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September 19, 2022

पितृपक्ष पितर और मुंबई के कौवें


                  शायद मुंबई ऐसी जगह है जहां पितृपक्ष मनाने की जरुरत नही है क्योंकि यहां सालभर लोग अपने पितृ रूपी  कौवों को खाना खिलाते है । जैसे बाकि जगहो पर  गली मे घुमते गाय , कुत्ता , कबूतर आदि कोई एक घर पकड़ लेते है और  रोज वहां आ कर खाना खाते है ऐसे ही मुंबई मे कौवे किसी घर की खिड़की पकड़ लेते है और  रोज आ कर खाना मांगते है । घर वालो को बकायदा आवाज दे कर बुलाते है और उस घर के लोग रोज उन्हे कुछ खाने को भी देते है । 

                          हमारे पड़ोसी के रसोई की खिड़की पर भी आते है । जब कोई नही रहता और  आवाज देने पर भी नही आता तो वहां रखा कोई बर्तन चोच से पकड़ कर से नीचे गिरा देते है । एक बार कांच का ग्लास उनका ऐसे ही तोड़ दिया नीचे गिरा कर । हमारे घर भी आते थे बिटिया दो चार बार खाना दे दी तो रोज का नियम बना लिया । अगर हम ड्राइंग रूम मे ना दिखे या आवाज  देने पर ना आये तो समझ जाता बेडरूम मे है और  उसकी खिड़की पर आ कर कान खाना शुरू कर देता । 

                    लेकिन  खाने के नखरे है भाई खाली रोटी दे दो तो ऐसा रिएक्शन देते की पूछो मत । एक बार उसके आने पर  रोटी दे दिया , काश की उस दिन विडियो निकालती तो आप लोग हँसते उसे देख कर । रोटी का टुकड़ा देख बिल्कुल 🙄 वाला रिएक्शन  था उसका । फिर चोच से उठा कर पटका और  कौव कौव चिल्ला जैसे मुझे चार बाते सुना रहा हो । हमने रोटी उठा कर फिर ऊपर रख दिया और  बोला खाना है तो खाओ वरना जाओ और कुछ नही है । फिर पानी मे डुबा कर एक बार  खाता फिर मुझे देख दो कौव कौव सुनाता और  फिर खाता 😄

                              मांस मछली के बाद इनको भुजिया सेव पसंद है । मांस तो हमारे यहां मिलता नही , सेव के बारे मे बाप बिटिया को जैसे ही पता चला , किलोभर आया भुजिया सेव दोनो जने पन्द्रह दिन मे इनको खिला दिये । बस उसी दिन इनको घर निकाला मिल गया । 

                             दुष्ट तो कितने थे आपलोग ही देख लिजिए । पंक्षियों के लिए  पानी रखती और  बाद मे देखती कि वो गिरा हुआ  है । लगा ग्रील के वजह से गिर जाता होगा फिर  एक दिन खुद देखा पानी पीया महराज ने और चोच से पकड़ कर डब्बा गिरा दिया पानी का जानबूझकर।  उस दिन मै फोटो ले रही थी तो सबूत के साथ रंगे चोच पकड़े गये । फिर हमने इस फोटो का प्रयोग किया पतिदेव को सुनाने के लिए  , देख रहे हो ना तुम्हारे पितर लोग क्या क्या कर रहे है । खुद  की चिंता है उन्हे  बाकियो की नही 😂😂😂

दुष्टई यहां नही रूकी चिड़िया के दानो के लिए लटकाये फिडर को चोच से हिला हिला उसका दाना नीचे गिरा देता था । बाहर पानी रखा तो अपना खाना ला कर उसमे डूबा कर उसको गंदा कर देता ।  कौवों को खाना छुपाने की आदत है । कहीं से अतिरिक्त खाना पाता तो हमारे गमले या उसके नीचे छुपा जाता कुछ दिन तो हमने कुछ  ना कहा फिर मांस मच्छी हड्डी ला कर छुपाना शुरू किया तब हमने इनका खाना वहां से फेकना शुरू किया । कौवे वैसे भी बहुत समझदार होते है दो बार  मे ही समझ गये कि जगह सुरक्षित नही तो बंद कर दिया । 


                            लेकिन कल तो हद ही हो गयी छोटे गमले मे सफेद पत्थर रखे थे पता नही शायद जुकाम था इनको सो महक ना आयी इनको और  अंडा समझ कर चोच से उठा ले गये । एक तो नीचे गिरा दिया शायद  दूसरा हमारी ही दूसरी खिड़की के नीचे पड़ा देखा । कम से कम तीस चालीस ग्राम का एक पत्थर था और  चार पांच फिट दूर दूसरी खिड़क पर हमे दिखा । कल फिर पतिदेव को सुनाया पितृपक्ष चल रहा है तुम्हारे पितरों को  लगा होगा तुमने उनके लिए  अंडे रखे है दावत के लिए  । तुम्हारी ही तरह है सबके सब , अंडे और  पत्थर का फर्क ना समझ आ रहा । देखो कही उनको कोरोना तो ना हो गया महक ना आ रही होगी । उनका किया तुम भुगतो निकालो वहां से मेरा पत्थर 😂😂😂



September 21, 2019

समय के साथ परंपराओं में बदलाव जरुरी हैं ----mangopeople

                                          बात कुछ   सालों पुरानी हैं एक दिन अचानक से सपने में अपने ससुर जी को देखा | सुबह मम्मी का फोन आया तो बातों बातों में मम्मी से इसका जिक्र कर दिया | बस  मम्मी अपने विश्वास के साथ शुरू हो गई  पितृपक्ष चल रहा हैं  ,( जबकि मुझे इसका पता नहीं था )  कोई तुम्हारे ससुराल में कुछ करता हैं कि नहीं , तुम्हारे ससुर तुम लोगों से भोजन मांग रहें हैं तुम उनके नाम का खाना निकाल दो , दिन याद हैं क्या , खीर पूड़ी ही निकाल दो | उन्हें पता था मैं ना इन चीजों पर विश्वास करती थी ना करने वाली थी |
                                         
                                         शाम को सारा किस्सा पतिदेव को सुनाया युही लेकिन ये सुनते ही  पतिदेव जी  का मन अटकने लगा इस बात पर और पूछने लगे क्या क्या करतें हैं | पतिदेव के माँ का देहांत उनके बचपन में ही हो गया था और पिता का साथ भी उनका जीवन में ना होने के बराबर ही था , जो कुछ साल पहले ही गुजरे थे | भाई बहन गांव में ही छूट गए बचपन में ही सो उन्हें कभी अपने माता पिता परिवार को याद करते ज्यादा देखा नहीं था | इसलिए उस दिन ऐसा कुछ करने की उन्ही इच्छा देख थोड़ा आश्चर्य भी हुआ |
                                       
                                       मेरा विश्वास इन सब पर नहीं था लेकिन लगा अगर कुछ कहा तो उन्हें बुरा ना लगे कि वो अपने माता पिता के लिए कुछ करना चाह रहें हैं और मैं अड़ंगा लगा रही | मैंने भी बता दिया खीर तो इतनी सुबह बनने से रही बिटिया के काम के आगे , मम्मी ने कहा हैं दही पूड़ी से भी काम चल जायेगा | सो सुबह चार पूड़ी दही दे कर कहा गया नीचे मंदिर पर गाय वाली आई होगी , गाय को खिला आओ | आ कर बताते हैं कि गाय नहीं थी कुत्ता भी नहीं मिला सब वही रख कर आ रहें थे मैंने भी रख दिया |
दोपहर में बिटिया को प्ले स्कूल से लाने जा रही थी तो देखा लगभग सभी पेड़ों के नीचे खाने के ढेर लगे थे और मक्खियां उन पर भिनभिना रहीं थी | कई दिनों से हो रहा होगा लेकिन उसके पहले मेरा ध्यान ही ना गया था शायद | कोई कुत्ता गाय कौवा उन्हें नहीं खा रहा था ऑफिस जाने की जल्दी किसी के पास रस्म आदायगी से ज्यादा का समय नहीं था | फिर वही देखा जो अपने लघुकथा में मैंने  जिक्र किया था कि उस खाने के ढेर से दो लड्डुओं का पेड़ की ढलान से लुढकना और किसी दिन हिना बेचारे का उसे उठा कर खा जाना |

                                              शाम को जब वो बात पतिदेव को बताई तो उन्हें भी अपने किये का  अफसोस हुआ | मैंने कहा अच्छा होता उसे अपने पास रख लेते ऑफिस जाते ना जाने कितने भिखारी तुम्हे रोज दिखते होंगे , उनमे से किसी को दे देते तो तो ज्यादा बेहतर ना होता | अगले दिन माँ के नाम का पूड़ी खीर मुझसे बनवा कर ले गए भिखारी को खिलने के लिए प्रायश्चित के रूप में | उसके बाद हमने कुछ नहीं किया |

                                                         समय के साथ इन रस्मों में कुछ बदलाव करना चाहिए , सड़क पर इन्हें ऐसे ही छोड़ कर चले आने से अच्छा हैं किसी को भी खाने के लिए दे दिया जाये | अपने माता पिता या इतने करीबी लोगों को कौन भूलता हैं चाहे वो हमारे साथ हो या ना हो | उन्हें याद करने के लिए किसी दिन विशेष की शायद ही हम में से किसी को जरुरत होती होगी | मैं किसी के विश्वास का विरोध नहीं करती बस चाहतीं हूँ समय के साथ बहुत सारी रस्मों परम्पराओं का रूप और उसके पीछे की सोच को बदल देना चाहिए | उन्हें और ज्यादा मानवीय और सामाजिक बना देना चाहिए |