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कुछ और कहने से पहले अब ये साफ कर दू की इससे बाद लिखा गया लेख इस आम महिला के आम से विचार है कोई विचारधारा नहीं जो उसने अपने अनुभव और अपने आस पास घट रहे घटनाओं को देख कर बनाया है | ये कही से भी कोई बौद्धिक बहस या विचार नहीं है बस हल्की- फुल्की सी बाते है | अत: ज्यादा की उम्मीद रखने वाले यही से लौट जाये |
कुछ लोग भारतीय मुसलमानों पर कुछ सवाल उठाते है कुछ जानबूझ कर और कुछ अनजाने में उनमें से कुछ सवाल और मेरे निजी विचार |
१- क्या भारत के सारे मुसलमान आतंकवादी है ?
नहीं जी ऐसा तो बिल्कुल नहीं है |
दुनिया में ऐसे लोगों की कोई कमी नहीं है जो अपने स्वार्थ पूर्ति के लिए लोगो को धर्म ,जाती ,समुदाय ,भाषा ,विचार धारा और क्षेत्र के आधार पर उलटी सीधी बाते कह कर उन्हें भड़काते है और इन सब का असर सिर्फ मुस्लिमों पर नहीं होता है सभी पर होता है तभी तो हमारा पूरा देश बटा हुआ है |
२-क्या भारत के सारे मुसलमान पाकिस्तानपरस्त है ?
नहीं जी ऐसा नहीं है |
शायद कुछ लोगों का जुड़ाव है उससे धर्म के आधार पर है लेकिन ये जुड़ाव बिल्कुल वैसे ही जैसे हमारे देश में कुछ लोगों का जुड़ाव हिन्दू राष्ट्र नेपाल के प्रति था और उसके धर्म निरपेक्ष बनने पर लोगों को दुख हुआ |
३-मुस्लिम गद्दार होते है उनमें भारत से प्रेम की कोई भावना नहीं होती है |
देश प्रेमी और देश के लिए कुछ करने वाले मुसलमानों का नाम लिखना शुरू करुँगी तो लिस्ट तो बड़ी लंबी बन जाएगी सबका नाम क्या लू पाठक तो जानते ही है |
रही बात गद्दारी करने की भावना की तो इस पर किसी एक धर्म का एकाधिकार नहीं है कोई माधुरी डबल एजेंट बन जाती है तो कोई अमेरिका को सारी ख़ुफ़िया सूचना दे कर वहा का नागरिक बन जाता है क्या कर सकते है ये तो व्यक्ति का अपना चरित्र है |
४-राजनीतिक दलों के तुष्टिकरण की नीति |
मुझे भी इससे बड़ी नफरत है गुस्सा आता है राजनीतिक दलों पर
लेकिन इसमे मुस्लिमों का क्या दोष वो हमेशा से राजनीतिक दलों के लिए एक वोट बैंक की राजनीति से ज्यादा कुछ समझे ही नहीं गये जैसे दलितों को समझा जाता है | दोनों के लिए हर सरकारों ने काफी कुछ किया पर उनकी स्थिति वही की वही रही जितने जतन उतने पतन | काश की सभी पार्टियाँ उन्हें सिर्फ भारत का एक आम आदमी समझती तो शायद उनकी स्थिति इतनी बुरी नहीं होती |
५-ये बहुत ही कट्टर और धर्म के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होते है इनके मुकाबले हिन्दू धर्म काफी उदार है |
५-ये बहुत ही कट्टर और धर्म के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होते है इनके मुकाबले हिन्दू धर्म काफी उदार है |
कभी कभी और कही कही ये सच दिखता है पर
मुझे लगता है कि अपने प्रारंभिक समय में एक हिन्दू भी शायद उतना ही कट्टर और धर्म भीरु होता रहा होगा जितना की आज कोई मुस्लिम है पर समय के साथ हमने धर्म को अपने रोज मर्रा के जीवन से जोड़ना कम कर दिया और एक सुविधाजनक आधुनिक जीवन अपना लिया फिर भी आज भी कुछ कट्टरवादी हिन्दू मिल जायेंगे | तो उन्हें अभी सब कुछ समझने और थोड़ा और आधुनिक सोच बनने के लिए और समय दिया जाना चाहिए |दोनों धर्मों की तुलना करना तो वैसे ही लगता है जैसे ये कहना कि अमेरिका के मुकाबले भारत ने कितनी कम तरक्की की है भाई ये तुलना करते समय ये बताओ की अमेरिका को आज़ाद हुए कितना समय हुआ है और भारत को आज़ाद हुए कितना समय हुआ है | आज ६३ सालों में हमने जितनी तरक्की की है मुझे नहीं लगता है की अमेरिका भी अपने आज़ादी के ६३ सालों के बाद इतनी तरक्की की होगी | इसलिए ये तुलना व्यर्थ है थोड़ा समय दीजिये | अब इस उदाहरण का शाब्दिक अर्थ ना निकालिएगा मूल बात को समझिये दोनों धर्मों को आयु में काफी फर्क है |( सिर्फ आयु की बात हो रही है परिपक्वता की नहीं )
६-मुस्लिम अनपढ़ गवार गरीब सिर्फ धर्म की बात करने वाला मासाहारी हिंसक होता है, मुस्लिमों की ये छवि |
मुस्लिमों की एक छवि ज़बरदस्ती बना दी गई है जैसे दुनिया में भारत की छवि एक सपेरो के देश के रूप में बना दी गई थी या है | बचपन से अब तक कई सहेलियाँ मुस्लिम रही है और कई जान पहचान वाले भी उनमें से कुछ के घर के पुराने लोग तो परंपरा वादी मुस्लिम थे पर वो और उनके जेनरेशन के लोग नहीं थे ना तो वो बुर्क़ा पहनती थी और ना हर बात में धर्म को सामने लाती थी उनकी सोच हमारी तरह ही सामान्य थी | दो मुस्लिम दोस्त तो शुद्ध शाकाहारी थी जब मैं घर पर ये बताती थी तो लोग विश्वास नहीं करते थे और यहाँ मुंबई में कई मुस्लिम परिवारों के करीब से जानती हुं वो तो किसी भी आम भारतीय परिवार से ज्यादा आधुनिक सोच और रहन सहन वाले है | जैसे जैसे दूसरे धर्म के लोगों की तरह उनमें भी शिक्षा का प्रसार पढ़ रहा है उनकी भी सोच बदल रही है | भारत ने अपनी सपेरो वाली छवि कुछ हद तक तोड़ दी है वो भी अपनी ये छवि धीरे धीरे तोड़ देंगे |
७- मुस्लिमों से जुड़ीं नकारात्मक ख़बरे ही क्यों आती है |
इस छवि और नकारात्मक खबरों के लिए मीडिया भी कम दोषी नहीं है किसी मुल्ला मौलवी ने दिया कोई फ़िजूल का फतवा और आने लगी ब्रेकिंग न्यूज़ हो सकता है की एक आम मुस्लिम इन फतवों को कोई भाव ना देता हो पर न्यूज़ चैनलों में इसे पूरा भाव मिलता है | मुझे याद है की एक बार देव बंद ने एक बड़ी रैली की थी और युवाओं को आतंकवाद से नही जुड़ने को कहा था साथ ही बताया था की ये कैसे इस्लाम के खिलाफ है और युवा इनके झासे में ना आये | ये खबर एक बार सिर्फ एक टीवी चैनल पर देखी थी किसी और पर नहीं देखी और ना अखबार में पढ़ी | शायद ये खबर और वो रैली चैनल वालो को टी आर पी बढ़ाने वाली नहीं लगी होगी इसलिए किसी ने भी उसे ठीक से कवर करने की जरुरत नहीं समझी | अभी हाल ही में देव बंद ने कश्मीर और कश्मीरी मुस्लिमों पर भी एक बयान भारत के पक्ष में दिया था उसकी खबर भी कही नहीं दिखी मुझे भी ये खबर तब पता चली जब अख़बार ने इस पर सम्पादकीय लिखा गया |
८- सरकार तो इतनी सुविधाएँ दे रही है पर इनका कुछ होता ही नहीं |
इस मामले में ज्यादा गुस्सा मुस्लिम बुद्धिजीवियों और पढ़े लिखे लोगों पर आता है | क्यों नहीं वो आगे आ कर अपने समुदाय की तरक्की के लिए कुछ करते है | मुस्लिम गरीब है अन पढ़ है उन्हें नौकरी नहीं मिल रही है उन पर अत्याचार हो रहा है जैसी बातों पर वो चीखना चिल्लाना तो खूब जानते है पर आगे बढ़ कर इनके विकास के लिए कुछ करते नहीं है | मैंने देखा है मुस्लिम और दलितों दोनों ही वर्गों के कुछ लोग सरकार द्वारा दिये जा रहे आरक्षण, सुविधाओं और पैसे का उपयोग खुद की तरक्की के लिए करते है और अपने समुदाय को भूल जाते है असल में जिसके विकास के लिए उन्हें ये सारी चीज़े दी जाती है | बस खाना पूर्ति के लिए उनकी बदहाली पर धडियाली आसु बहा कर अपना काम ख़त्म कर लेते है |
९- मुस्लिम महिलाओ की बड़ी बुरी स्थिति है |
बस बस अब इस मामले में मैं अपना मुँह बंद ही रखु तो अच्छा है वरना मुस्लिमों पर लिखा ये लेख अभी नारीवादी बन जायेगा | इतना ही कहूँगी की उन पर अपनी एक उँगली उठाने वाले जरा ध्यान से देखे की आपकी ही तीन उंगलिया आप की ही ओर इशारा कर रही है जरा अपने घर की महिलाओ की स्थिति देख लीजिये फिर किसी और की बात कीजियेगा | उन्हें किसी की सहानुभूति की जरुरत नहीं है कम से कम उनसे तो बिल्कुल ही नहीं जो खुद ये गलत काम करते है | वो अपनी लड़ाई खुद लड़ भी लेंगी और उसमे जीत भी सकती है |
इन सब बातों के बाद भी ये कहूँगी की ऐसा नहीं है की कुछ समस्याएँ है ही नहीं , हा है ओर बहुत सारी है पर जरुरत इस बात की है की उनके धर्म की तरफ उँगली उठा कर ओर हर जगह मीन मेख निकाल कर बार बार उन पर आरोप प्रत्यारोप लगा कर उन को हतोत्साहित करने के बजाये उन समस्याओं को सुलझाने के लिए उन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए और उन्हें सिर्फ मुस्लिम समझने के बजाये एक आम आदमी समझना चाहिए |
इस लेख को लिखने की प्रेरणा देने के लिए खास तौर पर मैं एन डी टीवी के बिहार के उस संवाददाता को धन्यवाद दुँगी जिसे आज सुबह बिहार में हो रहे मतदान पर रिपोर्टिंग करते हुए देखा | वोट दे कर आये तीन चार लोगों से बात करते हुए उसने एक से पूछा कि आप ने किस मुद्दे पर वोट दिया उसने कहा विकास दूसरे ने कहा विकास, उसे जो जवाब चाहिए था नहीं मिल रहा था उसने सवाल बदल और तीसरे से पूछा की आप किस मुद्दे पर वोट दे रहे है जाती या धर्म तीसरे ने भी कहा ये दोनों नहीं विकास पर दिया है अब चौथे से सीधे पूछा की आप ने किसको वोट दिया है उसने कहा ये नहीं बताऊंगा, तो रिपोर्टर ने तीसरे से पूछे सवाल को दोहरा दिया तो उन्होंने कहा की मैं तो जिसको मान लिया तो मान लिया उसी को वोट देता हुं | तो रिपोर्टर कहता है की आप मुस्लिम वोटर है आपने किस आधार पर कांग्रेस को वोट किया अब बताइये उसने कब कहा की वो मुस्लिम है और उसने कांग्रेस को वोट दिया है | | मतलब की बाकी लोग सिर्फ वोटर थे और वो मुस्लिम वोटर उनके हिसाब से वो अलग है और उसके सोचने का तरीका अलग है वो केवल धर्म के आधार पर वोट करता है और जब उसने उनके मन का नहीं बोला तो वो उसके मुँह में ज़बरदस्ती अपने शब्द भरने की कोशिश कर रहे थे | बोलिये ये हमारे पढ़े लिखे तबके की सोच है बाकियों को क्या कहु |
हो सकता है आप के विचार मुझसे काफी अलग हो आप के हर आलोचनात्मक टिप्पणी और सवाल का स्वागत है |
९- मुस्लिम महिलाओ की बड़ी बुरी स्थिति है |
बस बस अब इस मामले में मैं अपना मुँह बंद ही रखु तो अच्छा है वरना मुस्लिमों पर लिखा ये लेख अभी नारीवादी बन जायेगा | इतना ही कहूँगी की उन पर अपनी एक उँगली उठाने वाले जरा ध्यान से देखे की आपकी ही तीन उंगलिया आप की ही ओर इशारा कर रही है जरा अपने घर की महिलाओ की स्थिति देख लीजिये फिर किसी और की बात कीजियेगा | उन्हें किसी की सहानुभूति की जरुरत नहीं है कम से कम उनसे तो बिल्कुल ही नहीं जो खुद ये गलत काम करते है | वो अपनी लड़ाई खुद लड़ भी लेंगी और उसमे जीत भी सकती है |
इन सब बातों के बाद भी ये कहूँगी की ऐसा नहीं है की कुछ समस्याएँ है ही नहीं , हा है ओर बहुत सारी है पर जरुरत इस बात की है की उनके धर्म की तरफ उँगली उठा कर ओर हर जगह मीन मेख निकाल कर बार बार उन पर आरोप प्रत्यारोप लगा कर उन को हतोत्साहित करने के बजाये उन समस्याओं को सुलझाने के लिए उन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए और उन्हें सिर्फ मुस्लिम समझने के बजाये एक आम आदमी समझना चाहिए |
इस लेख को लिखने की प्रेरणा देने के लिए खास तौर पर मैं एन डी टीवी के बिहार के उस संवाददाता को धन्यवाद दुँगी जिसे आज सुबह बिहार में हो रहे मतदान पर रिपोर्टिंग करते हुए देखा | वोट दे कर आये तीन चार लोगों से बात करते हुए उसने एक से पूछा कि आप ने किस मुद्दे पर वोट दिया उसने कहा विकास दूसरे ने कहा विकास, उसे जो जवाब चाहिए था नहीं मिल रहा था उसने सवाल बदल और तीसरे से पूछा की आप किस मुद्दे पर वोट दे रहे है जाती या धर्म तीसरे ने भी कहा ये दोनों नहीं विकास पर दिया है अब चौथे से सीधे पूछा की आप ने किसको वोट दिया है उसने कहा ये नहीं बताऊंगा, तो रिपोर्टर ने तीसरे से पूछे सवाल को दोहरा दिया तो उन्होंने कहा की मैं तो जिसको मान लिया तो मान लिया उसी को वोट देता हुं | तो रिपोर्टर कहता है की आप मुस्लिम वोटर है आपने किस आधार पर कांग्रेस को वोट किया अब बताइये उसने कब कहा की वो मुस्लिम है और उसने कांग्रेस को वोट दिया है | | मतलब की बाकी लोग सिर्फ वोटर थे और वो मुस्लिम वोटर उनके हिसाब से वो अलग है और उसके सोचने का तरीका अलग है वो केवल धर्म के आधार पर वोट करता है और जब उसने उनके मन का नहीं बोला तो वो उसके मुँह में ज़बरदस्ती अपने शब्द भरने की कोशिश कर रहे थे | बोलिये ये हमारे पढ़े लिखे तबके की सोच है बाकियों को क्या कहु |
हो सकता है आप के विचार मुझसे काफी अलग हो आप के हर आलोचनात्मक टिप्पणी और सवाल का स्वागत है |
























