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October 07, 2016

भंवरे ने खिलाया फूल , फूल को दे रहे खाद पानी राजकुँवर - - - - - mangopeople


                                                           जिस दिन सर्जिकल स्ट्राइक हुई उसके दूसरे दिन रविस ने अपने प्राइम टाइम में बताया की कैसे सरकार की तरफ से इस मामले में सब आज चुप है और सामान्य तरीके से काम कर रहे है जैसे कुछ हुआ ही नहीं है । सन्देश साफ था की इस मामले को ज्यादा तूल नहीं देना है । हा छूट भैये नेता और भक्तगड़ जरूर लगे हुए थे , सीन फुलाने नापने और स्तुति गान में किन्तु ये कितने दिन चलता बहुत हुआ तो हफ्ते दस दिन फिर कोई नया मुद्दा मिल जाता और सर्जिकल स्ट्राइक सिर्फ चुटकुलों में बचा रहता । किन्तु हमारे यहाँ लोग कुल्लहाणी को पैर पर नहीं मारते पैर ही कुल्लहाणी पर दे मारते है , जो मुद्दा अपने आप ही समाप्त हो जाने वाला था उस पर नकारात्मक बयानबाजी करके उसे खाद पानी दे जीवित रखने का काम किया , पहले अरविन्द और अब राहुलगांधी ने ।

                                                              मोदी ने हमेसा एक रणनीति पर काम किया है कि लोगो को अपने दिए मुद्दे में उलझा कर रखो ताकि लोग उसी पर बात करते रहे और वो अपने मुद्दे उठाना तो दूर उसे याद भी न रख पाये । कई बार लोग उनकी रणनीति में फंसे है किन्तु इस बार तो लोग खुद ब खुद उनके जाल में घुस रहे है वो भी जबरजस्ती । इतनी लंबी किसान यात्रा करके आये राहुल किसानों पर बोल अपने मुद्दे उठाने की जगह सर्जिकल स्ट्राइक पर बेतुका बयान दे बैठे , किसने सलाह दी थी, दिग्विजय सिंह ने क्या उसके पहले पीके से पूछा था जिन्होंने उनके इस किसान रैली की सारी रणनीति बनाई थी ,( बेचारे पीके को भगवान ये सब सहने की शक्ति दे, उसका अपना कैरियर दांव पर है ) होना ये चाहिए था कि , जय जवान जय किसान का नारा लगाते हुए कहना चाहिए था की जवानों का बदला ले लिया अब किसानों की बात की जाये , अपने मुद्दों का केंद्र में लाना था पर किया उसका उलटा अपना मुद्दा पीछे छोड़ वो मोदी पोलिटिकली ज्यादा फायदा न उठा ले इस चक्कर में पड उनके मुद्दों में उलझ पड़े । प्यास क्या चाहे दो घुट पानी लीजिये अब मोदी और उनके भक्तो को और मौका मिल गया इस सारे मामले को और लंबा खीचने और इस पर चर्चा करने का ।

                                                            किसी सैनिक कार्यवाही पर वोट नहीं पडते ये बात शायद इन नेताओ को समझ नहीं आती । याद कीजिये ७१ का युद्ध जितने के कुछ साल बाद भी इंदिरा गाँधी को देश में आपातकाल लगने की नौबत आ गई , अटल जी के साथ बुद्धा मुस्कराने और कारगिल के बाद भी क्या हुआ पता है सभी को । यू पी के किसी गांव में जब आप कहेंगे की हमें किसी की जमीन नहीं हड़पनी तो वो बोलेंगे की आप मत हड़पो किन्तु यहाँ दबंगो की पूरी फ़ौज है जो हमारी जमीने हड़प रहा है उसकी बात करो , गोवा वाला बोलेगा ये क्या युद्ध का मौहाल बना दिया सारे पर्यटक ही गायब हो गए , और तमिलनाडु कर्नाटक वालो बोलेंगे कौन सा सिंधु जल यहाँ हम अपने कावेरी में उलझे है उसकी बात करो । आज भी भारत में आतंकवाद और पाकिस्तान जैसे मुद्दे बड़े और कुछ छोटे शहरो के उन लोगो तक ही सीमित है जो टीवी अख़बार और सोशल मिडिया से जुड़े है , उसके बाहर के ज्यादातर भारतीयों के लिए ये कोई मुद्दा ही नहीं है और न जाने किस अदृश्य राजनीतिक फायदे के लिए हमारे महान नेतागड़ इस मामले को लंबा और लंबा खीचते जा रहे है ।


                                                            मोदी को इतना बड़ा बनाने में उनके काम से ज्यादा फायदा उनके खिलाफ जगह जगह नकारात्मक बोलने और लिखे जाने से हुआ है , ये पहले भी हुआ है और अब फिर से होने जा रहा है । ये नकारात्मकता सकरात्मक और सही सवालो को दबा देती है , वो जवाबो से बच जाते है और पीड़ित से नजर आते है । जिससे उनके वोटो का ध्रुवीकरण आसानी से होता है । धन्यवाद मोदी की तरफ से राहुल , कांग्रेस और अरविन्द को ।

October 12, 2012

सर नोचने के लिए अपने हाथ कम पड़े तो मदद लीजिये ------------mangopeople




1-करीब दशक भर पहले महाराष्ट्र सरकार ने मुंबई में एक बड़े बिल्डर समूह को जो महंगे बड़े आलिशान फ़्लैट बनाने के लिए जाना जाता है, उसे मुंबई के बाहर एक बेसकिमती जमीन दे दी ताकि गरीब और माध्यम वर्ग के लिए छोटे और उनके बजट में आने वाले फ़्लैट बनाये ( वो भी तब जबकि महाराष्ट्र में भी डी डी  ए  की तरह म्हाडा नाम का सरकारी विभाग है जो खुद भी लोगो के लिए सस्ते घर बनाता है ) नतीजा बिल्डर ने उस जमीन पर बड़े बड़े आलिशान फ़्लैट बना दिया ( ये भी आश्चर्य की बात है की नक्शा  पास हुआ एक पूरा टावर खड़ा हो गया और सरकार को कुछ भी पता नहीं चला ) खबर लगी हो हल्ला हुआ और सम्बंधित विभागों की तरफ से बिल्डर समूह पर पर हजारो करोड़ ( शायद 2 हजार करोड़ ) का जुर्माना  लगा दिया गया , किन्तु जल्द ही महाराष्ट्र के "पावरफुल" नेता की कृपा से ये हजार से सौ करोड़ ( 2 सौ करोड़ ) में बदल गया । मामला आज भी आदालत में है । बिल्डर और नेताओ का शानदार मजबूत गठजोड़ देखिये , कहा कहा से पकड़ियेगा जहा एक रास्ते बंद कीजिये दुसरे खोल देंगे ।

   2-   नोयडा मे गरीब किसानो की जमीन का अधिग्रहण करके उसे अमीरों को फार्म हॉउस के लिए दे दिया गया और नीलामी में कहा गया की वो किसान भी जिनसे सरकार ने 25 पैसे में इस जमीन को ख़रीदा था वो भी अपनी ही जमीन को अब सरकार से 1 रु में खरीद सकते है और वापस से खेती माफ़ कीजियेगा अंग्रेजी में फार्मिंग कर सकते है ।  सरकार और बाबु की शानदार नीतियों का,  सोच का और गरीब किसान की हालत का नजारा देखिये , जनता के लिए बनी सरकार के जमीन के दलाल बन जाने का नजारा देखिये ।


3- मुंबई में सैनिको की विधवाओ के लिए ईमारत बनने वाली थी 7 मंजिला,  जिस विभाग के पास वो क्लियरेंस के लिए जाती उसी विभाग के बाबु और मंत्री को एक फ़्लैट उपहार में मिला जाती और धीरे धीरे ईमारत की ऊंचाई आसमान छूने लगी सैनिक और उनकी विधवाए कही पीछे ही छुट गए , सामने की सड़क की चौड़ाई कम कर दी गई, बगल में बस डिपो की जमीन  भी इसमें मिला दी गई ताकि और ज्यादा बड़ी ईमारत बने और उनके विभागों के बड़े बाबु, मंत्री को भी घर दे दिए गए । हो हल्ला हुआ जाँच शुरू हुई तो अंत में बात ये आ गई की न तो जमीन सैनिको की थी न ईमारत सैनिको की विधवाओ के लिए बन रहे थे तो काहे का घोटाला । किस्सा सुना है , एक रेगिस्तान  में आदमी तंबू लगा कर सोया था रात को ऊंट ने कहा थोड़ी जगह दे दो उसने दे दी सुबह उठा तो देखा की वो तंबू से बाहर है और ऊंट तंबू में बैठा है ।

4-  किसानो से खेती लायक उपजाऊ जमीने ली जाती है क्योकि घरो की कमी है और लोगो के लिए घर बनाना है किन्तु वहा बनते है अमीरों के लिए फार्मूला वन रेस का ट्रैक , गोल्फ कोर्स  ( निजी रूप से इस दोनों के बनाने से मुझे कोई आपत्ति नहीं है किन्तु वो खेती की जमीन सस्ते में गरीब किसानो से लेकर न बने जाये करोडो कमाते है तो खुद बाजार भाव पर जमीने ख़रीदे और उस पर बनाये ) और बड़ी बड़ी शानदार हर आलिशान सुविधाओ से युक्त इमारते, जो बस अमीरों की पहुँच में होती है, गरीब तो छोडिये माध्यम उच्च वर्ग के बस की बात भी नहीं होती है , बना दी जाती है और सरकारे कहती है की सब कानून के अंतर्गत हुआ है सब जनहित है । इस जन को भी देखिये और  जनहित का नजारा भी देखिये ।

5-कोर्ट ने कहा की देश की प्राकृतिक और खनिज सम्पदा को यदि सरकार चाहे तो देश हित में किसी भी नीजि  पार्टी को दे सकती है ।( पूर्व कानून मंत्री ने  जेटली  जी ने कहा की जज दो तरह के होते है एक वो जो कानून को जानते है और एक वो जो कानून मंत्री को जानते है, मैंने कुछ नहीं कहा ) वो सरकार जो जमीन अधिग्रहण बिल को सालो से अपने अंटी में दबा के बैठी है ( शायद इंतजार कर रही है की जब सभी जमीनों का अधिग्रहण हो जायेगा तब ये बिल लायेंगे ) क्योकि वो अभी तक इस बात को भी परिभाषित नहीं कर पाई है की बिल में जनहित की परिभाषा क्या रखे,  क्या ऐसी सरकारे भरोसे के लायक है । मोटरसाइकिल पर बैठ का युवराज जब भट्टा पर्सौला गए जल्द कानून का निर्माण करने का आश्वासन दे कर हीरो बन गए पर ये हिरोगिरी अपने सरकार से क्यों नहीं दिखा पा रहे है ।


6-अस्पताल के लिए ली गई जमीन पर एक दसक तक अस्पताल नहीं बनता है किन्तु सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ता है,  फिर अस्पताल नहीं बना तो वो जमीन बिल्डर को दे देती है क्योकि उसे अधिकार है की वो जमीन का प्रयोग , बदल सकती है । बड़े अस्पतालों , स्कुलो कालेजो को कौड़ियो के दाम में  जमीने दे दी जाती है इस शर्त के साथ की वह गरीबो का इलाज और पढाई मुफ्त में होगी किन्तु वहा गरीबो के लिए कुछ नहीं होता और सरकारों को कई फर्क नहीं पड़ता है । क्या ऐसी सरकारों से हम उम्मीद करे की वो जनहित के बारे में सोचेंगी या इस बात को आगे भी लागु करवाएंगी की उनकी नीतियों से गरीबो का हित होता रहे । सरकारों का काम केवल नीतिया बना देना नहीं होता है उन्हें ठीक से लागु करवाना भी उन्ही का काम है ।

7-जरा सरकारी मुआवजे का भी हाल देखिये , किसानो को उनकी फसल बर्बाद होने पर 10 रु से लेकर 50 रु तक का मुआवजे का चेक दिया गया बेचारो को बैंक तक पहुँचने में ही 20 रु खर्च हो गए ( भुनाना जरुरी था क्योकि नहीं भुनाया तो अगली बार मुआवजा नहीं मिलेगा ) , टिहरी गांव जब डूबा तो लोगो को जमीन दी गई और मकान बनाने के लिए इतने कम रुपये ( 20 से 25 हजार रुपये दिए गए थे शायद ) दिए गए की उससे तो दो कमरों का ढ़ांचा भी खड़ा न होता , इंदिरा विकाश योजना में आज भी लगभग 20 हजार रुपये दिए जाते है लोन में घर बनाने के लिए (सरकारे खुद इतने में घर बना के दिखा दे )  । जमीन अधिग्रहण के लगभग हर केस में चाहे वो सेज, बांध , इमारते , सड़क आदि आदि किसी के नाम पर भी लिए गए, जमीने कौड़ियो के दाम में ख़रीदे गए और वह रहने खेती करने वालो को फिर से ठीक से बसाया नहीं गया स्थापित नहीं किया गया । गरीब के दो कौड़ी की औकत देखिये ।


8-करीब 50 हजार भूमिहीन मजदूरों ने मोर्चा निकला दिया और अंत में सरकार ने एक बार फिर उन्हें बेफकुफ़ बनाने हुए कहा की उनकी बाते मान ली गई है और लोगो को उनकी जरूरतों के हिसाब से घर खेती के लिए जमीने दी जाएँगी । क्या कहे एक तरह तो सरकारे किसानो से जमीने ले कर उन्हें भूमिहीन बना रही है दूसरी तरह वो भूमिहीन किसानो मजदूरो को जमीन देने का वादा  कर रहे है । संभव ये भी है की कल को  जंगल की जमीनों को इन्हें दे दिया जाये क्योकि गरीबो के नाम पर पर्यावरण मंत्रालय भी ज्यादा कुछ रोक नहीं पायेगा और मंजूरी आसानी से मिल जाएगी उसके बाद यही मजदुर जब उस जमीन को अपनी मेहनत से काम खेती के लायक बना देंगे तो उनका भी ऐसी ही अधिग्रहण कर लिया जायेगा,  बिलकुल वैसे ही जैसे राजनीति में पहुँच रखने वाला कोई किसी बिल्डर से लोन ले कर जमीन अपने नाम पर ले फिर उस जमीन का प्रयोग सरकार द्वारा बदलवाये जैसे खेती की या अस्पताल की जमीन पर ईमारत बनाने की इजाजत क्योकि बिल्डर के मुकाबले वो ये काम आसानी से और कम समय में करा सकता है और फिर उस जमीन को उसी बिल्डर को ऊँचे दाम पर बेच दे जिससे उसने लोन ले कर जमीन खरीदी थी । सत्ता में बैठी और उनके करीबी लोगो का तिकड़मी दिमाग देखिये ।


9-जो लोग ये सोच रहे है की ये एक दलीय कार्यक्रम है वो जान ले की ये घपले घोटाले भी अन्य  सभी घपले घोटाले की तरह ही सर्वदलीय है , इसमे सभी दल की सरकारे और लोग मिले हुए  है , और सभी इन कंपनियों से बराबर का रिश्ता रखती है और फायदा लेती है । जैसे अब खबर आ रही है की डी एल ऍफ़ को गुजरात में भी जमीने दी गई है बिना किसी नीलामी के,  वहां वही कांग्रेस हल्ला मचा रही है जो कहती है की हरियाणा में कुछ भी गलत नहीं हुआ  और ये रिश्ता भी आज का नहीं है जैसे डी  एल ऍफ़ का रिश्ता राजीव से बहुत ही घनिष्ठ रहा है और इस घनिष्ठता ने ही उसे इतना आगे बढाया था । रिश्तो के इस मजबूत और लम्बी जोड़ को देखिये ।


10-कल टीवी पर एक और खिजाने वाले केस के बारे में सुना की कर्नाटक टूरिज्म विभाग ने अपनी जरूरतों के लिए जमीन अधिग्रहित की जमीन लेने के बाद कहती है की उसके पास मुआवजे के लिए पैसे नहीं है ( लो कल्लो बात अंटी  में नहीं कौड़ी अम्मा भुनाने दौड़ी ) बाद में उसने कहा की एक दूसरी प्राइवेट पार्टी  है जो पैसे देने के लिए तैयार है बस एक छोटी सी शर्त है वो ये की ये सारी जमीने उसे देनी  होंगी हा हा हा हा हा हा हा हा सुकर  है की मामला कोर्ट में गया और कोर्ट ने विभाग की  अच्छी खबर ली और किसानो को न्याय दिया ।  टीवी पर ये सुन कर मैंने कहा की बिटिया रानी मेरे दो हाथ मेरा सर नोचने के लिए कम पड़  रहे है दो अपने भी लगाना , आप के अपने हाथ भी अपने सर नोचने के लिए कम पड़े तो मित्रो से मदद लीजिये और हमारी तरह ही कुछ न कर पाने की खीज में अपने खिजाने वाले किस्सों की एक पोस्ट बना दीजिये । 



चलते चलते 
       
              कहा जा रहा था की वालमार्ट आएगा तो भारत में रोजगार मिलेगा , अच्छा वेतन मिलेगा , काम   की सही सुविधा जनक जगह मिलेगी आदि आदि , अब सुना है की अमेरिका में वालमार्ट के कर्मचारी कम वेतन , काम के ज्यादा घंटे , सुविधाओ की कमी आदि आदि को लेकर हड़ताल पर चले गए है ।










September 26, 2012

ये किस पेड़ के पैसे से हो रहा छवि निर्माण --------------mangopeople



आज कल बड़े जोर शोर से सभी टीवी चैनलों पर भारत का निर्माण हो रहा है और इस निर्माण पर करोड़ो  रूपये खर्च कर रही है वो सरकार जो कहती है की उसके पास जनता को सब्सिडी देने के लिए पैसे नहीं है , अब कोई पुछे  की सरकार की छवि निर्माण के लिए किस पेड़ से पैसे आ रहे है ( उस पेड़ का नाम है आम जानता की जेब ), शायद राजनीति में सबक लेने की परम्परा नहीं है यदि होती तो मौजूदा सरकार पूर्व में इण्डिया शाइनिंग का हाल देख कर ये कदम नहीं उठाती | बचपन में नागरिक शास्त्र की किताब में पढ़ा था की किसी देश की सरकार का काम बस लोगों से टैक्स वसूलना और खर्च करना नहीं होता है उसका काम ये भी है की अपने देश में रह रहे गरीब ,असहाय लोगों को हर संभव मदद भी करना और उनके लिए जीवन की प्राथमिक जरूरतों को पुरा करना  , सब्सिडी उसी के तहत आती है ताकि गरीब लोगों तक भी उन सुविधाओ को पहुँचाया जा सके जो उनके बस में नहीं है , सरकार ये काम देश से आंकड़े जुटा कर करती है  किन्तु जब सरकार के आकडे ही सही नहीं है तो वो ठीक से योजनाए कैसे बनाएगी ,  ३२ रु रोज कमाने  वाले को गरीब ना मानने वाली सरकार भला गरीबो के लिए क्या करेगी | विश्व बैंक का दबाव है की सब्सिडी ख़त्म की जाये किन्तु समस्या सब्सिडी नहीं है समस्या ये है की सही लोगों को सब्सिडी नहीं मिल रही है | महंगाई को सबसे ज्यादा बढ़ाने का काम करता है डीजल की बढ़ती कीमते क्योकि डीजल की कीमत बढने के साथ ही सभी सामानों की माल ढुलाई का खर्च बढ़ता है और एक ही बार में सभी चीजो के दाम बढ़ जाते है |  प्रयास तो ये करना चाहिए था की डीजल की खपत कम किया जाये उसे केवल कुछ जरुरी कामो के लिए प्रयोग किया जाये ना की महँगी बड़ी गाडियों के लिए या बिजली के उत्पादन आदि के लिए , होना तो ये चाहिए था की बाजार में सभी डीजल गाडियों और एक के बाद एक आ रही बड़ी महँगी डीजल गाडियों पर बड़ा टैक्स लगाना जाये  ,( कुछ आर्थिक सलाहकारों ने यही राय दी थी किन्तु सरकार ने उसे माना नहीं क्यों वही बेहतर बता सकती है  )  इससे सरकार की आमदनी भी बढ़ती और लोग डीजल गाड़िया लेने से परहेज करते उसकी खपत कम होती और सरकार पर सब्सिडी का बोझ कम होता , इसी तरह डीजल के अन्य गैर जरुरी प्रयोगों को रोक कर सब्सिडी के बोझ को कम किया जा सकता था,  किन्तु सरकार ने बड़ी कार कंपनियों को नाराज करने के और महँगी गाड़िया खरीदने वालो पर टैक्स का बोझ डालने के बजाये एक आसान रास्ता अपनाया की डीजल की ही कीमत बढ़ा दिया जाये और पूरे देश को हर रूप में इसका बोझ सहने के लिए मजबूर किया जाये |
                                                   
                                                  यही काम उसने गैस पर दी जा रही सब्सिडी पर भी किया , कहने को वो सब्सिडी दे रही है किन्तु जिसे मिलना चाहिए उसे मिल ही नहीं रहा है | साल में  मुझे ६ सिलेंडरो की जरुरत होती है जो मौजूदा नियम के अनुसार मुझे सब्सिडी वाली मिल जाएगी किन्तु बेचारी मेरी गरीब काम वाली बाई जिसे साल में ९ से १२ सिलेंडर की जरुरत है उसे पूरी सब्सिडी नहीं मिल रही है , हाल में ही आर टी आई के जरिये पता चला की एक बड़े उधोगपति , सांसद जिन्हें कोल ब्लोक भी मिला था उन्हें साल में करीब ७०० से ऊपर सब्सिडी वाले सिलेंडर मिल रहे थे , इसे देख कर आप समझ सकते है की योजनाओ में कितनी गड़बड़ी है सब्सिडी असल में मिलना किसे चाहिए था और मिल किसे रही है, क्या कोई उद्योगपति सांसद या जिनकी आय साल में १० लाख रूपये से ऊपर है  इस लायक होता है की उसे एक भी सब्सिडी वाला सिलेन्डर मिले  , लेकिन  जो नियम अभी सरकार ने बनाया है इससे भी उन्हें ६ सब्सिडी वाले सिलेंडर तो मिलेंगे ही,  इस नियम से सिलेंडरो की कालाबाजारी ही ज्यादा होगी , साथ ही ये नियम कम से कम भारत जैसे देश में जहा संयुक्त परिवार की परम्परा है वहा के लिए तो बिल्कुल भी उपयुक्त नहीं है जहा माता पिता बच्चो के साथ ही रहते है , कुछ समय पहले पढ़ा था की अब से एक पते पर बस एक ही गैस कनेक्शन मिलेगा ये बड़े शहरों में एकल परिवारों के लिए तो ठीक है किन्तु छोटे शहरो और गांवो में जहा संयुक्त परिवार है या एक ही घर में कई भाई रहते है वहा  के लिए ये नियम कैसे ठीक होगा  |  समझ नहीं आता की सरकार में बैठे लोग जो नियम कानून बनाते है उन्हें भारतीय परिवेश रहन सहन की कोई भी जानकारी है भी या नहीं | एक टीवी चैनल पर सुना की सरकार कहती है की देश में २८ % लोग ही एल पी जी का प्रयोग करते है और जिसमे से आधे से ज्यादा  शहरी लोग है यदि ये खबर सही है तो आप अंदाजा लगा सकते है की सरकार के पास कितने गलत आंकड़े है और गलत आंकड़ो के साथ वो गलत नियम ही बनाएगी |
            
                                                                   नीति नियम बनाने वाले क्या, सरकार की प्राथमिकता तय करने वाले भी भारत के बारे में और उसकी प्राथमिकता के बारे में कितना जानते है उस पर भी शक होता है,  एक तरफ देश में एक के बाद एक राज्य में कुपोषण की खबरे हमें शर्मसार कर रही थी वही यु एन के रिपोर्ट ने तो हमें पाकिस्तान और अफ़्रीकी देशों से भी गया गुजरा बता दिया कुपोषण के मामले में , जहा सरकार की प्राथमिकता भूख कुपोषण से मर रहे लोगों तक भोजन पहुँचाने की होनी चाहिए थी वहा सरकार किराना में एफ डी आई  लाने के लिए अपनी  सरकार ही दांव पर लगाने के लिए तैयार थी |  सरकार के चिंता का विषय गरीब भूखे लोग नहीं बल्कि वो है जिन्हें कभी अपने खाने पीने की चिंता करने की जरुरत ही नहीं होती है और सरकार उनकी चिंता में मरी जा रही है ( असल में तो उन लोगों की भी चिंता नहीं है असल चिंता तो अमेरिकी कंपनिया उनके हित और अमेरिका में होने जा रहे राष्ट्रपति चुनाव है )   | वो सरकार जो खुद कई बार अपने किसानो को उनकी फसलो का ज्यादा दाम देने के बजाये विदेशो से सडा गला अनाज कई गुना महंगे दामो पर खरीद कर लाती है वो उम्मीद कर रही है की कोई विदेश कंपनी उनके किसानो को उचित दाम दे कर रातो रात अमीर बना देगी , मतलब गरीबी हटाओ का उनका नारा कोई विदेशी कंपनी पुरा करेगी , और वो अपना मुनाफा छोड़ कर ऐसा क्यों करेगी इसका जवाब तो सरकार ही दे सकती है | यदि किसानो के भले का तर्क देने वाले भारत के किसानी  का हाल देखते तो ऐसा नहीं कहते , शायद उन्हें पता नहीं है की गरीब वो किसान नहीं है जिनके पास सैकड़ो एकड़ जमीने होती है या जो आधुनिक खेती करते है जिनकी संख्या काफी कम है गरीब वो किसान है जिनके बस दो चार बीघा जमीन है और पैदावार बहुत कम जिनकी संख्या देश में लाखो है , पता नहीं ये वालमार्ट वाले कैसे एक एक छोटे किसान के पास सीधे जा कर उनसे माल खरीदेंगे जो आज तक हमारे भारतीय व्यापारी नहीं कर पाये वो भी सीधे खरीद कर ज्यादा माल कमा सकते थे | ये भी समझ नहीं आता की यदि रिटेल में एफ डी आई इतना ही भारतीय उपभोक्ता के लिए फायदे मंद है और वो महंगाई को जमीन पर ला देगी ( ये काम भी हमारी सरकार नहीं कर पाई वो तो बस तारीख पर तारीख देती रही और महंगाई बढ़ती रही उसके लिए भी आउट सोर्सिंग की जा रही है की २०१४ चुनावों  तक सस्ते माल बेच दो उसके बाद जो चाहे करते रहना कौन पूछने वाला है यहाँ ) तो फिर १० लाख लोगों वाले शहर तक की इसे क्यों सिमित किया जा रहा है इसे पूरे भारत में लागु करना चाहिए था,  केवल बड़े शहर ही क्यों सस्ते समान का लाभ ले , छोटे शहरो गांवो के लोगों को भी इसका फायदा मिलना चाहिए , साथ में जितना माल बेचेंगे उतना हमारे किसान खुशहाल होंगे ( जो वालमार्ट खुद अमेरिका में भी चीनी सस्ते समान बेचता है वो हमारे यहाँ हमारे लोगों से समान ले कर बेचेगा,  ३०% समान भारत से खरीदने की सर्त का क्या हाल होता है वो किस रूप में प्रयोग होता है वो भी दिख जायेगा ) |
                     
                                                                    जो सरकार लोकपाल, महिला आरक्षण  जैसे अनेको बिल को आम सहमती के नाम पर लटकाए रहती है वो इन मुद्दों पर आम सहमती बनाने की जरुरत नहीं समझती है बल्कि अपनी सरकार तक को दांव पर लगा देती है और रातो रात काम होता है नोटिफिकेशन जारी हो जाता है | यदि  सरकार देश से महंगाई , भ्रष्टाचार , कुपोषण आदि समस्याओ को ख़त्म करने की  इतनी इच्छा शक्ति दिखाती तो देश कहा से कहा पहुंचा गया होता | करीब १०-१२ साल पहले एक खबर पढ़ी थी की अमेरिका के एक कस्बे में वालमार्ट अपना स्टोर खोलना चाह रहा था, तो वहा के प्रशासन ने पहले लोगों से राय जानने के लिए इस मुद्दे पर वोटिंग कराई और ९०% लोगों ने स्टोर खोलने का विरोध किया और कहा की वो यहाँ के छोटे स्टोर चला रहे लोगों के हितो को अनदेखा नहीं कर सकते है , क्या भारत में कभी ऐसा हो सकता है , शायद कभी नहीं यहाँ तो हम एक बार वोट देने के बाद अपने हाथ और जबान कटवा लेते है ५ साल के लिए |

 प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को उनके  जन्मदिन पर ढेरो बधाई और अपने जन्मदिन के पहले ही वोट के बदले हम जैसो को रिटर्न गिफ्ट में इतना कुछ देने के लिए  धन्यवाद !



चलते चलते

               इधर सरकार ने सब्सिडी वाले गैस सिलेंडरो की संख्या कम की उधर बाजार में अचानक से राजमा , मटर, बैगन , गोभी की मांग आसमान छूने लगा , असल में लोगो ने महंगे सिलेंडरो को देखते हुए तय किया की वो बाकि के गैस का उत्पादन खुद कर लेंगे !

December 02, 2011

सरकारी ऑनर किलिंग - - - - - - mangopeople


                                                                           

                                                         सरकार के लिए किराने में विदेशी निवेश अब साख का सवाल है कहती है की अब कदम वापस नहीं ले सकते है हमारी इज्जत का सवाल है भले लोग कितना भी विरोध करे संसद ठप रहती है तो रहे उसे क्या | सरकार का व्यवहार बिलकुल परिवार में उस बाप की तरह है जो बेटी यानि की आम जनता को अपने इज्जत के नाम पर मारने पर तुली है | सरकार को जनता रूपी बेटी का पिता होना चाहिए  किन्तु वो बाप सा व्यवहार कर रही है | बाप और पिता शब्दों का अंतर तो समझते होंगे ही ना , पिता शब्द आते ही दिमाग में परिवार चलाने वाला परिवार की ख़ुशी का ध्यान रखने वाला उसकी जरूरतों के लिए कुछ भी कर गुजरने वाले का ध्यान आता है और बाप शब्द आते है दिमाग में अपनी बपौती ज़माने वाला हर समय अपनी ही चलाने वाला , सिर्फ परिवार पर बाप होने की धौस ज़माने वाले की छवि बनती है जो अधिकार तो सब रखता है और परिवार के प्रति अपना कोई कर्तव्य नहीं समझता है | बस सरकार भी जनता के पिता के बजाये उसकी बाप बन गई है जिसके लिए परिवार उसके हित से बड़ा उसकी इज्जत हो गई है और जनता यहाँ बेटी की तरह अपने खुशियों जरूरतों के लिए उसका मुंह ताक रही है | अब जब बाप जी ने कह दिया है की ये उसकी साख का सवाल है तो बेटी के हित की कुर्बानी तो होगी ही | इसे क्या कहेंगे खालिस सरकारी ऑनर किलिंग बाप के इज्जत के नाम पर बेटी के हत्या |
                               पर यहाँ भी सारी इज्जत बस बेटी का मामला होने पर ही ख़राब होता है जब मामला बेटो यानि सरकारी कर्मचारी या बड़े उद्योगपतियों का हो तो ये बाप को अपने कदम वापस खीचने में कोई गुरेज नहीं होता है , प्रधानमंत्री ने अन्ना को लिखित में आश्वाशन दिया था की उनके मुख्य तीन मांगे मान ली गई है यहाँ तक की संसद में भी सभी सांसदों ने हामी भर दी थी, हद तो तब हो गई जब स्थाई समिति ने भी इन मांगो को मान लिया था लेकिन दुसरे ही दिन पुत्र प्रेम जाग गया और फिर कदम वापस ले लिए गए क्योकि उसके कदमो से बेटो को परेशानी जो होती, फिर इन बाप लोगो को इज्जत का ख्याल नहीं आया की जो जबान दी है तो उसे कैसे वापस ले , पर कहते है न  बेटो के लिए सब कुछ, उनके तो सात खून भी माफ़ पर जब बात बेटी की हो तो एक कदम भी पीछे नहीं होगा | सोचती हूँ की इस विषय में अब उन लोगो का क्या मत होगा जो कुछ दिन पहले तक देश में संसद को ही सर्वोच्च मान रहे थे उनके अनुसार परिवार में माँ बाप ही सब कुछ है बच्चो की कोई कीमत नहीं है बच्चे होते ही इसलिए है की वो माँ बाप बना सके इसलिए घर में चलेगी तो माँ बाप यानि सत्ता पक्ष और विपक्ष को मिला कर संसद की | तो अब बताइए की जब ये हमारे माँ बाप ही अपनी बातो से पलट जाये बच्चो को सरेआम आश्वासन  दे कर बदल जाये तो उनका क्या करे क्या अब भी संसद को ही सर्वोच्च मानाने की दलील को वो सही बताएँगे | आम लोग,  देश हित  उसकी जान की कीमत तथाकथित बाप की इज्जत के सामने कुछ भी नहीं है | तो भाई इस देश की परम्परा रही है की बेटियों ने हमेशा अपने हित को बाप के इज्जत के नाम पर मार दिया है तो आम लोग भी तैयार रहे बलिदान के लिए |
                   तर्क तो कई दिए जा रहे है कहते है की दलाल दलाली खा खा कर,  सामान कई हाथो में जा जा कर महंगाई बढ़ा रहा है और सरकार को बदनाम कर रहा है | किसान से ६ रु का प्याज खरीदते है उसमे ट्रांसपोर्ट , दलाली,  व्यापारी ,मजदूरी, थोक, फुटकर सब मिला कर उपभोक्ता के पास २० रु में पहुंचता है , विदेशी आयेंगे तो ऐसा नहीं होगा वो सीधे किसानो से खरीद कर आप को देंगे बीच का सब खर्चा ख़त्म उस पर से कोल्ड स्टोरेज बनायेंगे सामान ख़राब नहीं होगा | सोचती हूँ क्या इन विदेशियों के पास कोनो जादू की छड़ी है क्या जो फसल खेत से उड़ा कर सीधे हमारे घर पहुंचा देगा और ट्रांसपोर्ट का खर्च बच जायेगा, कोल्ड स्टोरेज का खर्चा , बड़े बड़े मॉल खोलेगा जगह का खर्चा उसमे लगे ए सी का खर्चा कर्मचारी का खर्चा , सब राज्यों में लगा टैक्स और टीवी से लेकर अखबार तक में अपने बड़े बड़े विज्ञापन का खर्चा खुद उठाएगा , और अपना मुनाफा छोड़  हमको सस्ता सामान देगा | किसानो को भी फायदा होगा कंपनी साहब के लोग आयेंगे हरपत्तू, खरपत्तो , भोला,  माधव सभी के झोपड़ो में खुद जायेंगे और सबकी कुछ कुछ बीघे में उगी फसल खरीदेंगे कोई दलाल बीच में न होगा | क्या वाकई ऐसा होगा ,  काहे की कई बार पतिदेव से सुन चुकी हूँ की आफिस की स्टेशनरी से लेकर कोई भी सामान की खरीद में इ काम में लगा आफिसर हमेशा पहले अपना कमीशन तय करता है फिर सामान खरीदता है कंपनी के लिए , हा दलाली बंद हो जाएगी कमीशन शुरू होगा बिलकुल अंग्रेजी काम | सच्चो में इ में तो किसान और हम उपभोक्ता का बड़ा फायदा है ,  लगता है कोनो चैरिटेबल संस्था है इ वालमार्ट और का का , शायद सरकार महंगाई खुद से कम नहीं कर पा रही है तो इ संस्था को बुला रही है की लो भैया अब तुम ही यहाँ की महंगाई दूर करो हमरे बस की बात तो ना है ये |
                                                                 दसक पहले भी जब भारत के बड़े उद्योगिक घरानों को किराना कारोबार में लाया गया तब भी यही दलील दी गई थी की उपभोक्ता और किसान दोनों को फायदा होगा उपभोक्ता को कितना फायदा है सब जानते है जब इन शानदार मॉल में सामानों पर १० से ५० पैसे की भारी छुट दी जाती है और एक समय में एक के बजाये जबरजस्ती दो सामान बेच दिया जाता है एक लो दूसरे पर छुट पाओ सामान घर लाने पर पता चलता है की १०० की जगह २०० का दो सामान लाये और कुछ छुट मिली ५ रुपये का इतनी छुट तो थोक बाजार में हमेशा ही मिल जाती है कई सामानों पर और आज भी कोई भी कंपनी सीधे किसानो से शायद ही कुछ खरीदती हो | सस्ता सामान कैसे दे वो उनके भी तो हजार खर्चे है वो अपने जेब से थोड़े ही भरेंगे वो भी खरीदारों के ही जेब से जायेगा | पर यहाँ तो अब भी उपभोक्ता को सब्ज बाग दिखाया जा रहा है सस्ता सामान का महंगाई कम होने का | मंत्री जी कहते है की जब देशी लोगो को छुट दिया गया था तब भी हो हल्ला मचा था बाद में सब ठीक हो गया कोनो फर्क पड़ा किराना दुकान चलाने वालो को | मंत्री जी सही ही कह रहे है मंत्री जो है इन मॉल में जाने वाले तो शायद आसमान से टपके है उसके पहले तो वो किसी किराना दुकान पर जाते ही नहीं थे इसलिए छोटे दुकानदारो के ग्राहकी पर तो कोनो फर्क पड़ा ही नहीं आगे भी नहीं पड़ेगा बेकार में लोग हो हल्ला मचा रहे है | जैसे की कोनो शराबी ख़राब लड़का से बिया करने पर बिटिया पहले खूब चिल्लाती है बाद में "भयल बिया मोर करबो का"  की तर्ज पर मार खा कर रो कर गा कर निभाती ही है,  बाप के इज्जत का सवाल है तो एक बार आने दीजिये विदेशी दुकानदारो को उसके बाद किसान जनता सब झेलबे करेगी जाएगी कहा कोनो और ठोर ठिकाना तो है नहीं उनका,  दोनों जगह पराई ही होती है | तो हम आम लोग जब अपने ही देश की सरकार के लिए पराये हो गए है तो इ विदेशी हमको क्या अपना समझेंगे दोनों मिल कर खून चूसेंगे |