्ति के लिए कर्म को एक बड़ा जरिया बताया | उनके अनुसार ईश्वर ने एक खास कर्म को करने के लिए ही मनुष्य का जीवन प्रदान किया है | फिर कोई मनुष्य उस कर्म को करने से पीछे कैसे हट सकता है | मोक्ष के रास्ते में जो दुःख है मोह है वो कर्म नहीं बल्कि वो कर्म के बाद का वो लालच है जब हम कर्म के बदले कुछ चाहते है | अर्थात कर्म करो और फल की चिंता छोड़ दो उसी से मोक्ष पा सकते हो  | फल देना ईश्वर का कार्य है और वो उसी पर छोड़ देना चाहिए | कर्म भी ईश्वर तक जाने का उससे योग ( मिलने )  का एक मार्ग है , इसलिए गीता को कर्मयोग और कृष्ण को उसका संस्थापक भी माना जाता है | कृष्ण ने बड़ी चतुराई से आम लोगो की भावनाओ को सोच को  एक दूसरी बिलकुल विपरीत दिशा में मोड़ दिया और लोगों के जीवन और समाज में एक व्यवस्था स्थापित कर दी बिना किसी हो हल्ले के क्रांति के | कृष्ण , गीता और महाभारत ना होता तो शायद भारत और हम वो नहीं होते जो आज है | मोक्ष हमारे अपने कर्म को ईमानदारी से करने में है कर्महीन होने में नहीं | 
#छठवांवेद 











July 01, 2018

अपराध में कुछ नए रंग ---------mangopeople




                                                         

                                                       आज का माहौल कुछ ऐसा है कि देश में होने वाली लगभग हर घटना का रुख एक ही तरफ मुड़ जाता है और बाकि के जरुरी सवाल कही पीछे छूट जाते है | किसी अपराध और अपराधी के लिए इससे अच्छा माहौल क्या होगा जब उसके अपराध को भी धर्म के रंग में रंग कर लोग अपनी सुविधानुसार और राजनैतिक विचारो के अनुसार प्रतिक्रियाए दे या उसका विरोध करे  | नतीजा ऐसे ज्यादातर अपराधों में धर्म और राजनीति का खतरनाक कॉकटेल अपराधी  के बचाव में भी लोगों को खड़ा कर देता है या कुछ लोग अगर मगर का पेंच इसमें लगा देते है | इस खतरनाक मिश्रण ने तो लोगों का  भरोसा भी कानून और पुलिस पर ख़त्म सा कर दिया है | यही कारण है की आज भीड़ द्वारा लोगो को मारे जाने की घटनाए दिन पर दिन बढ़ रही है | लोगो की प्रतिक्रियाए इतनी ज्यादा उग्र है कि वो बड़ी आसानी से किसी भी अफवाह झूठ पर विश्वास कर  अजनबी को संदेह की नजर से देखने लगे है और खुद कानून को हाथ में ले सजा देना शुरू कर दिया है |

                                                      किसी भी अपराध के असली कारणों को जब नहीं देखा जाता उसकी रोकथाम नहीं की जाती |  जब तक सुरक्षा के लिए जिम्मेदार लोगों और लापरवाही दिखाने वाले लोगों को दंडित नहीं किया जाता |  किसी भी तरह के अपराध को रोकना क्या कम करना भी असंभव है | हाल में भी मंदसौर में एक मासूम बच्ची के साथ जिस तरह बर्बर तरीके से रेप किया गया और उसकी हत्या करने की कोशिश की गई | उसके अपराधी को फांसी की सजा मिलना तो तय है | लेकिन ये भी जरुरी है कि लापरवाही बरतने वाले स्कूल के खिलाफ भी कार्यवाही की जाए और पुलिस के खिलाफ भी जाँच बिठाई जाए की ऐसे मामलों में  रिपोर्ट लिखे जाने के पुलिस कार्यवाही में कितनी  तत्परता दिखाती है  |  जिस तरह अपराधी तीसरे ही दिन सीसीटीवी कैमरे में कैद होने के कारण पकड़ा गया उससे लगता है कि यदि पुलिस उसी शाम से तेजी दिखती और इलाके  कैमरों की जाँच शुरू कर अपराधी को पकड़ने का प्रयास करती  तो शायद इतनी बर्बर घटना को होने से रोका जा सकता था | कार्यवाही उस स्कूल के खिलाफ भी होना चाहिए जिसने इतनी छोटी बच्ची को स्कूल से अकेले घर जाने दिया | जबकि रोज उसके पिता उसे लेने आते थे तो ये साफ तौर पर स्कूल की जिम्मेदारी थी कि जब तक उसके घर से कोई आ नहीं जाता बच्ची स्कूल से बाहर न जाए | ये जरुरी है कि ऐसी घटनाओं में ऐसे लापरवाह लोगों की भी जिम्मेदारी  तय की जाए और उन्हें उसकी सजा भी दी जाये | जिससे अन्य लोग भी सबक सीखे और ऐसी गलतियों से बचा जा सके  |

                                                  अक्सर ऐसे हर मामलों के बाद कड़े कानूनों और फांसी की सजा की मांग सभी करते है लेकिन कोई भी इसके पीछे के सामाजिक सोच को बदलने का कोई प्रयास नहीं करता है | आज भी खुलेआम महिलाओं को सोशल मिडिया में रेप की घमकी या उसे अश्लील मैसेज भेजे जाते है और कोई भी ऐसे लोगों का विरोध नहीं करता उनका बहिष्कार नहीं करता | सभी वही अगर मगर , महिलाओं को दोष देने और राजनैतिक सोच के हिसाब से प्रतिक्रिया देने का काम करते है | इससे ऐसी मानसिकता वाले लोगो को अपराध करने का बढ़ावा ही मिलता है | उन्हें लगता समाज में फिर हमारे लिए लोग खड़े हो जायेंगे और दोष महिला को दे दिया जायेगा  या मुद्दे को एक अलग रंग | जब  अपराध और अपराधी का विरोध में कुछ दूसरे रंग डाल दिए जाते है तो अपराध कम नहीं होते , उन्हें बढ़ावा मिलता है |


                       



June 22, 2018

तेरे प्यार का पंचनामा -------mangopeople






                                                                           डिस्कवरी पर कुछ समय पहले एक कार्यक्रम देखा , एक लड़की अपना लिंग बदल  लड़का बनना चाह रही थी | वैज्ञानिको ने उसके साथ कुछ मनोवैज्ञानिक रिसर्च के तहत उसके दिमागी परिवर्तन को जांचा | जब लड़की थी तो उसे कुछ तस्वीरें दिखाई गई | तस्वीरों को उसने  अपने दिमाग का केवल  पांच प्रतिशत ( ५ % )  ही खर्च कर पहचान लिया | तस्वीरों में ख़ास ये था की वो भावनाओं के साथ थी जैसे खिलखिलाता बच्चा , शांत सा बूढ़ा , मुस्कुराती लड़की , उदास सी महिला कुछ इस तरह की ही तस्वीरें थे | बस टेस्टोस्टेरोन के इंजेक्शन   के पुरे डोज के बाद  लड़का बन गई अंदर से तो बिलकुल उन्ही जैसी तस्वीरों को  पहचानने में उसे अपने दिमाग का पछत्तर ( ७५ % ) प्रतिशत भाग प्रयोग करना पड़ रहा था | चुकी तस्वीरों का विश्लेषण दिमाग अपने हिसाब से करता है अगर तस्वीर बच्चे के हंसने की है तो दिमाग उसे सिर्फ बच्चे की फोटो नहीं पढ़ता उसके भाव को भी  पढ़ता है और इसी में दिमाग ज्यादा प्रयोग हो जाता है |


                                                                  मतलब पुरुष भाव नहीं पढ़ पाते भावनाए नहीं समझ पाते  तो उनका दोष नहीं है ये पुरुष होने का केमिकल लोचा है अगर ऐसा आप सोच रहे है तो पोस्ट फिर से पढ़िए | मैंने नहीं कहा की पुरुष भाव नहीं पढ़ सकते बस दिमाग ज्यादा खर्च करना पड़ता है जो की वो  खर्च करने की जरुरत नहीं समझते और सीधा डायलॉग मार देते है कि इन औरतो को तो समझना मुश्किल है | जो पुरुष  दिमाग शादी के पहले किसी लड़की को पटाने , ताडने , प्रेमिका बनाने , मनाने में तीन सौ प्रतिशत जी हा पुरे तीन सौ प्रतिशत लगा देता है | खुद का डेढ़ सौ प्रतिशत औकात से ज्यादा , फिर उस कमीने दोस्त का पूरा दिमाग  जिससे खुद एक भी लड़की न पटी लेकिन बनता लव गुरु है और पचास प्रतिशत दिमाग उस गधे दोस्त का  जिसके पास असल में दिमाग है ही नहीं लेकिन  इस यज्ञ में वो भी अपनी आहुति देता है  | इस प्रकार तीन सौ प्रतिशत दिमाग लगाने वाला शादी के बाद पछ्त्तर प्रतिशत भी दिमाग खर्च करने को राजी नहीं होता ताकि पत्नी की कही गई बातो के साथ उसके भावनाओं को समझ सके | तो आगे से दिमाग  खर्चिये बचा के रखने पर न ब्याज मिलेगा और न बढ़ेगा |

#तेरेप्यारकापंचनामा


     














                

June 07, 2018

छठवांवेद ---------mangopeople

भाग -१
धार्मिक न होने के कारण धार्मिक किताबो को देखने का नजरिया मेरा बाकियों से अलग है मेरे लिए वो नैतिक शिक्षा देने वाले साहित्य है | किसी और के लिए जो महाभारत कृष्ण की लीला है वह मेरे लिए कृष्ण नामक लेखक द्वारा लिखी गई रचना है  | जो समाज में नैतिक मूल्यों को बढ़ाने , लोगो को सही से आचरण अर्थात धर्म अनुसार आचरण करने की प्रेरणा देने के लिए लिखा गया है | महाभारत की रचना सिर्फ धर्म और धर्म के अनुसार कर्म की महत्ता स्थापित करने के लिए की गई है | एक एक पात्र और एक एक घटना सिर्फ धर्म की समाज को महत्व बताने अर्थात धर्म की स्थापना के लिए है | यहाँ  धर्म का अर्थ हिन्दू मुस्लिम वाले से नहीं है बल्कि सही अच्छे कर्मो से है | कौरवों का १०० भाई होना , क्या संभव है ऐसा होना , नहीं , किन्तु चमत्कारिक रूप से १०० पुत्रो का जन्म होता है | संदेश साफ़ है १०० पुत्रो वाले वंश का भी नाश हो जायेगा यदि वो धर्म पर नहीं चल रहे है | पांच पुत्र ही हो लेकिन वो धर्म पर चले तो वंश का नाम रौशन करते है और १०० पुत्रो वाले अधर्मी वंश का नाश |

                                    अधर्म के साथ जो भी खड़ा होगा वो नष्ट होगा चाहे वो कितना बड़ा धर्मनिष्ठ , वचनपालन करने वाला ,  शूरवीर या अच्छा व्यक्तित्व हो | भीष्म वचन से बंधे अपने कर्तव्यों के नाम पर अधर्म के साथ खड़े हुए , द्रोणाचार्य पुत्र मोह में , कर्ण अपने लिए सम्मान पाने के लिए  , मित्रता का फर्ज और  एहसान का कर्ज चुकाने के लिए अधर्म के साथ खड़े रहे और महारथी होने के बाद सब हारे | यहाँ तक स्वयं भगवान की सेना अधर्मियों के साथ होने के कारण हार गई | कर्ण , भीष्म , द्रोणाचार्य आदि पत्रों की रचना ही इस उद्देश्य से किया गया कि संदेश दूर तक जाए और गहरा जाए | ध्यान दीजिये कि  ये पात्र और कई अन्य अच्छे पात्र जो कौरवो के साथ खड़े है वो सभी समाज के अलग अलग तबके से आये हुए , अलग अलग पदों और भिन्न परिस्थियों से आये हुए दिखाये गए है लेकिन सभी का अंत समान है , क्योंकि वो गलत के साथ खड़े हुए |  कलयुग में भी हम बैठ कर इन पत्रों के साथ सहानभूति जताते कहे कि वाह ये पात्र और  व्यक्तित्व कितना अच्छा था लेकिन ओह ! फिर भी मारे गए | ये ओह ये टिस मनुष्य को याद दिलाती रहे की अधर्मी होना और अधर्म के साथ खड़े होने से आप के सभी गुण बेकार हो जाते है वो अधर्म को जीत नहीं दिला सकते | उनका बुरा अंत हमें याद दिलाये की हमें खड़ा किसके साथ होना है | गलत के साथ खड़े होने के लिए आप कोई बहाना/ कारण नहीं दे सकते है |
                                                     इन पत्रों की रचना ही इस उद्देश्य के लिए किये गए कि मनुष्य समझे की केवल अच्छे होने और शूरवीर होने से कृति यश नहीं मिलता उसका प्रयोग हमेशा सही कार्यो में सहयोग के लिए ही होना चाहिए | मनुष्य के सौ अच्छे कर्म और बुद्धिमत्ता एक गलत काम की छूट नहीं देता है | आप को निरंतर केवल धर्म की राह चलना है चाहे परिस्थिति कुछ भी हो और समाज का व्यवहार आप के प्रति कुछ भी हो या समाज में आप का स्थान कुछ भी हो | ये मान कर चलिए महाभारत के सभी पात्र सिर्फ वही कर सकते थे जो उन्होंने किया इससे इतर वो यदि कुछ कर सकते कहानी की दिशा मोड़ने की जरा भी क्षमता उनमे होती तो वो पात्र  कृष्ण की इस रचना/लीला में कहीं नहीं होते |


#छठवांवेद 

May 26, 2018

श्रृंगार प्रेम है वासना नहीं -------mangopeople

   
हम अपने परिवार के सभी सदस्यों से जैसे चाहे वैसे अपने प्रेम का प्रदर्शन कर सकते है | माँ की गोद में सर  रख सो गए , भाई बहन को गले लगा लिया , पिता का हाथ पकड़ पार्क में दौड़ भाग लिए , दोस्तों के कंधे पर हाथ रख बतिया लिया , तो अपने बच्चो को  हमने चुम लिए | ये सभी हमारे परिवार के सदस्य है और हम सार्वजनिक रूप से इन सभी  के साथ अपने प्यार का इजहार भावनात्मक रूप से और शारीरिक रूप से कर सकते है | समाज और लोग सभी सहज और सामान्य रहते है उन्हें कोई समस्या नहीं होती , लेकिन जैसे ही बात जीवनसाथी पति या पत्नी की आती है उनके प्रेम दर्शाने के तरीको पर तुरंत  पाबन्दी लगा दी जाती है | कितना अजीब है ना जिन दो लोगो को प्रेम से रहने के लिए जोड़ा जाता है उनके ही प्रेम का प्रदर्शन समाज  स्वीकार नहीं करता है | शारीरिक ( गले लगाना ,  हाथ पकड़ना , करीब बैठे रहना ,  चूमना ) तो दूर की बात यहाँ भावनात्मक रूप से भी प्रेम के प्रदर्शन पर लोगो की भवे तन जाती है |  ऐसा नहीं है की हमारी संस्कृति में प्रेम था ही नहीं कृष्ण और राधा का होना बताता है कि प्रेम हमारी संस्कृति धर्म का हिस्सा  है | एक कदम और बढे तो रति और कामदेव के रूप में पति पत्नी के प्रेमी जोड़ी भी विद्यमान है | जहा शिव पार्वती और राम सीता सात्विक जोड़ियां थी वही विष्णु  लक्ष्मी और रति कामदेव के रूप में रजो जोड़े  का होना बताता है कि कम से कम धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से ये हमारे लिए यह वर्जित नहीं है | मंदिरो , स्तूपों और गुफाओं में हजारो आलिंगनबद्ध , प्रेमरत , श्रृंगारिक मुर्तिया और पेंटिंग गवाह है कि ये भारतीय समाज के लिए वर्जित कभी नहीं थे |  फिर न जाने कब हमारे समाज ने पति पत्नी के बीच से श्रृंगारिक प्रेम को निकाल दिया और उनके प्रेम दर्शाने को लज्जा का पाप का विषय बना दिया |
                                   


                                                  अंग्रेजो ने हमारे पुराणिक ग्रंथ हमसे पहले पढ़े और श्रृंगार का अनुवाद इरॉटिक यानि कामुकता बना दी ,  जबकि हम प्रेम और  कामुकता (वासना) के फर्क को जानते है | नतीजा हम भारतीय भी इसी घालमेल में फंसते  चले गए और पत्नी प्रेम की जगह भोग्य वस्तु बनती चली गई | इसे बढ़ाने में साथ दिया वो विचार जो तथाकथित भारतीय संस्कृति को बचाने के लिए उनके नाम की दुहाई  के साथ बोला जाता था | ज्यादा नियंत्रण न हो रहा तो विवाह कर लो , ये सब शादी के बाद , शादी के बाद जो चाहे वो करो ,  आदि इत्यादि इन संस्कृति बचाओ विचारो ने विवाह को शारीरिक जरूरते पूरी करने वाली संस्था और पत्नी को साधन बना दिया | पत्नी प्रेम की जगह कामुक नजरो से देखी जाने लगी उसकी कदर और इज्जत नजरो में गिरती गई | संस्कृति बचाते बचाते  विवाह प्रेम और पत्नी तीनो को मार दिया | पति पत्नी के बीच से प्रेम गायब और बस बची तो वासना नतीजा उनके हर क्रिया कलाप को वासना युक्त समझा गया | आप माँ  बाप भाई बहन दोस्त चाचा चाची जिसे चाहे उसे प्रेम कर सकते है लेकिन जैसे ही बात पत्नी की आती है , प्रेम का स्वरुप बदल जाता है और लोगो की सोच भी | पत्नी का प्यार से हाथ पकड़ लेना , उसे गले लगाना  , उसकी गोद में सर रख सो जाना , उसके करीब बैठ जाना जैसे प्रदर्शन आप कर ही नहीं सकते है  क्योंकि   समाज की नजर में आप पत्नी को प्रेम कर ही नहीं सकते उसे एक ही नजर से देख सकते है और उस वासना युक्त नजर से देख कुछ भी सार्वजनिक रूप से नहीं कर सकते है , वह वर्जित है | नतीजा विवाह है पत्नी  है लेकिन श्रृंगारिक प्रेम के लिए वहां  कोई जगह नहीं है |



             






                                             











     


                   


                                 
               







May 24, 2018

मार्लिन मुनरो प्रेग्नेंट है -------mangopeople

 गोवा में एक फोर्ट में गई और उसके बुर्ज पर बैठ एक अच्छी फोटो खिचवाई और  बिलकुल उसी जगह खड़े हो कर अफसोस किया की कोई वन पीस मिडी या स्कर्ट  क्यों ना पहना आज, वरना आज एक और इच्छा गोवा में पूरी हो जानी थी  | खैर छोटा भाई और उसकी पत्नी यहाँ खड़े हो गए और टायटेनिक वाली पोज़ में , छोटे भाई की पत्नी को बोला जल्दी ठीक से पोज़ बनाओ फोटो लेलु वरना अभी तुम्हारे टायटेनिक का मार्लिन मुनरो हो जाना है , उसने घटनो तक का  वन पीस ड्रेस पहन रखा था | उसके कौन मार्लिन मुनरो के सवाल का जवाब दिया फोटो लेने दो जवाब मिल जाएगा | जल्दी करने के बाद भी बस दो क्लिक ही कर पाई थी और एक जोरदार हवा निचे समंदर से आई और उसके दोनों तरफ फैले हाथ तुरंत स्कर्ट पर आ गये , हम सब हस पड़े , ये है मार्लिन मुनरो समझी | फिर तुरंत उन्हें मार्लिन मुनरो की प्रसिद्द पोज़ वाली फोटो दिखा ज्ञान बढ़ाया गया | टायटेनिक पोज़ वाली फोटो भाई ने फेसबुक पर लगाई सभी ने अपनी श्रद्धानुसार उस पर टिप्पणी दी , लेकिन सबसे धांसू कमेंट सीधे मम्मी को फोन पर मिला शाम को कोलकता वाली मौसी से |  बधाई हो तुम फिर से दादी बनने वाली हो , हमें बताया भी नहीं | मम्मी बोली लो मै फिर से दादी बनने वाली हूँ मुझे ही नहीं पता और तुमको पता चल गया उतनी दूर | फेसबुक पर बहु की फोटो देखी प्रेग्नेंट लग रही थी |
              किस्सा ये था कि मौसी को एक बेटा और बेटी है , दीदी ने जुड़वा बच्चे एक लड़का , लड़की कर एक बार में काम निपटा दिया | लेकिन सुपुत्र को एक बेटी थी और थाइराइड के कारण बहु दुबारा कंसीव नहीं कर पा रही थी , प्रयास करते करते बेटी १० साल की हो गई फिर दवा दारू के बाद बहु ने दूसरे का नंबर लगा दिया | अब इतने समय बाद दूसरा बच्चा और वही सामाजिक ताना बेटे के लिए किया होगा इतने सालो बाद का शायद दबाव , जो भी रहा हो मौसी इस ताक में थी कि कोई और भी दूसरे न नंबर लगा दे तो उनका दबाव कम हो , मुझ तक से पूछ डाला दूसरे के बारे में नहीं सोच रही ,उनकी पोती मेरी बेटी से आठ महीने ही छोटी है और भाई मुझसे एक साल ही छोटा है , मै हँस पड़ी क्या मौसी इस उमर में , दिमाग नहीं ख़राब मेरा | उस समय अंदाजा नहीं था कि वो क्यों पूछ रही है | अब जैसे सावन के अंधे को बस हरियाली नजर आती है उसी तरह उस फोटो में भाई की पत्नी की ड्रेस में थोड़ी सी हवा भर गई थी ठीक मार्लिन मुनरो पोज़ के पहले और उसी से उन्होंने अंदाजा लगा कर बधाई तक दे दी | अच्छी खासी हमारी रोज़ मार्लिन मुनरो को प्रेग्नेंट बना दिया | 
आप कुछ भी पोस्ट लिखिये , कई बार पाठको के मन में अपना ही कुछ चल रहा होता है और वो अपनी श्रद्धानुसार उस पर टिप्पणी दे देते है और पोस्ट और आप कि सोच  का  अंदाजा भी लगा लेते है |












May 23, 2018

मेरी सोनी मेरी तम्मना झूठ नहीं है मेरा प्यार -------mangopeople



ये कलीना यूनिवर्सिटी कैसे जाते है
तुम्हे वहां क्या काम है
मुंबई आये छः महीने से ऊपर हो गए , अभी तक कही भी अकेले जा नहीं सकती , निकलू भी तो कहा।  इस  तरह कोई मुझे तो जॉब देने से रहा मुझे शहर के बारे में कुछ पता ही नहीं है | इसलिए सोचा कॉलेज ज्वॉइन  कर लेती हूँ , रोज बाहर निकलना हो जायेगा , शहर जान जाउंगी तो खुद से ही जॉब देख लुंगी |
अच्छा तो तुम्हे जॉब करना है
क्यों तुम्हे कोई परेशानी है
नहीं नहीं , कोई परेशानी नहीं है
फिर ऐसे क्यों पूछ रहे हो
नहीं , अभी तक हमारे घर में किसी औरत ने बाहर काम नहीं किया है तो ---
तो क्या
मतलब जॉब क्यों करना चाहती हो
अच्छा अच्छा ये बात है | अब  ये  बताओ  कि मुझे अपने मन की बात बतानी है या तुम्हे कन्विंस करना है
क्या ये दोनों अलग चीजे है
बिलकुल
ओके मान लो , ऐसा  इमैजिन करो सोचो की मै कह रहा हूँ मुझे कन्विंस करो तो
तो सुनो ,  ये जो पत्नियों का प्यार होता है ना अपने पतियों के लिए ये सच्चा नहीं होता इसमें मिलावट होती है अपने स्वार्थ की , क्योकि फाइनेंशली अपने पति पर निर्भर होती है ना | अकेले आदमी से शादी करती ही कहा है , पूरा पॅकेज होता है घर है की नहीं,  जॉब कैसी है , कितना कमाता है , आगे भविष्य कैसा होगा उसके साथ |  सब कुछ ठोक बजाने के बाद पति बनाती है |  बहुत सारी  पत्नियां तो  पति को बस  एटीएम मशीन समझती है | कुछ मजबूरी में प्यार करती है कि उनकी सारी जरूरतों की पूर्ति तो पति करता है अब इसे प्यार न करे तो अपनी जरुरत कैसे पूरी होगी | पति अस्पताल चला जाए या  मर मरा  भी जाये तो उसके जाने का गम कम  गम  और चिंता इस बात की ज्यादा होती है कि अब मेरा क्या होगा पैसे कहा से आयेंगे , घर कैसे चलेगा , बच्चो का क्या होगा | उस   बेचारे  के लिए सच्चा रोने वाला भी कोई नहीं होता |   पत्नी तो छोडो रिश्तेदार भी यही उम्मीद करते है , सब तुमको बस एटीएम मशीन समझते है स्वार्थभरा झूठा प्यार करते है | लेकिन मै ऐसा नहीं करना चाहती।  मै तुम्हारे पैसे से नहीं सिर्फ तुम्हे प्यार करना चाहती हूँ , मै तुमको सच्चा , ट्रू , निस्वार्थ प्यार करना चाहती हूँ , समझे  |
हम्म्म

क्या हुआ कुछ बोलोगे ठीक से कन्वेंस नहीं हुए क्या
कलीना कब चलना है
गुर्ररर
अरे चल तो रहा हु अब क्यों गुस्सा हो
मुझे लेगा था मेरे मन की सुनोगे , पूछोगे मै क्या चाहती हूँ , लेकिन नहीं एक नंबर के  स्वार्थी हो बस अपनी पड़ी है  | बस खुद कन्विंस होना है मै क्या चाहती हूँ किसी को पड़ी ही नहीं है |
नहीं मै बस वही पूछने वाला था
 मिस्टर निश्चल आज की तारीख लिख लो आज से हर बात केवल तुम्हे कन्वेंस करने वाले ही तरीके से बताई जायेगी  और देखना ये तुमको कितना भारी पड़ने वाला | गुर्ररर

#अधूरीसीकहानी_अधूरेसेकिस्से

May 12, 2018

पंजाबी लडके को मद्रासी लड़की से प्यार हुआ और शादी हो गई ------mangopeople



शादी के कुछ ही महीने हुए थे  एक शाम निश्चल मै सब्जी लेने के लिए निकले , उसके पहले उन्हें बनारस की ढ़ेर सारी बाते बता रही थी, बताते बताते पुरे बनारसी मूड में आ गई थी | बाहर निकल दरवाजे में ताला लगाया और हाथ आगे बढ़ा कर बोला ताली दो , उन्होंने झट मेरे हाथ पर अपने हाथ से ताली दे दी | मै  हँसी और फिर हाथ आगे बढ़ा कर बोला ओके वैरी फनी अब ताली दो उन्होंने फिर हाथ आगे बढ़ाया और मेरी हाथ पर अपने हाथ से ताली दे दी | चलो अब मजाक मत करो चाभियाँ दो देर हो रही है | अरे तुमने चाभियाँ कब मांगी |  मांगी तो दो बार और तुमको मजाक सूझ रहा है | तुमने तो ताली मांगी थी मैंने दी |  फिर याद आया कि ना मै बनारस में हूँ और ना ये बनारसी |  अरे यार हमारे बनारस में चाभियों को ही ताली कहते है,  ताला और ताली कितना सिंम्पल है | मैंने कभी सूना ही नहीं तो मुझे क्या समझ आयेगा | उलटा मुझे लग रहा था ये बार बार ताली क्यों मांग रही हो मुझसे | सुनो एक बात बताओ ये कई महीने से मै तुमसे बात कर रही  हूँ तुमको कुछ समझ में आती है कि  मै क्या बोल रही हु , या बस सुन लेते हो | थोड़ा रुके और सोच कर बोले कभी कभी कुछ कुछ बात समझ नहीं आती | तुम्हे मेरी बात समझ नहीं आती और तुम मुझे आज बता रहे हो इतने महीनो बाद | हद है आज मै नहीं पूछती तो मै सारी  जिंदगी बड़बड़ करती और तुमको समझ कुछ नहीं आता |  ये कह हँसते हुए एक गाना गा दिया पंजाबी लडके को मद्रासी लड़की से प्यार हुआ और शादी हो गई | अब ये क्या है | लो अब तुमने ये गाना भी नहीं सुना है | मतलब ऐसे कपल के बीच लैंग्वेज प्रॉबलम हो गई दोनों के एक दूजे की बात समझ ही ना आती |
             दुनियां में लोग ऐसे लोग चाहते है जो उन्हें समझे उनकी बातो को सुने समझे ताकि वो अपना दिल खोल कर उसके सामने रख दे | लेकिन वो भूल जाते है कि  जैसे जैसे हम अपना दिल खोलते है सुनने वाला की अपनी सोच , पूर्वाग्रहों की मिलावट उसमे होती जाती है और हमारी एक छवि उसके मन में बन जाती है | लोग कहने वालो को अपने हिसाब से जज करने लगते है और वो हमारे लिए पूर्वाग्रह पाल कर बैठ जाते है | समझने वाला अपनी समझ से समझने लगता है वो नहीं समझता जो हम कहना चाहते है | मेरे हिसाब से तो अपना दिल खोल कर रखने के लिए सबसे अच्छा वो इंसान है जो असल में आप की बात समझता ही नहीं और  जब समझता है तो बस उतना ही जितना आप उसे समझाते है | जीवन में पहली बार कोई ऐसा मिल गया , जिसे सब कुछ कहा जा सकता है दिल में जितना भी जहर,प्यार, गुस्सा, नाराजगी , ईर्ष्या , जलन सब बक दो जिसे बात ही ठीक से समझ न आ रही हो वो बस सुनेगा लेकिन मुझे जज नहीं करेगा |  इंसानी भावो के आने जाने से होने वाली स्वाभाविक परिवर्तनों से वो हमारे लिए कोई पूर्वाग्रह नहीं बनाएगा , हमारे लिए जजमेंटल नहीं होगा  | जब किसी मित्र की सफलता पर खुश होते कहती कि निश्चल जलन हो रही है उससे,  तो कभी ये नहीं सोचा की जलनखोर मित्र हूँ , समझा तो बस इतना की ख़ुशी के आँसू की तरह एक ख़ुशी वाली जलन भी होती है | जब उसी मित्र के किसी उसके किसी कठिन समय में उसे फोन पर हिम्मत बंधाते मजाक करती और फोन रखते कहती कि  मुझे उसके लिए डर लग रहा है उसकी चिंता हो रही है तो ये न समझा की ढकोसला कर रही हूँ | इंसान समझे या न समझे बाते अवचेतन मन में जाती रहती है , एक सेफ स्टोरेज में और एक दिन जरूर बाहर आयेगी एक विश्वास  भरोसे  रूप  जब उनकी जरुरत होगी |


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May 10, 2018

सुंदरता हॉटनेस ये सब वाकई किसी स्त्री के लिए एक एटीट्यूट है और किसी पुरुष के दिमाग का फितूर ------mangopeople

 

   
सुंदरता लड़की के लिए प्राकृतिक है ये स्त्रीय अंग है लेकिन ये कोई योग्यता नहीं है जिसे बेमतलब का निखारने में समय व्यर्थ किया जाये  |  जिनमे कुछ काबलियत नहीं होती वही आगे बढ़ कर बेमतलब लीपा पोती कर अपनी सुंदरता दिखाते है | बचपन में हमारे मातृसत्तात्मक घर का बिन कहा ये सन्देश बड़ा साफ़ था काबिल बनो सहूर सीखो जीवन में वही काम आएगा  | ये सहूर सलाई कढ़ाई , खाना बनाने से  लेकर पढाई लिखाई कर कुछ बनने तक में से कुछ भी हो सकता था |   लेकिन इसका मतलब ये भी नहीं था कि अच्छे दिखने के लिए कुछ करो ही मत , खूब स्टाइल में कपडे पहनो , ( हम डिजाइनर कपडे पहनते थे उस जमाने में , क्योकि कपडे घर में सिले जाते थे बुआ , दीदी या मम्मी द्वारा ) सबसे अलग दिखो जो करो अपने लिए करो लेकिन इन सब को योग्यता मत समझो और समय बर्बाद न करो | फिर  सुंदरता का कोई पैमाना उस जगह कैसे तय हो,  जहा हर तरह के लोग रहा रहे हो | कोई सांवला लेकिन नयन नक्श में अच्छा तो कोई गोरा लेकिन लेकिन शकल कोई ख़ास नहीं कोई लंबा तो कोई छोटा कोई अति दुबला तो कोई मोटा | इसलिए खामखा का सुन्दर दिखने के प्रयास में हम लोग कभी पड़े ही नहीं |  हमारे लिए कभी कोई कॉम्लीमेन्ट होता तो पहला "अच्छी" दिख रही हो और सबसे बड़ा , "बड़ी अच्छी" दिख रही हो | मतलब जीवन सुन्दर , प्यारी , ब्यूटीफुल गॉर्जियस जैसे तमाम शब्दों के बिना ही गुजर गया |  ये शब्द कभी तारीफ बने ही नहीं हम लोगो के लिए , उलटा ये एहसास दिलाते की नाकाबिल हो ,उसे मुझ में और कुछ न दिखा |
                                                                  बड़े होने पर एक फिल्म से ज्ञान मिला , फिल्म में सांवली सी आधुनिक हीरोइन बोलती है सुंदरता कुछ नहीं होती , ऐटिट्यूड  सब कुछ होता है | आप खुद को कैसे दुसरो सामने रखते है आप का ऐटिट्यूड कैसा है ये बड़ी बात है , वरना भारत में मेरे सांवले रंग के बाद भी लोग मेरी सुंदरता की इतनी तारीफ नहीं करते | फिर मुझ टेढ़े  ऐटिट्यूड वालो को पता चला  ऐटिट्यूड भी कुछ होता है , और हम सुन्दर क्यों नहीं है , ऐसे टेढ़े  ऐटिट्यूड वाले से लोग डरते है | साथ में ये भी समझ आ गया कि सुन्दर दिखने की जगह लोगो को डराना ज्यादा मजेदार है | उस खूबसूरती के पीछे क्या भागना जिसका कोई भरोसा नहीं वो कब अपना रूप बदल दे | एक सिकुड़ी सी अभिनेत्री आती है और बड़े  ऐटिट्यूड से बोलती है जीरो फिगर ही सुंदरता है और लोग उसे ही सुन्दर मान पैमाना तय कर देते है | अचानक से कर्वी बॉडी वाली भारतीय सौंदर्य मोटापा दिखने लगता है और पचके गाल तेजहीन चेहरा , गर्दन की हड्डिया और जीरो कमर सुन्दर हो जाता है | अभिनेत्री बच्चे को जन्म देती है और उसी अदा से अपनी कर्वी कमर दिखा सुन्दर बताती है और रातो रात खूबसूरती का पैमाना बदल जाता है और भारतीय कर्वी स्थूल शरीर खूबसूरत हो जाता है | अब लोगो की नजर स्त्री के कर्व पर जाने लगती है और जीरो कमर वालो को हसींन लोगो के लिस्ट से छांट दिया जाता है | ऐसी सुंदरता जो नजर के साथ बदल जाये उसे पाना एक मुश्किल क्या लगभग असंभव काम था लेकिन ये पक्की बात है कि ऐटीट्यूड ही आप को हर रूप में सुन्दर बना सकता है लोगो की नजर में | तो असल में सुंदरता किसी स्त्री के लिए बस एक  ऐटिट्यूड है और पुरुषीय दिमाग का मात्र फितूर |  सोशल मिडिया में ऐसी ढेरो महिलाओ को इस नियम का पालन करते देख सच में बड़ा मजा आता है और अच्छा लगता है कि स्त्री ने अब अपने रूप और सौंदर्य को लेकर अपना पैमाना बनाना शुरू कर दिया है |

           हवा में उड़ता जाये लाल दुपट्टा

    विवाह के बाद  हमने हॉटनेस की भी नहीं परिभाषा गढ़ी | मेरे शरीर का तापमान हमेशा सामान्य लोगो से ज्यादा गर्म होता है , नतीजा निश्चल हर दूसरे दिन , तुम्हे बुखार है , नहीं मै ठीक हूँ , नहीं मुझे लग रहा है तुम्हे बुखार है  |  मै ना कहती वो मानते नहीं न जाने कितनी ही बार थर्मामीटर से चेक कर लिया गया सब सामान्य है लेकिन उन्हें विश्वास न हो पूरी तरह | सामान्य थर्मामीटर पर भरोसा न हुआ तो एक दिन डिजिटल थर्मामीटर उठा लाये | उसे देख हैरान होती बोली कोई और होता तो कहता वॉव मेरी बीबी कितनी हॉट है और कुछ ढंग के गिफ्ट लाता , एक तुम हो जो बार बार बुखार बोल कर उसकी हॉटनेस चेक करने के लिए थर्मामीटर लाए हो हद है , इस अरेंज मैरिज का कुछ नहीं हो सकता |  बस जो हॉटनेस किसी आधुनिक लड़की के लिए एक बड़ा कॉम्प्लिमेंट होता वो हमारे घर कॉमेडी बन गई तब से |
                                                        एक फिल्म में सांवली सी आधुनिक हीरोइन बोलती है सुंदरता कुछ नहीं होती , एटीट्यूट सब कुछ होता है | तो ये गांठ बांधी फ़िल्मी ज्ञान एक दिन काम आया | बर्फ में घूमने जाना था , सारी जिंदगी देखी यश चोपड़ा की फिल्मो का असर था कि एक रेड शिफॉन की साड़ी खरीद लाई |  उसे पहन बर्फ में फोटो खिचानी है एक दम कुछ तूफानी करना है सोच लिया | एक्साइटमेंट में घर आते ही फटा फट उस साड़ी को रेड प्लाजो के ऊपर ही  बांध लिया गया और रेड टॉप को पीछे कल्चर लगा ब्लॉउज बना लिया गया | खिड़की के सामने खड़े हो पल्लू पर्दे पर टांग लहराते पल्लू का सीन बनाया और पुरे एटीट्यूट के साथ पोज़ बना  यश चोपड़ा की सारी हीरोइनों की आत्मा को अपने अंदर आत्मसात  किया गया और निश्चल को फोटो खींचने के लिए बोला |  वो बिना मुझे पर ध्यान दिए , कंधे और कान के बीच अपना फोन फंसाये अपने फोन में बतियाते ,चार क्लिक कर दिए | मेरे हर पोज़ पर हम्म्म का जवाब देते |   जब फोटो देख कर कहा अच्छी दिख रही है ना तो बिना फोटो देखे जवाब फिर से था हम्म | बड़ा गुस्सा आया देखो तो मै इतनी एक्साइटेड हूँ और यहाँ से कोई रेस्पॉन्स ही नहीं , फिर उसी  फ़िल्मी ज्ञान का ध्यान आया | वॉव कितनी सेक्सी फोटो है ना और पुरुषीय चेतना जगाने वाले शब्द ने जादू दिखाया | कौन सी , एकदम ध्यान मेरे फोन पर |  वही जो तुमने खींची है , वाह कमाल फोटो ली है चलो फोटो खींचने आ ही गया | तारीफ पर कंधे उचकाते ,मै तो अच्छी फोटो लेता ही हूँ , नजर ध्यान से फोटो पर | मै ,झीनी सी साड़ी में फिगर अच्छा आता है ना , हूँ सही कह रही हो | फिर  खुद की फोटो की ऐसी नख से केश तक की खोज खोज कर तारीफ़ शुरू हुई की अगले कुछ देर तक जारी रही | कुछ ही देर में शब्दों और एटीट्यूट ने अपना काम कर दिया | एक साधारण सी फोटो जो बिना मन के  खींची गई , थकी हालत में आधे अधूरे तरीके से पहने साडी में , बाल तक बिखरे क्योकि कल्चर टॉप में लगाया है , वो फोट ख़ास बन किसी के मुंह से वॉव निकलवाने लायक बन गई और कुछ ही देर पहले मै उन्ही कपड़ो में उतनी ही साधारण और  ध्यान देने लायक नहीं थी जैसे सब्जी खरीदते समय बगल खड़ी महिला , बस हद ही थी |
                                                 
                   अगले दिन तो गजब ही हो गया जब वो फोटो उनके मोबाईल में दिख गई , मुझे दिखा मुस्कुराने लगे |  मन ही मन जोर की हँसी आई पर उसे रोका और बहार एक मुस्कान दे दी | पता न था कि वाकई में एटीट्यूट में जादू होता है | फिर भी चलो अच्छा है अब अपना बुढ़ापा अच्छा गुजरेगा , कभी जब तुम्हारे सर पर अंगुलिया फेरने के लिए बाल न होंगे और मेरे माथे का पसीना कही माथे के सिलवटों में फँसा रहा जायेगा तब ये आइडिया काम आयेगा |


#अधूरीसीकहानी_अधूरेसेकिस्से




           

         

                   





                                                 

May 08, 2018

कैसे गढ़ते थे ऐसे मजबूत नारी पात्र गुरुदेव - - - - - mangopeople



           कुछ साल पहले अनुराग और तानी बासु ने रवीन्द्रनाथ टैगोर की कहानियों को टीवी पर दिखाया ( इतना अच्छा बनाया था की उसकी तारीफ में अलग से दो चार पोस्ट लिखी जा सकती है ) |  कुछ कड़िया सशक्त नारी पत्रों पर था | ऐसे ही  एक कहानी में जमींदार पति पत्नी है , तभी शहर में एक नाटक कंपनी आती है पति उसमे पैसे लगाते है और नाटक देखते देखते नाटक की नायिका से प्रेम करने लगते है | पत्नी को शक होता है वो पति की खोज खबर के  लिए चुपके से नाटक देखने  जाने लगती है , लेकिन जल्द ही वो पति पर नजर रखना छोड़ नाटक में खोने लगती है और खुद को नायिका की जगह रखने लगती है | इधर पति और नाटक की नायिका का प्रेम बढ़ता जाता है और अब वो ठीक से काम नहीं कर पाती , इसके लिए नाटक के निर्देशक से डांट भी खाती है और गुस्से में पति नायिका को अपने साथ अपनी दूसरी हवेली में ला कर रहने लगता है | जल्द ही वो अपनी पत्नी को भूल जाता है और वो  दोनों पति पत्नी के तरह रहने लगते है |  नायिका पत्नी सा ही व्यवहार करने लगती है , अकेले रहते रहते परेशान हो जाती है और अब वो नाटक में वापस काम करना चाहती है तो पति उसका असली पति बन काम करने से रोक देता है | पैसे ख़त्म होने लगते है और फिर पति को अपनी पत्नी की याद  आती है | अपने पुराने शहर पहुंचते है और देखते है कि  पत्नी उसी नाटक कंपनी की नायिका बन गई है और लोगो की खूब सराहना पा रही है | उसके बॉडीगार्ड पति को उससे मिलने तक नहीं देते |
                                  कुछ समय पहले तमिल साहित्य  महान काव्यग्रंथ शिलापदिकारम के बारे में पढ़ा , जो हजारो साल पहले लिखी गई थी | कहानी सेम पति और पतिव्रता पत्नी नाटक की नायिका और पति  का उससे प्रेम उसका साथ रहना पत्नी  को भूल जाना नायिका की माँ का लालची होना और पति द्वारा अपना सारा पैसा उस पर लुटा देना | एक गलतफहमी में पड़ वापस पत्नी के पास आना और पत्नी का उसे स्वीकार कर लेना | पैसे के लिए मदुरै जाना वहां उस पर रानी की पायल चुराने का आरोप लगना और हड़बड़ी में उसकी मौत | पत्नी का वहा कर अपने पति  निर्दोष साबित करना और उसके श्राप से पुरे मदुरै का जल कर भस्म हो जाना | लगा जैसे इसी कहानी का आधुनिक वर्जन गुरुदेव ने लिखा हो | अब ये कहने की जरुरत है कि  दोनों में से कौन वर्जन एक स्त्री के रूप में मुझे पसंद होगा | धारावाहिक के कितने की एपिसोड देख लगा उस जमाने में रविंद्रनाथ ने इतने मजबूत नारी चरित्र कैसे गढ़े होंगे | उनके जन्मदिन पर उनको मेरा प्रणाम |





     











                 












                                                                            

February 09, 2018

अपराधियों का विचारधाराकरण -------mangopeople





               
                                                   विचारधारा के इस कथित झगड़े में फायदा सरकार और विपक्ष के आलावा आजकल अपराधियों को भी हो रहा है | कोई नीजि दुश्मनी हो, खुन्नस हो ,चर्चा में आना हो , अपनी राजनीति चमकानी हो या कोई नीजि पूर्वाग्रह हो | अपराधी आराम से अपने अपराध को विचारधारा का चोला पहना अपराध कर लेता है और एक तबका खड़ा हो जाता है उसके बचाव में | कोई उसके कृत्य को सिर्फ अपराध मानता ही नहीं , सभी उसको एक वाद से जोड़ देते है और उसके तहत ही उसके अपराध पर चर्चा करते है | जो अपराध राज्य सरकारों के लिए कानून व्यवस्था का मसला बनना चाहिए था  वो विचारधारा के नाम पर हुए झगड़े बन ,  सरकारों को भी फायदा देते है | सरकार भी ऐसे आरोपों और चर्चा को बढ़ावा देती है ताकि वो जिम्मेदारी से बच सके |  कोई उससे ये न पूछे की राज्य की सुरक्षा व्यवस्था कानून की जिम्मेदारी उसकी है और ये चूक कैसे हुई | तब तो सरकारों के लिए और आसान हो जाता है जब किसी अपराध को विपक्ष की सोच से जोड़ दिया जाता है | फिर तो उसके लिए सुनहरा मौका होता है कि  वो उसे और जोरदार ढंग से प्रचारित करे जिसके किसी की भी उंगली उसके शासन की तरफ न उठे |  इसमें विपक्ष भी बराबरी का योगदान देता है , वो भी उसे अपराध न मान कानून व्यवस्था का मसला  नहीं उठाती | वह भी समयानुसार सिर्फ विचारधारा का नाम ही दे अपने लिए वोट का इंतजाम  करती है | विचारधारा उसकी सोच से मिलती हो तो अपराध का बचाव नहीं तो सरकार की सोच पर हल्ला |
                                       

                                                                                                   मामला अख़लाक़ का हो या अंकित का असल में तो इन्हे मात्र एक अपराध की नजर से देख राज्य सरकारों पर सवाल करना चाहिए कि राज्य में कानून का कितना राज है और अपराधियों पर कितना अंकुश | सवाल पुलिस विभाग से पूछा जाना चाहिए कि वो क्या कर रही है | ये मसले यदि अपराध की नजर से देखे जाते और सही सवाल समाज और विपक्ष की तरफ से उठाये जाते तो कोई भी तबका अपराधियों के साथ खड़ा न होता और न ही उसके बचाव में कुछ कह पाता | उसकी जाँच भी बिना किसी दबाव के सही तरीके से होती और सही अपराधी भी पकड़े जाते | ये विचारधारा का ही झगड़ा है कि कई बार अपराध कोई और कर जाता है और विचारधारा का नाम दे उसका रुख कही और मोड़ दिया जाता है जिससे जाँच करने वाली  एजेंसिया भी दबाव में आ कर या दबाव में गलत दिशा में अपराधियों को खोजने लगती है और असल हत्यारा आराम से बाहर घूम रहा होता है | एक आरटीआई कार्यकर्ता की हत्या के मामले में ये दिख भी चुका है कि लोगो ने उनकी हत्या को इतना ज्यादा एक सोच से जोड़ दिया की पुलिस को उनके करीबी हत्यारो को भी पकड़ने में समय लग गया | ये आज की तथकथित विचारधारा ही है कि समाज एक अपराधी के साथ खड़ा हो जाता है या अपराध को लेकर अगर मगर करता है और इस स्थिति के लिए समाज के दोनों ही तबके बराबर के जिम्मेदार है |