November 07, 2019

घुमक्कड़ी और भोजन -------mangopeople



                                         ये बात तो हमेशा से पता थी कि  हम जैसे चाइनीज खाने वाले अगर चीन जा कर चाइनीज खाना खाये तो हमारे गले भी ना उतरेगा वो खाना | भारतीय चाइनीज खाना भारतीय स्वाद के अनुसार ढाल दिया गया हैं | उसी तरह ये भी पता था कि  कभी दक्षिण भारत जा कर इडली डोसा सांभर आदि खाया तो उसका स्वाद शायद ना भाये जैसा अपने यहाँ अच्छा लगता हैं | हमने दक्षिण भारतीय खाने को उत्तर भारतीय स्वाद में बदल रखा हैं |
                                         लेकिन शुक्र हैं जिस पहले होटल में कोच्चि से मुन्नार जाते रास्ते में केले के पत्ते पर केरला का भोजन सद्या खाया उसमे बहुत स्वाद था और सभी को पसंद भी आया | अनानास से बनी एक सब्जी खूब पसंद आई | चटनी में स्वाद था और गुड़ नारियल से बना खीर भी स्वादिष्ट था | लेकिन शंका थी कि ये होटल ख़ास टूरिस्टों के लिए था इसलिए इसके भोजन में उत्तर भारतीय स्वाद की मिलावट जरूर की गई होगी | शंका जल्द ही सही भी हो गई जब थेकड़ी , पेरियार में खाने बैठे और उसने पूछा केरल चावल या  प्लेन तो केरल के खाने के  अति उत्साह में बिना देखे कह दिया केरल का चावल दीजिये | लाई  जैसे मोटे मोटे और कुछ कुछ लालिमा लिए चावल को खाना  सच में आसान नहीं था | फिर उनकी सब्जियों और सांबर का स्वाद भी पसंद नहीं आया |
                                         नाश्ते में रोज ही इडली उत्पम ढोसा और कोई  उत्तर भारतीय खाने के विकल्प में से दक्षिण भारतीय ही खा रहें थे लेकिन पहला वाला छोड़ कर  कहीं का भी सांभर और रसम पसंद नहीं आया चाहे वो अच्छा होटल हो या सड़क पर कोई रेस्टुरेंट | हां ये था कि इडली उत्तपम आदि हमारे यहाँ के मुकाबले ज्यादा सॉफ्ट और स्वादिष्ट थे | होटल में नाश्ते में रोज वो केले से बना अलग अलग तरीके का मीठा पकवान रख रहा था | पहले दिन कैरेमल और मेवे के साथ रोस्टेड केले से बना कुछ मीठा रखा था ( नाम भूल गई ) वो बहुत पसंद आया लेकिन बाकी के दो दिन जो मीठा रखा गया उसमे  मजा ना आया | लाल वाले केले में लगा हमारी पसंद का स्वाद नहीं हैं | लेकिन नारियल को मिला कर बनाया पैन केक बहुत पसंद आया | उसमे सूखे नारियल और मेवें का स्टफिंग भी किया गया था | मीठे में तो बस हाथ लगा कुछ पसंद आया कुछ नहीं |
                                        कोवलम के समुन्द्र के किनारे में खोजते खोजते एक शाकाहारी रेस्टुरेंट में पुट्टु  मिला  पहले लगा कहीं सादा सा चावल और सांभर जैसा ना लगे , लेकिन चावल से बना भोजन ,  चावल का स्वाद नहीं दे रहा था बल्कि अपने आप में एक अच्छी अलग सी डिश लग रही थी | अप्पम बहुत खोजा नहीं मिला सब बोलते रहें कि दो दिन उसकी तैयारी में लगते हैं अभी नहीं मिलेगा | डोसा हर जगह उपलब्ध था और उसे जम कर खाया भी गया | बहुत कुछ खाया बहुत कुछ छूट भी गया , अभी तो बहुत सारी  जगह बची हैं अगली बार कसर पूरी कर ली जाएगी |
                                         बाकि मासांहारी में तो बीफ ,  डक , खरगोश जैसो के बारे में पहली बार अपने जीवन में , मेनू में पढ़ा | मुंबई में से मांशाहारी खाना परोसने वाले रेस्टुरेंट में चले जाते हैं कभी कभी और शाकाहारी खाते हैं | विश्वास रहता हैं कि कोई मिलावट नहीं होगी लेकिन पता नहीं क्यों वहां पर भरोसा ना हो रहा था | मुंबई की तरह जैन और मारवाड़ी लोग तो ना रहते थे ना वहां | लेकिन मेरी उम्मीदों से परे  वहां ढेर सारे मारवाड़ी , शुद्ध शाकाहारी भोजनालय मिल गए | कोवलम के उस समुन्द्र के किनारे भी जहाँ फिरंगी भरे पड़े थे और हर होटल के बाहर मछलियां सजा कर रखी गई थी , अपनी पसंद का चुन लीजिये वही पका कर खिलाएंगे |
                                     



पहले मुंबई का भी सांभर पसंद नहीं आता था लगता जो बात बनारस में हैं वो और कहाँ मिलेगी | अब सत्रह सालों में धीरे धीरे ये पसंद आने लगा हैं | कुछ चीजे खाते खाते ही पसंद आती हैं |

1 comment:

  1. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार ८ नवंबर २०१९ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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