Showing posts with label विवाह. Show all posts
Showing posts with label विवाह. Show all posts

May 13, 2022

विवाह स्त्री जीवन की धुरी नहीं हैं

स्त्रियों से जुड़े तीन अलग अलग मामलों में कोर्ट का फैसला आया हैं और फैसले हमें स्त्रियों की समाजिक स्थिति सोच पर ज्यादा काम करने को कहती हैं | 

पहले मामले में एक पिता अपनी चौदह साल की बेटी  से लगातार  रेप कर उसे गर्भवती  कर देता हैं और जब अस्पताल से मामला पुलिस तक पहुंचता हैं तो माँ बेटी दोनों पिता का नाम लेने से इंकार कर देती हैं | पुलिस का दबाव बढ़ने पर किसी और का नाम ले लेती हैं | 

पुलिस उनके आस पास के लोगों से पूछताछ और भ्रूण का टेस्ट कर पिता के  खिलाफ मुक़दमा  दर्ज करती हैं अब कोर्ट ने पिता को बीस साल की सजा दी हैं लेकिन माँ बेटी ने   पिता के   खिलाफ गवाही नहीं दी | 

दूसरा मामला ज्यादा महत्वपूर्ण हैं क्योकि इस फैसले से कोर्ट ने पति के खिलाफ रेप का मामला दर्ज करने के लिए कहा हैं | पत्नी दस सालो से ज्यादा समय तक क्रूर तरीके का यौन दुर्व्यवहार  सहती हैं जिसमे बार अप्राकृतिक  यौन सम्बन्धो के साथ बेटी के सामने यौन सम्बन्ध बनाने जैसे आरोप हैं | 


पत्नी ने क़ानूनी मदद तब ली जब नौ साल की बेटी के सामने यौन सम्बन्ध बनाने के बाद बेटी का भी यौन शोषण किया गया | पहले पॉक्सो एक्ट में मामला दर्ज किया गया था फिर कोर्ट ने फैसला दिया कि पत्नी से रेप के भी चार्जेस लगाये जाए क्योकि रेप तो रेप होता हैं चाहे वो कोई भी पुरुष करे | 

तीसरे मामले में कोर्ट ने अपने जीवनसाथी के चरित्र पर शक करने या चरित्र को लेकर निराधार आरोप बार बार  लगाने को क्रूरता माना हैं और इसके आधार पर तलाक को स्वीकार किया हैं | ये फैसला पत्नी के खिलाफ और पति के पक्ष में दिया हैं | 

1 - पहले मामले में पत्नी गरीब और पति पर निर्भर है | उन्हें ऐसे अपराधों से संरक्षण और सजा के लिए पहले से कानून मौजूद हैं लेकिन उनकी सामाजिक स्थिति और खुद उनकी सोच के आगे कानून का संरक्षण बेकार हैं | स्त्री सशक्तिकरण और अपराधों से उनके बचाव के लिए बना हर कानून तब तक इन जैसी स्त्रियों के लिए बेकार हैं  जब तक नीचे के स्तर तक स्त्रियों की सोच को नहीं बदला जाता | 


2 - दूसरे मामले में महिला काम तो नहीं करती लेकिन एक करोड़ से ज्यादा की संपत्ति उनके नाम है | जिसके  सहारे वो अपनी बेटी के साथ अलग जीवन बिता सकती थी इस विवाह से बाहर निकल कर | लेकिन एक दशक तक वो अत्याचार सहती हैं  जब तक पानी सर के ऊपर नहीं चला जाता और बेटी का भी   शोषण शुरू होता हैं  |  वो कानून का सहारा पहले भी लेकर अपना और अपनी बेटी को बुरे अनुभवों से बचा सकती थी  | 

3 - तीसरे मामले में महिला ना केवल पढ़ी लिखी है बल्कि एक कॉलेज में पढ़ाती भी हैं मतलब हर तरीके से आत्मनिर्भर  हैं  | लेकिन जिस पति  के चरित्र पर  शक है वो उसी के साथ रहने की ज़िद पर अड़ी है तब भी जब पति उन्हें तलाक देना चाहता हैं | आखिर वो कौन सी सोच हैं जो उन्हें उसी पति के साथ रहने के लिए मजबूर कर रहा हैं जिसको वो पसंद नहीं करती | 


जब तक स्त्रियां विवाह को अपने जीवन की धुरी , आधार मानना बंद नहीं करेंगी | जब तक वो  विवाह की सफलता असफलता को अपने जीवन की सफलता असफलता से जोड़ना बंद नहीं करेगी उनका कोई भला होने वाला नहीं हैं | उनके बचाव के लिए बने सैकड़ों कानूनों का कोई मतलब नहीं होगा जब तक वो अपने रूढ़िवादी सोच से बाहर नहीं निकलेंगी |


February 22, 2013

कितने सक्षम है युवा जीवन साथी चुनने में - - - - - -mangopeople


 नोट --- मुद्दे शायद कई आ गए है इसलिए विचार कही घुले मिले से लेगे तो झेल लीजियेगा


एल आई सी का विज्ञापन " चाचु आप को शादी के लिए कैसी लड़की चाहिए "
चाचू जबाब देते है की लड़की पैसे वाले घर से हो तो एक सपोर्ट मिलेगा , बचत करने वाली हो तो सेविंग होगी जिंदगी अच्छी चलेगी ,  पढ़ी लिखी और सरकारी नौकरी वाली हो तो बुढ़ापे की चिंता न हो । बच्चा कहता है की चाचू ये सब चाहिए तो एल आई सी की फलाना पॉलोसी ले लो और शादी ऐसी लड़की के साथ करो जो तुम्हे प्यार करे । हाल ही में रचना जी ने नारी ब्लॉग पर दो पोस्टे डाली एक में एक गांव से आ कर शहर में बसे एक युवा लडके की है जिसे गांव की अरेंज मैरिज वाली पत्नी नहीं पसंद है , तो दूसरी पोस्ट में युवा लड़की है (जो अब डाक्टर भी है ), जो अपने ९ साल के सम्बन्ध को शादी में न बदल पाने और उसे बिना बताये उसके प्रेमी के किसी और से शादी कर लेने से दुखी है , और अब अपने प्रेमी को सबक सिखाना चाहती है  ।  उस पोस्ट पर मुक्ति जी और रचना जी कहती है की समस्या ये है की आज भी बच्चो को माता पिता अपनी मर्जी का जीवन साथी नहीं चुनने देते है , उन्हें पढ़ने के लिए बाहर भेज देते है किन्तु विवाह का निर्णय खुद करते है , और इस कारण कई बार बेमेल विवाह हो जाता है , पति को पत्नी नहीं पसंद या पत्नी को पति । विवाह के लिए इन युवाओ को मर्जी को जानना चाहिए और उनका विवाह उनकी मर्जी से करना चाहिए ।

                                                    किन्तु सवाल ये है की आज के युवा अपने लिए जीवन साथी चुनने में कितने सक्षम है , जीवन साथी को लेकर उनकी सोच क्या है , क्या पढाई लिखाई करने के बाद उनके कपडे रहने खाने के ढंग के साथ की क्या जीवन साथी को लेकर उनकी सोच भी बदली है ।  विवाह के लिए जीवन साथी के रूप में आज के युवा क्या चाहते है इसकी कुछ बानगी देखिये ( अपनी छोटी बहनों के लिए कितने ही लडके देखे उनसे बात की अपनी बिरादरी से बाहर तक के लडके देखे इसलिए कुछ का निजी अनुभव है और कुछ आस पास के युवाओ से बात की है )

करीब २८  साल का युवा एयरनॉटिक  इंजिनियर ( हेलीकाप्टर के इंजिनियर को यही कहते है न ) जिनको अपने काम के लिए एक हफ्ते मुंबई और एक हफ्ते पुणे में रहना होता है के विचार , जी मुझे पढ़ी लिखी समझदार पत्नी चाहिए ,नहीं मै  उससे नौकरी नहीं कराऊंगा , आप तो टीवी सीरियल में देखा होगा की कैसे नौकरी करने वाली पत्नियों से परेशानी होने लगती है , फिर घर आओ तो घर पर कोई एक कप चाय भी पिलाने वाला न हो तो शादी से क्या फायदा । पत्नी तो मुंबई में ही रहेगी उसे पुना ले कर अप डाउन नहीं करूँगा :)
  तो भैया ये बताओ की पुने में तुमको एक हफ्ते चाय कौन पिलाएगा , क्या वहा के लिए दूसरी पत्नी रखोगे ।


बैंक में नौकरी करने वाला युवा जिसने बाकायदा अखबार में विज्ञापन दिया है , प्रोफेशनल लड़की से विवाह , जी नहीं मुझे भी अपनी पत्नी से नौकरी नहीं करवानी है , तो प्रोफशनल लड़की की बात क्यों कही , जी वो तो इसलिए की लड़की थोडा पढ़ी लिखी हो मुझे घर का आटा दाल न लाना पड़े :)
हे प्रभु घर का सामान लाने के लिए भी किसी प्रोफेशनल डिग्री की जरुरत होती है ।

अपने पिता की दुकान को अपने स्तर का न बताने वाला युवा जो बाहर जा कर मामूली सा डी  डी  पी के काम को ही बड़ा और पढ़ा लिखा काम मानता है , मुझे फलाने की पत्नी ने भी सुन्दर पत्नी चाहिए , चार दोस्तों के बीच ले जाने लायक हो  और दहेज़ भी उससे ज्यादा चाहिए वो तो दो भाई है , जबकि मै  तो इकलौता बेटा हूँ  :)
भाई पत्नी अपने लिए चाहिए या दोस्तों के लिए ।

एक बड़ी कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजिनियर,  मै ५ फिट १० इंच का हु तो लड़की कम से कम ५ फिट ६-७  इंच की हो मेरी सेलरी ८ लाख है तो लड़की की कम से कम ७ लाख हो मेरा रंग गेहुआ है पर लड़की बिलकुल गोरी और सुन्दर होनी चाहिए , और खाना उसे केवल भारतीय ही नहीं विदेशी भी आना चाहिए, बिलकुल मेरी टक्कर की हो हम  दोनों चले तो लगे की भाई जोड़ी हो तो ऐसी ।
बंधू इस कद वाली और ७ लाख कमाने वाली लड़की अपने टक्कर के लडके के साथ जिसका कद ६ फिट और कमीई १०-१ 2 लाख होगी उससे करेगी तुमसे क्यों करेगी, उस पर से तुमको खाना भी लिखाएगी बना कर ,एक कुक न रख लेगी अपनी कमाई से , उसे भी तो अपनी जोड़ी लाजवाब बनानी होगी ।


लड़किया भी कम नहीं है , समय बदल गया किन्तु सफ़ेद घोड़े पर मुझे "प्यार" करने वाला मेरा "राजकुमार" आयेगा की मानसिकता अभी भी बहुत सारी लड़कियों के दिमाग से नहीं उतरा है । उत्तर भारत के एक गांव में युवती  बी ए  की पढाई आगे बस घरेलु जीवन जीने की इच्छा जीवन साथी कैसा चाहिए, सीधा जवाब था की कम से कम ३० - ४०  हजार कमाता हो उसके आगे उन्होंने कोई दूसरी बात नहीं कही । इसी तरह की एक और युवती , गोरा लम्बा हैंडसम हो और मुझे खूब प्यार करे । जो पढ़ी लिखी है नौकरी कर रही है , मुझे तो ऐसा पति चाहिए जो पढ़ा लिखा हो खुले दिमाग का आजाद ख्याल रहे,  अकेले रहता हो संयुक्त परिवार नहीं चाहिए , मुझे भी नौकरी करने दे ,  मुझे भी आजादी रहे ।  किन्तु इन्हें ये नहीं पता की पढ़े लिखे होने भर से कोई आजाद ख्याल नहीं हो जाता है और संयुक्त परिवार न भी हो तो भी पति पत्नी को आजादी दे ही दे ये भी जरुरी नहीं है । ( अब आप कह सकते है की लड़को को इतने उदहारण दिए लड़कियों के इतने कम क्यों , जवाब सीधा सा है की लड़कियों से पूछता कौन है की उन्हें कैसा जीवन साथी चाहिए उन्हें बोलने का हक़ ही कहा है , उन्हें पसंद या नापसंद किया जाता है वो किसी को पसंद या नापसंद नहीं करती है विवाह के लिए  , हा  कुछ घरो में ये स्थिति बदली है किन्तु वो संख्या बहुत ही छोटी है ) ये लिस्ट बहुत ही लम्बी है आप लोगो के पास भी इस तरह के उदहारण होंगे ।
                 

                                              आज कल के ज्यादातर ( जो कोई बड़ी डिग्रीधारी है या जो नए नए आधुनिक बने है ) युवा जीवनसाथी के रूप में चाहते क्या है इसे लेकर उनकी समझ थोड़ी उलझी हुई  है , असल में पति और पत्नी कैसे  हो इस बात को लेकर ही उनके मन में गलत धारणाये बनी हुई है , एक घिसी पिटी  सी  सोच, लकीर  है और हर युवा उसी पर चलना चाहता है , की बस मै ही अपना  जीवन साथी चुनुगा तो वो मेरे लिए ठीक होगा नहीं तो दुसरो ने किया या उसमे वो सारी खूबिया  नहीं हुई और कोई भी कमी हुई तो वो विवाह बेमेल है उसमे रहना एक समझौता है । सबसे बुरी हालत उन की है जो अभी अभी आधुनिक बने है , गांवो से पढ़ने शहर में आ गए दो चार साल की पढाई और एक  नौकरी उन्हें अचानक से गलतफहमी में डाल देते है की वो अब आधुनिक हो चुके है , खासकर विवाह के मामले में अब उन्हें उनके पसंद की या कहे उनके स्तर ? की लड़की चाहिए  ।  जबकि वास्तव में दिमागी तौर पर खासकर अपनी पत्नी को लेकर उनकी सोच में जरा भी परिवर्तन नहीं होता है , कुछ तो इस बात को भली प्रकार जानते है और भले शहर में रहे किन्तु भूल कर भी शहर की लड़की से शादी नहीं करते है , कितनो को ही जानती हूँ कहते है बाप रे मुंबई -दिल्ली  की लड़की के साथ शादी कभी नहीं यहाँ की लड़की पत्नी के रूप में हमें नहीं चलेगी , वो अपनी सोच को जानते है और ये भी जानते है की शहरो में पली बढ़ी लड़कियों की सोच को वो पचा नहीं पाएंगे , जबकि कुछ पूरी तरह से गलतफहमी में ही जीते रहते है ।  अब रचना जी ने अपनी पोस्ट में जिस युवक ने अपने बारे में लिखा है उसे ही ले लीजिये हम जिस देश में रहते है वहा किसी लड़की का शराब न पीना उसकी कमी कब से बन गई , जो युवक इतना आधुनिक बन रहा है वही एक रुढ़िवादी पति की तरह अपनी पत्नी को जरा भी सम्मान नहीं दे रहा है उसके अंग्रेजी न जानने भर को वो गावर होने की निशानी बता रहा है ,  क्या वो अपने माता पिता को भी ऐसे शब्दों से नवाजेगा शायद नहीं क्योकि वो कहने को तो आधुनिक बना गया है किन्तु दिमाग में आज भी पत्नी को लेकर वही सोच है कि उसे मेरी कठपुतली होना चाहिए उसे वही करना चाहिए जो मै कहूँ , यहाँ तक की नौकरी भी वही करनी चाहिए जो मेरी मर्जी हो , पत्नी की मर्जी पत्नी की सोच से उसे कोई लेना देना नहीं है पत्नी का अर्थ है वो महिला जो बस आज्ञाकारी गुलाम की तरह अपने पति की हर उम्मीदों पर खरा उतरे , इन सब के आलावा एक पढ़ी लिखी नौकरी कर रही लड़की को खाना बनाना और घर संभालना भी अच्छे से आना चाहिए नौकरी करने के बाद भी ये जिम्मेदारी भी केवल उसी की होगी , यहाँ पर इनकी आधुनिकता उनकी पढाई लिखाई उनका शहरीपन कहा चला जाता है, तब वो आधुनिक पति की तरह उसे अपनी भी जिम्मेदारी नहीं समझते है ।  

                           क्या खुद के पसंद से विवाह करने में कोई परेशानी ही नहीं है , क्या  खुद से अपना जीवन साथी चुनने पर उनकी सभी इच्छाए पूरी हो जाती है , जवाब सीधा सा है नहीं, ऐसा हो ही ये भी जरुरी नहीं है , बिलकुल वैसे ही जैसे अरेंज मैरिज का मतलब बस बेमेल और बच्चो की मर्जी के खिलाफ विवाह ही होता है  ।  ज्यादा क्या कहु आज कल के युवा लिव इन रिलेशन से आजम कर अपना जीवन साथी चुनना चाहते है और नतीजा क्या है , कि  आज लिव इन रिलेशन को भी कोर्ट को घरेलु हिंसा में शामिल करना पड़ा , इतने से ही आप समझ गए होंगे की मै क्या कहना चाह  रही हूँ ।   अब खुद रचना जी के दूसरी पोस्ट को देखिये जिसमे लड़की बता रही है की ९ सालो के संबंधो के बाद भी विवाह नहीं हुआ , लडके ने उसे धोखा दिया , लड़की ने अपनी मर्जी से किसी को अपना जीवन साथी चुन था,  उसका एक ये भी नतीजा हुआ , और ये धोखा दोनों तरफो से होता है । आधुनिकता के नाम पर वो ऐसे संबंधो में आ तो जाते है किन्तु उसके टूटने को वो उसी आधुनिकता के साथ पचा नहीं पाते है , तो बहुत सी जगहों पर ऐसी संबंधो के नाम पर लड़की और लड़का दोनों का शोषण होता है कभी शारीरिक और कभी आर्थिक , और जो रिश्ते विवाह तक पहुँच भी जाते है वह भी विवाह के बाद बिलकुल वैसे ही होते है जैसे किसी अरेंज मैरिज में पति पत्नी के बीच होता है । आप को हजारो जोड़े मिल जायेंगे जो बताएँगे की लव मैरिज में मैरिज के बाद लव पता नहीं कहा गया अब तो बस मैरिज ही बचा है । कारण एक ही है की जीवन साथी को लेकर युवाओ की सोच आज भी वही रुढ़िवादी है , वो भले ही कितने ही आधुनिक हो गए है ।  पति पत्नी के बिच झगड़े तनाव , विवाद , एक दूसरो क नापसंद करना और  तलाक हर तरह के विवाह में होते है ,  वो जो सिर्फ माता पिता की मर्जी से हुए , उसमे भी जो माता पिता और बच्चो दोनों की मर्जी से हुए , उसमे भी जो केवल बच्चो की मर्जी से हुए और उनमे भी जिसमे कई सालो तक लिव इन रिलेशन के बाद विवाह हुए । कोई भी विवाह ऐसा नहीं होता है जिसमे कुछ समझौते न हो , जिसमे दोनों में कोई कमिया न हो , जिसमे किसी मुद्दे पर दोनों के विचार अलग न हो ।  यदि विवाह में दो व्यक्ति है दो इकाई है तो निश्चित रूप से वहा दो तरह की सोच होगी और कभी न कभी वो आपस में टकराएंगी और दोनों को समझौता करना होगा , हा वहा पर नहीं होंगे जहा पर पत्नी को दूसरी इकाई माना ही न जाये ।

                                                कहने का अर्थ ये है की जो युवा और परिवार भी आधुनिक पढ़ा लिखा होने का दंभ भरते है उन्हें पहले अपने जीवन साथी को लेकर अपनी सोच को बदलना होगा , और उसे भी उतना ही आधुनिक बनाना होगा जितना की वो खुद को समझते है , पत्नी को सम्मान देना,  उसके अस्तित्व को स्वीकार करना , उसकी इच्छा मर्जी का भी ध्यान रखना और उसे भी परिवार की बराबरी की इकाई समझना , और खुद से कमतर न समझने की समझ बढानी होगी , पहले किसी बात में सक्षम बनिए फिर कीजिये कोई मांग । मैंने जो कहा वही सत्य नहीं है सभी की अपनी सोच है और अपवाद से दुनिया भरी पड़ी है ।

चलते चलते        
                              दो दिन पहले  एक बच्ची के जन्मदिन में गई वहा कुछ गेम के बाद लडके और लड़कियों की दो टीम बना दी गई और फिर उनके बीच  शारीरिक ताकत के गेम शुरू कर दिया गया , हम सब बेटियों वाली मम्मियो ने कहा ये गलत है लड़किया हार जायेंगी निश्चित रूप से लडके शारीरिक ताकत में उनसे ज्यादा होते है और लड़किया ऐसे गेम खेलना भी पसंद नहीं करती है , उन्हें इसकी आदत नहीं है  , उन्हें चोट लग जाएगी , किन्तु कुछ ही मिनट में हमारी ही बेटियों ने हमें गलत साबित कर दिया ५ में से ४ गेम जित गई । हम सभी अपनी बेटियों को कम आकते है , असल में हम सभी बेटियों को कम आकते है । वो गांव में पढ़ी लिखी है तो आधुनिक नहीं होगी , वो बदल नहीं सकती है , गांव की लड़की शहर में पढ़े लिखे लडके के लिए उपयुक्त पत्नी नहीं है , यदि लड़की को आधुनिक बनाना है तो उसे अपने गांव शहर से दूर जा कर ही पढाई करनी होगी तभी वो आधुनिक बनेगी , उन्हें आधुनिक बनना ही चाहिए , इसलिए की उनका विवाह किसी अच्छे लडके से हो सके , क्यों ऐसा क्यों होना चाहिए , हम क्यों अपनी बेटियों को कम आंक रहे है हम क्यों कहते है की हिंदी मीडियम से पढ़ी लड़की कुछ कर नहीं सकती है,  गांव के घरेलु वातावरण में पली लड़की कुछ कर नहीं सकती है । यदि ये सोच हमारी है तो हम से बड़ा गावर कोई नहीं है । सच कहू तो आज यदि हमारे समाज में शादिया बची है परिवार नाम की कोई चीज बची तो वो इन गांव छोटे शहरो हिंदी मीडियम में पढ़ी लडियो की वजह से है जो आज भी परिवार को बचाने और बनाये रखने की जिम्मेदारी खुद पर ही लेती है , जो जानती है की हमारा पढ़ा लिखा आधुनिक पति,  पत्नी के लिए कैसा गावर , रुढ़िवादी सोच रखता है , जो जानती है की नौकरी के बाद घर भी उसे ही संभालना है , जो जानती है की आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने के बाद भी कैसे अपने वजूद को खो के जिना है , कैसे अपनी इच्छाओ , सोच को मार कर केवल पति और परिवार की सोच के हिसाब से जिन है खुद को ढालना है , और सारा जीवन सिखते सिखते बदलते बदलते बिताना है । उन्हें बदलने की कोशिश मत कीजिये क्योकि हमारे समाज की पुरुषवादी सोच पत्नी को लेकर सोच अभी नहीं बदली है , पहले उसे बदलिए बेटिया अपने आप बदल जाएँगी । मै  अपनी बेटी को रोलर स्केट सिखाने जाती थी वहा लड़को की रफ़्तार बड़ी तेज होती थी और लड़किया उस मुकाबले धीमा चलाती थी , लेकिन वो तेज रफ़्तार उन लड़को के बार बार गिर जाने का कारण होता था जबकि लड़किया गिरती नहीं थी इस संतुलन का सम्मान कीजिये उसे कम करके मत दिखाइए  :)


एक नई बात भी पता चली इस विचार विमर्श में की आप तब तक ही युवा है नए ज़माने के है जब तक आप का विवाह नहीं हुआ है ।  विवाह होने और बच्चे होने के बाद आप की आयु कितनी भी हो आप के साथ आप की सोच भी अब युवा नहीं होती है , आप पुराने और रूढ़िवादियो की श्रेणी में आ जाते है और कितनी भी आयु तक आप का विवाह न हो आप युवा ही होते है आज के ज़माने के होते है ।  जैसे ३०-३५ साल की अविवाहित युवती को लोग लड़की और बच्चे दीदी बोलते है और 22 साल में ही माँ बन गई युवती को औरत और बच्चे आंटी कहते है  :)))       
                                                        

October 17, 2012

जेम्स बॉन्ड अभिनेत्रिया भी भई नारीवादी --------mangopeople





एक खबर पढ़ी की जेम्स बांड फिल्मो में काम करने वाली अभिनेत्रियों को " बॉन्ड गर्ल" कहा जाता है किन्तु 23 वे बॉन्ड फिल्म में काम कर रही हॉलीवुड अभिनेत्रीया  बेनेरिस  मार्लो  और निओमी  हैरिस को इस नाम से परहेज है उनका मानना है उन्हें "बॉड गर्ल"  नहीं "वुमन"  कहा जाये । असल में  इन फिल्मो में काम कर रही अभिनेत्रियो को केवल एक  सेक्स बम की तरह पेश किया जाता है जबकि ऐसा नहीं है , महिला किरदार भी बॉड की तरह ही चालक समझदार और कई मौको पर एक्शन भी करती है और बॉड की जान तक बचाती है , उसके मुकाबले जिस्म दिखाने के दृश्य तो काफी कम होते है किन्तु उन्हें अपना खुबसूरत बदन दिखने वाली किशोरी की तरह सेक्स बम ही बना कर प्रचारिक किया जाता है जो गलत है  । इसी बात का विरोध किया जा रहा है और ये विरोध भी कोई पहला नहीं है जहा बॉड फिल्म में नायिका बनने के लिए होड़ मची रहती है वही कुछ अभिनेत्रियों ने इस किरदार को करने से ही मना भी किया है .क्योंकि उनका मानना है की जेम्स बॉड को महिलाओं के जज्बातों की क़द्र नहीं हैं वह अपने काम निकालने के लिए उन्हें मोहरा बनाता हैं और फिर उनसे किनारा कर लेता हैं यहाँ तक की वह अलग अलग देशों में जाता है और अपने अहम् की संतुष्टी के लिए कई महिलाओं के साथ बेड साझा करता हैं.( राजन जी के ब्लॉग से ) । अमेरिका जैसे देशो में भी महिला अभिनेत्रिया अपने सही स्थान की मांग कर रही है ।  भारत के लिए भी ये नया नहीं है अभी हांल में भी विद्या बालन की फिल्म डर्टी पिक्चर ने खूब पैसा कमाया तो पत्रकार उनसे पुछने लगे की क्या अब उन्हें पैसा कमाने वाले खान अभिनेताओ की तरह विद्या खान कहा जाये तो उन्होंने तुरंत जवाब दिया की क्यों विद्या खान क्यों किया जाये शाहरुख , आमिर और सलमान बालन क्यों न कर दिया जाये ( नीजि रूप से भी मुझे उनका ये जवाब बहुत ही पसंद आया ) । लिजिये अब तो अभिनेत्रिया भी नारीवादी बन गई वो भी किस देश की जहा पर ज़माने से महिलाओ के बराबरी की बात की जा रही है किन्तु विरले ही कोई पुरुष उनके किये को सम्मान की दृष्टि से देखता हो और बराबरी का बात करता हो । ऐसा नहीं है की कुछ उदाहरन है ही नहीं , आप को याद होगा एक अमेरिकी टीवी सीरियल " फ्रेंड्स " आता था पूरी दुनिया में काफी प्रसिद्द था उसमे 6 दोस्तों की कहानी थी जिसमे 3 महिला और 3 पुरुष थे जब वो धारावाहिक काफी प्रसिद्द हो गया तो महिला कलाकारों ने मांग की की उन्हें भी उतना ही पैसा दिया जाये जितना की पुरुष कलाकारों को दिया जाता है क्योकि उस धारावाहिक की सफलता में उनका बराबर का हाथ है , उनके उस कदम पर धारावाहिक के तीनो पुरुष कलाकार अपना अहम् सामने रखने  की जगह उनके साथ खड़े हो गए और बराबर पैसे देने की मांग करते हुए काम करने से इंकार कर दिया , नतीजा उन दिन से सभी को एक सामान पैसे दिए जाने लगे ( मतलब की महिलाओ के पैसे बढा  दिए गए पुरुषो के कम नहीं किये गए )। अन्तराष्ट्रीय महिला टेनिस खिलाडी भी महिला और पुरुषो को पुरुस्कारों  में मिलने वाले पैसो में बराबरी की बात करती रही है , उनकी बात को ये कह कर ख़ारिज कर दिया जाता रहा है की पुरुष 5 सेट मैच खेलते है और महिलाए 3 सेट ( ये भी कोई तर्क हुआ ) महिला खिलाडियों का   कहना है की लोग अच्छा खेल देखेने आते है न की यहाँ समय बिताने क्या पुरुषो के जो मैच तीन  सेट में ही ख़त्म हो जाते है तो उन्हें कम पैसे दिए जायेंगे । किन्तु बराबरी की ये सभी मांगों को नारीवादी सोच कह कर ख़ारिज किया जाता रहा है ।
    
                     समझ नहीं आता की नारी जब भी अपनी ,अपने अधिकारों ,बराबरी की बात करती  है तो उसे नारीवादी कह कर ख़ारिज क्यों कर दिया जाता है , किसी पुरुष की बातो को तो पुरुषवादी कह कर नहीं ख़ारिज किया जाता है यहाँ तक की कोई पुरुष नारी के बारे में लिखे तो उसे भी नारीवादी कह कर ख़ारिज नहीं किया जाता है बल्कि उसे तब संवेदनशील कह कर प्रसंसा की जाती है । कुछ दिन पहले देवेन्द्र जी के ब्लॉग पर मुक्ति जी के फेसबुक पर विवाह को लेकर एक टिप्पणी पढ़ी  " कल एक ब्लोगर और फेसबुकिया मित्र ने मुझे ये सलाह दी की मै शादी कर लू , तो मेरा आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित हो जायेगा :) इस प्रकार का विवाह एक समझौता ही होगा , तब से मै स्त्रियों द्वारा  " सुरक्षा " के लिए  चुकाये जाने वाले कीमत के विषय में विचार विमर्श कर रही हूँ और पुरुषो के पास ऐसा कोई विकल्प न होने के मजबूरी के विषय में भी :) इससे पहले मुक्ति जी के मित्र की बात का ही जवाब दे दूँ , जिस समाज में हम रहते है वहां आज भी स्त्रिया खुद से विवाह नहीं करती है बल्कि उनका विवाह किया जाता है पिता, भाई आदि आदि के द्वारा और कब करना है किससे करना है कैसे करना है आदि आदि का निर्णय भी वही करते है तो सलाह किस पिता भाई को ऐसी देने चाहिए की ,  पिता जी भाई जी अपने बहन बेटी का झट से विवाह कर दे ताकि उसकी सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा का "बोझ" ( यदि वो ऐसा समझते  हो तो ) आप पर से उतर जाये , अब वो भाई और पिता उन्हें कैसे जवाब देते है ये तो इस बात पर निर्भर होगा की वो अपनी बेटी या बहन का विवाह क्या सोच कर करते है ( क्या आप को इसमे खाप पंचायत वाली सोच नहीं दिख रही है की बेटियों का बलत्कार हो रहा है तो उनका विवाह 15 साल में ही कर दो ताकि आप से उसकी सुरक्षा का झंझट छूटे और बला किसी और पर जाये )  स्त्री तो यहाँ कोई मुद्दा ही नहीं है क्योकि यदि मात्र सामजिक और आर्थिक सुरक्षा के लिए विवाह किये जाते है तो वो सब कुछ तो स्त्री को बिना कुछ भी किये अपने पिता के घर में मिल ही रही है उसके लिए उसे विवाह की क्या जरुरत है सोचना तो उस पिता को है की क्या वो अपनी जन्म दी हुई बेटी को आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा नहीं दे सकता है उनका लालन पालना जीवन भर नहीं कर सकता है , और यदि  ये सलाह किसी स्त्री को दी जा है की वो शादी कर ले , मतलब की वो अपने विवाह के लिए फैसले लेने के लिए स्वतंत्र है , तो ये बात भी ध्यान में रखनी चाहिए की हमारे समाज में जो स्त्री अपने विवाह के फैसले लेने के लिए स्वतंत्र  है उसे किसी और से सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा की जरुरत नहीं है ।

                                    
                                                              दुनिया में सत्ता पाने उसे बनाये रखने का सबसे कारगर तरीका है डर पैदा करना , धर्म राजनीति से लेकर पुरुष भी स्त्री पर अपनी  सत्ता,  डर दिखा कर ही काबिज रखता है , जैसे की विवाह को सुरक्षा का नाम दे कर उसके अन्दर स्त्री पर सत्ता सिन रहना , अब जब की स्त्री को ये बात  समझ में आ रही है कि  एक तो विवाह मात्र सुरक्षा नहीं है दुसरे ये की अब कम से कम हम अपनी सामजिक और आर्थिक सुरक्षा के लिए किसी और पर निर्भर नहीं है , वैसे ये बात भी सोचने की है की जिस विवाह को स्त्री के लिए हर तरीके से सुरक्षा बताया गया वहां  वो सारी सुरक्षा उसे मिलती हो ऐसा भी नहीं है , घरेलु हिंसा के सामने आते मामले बता रहे है की वो शारीरिक प्रताड़ना से अपने ही घर और घरवालो से सुरक्षित नहीं है , यहाँ तक की महिलाए अपने ही घर में बलात्कार से भी सुरक्षित नहीं है , निम्न वर्ग, खेती बड़ी वाले गांवो, मुंबई जैसे शहरों में बड़ी संख्या में महिलाए आर्थिक रूप से घर में बराबर का सहयोग कर रही है तभी घर चल रहा है , फिर किस बात की सुरक्षा ये विवाह उन्हें प्रदान कर रहा है , फिर वो क्यों उस विवाह को अपनाये जो उन्हें मात्र गुलाम बनाने और अपनी जरूरतों को पूरा करने की सोच के साथ पुरुष करता है ( यहाँ मै सभी पुरुषो की बात नहीं कर रही हूँ पर जिनके विचार ऐसे है उनके लिए , किन्तु अफसोस की ज्यादातर के ऐसी ही है,  चाहे जानकर या चाहे अनजाने में  ) । अब जब नारी विवाह के "अर्थो" को बदलने की बात कर रही है तो कुछ पुरुषो के द्वारा एक नया डर  पैदा किया जा रहा है , लो जी नारी विवाह नहीं करेगी तो बच्चे कैसे होंगे  समाज कैसे चलेगा , दुनिया नष्ट हो जाएगी , समाज में आराजकता फ़ैल जाएगी ( एक स्त्री के लिए समाज हमेसा से  अराजक ही रहा है है गोवाहाटी कांड से लेकर हजारो उदाहरण पड़े है  )परिवार का नमो निशान मिट जायेगा और न जाने क्या क्या बकवास । कितनी अजीब बात है की स्त्री सिर्फ ये कह रही है की आज विवाह के मायने बदलने चाहिए , विवाह एक तरफ़ा समझौतों पर नहीं हो , बल्कि दो लोगो के आपसी समझ पर होनी चाहिए , विवाह में जब दो पक्ष होते है और कोई एक पक्ष के बिना विवाह नहीं हो सकता है तो फिर दोनों का स्थान भी बराबर होना चाहिए , एक विवाह में जितना महत्व पुरुष के शरीर की जरूरतों को दिया जाता है उतना ही महत्व स्त्री के मन भावनाओ को भी दिया जाना चाहिए , साथ ही माँ कब बनना है और कितने बच्चो की माँ बनना है इसका निर्णय भी वो खुद करेगी , अपवाद स्वरुप ही कोई महिला ये कहती हो की उसे कभी भी माँ नहीं बनना  है , साफ है की वो बस इतना चाहती है की उसे अब विवाह के लिए पति परमेश्वर की नहीं "जीवन साथी" की जरुरत है ( वैसे उम्मीद है की लोग "जीवन साथी" का मतलब तो समझते होंगे ) । किन्तु शोर मचाया जा रहा है की लो ये नारीवादिया दुनिया ख़त्म करने पर तुली हुई है  महिलाए विवाह की नहीं करना चाहती है और न ही बच्चे को जन्म देना चाहती है , हा ये ठीक है की आज विवाह न करने वाली लड़कियों की संख्या बढ़ रही है क्योकि समस्या वही है की विवाह करने के लिए पति तो हजार मिल रहे है किन्तु कोई जीवन साथी नहीं मिल रहा है यदि वो विवाह नहीं कर रही है तो उसका सबसे बड़ा करना है की विवाह करने के लिए उन्हें कोई साथी ही नहीं मिल रहा है । अब जबकि वो आर्थिक और सामाजिक रूप से किसी और पर निर्भर नहीं है तो  वो पारम्परिक विवाह के उस रूप से बाहर आ चुकी है और विवाह के नए मयानो के साथ विवाह करना चाह  रही है किन्तु जिस रफ़्तार से स्त्री बदल रही है उस रफ़्तार से पुरुष नहीं बदल रहे है , ये बिलकुल ठीक बात है की आज विवाह के पारम्परिक सोच से पुरुष भी बाहर आ रहा है और वो भी मात्र  पत्नी की जगह हर कदम पर उसके साथ देने वाली जीवन संगनी की चाह रखता है ( कई बार उन्हें भी अपने लिए साथी खोजने में परेशानी होती है किन्तु शायद वो अपनी जरूरतों के आगे झुक जाते है और हार मान कर अंत में जो मिल जाये उसी से विवाह कर लेते है शायद कुछ महिलाए ये समझौते नहीं कर रही है इसलिए वो या तो देर से विवाह करती है या न करने का ही निर्णय ले लेती है , वैसे अपवाद हर जगह होते है  ) कुछ स्त्रियों के विवाह न करने से दुनिया नहीं ख़त्म होने वाली है और न ही समाज में आराजकता आने वाली है यदि आराजकता आज समाज में है और कभी ये बढ़ी तो उसका  कारण  पुरुष का चारित्रिक पतन होगा कोई स्त्री का विवाह न करना नहीं होगा।

                                                                                  दुख इस बात पर नहीं होता है की कुछ सिरफिरे दिमाग अपने चात्रित्रो के कारण  बेमतलब की चिल्ल पो करते है और चीजो को गलत ढंग से पेश कर लोगो को मुर्ख बनाने या डराने का काम कर रहे है , दुःख  इस बात का होता है की कुछ समझदार बिना बात को समझे उनकी बातो का समर्थन करने लगते है । विवाह एक बहुत ही नीजि सोच है हर व्यक्ति का अपना विचार होता है हर व्यक्ति के विवाह करने और न करने के अपने कारण  हो सकते है हमें उसमे हस्तक्षेप करने की या ये कहने की कोई आवश्यकता नहीं है की उनके लिए क्या सही या गलत है , कल को यदि वो जबरजस्ती विवाह कर लेते है और बाद में परिणाम तलाक होता है तो दो जिन्दगिया बर्बाद होती है उसका जिम्मेदार कौन होगा , क्या समाज इस बात से अच्छा बना रहेगा जिसमे ढेर सारे बेमेल, बे-मन से बने विवाह हो और वो सारा जीवन कुढ़ते हुए लड़ते हुए घुट घुट कर बिताये , क्या ऐसे विवाह वाले समाज बहुत अच्छे होंगे , एक बार कल्पना कीजिये की इस समाज में जन्म लेने वाले बच्चे कैसे होंगे , उन पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा । इसलिए जरुरी ये है की समय के साथ बदला जाये आज की जरूरतों को समझा जाये बदल रहे समाज के साथ लोग भी बदले और ये बात समझ ले की नारी भी बदल रही है बदल गई है और उसी के हिसाब से उसके आस पास की चीजो को भी बदलना होगा , और पुरुष को तो सबसे ज्यादा । ये बदलाव बहुत कठिन नहीं है बस आप स्त्री की जगह ये सोचिये की मेरी छोटी बहन या बेटी का मामला है देखिये ये  बदलवा आप में खुद ब खुद आ जायेगा , और बदलाव आ भी रहा है देखा है न जाने कितने ही पिताओ को जो अपनी बेटी के लिए समाज से पंगे लेते है , मुंह उठाये किसी से भी बेटी का विवाह नहीं कर देते है , कितने ही लड़को को इंकार कर देते है , सीना फुला कर बताते है की उनकी बेटी कितनी पढ़ी लिखी है और उसका वेतन कितना है , आज पिता बताते है की उन्हें कैसे वर की तलास है अपनी बेटी के लिए , बस ऐसे पिताओ  की संख्या कम है । किन्तु जैसे ही ये पुरुष पिता से पति के रूप में आता है इसकी भाषा बोली और सोच दोनों ही बदल जाती है इसलिए अब जरुरी है की पिता के बाद भावी पतियों की सोच में भी बदलाव आये नहीं तो वो सदा भावी पति ही बन कर रह जायेंगे ,क्योकि स्त्री को अपनी जरूरतों और भावनाओ को दबाना आता है वो उन्हें दबा कर विवाह न करने का तो निर्णय आसानी से ले लेगी और उसे निभा भी लेगी किन्तु किसी पुरुष के लिए ये करना मुश्किल होगा इसलिए नारी को ये बताने के बजाये की वो क्या करे और न करे अपने आप को बदलिए अपनी सोच को बदलिए , वरना हर स्त्री समाज की और लोगो की परवाह करना बिलकुल भी बंद कर देगी क्योकि अब घरो में बेटिया नहीं राजकुमारिया जन्म लेती है और याद रखिये की  राजकुमारिया कपडे नहीं धोती :)।



चलते चलते  

                    एक हमारा देश है जहा महिलाओ से जुड़ा शायद ही कोई मुद्दा कभी भी चुनावी मुद्दा बनता हो और एक अमेरिका है , राष्ट्रपति का चुनाव दुबारा लड़ने जा रहे ओबामा ने अपने प्रतिद्वंदी से बहस करते हुए बताया की  उन्होंने महिलाओ और पुरुषो को सामान वेतन दिलाये है , जरा देखिये और सुनिए की ये मुद्दा वहां का चुनावी मुद्दा भी है और खुद ओबामा भी इस बात का जिक्र कर रहे है । असल में वहा पर महिलाए वोट करती है मतलब अपनी सोच समझ के हिसाब से,  इसलिए वो भी वोटर है , जबकि भारत में महिलाए वोट देती है किन्तु वोटर नहीं है मतलब की ज्यादातर महिलाए अपने घर के पुरुष सदस्यों के कहने पर ही वोट दे देती है या उनकी बाते ही सुन कर उसी से प्रभावित हो कर वोट दे दिया , राजनीति में वो रूचि नहीं लेती है और अपना दिमाग नहीं लगाती है ज्यादा से ज्यादा सिलेंडर महंगाई को ले कर हाय तौबा मचा दिया बस , तो जरा अपनी वोट की शक्ति पहचानिए और वोटर बनिये।