October 21, 2010

एक भारतीय मुस्लिम का करारा जवाब - - - - - - - mangopeople

मैं कुछ कहु उसके पहले ये वीडियो देखिये और मजे ले लीजिये मुशर्रफ की बेईज्जती, का फिर बाते होंगी | एक चीज  पर ध्यान दीजियेगा  मुशर्रफ का चेहरे की उड़ती रंगत और उनकी प्रतिक्रिया ना दे पाने की कसक |

http://www.youtube.com/watch?v=DYdUPV0OOJw





कुछ और कहने से पहले अब ये साफ कर दू की इससे बाद लिखा गया लेख इस आम महिला के आम से विचार है कोई विचारधारा नहीं जो उसने अपने अनुभव और अपने आस पास घट रहे घटनाओं को देख कर बनाया है | ये कही से भी कोई बौद्धिक बहस या विचार नहीं है बस हल्की- फुल्की सी बाते है | अत: ज्यादा की उम्मीद रखने वाले यही से लौट जाये |
  
कुछ लोग भारतीय मुसलमानों पर कुछ सवाल उठाते है कुछ जानबूझ कर और कुछ अनजाने में उनमें से कुछ सवाल और मेरे निजी विचार |
 
१- क्या भारत के सारे मुसलमान आतंकवादी है ?
    नहीं जी ऐसा तो बिल्कुल नहीं है |
दुनिया में ऐसे लोगों की कोई कमी नहीं है जो अपने स्वार्थ पूर्ति के लिए लोगो को धर्म ,जाती ,समुदाय ,भाषा ,विचार धारा और क्षेत्र  के आधार पर उलटी सीधी बाते कह कर उन्हें भड़काते है और इन सब का असर सिर्फ मुस्लिमों पर नहीं होता है सभी पर होता है तभी तो हमारा पूरा देश बटा हुआ है | 

२-क्या भारत के सारे मुसलमान पाकिस्तानपरस्त है ?
    नहीं जी ऐसा नहीं है  |
शायद कुछ लोगों का जुड़ाव है उससे धर्म के आधार पर है लेकिन ये जुड़ाव बिल्कुल वैसे ही जैसे हमारे देश  में कुछ लोगों का जुड़ाव हिन्दू राष्ट्र नेपाल के प्रति था और उसके धर्म निरपेक्ष बनने पर लोगों को दुख हुआ |

३-मुस्लिम गद्दार होते है उनमें भारत से प्रेम की कोई भावना नहीं होती है |
    देश प्रेमी और देश के लिए कुछ करने वाले मुसलमानों का नाम लिखना शुरू करुँगी तो लिस्ट तो बड़ी लंबी बन जाएगी सबका नाम क्या लू पाठक तो जानते ही है |
रही बात गद्दारी करने की भावना की तो इस पर किसी एक धर्म का एकाधिकार नहीं है कोई माधुरी डबल एजेंट बन जाती है तो कोई अमेरिका को सारी ख़ुफ़िया सूचना दे कर वहा का नागरिक बन जाता है क्या कर सकते है ये तो व्यक्ति का अपना चरित्र है |

४-राजनीतिक दलों के तुष्टिकरण की नीति  |
मुझे भी इससे बड़ी नफरत है  गुस्सा आता है राजनीतिक दलों पर  
लेकिन इसमे मुस्लिमों का क्या दोष वो हमेशा से राजनीतिक दलों के लिए एक वोट बैंक की राजनीति से ज्यादा कुछ समझे ही नहीं गये जैसे दलितों को समझा जाता है | दोनों के लिए हर सरकारों ने काफी कुछ किया पर उनकी स्थिति वही की वही रही जितने जतन उतने पतन | काश की सभी पार्टियाँ उन्हें सिर्फ भारत का एक आम आदमी समझती तो शायद उनकी स्थिति इतनी बुरी नहीं होती |
 
५-ये बहुत ही कट्टर और धर्म के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होते है इनके मुकाबले हिन्दू धर्म काफी उदार है | 
    कभी कभी और कही कही ये सच दिखता है पर 
मुझे लगता है कि अपने प्रारंभिक समय में एक हिन्दू भी शायद उतना ही कट्टर और धर्म भीरु होता रहा होगा जितना की आज कोई मुस्लिम है पर समय के साथ हमने धर्म को अपने रोज मर्रा के जीवन से जोड़ना कम कर दिया और एक सुविधाजनक आधुनिक जीवन अपना लिया फिर भी आज भी कुछ कट्टरवादी हिन्दू मिल जायेंगे | तो उन्हें अभी सब कुछ समझने और थोड़ा और आधुनिक सोच बनने के लिए और समय दिया जाना चाहिए |
दोनों धर्मों की तुलना करना तो वैसे ही लगता है जैसे ये कहना कि अमेरिका के मुकाबले भारत ने कितनी कम तरक्की की है भाई ये तुलना करते समय ये बताओ की अमेरिका को आज़ाद हुए कितना समय हुआ है और भारत को आज़ाद हुए कितना समय हुआ है | आज ६३ सालों में हमने जितनी तरक्की की है मुझे नहीं लगता है की अमेरिका भी अपने आज़ादी के ६३ सालों के बाद इतनी तरक्की की होगी | इसलिए ये तुलना व्यर्थ है थोड़ा समय दीजिये |  अब इस उदाहरण का शाब्दिक अर्थ ना निकालिएगा मूल बात को समझिये दोनों धर्मों को आयु में काफी फर्क है |( सिर्फ आयु की बात हो रही है परिपक्वता की नहीं ) 

६-मुस्लिम अनपढ़ गवार गरीब सिर्फ धर्म की बात करने वाला मासाहारी हिंसक होता है, मुस्लिमों की ये छवि |
   मुस्लिमों की एक छवि ज़बरदस्ती बना दी गई है जैसे दुनिया में भारत की छवि एक सपेरो के देश के रूप में बना दी गई थी या है | बचपन से अब तक कई सहेलियाँ मुस्लिम रही है और कई जान पहचान वाले भी उनमें से कुछ के घर के पुराने लोग तो परंपरा वादी मुस्लिम थे पर वो और उनके जेनरेशन के लोग नहीं थे ना तो वो बुर्क़ा पहनती थी और ना हर बात में धर्म को सामने लाती थी उनकी सोच हमारी तरह ही सामान्य थी |  दो मुस्लिम दोस्त तो शुद्ध शाकाहारी थी जब मैं घर पर ये बताती थी तो लोग विश्वास नहीं करते थे और यहाँ मुंबई में कई मुस्लिम परिवारों के करीब से जानती हुं वो तो किसी भी आम भारतीय परिवार से ज्यादा आधुनिक सोच और रहन सहन वाले है | जैसे जैसे दूसरे धर्म के लोगों की तरह उनमें भी शिक्षा का प्रसार पढ़ रहा है उनकी भी सोच बदल रही है | भारत ने अपनी सपेरो वाली छवि कुछ हद तक तोड़ दी है वो भी अपनी ये छवि धीरे धीरे तोड़ देंगे |

७- मुस्लिमों से जुड़ीं नकारात्मक ख़बरे ही क्यों आती है |
  इस छवि और नकारात्मक खबरों के लिए मीडिया भी कम दोषी नहीं है किसी मुल्ला मौलवी ने दिया कोई फ़िजूल का फतवा और आने लगी ब्रेकिंग न्यूज़ हो सकता है की एक आम मुस्लिम इन फतवों को कोई भाव ना देता हो पर न्यूज़ चैनलों में इसे पूरा भाव मिलता है | मुझे याद है की एक बार देव बंद ने एक बड़ी रैली की थी और युवाओं को आतंकवाद से नही जुड़ने को कहा था साथ ही बताया था की ये कैसे इस्लाम के खिलाफ है और युवा इनके झासे में ना आये | ये खबर एक बार सिर्फ एक टीवी चैनल  पर देखी थी किसी और पर नहीं देखी और ना अखबार में पढ़ी | शायद ये खबर और वो रैली चैनल वालो को टी आर पी बढ़ाने वाली नहीं लगी होगी इसलिए किसी ने भी उसे ठीक से कवर करने की जरुरत नहीं समझी | अभी हाल ही में देव बंद ने कश्मीर और कश्मीरी मुस्लिमों पर भी एक बयान भारत के पक्ष में दिया था उसकी खबर भी कही नहीं दिखी मुझे भी ये खबर तब पता चली जब अख़बार ने इस पर सम्पादकीय लिखा गया |

८- सरकार तो इतनी सुविधाएँ दे रही है पर इनका कुछ होता ही नहीं | 
इस मामले में ज्यादा गुस्सा मुस्लिम बुद्धिजीवियों और पढ़े लिखे लोगों पर आता है | क्यों नहीं वो आगे आ कर अपने समुदाय की तरक्की के लिए कुछ करते है | मुस्लिम गरीब है अन पढ़ है उन्हें नौकरी नहीं मिल रही है उन पर अत्याचार हो रहा है जैसी बातों पर वो चीखना चिल्लाना तो खूब जानते है पर आगे बढ़ कर इनके विकास के लिए कुछ करते नहीं है | मैंने देखा है मुस्लिम और दलितों दोनों ही वर्गों के  कुछ लोग सरकार द्वारा दिये जा रहे आरक्षण, सुविधाओं और पैसे का उपयोग खुद की तरक्की के लिए करते है और अपने समुदाय को भूल जाते है असल में जिसके विकास के लिए उन्हें ये सारी चीज़े दी जाती है | बस खाना पूर्ति के लिए उनकी बदहाली पर धडियाली आसु बहा कर अपना काम ख़त्म कर लेते है |

९- मुस्लिम महिलाओ की बड़ी बुरी स्थिति है | 
    बस बस अब इस मामले में मैं अपना मुँह बंद ही रखु तो अच्छा है वरना मुस्लिमों पर लिखा ये लेख अभी नारीवादी बन जायेगा | इतना ही कहूँगी की उन पर अपनी एक उँगली उठाने वाले जरा ध्यान से देखे की आपकी ही तीन उंगलिया आप की ही ओर इशारा कर रही है जरा अपने घर की महिलाओ  की स्थिति देख लीजिये फिर किसी और की बात कीजियेगा | उन्हें किसी की सहानुभूति की जरुरत नहीं है कम से कम उनसे तो बिल्कुल ही नहीं जो खुद ये गलत काम करते है | वो अपनी लड़ाई खुद लड़ भी लेंगी और उसमे जीत भी सकती है  | 


इन सब बातों के बाद भी ये कहूँगी की ऐसा नहीं है की कुछ समस्याएँ है ही नहीं , हा है ओर बहुत सारी है पर जरुरत इस बात की है की उनके धर्म की तरफ उँगली उठा कर ओर हर जगह मीन मेख निकाल कर बार बार उन पर आरोप प्रत्यारोप लगा कर उन को हतोत्साहित   करने के बजाये उन समस्याओं को सुलझाने के लिए उन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए और उन्हें सिर्फ मुस्लिम समझने के बजाये एक आम आदमी समझना चाहिए |


इस लेख को लिखने की प्रेरणा देने के लिए खास तौर पर मैं एन डी टीवी के बिहार के उस संवाददाता को धन्यवाद दुँगी जिसे आज सुबह बिहार में हो रहे मतदान पर रिपोर्टिंग करते हुए देखा | वोट दे कर आये तीन चार लोगों से बात करते हुए उसने एक से पूछा कि आप ने किस मुद्दे पर वोट दिया उसने कहा विकास दूसरे ने कहा विकास, उसे जो जवाब चाहिए था नहीं मिल रहा था उसने सवाल बदल और तीसरे से पूछा की आप किस मुद्दे पर वोट दे रहे है जाती या धर्म तीसरे ने भी कहा ये दोनों नहीं विकास पर दिया है अब चौथे से सीधे पूछा की आप ने किसको वोट दिया है उसने कहा ये नहीं बताऊंगा, तो रिपोर्टर ने तीसरे से पूछे सवाल को दोहरा दिया तो उन्होंने कहा की मैं तो जिसको मान लिया तो मान लिया उसी को वोट देता हुं | तो रिपोर्टर कहता है की आप मुस्लिम वोटर है आपने किस आधार पर कांग्रेस को वोट किया अब बताइये उसने कब कहा की वो मुस्लिम है और उसने कांग्रेस को वोट दिया है | | मतलब की बाकी लोग सिर्फ वोटर थे और वो मुस्लिम वोटर उनके हिसाब से वो अलग है और उसके सोचने का तरीका अलग है वो केवल धर्म के आधार पर वोट करता है और जब उसने उनके मन का नहीं बोला तो वो उसके मुँह में ज़बरदस्ती अपने शब्द भरने की कोशिश कर रहे थे | बोलिये ये हमारे पढ़े लिखे तबके की सोच है बाकियों को क्या कहु | 

हो सकता है आप के विचार मुझसे काफी अलग हो आप के हर आलोचनात्मक टिप्पणी और सवाल का स्वागत है | 









 
       



October 19, 2010

आत्मा, पुनर्जन्म और भगवान क्या आप वास्तव में इन पर विश्वास करते है एक बार क्रास चेक कीजिये - - - - mangopeople

पहला सवाल सभी पाठकों से यही है की क्या आप आत्मा, पुनर्जन्म और भगवान  पर विश्वास करते है | इस सवाल पर  ९९% का जवाब हा में होगा | अब एक कहानी सुनिये बचपन में सुना होगा एक बार फिर सुनिये और फिर इसका जवाब दीजिये |

एक चोर था एक दिन जब वो चोरी के लिए गया तो साथ में अपने १२ साल के बेटे को भी ले गया बोला की बेटा मैं अंदर चोरी के लिए जा रहा हुं तुम बाहर खड़े हो कर देखते रहो की कोई हमें ऐसा करते देखे नहीं यदि हमें कोई देखे तो मुझे इशारा कर देना | बाप जैसे ही अंदर गया बेटे ने कहा की पिता जी कोई देख रहा है वो तुरंत बाहर आ गया और फिर दूसरे घर में गया बेटे ने फिर कहा की कोई देख रहा है इसी तरह जब कई घर में ऐसा हुआ तो पिता ने पूछ ही लिया की ऐसा कैसे हो रहा है कि आज  कोई ना कोई देख ले रहा है कौन है ये जो हमें देख रहा है | तो बेटे ने कहा की भगवान हमें देख रहा है आप ने ही तो कहा है की वो हर जगह व्याप्त है और वो हमें हमेशा देखता है | क्या वो हमें चोरी करते हुए नहीं देख रहा है |

कहानी में क्या कहा जा रहा है मुझे बताने की जरुरत नहीं है सब समझ गये है  अब बताइये की क्या आप वास्तव में भगवान में विश्वास करते है |

आत्मा कभी नहीं मरती है   किस आधार पर लोग ये बात कह देते है मुझे समझ नहीं आता है यदि आत्मा नाम की कोई चीज है तो मैं तो रोज उसे मरता हुआ देखती हुं | लोग भूखे मर रहे है और सरकार में बैठे लोग  अनाज को सडा कर बर्बाद कर रहे है, हमारे दिये जिस टैक्स के पैसों से देश का विकास होना चाहिए था वो खेलो के नाम पर चंद लोगों द्वारा  डकार लिए गये , सैनिकों के खाने के पैसे भी लोग खुद खा जाते है , पहले देवी मान कन्या को भोजन कराते है फिर एक कन्या को पैदा होने से पहले ही मार देते है , पिता ने ही पैसे के लिए अपने ही १० साल के बेटे का अपहरण किया और फिर हत्या कर दी ,  अमीर होने के लिए एक परिवार ने अपने ही दो बच्चों की बलि चढ़ा दी , अपने स्वार्थ के लिए हम रोज कोई ना कोई गलत काम करते है  | क्या आप को नहीं लगता की ये सब करने के बाद आत्मा नाम की चीज मर जाती होगी | 

पुनर्जन्म लेने के बाद आप क्या बनेगे जो लोगों के गलत काम करने की रफ़्तार है उसे देखते हुए तो लगता है की आगे के बीस तीस साल बाद धरती पर रीड विहीन जीवो की संख्या सबसे ज्यादा होगी |

आज तक मैंने तो किसी को भी भगवान के डर से कुछ गलत करने से डरते हुए नहीं देखा है | ना ही कभी देखा है की कोई गलत काम करते हुए ये सोचता है की हमें इसका फल अगले जन्म में क्या मिलने वाला है | पर कहते सब है की हम सब में विश्वास  करते है |  पता नहीं किस तरह का ये विश्वास है | आखिर लोग अपने आप से ये झूठ क्यों बोलते है कि वो इन सब पर विश्वास करते है शायद अपने नाकामयाबी और अपनी गलती का ठीकरा भगवान के ऊपर फोड़ने के लिए कि भगवान की यही मर्जी थी | अब अपने आप से ईमानदारी से फिर से पूछिये की क्या आप वास्तव में इन सभी चीजो पर विश्वास करते है और अब जवाब दीजिये |



October 15, 2010

नोबेल शांति पुरस्कार और एक भयानक विचार - - - - - mangopeople

ये तो सभी जानते है की इस बार का नोबेल शांति पुरस्कार चीन के ल्यु श्याओपो या लिउ शाओबो ( उनके ये दो नाम सामने आ रहे है जो सही हो वही वाला पढ़ा ले ) को दिया गया है वो चीन में लोकतंत्र के लिए आवाज़ उठा रहे थे ( ऐसा हिंदी अखबारों में लिखा है) इसीलिए उनको जेल में डाल दिया गया है और उनकी पत्नी लिउ शिया को भी घर में नजर बंद कर दिया गया है | निश्चित रूप से ये चीन के लिए ये पश्चिम का षडयंत्र है उसे अस्थिर करने के लिए उसके विचार धारा को ख़राब साबित करने के लिए लेकिन चीन ने कहा है की इस काम से उसकी विचार धारा पर कोई असर नहीं होगा ( फिर नार्वे को धमकी देने की क्या जरुरत थी या उसके राजनयिक से बात निरस्त करने की क्या जरुरत थी ) अब इन सब के बीच दुनिया में लोकतंत्र फ़ैलाने का ठेका लिया अमेरिका कैसे चुप रहता उसने भी अपना मुँह खोला और बोला की नोबेल पुरस्कार विजेता की पत्नी को आज़ादी दी जाये और उसे मानवाधिकार की याद दिलाई ( उसके सैनिक युद्ध बंदियों और युद्ध क्षेत्र से पकडे गए लोगो के साथ जो कर रहे है वो भी मानवाधिकार के अंतर्गत ही हो रहा है ) | नोबेल शांति पुरस्कार कितने निष्पक्ष होते है ये हम सभी को पता है तभी तो पिछले साल वो दो देशों को युद्ध  में झोकने वाले अपने पूर्व के राष्ट्रपतियों की नीतियों को ही आगे बढ़ने वाले उनके नए नवेले राष्ट्रपति को दे दिया गया हमारी भाषा में कहे तो उनके हाथों की मेंहदी भी नहीं छूटी थी बस एक महीने बाद ही दे दिया गया | जी हा पुरस्कार उनके हाथों में भले कुछ महीनों बाद आया था पर उनका नोमिनेशन तो तभी कर दिया गया था जब उनको अपना पद संभाले एक महिना ही हुआ था | और आज की तारीख में अमेरिका का सबसे बड़ा प्रतियोगी दादागिरी करने में चीन ही है अब उसके इस काम से चिढ़े अमेरिका द्वारा उसे इस तरह से चिढाने के कई काम होते है |
                             संभवतः भूमिका अच्छे से बन गई है अब मेरे भयानक विचार पर आते है सोचिये की कल को हमने अमेरिका से परमाणु समझौता कर लिया बिजली बनाया अपना विकास किया मजे लिए और वो नहीं किया जो वो हमसे चाहता है और जो हमारा दूसरा पड़ोसी उसके आगे करता है, दुम हिलाना, भाई हम अपने पड़ोसी के तरह बिना सिंग वाले बुद्धिहीन जीव तो है नहीं जो अमेरिका की हर इच्छा पूरी करते चले चलो हमने इंकार कर दिया और बन बैठे चीन की तरह उसके दुश्मन तो सोचिये की हमारे यहाँ वो किसको नोबेल पुरस्कार दिला सकता है | दावेदार तो कई है  जिसको नोबेल मिलने पर हमें भी वैसे ही हजम नहीं होगा जैसे की आज चीन को नहीं हजम हो रहा है | सबसे पहला नंबर आता है कश्मीर में बैठे कई अलगाववादी नेताओ का जो दावा करते है कि वो तो शांतिपूर्ण तरीके से भारत का विरोध कर रहे है और फिर समय बदलते और नेताओ को बदलते देर थोड़े ही लगती है जब बात नोबेल की हो और साथ में १४ लाख डालर भी मिलते है तो मुहम्द अज़हर से ले कर बड़े से बड़ा हिंसक आतंकवादी दावा कर सकता है की उसने तो सारा विरोध अहिंसक ही किया है उससे बड़ा शांति का दूत कोई और है ही नहीं | अब छविया बदलते देर थोड़े लगती है आखिर इंदिरा जी ने यासिर अराफ़ात को भी गले लगाया था ( ऐसा हमने पढ़ा और सुना है ) उनका इतिहास सभी जानते होंगे की वो अपने शुरूआती जीवन में क्या थे और इजराइल उनसे क्यों इतना चिढ़ता था | चलिए वापस अपने देश आ जाते है तो मतलब ये की तब तक कश्मीर में इस पुरस्कार के लिए कई दावेदार हो सकते है और सभी को नोबेल के लिए शार्ट लिस्ट किया जा सकता है जैसे इस बार चीन से तीन और ऐसे ही लोग शार्ट लिस्ट किये गये थे यानी कुल चार दावेदार चीन की तरफ से थे पर हम उनको पछाड़ देंगे क्योंकि हमारे पास कश्मीर के अलावा बब्बर खालसा , उल्फा, नक्सली नागा विद्रोही बहुत सारे दावेदार हमारे प्यारे पड़ोसियों की कृपा से मौजूद  है | सबसे तगड़ी दावेदारी किसकी होगी ये इस बात पर निर्भर होगा कि अमेरिका से उस समय हमारे दोनों पड़ोसियों के रिश्ते कैसे है |
             एक और ख्याल है सोचिये की नोबेल कोई छोटा मोटा पुरस्कार तो है नहीं अन्तराष्ट्रीय स्तर का है और काफी सम्मानित भी है उसकी तो बात ही दूसरी है लोग तो छोटे मोटे पुरस्कारों के लिए ना जाने क्या क्या कर जाते है सरकारों के तलवे चाटने से लेकर उनके दिये पदों पर जी हजुरी करने लगते है तो फिर अपनी छवि बदलना कौन सा मुश्किल काम है | अब सोचिये की अचानक से ये ख्याल दाउद को आ जाये की मेरे लिए दो देश आपस में लड़ रहे है चलो मैं ही आत्मसमर्पण कर देता हुं इससे दो देशों की दुश्मनी कम हो जाएगी और बदले में ये शांति स्थापित करने के लिए नोबेल पर अपना दावा ठोक दूँगा हो सकता है अमेरिका भी मेरा साथ दे और भारत से कहे की आप इस शांति के मसीहा को जेल में नहीं डाल सकते है इसने तो दो देशों के बीच शांति फैलाई है ये आत्मसमर्पण करके अपना प्रायश्चित करना चाहता है इसे शांति से करने दे |  और मान लो की जेल से छुटकारा नहीं भी मिला तो भारत के जेलों से हम जैसो को डरने की क्या जरुरत है खुद वहा के मंत्री कहते है की अबू सलेम को फाईफरह कर भी वो चकाचक रहते है अरे थोड़ी बहुत परेशानी हुई तो भाई नोबेल के लिए वो भी सह लेंगे | कौन सा मेरे जीते जी मेरे मुकदमो का फैसला आने वाला है और हो भी गया तो क्या गारंटी है की मुझे मिली फाँसी की सजा मुझे दे दी जाये अफजल गुरु  का नंबर २७ था मेरा जब तक आयेगा तब तक तो शायद मैं जिंदगी के सारे मजे लेकर अपनी प्राकृतिक मौत मार चूका होंगा |
                ख्याल भयानक है पर क्या पता हमें कब सच हो जाये बुरे के लिए हमेशा पहले ही तैयारी कर लेना चाहिए एक एंटी ख्याल भी साथ में अभी अभी आ गया है | जी मेरा नहीं है एक फिल्म से डाका डाल रही हुं फिल्म का नाम है " तेरे बिन लादेन " जी हा बिल्कुल सही सोच रहे है आप हमें भी एक अदद नीरू की जरुरत होगी जिसे लादेन बनाया जा सके बस उससे अमेरिका के खिलाफ सारे युद्ध बंद करने अमेरिका के साथ दूनिया से माफ़ी मागने और आगे शांति के लिए ही कार्य करने वाले डायलॉग बुलावा कर रिकार्ड करना है और जारी कर देना है दुनिया में और फिर मांग करनी है की नारे लगने है |
नोबेल दो नोबेल दो लादेन को नोबेल दो    
शांति के मसीहा को जल्दी से नोबेल दो
हम शुरुआत तो अकेले करेंगे पर हमारे साथ सारे इस्लामिक देशों का कारवाँ मिलता जायेगा और आवाज़ तेज होती जाएगी फिर चाहे तो हम खाड़ी देशों के साथ कूटनीति भी कर सकते है कि भाई साफ है कि लादेन को नोबेल दो नहीं तो तेल नहीं |
बोलिये विचार कैसा है
इस विचार से इतर एक बात - - - - मेरा मानना है कि दुश्मन की हर बात में बुराई नहीं देखनी चाहिए और उसकी हर गलती पर "उसने गलत किया" ये भी नहीं चिल्लाना चाहिए उसे अपने नफे नुकसान पर तौल कर बोलना चाहिए ( यहाँ दो देशों की बात हो रही है ) | भारत से ऐसी कूटनीति की उम्मीद तो नहीं थी ( क्योकि अन्तराष्ट्रीय कूटनीति में अक्सर वो कच्चा ही साबित होता है )  पर नोबेल पुरस्कार पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रया ना दे कर भारत ने मेरे हिसाब से तो अच्छा किया |

October 12, 2010

ऊफ ये नारीवादिया कभी सुधरेंगी ? - - - - - - - - - -mangopeople

कितना बुरा लगता है जब आप कोई गंभीर लेखन करे और लोग उसे व्यंग्य कहे दिल से आत्मा से किसी की बुराई करे और लोग उसे समझे ही नहीं उसका मतलब ही उलटा निकालने लगे | लगता है जैसे सारी मेहनत बेकार गई इतने हिम्मत से ये जहर उगला था और सभी इसको अमृत समझने की भूल कर गये | इसलिए अपना ये लेख नारी ब्लॉग के बाद एक बार फिर यहाँ दे रही हु इस उम्मीद में की शायद कोई मेरे इस गंभीर शिकायत को गंभीरता से लेगा | लेख थोड़ा लंबा है कोई बात नहीं कोई ब्याज नहीं लगेगा किस्तों में पढ़ लीजिये |

एक बात समझ में नहीं आती है की कुछ महिलाओ को दूसरे के जीवन में टाँग अड़ाने या दूसरों के घरों में ताका झाकी करने की आदत क्यों होती है | मैं तो बड़ी परेशान हुं एक ऐसी ही महिला से कुछ लोग उनको नारीवादी कहते है तो कुछ लोग उनको वो क्या कहते है हा याद आया घर तोडू औरत | कहते है उनको दूसरों के घर तोड़ने की आदत है | तलवार जी की बहु का  एक साल में दूसरी बार मिस कैरेज हो गया बेचारी को पहले से ही दो लड़कियाँ है | हमारी नारीवादी वहा चली गई कहने लगी क्या बात है मिसेज तलवार आपकी बहु के साथ दूसरी बार ये घटना हो गई किसी अच्छे डाक्टर को दिखाइये मिसेज तलवार ने कहा की नहीं भाई ऐसी कोई बात नहीं है हम तो खुद काफी अच्छे डाक्टर को दिखाते है | बेचारी बहु का उतरा सा मुँह देख कर उसे कह दिया की जब अगली बार फिर से प्रेग्नेंट होना तो अपने मायके चली लाना यदि बच्चा सुरक्षित चाहती हो | लो जी उनकी बहु ने तो सच में यही कर दिया अब तलवार परिवार का तो गुस्सा होना लाज़मी था | जिस बात का डर था उन बेचारो को वही हो गया तीसरी बार भी बेटी | उन्होंने भी साफ मना कर दिया की बहु हमारे इजाज़त के बिना मायके गई कैसे, अब हम उसे नहीं लायेंगे | तलवार साहब ने खुद कहा कि  उन्हें बेटी होने का गम नहीं है पर बहु की आदते ख़राब हो गई थी देखिये अपनी मर्ज़ी से मायके चली गई अब पड़ी रहे वही पर हमें उसकी जरुरत नहीं है | बोलो तोड़ दिया उसका घर अरे अपने ससुराल में होती तो क्या होता ज्यादा से ज्यादा एक दो बार और उस का मिसकैरेज हो जाता जहा दो जन्म से पहले मार दी गई वहा एक और मार दी जाती क्या फर्क पड़ता पर कम से कम उसका घर तो बना रहता बाकी दो बेटियों को तो उनके पिता का प्यार मिलता आप जानते नहीं कितना प्यार है उसको बेटियों से अब बताओ वो भी पिता के प्यार से महरूम हो गई | उन नारीवादी की अपनी दो बेटिया है उनको बेटे की चाह नहीं है पर इसका मतलब ये तो नहीं की दूसरों को भी इसकी चाह नहीं हो अरे बेटा कुल का चिराग होता है माँ बाप का सहारा होता है पर इनको कौन समझाये | अरे मुझे तो लग रहा है की तलवार परिवार अच्छा कर रहा था देश की जनसंख्या बढ़ने से रोक रहा था नहीं तो आदमी बेटे के चक्कर में कितनी बेटियों को जन्म देते चले | कुछ बेवकूफ़ लोग इसे भ्रूण हत्या कहते है और इसको लड़के लड़कियों के अनुपात ख़राब होने का कारण मानते है | पर मुझे नहीं लगता है कि कुछ ऐसा होता है ,ब्लॉग जगत के एक ज्ञानी ने हमें बताया की ऐसा कुछ होता ही नहीं है ये तो प्राकृतिक कारण है जो आज लड़कियाँ कम जन्म ले रही है और लड़के ज्यादा | जय हो उस ज्ञानी बाबा की और उफ़ ये घर तोडू औरते |
जी उनकी हिमाकत यही नहीं रुकी मिस्टर नारायण ने पार्टी दी उनका बेटा आस्ट्रेलिया जा रहा था पढ़ने के लिए सभी वहा गये वो भी गई और कहने लगी वहा नारायण जी आप के बच्चे तो बड़े होसियार है भाई इस साल बेटे को आस्ट्रेलिया भेज रहे है अगले साल लड़की भी ग्रेजुएशन कर लेगी उसे कहा भेज रहे है पढ़ने के लिए | नारायण जी ने कहा नहीं भाई बेटी को नहीं भेज रहा हुं लड़की है आप समझ सकती है थोड़ा सुरक्षा का मामला है तो कहने लगी की नारायण जी आप बेटा बेटी में इतना फर्क करते है बेटी कि इतनी चिंता आप को बेटे की जरा भी फ़िक्र नहीं है रोज टीवी पर आस्ट्रेलिया से भारतीय छात्रों के पीटने की खबर आ रही है आप को उससे डर नहीं लगता है | लो जी लगा दी आग नारायण जी के घर में वो दिन है और आज का दिन उनकी बेटी ने जब से ये बात सुनी है तब से ज़िद पर अड़ी है की पाप मैं तो भईया से ज्यादा पढ़ने में तेज हुं मुझे भी आगे पढ़ाई के लिए बाहर जाना है और नारायण जी उसे जाने नहीं दे रहे है भंग हो गई घर की शांति | अब आप ही बोलो की लड़कियों की पढ़ाई में कोई इतने पैसे खर्च करता है क्या अरे उनको तो फिर ससुराल चले जाना है उनकी पढ़ाई माँ बाप के क्या काम आयेगा बेटा पढ़ेगा कुछ अच्छा बनेगा उनके बुढ़ापे का सहारा बनेगा आज इन्वेस्ट किया है कल वही कमाई बनेगा | फिर ये भी तो डर रहता है कि लड़कियों को बाहर भेजो तो उनको कुछ ज्यादा ही पर निकल आते है बाहर पढ़ने को भेजा तो क्या पता वहा से किसी थॉमस पीटर को लेकर चली आवे का इज़्ज़त रह जाएगी नारायण जी की | पर उन नारीवादी को ये बात समझ आये तब ना उफ़ ये घर तोडू औरते |
 हद करती है राय साहब के बेटी की तो शादी ही तोड़ दी हुआ ये की लड़के वालो ने कुछ भी नहीं मागा था बड़े भले लोग थे राय साहब तारीफ करते नहीं थक रहे थे  राय साहब काफी पैसे वाले थे सब जानते थे सो लड़के वालो ने कह दिया की बेटी की ख़ुशी के लिए जो देना है आप खुद ही दे दे  | लड़का बैंगलोर  (बैंगलुरू)  में साफ्टवेयर इंजीनियर था उन्हें जा कर बोल आई की भाई पैसे दे रहे हो अच्छा कर रहे हो बेटी का भी पिता के धन पर हक़ बनता है आप के पास है तो अवश्य उसकी खुशी के लिए दे ऐसा करे की अपनी बेटी के नाम पैसे डाल दे बैंगलोर जाएगी तो वही पर अपने घर गृहस्थी का समान ले लेगी फैशन डिज़ाइनिंग का कोर्स किया है अपना बुटिक खोल लेगी एक अनजान शहर में वो कहा पैसों के लिए भाग दौड़ करेगी | राय साहब की मति मारी गई थी और उनकी बात मान ली शादी के चार दिन पहले जब लड़कों वालो के हाथ कुछ नहीं आया और उन्हें पता चला की सारा पैसा लड़की के नाम है तो उन्होंने शादी ही तोड़ दी | अब बोलो तो "आप को जो देना है खुद ही दे दो हमारे पास तो भगवान का दिया सब कुछ है" अरे ये सब बाते तो कहने के लिए होती है मानने के लिए नहीं | बिना लड़के वालो को कुछ मिले शादी संभव है क्या लड़के को पढ़ाने लिखाने में इतना खर्च किया है माँ बाप ने क्या उसको नहीं वसूलेंगे | अग्रवाल जी की लड़की को तो थाने तक ले कर चली गई हुआ ये की बेचारे के दामाद को बिज़नेस के लिए पैसे चाहिए था सो पत्नी को भेज दिया मायके की जाओ पापा से पैसे ले कर आना उसे ससुराल नहीं आने दे रहे थे | अग्रवाल जी को लेकर थाने चली गई और दामाद के खिलाफ रपट लिखा दी कि पैसे के लिए पत्नी को पिटता है और अब उसे साथ नहीं रख रहा है | तोड़ दिया एक और घर अग्रवाल जी को दे देने थे पैसे बेटी का घर बसा रहे ये ज़रुरी नहीं था और बेटी भी मार खा के चली आई ये नहीं कि मार सह कर भी अपना घर बचाती | कौन समझाये इनको उफ़ ये घर तोडू औरते |
आप बताइये की एक नारी के जीवन में उसके घर गृहस्थी पति परिवार से भी बड़ा कोई होता है अरे भगवान ने उसे बनाया ही इसीलिए है की वो सारा जीवन दूसरों की देखभाल करे उनकी सेवा करे क्या और कोई जीवन है उनका | पति उनका परमेश्वर होता है सारा जीवन उनके चरणों में गुजार देना चाहिए कभी कदार यदि उसको गुस्सा आये और पत्नी को पिट दे तो उसका प्यार समझ कर ग्रहण कर लेना चाहिए और कुछ नहीं कहना चाहिए पर इनको देखो वर्मा जी अपनी पत्नी को पिटते थे उनके बीच में कूद पड़ी अरे भाई ये उनके परिवार का आपस का मसला है जब वर्मा जी के बड़े भाई भाभी और पिता जी माता जी कुछ नहीं कर रहे है तो आप को पति पत्नी के बीच जाने की क्या जरुरत है कभी कदार पति ने पिट दिया तो क्या हुआ आखिर प्यार भी तो करता है एक दो झापड़ खा लेने में क्या बुराई है मुझे तो सारी गलती औरतों की ही लगाती है क्या जरुरत है पति से झगड़ा करने की चुप चाप वो जो कहे गाली दे सुन लेना चाहिए ज्यादा बोलेंगी तो मार तो खायेंगी ही ना | चुप रहेंगी तो दो झापड़ में पति शांत हो जायेगा और कुछ देर में भूल जायेगा आप भी भूल जाइये | पर ये समझती नहीं है उफ़ ये घर तोडू औरते |
एक नारी तो अपना अस्तित्व खो कर ही सही जीवन पाती है उसका काम तो बस बच्चे पैदा करना उसे अच्छे संस्कार देना और उनका पालन पोसन करना है | जब तक कोई स्त्री प्रसव आनंद सह कर किसी पुत्र को नया जीवन नहीं देती है वो संपूर्ण  नहीं होती है | पर ये निकल पड़ी है कि बेटियों की भी पहचान होनी चाहिए उनका भी नाम होना चाहिए उनका अपना अस्तित्व होना चाहिए उनको भी घर से बाहर निकल कर काम करना चाहिए का नारा लेकर | एक ज्ञानी ने हमें बताया है देश में महिलाओ के खिलाफ अपराध इसी के कारण बढ़ गये है क्योंकि वो घर से बाहर निकल रही है | सीधा हिसाब है की जब वो घर के बाहर निकलेंगी ही नहीं तो उनके खिलाफ कोई अपराध होगा ही नहीं ना | चुपचाप घर में बैठिये ना, किसने कहा है घर से बाहर जाने के लिए |  पहले घर से बाहर निकल कर पुरुषों को उकसायेंगी  फिर जब वो कुछ कर देगा तो तमाशा खड़ा कर देंगी |   दोष तो महिलाओ का है आप गई ही क्यों उसके सामने ना आप उसके सामने जा कर उसे उकसाती ना वो  कुछ करता उसमे उस बेचारे का क्या दोष है | पर ये मानती कहा है उफ़ ये घर तोडू औरते |
अरे इन्होंने तो कामवालियों तक के घर नहीं छोड़े उसे भी तोड़ डाला वो कामवाली भी बेवकूफ़ एक दिन रोते हुए इनके पास चली आई कहने लगी की जो कमाती है वो सब पति छीन लेता है और अपनी मर्ज़ी से उसे खर्च करता है शराब जुए में उड़ा देता है बच्चों के फ़ीस के पैसे नहीं है | लो जी चली गई उसके घर और उसके पति को धमका आई की आज के बाद यदि उसने पैसे छीने तो उसकी शिकायत पुलिस से कर देंगी और उसे छोड़ आया वहा जी वही जहा शराब वराब छुड़ाने है | क्या किया क्या जाये इनका इनको इतनी भी समझ नहीं है की जब अपना सब कुछ पति का है तो क्या पैसा उसका नहीं है आखिर कोई महिला कमाती ही क्यों है इसीलिए ना की पति के साथ खर्च में हाथ बटा सके जब बेचारे पति के शराब जुए का खर्च कम पड़ेगा तो पत्नी से नहीं लेगा तो किससे लेगा | आखिर एक नारी का धर्म ही क्या है अब जा कर जाना है की पुरुषों को खुश रखना तभी तो वो अपने पत्नी माँ या बेटी बहन को खुश कर सकते है वो दुखी रहेंगे तो सभी को दुखी करेंगे | पर उफ़ इन घर तोडू औरतों को क्या पता |
 याद करीये हमारी सभ्यता हमारी संस्कृति को कैसे नारिया अपना सर्वस्त्र निक्षावर करके भी अपना घर बचाती थी |  भले पति पिट पिट कर मार डाले ससुराल वाले दहेज़ के लिए जला दे पर कभी मायके वापस नहीं आती थी अपना घर नहीं तोड़ती थी | माँ की वो सिख नहीं भूलती थी की बेटी जिस ससुराल में तेरी डोली जा रही है वही से तेरी अर्थी निकलनी चाहिए | पर आज इन नारी वादियों के कारण लोगो के घर टूट रहे है ये नारियो को बिगाड़ रही है हमारी संस्कृति का ख़राब करके रख दिया है | इनकी इन हरकतों से तो सीता माता भी दुखी है |
खुद इनको तो सब कुछ  मिल गया है एक समझदार पति दो प्यारी बेटिया सम्मान और प्यार करने वाले सास ससुर समाज में नाम और पहचान खुद का घर तो ये खूब संभालती है पर दूसरों का घर तोड़ती है | उफ़ ये घर तोडू औरते |
कल आई थी मैडम जी मेरे पास सबकी खबर सुनाने कहने लगी " आज कल दिन ठीक नहीं चल रहे है तलवार जी के कुल के चिराग उनके बेटे ने उन्हें घर अपने नाम करके घर से निकल दिया है बेचारे बेटी के पास रह रहे है | नारायण जी का बेटा वही आस्ट्रेलिया में ही बस गया है पर वो किसी को बताते नहीं क्या बताये किसी के साथ रहता है किसी थॉमस के साथ हा बेटी बड़ी अच्छी पोस्ट पर पहुँच गई है सीना फूला कर सबको बताते है | राय साहब की बेटी की शादी उसी लड़के के साथ हो गई है | लड़के ने अपने घर वालो की मर्ज़ी के खिलाफ शादी कर ली | अग्रवाल जी की बेटी का तलाक हो गया है उसकी भी दूसरी शादी तय हो गई है | वर्मा जी तो पुलिस की एक झाड़ के बाद ही सुधर गए | कामवाली के पति की भी शराब जुए की लत छूट गई है अब ढंग से काम करता है कही | " अपनी झूठी वाह वही करके मैडम जी चलती बनी | पर जो भी हो वो है तो घर तोडू औरत ही |  
    

October 10, 2010

आइये तनाव मुक्त हो कर मज़ाक उडाये इनका - - - - - - - - mangopeople


                                    राजनिती  का  ड्रामा 
                           मेल ऑफ़ दी विक ...............नाटक 
                 राहुल गाँधी ने ये सारा काम किया बस एक घंटे  
                वो भी मीडिया के सामने ये करके उन्हें क्या मिला 
               यदि आप वास्तव में हमारे भारत को बदलना चाहते है 
               तो हमें कुछ भी दिखाने की जरुरत नहीं है आप    
                वास्तव में कुछ कार्य हम खुद आप के पीछे चलेंगे 
                         
                                  करूणानिधि की भूख हड़ताल 
                    दुनिया के इतिहास में यह पहली बार हुआ जब 
                    कोई भूख हड़ताल सिर्फ चार घंटे चली वो भी सारी 
                     सुख सुविधाओं के साथ ये भूख हड़ताल ब्रेकफास्ट 
                    के बाद शुरू हुआ और लंच के पहले ख़त्म हो गया
                                          बोलिये है ना मजेदार 

बंद कीजिये ये सब और एक परिपक्त भारतीय बनिये

    आज कल ब्लॉग जगत में काफी गंभीर बहस चल रही है अब तो मज़ाक पर भी बहस हो रही है की मज़ाक किस पर किया जाये लोग तय नहीं कर पा रहे है मेरी गारंटी है देश के वर्तमान नेता ही एक मात्र ऐसे लोग है जिन पर किया गया मज़ाक और उनकी टाँग खिचाई से  किसी को भी आपत्ति नहीं होगी सब इसका बिना किसी तनाव के मजे ले सकते है और एक सुर में सभी उनका मज़ाक उड़ा सकते है | शुरुआत मैंने की है आइये हाथ बढाइये जितना चाहे दिल खोल कर इनका मज़ाक उड़ाइए और और तनाव मुक्त हो जाइये |

फोटो  ऊपर की सूचना ई -मेल से प्राप्त है | 













October 05, 2010

क्या हमारे सिस्टम की ये लापरवाही माफ़ी के लायक है - - - - - -mangopeople

आज सुबह नव भारत टाइम्स में एक खबर बढ़ी पढ़ कर जितना दुख हुआ उतना ही गुस्सा आया देश की व्यवस्था पर | मुंबई में एक व्यक्ति एक्सीडेंट के बाद ब्रेन डेड हो गया उसकी पत्नी ने इस दुख की घड़ी में भी अपने दुःख को एक तरफ रख अपने पति के अंग दान करने की सोची तो उसे पुलिस से एन ओ सी लाने को कहा गया पहले तो उन्हें दो पुलिस स्टेशन के बीच दौड़ाया गया फिर उससे कहा गया की अभी तो उसके पति की सांसे चल रही है वो क्यों उसको मार रही है बेचारी घबरा कर अस्पताल आ गई वहा पर फिर से उनकी काउंसलिंग करके मनाया गया तो इस बार पुलिस ने कहा दिया की उसे अंग दान के कानून के बारे में जानकारी नहीं है | इस पर उस अस्पताल ने दूसरे अस्पताल से कमिश्नर के आदेश की वो कापी मगाई जिसमे कहा गया है ऐसे मामलों में पुलिस खुद अस्पताल में आ कर कार्यवाही करे तब तक रात हो चुकी थी फिर भी वो महिला तीन चक्कर लगने के बाद भी आदेश की कॉपी ले कर वापस पुलिस स्टेशन गई जहा पर उससे कहा दिया गया की पुलिस  गणपति के ड्यूटी में व्यस्त है और तब तक उसके पति के अंग ख़राब हो चुके थे और उसने भी हार मान लिया कुछ घंटो बाद उसके पति की मौत हो गई  | अब आप बताइये की इस तरह की लापरवाही माफ़ करने लायक है सोचिये उन तीन लोगों के बारे में जो जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे जिन्हें अंग प्रत्यार्पित करने के लिए तैयार कर लिया गया लेकिन रात होते होते उनको फिर से एक नया जीवन मिलने का मौका हाथ से चला गया | उन तीनों लोगों और उनके परिवार पर क्या गुज़री होगी | क्या पुलिस और हमारी ये व्यवस्था इतनी असंवेदनशील हो गई है क्या उन पुलिस वालो को मामले की गंभीरता और जरुरत की जरा भी समझ नहीं थी | इस मामले में अस्पताल भी कम दोषी नहीं है कहने को तो वो अस्पताल मुंबई का काफी नामी प्राइवेट अस्पताल है क्या उसकी ज़िम्मेदारी नहीं थी की सारी कागजी कार्यवाही वो खुद करे ना की उस महिला को भाग दौड़ करने के लिए भेजे जो महज ३५ साल की आयु में अपने पति को मरते हुए देख रही थी | मैं तो उस महिला के हिम्मत की दाग दूंगी जो खुद पर आये इतने बड़े दुःख को भुला कर इतना नेक काम करने का प्रयास कर रही थी पर उसके सारे प्रयास सिस्टम की लापरवाही के कारण बेकार हो गये और बेकार हो गई तीन लोगों को फिर से जीवन मिलने की आस जो उसके पति के अंगों से फिर से जीवन पाने वाले थे | 
   अखबार के मुताबिक अकेले मुंबई में १५०० लोग किडनी और ६५ लोग लीवर के इंतजार में है | पूरे देश में कितने होंगे हम अंदाजा लगा सकते है | हमारे देश में अंग दान को ले कर वैसे ही कई भ्रान्तिया है अंग दान करने वालो की संख्या बहुत ही कम है उस पर से यदि जो देने के बारे में सोचे  उसके साथ इस तरह का व्यवहार हो तो वो इन्सान निराश होगा ही  दूसरों पर भी  इसका बुरा असर होगा | इस तरह की घटना को सुन कर तो कोई भी यही कहेगा की कौन इस झंझट में फसेगा | इस तरह के नेक कामों को तो और सहूलियत भरा बनना चाहिए ताकि और भी लोग प्रोत्साहित हो पर क्या कहा जाये हमारे देश की व्यवस्था को जहा पुलिस को कानून की जानकारी नहीं होती है उसे किसी काम की प्राथमिकता की समझ नहीं होती है या ये कहु की पुलिस है ही इतना असंवेदनशील की उसे किसी के जीवन और मौत से फर्क ही नहीं पड़ता है | अब इस केस के सामने आने के बाद तो लगता है की ना जाने ऐसा कितने लोगों के साथ ऐसा हुआ होगा और लोग चाह कर भी ये नेक काम नहीं कर पाये होंगे |  क्या हम कभी भी सरकारी काम में कागजी कार्यवाही के जंजाल से बाहर आ पाएंगे | क्या कभी भी और किसी भी मामले पर हमारी ये देशी व्यवस्था सुधरेगी या थोड़ी भी गंभीरता दिखायेगी |


 

September 29, 2010

उफ़ ये सरकारी दहशत - - - - - - - mangopeople

अपनी बेटी को स्कूल छोड़ने गई तो एक अजीब सी दहशत सबके चेहरे पर थी और एक सवाल " कल अपनी बच्ची को स्कूल भेज रही हो क्या मैं तो नही भेज रही हुं " सबके चेहरे पे व्याप्त दहशत की लकीरें और सवालों ने मुझे भी डरा दिया जो अब तक नहीं था | कुछ नहीं होगा का नारा जो मैं अब तक लगा रही थी अब मेरा ही विश्वास उस पर से उठ गया है अब तो लग रहा है की जैसे वास्तव में कुछ होने वाला है | सही स्थिति जानने के लिए जब कोई न्यूज़ चैनल देख रही हुं ( शायद यही मेरी बेवकूफी है ) तो वह और भी डरा रहा है | पूरा देश हाई एलर्ट ,३२ शहर और चार राज्य संवेदनशील घोषित चारों तरफ सुरक्षा व्यवस्था चाक चौबंद हो गई है सेना को भी एलर्ट कर दिया गया है कही गड़बड़ी होने पर वहा पर दस मिनट में सुरक्षा कर्मी पहुँच जायेंगे सरकार की अपील की शांति बनाये रखे और ख़ुशियाँ ना मनाये | मानव रहित विमान और मिग भी सुरक्षा के लिए तैनात है वायु सेना और थल सेना दोनों मिल कर काम कर रहे है ये कामनवेल्थ की सुरक्षा से जुड़ीं खबर है पर एक साथ ये खबर दिखाने से पूरा घालमेल हो जा रहा है  इतनी सारी ख़बरे सुनने के बाद तो डर और भी बढ़ गया जब सरकार ही माने बैठी है की कुछ होने वाला है तो हम कौन होते है ये सोचने वाले की कुछ नहीं होने वाला है | इस तरह की ख़बरे जब टीवी चैनलों द्वारा सरकारें फैलाती है तो उससे आम आदमी का डर कम नहीं होता है बल्कि उसे और डरा देती है | अरे सरकार को कोई सुरक्षा व्यवस्था करनी है तो वो चुप चाप कर सकती है उसके लिए इतना शोर मचाने की क्या आवश्यकता है | अगर वो ये समझती है कि इस तरह की ख़बरे फैला कर वो किसी दंगाई गुंडे मवाली या गड़बड़ी फ़ैलाने वाले को रोक सकती है या डरा सकती है तो मैं इसको उनका भोलापन ही कहूँगी इन खबरों से दंगाई या गड़बड़ी फ़ैलाने वाले नहीं आम लोग डरते है | उनको तो जो करना है और जब करना है कर ही लेंगे उनको सुरक्षा बलों का डर नहीं होता है जो होता तो शायद दुनिया में कही भी कोई अपराध नहीं होता | इस तरीके से तो आप उनको और सावधान कर रहे है और अपनी रणनीति ठीक से बनाने का मौका दे रहे है वरना ये बताने की जरुरत ही क्या है कि कहा कितने सुरक्षा कर्मी होंगे कहा क्या सुरक्षा व्यवस्था है | सरकार ने तो सीधे कहा दिया है की अंशु जी आप का शहर और राज्य दोनों ही संवेदनशील है अब आप ही बताइए की जब सरकार ही ऐसी बात कहेगी खुले आम तो क्या है मुझ में हिम्मत की अपनी छोटी सी बच्ची को सात किलोमीटर दूर उसके स्कूल भेज दू कल | मैंने तो अपने पति को भी आज हिदायत दे दी की कल यदि जरुरत नहीं है तो आँफिस से छुट्टी ही ले लो या कम से कम उन क्षेत्रो में मत जाना जहा एक समुदाय के ज्यादा लोग रहते है या जहा पर एक राजनीतिक पार्टी का ज्यादा दबदबा है  हमारा शहर राज्य दोनों संवेदनशील है | इस संवेदनशील शहर के किसी संवेदन शील इन्सान की संवेदना को कही फैसले से चोट लगी तो पता नहीं वह असंवेदना दिखाते हुए किस किस को कितनी चोट पहुचायेगा |
जो सरकार को आम लोगों की चिंता होती उनके सुरक्षा की चिंता होती तो मीडिया के साथ मिल कर इस तरह की दहशत फैलाने की जगह अपना ख़ुफ़िया तंत्र मजबूत करती उनको काम पर लगाती और अंदर ही अंदर उन लोगों का पता करवाती जो इस तरह के मनसूबे बना रहे है और उन्हें अंजाम तक पहुँचाने से पहले ही पकड़ती | जो कल किसी ने फैसले के बाद ख़ुशियाँ मनानी शुरू कर दी या किसी ने कोई गड़बड़ी की उसके बाद उसे रोकने का क्या फायदा क्योंकि एक बार किसी की की गई ये हरकत और लोगों को भी ऐसा करने का बढ़ावा देगी | आप सिर्फ बल्क एस एम एस भेजने पर रोक लगा कर ये सोच रहे है कि आज की संचार क्रांति के युग में खबरों को फैलने से रोक लेंगे तो ये आप की नादानी ही है |
        शायद सरकार को मालूम ही नहीं है कि इस तरह के मामलों से कैसे निपटा जाता है या कही ऐसा तो नहीं की सरकार जानबूझ के ये ख़बरे लोगों में फैला रही है ताकि लोगों का और मीडिया का भी इस समय किसी और मुद्दे से ध्यान हट जाये कामनवेल्थ से जुड़े घपलो की तरफ से | जिस तरह महँगाई के मुद्दे को कामनवेल्थ के घपलो की खबरों ने खा लिया उसी तरह अयोध्या पर आ रहे फैसले के मुद्दे को इस तरह उछालो की लोग घपलो को भूल जाये | इससे अच्छा मामला और क्या होगा जिसमे सरकार कोई पक्ष नहीं है और उससे कोई सवाल भी नहीं करेगा और ना ही उसको घेरेगा और न्यायलय के खिलाफ कोई कुछ बोल नहीं सकता है | जो कही कोई गड़बड़ी हुई भी तो उसमे सरकार का कोई दोष नहीं निकल पायेगा जो बड़ी गड़बड़ी हो गई तो देखा जायेगा पर कम से कम कामनवेल्थ में फसी गर्दन तो बाहर आ जाएगी | वैसे भी हमारी सरकारें फौरी इलाज में विश्वास करती आई है बाद में आये परिणाम से बाद में निपट लेंगे |
वैसे इन सारी सुरक्षा व्यवस्था का क्या मतलब है सरकार के लिए और वो उस पर कितना भरोसा करती है वो कल आये शीला दीक्षित के बयान से जाहिर हो जाता है जब वह बाहर से आये खिलाड़ियों और अधिकारियों को ये कह रही है की यदि उनके समान चोरी हो रहे है तो वो अपने कमरों का दरवाज़ा बंद करके जायेस्वदेशियो को तो इन सब की आदत है |
 वैसे आप बताइये की सरकार द्वारा घोषित संवेदनशील राज्य की निवासी मैं कल अपनी बेटी को स्कूल ले जाऊ की नहीं |

September 24, 2010

क्या आप इस टेस्ट को पास कर सकते है - - - - - - -mangopeople

एक  मजेदार ई मेल पर नजर पड़ी सोचा आप लोगों के साथ शेयर कर लू |



इस टेस्ट को पास करीये  मेरी तरफ से शुभकामनये 

एक छोटा  Neurological टेस्ट 

समय २० सेकेण्ड हर एक के लिए


1- नीचे दिए चित्र में c खोजिये पर हा कर्सर का प्रयोग मत कीजिये

OOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOO
OOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOO
OOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOO
OOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOO
OOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOO
OOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOO
OOOOOOOOOOOOOOOOOOOCOOOOOOOOOOO
OOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOO
OOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOO
OOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOO
OOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOO


 

2- आप ने c  खोज लिया है तो अब जरा इनमे से 6 खोज कर बताइये पर कर्सर प्रयोग मत कीजिये

99999999999999999999999999999999999999999999999
99999999999999999999999999999999999999999999999
99999999999999999999999999999999999999999999999
69999999999999999999999999999999999999999999999
99999999999999999999999999999999999999999999999
99999999999999999999999999999999999999999999999


 

3 - और अब जरा N खोज कर बताइये थोडा मुश्किल है ना

MMMMMMMMMMMMMMMMMMMMMMMMMMMMNMM
MMMMMMMMMMMMMMMMMMMMMMMMMMMMMMM
MMMMMMMMMMMMMMMMMMMMMMMMMMMMMMM
MMMMMMMMMMMMMMMMMMMMMMMMMMMMMMM
MMMMMMMMMMMMMMMMMMMMMMMMMMMMMMM


 यह मजाक नहीं है यदि आप ने यदि आप ने ये तीन टेस्ट पास कर लिया है तो आप को अपने न्यूरोलाजिस्ट के पास जाने की आवश्यकता नहीं है |  Your brain is great and you're far from having a close
  relationship with Alzheimer.  

बधाई हो
 
हा एक टेस्ट और दीजिये ....
 
  44 th  अमेरिकन राष्ट्रपति को ढूंढ़ कर बताइये 
 


चलिए ढूंढ़ लिया बधाई हो आप  colour blind भी नहीं है !




To my 'selected' strange-minded friends: 




This is weird, but interesting!

If you can raed this, you have a sgtrane mnid too

Can you raed this? Olny 55 plepoe out of 100 can.

I cdnuolt blveiee that I cluod aulaclty uesdnatnrd what I was rdanieg. The phaonmneal pweor of the hmuan mnid, aoccdrnig to a rscheearch at Cmabrigde Uinervtisy, it dseno't mtaetr in what oerdr the ltteres in a word are, the olny iproamtnt tihng is that the frsit and last ltteer be in the rghit pclae. The rset can be a taotl mses and you can still raed it whotuit a pboerlm. This is bcuseae the huamn mnid deos not raed ervey lteter by istlef, but the word as a wlohe. Azanmig huh? Yaeh and I awlyas tghuhot slpeling was ipmorantt! 


है  ना मजेदार बोलिये कैसा लगा

September 22, 2010

क्या संस्कारो के नाम पर बच्चो के साथ ये दूरी ठीक है - - - - - - mangopeople

टीवी पर ये खबर देख कर काफी दुख हुआ की बच्चों को स्कूल ले कर जाने वाला कैब ड्राइवर लम्बे समय से बच्चों का रेप कर  रहा था और माँ बाप को इस बात की जानकारी ही नहीं हुई की उनके तीन बच्चों के साथ ये सब हो रहा है | माँ को तब पता चला जब उन्होंने बच्चों के शरीर पर इंजेक्शन का निशान देखा | इस बात पर आश्चर्य होता है की तीनों बच्चों में से किसी ने भी इस बात की जानकारी कभी भी अपने घर पर नहीं दी | सोचिये की अक्सर बच्चे अपने साथ होने वाली ज्यादातर घटना अपने घर आ कर बताते है की आज मैं गिर गया मुझे चोट आई मुझे उसने मारा मुझे उसने गाली दी आदि आदि फिर क्या वजह थी की बच्चों ने इतनी बड़ी घटना अपने घर पर नहीं बताई | सिर्फ इस मामले में नहीं कई और मामले में भी छोटे बच्चों के साथ ही कई बार बड़े बच्चे भी अपने साथ होने वाली इस तरह की घटना के बारे में या किसी तरह के शारीरिक शोषण के बारे में अपने घर में बताने से बचते है या तब बताते है जब काफी देर हो चुकी होती है | आखिर इसकी वजह क्या है एक कारण तो ये है की ऐसा करने वाला उनको डरता धमकता है और किसी को ना बताने के लिए कहता है पर इससे बड़ा कारण मुझे लगता है ये है कि भारत में संस्कार के नाम पर खास कर माध्यम और निम्न वर्ग अपने और अपने बच्चों के बीच इस मामले में इतनी मोटी दीवार खड़ा कर लेता है जिसे बच्चे पार नहीं कर पाते है | जैसे ही बच्चों के सेक्स एजुकेशन की बात आती है लोग अपना मुँह बनाने लगते है संस्कारो की दुहाई देने लगते है जिसके अनुसार बच्चों को अपने परिवार से, बड़ों या ये कहे की किसी से भी सेक्स जैसे मुद्दों पर बात नहीं करनी चाहिए और इसे पश्चिमी गन्दगी करार दे देते है | मुझे लगता है की शायद वो ना तो इसका मतलब समझते है और ना इसकी ज़रूरतों को | कई बार तो जब बच्चे इस बारे में बड़ों को बताते है तो उनकी बातो को गंभीरता से लिया ही नहीं जाता है ये सोच लिया जाता है की किसी ने बच्चे से मज़ाक किया होगा और बच्चे ने कुछ गलत ही सोच लिया और कई बार तो उनकी ही गलती निकल दी जाती है खास कर लड़कियों के मामले में जैसे की लड़की ने घर पर आ कर कहा की किसी ने उसी परेशान किया छेड़ा या कमेन्ट पास किया तो सबसे पहले का दिया जाता है की उस तरफ गई ही क्यों ,या कितनी बार कहा है की बे वजह घर से मत निकला करो ,या तुने ही कुछ किया होगा किसी और के साथ तो ये नहीं होता है आदि | इससे होता ये है की अगली बार बच्चे के साथ कुछ होता है तो वो घर पर बताने से डरने लगता है की उसे ही डाट पड़ेगी या सब उसका मज़ाक उड़ायेंगे या उसका घर से निकलना बंद हो जायेगा |
ऐसा नहीं है की हमारी परंपरा में इस तरह के किसी शिक्षा की बात है ही नहीं बच्चों के बड़े होते ही खास कर लड़कियों के मासिक धर्म शुरू होते ही घर की बूढ़ी महिलाएँ बच्ची की माँ से कह देती थी की बच्ची बड़ी हो गई है उसे गलत सही की जानकरी दे दो | ये गलत सही की जानकारी सेक्स एजुकेशन ही होती है पर शायद उतने खुले और बड़े रूप में नहीं पर कुछ जानकरी अपने शरीर में हो रहे परिवर्तन के बारे और इस बारे में की उनको कैसे अपने आप को सुरक्षित रखना है जो काफी सतही होता था | पर आज सिर्फ इतनी जानकारी से काम नहीं बनेगा और ना ही बच्चों के बड़े होने तक रुकने का समय है | अब आप को लगेगा की एक चार पांच साल के बच्चे को इस बारे में कैसे बता सकते है या उसको हम क्या ज्ञान दे सकते है इस बारे में तो मुझे लगता है की सबसे पहले तो अपने बच्चों को बताये उन स्पर्श का अंतर जो आप उसको करते है और जो कोई दूसरा किसी गलत नियत से करता है | वैसे ही जैसे हम उनको बताते है की उसे किसी अजनबी से बात नहीं करनी चाहिए उसके साथ कही नहीं जाना चाहिए और उनकी दी चीजें कभी नहीं खानी चाहिए उसी तरह उन्हें ये बताये  की उन्हें भी कभी किसी और को अपना शरीर को हाथ  नहीं लगाने देना चाहिए खासकर उनके निजी अंगों को या कोई भी ऐसा करता है तो तुरंत ही आ कर घर पर बताये | इससे कम से कम वो अपने साथ होने वाले किसी दुर्व्यवहार को तुरंत आ कर घर पर बताएगा डरेगा या हिचकेगा नहीं और हम उसे वही रोक सकते है | भारतीय सभ्यता और संस्कार के नाम पर जो बच्चों से इस बारे में दूरी बनाई जा रही है उसे कम से कम इतना तो कम कर देना चाहिए की हमारे बच्चे हमसे कुछ भी कहने या पूछने से डरे नहीं |
  मुझे तो लगता है की इस बारे में बच्चों के छोटे छोटे सवालों के जवाब परिवार को ज़रुर देना चाहिए जो अक्सर वो फ़िल्मे टीवी देख कर पूछते है वो भी बिना किसी हिचक के इससे होगा ये की एक तो बच्चे की जिज्ञासा समाप्त हो जाएगी और किसी गलत जगह से कुछ बे मतलब के ज्ञान लेने से बच जायेगा | अगर आप उसके दस में से पांच सवालों के जवाब भी दे देते है तो बाकी पांच सवाल जो उसको समझने लायक नहीं है उसे आप ये कह कर टाल भी सकते है की जब आप बड़े हो जायेंगे तो उनका जवाब समझ पाएंगे तो बच्चा खुद ही शांत हो जायेगा | अब कहने वाले कहेंगे कि देखा ये हमारे संस्कार ना मानने का नतीजा है या धर्म के अनुसार ना चलने का नतीजा है ब्ला ब्ला ब्ला जमाना इसी कारण ख़राब हो गाय है तो मुझे लगता है कि अब इसके लिए हम क्या कर सकते है ये तो ख़राब हो ही चूका है हम इसको तो नहीं सुधार सकते है पर अपने बच्चो की सुरक्षा के लिए जो हमें करना चाहिए और जो हम कर सकते है  वो तो करेंगे ही मतलब की उसे तो समझाना ही पड़ेगा की वो कैसे इस ख़राब जमाने में खुद को सुरक्षित रख सकता है  भले इसके लिए एक और संस्कार को छोड़ना पड़े |
पर ये सब तो उनके लिए है जो माँ बाप समझदार है जो उनके सवालों के जवाब दे सकते है पर हमारे देश में एक बड़ी संख्या ऐसे माँ बाप की है जो जानते ही नहीं की वो बच्चों को बताये क्या या कम पढ़े लिखे है | इसके लिए तो मुझे लगता है की सरकार और स्कूलों को ही इस बारे में पहल करनी चाहिए पता नहीं वो क्यों इसको शुरू करने में डर रहे है | शायद ये डर भारतीय सभ्यता संस्कृति के रक्षकों का है | मेरा ज्ञान अपनी संस्कृति के बारे में काफी छोटा है मुझे पता ही नहीं था की " काम सूत्र " स्पेनिश में लिखा गया था और " खजुराहो " से ले कर अनेक प्राचीन मंदिर किसी पश्चिमी देश से इम्पोर्ट किये गये थे ..............

नोट -----------मै इस विषय की बड़ी जानकार नहीं हु एक आम और निजी विचार है लेख में और सुधार संभव है आप अपने विचार देकर इसे पूरा कर सकते है |

September 18, 2010

कही आपकी श्रद्धा किसी की मुसीबत ना बन जाये - - - - - - - mangopeople

सात वार और नौ त्यौहारों के हमारा देश में हर तीज त्यौहार को मनाने का उत्साह एक जैसा ही होता है क्या होली क्या गणपति पूजा क्या दुर्गा पूजा और क्या दीवाली सभी त्यौहार बड़े धूम धाम और बड़े शोर गुल जी हा शोर गुल के साथ मनाया जाता है बिना इस बात की फ़िक्र करे की इससे किसी और को परेशानी हो सकती है | पूजा पंडालो में बजता तेज संगीत हो या मूर्तियों के आगमन और विसर्जन के समय बजता ढोल नगाड़ा या पटाखों का शोर या घंटो सड़क पर नाच नाच कर उसको जाम करना हो सब कुछ बिना किसी चिंता बिना किसी फ़िक्र के दिल खोल कर बजाया और किया जाता है | एक सामान्य आदमी तो इसे श्रद्धा के कारण सह भी ले पर उनका क्या जो बीमार हो जिनकी परीक्षाये हो जिनसे दस दस दिन तक रोज सुबह शाम ये शोर ना बर्दाश्त होता हो जो चैन से सोना चाह रहे हो या जिसके पास श्रद्धा ना हो या किसी और धर्म का हो | अभी हाल ही में मैंने समाचार पत्रों में पढ़ा की किसी ने इस बात पर फतवा लिया है की क्या रोजा रखने वालो को सुबह बार बार मस्जिद से  अजान लगा कर जगाना सही है क्योंकि इससे बीमार लोगों बच्चों और दूसरे धर्म के लोगों को परेशानी होती है | फतवा दिया गया की हा ये गलत है | फतवे के बाद भी क्या इस बात को सभी ने माना, नही | जब लोग कोर्ट के दिए आदेश को भी हर जायज़ - नाजायज तरीके से तोड़ने की कोशिश करते है उससे बचने की कोशिश करते है तो किसी और की वो क्या बात सुनेंगे | फिर कोर्ट ने ये तो कह दिया की रात दस बजे के बाद गाना बजाना मना है और उसके आदेश के कारण दस बजते ही सारे बड़े बड़े स्पीकर बंद हो जाते है पर जो सुबह आठ बजे से बारह बजे तक और शाम को चार बजे से दस बजे तक इन भोपुओ से तेज संगीत बजाय जाता है उसको कैसे रोका जाये और रात दस बजे के बाद विसर्जन के लिए जाती मूर्तियों के साथ होने वाले शोर को कैसे रोका जाये | उस पर से वो कभी कभी तो एक ही जगह रुक कर घंटो नाचना शुरु कर देते है बिना ये सोचे की उनके ऐसा करने से उनके पीछे हजारों लोग जाम में फस जा रहे है जिनमे से कुछ लोग ज़रुरी काम से जा रहे होंगे या कोई बीमार अस्पताल जा रहा होगा | इसी तरह होली के हुड़दंग और दीवाली के पटाखे भी लोगों को परेशान करते है | जब होली के कुछ दिन पहले से ही घर से बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है मुंबई दिल्ली जैसे शहरों में तो नहीं पर उत्तर भारत के छोटे शहरों में कोई भरोसा नहीं होता की कब कौन कहा से आप के ऊपर रंग डाल दे और आप के कपड़े ख़राब होने के बाद कह दे की बुरा न मानो होली है | सबसे ज्यादा मुसीबत लड़कियों और महिलाओ को होती है रंगों के साथ ही हुड़दंगियो से | उसी तरह दसहरे के बाद से दीवाली बीतने के चार दिन बाद तक पटाखों का शोर कान के परदे फाड़ता रहता है |
कुछ लोग यह भी कहते है कि "जी ये तो साल का त्यौहार है कौन सा रोज रोज आने वाला है दो चार दस दिन उत्सव मना भी लिया तो किसी को क्या परेशानी है" | तो मैं आप को सिर्फ अपनी परेशानी बताती हुं | जन्माष्टमी के एक महीने पहले से ही  गोविन्दाओ की टोली तेज तेज गाने बजा कर अभ्यास करती रही जन्माष्टमी बीता फिर गणपति आ गया अब इसमे भी गये बारह दिन भजन सुनते फिर तुरंत ही नवरात्रि आ जाएगी फिर दस दिन गये देवी भजन सुनते या डांडिया पंडालो में बजते फ़िल्मी गानों को, फिर पंद्रह दिन बाद ही पटाखे बजने शुरु हो जायेंगे क्योंकि दीवाली पास होगी और दीवाली के चार दिन बाद तक ये पटाखे बजते रहेंगे | साल का त्यौहार बस एक दो दिन का उत्साह के नाम पर मैं पूरे चार महीने जुलाई अगस्त से अक्तूबर नवंबर तक ये सब हर साल झेलती हुं | एक स्वस्थ , सामान्य इन्सान होने के कारण ये सब झेल लेती हुं पर जो बूढ़े है बच्चे है  बीमार है उनका हाल क्या होता होगा |
क्या भगवान के प्रति श्रद्धा दिखाने या कोई उत्सव या त्यौहार मनाने का बस यही तरीका है | क्या हम थोड़ा और अनुशासित हो कर अपने तीज त्यौहार नहीं मना सकते है | मैं ये नहीं कहती की होली पर रंग ना खेला जाये पर इसे होली को एक दिन और अपने करीबियों तक ही सीमित किया जा सकता है जो नहीं चाहते या जो आप से अजनबी है उन्हें रंगने की जरुरत ही क्या है | क्या दीवाली पर तेज आवाज़ के पटाखे बजाने ज़रुरी है हम रोशनी वाले कम आवाज़ वाले पटाखे बजा कर और दो दिन पटाखे बजा कर भी दीवाली मना सकते है उसके मजे ले सकते है | पूजा पंडालो में इतना तेज और देर तक संगीत बजाने की जरुरत ही क्या है | पूजा पंडालो का मजा तो उसे देखने आये लोगों के उत्साह से है ना की तेज बजते भजनों से | ये भी नहीं कह सकते है की तेज बजते भजन पंडालो के होने की सूचना देता है पंडाल तो खुद में इतने बड़े होते है की कोई भी उसे देख सकता है फिर लाईटो की सजावट तो खुद ही इस उत्साह में बढ़ोतरी करता है | मुंबई में हर साल मैं विसर्जनविसर्जन के दौरान भी देख चुकी हुं | ये श्रद्धा का कौन सा रूप है क्या ये सही है | निश्चित रूप से हमें अपने अराध्य के विसर्जन के समय हमें ख़ुशियाँ मनानी चाहिए पर इसके लिए सारे रास्ते नाचने की क्या आवश्यकता है ये काम हम पंडाल के पास और फिर विसर्जन स्थल के पास भी कर सकते है या फिर चलते  हुए करके |
मुझे याद है की जब मैं छोटी थी तो मुझे भी पटाखे जलाना अच्छा लगता था आवाज़ जितनी तेज होती मजा उतनी ही ज्यादा आता था पर बड़े होने के बाद दूसरों की परेशानी देख कर और इससे होने वाले शोर को देख कर वो सब बुरा लगने लगा और पटाखे जलाने बंद कर दिया अब आप कब बड़े होंगे | 



 

September 14, 2010

आप को क्या लगता है की जुगाड़ सिर्फ भारत का आम आदमी ही करता है जरा इनको देखिये

 





Gotta feed the baby AND do the laundry?
No problem-o!


 No spoon? No problem-o!


 Seatbelt broken?

No problem-o!

New TV too big for the old cabinet?
No problem-o!
Cables falling behind the desk?
No problem-o!

No bottle opener?
No problem-o!
Fuse burnt out?
No problem-o!
Car stereo stolen?
No problem-o!
Can't afford a real GPS?
No problem-o!
 No ice chest?
No problem-o!
Can't read the ATM screen?
No problem-o!
Exhaust pipe dragging?
No problem-o!
Car can't be ordered with the "Woody" option?
No problem-o!
Desk overloaded?
No problem-o!
Tires worm out?
No problem-o!
Might be a little hard to steer.

Display rack falling over?
No problem-o!
What the?
Wiper motor burned out?
No problem-o!
Electric stove broken & can't heat coffee?
No problem-o!
Satellite go out in the rain?
No problem-o!
Car imported from the wrong country?
No problem-o!
Bookshelf cracking under the weight?
No problem-o!
Out of diapers?
No problem-o!
  
ये मुझे ई - मेल से मिला है

September 09, 2010

अल्लाह ने कहा मेरे बंदे ज्यादा मुर्ख है भगवान ने कहा मेरे भक्त ज्यादा मुर्ख है बोलो कौन सही है_- - - - - - mangopeople

अल्लाह अपने पीसी को देख कर जोर जोर से हसे जा रहे थे भगवान से रहा नहीं गया बोले यार क्यों इतने जोर से हसे जा रहे हो मुझे भी बताओ मैं भी थोड़ा हस लू अल्लाह ने कहा ये देखो इस ब्लॉग में क्या लिखा है लिखते है की आओ ईद पर अल्लाह से दुआ करे की फैसला  हमारे पक्ष में हो और उस ज़मीन पर अल्लाह का घर हम बनाये बोलो अब मेरे इतने बुरे दिन आ गये है की जो हमारे दिए घर में रह रहा है वो हमारे लिए कैपेन कर रहा है मुझ पर विश्वास करने वाला ये कितना मुर्ख है तो भगवान ने कहा मुझ  पर विश्वास करने वाला भी कम नहीं है कह रहा था की यदि उस ज़मीन पर मेरे लिए घर बनने का ठेका उसे नहीं मिला तो वो सड़क पर हजारों लोगों को लेकर उतरेगा और आन्दोलन करेगा कमबख्त पीछे मुड़ कर भी नहीं देख रहा है की उसके पीछे तो कोई है ही नहीं | अल्लाह ने कहा मेरे बंदे ज्यादा मुर्ख है मैंने तो उनसे कहा की मुझे याद करना है तो कही भी एक दिशा की और मुँह करके मुझे याद कर लेना काफी है पर वो अड़े है की वो मुझे याद करेंगे तो उसी एक जगह पर भगवान ने कहा नहीं मित्र मेरे भक्तो की मुरखता के आगे तेरे कुछ भी नहीं है मैंने तो कहा था की मैं तो हर दिशा में हुं कण कण में हुं तुम्हारे अंदर भी हुं जहा चाहो जब चाहो जिस अवस्था में चाहो मुझे याद कर सकते हो पर वो भी अड़ा बैठा है की मैं तो पुजूंगा तुमको तो उसी ज़मीन पर | फिर अल्लाह ने कहा नहीं दोस्त मेरे वाले ज्यादा बेवकूफ़ है मैंने तो यहाँ से एक को भेजा था वो वहा जा कर दो बन गये दोनों ही मुझे मानते है पर एक दूसरे के दुश्मन बन बैठे है एक दूसरे को ही मार रहे है हद तो तब हो गई जब एक तरफ उनके ही भाई बंधु बाढ़ में बहे जा रहे है बजाय उनके मदद करने के ये कमबख्त लगे है  दूसरी तरफ एक दूसरे को मारने में | भगवान ने कहा नहीं मेरे भाई मेरे वाले ज्यादा गधे है मैंने भी उनको एक बना कर भेजा था इन्होंने अपने को इतने हिस्सों में बाट लिया है की मुझसे तो गिना भी नहीं जा रहा है जात के नाम पर क्षेत्र के नाम पर भाषा के नाम पर और पता नहीं किस किस नाम पर और लगे है एक दूसरे को नीचा दिखने एक दूसरे की टाँग खींचने एक दूसरे को मारने और भगाने में अब मैं इनका क्या करूँ | अल्लाह ने कहा असल में बंधु ये सब के सब जाहिल और गावर है इनको क्या पता है हमने भी एक बड़ी कंपनी की तरह बाजार में कई तरह के साबुन उतर रखे है ताकि सभी अपनी सहूलियत के हिसाब से हमारी ही कंम्पनी का साबुन प्रयोग करे ग्राहक कही और ना जाये भगवान ने कहा हा यार जिसे दिन में पांच बार नहाने का शौक है उसके लिए अलग साबुन जो दिन में एक बार रोज नहाये उसके लिए अलग साबुन और जो हफ्ते में बस एक बार नहाने में विश्वास रखता है उसके लिए अलग साबुन और ये नालायक एक ही कंपनी के प्रोडक्ट को कह रहे है की मेरी कंपनी का साबुन तुम्हारे कंपनी के साबुन से ज्यादा अच्छा है क्या आपने इनको हमारे प्रोडक्ट का विज्ञापन करने का कांट्रेक्ट दिया है क्या ? नहीं मेरे भाई जान अल्लाह ने कहा हमारा  दिमाग ख़राब है क्या की मैं ऐसा करो जिनको ये भी नहीं मालूम की सभी साबुन में एक ही चीज मिली है और सब के सब साबुन एक ही काम करता है वो है उनके बदन पर जमी गन्दगी साफ करना हर साबुन को हमी दोनों ने मिल कर बनाया है बस नाम अलग अलग दे दिए है भला मैं उनको ऐसा कोई कांट्रेक्ट क्यों दूँगा | भगवान ने कहा वही तो मेरे साथी हमने जब इन नमाकुलो को बनाया था इनकी अच्छी संरचना को देख कर इनको इंसानियत रूपी एक सुन्दर मजबूत और खास खाल दी थी ताकि ये दूसरे प्राणियों से अलग लगे और इनके लिए खास साबुन भी बनाया ताकि ये उस खास खाल की देखभाल अच्छे से कर सके उस पर कोई मैल न बैठने दे उसे हमेशा चमकदार बनाये रखे पर सब के सब साबुन को लेकर उसका विज्ञापन करने में लगे है की मेरा साबुन तुम्हारे साबुन से ज्यादा अच्छा है इससे तन का मैल अच्छे से साफ होगा पर खुद अपने खाल की मैल उससे साफ नहीं कर रहे है | सही कहा महोदय आपने अल्लाह बोले ये सब के सब नहाने का नाटक करते है उस साबुन से नहाते नहीं है देखिये इनकी खाल कितनी गंदी हो गई है मैल की एक इतनी मोटी परत चढ़ चुकी है की हमारी दी खाल अब तो दिखाई भी नहीं दे रही है | तभी तो ये भी हमारे बनाये बाकी जीवों जानवरों की तरह हो गये है चलो जब इनमें से कुछ को इस खाल की जरुरत है नहीं है तो निकल देते है उनके शरीर से ये खाल और पहना देते है जानवरों की खाल उसी के लायक है सब नालायक | नहीं नहीं ऐसा मत करियेगा भगवान ने कहा ये जंगल में गये तो वहा भी दंगल करेंगे ये तो बड़े खतरनाक हो गये है | तो किया क्या जाये मेरे प्रियवर अल्लाह ने कहा | जानशीन हमें तो कुछ और करना होगा भगवान ने कहा ऐसा करते है की जिन लोगों की खाल पर मैल ज्यादा  है उनकी खाल निकल कर उनको जानवरों की खाल पहना कर ये बताते है की तुम्हारी  पुरानी खाल कितनी अच्छी थी पर तुमने उसकी कदर नहीं की अब भोगो जिनकी खाल पर थोड़ी मैल है उन्हें साफ करने की वार्निग दे कर और जो ये खाल पहले ही उतर चुके है पर कपड़े से अपना शरीर ढक कर मानव होने का फर्जीवाड़ा कर रहे है उसको तो हम सीधे अपने पास ही बुला लेते है उसका हिसाब किताब तो हम लोग यही करते है | राम राम भगवान कसम एक बार वो हमारे  हाथ आये मैं फिर उसे बताता हुं अल्लाह ने कहा | तौबा तौबा अल्लाह कसम भगवान ने कहा उसे एक बार मेरे हाथ आने दो मैं उसे और जोर का बताता हुं |
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अब आप मुझे क्यों ढूँढ रहे है मैं तो जा रही हुं अपनीखाल साफ करने देख रही हुं इस पर भी मैल चढ़ गई है पर परेशानी ये है की मैं तो इस कम्पनी पर विश्वास ही नहीं करती हुं तो उसका साबुन कैसे प्रयोग करूँ कही रिएक्शन कर गया तो सो जा रही हुं हॉकिंग बाबा की शरण में वो कह रहे थे की ये पूरी कंपनी ही फ़र्ज़ी है उन्ही से पूछती हुं की क्या हमारे लिए कोई साबुन  उनके पास है |

September 04, 2010

नई दिल्ली की राजधानी क्या है ? क्या आप के टीचर ने आप को बताया है - - - - - - mangopeople

नई दिल्ली की राजधानी क्या है ?---------- जवाब दीजिए नहीं पता तो जवाब सुनिये चादनीचौक ,पुरानी दिल्ली ,नोएडा ,गुड़गाँव  चौक गये ये जवाब है  यूपी के गावों के प्राथमिक विद्यालयों में तैनात कुछ शिक्षकों के अब सोचिये की जब टीचर का ज्ञान इतना बढ़िया है तो वो बच्चों को क्या ज्ञान दे रहें होंगे | आप इस बात का संतोष मत करीये की आप का बच्चा तो अंग्रेजी मीडियम के प्राइवेट स्कूल में या किसी कान्वेंट में पढ़ रहा है | जरा पता कीजिए की स्कूल में शिक्षकों की शैक्षिक योग्यता क्या है कही आधे से ज्यादा कम शैक्षिक योग्यता के साथ बस टमप्रेरी जाब पर तो नहीं है | चलिए यदि ऐसा नहीं है तो क्या वो आप के बच्चों को ज्ञान दे रहे है या सिर्फ कोर्स पूरा करा रहे है | जानना मुश्किल  नहीं है बस अपने बच्चे से कोर्स के बाहर से कोई सामान्य ज्ञान की बात पूछ लीजिये जवाब मिल जायेगा की बच्चा स्कूल में क्या पढ़ रहा है |
  आज के नंबरों की गला काट स्पर्धा की हम सब आलोचना करते है और इसको आज की शिक्षा व्यवस्था का दोष मनाते है पर क्या वास्तव में ऐसा है | असल में ये व्यवस्था गुरु से टीचर बने इस वर्ग का कारनामा है | ये व्यवस्था उन टीचरों की देन है जिनका अपना ज्ञान कोर्स की किताब से आगे नहीं था पर वो टीचर बन गये क्योंकि ये सबसे आरामदायक , सबसे ज्यादा छुट्टियों वाला महिलाओ के लिए सबसे सुरक्षित ( ज्यादातर लोग ऐसा मानते है ) सुविधाजनक प्रोफेशन है | अब जब खुद इनका ज्ञान कम था तो वो बच्चों को क्या बताते सो इन्होंने एक काम किया की बच्चों का सारा ध्यान सिर्फ कोर्स की किताबों को पढ़ने और अच्छे नंबरों तक सीमित कर दिया | माँ बाप स्कूल प्रशासन सभी खुश हो गये की हमारे बच्चे अच्छे नंबर ला रहे है पर किसी ने भी इस बात को जानने का प्रयास नहीं किया की बच्चों को क्या ज्ञान दिया जा रहा है वो क्या सीख रहे है | टीचर खुश की चलो की अब बच्चे भी हमसे कोई ऐसा सवाल नहीं करेंगे जो हमें नहीं पता होगा | बच्चे भी खुश की चलो की अब कुछ समझने की जरुरत नहीं है बस रटो और अच्छे नंबर लाओ काम हो गया |  अब यही नंबरों की दौड़ गला काट स्पर्धा में बदल गई तो लगे है हम सब उसकी बुराई करने में |
हद तो तब हो गई की जब टीचरों ने अपना लक्ष्य सिर्फ कोर्स को पूरा कराने तक ही सीमित कर लिया अब तो उनको इस बात से भी मतलब नहीं रहा की जो वो पढ़ा रहे है वो बच्चों को समझ में भी आ रहा है या नहीं उन्होंने ने अपने हिसाब से किताब को ख़त्म किया और उनकी ज़िम्मेदारी ख़त्म हो गई बाकी बच्चे जाने और उनके माँ बाप जाने | इसके अलावा वो ये भी चाहते है की बच्चा वैसे ही याद रखे और सवालों को हल करे जैसा की उन्होंने बताया है | आप कभी अपने बच्चे को टीचर के बताये तरीके से अलग तरीके से गणित के सवाल हल करके भेज दे फिर देखे की टीचर की प्रतिक्रिया क्या होती है | उनका जवाब होगा "क्या मैंने जो बताया है वो तुमको समझ में नहीं आया " खुद को ज्यादा होशियार समझते हो अपना दिमाग  लगने की जरुरत नहीं है " " हा ये सही है पर मैंने जो तरीका बताया है वो ज्यादा आसान है " " नहीं मेरे तरीके से करो तभी ज्यादा नंबर आयेंगे " लीजिये जी इनमें से कोई जवाब सुनने के बाद तो किसी विद्यार्थी में हिम्मत नहीं होगी की टीचर के बताये तरीके के अलावा कोई तरीका अपना ले | कई बार तो टीचर कोर्स के विषय को भी अपनी सुविधानुसार पढ़ाते है | में आप को अपना एक अनुभव बताती हुं हम जब ११ में थे तो हमारी होम साइंस की टीचर ने महिलाओ के शारीरिक संरचना के पाठ को ये कहते हुए नहीं बढ़ाया  की  ये परीक्षा में नहीं आएगा इसे मत पढ़िए उन्होंने तो यहाँ तक कह दिया की ये सब बेकार का पाठ है जबकि हम सब बच्चे नहीं थे और हम गर्ल्स स्कूल में थे तो भी उन्होंने इंकार कर दिया क्योंकि वो उसे पढ़ाने में असहज महसूस कर रही थी | इसी तरह जब मैं पत्रकारिता का कोर्स कर रही थी तो हमारे एक टीचर जो अपना सारा ज्ञान सारा समय अपने सारे सोर्स स्वार्थ भाव से विद्यापीठ की राजनिती में खर्च करते थे एक दिन वो गलती से हमारी क्लास में आ गये ( पूरे साल उन्होंने जितने क्लास हमारे लिए उसे उंगलियों पर गिना जा सकता था ) से एक सवाल पूछ बैठी जो था तो हमारे कोर्स से संबंधित पर व्यवहारिक ज्ञान से था ना कि किताब से तो उनका  जवाब था की जो परीक्षा के लिए जरूरी है वो पढ़ा लीजिये ऐसे ज्ञान के लिए तो पूरी उम्र पड़ी है | इतना अच्छा ज्ञान पा कर तो हम धन्य ही हो गये और हमें अपने पढ़ने का असली लक्ष्य मिल गया उस दिन |                                                   
                          पर आप को बताओ की कई ऐसे भी टीचर है जो वास्तव में कोर्स के उन हिस्सों को नहीं पढ़ाते है जिनमे से परीक्षाओ में सवाल नहीं आते है या बहुत कम आते है | अब क्या कहा जाये ऐसे टीचरों को वो अपने स्वार्थो के लिए बच्चों के ज्ञान उनकी सोच उनके आत्मविश्वास उनके भविष्य और देश के भविष्य से खिलवाड़ कर रहे है | ऐसे ही शिक्षकों ने हमारे देश के गुरु शिष्य परंपरा को ख़त्म  कर दिया है अध्यापन को सिर्फ एक प्रोफेसन बना कर रख दिया है जिसका ख़ामियाज़ा हम सभी को भुगतना पड़ रहा है |
                                   एक अच्छा टीचर गुरु किसी बच्चे के जीवन में कितने बदलाव ला सकता है हम उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते है एक चाणक्य जैसे गुरु ने चन्द्र गुप्त जैसे सामान्य से इन्सान को हमारे इतिहास में एक उच्च स्थान दिला दिया ऐसे हजारों उदाहरण हमारी सभ्यता में है | अच्छा टीचर ना केवल छात्रों को ज्ञान देता है साथ ही उनको भविष्य की राह दिखता है उसमे एक नई सोच पैदा करता है उनका आत्मविश्वास बढ़ता है | आज मैं अपने ऐसे ही एक टीचर को प्रणाम कर रही हुं जिनके कारण मुझमे इतना आत्मविश्वास आया | डाक्टर  मुनमुन मजुमदार जे एन यू से गोल्ड मेडिलिस्ट ग्रेजुएशन में हमारी पोलटिक्स की टीचर जिन्होंने पहली बार हमें बताया की स्कूल कॉलेज में पढ़ाई का अर्थ सिर्फ कोर्स ख़त्म करना और परीक्षा में अच्छे नंबर लाना ही नहीं होता है उससे कही ज्यादा है उन्होंने हमेशा कोर्स के साथ ही राष्ट्रीय और अन्तराष्ट्रीय राजनिती के बार में हमें इतना ज्ञान दिया की उससे ना केवल हमारी जानकारी बढ़ी हमारा आत्मविश्वास बढ़ा और वो ज्ञान आज भी हमारे प्रोफेशन में काफी काम आता है साथ ही एक इच्छा जागृत की ज्यादा से ज्यादा जानकारी पाने की | ऐसे सभी गुरुओं टीचरों का हमारा नमन: |