April 16, 2011

आज हमारी ब्युटीफुल प्रिंसेस का जन्मदिन है उसे ढेर सारा आशीर्वाद दीजिये - - - - - - mangopeople



                                                   आज हमारी ब्युटीफुल प्रिंसेस का हैप्पी वाला बर्थ डे है | ब्यूटीफुल क्यों ? वैसे तो हर माँ के लिए उसके बच्चे दुनिया में सबसे ब्यूटीफुल होते है , लेकिन मुझे बिटिया रानी के ये पूछने पर कि 'मॉमा मै ब्यूटीफुल दिख रही हु ना"  दिन में तीन या चार बार उन्हें ये बताना पड़ता है की वो ब्यूटीफुल दिख रही है और प्रिंसेस इसलिए की उन्हें बड़ी हो कर प्रिंसेस बनना है | लो जी सिंड्रेला , स्नोवाईट , स्लीपिंग ब्यूटी , जास्मिन , प्रिंसेस बैली जैसी कहानियो रोज सुनती है उसका कुछ तो असर होना ही था ना | 

                                  बहुत साल पहले एक खबर पढ़ी थी की भविष्य में आप डिजाइनर बेबी को जन्म दे सकेंगे मतलब की रंग कैटरीना का  आँखे ऐश्वर्य की कद सुष्मिता की और जो भी आप चाहे अपने बच्चे में वो आप को मिल जायेगा, वैज्ञानिक ये सब आप के लिए कर देंगे | सो जब मेरे माँ बनने का समय आया तो हम दोनों ने भी अपने बच्चे को डिजाइन करना शुरू किया मतलब ये सोचना शुरू किया की हमारी बच्ची कैसी होगी | अब हम वैज्ञानिको की तो मदद नहीं ले रहे थे तो सब कुछ पति पत्नी के बिच से ही चुनना शुरू किया वो भी सब अच्छी अच्छी वाली जो कुछ भी हम दोनों में था | तय किया की दिखने में वो पति जसी हो और व्यवहार में माँ जैसी हो ( मेरी बेटी पति जैसी सीधी साधी हम दोनों को ही मंजूर नहीं थी, और मेरे लिए सुन्दरता  के मामले में बेहतर था की वो पिता जैसी ही हो क्योकि सुन्दरता से मेरा दूर दूर तक कोई रिश्ता नहीं है ,  हा हा हा हा हा   ) मुझसे तो वो बस दो ही चीजे पाए एक तो घुंघराले बाल दुसरे गालो पर पड़ते डिम्पल ( मुझे बहुत थोड़े पड़ते है मै चाहती थी उसे खूब गहरे पड़े )  और पुत्री होना तो मेरे लिए हमेसा से ही निश्चित था उसके लिए कोई दो राय या कुछ और की तो बात ही नहीं थी और जब बच्ची हमारे सामने आई तो बाकि बाते तो पता नहीं चल रही थी लेकिन जब वो जन्म के दुसरे दिन मुस्कराई और उसके गालो पर गढ्ढे पड़ते देखा तभी समझ गई की हमारी एंजेल तो बिलकुल वैसी ही होनी है जैसी हमने सोचा है |
       किन्तु सब आप के मन का हो ही जाये ये भी नहीं होता है ना हमने तो इसके जन्म का दिन भी तय किया था आज से 11 दिन बाद का, सब ठीक था किन्तु बीच में डाक्टरों ने अपनी कमाई के लिए ऐसा डराया की जानते हुए भी बेफकुफ़ बन गए क्या करे जब बात बच्चे पर किसी तरह के खतरे की हो तो सभी जान कर भी बेफकुफ़ बनने में ही अपना भला समझते है , वैसे अंत में  ये १६ अप्रैल का दिन भी मैंने ही चुना था डाक्टर के दिए चार दिनों में से | 
                                               दुनिया की ये परम्परा रही है की पिता अपने बेटो को अपना नाम देते है जार्ज और लुई से चला ये रिवाज बुश तक पहुँच गया और हमारे यहाँ भी पिता का नाम जोड़ा जाता है | पर कभी ये रिवाज क्यों नहीं बना की माँ बेटियों को अपना नाम देंगी, सो मैंने भी तय कर लिया था वो भी हमेशा से, की  अपनी बेटी को तो मै अपना नाम दूंगी | उसके जन्म के बाद शुरू हुई नाम की खोज जो पहला नाम पसंद आया वो था "पार्थवि" जिसका अर्थ पार्वती जी का नाम बताया गया पसंद आया क्योकि पार्वती जी नारीत्व गुणों के साथ ही देवी की शक्ति रूप थी ( बाद में पता चला की ये नाम देवी के शक्ति रूप का ही है यानि दुर्गा को भी "पार्थवि" कहते है ) पर ये मेरा नाम नहीं था सो खोज जारी रखी (अब हम लोग हिंदी के बड़े ज्ञानी तो थे नहीं सो अपने नाम की पर्यायवाची खोजना एक मुश्किल काम था वो भी बिना नेट के) और अंत में हमें मिल ही गया नाम  "अनामित्रा"   दोनों नाम पसंद आया सो हमने उसके दो नाम रख दिये एक घर के लिए "पार्थवि" जो हम दोनों को पसंद था और स्कुल के लिए "अनामित्रा" ताकि दुनिया में वो मेरे नाम से ही जानी जाएगी ( जबकि आज की तारीख में हम अपनी ईमारत में और उसके स्कुल में उसके नाम से जाने जाते है की हम "पार्थवि"  के मम्मी पापा है ) |
                                                           कहते है की नाम का असर बच्चो पर होता है इसी का नतीजा है की उनमे जहा लड़कियों वाले सारे गुण, सजना सवरना खुबसूरत दिखने का प्रयास करना गुडियों से खेलना है तो साथ में शारीरिक दम ख़म वाली और अपनी शक्ति दिखाने वाले भी गुण है | पार्क में गई तो ज्यादातर लड़को के साथ ही खेलती है क्योकि वही दौड़ने उछलने कूदने और शरारत करने में इनका साथ देते है | स्कुल में रेस में भी भाग लिया और पहला स्थान पाया , पाना ही था रोज मुझे पकड़ कर पार्क ले जाती और ८-१० साल के लड़को के साथ रेस करके अपना अभ्यास करती थी बिना मेरे कहे खुद से | अब नाम के साथ जुड़ा गुण है तो उसके साथ जुड़े दोषों से कैसे दूर रह सकती थी सो नाम के साथ जुड़े दोष भी है वो है गुस्सा और गर्मी | गुस्सा हर समय नाक पर और १८ के तापमान में भी कहना की गर्मी लग रही है |
                                           उनके जन्म के बारे में जान लिया नाम के बारे में जान लिया और उनके स्वभाव के बारे में जान लिया अब हमारी एंजेल की कुछ फोटो सोटो भी देख लीजिये |


                 

पचपन से कैमरे के लिए पोज  देने की आदत है इन्हें | बचपन में कभी भी इनकी कोई शरारत मै सुट करना चाहती भी थी तो कैमरा देखते ही ये वो करना छोड़ कर बस कैमरा ही देखने लगती थी | देखिये अभी भी कैसे कैमरे के लिए पोज दे रही है |

अपने लम्बे बालो से बड़ा प्यार है इन्हें क्या मजाल की कोई हाथ भी लगा दे या उन्हें कटवाने की बात कर दे और हर समय इन्हें खुले बाल चाहिए , फैशन है | जन्म से अभी तक इसका मुंडन नहीं हुआ है, अब कराना तो भगवान के बस में भी नहीं है अब तो देर भी हो गई है और वो और भी लम्बे हो चुके है |

बस एक बार सैंटा मिल जाये फिर तो खिलौनों की इतनी लम्बी लिस्ट बनेगी की पूरा साल सैंटा हमारे ही घर खिलौने डिलेवर करते रह जायेंगे |


    तीसरे जन्मदिन की फोटो है बार्बी बनने के लिए बार्बी पार्लर गई थी और चुपचाप बैठ कर इस तरह तैयार हुई बाल बनाये की सब आश्चर्य कर रहे थे , तीन साल में ही ये हाल है  बड़ी हो कर क्या करेंगी |

भला हो सागर ब्रदर्स का जो उन्होंने मुझे कृष्ण के रूप में संतान पाने की इच्छा पूरी करवा दी | नया वाला कृष्ण (कृष्णा ) देख कर ये भी मुझे काफी दिनों तक मैया मैया कह कर पुकारती थी |  लग रही है  ना पूरी कृष्ण जैसी |

                                   


देखा हमारी परी कितनी प्यारी है  और बच के रहिएगा अपने मैजिकस्टिक से सभी को फ्राग बना देती है  |
 

हम बड़े भी पहले बचपन में अपने शौक में बच्चो में नई नई आदते डाल देते है फिर जब बच्चे बड़े होने पर वही करते है तो हम शिकायत करते है | अब देखिये ६ माह की है बड़े आराम से गॉगल लगा कर बैठी है क्या मजाल की गिर जाये, अब बड़े हो कर जब बिना गॉगल के बाहर नहीं जाती तो हम कहते है की कितना फैशन करती है |


                   सब तो हो गया अब इनकी शरारतो का और मीठी सी मुस्कान का एक वीडियो देखिये, जरा देखिये तो क्या चीज ये बड़े जतन मेहनत और चाव से खाने का प्रयास कर रही है |




चलते चलते
                                                                   आज चलते चलते में हमारी डॉल का किस्सा | इन्हें सिखाने के क्रम में हमने उन्हें सप्ताह के नाम सिखाये केवल सात दिनों में ये नाम याद कर ली, हमारा उत्साह बढ़ गया सो सोचा की इन्हें महीनो के नाम भी सिखा दे | अब हमने कोई किन्नर गार्डेन का कोर्स तो किया नहीं है जो पता रहे की बच्चो को सिखाना कैसे है सो हमसे सीधे कहा की "बाबु वन इयर में 12 मंथ होते है " इन्होने फाटक से सवाल दागा " मॉमा इयर क्या होता है " तब समझ आया की बच्चो को इस तरह हम नहीं समझा सकते है, फिर भी कोशिश जारी रखा और सोचा की इन्हें इनके मतलब की बातो से समझाते है तो ये जल्दी समझ जाएँगी | हमने कहा कि " बेटा तुम्हारा फर्स्ट बर्थ डे जब हुआ तब तुम वन इयर की हुई सकैंड में तुम टु इयर की हुई थर्ड में थ्री इयर की अब तुम्हारा फोर्थ बर्थ डे आ रह है तुम फोर इयर की हो जाओगी | ये रुकी कुछ सोचा फिर बोला " मॉमा फोर्थ बर्थ डे पर आई हैव फोर इयर(कान) सो हाउ मेनी आइस (आँखे ) मॉमा" | जवाब आप के पास हो तो जरुर दीजियेगा मै तो अभी नहीं दे पाई हूँ |

                                                        आज मेरी प्यारी सी परी को उसके जन्मदिन पर ढेर सारा आशीर्वाद दीजिये ताकि जीवन में वो हमेशा खुश रहे और वो सब पाए जो उसे एक सफल इन्सान बनने में सहयोग करे |
लीजिये खाइये उनकी पसंद का डोरा केक और पूरा ब्लॉग भी उनके पसंद के पिंक कलर में है | मेरी तो पार्टी अभी बाकि है और दस दिन और ब्लोगिंग से छुट्टी अभी बाकि है |

April 06, 2011

आज मेरे ब्लॉग पर बस ये लिंक है - - - - - - mangopeople

आज मेरे ब्लॉग पर बस ये लिंक है यदि आप की इच्छा हो तो यहाँ जा कर मेरे विचार पढ़ ले यदि इच्छा  हो तो वही टिपण्णी भी दे दे नहीं देना है तो भी कोई बात नहीं नहीं आप समय निकल कर पढ़ ले मेरे लिए यही बहुत है | यहाँ टिपण्णी न दे यहाँ के टिपण्णी विकल्प को बंद समझे | 
एक तो तकनीकी  जानकारी कम है उस पर से आज कल समय भी नहीं मिल रहा है इसलिए टिप्पणी का विकल्प बंद नहीं कर पाई लेकिन आप इसे बंद ही समझे इस पोस्ट के लिए यदि इच्छा हो तो वही पर कुछ विचार रखे | धन्यवाद |

April 02, 2011

विश्वास नहीं हो रहा है ,तो कर लीजिये हम सच में विश्वकप जीत चुके है - - - - -mangopeople

                                                      विश्वास नहीं हो रहा है , 
                             तो कर लीजिये
                  हम सच में विश्वकप जीत चुके है 
           अरे मिठाई खरीदने और खाने की फुरसत कहा है  पहले इस पल का आन्नद तो उठा ले |
                 मुबारक हो आप सब को 

April 01, 2011

ब्लॉग ब्लॉगर और स्वप्न सुंदरी - - - - - mangopeople

चमेलिया जी की मुड बिलकुल ख़राब चल रहा था कुछ दिन से घिसु का व्यवहार ही बिलकुल बदल गया था रहे रहे अकेले में ही मंद मंद मुस्कराने लगता या कभी उसकी हंसी निकल जाती तो कभी अचानक से उग्र हो जाता था और पत्नी की हर बात ही उन्हें बुरी लगने लगती थी " तुम नारीवादी समझती क्या हो अपने आप को " अपने लिए नारीवादी शब्द सुन कर उसे धक्का सा लग जाता था | एक दिन तो हद ही हो गई जब वो अपने बचपने के दोस्त रहीम से भीड़ पड़े " साले तुम लोग तो हमारी खाते हो और उनकी बजाते हो वही क्यों नहीं चले जाते "| न दोस्तों रिश्तेदारों से मिलना न कही आना जाना सुबह शाम या कहे कभी कभी तो रात रात भर बस कंप्यूटर के आगे बैठे रहना और खटकगिरी करना | एक दिन परेशान हो कर चमेलिया जी ने पूछ ही लिया की आखिर तुम इस पर करते क्या हो मुझे लगता है की इसी के कारण तुम दिन पर दिन बदलते जा रहे हो अभी के अभी बताऊ मुझे की क्या चक्कर है नहीं तो उठा कर इस टिन के डब्बे को बाहर फेक देती हूँ | धीसू समझ गया की आज तो बताना ही पड़ेगा |   धीसू बोला "कुछ नहीं है मै यहाँ ब्लोगिंग करता हूँ कुछ अपने मन की लिखता हूँ कुछ दूसरो की मन की पढ़ता हूँ बस और कुछ नहीं है "
 "अच्छा ! इ ब्लोगिंग तो बड़े बड़े सेलिब्रेटी लोगो के चोचले है उनका लिखा तो सब पढ़ने के लिए आतुर है तुम कौन से बड़े आदमी हो और तुम्हारा लिखा और तुम्हारे बारे में जानने के लिए कौन बेफकुफ़ बैठा है " चमेलिया जी बोली |
 " अरे तो मुझको क्या किसी सेलिब्रेटी से कम समझती हो क्या , देखो कितने आते है मुझे पढ़ने के लिए मै ब्लॉग जगत का जाना माना नाम हूँ "  घिसु ने फट से जवाब दिया |
 " अच्छा तो इ बात है मुझे भी सिखा दो न ये ब्लोगिंग करना |" चमेलिया जी ने झट सेलेब्रिटी बनने की इच्छा से कह दिया |
 "अरे तुम ब्लोगिंग करोगी तो खाना कौन बनाएगा और ये सब तुम्हारे बस की बात नहीं है ब्लॉग लिखने के लिए लेखन प्रतिभा का होना जरुरी है ये तुम में कहा है और तुम्हारी रूचि भी इन चीजो में नहीं है दो दिन करके छोड़ दोगी " घिसु ने फटाफट जवाब दे दिया |
 "अच्छा तो मै क्या सारे दिन खाना ही बनाती रहती हूँ , ठीक है जाने दो | " इतना कह चमेलिया जी वहा से चली गई  और घिसु ने सोचा चलो पिंड छुटा नहीं तो यदि इनको सिखा देता तो ब्लॉग जगत में मै क्या क्या ढींगे मारता हूँ अपना एक अच्छा सा इमेज बना रखा है सब इनको पता चल जाता और मुझे ब्लॉग जगत से भागना पड़ता | लेकिन वो तो मुगालते में था दुसरे दिन ही चमेलिया जी घिसु के जाते ही कंप्यूटर पर बैठ गई और ब्लॉग खोल पढ़ने लगी कुछ महीनो तक ये चलता रहा पर उनको घिसु नाम का कोई ब्लोगर नहीं मिला किन्तु एक दिन उन्हें घिसु मिल ही गया, फोटो से पकड़ा गया नाम तो बदल कर उसने राहुल कर लिया था किन्तु चेहरा कैसे बदलता सो पकड़ा गया महीने भर उसकी पोस्ट पढ़ इतना तो समझ गई की घिसु बहुत बड़ा फेकू है और जो निजी जीवन में कभी कुछ नहीं कर सहा वो यहाँ आभासी दुनिया में जेम्स बांड बना फिर रहा है | पर उसे खोजने के चक्कर में वो पुरे हिंदी ब्लॉग जगत के "चाल" और "चलन " को अच्छे से समझ गई और ये भी समझ गई की घिसु यहाँ नाम बदल कर है, इसलिए अब मुझे भी नाम बदल कर इस मैदान में उतरना होगा और देखना होगा की आखिर घिसु यहाँ कर क्या रहा है कही किसी के साथ नैन मटका तो नहीं कर रहा या मेरे खिलाफ कोई  साजिस तो नहीं कर रहा क्या पता अपना दुखड़ा यहाँ रो रो कर मेरी इमेज ख़राब कर रहा हो थोड़ी उसकी मन की थाह लेनी होगी और फटाफट चमेलिया जी ने एक ब्लॉग बना दिया और नाम रखा अपनी फेवरेट वाली हेमा मालानी के नाम पर "स्वप्न सुंदरी" और फोटो लगा दी अपनी एक पुरानी सुन्दर सहेली की | चुकी उन्हें ब्लॉग जगत का "चाल" और "चलन" पता चल चूका था सो वो पहले ही सभी को प्यारी प्यारी और सभी के इगो की मालिश करने वाली टिप्पणिया दे दे कर अपनी मुरीद बना चुकी थी लोग तो उन्हें अपना ब्लॉग बना कर लिखने की मिन्नतें तक करने लगे थे नतीजतन उनकी पहली ही पोस्ट सुपर हिट हो गई और टिप्पणियों की संख्या सौ के पार चली गई  टिपण्णी करने वालो में घिसु भी था | " वाह आप क्या लिखती है मै तो पहले से ही कह रहा था की आप कुछ लिखिए आप के अन्दर छुपे लेखन प्रतिभा को तो मै पहले ही समझ गया था आप जैसे अच्छा लिखने वालो के दम पर ही ये हिंदी ब्लॉग जगत टिका है आप जैसी प्रतिभावान महिलाओ को हिंदी ब्लॉग जगत को और ऊपर उठाने और आगे ले जाने में सहयोग करना चाहिए | बहुत अच्छा लिखती है लिखती रहिये किसी सहयोग की जरुरत हो तो बन्दे को याद कीजियेगा फिर हम तो एक ही शहर से भी है |"  बस फिर क्या था चमेलिया जी को यही तो चाहिए था फट उन्होंने घिसु के मेल कर अपना फेक मेल आई डी दे दिया ताकि बात कुछ आगे बढे किन्तु साथ ही उन्हें गुस्सा भी आ रहा था की पत्नी के लिए तो खाना कौन बनाएगा का जूमला बोला जाता है और बाहर की महिलाओ के लिए ये सब, खूब बेटा घिसु खूब कही एक बार तुम्हारी मन का थाह ले लू फिर बताती हूँ तुमको | फिर तो शुरू हो गया दोनों के बीच विचारो का आदान प्रदान और धीरे धीरे ये विचारो का आदान प्रदान घिसु की तरफ से दिल का लगाना बनने लगा | किन्तु स्वप्न सुंदरी का घिसु अकेला दीवाना नहीं था यहाँ तो कई लाइन में लग गए क्या बूढ़े ??? क्या जवान सब उनके दीवाने हो चले और ये दीवानगी उन्हें मिलने वाली टिप्पणियों में दिखने लगा और उन्हें फलो करने वालो की संख्या महीने भर में ही तीन सौ के पार हो गई | उन पर पोस्टे लिखी जाने लगी उनकी तारीफों के बड़े बड़े पुल बना दिए गए ब्लॉग जगत के सभी बड़े पुरस्कार ???  उन्हें दे दिया गया कुछ ही महीनो में वो एक बड़ी ब्लोगर बन गई | आखिर उन्हें भी दिखाना था धीसू को की वो किसी बात में उससे कम नहीं बल्कि ज्यादा ही है |
                                                                            ब्लॉग जगत में विचरण करते हुए उन्हें पता चला की एक ब्लोगर है जो पक्का नारीवाद का विरोधी है हर मामले में ही महिलाओ का विरोध करता है उसको लगता है की महिलाओ को तो घर में रह घर गृहस्थी संभालनी चाहिए उन्हें तो बस बच्चे पैदा करना और उनकी देखभाल करनी चाहिए और अपने पति की सेवा करनी चाहिए | पढ़ कर चमेलिया जी को बहुत गुस्सा आया सीधा उसके ब्लॉग पर गई और उसका प्रोफाइल चेक किया नजर फोटो पर गई तो लगा जैसे कोई पहचाना चेहरा है कही तो देखा है इनको, दिमाग पर जोर डाला तो पता चला अरे ये तो जौनपुर वाली बुआ के दामाद है | उन्हें पहचानते ही चमेलिया जी की हंसी निकल गई और वो हंसते हंसते लोट पोट हो गई अच्छा तो ये मुगलसराय वाले जीजा है बेचारे ये सब यहाँ न कहे तो क्या करे घर में मेरी दबंग दीदी इनको कुछ कहने तो देती नहीं है बेचारे उसके सामने मुंह भी नहीं खोल पाते है और कुढ़ कर रह जाते है एक तो दीदी दबंग उस पर से उसकी नौकरी भी इनसे अच्छी है उसका जलन अलग बेचारे अपनी पत्नी को तो कुछ कह नहीं पाते है सो अपनी पूरी भड़ास यहाँ दूसरी महिलाओ को ऊपर निकालते है | वो समझ गई ये तो दया के पात्र है इन्हें कुछ कहना ठीक नहीं है बेचारे अब यहाँ पर अपनी भड़ास न निकाले तो और क्या करे |
                                                        अब तक जो हाल घिसु का था वो चमेलिया जी का होने लगा चावल गैस पर रखा और भूल गई, लगी नई पोस्ट के बारे में सोचने जब तक मन में पोस्ट पक कर तैयार हुई उतने में तो चावल जल गया | ये रोज की बात होने लगी कभी रोटी कच्ची तो कभी सब्जी जली कभी बाजार से कुछ का कुछ सामान आ जाता था तो कभी घर गन्दा ही पड़ा रहा जाता क्योकि वो लोगो को टिपियाने में व्यस्त रहती तो कभी किसी को गरमा गर्म बहस का जवाब दे रही होती तो पीछे से कुकर सिटी मारता रह जाता | जब बेचारा घिसु इस बारे में पूछता तो कुछ ऐसा बोल देती की बेचारा वो भी स्वप्न सुंदरी के खयालो में खो जाता और कच्चा पक्का सब बिना ना नुकुर के खा जाता |
                                                  इधर घिसु की हालत और भी ख़राब होने लगी वो तो दिन रात बस स्वपन सुंदरी के सपने में खोया रहता था और घर का एक काम भी नहीं करता था | परेशान हो कर चमेलिया जी को ही  काम के लिए सरकारी दफ्तर जाना पड़ा | सामने बैठा आदमी उबंसी ले रह था उससे कहा की मुझे ये फाइल जमा करनी है कहा करू उसने बेमन से फाइल को देखा और कहा करनी तो यही है रखा दीजिये | बड़ा रूखे से बोला, बगल में बैठे दुसरे लोग हंसी मजाक में व्यस्त थे तो उसने उनसे भी बड़ी रूखे से कहा की "आप लोगो को हंसी ठठे के आलावा और कुछ नहीं आता है जब देखिये तब बस मजाक करना हँसना समय की बर्बादी | " सब चुप हो गए वहा बैठी महिला ने चमेलिया जी को अपने पास बुलाया और पूछ "क्या काम है हमें बताइए उन्हें छोडिये बड़े नीरस और बोरिंग आदमी है इसीलिए किसी से उनकी मित्रता नहीं है उनके पास कोई बैठ जाये तो आदमी बोरियत से मर जाये जीवन में आन्नद का मतलब ही उन्हें नहीं पता सो दूसरो को भी हँसता देख इन्हें कष्ट होता है "| चमेलिया जी एक बार फिर उनकी तरफ देखने लगी वो अपने आँखे से चश्मा निकाल कर अपनी आँखे पोछ रहे थे | चश्मा उतारते ही चमेलिया जी ने उन्हें झट से पहचान लिया अरे ये तो ब्लॉग जगत के हास्य सम्राट है ये देखते ही चमेलिया जी का मुंह खुला का खुला ही रह गया | अरे मेरी ब्लॉग पर इनसे कितनी पटती है हमारे हंसी मजाक वाले टिप्पणियों के आदान प्रदान होता रहता है  इनके हास्य के सभी कायल है और ये निजी जीवन में कितने बोरिंग और नीरस है इन्हें तो दूसरो का हँसना भी नहीं गवारा है | हे प्रभु ये कैसी दुनिया है और ये कैसी आभासी दुनिया है जहा आदमी कुछ  का कुछ बन जाता है |
                                                                      पुरे ब्लॉग जगत में ब्लोगर मिट की धूम थी चमेलिया जी को लगा की इस बार जब घिसु ब्लोगर मिट में जायेगा तो वो भी उसकी पत्नी की हैसियत से साथ हो लेंगी और कुछ लोगो से मिल भी लेंगी | जब घिसु जाने लगा तो उन्होंने भी साथ चलने की इच्छा जाहिर कर दी इस पर घिसु ने फिर भाव मारा " अरे वो कोई तुम्हारे भाई की शादी है जो तुमको ले के चलू, वहा सभी विद्वान जन आयेंगे वहा पर बड़ी बड़ी बौद्धिक बाते होंगी नए नए विचारो का जन्म होगा ब्लॉग जगत की तरक्की की बाते होंगी तुम्हारे तो पल्ले भी नहीं पड़ेगा कुछ वो तुम्हारे जाने लायक जगह नहीं है | " बेचारी मन मसोस कर रह गई किन्तु दुसरे दिन उनका माथा ठनका जब मिट की फोटो उन्होंने ब्लॉग पर देखा और माथा पिट लिया | पता चला की ब्लोगर मिट के नाम पर बस मिलना मिलाना, हंसी ठठा और जाम टकराए गए साथ में रात का सुरूर चढ़ने पर वो सब भी हुआ जो उनकी भाई की शादी में जीजा लोग पीने के बाद करते है | उन सब में घिसु भी था और उन फोटो पर वैसे ही टिप्पणिया भी आई जैसी शादी के दुसरे दिन जीजा लोगो की कारस्तानी सुन दीदी लोग खीसे निपोर कर करती है | यानि कुल मिला कर वो बौद्धिक मिलन कम भाई की शादी ही निकली |
                                       एक दिन वो बाजार जाने के लिए घर से निकली तो देखा कुछ दुरी पर मजमा लगा है और दो अल्ट्रा मार्डन छोटे छोटे कपडे पहने लड़किया एक युवक को पिट रही है, वो भी मजे लेने के लिए वहा चली गई और पूछ क्या हुआ तो पता चला की लड़का एक साथ दो दो लड़कियों के साथ चक्कर चला रह था आज पकड़ा गया दोनों उसकी पूजा कर रही है | उन्होंने सोचा की रोकना चाहिए पूछा कितने देर से ये पिट रहा है बगल वाला बोला मै तो बीस मिनट से देख रह हूँ तो ठीक है दस मिनट और पिट लेने दीजिये फिर रोकते है | आधे घंटे होते ही चमेलिया जी ने इन दो लड़कियों को रोका "अब बस करो इसे पिटना, हाल देखो अपने हाथो का, उनमे दर्द होने लगेगा और अब और इसे पिटा तो तुम्हारी सैंडिल भी टूट जाएगी फिर घर क्या पहन कर जाओगी |" लड़का जो बेचारा कब से अपना चेहरा निचे कर उसे बचाने का प्रयास कर रहा था उसमे थोड़ी हिम्मत आ गई वो खड़ा हो गया उसके देखते ही चमेलिया जी की आँखे बड़ी बड़ी हो गई अपने दोनों हाथो को अपने गालो पर रखते  हुए जोर से कहा "तुम" ये सुन लड़का थोडा सकपका गया सोचने लगा की ये कौन है कही मेरी कोई रिश्तेदार तो नहीं | चमेलिया जी ने आगे कहा की " तुम तो वही हो ना जो ब्लॉग पर लिखते हो की लड़कियों को ढंग से रहना चाहिए माँ बाप का कहना मानना चाहिए उन्हें लड़को से दोस्ती नहीं करनी चाहिए उन्हें छोटे छोटे कपडे नहीं  पहनने चाहिए लड़कियों को शालीनता का पाठ पढ़ाते हो और लड़कियों को लड़को के बिगड़ने का दोषी तक मान लेते हो " | ये सुन लड़किया बिलकुल चौक गई और कहा " ये बेफकुफ़ ब्लॉग लिखता  है और उसपे ये सब लिखता है | अरे हम कभी भारतीय कपड़े पहन ले तो कहता है की क्या बहन जी की तरह बन कर आई हो मेरी गर्ल फ्रेंड बनना है तो मार्डन कपडे पहन कर आया करो " | चमेलिया जी बोली " यदि मै पहले इसका चेहरा देख लेती तो इसे आधे घंटे और पिटता छोड़ देती रुको तुम लोग काफी दिन से इसे टिपिया टिपिया कर सुधरने को कह रही थी पर ये सुधर नहीं रहा था आज इसे पिटवा कर सुधारती हूँ " वो भीड़ की तरफ मुड गई : कैसे निर्लज्ज लोग है आप सब दो बेचारी मासूम लड़किया इसे अकेले पिट रही है और आप लोग चुप चाप खड़े खड़े देख रहे है इसे पिट पिट कर इन बेचारियो के हाथ में छाले पड़ गए और इस कम्बखत का तो मुंह भी नहीं सुजा क्या आप के घर में माँ बहन नहीं है क्या,  वो अकेले किसी को ऐसे मारती रहेंगी और आप खड़े  खड़े  देखते रहेंगे आप उनकी कोई मदद नहीं करेंगे लानत है आप लोगो पर पीटीए इसे जब तक इसका मुंह सूज ना जाये जिसके बल पर ये लड़कियों को फंसाता है | " चमेलिया जी के जोशीले भाषण से सभी में जोश आ गया और सब टूट पड़े उस पर चमेलिया जी ने भी उस पर अपने हाथ साफ कर अपनी भड़ास निकाली और उसे भीड़ के हवाले कर घर आ गई |
                                                                              घर आ कर मेल चेक किया तो वहा घिसु का प्रणय निवेदन पड़ा मिला पढ़ कर मारे ख़ुशी के उनका जी भर आया लेकिन तभी उन्हें याद आया की ये तो मेरे लिए नहीं स्वप्न सुंदरी के लिए है ये सोचते ही उनका पारा सातवे आसमान पर पहुँच गया " आज आने दो इस घिसु के बच्चे को आज इनको मै नही छोड़ने वाली हूँ बहुत देख लिया सपना अब इन्हें सपने से जगाने का समय आ गया है | " तुरंत मेल का जवाब दिया और घिसु से मिलने के लिए जगह लिख उसे उसी दिन बुला लिया | वहा आफिस में घिसु सारे दिन बस अपना मेल ही खोल कर बैठा था न जाने उधर से क्या जवाब आये कही उसका दिल न टूट जाये कही वो बुरा न मान जाये कही मुझसे बात करना ही न छोड़ दे | पर जब जवाब पढ़ा तो उसके पैर ही जमीन पर नहीं पड़ रहे थे | फटा फट आफिस में पत्नी के बीमार होने का बहाना बना वो वहा से निकल पड़ा ताकि अपनी स्वप्न सुनदरी के लिए वो कुछ अच्छा सा उपहार ले सके | इधर चमेलिया जी भी घर पर बेलन झाड़ू जैसे अपने हथियारों को दुरुस्त करने लगी आज आने दो घर पर इनका सारा भुत उतार दूंगी | तभी बाहर से बच्चो का शोर आने लगा देखा कोई व्यक्ति बच्चो को डांट रहा था वो भी बाहर आ गई वहा पहुंचते ही वह आदमी इन्ही की तरफ मुखातिब हो गया और कहने लगा "देखिये कितने बदमाश बच्चे है कहते है स्कुल की तरफ से दान देने के लिए पैसे चाहिए सभी से दस दस रुपये जमा कर रहे है सब नौटंकी है ये स्कुल वाले एक रुपये नहीं देते है सब इनके जेब में जाना है फिर दान गे भी तो  स्कुल की तरफ से जाने वाला है हमारा कौन सा नाम होगा और ये बच्चे जबरजस्ती मुझसे पैसे मांग रहे है दान वान देने के चोचले मै नहीं करता हूँ " वो आदमी बोलता जा रहा था और चमेलिया जी उसका चेहरा देखे जा रही थी | तभी पीछे से आवाज आई " अरे आप यहाँ क्या कर रहे है " चमेलिया जी ने पीछे मुड कर देखा तो वो उनके मोहल्ले में नई नई आई मीना थी | मीना ने तुरंत परिचय कराया की ये मेरे पति है दोनों ने उन्हें मुस्करा के देखा और चले गए | और चमेलिया जी सोचने लगी ये तो हमारे गुप्ता जी थे जो ब्लॉग पर बड़ा ढींगे हांकते है की वो बड़ा समाज सेवा कर रहे है बड़े भले आदमी है सभी की चिंता है उन्हें और साथ में स्वप्न सुंदरी के करीब आने का प्रयास करने वालो में ये भी एक है और इनकी इतनी अच्छी सी पत्नी को कुछ पता ही नहीं है | चमेलिया जी ने तुरंत ही अपनी पोल खोलने का कार्यक्रम स्थगित कर दिया सोचा की मुझे इसमे उन सभी पत्नियों को शामिल करना चाहिए जो अपने पतियों के ब्लोगिंग से त्रस्त है और जो जानती ही नहीं की उनके पति ब्लॉग जगत में और दुसरे सोसल साईट पर बैठ कर क्या क्या कर रहे है | उन्होंने ठान लिया की वो ऐसे सभी पतियों की पोल खोलेंगी और अपनी तरह ही उनकी पत्नियों को भी  फेक ब्लॉग या दुसरे साईट पर झूठा प्रोफाईल बना कर अपने पतियों की सारी कारस्तानी दिखाएंगी |
                                      आज महिना भर हो गया चमेलिया जी के सपथ लिए न जाने किन किन की पत्नियों ने न जाने किन किन नामो से अपना ब्लॉग बनाया होगा या दुसरे साईट पर अपना प्रोफाइल बनाया होगा पता नहीं कौन कौन अपनी ही पत्नी से चैट कर कर खुश हो रहा होगा, पता नहीं कितने ही ब्लॉगर जो घर की मुर्गी साग बराबर मान कर पत्नी के विचारो को जरा भी भाव नहीं दे रहे थे वो ब्लॉग पर उनके तारीफ में कविताए लिख रहे हो या लम्बी लम्बी टिप्पणिया दे रहे हो उन्हें महाश्वेता देवी से लेकर महादेवी वर्मा तक का ख़िताब दे रहे हो, पता नहीं कितनी पत्निया ब्लॉग पर पति का नया रूप देख कर आश्चर्य में पड गई हो ,पता नहीं कितनी पत्निया उनकी लम्बी लम्बी फेकू बाते पढ़ हंस हंस के लोट पोट हो रही हो पता नहीं - - -- - - - --और बेचारे ब्लॉगर पति ये सोच की उनके बारे में घर पर किसी को पता ही नहीं कुछ भी लिख रहे हो | अब उन्हें क्या पता की उनके जाने के बाद पत्निया उनकी खबर रखने के लिए क्या क्या कर रही है |
                 
नोट ----- ब्लॉगर इसे अप्रैल फुल का मजाक ना समझे सच में चमेलिया जी "ब्लॉग पीड़ित पत्नी संगठन " बना चुकी है और अपने काम पर भी लग गई है सो ऐ भाई जरा देख कर टिपियाइये फिर ना कहियेगा की मैंने बताया नहीं |    

March 30, 2011

जीत मुबारक हो - - - - - - mangopeople

भारतीय टीम की सेमीफाइनल में जीत की सभी को ढेरो बधाईया | 
अब मुंबई वालो की बारी है |
 WELCOME TO MUMBAI TEEM INDIA 





खाली प्लेट क्यों है तो क्या आप लोगो के लिए बचाती सारी मै खा गई निचे एक बची है जल्दी से खा लीजिये नहीं तो वो भी मेरे ही पेट में जाएगी | फ़िलहाल आज तो पार्टी का आन्नद उठाने जा रही हूँ बाकि कल |




March 28, 2011

" MOTHER OF ALL MACH'S " खिलाडियों पर ये जानलेवा दबाव - - - - - - - - - mangopeople

                                        क्वार्टर फ़ाइनल मैच में अभी भारत को आस्ट्रेलिया के खिलाफ जितने के लिए २५ रन और बनाने थे तभी एक विदेशी कमेंटेटर ने कहा की अब ३० मार्च का सेमीफाइनल मैच होगा " MOTHER Of ALL MACH'S " यानी ये बात पुरे क्रिकेट जगत को पता है की भारत और पाकिस्तान के बीच कोई मैच और वो भी विश्व कप के सेमीफाइनल जैसे मैच का होने का क्या मतलब है | दोनों देशो में क्रिकेट को धर्म का दर्जा प्राप्त है और क्रिकेट यहाँ बस एक खेल न हो कर जूनून है और ये जूनून तब और सर चढ़ कर नाचने लगता है जब ये खेल इन दो देशो के बीच हो रहा हो और जब मैच विश्व कप का सेमीफाइनल हो तो फिर तो पूछिये ही मत फिर तो खेल खेल न हो कर जंग हो जाता है | जरा अखबारों की और न्यूज चैनलों की भाषा तो पढ़िए और सुनिये उनकी बोली जो इस जूनून को और ऊपर चढ़ा कर सातवे आसमान पर पहुंचा देता है " ये खेल नहीं ये युद्ध है " " इस जंग को हमें जितना ही है " और न जाने क्या क्या |  सच कहूँ तो इस समय मुझे भारत पाकिस्तान दोनों के खिलाडियों के ऊपर दया आ रही है | बेचारे किस तरह के भारी दबाव में जी रहे होंगे उस पर से मैच के बीच इतने ज्यादा दिनो का अंतर उन्हें और भी खलता होगा | रोज रोज टीवी अखबारों में इस मैच के दबावों, लोगो की उम्मीदों की खबरे देख पढ़ सुन उन्हें भी लगता होगा की अब बस कल ही मैच हो सब ख़त्म हो तब जा कर शांति मिले | इस समय तो उनका खाना पीना सोना जागना सब दुस्वार हो चूका होगा | बोलते समय भी सौ बार सोचते होंगे की कही कुछ ऐसा न बोल जाये जो कल को हम पर ही भारी पड़े या लोगो को हमारे हतोत्साहित , अति उत्साहित , अति आत्म विश्वास से लबरेज या दबाव में होने का एहसास न करा दे लोगो को बोलो तो बस ऐसा की हम सब शांत चित हो कर बिना किसी दबाव के बस मैच की तैयारी कर रहे है | एक बार इमरान खान का एक साक्षात्कार देखा था जिसमे वो बता रहे थे कि १९९२ के फ़ाइनल मैच के पहले आलू के बोरे उप्स मतलब इंजमाम को पेट दर्द होने लगा था वो बोले की मै समझ गया की वो झूठ बोल रहा है कई बार ऐसे अति दबाव वाले मैच के पहले कई युवा खिलाडी ये सोचने लगते है की काश हम बीमार पड़ जाये घायल हो जाये और ये मैच न खेलना पड़े | बेचारे सोचते होंगे की कम से कम हारने के बाद हम पर दोष नहीं आएगा, कि हम बेकार खेले या हमारी वजह से टीम हार गई और जीत गए तो पिछले मैचो में जो प्रदर्शन किया है उसका कुछ तो क्रेडिट मिल ही जायेगा | मै तो दाद देती हूँ खिलाडियों को जो इस भारी तनाव को सहते हुए खेलते है और जब कभी मैच के बीच कोई बुरी स्थिति आ जाती है तो उस समय खुद पर काबू रखते हुए अपने नर्वसनेस को दबाते हुए वो बल्ला या गेद थामे रहते है और अच्छा प्रदर्शन भी करते है या उसका प्रयास करते है | पिछले मैच में जब धोनी आउट हो गए तो लगा सब ख़त्म हुआ किन्तु जब युवराज और रैना टीम को जीत के करीब ले जाने लगे तो हर बाल पर जान हलक में आ जाती थी की कही ये दोनों आउट न हो जाये जब तक टीम जीत नहीं गई खुद पर कंट्रोल करना कितना मुश्किल हो जाता है जब हम देखने वालो का ये हाल है तो सोचिये की खेलने वाले का मैदान में क्या हाल होता होगा वो कैसे ये सब झेलते होंगे |
                                                    बेचारे दोनों टीमो के खिलाडियों की हालत तो युद्ध में जा रहे सैनिको जैसी होगी या ये कहूँ की उससे भी ज्यादा दवाब पूर्ण क्योकि सैनिक जीते या हारे उनकी आलोचना नहीं होती है और पूरा जोर लगाने के बाद भी हार जाये और मारे जाये, तो मरने के बाद शहीद का दर्जा मिलता है और हार को भी सम्मान की नजर से देखा जाता है | किन्तु यहा तो लोगो को हर हाल में जीत ही चाहिए हार के बारे में तो लोग सोच ही नहीं रहे है,  लोग तो खेल के बारे में भी नहीं सोच रहे है वो तो बस और बस जीत जाने के बारे में सोच रहे है, बाते कर रहे है | खिलाडी अपना जी जान लगा दे किन्तु उसके बाद भी हार जाये, आखिर है तो खेल ही एक को तो हराना ही पड़ेगा , तो यहाँ तो सिर्फ और सिर्फ आलोचना वो भी न सहने लायक ही मिलेगी  |  वैसे मैच टाई हो जाये तो कौन जीतेगा तो क्या लीग मैच के नंबर देखे जायेंगे या रन रेट, १९९९ के सेमीफाइनल की तरह, तो उस हिसाब से तो पाकिस्तान जीत जायेगा | यानि हम टाई में भी हार जायेंगे मतलब की भारतीयों को हर हाल में जितना ही है, लो भाई मै भी जीत की ही बात करने लगी
                                                          दोनों टीमो में से जो भी ये मैच हारेगा वो  उत्तेजित , आक्रोशित और अतिस्योक्ति पूर्ण अपनी आलोचना सुनने, पुतले जलाये जाने , विरोध प्रदर्शन होने , खिलाडियों के घरो पर पत्थरबाजी  के बाद एक बार जरुर ये सोचेगा की काश हम क्वार्टर फ़ाइनल में ही हार गए होते तो अच्छा होता क्योकि यहाँ पर सेमीफाइनल हारने का गम से बड़ा गम  भारत या पाकिस्तान से हारने का गम होगा साथ में बेभाव की पुरे देश की आलोचना भी झेलना पड़ेगा वो अलग ,पहले ही हार जाते तो बात सिर्फ हारने तक ही होती | वैसे टीम के हारने के बाद उसकी आलोचना करने का ये तरीका अभी तक दो देशो भारत और पाकिस्तान के लोगो के पास ही था किन्तु इस बार इसमे बांग्लादेश के लोगो ने भी बराबर साथ दिया बल्कि एक कदम और आगे चले गए और वेस्टइंडीज से हारने के बाद खिलाडी के घर पथराव कर घर में मौजूद उनकी माँ और बहन को भी घायल कर दिया | 
                             दुनिया जहान में किसी खेल के सौ दो सौ या  ज्यादा से ज्यादा हजार विशेषज्ञ होते है जो बारीकी से खेल का विश्लेषण करते है किन्तु हमारे यहाँ क्रिकेट के एक अरब से भी ज्यादा विशेषज्ञ है जो खेल और खिलाडी की ऐसे बाल की खाल निकालते है और ऐसे एक्सपर्ट कमेन्ट देते है की बड़ा से बड़ा खिलाडी भी खुद पर शक करने लगे | जो इस खेल को नहीं देखते है वो भी ये तो कमेंटे कर ही देत है की ये बकवास खेल है दुसरे खेल की तरफ कोई क्यों नहीं ध्यान देता है या लोग इस खेल को देखने में अपना समय क्यों बर्बाद करते है | मतलब वो खेल देख ये तो बता ही देता है की क्रिकेट से ज्यादा अच्छे दुसरे खेल है या काम है | आकडे देने वाले आकडे दे रहे है की हम तो विश्वकप में कभी पाकिस्तान से हारे ही नहीं है एक दो बार नहीं कुल चार बार पाकिस्तान को हराया है सो इस बार नहीं हराने का तो सवाल ही नहीं होता है पिछले आकडे हमारे साथ है | तो वो भूल जाते है की कोई भी खेल आकड़ो पर नहीं जीता या हारा जाता है पिछले को भूल जाइये क्योकि यदि आकड़ो से जीत और हार तय होती तो , तो हम आस्ट्रेलिया से जीतते ही नहीं क्योकि उसने हमें सात में से पांच बार हराया था और दुसरे हम इस बार विश्वकप नहीं जीत सकते क्योकि आकडे कहते है की मेजबान देश कभी भी कप नहीं जीतता है १९९६  में विश्वकप जितने वाली श्रीलंका सह मेजबान थी जैसे इस बार है | मतलब ये की जीतता तो वो है जो इन सारे दबावों को झेल कर उस एक दिन अच्छा खेल दिखाये | किसकी टीम मजबूत है किसकी टीम कमजोर है किसकी बैटिंग लाइन अच्छी है तो किसकी बोलिंग अच्छी है किसने पहले कैसा प्रदर्शन किया है ये सब मायने नहीं रखता है यदि रखता तो २००३ में हम सेमीफाइनल में केन्या जैसी टीम के साथ मैच नहीं खेलते |  यदि कुछ मायने रखता है तो वो है उस दिन का खिलाडियों का प्रदर्शन |
                                                                                   वैसे इतने सारे दबाव क्या कम थे खिलाडियों पर जो मनमोहन सिंह भी चले आ रहे है मैच देखने खुद तो आ ही रहे है लावा लश्कर ले कर साथ में जरदारी गिलानी को भी न्योता दे दिया क्या करेंगे ये लोग मैदान में बैठ कर ,
क्या कहा खिलाडियों का उत्साह बढ़ायेंगे ?
 हा हा हा हा
 जो हाल आज की तारीख में इन दोनों प्रधानमंत्रियो का अपने अपने देशो में है, मुझे तो लगता है खिलाडियों से हाथ मिलाते समय खिलाडी ही इन दोनों का उत्साह बढ़ायेंगे, सर जी घबराइये मत सोनिया मैडम है ना और गिलानी के लिए जनाब घबराइए नहीं अंकल सैम है ना जब तक खुदा मेहरबान तब तक गधे भी पहलवान |
                
 मेरी इच्छा ! मैच किसी भी टीम के लिए एक तरफ़ा जीत वाला ना हो मैच का रोमांच आखरी गेंद तक बना रहे | मेरे लिए तो अभी तक दोनों टीम का पलड़ा बराबर का है कोई भी जीत सकता है |
                                                            


चलते चलते 

              पाकिस्तानी मुल्लाओ ने अल्लाह को और भारतीय पंडितो ने भगवान को फोन लगाया और पूछा की यदि लोग पूछे की सेमी फ़ाइनल मैच कौन जीतेगा तो मै क्या जवाब दू तो भगवान और अल्लाह ने कहा कि कह दो " नो आइडिया सर जी " | 

 पाकिस्तान ने भारत को एक ख़ुफ़िया रिपोर्ट दी कि उन्हें पता चला है की भारत में होने वाले फ़ाइनल मैच पर आतंकवादी हमला करने वाले है और आतंकवादियों ने फ़ाइनल के १७ टिकट भी खरीद लिया है और पाकिस्तानियों ने  एक आतंकवादी को इस मामले में पकड़ा भी है | भारत हैरान की आखिर पाकिस्तान को क्या हो गया है वो भला हमसे ऐसी सुचनाये क्यों शेयर कर रहा है पहले तो ऐसी कोई सूचना नहीं थी, क्वार्टर फ़ाइनल मैच शुरू होने के बाद ये खबर अचानक कहा से आ गई | जवाब भारत को जल्द मिल गया जब रहमान मालिक ने पकडे गए आतंकवादी का बयान भारत को भेजा जिसमे आतंकवादी  कहता है कि "हजूर जो आतंकवादी टिकट ले कर मैच देखने जाने वाले है वो सब क्रिकेट के बड़े मुरीद है यदि फ़ाइनल में पाकिस्तान गया तो वो जेहाद भूल चुपचाप मैच का मजा लेंगे और अपनी टीम का उत्साह बढ़ाएंगे टिकट के पैसे वसूल कर घर आ जायेंगे किन्तु यदि पाकिस्तान फ़ाइनल में नहीं गया तो फिर मैच उनके किस काम का फिर तो उन्हें जेहाद ही याद आयेगा और वो आत्मघाती हमला कर देंगे | अब ये भारत तय कर ले की उसे सेमीफाइनल मैच जितना है या फ़ाइनल मैच शांति से पूरा करवाना है | "

             जब मनमोहन सिंह ने गिलानी और जरदारी को मैच देखने का न्योता भेजा , तो गिलानी सीधे हुजी के पास गए और उससे कहा की मैच देखने जरदारी जा रहे है उड़ा दो साले को वही पर वापस नहीं आना चाहिए  एक तीर से दो निशाने | फिर जरदारी हुजी के पास गए और कहा की मैच देखने मै गिलानी को भेज रहा हूँ उड़ा दो साले को वही पर वापस नहीं आना चाहिए एक तीर से दो निशाने | किन्तु अमेरिका से फोन आ गया की भाई भारत मैच देखने दोनों को जाना चाहिए ताकि दोनों देशो के बीच अच्छी बात हो सके | दोनों का आना तय हो गया अब पाकिस्तानी जनता हुजी के पास गई और कहा उड़ा तो दोनों सालो को वापस नहीं आना चाहियें दोनों के दोनों, भले हमें इसके लिए अपने ग्यारह बकरों की बलि देनी पड़े |

                        भारत सेमीफाइनल मैच हार गया दुसरे दिन पाकिस्तान के अखबारों में खबर छपी  " भारत को पाकिस्तानियों ने पीट विश्वकप से बाहर किया , अब कप हमारा है " और सारे पाकिस्तानी इस खबर को ऐसे पढ़ रहे ( उनके कान बज रहे है ६० साल अन्दर दबी इच्छा बाहर आ रही है ) है "  भारत को पाकिस्तानियों ने पीट कश्मीर से बाहर किया अब कश्मीर हमारा है " |
दिल बहलाने के लिए ख्याल अच्छा है |





March 25, 2011

महिलाओ के खिलाफ अपराध करने वाले बड़े अपराधियों को सजा की खबरे क्या हमारे यहाँ भी आएँगी - - - - mangopeople

इस्राइल के पूर्व राष्ट्रपति मोशे कात्साव को बलात्कार और यौन उत्पीड़न के अन्य मामलों में दोषी पाए जाने पर मंगलवार को सात साल जेल की सजा सुनाई गई। वह अब तक के सर्वोच्च इस्राइली पदाधिकारी हैं जिसे जेल भेजा गया है। जिला अदालत ने कात्साव को दो साल के प्रोबेशन के लिए भी भेज दिया और आदेश दिया कि वह 125000 इस्राइली शेकेल्स (करीब 35 हजार डॉलर) का हर्जाना दो पीडि़त महिलाओं को दें। इन महिलाओं की पहचान केवल 'एलेफ' और 'एल' के रूप में की गई है। एलेफ को 28 हजार और एल को 7 हजार अमेरिकी डॉलर दिए जाएंगे। यह सजा तीन में से दो न्यायाधीशों के पैनेल ने दी। कात्साव को दिसंबर, 2010 में बलात्कार, यौन उत्पीड़न, अशोभनीय व्यवहार का दोषी पाया गया था। यह मुकदमा 18 महीने चला। इसमें बताया गया कि कात्साव एक यौन शिकारी हैं जो अपनी महिला स्टाफ का नियमित रूप से यौन शोषण करते थे। कात्साव जब पर्यटन मंत्री थे, तो उन्होंने एलेफ से दो बार बलात्कार किया और जब वह प्रेजिडेंट थे तो उन्होंने दो और महिलाओं का यौन शोषण किया था।
                                                         क्या ऐसा कुछ हम कभी भारत के बारे में सोच सकते है कि किसी उच्च पद पर बैठे व्यक्ति को बलात्कार जैसे अपराध कि सजा हो , शायद सपने में भी नहीं | अभी हल में ही उत्तर प्रदेश में सत्तासीन पार्टी के कई माननीय लोग जो बस विधायक भर थे , इस मामले में आरोपित हुए और बड़ी मुश्किल से काफी हो हल्ला के बाद उन को गिरफ्तार किया जा सका | जब मात्र गिरफ़्तारी में इतनी परेशानी हुई तो आरोप को साबित कर पाना तो आप समझ ही सकते है की नामुमकिन है | फिर इनकी क्या बात करना ये तो कानून बनाने वाले माननीय लोग है, प्रियदर्शनी मट्टू केस में तो आरोपी के पिता बड़े आफिसर थे और रुचिका केस में खुद आरोपी एक बड़े ओहदे पर बैठा व्यक्ति था दोनों ही लगभग आरोपों से साफ बच कर निकल चुके थे वो भी सालो साल चले मुकदमे के बाद | भला हो मिडिया का जिन्होंने अपने प्रयास से इन्हें कुछ सजा दिलाई किन्तु उसके बाद भी प्रसाशन का पूरा लावा लश्कर आरोपियों को ही बचाने में जुटा था और अंत में दोनों को कड़ी सजा से बचा भी लिया | इन्हें भी छोडिये मामूली से लोग भी पैसे के दम पर डरा कर धमाका कर अपनी पहुँच दिखा कर ज्यादातर इन मामलों में बच कर निकल जाते है | 
                                                 तो ऐसे में सरकार के किसी सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति को इस मामले में सजा होने वो भी जेल की, हम कल्पना  में  भी  नहीं सोच सकते , वो भी मात्र १८ महीनो के अन्दर | ज्यादातर लोग इसके लिए दोषी अदालतों को देंगे की जहा मुक़दमा सालो साल चलता है या पुलिस को देंगे जो ठीक से जाँच नहीं करती है और पैसे रसूख के बल पर आरोपियों का साथ देती है | पर क्या वास्तव में समस्या सिर्फ यही है , क्या वास्तव में आरोपियों को सजा न मिल पाने का कारण सिर्फ तकनीकी समस्या है या कानून व्यवस्था की समस्या है | मुझे ऐसा नहीं लगता है, असल समस्या है हमारे समाज की सोच का है यहाँ पर ऐसे अपराध के पीड़ित को ही बड़ा अपराधी मान लिया जाता है और पहले उसे ही सक की नजर से देखा जाने लगता है | पुलिस स्टेशन में घुसते ही पीड़ित पर और उसकी मंसा पर इतने सवाल दाग दिए जाते है की मानसिक रूप से टूटी पीड़ित खुद आपराध बोध से ग्रस्त हो जाती है | 
                                                समाज की सोच क्या है " तुम्हारे साथ ही ऐसा कैसे हो गया ,दुनिया में और भी तो लड़किया है उनके साथ क्यों नहीं हो गया, जरुर तुमने समाज के बनाये नियमो को तोडा होगा ( याद है आधी रात को अपने काम से लौट रही एक पत्रकार की हत्या और लुट पर दिल्ली की मुख्यमंत्री ने उनके देर  रात घर से बाहर निकालने पर ही सवाल उठा दिया था ) यदि अपराधी पैसे वाला है , किसी उच्च पद पर है, राजनीतिज्ञ है ,या कोई सेलिब्रिटी है तो सीधे इसे साजिस, राजनीति , सामने वाले को फ़साने की नियत या पैसे और महत्वाकांक्षा के लिए खुद उसके पास जाने तक की शंका जाहिर कर दी जाती है जैसा शाहनी आहूजा केस में कुछ टीवी चैनलों ने ये दिखाना शुरू कर दिया की जिस नौकरानी के साथ बलात्कार हुआ वो शाहनी को पसंद करती थी क्योकि वो प्रसिद्ध फ़िल्मी सितारा था और अपनी इच्छा से बनाये गए शारीरिक सम्बन्ध को रेप का नाम दिया जा रहा है , रुचिका केस में इसे तब राजपूतो राठौर जाति के खिलाफ साजिस मान रुचिका और उसके परिवार के खिलाफ ही विरोध प्रदर्शन हुआ और राजनीति से जुड़े लोग तो इसे सीधे विपक्ष की साजिस करार दे मानाने से इंकार कर देते है | पुलिस स्टेशन में ही पीड़ित के कपडे लत्ते से ले कर उसके रहन सहने और काम धंधे पर ऐसे सवाल कर जीते जी उसके चरित्र का पोस्मार्टम कर दिया जाता है जैसे वो ही अपराधी हो |  
                               यहाँ होता ये है की जैसे ही पीड़ित ने किसी बड़े व्यक्ति या उससे आस पास से ले कर दूर का भी सम्बन्ध रखने वाले का नाम अपराधी के रूप में लेती है पुलिस तुरंत ही अपने हाथ खड़े कर लेती है और लगती है पीड़ित को ही कटघरे में खड़ा करना या मामले की लिपा पोती करने या उसे छुपाने | हालत ये है की जाँच एजेंसिया खुद ही पहले ही मान लेती है की इस मामले में कुछ नहीं हो सकता, आज हम जाँच करेंगे कल को ऊपर से दबाव आ जायेगा और सब बेकार जायेगा इससे अच्छा है कि मामला यही ख़त्म करने का प्रयास करो |  जैसे शाहिनी आहूजा केस में जाँच से जुड़े एक पुलिस वाले ने पहले ही कह दिया था की हमारे पास सब पुख्ता साबुत है बस पीड़ित अपनी बात पर अड़ा रहे , मतलब उसे अच्छे से पता था की पीड़ित समाज के निचले तबके से आती है और अपराधी समाज का जाना माना नाम है जो पीड़ित पर कल को हर तरह का दबाव डालेगा आरोप वापस लेने के लिए और अंत में हुआ भी वही ( जैसी की हर जगह खबर आ रही है की पीड़ित ने आरोप वापस ले लिया है ) किन्तु क्या जाँच एजेंसियों ने अपनी तरफ से ऐसा कोई भी प्रयास किया कि ये ना हो सके और रेप की शिकार लड़की बिना किसी दबाव के अपनी बात कहा सके जवाब नहीं में होगा तभी तो जो सक पुलिस वाले ने अपराध होने के हफ्ते भर बाद ही जाहिर कर दिया था वो कुछ समय बात सच हो गया | पुलिस को भी पता है कि ऐसे केस में क्या होता है किन्तु वो उसे रोकने और अपराधी को सजा दिलाने का प्रयास करने की जगह सब कुछ दोनों पक्षों पर ही छोड़ देता है जिससे इस तरह का अपराध करने वाले बड़े नाम बड़ी आसानी से बच कर निकला जाते है | 
                                            सिर्फ पुलिस क्या समाज के लोग भी बड़ा नाम आते ही इस तरह की घटनाओ को सक की नजर से देखने लगते है उन्हें भी ये सच कम साजिस ज्यादा लगती है | जब समाज की ( ज्यादातर लोगो की ) सोच ही यही होगी तो पुलिस जाँच एजेंसियों और खुद आपराधि इस बात से कैसे बच सकता है आखिर वो भी तो इस समाज का ही हिस्सा है अपराधी भी इस तरह के अपराध करने वक्त ये मान कर चलता है की उसका कोई कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता पहले तो अपनी इज्जत के डर से लड़की पुलिस में जाएगी ही नहीं क्योकि वो एक जाना माना नाम है और यदि वो गई भी तो अपने पैसे और पहुँच के बल पर इस सब से बड़ी आसानी से निकल जायेगा | 
                      इस लिए जरुरी है की पहले समाज की सोच बदले तभी अपराधियों में अपराध करने से पहले सजा का समाज के तिरष्कार का अपमान का डर होगा और वो ऐसा करने से पहले हजार बार सोचेगा साथ ही पुलिस पर भी राजनीतिक और उपरी दबाव कम हो और लोगो का न्याय दिलाने का दबाव ज्यादा हो ताकि वो निष्पक्ष रह कर जाँच कर सके और अपराधी को सजा दिलाने में अपना सहयोग कर सके | एक बार जब बलात्कार यौन शोषण जैसे मामलों में बड़े लोगो को सजा होने लगेगी तो इस तरह का अपराध करने वाले सभी के मन में कानून का डर होगा और अपराध में कमी आएगी | 

            

March 21, 2011

हमारा एक छोटा प्रयास इन्हें इनका बचपन लौटा सकता है - - - - - mangopeople



                                                                                                    हम सभी अकसर ये शिकायत करते है की हम ज्यादा काम करते है और घर या आफिस में किसी सुख सुविधा की कमी है तो हमें रोने का एक और बहाना मिल जाता है | जरा इन बच्चो को देखीये इनकी उम्र और इनके काम करने के माहौल को देखीये , जिस उम्र में इन बच्चो का पढ़ना लिखना चाहिए खेलना कूदना चाहिए दिन दुनिया की सभी चिन्ताओ से मुक्त हो जीवन जीना चाहिए तो ये बेचारे काम कर रहे है वो भी इस खतरनाक और घटिया वातावरण के बीच | देख कर दुःख होता है हम में से कई इन बच्चो को देखते होंगे उनके बारे में जानते होंगे पर करते कुछ भी नहीं " हम क्या कर सकते है ,बेचारे गरीब है ,बेचारे काम करते है तब खाना मिलाता है ,शिकायत करने से क्या फायदा हमारी सुनेगा कौन , एक बार इन्हें छुड़ा भी लिया तो क्या फायदा ये फिर से गरीबी के कारण इसी माहौल में आ जायेंगे" जैसे बहाने कर हम या तो इन्हें अनदेखा कर देते है या कुछ करने से पीछे हट जाते है |  कई बार हम में से कई लोगो को पता ही नहीं होता की हमें करना क्या है या हम इसकी कहा शिकायत करे | इनमे से एक मै भी हूँ मै स्वयम नहीं जानती की यदि मै किसी बाल मजदूर को देखू तो उसकी शिकायत कहा और किससे करू ( साथ में मेरा नाम भी सामने नहीं आये )पाठको से निवेदन है कि जिन्हें इस बारे में जानकारी हो वो अपनी जानकारी यहाँ दे दे या किसी एन जी ओ की जानकारी दे ( मै मुंबई में हूँ यदि यहाँ के किसी एन जी ओ की जानकारी दे तो और भी अच्छा होगा ) जो बाल मजदूरी के खिलाफ काम करती है और ऐसे बच्चो की देखभाल का भी इंतजाम करती हो | साथ ही सबसे निवेदन भी है कि यदि आप में से कोई भी बाल मजदुर को देखे खासकर जो किसी के यहाँ नौकरी कर रहे हो तो उसके मालिक को एक बार इसके लिए टोके और बताये की वो बाल मजदूरी करा कर गलत कर रहा है और उसकी सरकारी तंत्र में शिकायत भी करे | मुझे पता है की ये बहुत बड़ी समस्या है पर कहते है न की बूंद बूंद से घड़ा भरता है तो यदि एक एक आम व्यक्ति भी इस समस्या को हटाने के लिए अपना थोडा सा भी योगदान दे तो कुछ बच्चो को तो हम इस नारकीय जीवन से बचा ही सकते है | काफी जगह ये जागरूकता भी फैलाई जाती है की हमें उन सामानों का उपयोग नहीं करना चाहिए जो ऐसी जगहों पर बना हो जहा की बच्चे काम करते है किन्तु इससे उन बच्चो पर ज्यादा असर नहीं होगा बल्कि हो सकता है की उनका और भी शोषण हो और उनकी मजदूरी और भी कम कर दी जाये | पर मुझे नहीं लगता है की सर्फ़ ये करने से बाल मजदूरी कम होगी उसके लिए प्रत्यक्ष तौर पर इन बच्चो के लिए कुछ करना होगा | कम से कम एक फोन करके इसकी सूचना सही तंत्र तक पहुँचाने जैसा छोटा काम तो हम कर ही सकते है |




 














सभी चित्र  ई -मेल से प्राप्त |

March 04, 2011

मिडिल क्लास का जीवन पहले से बेहतर और दुष्कर हो गया है - - - - - - - mangopeople


    Mukesh Kumar Sinha said...
jo bhi ho, hame bas itna samajh aata hai ki ek aam bhartiya ab pahle se behtar jeendagi jee rahi hai:) aur agar aisa hai to kuchh to sarkar ne kiya hi hai..!! hai na ...:)                                                                                    प्रवीण शाह said... . . पर एक बात का जवाब आप ईमानदारी से दीजियेगा... क्या आपको नहीं लगता कि तमाम महंगाई, टैक्स, Government's Apathy आदि आदि के होहल्ले के बावजूद The Great Indian Middle Class के पास भारतीय इतिहास के किसी और दौर के मुकाबले आज ज्यादा स्पेयर पैसा है व वह और बेहतर जीवन जी रहा है।
                                                      मेरी पिछली पोस्ट  आह  बजट  ! वाह बजट !  पर मुकेश जी और प्रवीण शाह जी ने ये टिप्पणिया की थी उन दोनों ही लोगो का कहना था की आज के मिडिल क्लास का आदमी कल से बेहतर जीवन जी रहा है उसके पास कल के मुकाबले ज्यादा पैसा है | दोनों लोग की बात से मै सहमत हूँ  किन्तु उस बेहतर जीवन को हमेशा बेहतर बनाये रखने और आज की बढ़ चुकी जरूरतों को संभालने के लिए उसे कितनी मेहनत करनी पड़ रही है  वो भी देखनी चाहिए और ऐसा नहीं है की उस पर महंगाई का असर नहीं हो रहा है | बदलते सामाजिक और आर्थिक ढाचे ने उसके लिए कई नई जरुरी जरूरते पैदा कर दी है जिसे वह नजर अंदाज नहीं कर सकता है | आर्थिक उदारवाद और खुले बाजार  के दौर ने माध्यम श्रेणी परिवारों को भी सपने देखने और अपनी इच्छाओ को पूरा करने का मौका दिया किन्तु उसने इसकी कीमत भी वसूल ली |  इसी का नतीजा है की आज मिडिल क्लास को भी तीन श्रेणियों में बाट दिया गया है अपर मिडिल क्लास, मिडिल मिडिल क्लास और लोअर मिडिल क्लास | अब मिडिल क्लास में भी अमीरी और गरीबी का फर्क आ गया है | अपर मिडिल क्लास सपने देखता है उसे कर्ज ले कर पूरा करता है और सारा जीवन उस कर्ज को उतारता है | मिडिल मिडिल क्लास सपने देखता है कर्ज ले कर सपने पूरा करता है और अब कर्ज को उतारने में उसकी कमर टूटती जा रही है और जीवन की दूसरी जरूरते कर्ज के भेट चढ़ती जा रही है और तीसरा है लोअर मिडिल क्लास जिसे सपने देखने का हक़ तो मिल गया है किन्तु उनमे से कई वो पूरा ही नहीं कर पा रहा है और सारा जीवन बस उसे पूरा करने के लिए दौड़ लगाने में ही बिता देता है | पर एक सपना तो उसका भी पूरा हो रहा है " हमने संभाल रखा है आप के खास लम्हों को "  थैंक्यू रतन टाटा |                                                             पहले जो मिडिल क्लास नौकरी के दुसरे दौर में ही अपना घर या गाड़ी का सपना भी नहीं देख सकता था( खासकर बड़े शहरो में छोटे शहरो में लोगो के पास अक्सर पुश्तैनी घर हुआ करते थे )  वो फ़्लैट सिस्टम ( बड़े शहरो में ) और अफोर्डेबल गाडियों तथा आसानी से मिलते घर और गाड़ी के लिए कर्ज ने मिडिल क्लास के सपने को पूरा कर दिया किन्तु आज कुछ तो इस बढ़ती ई एम आई को झेल ले रहे है किन्तु कुछ के बस के बाहर होता जा रहा है | ई एम आई तो हर हाल में भरना ही है अब उसके लिए जीवन की दूसरी जरूरतों में कटौती करनी पड़ रही है तो कही पर पति पत्नी दोनों को ही न चाहते हुए बच्चे छोड़ कोल्हू के बैल की तरह काम में जुटे रहना पड़ रहा है | फिर घर को मेंटेन भी रखना है दुनिया जहान के टैक्स भी भरना है और बढ़ता ईधन का खर्च गाड़ी को कवर चढ़ा कर रखने के लिए या कम प्रयोग करने के लिए मजबूर किये जा रहा है |
           समय के साथ जीवन में कुछ नई जरूरते बढ़ती जा रही है | अब बेचारा मिडिल क्लास वाले का जीवन बेहतर हो गया है वो इलाज के लिए सरकारी अस्पताल में नहीं जाता या वहा की अव्यवस्था और स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता उसे ऐसा करने नही देती | प्राइवेट अस्पताल एक बड़ी बीमारी में एक ही बार में घर के सालो का बजट बिगाड़ देते है | उसके लिए हर साल हम सभी को अपनी और अपने परिवार की नजर उतार कर १० -१५ हजार मेडिकल इंसोरेंस को देना पड़ता है | उस पर से अब निजी अस्पतालों में इलाज को भी सर्विस टैक्स के दायरे में लाया जा रहा है  इससे तो इलाज और भी महंगा हो जायेगा जो मुझे नहीं लगता है की बीमे की रकम से भरी जा सकती है | अमिर पर इसका असर नहीं होगा गरीब हर हाल में सरकारी अस्पतालों के भरोसे ही रहेंगे तो इसका ज्यदा असर मिडिल क्लास पर ही पड़ेगा |
                     संयुक्त परिवार के प्रचलन अब ख़त्म होता जा रहा है और इसके साथ ही आदमी पर दो नई आर्थिक जिम्मेदारिया आ पड़ी है पहला तो है जीवन बीमा | जीवन तो पहले भी कभी भरोसे के लायक नहीं था पर अपने पीछे संयुक्त परिवार का भरोसा था किन्तु अब अपने परिवार की जिम्मेदारी मरने के बाद भी हमें ही लेनी है |  अब मिडिल क्लास अपनी मिडिल क्लास वाली सोच तो छोड़ नहीं सकता सो टर्म इंसोरेंस की जगह रेगुलर इंसोरेंस लेता है ताकि उसकी रकम डूबे नहीं बाद में मेच्योर हो उसे वापस मिल जाये सो एक बड़ी रकम बीमे की किस्ते भरने में चली जाती है  और अब सरकार बिमा को भी महंगा करने जा रही है | यदि मरे नहीं जिन्दा रह गए तो रिटायर्मेंट भी देखना है और बुढ़ापा भी तो उसकी जिम्मेदारी भी हमी पर है बच्चो का भरोसा नहीं कर सकते और सरकार की तरफ से कोई सामाजिक सुरक्षा का इतजाम नहीं है , फिर ये कंपनिया भी मजबूर कर देती है " सर उठा कर जियो " लो जी अब प्राइवेट जॉब वालो को एक मोटी रकम पेंशन प्लान में भी डालना है , वो भी इतनी की बुढ़ापे में बढे मेडिकल खर्च और आज की जीवन स्तर भी मेंटेन रहे |
                              विज्ञापन देखा है  " ये रह १८ साल बाद बंटी, उसकी गाड़ी और उसकी फ़ीस १० लाख रुँपये और फ़ीस की रकम सुन आ गई बाप को हार्ट अटैक " और भविष्य में इस हार्ट अटैक से बचना है तो उसका इंतजाम भी आज ही हमें करना होगा | जब आज की तारीख में स्कुलो की बढ़ती फ़ीस माँ बाप का सरदर्द बनी है, उच्च शिक्षा और बड़े कालेजो की फ़ीस आज ४-५ लाख है तो जरा अंदाजा लगाइए की आज से १५ से २० साल बाद फ़ीस क्या होगी जरा महंगाई का स्तर भी देखते चलियेगा और साथ में ये भी सोचते की तब तक शिक्षा का बाजारीकरण पूरी तरह से हो चूका होगा सरकार शिक्षा के क्षेत्र खास कर उच्च शिक्षा के क्षेत्र से लगभग बाहर होगी देश में निजी और विदेशी शिक्षा संस्थानों की भीड़ होगी जो कमाने के लिए शिक्षा संस्थान खोलेंगे | तो सोचिये की उनकी फ़ीस क्या होगी और उतनी फ़ीस के लिए आज से ही हमें अपनी आज की कमाई का एक बड़ा हिस्सा उसके लिए रखना होगा | भूल जाइये की जैसे हमरे माँ बाप ने हमसे कहा की जो करना है अपने पढाई के बल बूते करो वैसा हम अपने बच्चो से कह पाएंगे | बच्चे कहेंगे की हमें फला कोर्स करना है ( तब तक न जाने कौन कौन से नए नए कोर्स पढाई आ जाएगी  ) तो बस करना है भले उसके लिए वो सरकारी सस्ते कालेजो में प्रवेश न पा सके तो पेमेंट सिट भी दिलानी पड़ेगी | क्यों ? एक और नया विज्ञापन नहीं देखा है " की देश में लाखो कालेज है जहा से हर साल लाखो टॉपर बाहर निकालेंगे और फिर वो प्रतियोगिता करेंगे उच्च शिक्षा की कुछ हजार सीटो के लिए सब टापरों को सिट कहा से मिल पायेगी , तो आज से ही प्लान कीजिये "| यानि पेमेंट सिट के लिए भी आज से ही तैयारी कीजिये  और जिनके दो या तीन बच्चे है वो खुद ही हिसाब लगा ले |                                                      चलिए मान लिया की कुछ लोगो को अपने बच्चो को उच्च शिक्षा नहीं दिलानी है तो उनमे से ज्यादातर को बेटी के विवाह की चिंता होती है | तो वर्त्तमान में हमारे देश में विवाह में लेन देने, रस्मो रिवाज और अन्य समारोहों पर हो रहे खर्च को देखे तो उसके लिए भी उन्हें आज से ही बचत करनी होगी क्योकि भविष्य में ये खर्च भी आज के मुकाबले कई गुना ज्यादा होंगे और ये भी मान कर चलिए की तब तक कोई सामाजिक क्रांति नही आने वाली है जो आप को इन सामजिक खर्चो से बचा ले या आप खुद बचना नहीं चाहेंगे |                                                                                                     ये सब तो भविष्य के खर्चे है जिनके लिए हमें आज से बचत करनी है किन्तु सरकार ये सब बचत करने के लिए हमें कितनी छुट देती है सिर्फ एक लाख बीस हजार रुपये वो भी उन जगह इन्वेस्ट करने पर जहा हमारे पैसा ज्यादा नहीं बढ़ने वाले है और जो आज कुछ स्कीम है जो महंगाई की रफ़्तार से हमारे पैसे भी बढ़ा सकती है तो सुना है की उन मदों को अब २०१२ के नए टैक्स कोड प्रणाली लागु होने के बाद  हटा दिया जायेगा | यानि आज से १५-२० साल बाद या रिटायर्मेंट के बाद हमें जरुरत लाखो की होगी और हम उसके लिए पैसा इन्वेस्ट कर रहे होंगे उन जगहों पर जहा  हमें ८-९% प्रतिशत के दर से ब्याज कुछ बोनस के साथ मिलेगा | चलिए ये मान लेते है कि इनमे से कुछ चीजे चाहे तो कुछ लोग, जो सिर्फ वर्तमान में जीने में विश्वास रखते है, इसे नजर अंदाज  ( वैसे करना तो नहीं चाहिए ) कर सकते है , तो आज की जरूरते भी कहा कम है |                                                               हमारे बचपन में टीवी फ्रिज जैसी चीजे विलासिता की चीज होती थी आज झोपड़ो में भी मिल जायेंगे | कुछ साल पहले तक कंप्यूटर बस आफिसो में और अमीरों के बच्चो तक सिमित थे अब इनके दर्शन भी आप को हर मध्यम वर्गीय परिवारों में हो जायेगा इस तरह के सामानों से हमारा घर दिन पर दिन भरता जा रहा है और जो हर ८-१० साल बाद बदल जाता है नए ब्रांड नए आधुनिक माडल | कपडे भी अब ब्रांड के नीचे कहा पसंद आते है ब्रांडो की अच्छी फिटिंग और गुणवत्ता के आगे सस्ता तो मन भाता ही नहीं है अब वो भी महंगे कर दिए है सरकार ने ,अब उसे हमारा अच्छा पहनना भी नहीं भा रहा है | कपडे क्या खाने पीने के सजने सवरने सभी चीजो में ब्रांड, अच्छे से अच्छे ब्रांड के नीचे बात ही नहीं होती है |                                                                                                                              फिर बच्चो को अच्छे से अच्छे स्कुल में डालना है उनकी महँगी फ़ीस भी भरनी है किताब कॉपी का खर्च भी देखना है और स्कुलो के प्रोजेक्ट से लेकर साल भर होने वाले ढेरो चोचलो के खर्चो को भी उठाना है वो भी बिना किसी ना नुकुर के और सरकार जीवन के सबसे महत्वपूर्ण खर्चे के लिए हमें कितनी छुट देती है १२ हजार रुपल्ली की, सरकार ही जानती होगी की आज की तारीख में किस स्कुल की ट्यूशन फ़ीस इतनी है | फिर केवल स्कुल से कहा चलता है टियुशन भी चाहिए जो महानगरो में घंटो और विषयो के हिसाब से चार्ज करते है  कुछ बच्चो को तो एक साथ कई ट्यूशन दिलाने पड़ते है | फिर उनके हॉबीकोर्स के खर्चो को हम कैसे भूल सकते है आज सबको आलराउंडर जो बनना है |                                                                                                                                 गया वो जमाना जब दो चार महीने में एक बार हम घूमने के नाम पर किसी मंदिर या रिश्तेदार पहचान वाले के घर चले जाते थे आज तो वीकेंड मनाने का जमाना है हर शनिवार या रविवार घूमने का दिन होता है बच्चे घर में टिक ही नहीं सकते है और बाहर जाना है तो मैक्डी से लेकर पिज्जा वालो का धंधा भी तो हमें ही जमाना है बाहर नहीं भी गए तो क्या हुआ ये तो आपके दरवज्जे तक घंटी बजा कर दे जाते है और बच्चा बच्चा इनको आर्डर देना जनता है | और अब गर्मी की छुट्टिया दादी या नानी के घर नहीं बीतती है माध्यम वर्गीय परिवारों की, उन्हें भी दुनिया जहान देखना है भूल जाइये यात्रा के नाम पर बुढ़ापे में तीर्थ यात्रा के ज़माने को | "ट्रूली एशिया मलेशिया "  वाले सपने तो मिडिल क्लास नहीं देख सकता किन्तु " एम पी गजब है सबसे अलग है " या "गो गोवा"  वाला विज्ञापन तो उन्हें भी देश देखने की इच्छा तो जगा ही देता है |                                                                     मिडिल क्लास वाले है पढ़े लिखे है तो चाह कर भी चाइनीज सस्ते खिलौने अपने बच्चो को नहीं दे सकते है हमें पता है वो खतरनाक है तो फिर आ जाइये वही ब्रांडेड महंगे खिलौनों पर |  हम मिडिल क्लास वाले अब अपने बच्चो के कम से कम खिलौनों की फरमाइश पूरी करने में ज्यादा ना नुकुर नहीं करते और करना भी नहीं चाहते है | बच्चे और उनकी जरूरते अब हमारे जीवन में पहले के लोगो से कही ज्यादा अहमियत रखते है | मैंने देखा क्रिसमस और बाल दिवस पर एक नामी ब्रांड के खिलौनों की दुकान में इतनी भीड़ थी की लगा जैसे वो खिलौने मुफ्त में बाँट रहे थे सब पैरेंट्स अब बच्चो की जरूरतों के प्रति काफी मुखर हो चुके है |                                                           अब किस किस का जिक्र करे लिस्ट तो बहुत लम्बी है | हा ये ठीक है की आज मिडिल क्लास का जीवन पहले से बेहतर है किन्तु इसने उसे उसी बेहतर जीवन की आदत डाल दी है अब वो उससे नीचे नहीं आ सकता है अपनी जरूरते कम नहीं कर सकता है सपने देखना बंद नहीं कर सकता है किन्तु इस बेहतर जीवन का स्तर बनाये रखने के लिए और बढ़ी हुई जरूरतों को पूरा करना दिन पर दिन महंगा होता जा रहा है और इनको पूरा होने में थोड़ी सी भी कसर रह जाये तो वो उसे पहले से ज्यादा सताती है और उसे मजबूर दिखाती है |       

March 01, 2011

आह बजट ! वाह बजट ! - - - - - - - mangopeople


                                                                   
 स्पष्टिकरण :-  ये किसी आर्थिक जानकर के विचार नहीं है एक आम आदमी एक आम गृहणी के आम से विचार है जिसका वो आचार यहाँ सुखाने के लिए डाल रही है सो बाद में आचार खट्टे  है की शिकायत न करे आम के आचार को विचार कर खाये | मसाले में कोई तकनीकि कमी दिखाई दे तो अवश्य बताये |
                     

                  सुबह का अख़बार उठाया इस उम्मीद के साथ की जैसे पहले बजट के दुसरे दिन अखबारों की पहला समाचार होता था कि क्या क्या चीजे सस्ती हुई और क्या क्या चीजे महँगी, किन्तु अखबार में ये मुख्य समाचार नहीं था | याद होगा पहले एक पूरी लिस्ट होती थी जिसमे सस्ते हुए और मंहगे ही सामानों के नाम होते थे पर काफी समय से अब ये परम्परा बंद हो गई है | अब बजट को तकनीकि रूप से ऐसा बनाया जाता है की अब पहले की तरह आम आदमी पर इसका सीधे प्रभाव बजट के बाद ज्यादा नहीं पड़ता है और आम आदमी भी बजट की तरफ उतना टक टकी लगाये नहीं देखता है | अब बजट बजट न हो कर तकनीकी खेल ज्यादा हो गया है जिससे आम आदमी को अंग्रेजी में ( तकनीकि रूप से ) बेफकुफ़ बनाया जाता है | 
                                                                     अब जैसे रेल बजट को ही ले लीजिये अगर यु पी ए के आठ  सालो की बात करे तो ये खूब प्रचारित करवाया जाता है की टिकटों के दाम नहीं बढे पर क्या वास्तव में ऐसा है, नहीं; इसे बड़ी चालाकी से उन्होंने ऐसे किया की जो दिखाई नहीं देता है | जैसे कई मेल ट्रेनों को एक्सप्रेस घोषित कर दिया जाता है न सुविधाए बढ़ी न ही ट्रेन की गति पर इस एक्सप्रेस के नाम पर टिकटों में २० रुपये का तकनीकि इजाफा कर दिया गया जिसका पता आम आदमी को टिकट खरीदते समय चलता है | रिटर्न टिकट लेने पर अब हमको १० रुपये ज्यादा देना होता है तत्काल कोटे के नाम पर सामान्य टिकटों को महंगे दामो पर बेचा जाता है जबकि होना ये चाहिए की इसके लिए अलग से डिब्बे जोड़े जाये | इसे कहते है तकनीकि खेल कि प्रचारित तो ये किया की दाम नहीं बढ़ाये किन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है | 
                                                          यही हाल आम बजट का भी है | कहने के लिए ये साल भर के लिए सरकार का लेखा जोखा है किन्तु वास्तव में अब कितनी चीजे सरकार के हाथ में रह गई है या ये कहे की खुद कितनी चीजे उसने अपने हाथ में रखी है  सब कुछ उसने तो भगवन भरोसे ( बाजार भरोसे ) छोड़ दिया है | तो अब उसके बजट का कोई ज्यादा मतलब भी नहीं रह गया है कुछ एक चीजो को छोड़ दे तो | अब पहले की तरह आर्थिक नीतिया बजट पेश होने तक नहीं रोकी जाती समय और जरुरत के अनुसार साल के बीच बीच में कुछ आर्थिक निर्णय सरकार लेती रहती है |  यही कारण है की बजट का अब बाजार पर भी उतना असर नहीं होता है की एका एक सभी सामान सस्ते हो गए या सामानों का दाम रातो रात बढ़ गया ,हा शेयर बाजार भले एक दिन कुछ ऊपर निचे होने की परम्परा निभाता है किन्तु वो भी अब परम्परा भर ही रह गई है |
        क्योकि अब चाहे पेट्रोल के दाम हो या अनाज, टीवी, फ्रिज आदि आदि किसी का भी दाम बढ़ने और घटने के लिए बजट का इंतजार नहीं किया जाता अब ये सब अंतराष्ट्रीय बाजार, भारतीय बाजार, उपभोक्ता की जरूरते आदि पर निर्भर हो गया है | अब पेट्रोल के दाम ही ले लीजिये पिछले दो साल में बजट तो दो बार पेश हुए किन्तु इनके दाम सात बार बढ़ा दिया गया, जबकि कभी ये केवल बजट में ही बढाया या घटाया जाता था | याद है बजट के दो दिन पहले से ही लोग अपनी गाडियों की टंकी फुल कराने लगते थे और कुछ महा चालक पेट्रोल पंप वाले तो बजट के एक दिन पहले बंद रखते थे क्योकि ये तो निश्चित ही होता था की दाम बढ़ेंगे और वो पुराने सस्ते ख़रीदे मॉल को बजट के दुसरे दिन मंहगे दाम पर बेचते थे , क्योकि बाकि चीजो के दाम भले बाद में बढ़ते थे किन्तु पेट्रोलियम पदार्थो के दाम आधी रात से ही लागु हो जाता था और यदि मेरी यादास्त सही है तो पहले बजट आज की तरह सुबह नहीं शाम को पेश किया जाता था  यानी बजट पेश होने के कुछ ही घंटो बाद दाम बढ़ जाते थे |
                     बजट के दुसरे दिन चाय पान की दुकानों पर वो जमघट और गहन चिन्तन मनन की किसके दाम बढ़ने से किसको क्या फायदा नुकसान हो रहा है और किसके घटने पर आम जनता को फायदा | लोग अपनी अपनी जरूरतों के हिसाब से बजट को अच्छा और बुरा कहते थे | महिलाओ के सबसे ज्यादा चिंता अपने गैस सिलेंडर के दाम की होती थी | पर कुछ चीजे तय होती थी जैसे की टीवी फ्रिज आदि के दाम लगभग हर बजट में कम होते थे और आम आदमी कहता की इसके दाम कम करने से क्या फायदा क्योकि ये चीजे तब सबकी जरुरत नहीं होती थी मतलब एक बार घर में टीवी या फ्रिज आ गया तो बीस साल की छुट्टी मानिये कितने भी ख़राब हो जाये ठोक पीट मैकेनिक के यहाँ भेज भेज कर चलाया या घिसा जाता था | पर अब तो पूछिये मत ख़राब होने तो दूर की बात अब तो ज्यादा पुरना होते ही या कोई नया माडल बाजार में आते ही लोग इन सामानों को बदल डालते है | 
                                          बजट में पहले सबसे दुखी होते थे पीने वाले क्योकि हर बजट के बाद उनके पैग का दाम बढ़ जाता था , बाकि लोग इससे खुश होते थे, हा हा और बढ़ाना चाहिए शराब सिगरेट आदि के दाम इन पर और टैक्स लगाना चाहिए ताकि पीने वाले पीना छोड़ दे | लेकिन न तो सरकार ने टैक्स बढ़ाना छोड़ा न पीने वालो ने पीना छोड़ा | सरकार इन पर टैक्स लगा कर जो पैसा कमाती है वो शराब सिगरेट को न पीने की हिदायत देने वाले विज्ञापनों, इससे होने वाले कैंसर आदि बीमारियों के इलाज और इन्हें पी पी कर गरीब हो चुके लोगो को सब्सिडी दे कर अनाज आदि देने और पी कर गाड़ी चलाने वाले से होने वाली दुर्घटनाओ पर खर्च कर देती है | 
                   चलिए हम लोग भी खुश हो लेते है सरकार ने हमें साल का २०६० रुपये का यानि महीने का १७१ रु का फायदा (????) पहुँचाया है क्या करे इसका मारे ख़ुशी के पार्टी कर ले , या  पता चला है कि पेट्रोलियम पदार्थो के दाम फिर से २-४ रु तक बढ़ने वाले है  यानी महीने के ५०० रु के लिए , सरकारी अस्पताल तो हमारे जाने लायक नहीं है प्राइवेट महंगे कर दिया तो उसके लिए, सब्जी और अनाज के दाम अब भी कम नहीं हुए महीने के १००० रु के लिए , दूध के दाम अभी फिर से तीन रु बढ़ गए महीने के ९० रु के लिए आदि आदि आदि पर खर्चने के लिए बचा लू |  सरकार खुद कह रही है की अगले साल महंगाई दर ८.५% रहेगी और टैक्स में छुट कितना दे रही है पता नहीं सरकार क्या हिसाब किताब लगाती है | वैसे तो हमारे ये भी नहीं बचने वाले है साल का वेतन बढ़ोतरी जो होगा तो उसके बाद तो हमारी तरफ और टैक्स ही निकलेगा | वैसे सरकार से ज्याद उम्मीद थी नहीं क्योकि जिस सरकार का मुखिया ये कहे की महंगाई है ही नहीं वो तो बस मिडिया का प्रोपेगेंडा है और हमारे वित्त मंत्री सब भगवान भरोसे छोड़ कर ये कहे की उनके पास अल्लाद्दीन का चिराग नहीं है जो महंगाई कम कर दे तो वो क्या कर सकते है |         
             

February 23, 2011

ऐसे ऐसे कैसे कैसे ये पति - - - - - - - mangopeople

 सौ देश के सौ पुरुष सौ तरह के हो सकते है किन्तु दुनिया के किसी भी कोने से पति को लाइए वो सब के सब एक ही तरह के होते है मतलब की पत्नी को लेकर उनकी सोच लगभग एक जैसी होगी पत्नी के साथ उनका व्यवहार बातचित लगभग एक सी होगी  | दुनिया के किसी भी कोने से किसी पत्नी से अपने पति की खराबिया बुरी आदते पूछिये सब मेल खाती होंगी बस संस्कृति और रहन सहन के तरीके के कारण दो चार इधर उधर हो सकती है नहीं तो सभी पत्नियों को एक सी समस्याए पतियों से होती है | कुछ खास का जिक्र यहाँ कर रही हूँ देखिये की आप के पति किस श्रेणी में आते है या आप किस श्रेणी के पति है |

प्यार का दावा करने वाले पति :- ज्यादातर पति दावा करते है की वो अपनी पत्नियों को बहुत प्यार करते है, करते है तो करते है , इसमे कहने की क्या जरुरत है ( खास कर अरेंज मैरिजवाले, वैसे लव मैरिज वालो की स्थिति भी कुछ साल बाद अरेंज मैरिज वालो जैसी ही हो जाती है या ये कहू कुछ ज्यादा ही बत्तर ) " सिर्फ एहसास है इसे रूह से महसूस करो " और ये वाला गाना उनकी टैग लाइन होती है | पर जिस पत्नी को इस एहसास को, कि उसका पति उसे बहुत प्यार करता है,  महसूस करना चाहिए उसकी रूह सारा जीवन उसे प्यार को बस ढूंढ़ते गुजर देती है पर वो मिलती नहीं |  जिस बेचारी को असल में प्यार को महसूस करना चाहिए वो उसे कभी ऐसा कर ही नहीं पाती | करे भी कैसे पति जब उसके साथ दो घडी बैठे तब ना सुबह का समय तो मान कर चलिए की शायद ही किसी को एक दुसरे के लिए समय हो आफिस से आने के बाद पति फ्रेस हो कर सीधा गली के नुक्कड़ पर दोस्तों के पास या जहा भी उनकी मंडली जमती हो कुछ तो आफिस के बाद मंडली जमा कर ही वापस घर आते है और कुछ परिवार के बाकि सदस्यों के साथ टीवी के पास या काम के मारो के पास आफिस का काम तो कुछ को विवाह के बाद भी एकांत से प्यार , अब तो टीवी के साथ निगोड़ी इंटरनेट भी है कभी सोसल नेटवर्किंग साइड तो कभी ब्लोगिंग | ब्लोगिंग से अपने विचार अनजाने को पहुंचा दिया दुसरो का सुन लिया पर पत्नी के विचारो से बिलकुल अनजान , नेटवर्किंग साइड पर अपना नेटवर्क खूब मजबूत कर लिया पर पत्नी को इनके नेटवर्क में कभी आती ही नहीं | जो पत्नी को कुछ कहना है तो अब सुबह सुबह मेरे पास समय नहीं है तुम्हारा रोना धोना  सुनने के लिए बाद में बताना , शाम को लो घर में अभी घुसा नहीं की तुम्हारा रोना धोना शुरू हो गया और रात में अब सोने के समय में अपना रोना धोना ले कर मत बैठ जाओ और छुट्टी के दिन में अब अपना ये सब लेकर सुरु मत हो जाओ मेरी छुट्टी ना बर्बाद करो | अब तो नरसिंह देव ही कोई बेला ( समय ) बता सकते है इन पतियों से बात करने का जो उन्हें हमेशा पत्नियों का रोना धोना लगता है | अब इन से क्या बात करे ???

बचत करने वाले पति  :-  पतियों की बड़ी शिकायत रहती है की पत्निया बड़ी फिजूल खर्च होती है पैसे बचत नहीं करती है |  " फलाने की पत्नी को देखो कितना बचत करती है सेल से ढूंढ़ ढूंढ़ कर सस्ते में सामान लाती है और एक तुम हो की ब्रांड के निचे बात ही नहीं करती हो तुम्हारे लिए तो महंगी चीज ही अच्छी होती है सस्ता मतलब बेकार | हर सामान के लिए मॉल भागोगी सामने की दुकान से कुछ भी नहीं लोगी जहा वही चीज सस्ते में मिल जाएगी  , कभी बचत भी किया करो" और जैसे ही पत्नी ने बचत की पति  " ये कौन से ब्रांड का डियो ले आई हो मै इस ब्रांड का नहीं लगता हु " पत्नी " अजी पहले तो यही लगाते थे ,एक पर एक फ्री मिल रहा था ले आई " पति " क्या सेल से उठा लाई हो तुम्हारा तो कोई क्लास ही नहीं है कहने के लिए मॉल में जाती हो पर ढंग का सामान नहीं लाती कुछ भी सेल से उठा लाती हो और ये शर्ट कहा से लाई हो " " जी सामने वाली दुकान से " " क्या वो सामने वाली फटेहाल सी दुकान से वहा से तो मै अपने लिए रुमाल भी न लू उसके पास कुछ ढंग का मिलाता भी है तुम भी कही से भी कुछ उठा लाती हो "| लो कल्लो बात अब इनके लिए क्या ख़रीदे ???

साफ सफाई पसंद पति  :- इस टाईप के पति को घर हमेशा साफ सुथरा दिखना चाहिए | साफ सुथरे घर में ये आफिस से आते ही अपना बैग सोफे पे फेका और वही पर जूता उतर कर छोड़ दिया मोजो को ऊतार कर जूते में नहीं डालेंगे उसे सामने सेंटर टेबल पर रख देंगे फिर बेडरूम में जा कर कपडे बिस्तर पर छोड़ फ्रेस होने बाथरूम में चले जायेंगे और बाहर आ कर कहेंगे ये घर की क्या हालत बना दी है जब देखो पूरा घर फैला रहता है यहाँ वहा सामान फैला पड़ा है घर को ढंग से रखना आता ही नहीं | कुछ थोड़े व्यवस्थि होते है और अपने फैलाए सामान को समेटना शुरू कर कहते है इस घर की हालत देखो यदि मै यहाँ वहा से सामान न समेटू घर ढंग से न रखु तो घर घर नहीं कूड़ा खाना लगेगा | अब इनको क्या कहे ???

भोजन पसंद पति :- पत्नी ने बड़े प्यार उनकी फेवरेट वाला संभार बनाया और पति देव पहला चम्मच मुहं में डालते ही " तुमको तो संभार बनाना ही नहीं आता है कितना सडा सा लगा रहा है उस दिन देखो मिसेस रेड्डी ने कितना अच्छा संभार बनाया था और उस दिन छोले भी कितना बेकार बने थी मिसेस भल्ला के हाथ के छोले की तो बता ही कुछ और है " और बेचारी पत्नी " जिस सांभर को तुम सडा हुआ कह रहे हो और छोलो को बेकार उसी दोनों की रेड्डी जी और भाल्ला जी तारीफ करते नहीं अघाते एक कटोरी भेजती हूँ दूसरी कटोरी मांग कर ले जाते है " | अब इनको क्या खिलाए ???

मैनर वाले पति :- ऐसे पतियों के साथ यदि पत्नी उनके बॉस या किसी अति खास व्यक्ति के साथ भोजन करने जाये तो उसे इतने टेबल मैनर बताये जांयेंगे की पत्नी को लगेगा की उससे बड़ा गावर तो कोई होगा ही नहीं शायद वो किसी जंगल से पकड़ कर आई है पर जब पत्नी कभी पति साथ कही बाहर खाने को जाये तो पति देव खाना सर्व होते ही बिना किसी की और देखे खुद खाना शुरू कर देंगे  चाहे किसी और के प्लेट में खाना सर्व भी नहीं हुआ हो खाना खाते समय बड़ा बड़ा मुंह खोल कर आवाज करते हुए ऐसे खायेंगे की सामने बैठा क्या बगल की सिट वाला भी मुड़ कर देखने लगे , खाने के बाद पेट पर हाथ फेर कर जोर का डकार मार देंगे, वो भी तब जब कभी सामने पत्नी की सहेलिया हो या वो रिश्तेदार हो जिनको पत्नियों ने अपने पति के मैनर वाला होने की शान बघारी हो | मुफ्त का टूथ पिक देख उस पर टूट पड़ेंगे और वही सबके सामने दांत साफ करना शुरू कर देंगे भले घर पर कभी खाने के बाद दांत न साफ करते हो  | नाक में उंगली डालना , छिकते, खासते और जम्हाही लेते समय हाथ न रखना, सबके सामने कही भी खुजली करना सुरु कर देना , बिना हाथ धोए खाने बैठ जाना और  तुर्रा ये की ये सब चोचले है इन्हें घर पर करने की जरुरत नहीं है घर तो आराम से रहने की जरुरत है और यही हरकते जब उनका देख कर बच्चे करे तो " कैसी माँ हो बच्चो को जरा भी ढंग के मैनर नहीं सिखाया है करती क्या हो " |  अब इनको क्या सिखाये ???

पत्नी की हिफाजत करने वाले पति :- ऐसे पति बड़े हिफाजती होते है अपनी पत्नी को बहार ले जाने में बड़ा डरते है, दोस्तों के साथ कही घूमने का कार्यक्रम बना या एक दिन के पिकनिक का, कुछ अपनी पत्नी समेत जायेंगे पर कुछ पत्नी हिफाजती पति पहला फर्ज निभाते हुए पत्नी को हर कष्टों से दूर करने का प्रयास करेंगे , अरे कही तुम बीमार पड़ गई तो, तुम वहा क्या करोगी बोर हो जाओगी ,  वहा बहुत चलना पड़ता है तुम नहीं चल पाओगी, इतनी ठंडी गर्मी तुम बर्दास्त नहीं कर पाओगी ,अरे बच्चा इतना छोटा है उसे लेकर कहा बेकार में परेशान होगी ,तुम थक जाओगी नाहक, यही घर पर आराम से रहो मै हो कर आता हूँ | फिर बेचारे पत्नी को न ले जा पाने का कष्ट सह नहीं पाते है और जब वहा दूसरो को अपनी पत्नियों के साथ नाचे गाते आन्नद उठाते देखते है तो अपना गम  दूसरो की पत्नियों के साथ ही नाच गा मिटाते है " क्या भाभी जी एक डांस मेरे साथ भी क्या डांस करती है आप " अपने बच्चे घर पर छोड़ कर आते है और दूसरो के बच्चो के साथ वहा बड़ा प्यार जताते है सबके फेवरेट अंकल बन जाते है |
                        ऐसे पति प्रकृति प्रेमी भी होते है जब बाकि अपने बीबी बच्चो के साथ फोटो ले कर अपनी यादो को समेटते है तो ये बेचारे अपने कैमरा में प्रकृति की सुन्दरता को ही कैद कर संतुष्ट होते है | पहाड़, झरना, नदी, नाला, समंदर, रेत बर्फ आदि आदि की फोटो लेते रहते है पर ये अन्य प्रकृति प्रेमियों से थोड़े अलग होते है इसलिए इनकी फोटो में प्रकृति के सुन्दर नजारों के साथ ही आप पाएंगे की फोटो के एक कोने में या कभी कभी बीच में ,तस्वीर की सुन्दरता बढ़ाने के लिए कोई सुन्दर सुकोमल महिला या लड़की अवश्य होती है जो गलती से अचानक से इनकी प्राकृतिक फोटो में आ जाती है | अब इनको कहा घुमाये ???

 पत्नी की सुनने वाले पति :-पत्नी जब टोक दे की फलाने बाजार मत जाओ यो आज बंद रहता है तो उसकी बात अनसुना कर चल देंगे जब उसकी बात सही निकलेगी तो कहेंगे की मै तो जनता ही था कि  नहीं मिलेगा बाजार बंद होगा तुम पहले ही टोक जो दी थी, तुम टोको और कोई काम हो जाये होई नहीं सकता और जब पत्नी न टोके तो पहले क्यों नहीं टोका की आज वो बाजार बंद होगा बेवजह उतनी दूर जा कर पैसा समय बर्बाद किया | पत्नी याद दिलाए की बिल आया है जमा कर दीजिये तो कहेंगे की अभी कल आया है न आज समय नहीं है बाद में याद दिलाना जमा कर दूंगा और दो चार बार याद दिलाने पर कहेंगे की क्या किसी चीज के पीछे पड़ गई हो बार बार एक चीज की रट लगा दी है कहा ना समय मिलेगा तो जमा कर दूंगा आखरी तारीख बीतने के बाद पत्नी पूछेगी की जमा कर दिया तो कहेंगे की पहले क्यों नहीं याद दिलाया अब बता रही हो आखरी तारीख बीतने के बाद, पत्नी उत्तर देगी जिस दिन आया था उसी दिन याद दिला दिया था, तो जवाब मिलेगा की दो चार बार याद दिलाना था ना | अब इनको क्या क्या याद दिलाए ???

गैजेट पसंद पति :- हा इन पतियों को गैजेट काफी पसंद होते है खास कर अपनी पत्नियों के मोबाईल | उन्हें अपने मोबाईल  से ज्यादा अपनी पत्नियों के मोबाईल  पसंद होते है उसके गेम, उनकी मोबाई से ली तस्वीरे आदि आदि और इस की आड़ में ये पत्नियों की आई गई काल से लेकर सारे सन्देश भी छान मारते है की उनके पीछे पत्नी ने किस किस से बात की और किस किस का कितना फोन आया और कौन कौन किस किस तरह के संदेस पत्नियों के पास भेज  रहा है | वैसे ऐसे लोग सिर्फ पत्नियों के नहीं अपनी सभी महिला रिश्तेदारों के और जान पहचान वाले खासकर महिलाओ के फोन इसी तरह खंगाल डालते है | ( इस बारे में अगली पोस्ट में और विस्तार से लिखूंगी फ़िलहाल के लिए इतना ही | )

 बच्चो से प्यार करने वाले पति :- ऐसे पतियों को बच्चो से बड़ा प्यार होता है जैसे विवाह के बाद पत्नी कहती है की वो अभी बच्चे नहीं चाहती पहले कुछ साल एक दुसरे को समझने और अपने कैरियर को देना चाहती है तो तुरंत ऐसे पतियों को बच्चे के प्रति बड़ा प्यार पैदा हो जाता है और शुरू हो जाता है बच्चे की रट की मुझे बच्चे बड़े प्यारे लगते है, मै तो अभी एक बच्चा चाहता हूँ, हमें लगता है की पहले हमें एक बच्चा कर लें चाहिए फिर आराम से दूसरी चीजो के बारे में सोचना चाहिए, कही हम देर करे तो कल को बच्चे के लिए हमें तरसना ना पड़े उनको देखो उन्होंने देर की तो उन्हें हुआ ही नही, या घर में सभी हमारे बच्चे के लिए इंतजार कर रहे है माँ पापा की आँखे अपने पोता पोती के लिए तरस रहे है ऐसा करो एक बच्चा कर लेते है माँ उसे देखेगी तुम आराम से अपने काम को देखना कोई परेशानी नहीं होगी आदि आदि | अब पहला बच्चा हो गया तो, अरे मेरी माँ उसकी कैसे देखभाल कर पायेगी वो इतने छोटे बच्चे को कैसे संभालेगी , बच्चे की देखभाल तुम ही करो माँ अपने बच्चे को जितने अच्छे से संभाल सकती है कोई और उसे नहीं कर सकता वगैराह वगैराह, लो निकल गए चार साल और | चार साल बाद एक बार फिर पत्नी की इच्छा ने अंगड़ाई ली और वो बोली मुझे लगता है की अब मुझे अपने काम करने के बारे में सोचना चाहिए अब हमारी बेटा \ बेटी स्कुल जा रहे है मै खाली हूँ तभी पति की दुसरे बच्चे की इच्छा अंगड़ाई लेने लगती है | मुझे लगता है की हमें दूसरा बच्चा कर लेना चाहिए ,क्या है न की एक बेटा \बेटी तो है इस बार बेटा \बेटी हो जाये तो परिवार एक तरह से पूरा हो जायेगा, घर में दो बच्चे तो होने ही चाहिए दोनों के कम्पनी मिलती है फिर पत्नी को दो बच्चे होने के सारे फायदे गिना दिए जाते है और घर में दूसरा बच्चा आ जाता है और चार साल की छुट्टी |
 इनमे से भी कुछ ऐसे होते है जो बच्चो को कितना प्यार करते है की पूछिये मत पत्नी को सीधा फरमान रहता है की मेरे आने से पहले उसे सुला देना , मेरे सामने इसकी चिल्ल पो नहीं होनी चाहिए, यदि बच्चे बड़े है तो बच्चो को पापा के घर आते ही उनके कमरे में न जाने का फरमाना सुना दिया जाता है या तो उन्हें उनके कमरे में चुप चाप रहने को कह दिया जाता है या फिर उन्हें घर से बाहर खेलने के लिए कहा दिया जाता है और खाने और सोने के समय ही आने के लिए कहा जाता है | उफ़ ये प्यारे पापा ???

               वैसे ये लिस्ट यही ख़त्म नहीं होती है अभी तो इसमे कई और बाते जुड़ सकती है जो मुझसे छुट गई है वो आप पाठक पूरा कर दे मै पोस्ट में जोड़ती जाउंगी |
 एक नई फिल्म आई है उसका एक संवाद पोस्ट पर बिलकुल ठीक बैठता है तो उसका जिक्र कर देती हूँ कि
 " दुनिया की हर पत्नी कभी न कभी , कभी न कभी अपने पति से हमेशा के लिए छुटकारे के बारे में जरुर सोचती है " |
 वैसे पूरी तरीके से नहीं ( मतलब वो तरीका नहीं अपनाती या सोचती जो फिल्म में दिखाया गया है और छुटकारा की सोच कुछ समय के लिए ही हो सकती है  ) पर कुछ हद तक तो मुझे लगता है प्रियंका डार्लिंग ठीक ही कह रही है | :)))