जब भरतनाट्यम कॉलेज जाना शुरू किया तो कुछ महीने बाद ही एक पारसी महिला भी वहां सीखने आई , मुझे सुन कर आश्चर्य हुआ ये क्या और कैसे सीखेंगी | क्योकि किसी कॉलेज में सिर्फ डांस करना नहीं सिखाया जाता बल्कि ढेर सारा ग्रंथीय ज्ञान भी दिया जाता हैं | बच्चो की बात और होती है पहले से कोई भावना नही होती है तो वो सभी चीजे आसानी से सीख लेते है ।
लेकिन बड़े होने पर पहले से भरा ज्ञान और सोच हमारे कुछ नया सीखने के आड़े आता है । तो पता था कि मुंबई जैसे जगह में पले बढे के लिए यह एक मुश्किल काम होगा | थोड़ा बहुत संस्कृत पढ़े हम लोग के लिए संस्कृत के सैकड़ों श्लोकों को याद करना और समझना ही मुश्किल हो रहा हैं इनके लिए तो और भी मुश्किल होगा |
एक सवाल अपने कॉलेज में अपने मैम से भी किया , ये तो धार्मिक कहानियों को भी नहीं जानती ये कैसे कृष्ण, राधा , शिव आदि भगवानों के भावों को कैसे पकड़ेंगी उनकी कहानियों पर कैसे नृत्य करेंगी |मेरी चिंता सही साबित हुए और उनके लिए उन श्लोको को पढ़ना तक मुश्किल था |फिर वो भाषा को लेकर सवाल करने लगती ऐसा क्यों हैं वैसा क्यों हैं , इतने लंबे शब्द क्यों हैं , सारे शब्द एक साथ क्यों लिखे हैं आदि आदि | एक बार मैंने भी टोका आप इंग्लिस को लेकर भी ऐसे ही सवाल करतीं थी कि कोई शब्द साइलेंट क्यों हैं या उनका उच्चारण अलग अलग जगह अलग अलग क्यों हैं , तो वो बड़ा तगड़ा बुरा मान गई | कई बार फिजूल की टिप्पणियां वो धार्मिक चीजों पर कर जाती | मात्र एक महीने में ही उन्होंने आना बंद कर दिया |
ऐसा नहीं था कि वो दूसरे धर्म के होने के कारण नहीं कर पाई | हमारे कॉलेज में एक केरल की ईसाई विद्यार्थी भी थी | वो बचपन से ही भरतनाट्यम सीख रहीं थी केरल में ही अपने गुरु से लेकिन उनके पास डिग्री नहीं थी | विवाह के बाद मुंबई आ कर वो दूसरे शैली का भरतनाट्यम सीखीं ताकि डिग्री ले सकें और पांच साल में बी ए और एम ए करके निकली |
हिन्दू ना होने के बाद भी हिन्दू धार्मिक चीजों को लेकर उनकी जानकारी ठीक ठाक थी और वो कभी कोई बेकार के सवाल भी नहीं करती | साफ था उनको बचपन से ये सब सीखा दिया था उनके गुरु ने , क्योकि दक्षिण भारत में किया जाने वाला भरतनाट्यम पूरी तरीके से धार्मिक होता हैं | कॉलेज आ कर उन्होंने वेद , पुराण , रामायण , महाभारत को कोर्स में भी पढ़ा |
लेकिन उनका सारा ज्ञान किताबी और सुनी गई बातों से था ना उनका विश्वास उनमे था और ना वो उसके पीछे के आध्यात्म और भावों को महसूस कर सकती थी | यही कारण हैं कि वो इन पर किसी भी तरह की चर्चा में भाग नहीं लेती थी | लेकिन उन्हे जो आना चाहिए था वो बहुत अच्छे से आता था और वो था भरतनाट्यम।