July 04, 2012

पीड़ित कौन और मांफी देने वाला कौन - - - - mangopeople

                                                                   
                                                                मुद्दे को ठीक से समझने के लिए उसे एक कहानी किस्से की तरह सुनाती हूँ, मान लीजिये की एक गांव क़स्बा शहर जैसा कुछ है, जहा सब एक दूसरे को जानते है जैसे की अपना ब्लॉग जगत है, कुछ वैसा ही, वहा कई तरह के लोग है ,उनमे एक ऐसा भी व्यक्ति है जिसकी आदत है चर्चा में बने रहने के लिए कुछ भी करने की,  सब उसकी बाते करे उसे देखे उसके लिए वो कुछ भी करता है , तो कभी बस अपने  आन्नद के लिए,  महिलाए उसके निशाने पर ज्यादा रहती है महिलाए के लिए अपने घर की छत पर चढ़ कर अश्लील टिप्पणिया करना उसके सबसे प्रमुख आदतों में एक थी , ये सबसे आसान तरीका है चर्चा में आने के लिए और मजे लेने के लिए तैयार कुछ लोगो को अपने पास बुलाने के लिए | कुछ लोगो को गलतफहमी थी की वो बड़े आदमी है ( अभी हाल में ही ननद की बेटी की शादी थी, गाने वाले लडके की तरफ किसी ने इशारा कर कहा बहुत बड़ा सिंगर है,  मैंने कहा वो आर्केस्ट्रा वाला,  तो उन्होंने कहा की अरे नहीं भाई टीवी पर एक प्रतियोगिता में आया था बड़ा सिंगर है,  मैंने कहा काहे का बड़ा आज भी शादियों के आर्केस्ट्रा में गा बजा रह है, तो जबाब मिला आर्केस्ट्रा मत कहिये बैंड  है | मतलब टीवी पर आने के बाद आदमी बड़ा हो जाता है और आर्केस्ट्रा बैंड बन जाता है ) कुछ एक लोग बड़ा आदमी है के कारण उन्हें कुछ कहते नहीं थे कुछ अपने मतलब के लिए उन्हें समय समय पर उकसा कर मजे लिया करते थे ( कई बार लोग खुद कई गिरी हुई हरकते नहीं कर पाते है तो ऐसे लोगो को सहारा लेते है अपना दामन भी साफ और खुद की खुन्नस भी निकल गई ) सालो तक उनकी यही हरकते रही लोगो को व्यक्तिगत टिप्पणी  करना उल जुलूल हरकते करना आदि आदि | एक दिन उनको ये एहसास  हुआ की इन हरकतों के कारण वो बड़े आदमी बस माने जाते है कुछ लोगो के लिए,  किन्तु उन्हें वो सम्मान नहीं मिलता है कोई पुरुस्कार नहीं मिलता है उनकी हरकते बीच में आ जाती है , तो उन्होंने सोच लिया की अब से वो ये सारी हरकते बंद कर देंगे ताकि उन्हें वो सब मिल सके और उन्होंने अपने घर की छत पर चढ़ चिल्लाना शुरू किया की पिछले किये की माफ़ी मांगता हूँ आगे से ऐसी कोई हरकत नहीं करूँगा सब लोग मांफ कर दे | उनका ऐसा कहना था की अचानक से उस समाज  ,जगत के बहुत से  विद्वान् बुद्धिजीवी और आम लोग  निकल कर बाहर आ गये और लगे उन्हें माफ़ करने,  उनकी माफ़ी की सराहना करने और ये बताने की उन्होंने माफ़ी मांग कर कितना बड़ा काम किया है अब तो वो महान लोगो में शामिल हो गये सब ने मिल कर उन्हें माफ़ कर दिया | किन्तु वो बेचारे सब बिलकुल आश्चर्य में पड़ गये जिनको उन्होंने सारा जीवन व्यक्तिगत टिप्पणिया की उन्हें परेसान किया महिलाओ से अश्लील बाते की , वो सोच में पड़ गये की इस व्यक्ति ने अपराध तो हमारे खिलाफ किया है तो ये माफ़ी देने वाले ये कौन लोग है , माफ़ी मांगने वाले ने तो इनके खिलाफ कोई अपराध किया ही नहीं है तो ये माफ़ी क्यों दे रहे है और ये बात भी समझ नहीं आती है जब अपराध करने वाले ने कुछ व्यक्ति विशेष लोगो के खिलाफ परोक्ष और अपरोक्ष रूप से अपराध किया है तो उसे माफ़ी उनसे मांगनी चाहिए या पूरे उस समाज से | बेचारे इस सोच में अपने सर के बाल नोच रहे थे और सोच रहे थे की आज वही लोग उस अपराधी को माफ़ी दे रहे है जो कभी भी अपराध के होते समय उसका विरोध करने नहीं आये आज अचानक से एक अपराधी को माफ़ करने कैसे चले आये |
                                                           
                                                            
                                                                         अब मुद्दा क्या है,  नहीं वो व्यक्ति या उनका व्यवहार मुद्दा नहीं है ( ऐसे लोग तो ध्यान देने के लायक भी नहीं होते है ) मुद्दा है अपराध और अपराधी के प्रति समाज का व्यवहार | क्या अनेक अपराध करने के बाद व्यक्ति माफ़ी मांग ले तो उससे उसका अपराध कम हो जाता है या उस व्यक्ति की पीड़ा कम हो जाती है जो उसके अपराध से पीड़ित है , क्या ये समाज का सही न्याय है की उस अपराधी को माफ़ कर दे | मुझे तो ये बात भी हास्यापद लगती है की अपराध किसी के प्रति और माफ़ी किसी और से , जिसका पूरे मामले से सम्बन्ध ही नहीं है वो कौन होता है माफ़ करने वाला, न्याय देने वाला अधिकारी भी अपराधी का दोष सिद्ध होने पर अपराध और कानून के मुताबिक सजा देता है माफ़ी नहीं , माफ़ी यदि कोई दे सकता है मेरी नजर में तो वो बस और बस पीडित ही हो सकता है | किन्तु वहा ये भी देखा जाना चाहिए की अपराध की प्रकृति क्या है कही ऐसा तो नहीं की किया गया अपराध उस व्यक्ति विशेष के साथ ही पूरे समाज को भी प्रभावित कर रहा है क्योकि फिर ऐसी जगह पर पीड़ित भी माफ़ी देने के लायक नहीं होता है |  इस तरह अपराधी को माफ़ कर दिया जाये तो समाज में दूसरे भी ये सोच कर अपराध करने लगेगे, अपने स्वार्थो के कारण की ठीक है बाद में माफ़ी मांग लेंगे तो सब माफ़ कर देंगे अभी तो अपने स्वार्थो की पूर्ति कर लो,  जिसे जो कहना है जिसके साथ जो करना है कर लो , समाज में इस तरह का सन्देश जाना कभी भी ठीक नहीं है | सजा का कई मायने होते है पहला की अपराधी को उसके किये की सजा मिले , दूसरा पीड़ित को न्याय मिले और तीसरा  समाज में अन्य को भी ये चेतावनी मिले की कोई भी इस तरह की हरकत दुबारा न करे , किन्तु किसी को भी माफ़ी दे कर हम समाज में क्या संदेस दे रहे है खासकर उन लोगो को जो अपराधी प्रवित्ति के है जो बार बार कई तरह के सामाजिक अपराध करते रहते है |  इस तरह के लोगो का समाज के माफ़ कर देने वाले रेवैये से मन बढ़ता है | माफ़ी देने वाले क्या कभी एक बार भी ये सोचते है की वो किस अधिकार से किसी को मांफी दे रहे है, क्या कभी वो देखते है की जिस व्यक्ति को पीड़ा पहुंचाई गई उसका क्या कहना है जुर्म करने वाले के प्रति, उस पर क्या बीती होगी जब उसे भला बुरा या अश्लील बाते कही गई थी , क्या वाकई माफ़ी मांगने वाले का अपराध इतना छोटा और कम है की उसे बिना विचार के ही तुरंत माफ़ कर दिया जाये , शायद नहीं,  वो विद्वानजन और बुद्धिजीवि लोग ये सोचने की जहमत नहीं उठाते होंगे,  उनके हिसाब से जबानी मांफी मांग लेना और उसे माफ़ कर देना ही बड़ी बात है और सभी बड़े होने की होड़ में शामिल हो जाते है | 
                                                                    

                                                                                    ये मुद्दा जितना छोटा आप सोच रहे है उतना है नहीं , क्योकि जो समाज की सोच और रवैया होता है वही सोच उसके कानून में भी झलकता है | सब ने खबर पढ़ी होगी की राष्ट्रपति ने ( तकनीकि रूप शायद इसके पीछे केंद्रीय गृह मंत्रालय है )  एक दो नहीं कुल ३५ फांसी की सजा पाये अपराधियों की सजा को मांफ करके आजीवन कारावास में बदल दिया | ये पढ़ कर घोर निराश हुई कि इन माफ़ी पाने वालो में वो अपराधी भी शामिल है जिसने एक छोटी सी मासूम बच्ची के साथ बलात्कार  कर उसकी हत्या कर दी थी और सामूहिक हत्याकांड को अंजाम देने वाले भी माफ़ी पा गये है यहाँ तक की ५ साल पहले ही अपनी प्राकृतिक मौत पा चूका अपराधी भी माफ़ी पा गया ( ये एक चुक हो सकती है ) | सोचिये उन परिवारों का जो सालो तक हमारी पेचीदा और लम्बे समय तक चलने वाली क़ानूनी लड़ाई को लड़ने के बाद अपने अपराधी को सजा दिला पाये थे अब वो कैसा महसूस कर रहे होंगे ,निश्चित रूप से खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे होंगे | उन्होंने अपराधी को सजा दिलाने के लिए तन मन और धन तीनो तरीके से बहुत कुछ सहा होगा तब कही जा कर उस अपराधी को सजा मिली होंगी किन्तु सरकार ने एक झटके में उन सभी के सारे संघर्ष पर पानी फेर दिया |  सरकारों को इस तरह के निर्णय लेने में जरा भी हिचक नहीं होती होगी क्योकि समाज का रवैया ये है की जब अपराधी अपने अपराध का प्रायश्चित करे उसकी माफ़ी मांगे तो उसे माफ़ कर देना चाहिए ( अब वो सारे लोग जो यहाँ वहा सामाजिक अपराधियों को अपनी तरफ से फटाफट माफ़ कर देते है इस पर सोचे की उन्होंने सही किया या गलत ) क्योकि माफ़ी मांगने वाला बड़ा होता है , महान होता है , उसे प्रायश्चित का सुधरने का मौका मिलना चाहिए आदि आदि आदि के ढेर सारे प्रवचन | सरकारों को पता है की समाज में उसके इन फैसलों से कोई फर्क नहीं पड़ेगा कोई भी इनका विरोध नहीं करेगा, तो वो अपने सोच के हिसाब से जो चाहे निर्णय ले ले | अपनी सोच के हिसाब से इस  लिए कह रही हूँ क्योकि कानून के हिसाब से तो जो सजा उसे मिलनी चाहिए थी वो तो पहले ही उसे देश के सबसे बड़े न्यायाधीस ने दे दिया है ,  निश्चित रूप से सरकार का फैसला कानून की नजर से तो नहीं ही होता होगा ( जहा तक मेरी जानकारी है इसमे भी कोई क़ानूनी पक्ष है तो जानकर बताये  ) | सरकारे अपनी सोच के हिसाब से फैसले लेती होंगी और सरकार में बैठे लोग इस समाज से ही तो जाते है उनका फैसला भी समाज की सोच को ही दिखायेगा | यदि कोई समाज अपराध और अपराधियों के प्रति एक कड़ा रुख अपनाता है तो कभी भी सरकारे समाज की सोच के खिलाफ खासकर इस तरह के मामलों में नहीं जा सकती है | मै तो नीजि रूप से इस बात के भी खिलाफ हूँ की जब देश के सबसे बड़ी अदालत ने किसी व्यक्ति को उसके अपराध की देश के कानून के मुताबिक सजा दे दी है तो उसे कोई और माफ़ी दे , खासकर कानून से इतर जा कर, ( पता नहीं राष्ट्रपति से माफ़ी की अपील का कानून बना  ही क्यों है,  क्या उन्हें लगता है की इतना कानून का जानकर न्यायाधीश भी गलती कर सकता है या  अपराधियों को भी मानवीयता से देखना चाहिए , कम से कम फाँसी की सजा पाया अपराधी तो इस लायक नहीं ही होता है की उसके प्रति कोई मानवीयता दिखाई जाये |)   नतीजा क्या होगा की अब इस आधार पर उन सभी अपराधियों की हिम्मत बढ़ेगी जो इस तरह का अपराध कर चुके है और उनकी भी जो इस तरह के अपराध करने के बाद फायदे में रहेंगे ( अपने देश में संपत्ति, जाति, धर्म और यहाँ तक की इज्जत के नाम पर पूरे परिवार या कहे सामूहिक हत्याओ का इतिहास भी है और भविष्य में कई सम्भावनाये भी और महिलाओ के प्रति किये जा रहे अपराध की तो कोई गिनती है नहीं है  ) उनका तो मन इस तरह के माफियो से और भी बढेगा |  पर समाज और सरकारे इन बातो की परवाह नहीं करती है और न ही उन्हें उन मांफियो के परिणामो और पीडितो के दर्द से मतलब होता है वो अपनी मर्जी और अपने बेमतलब के तर्क से काम करती है |
                                                                               अब सवाल ये है की क्या समाज में सामाजिक,  व्यक्तिगत अपराध करने वालो को माफ़ ही नहीं किया जाये तो जवाब सीधा सा है की ये तो व्यक्ति की माफ़ी मांगने के तरीके से ही पता चला जाता है की उसकी असल मंसा क्या है खाकर सामाजिक अपराध करने वाले | जैसे उदहारण देती हूँ  जब अपराध किसी व्यक्ति के प्रति किया गया है नाम ले कर तब माफ़ी मंगाते समय व्यक्ति का नाम न ले कर केवल समाज से माफ़ी मांगी जाये तो शक होता है कि निश्चित रूप से अपराधी मांफी की जगह केवल समाज में अपना सम्मान पाने की इच्छा रखता है उसको कोई माफ़ी नहीं चाहिए और न ही वो अपने अपराध के प्रति जरा भी शर्मिंदा है और न उसे इस बात की जरा भी फ़िक्र है की उसके किये से उस व्यक्ति को कितनी पीड़ा पहुंची है | अपराधी सीधे समाज में उन लोगो से मांफी मांगता है जो उसे माफ़ कर देंगे, बड़ी आसानी से और उनकी माफ़ी पा कर अपराधी संतुष्ट भी हो जाये उसे जरा भी इस बात कि परवाह न हो कि उसे उन लोगो ने माफ़ किया की नहीं जिसके प्रति उसने अपराध किया है,जिन लोगो को उसने पीड़ा पहुंचाई है | तो ऐसे अपराधी मांफी के लायक नहीं होते है और उन्हें क्षमा कर हर तरह के सामाजिक अपराधो को बढ़ावा ही मिलता है समाज सुधरता नहीं है |
                                             

39 comments:

  1. Bahut dino baad aapke blog pe aayee hun.Apni sehat karan duniyase kat-si gayi hun....aapka ye aalekh bahut achha laga....mai pune me rahti hun...kya aapkee email ID mujhe mil sakti hai? Aapke saath baaten karna mujhe achha lagega.

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    1. उम्मीद है अब आप की सेहत ठीक होगी, पोस्ट अच्छा लगा धन्यवाद !

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  2. हर गलती के लिए माफ़ी नहीं हो सकती .... साथ ही मंशा तो ज़रूर मायने रखती है क्योंकि कुछ लोग तो माफ़ी बाद में मांगते हैं अगली गलती करने की पहले सोचते है.... कारण वही ख़बरों में बने रहना

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    1. जिन्होंने सोच ही लिया कि सीधे काम करके प्रचार नहीं मिल सकता.. ऐसे महत्वाकांक्षी ही अपराध मनोवृत्ति के हो जाते हैं.

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    2. मोनिका जी
      सही कहा !
      प्रतुल जी
      ऐसे अपराधियों को सजा तो कभी नहीं मिलती है माफ़ी मांगने पर वो जरुर मिल जाता है |

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  3. जैसे आप ने माफ़ी की बात लिखी इसी ब्लॉग जगत पर एक अश्लील , द्विअर्थी लेखन लिखते सो काल्ड हास्य कवि याद आगये जिन्होने कुछ दिन पहले इसी प्रकार की पोस्ट लिखी थी और बहुत से लोग उनको माफ़ी भी दे आये थे शाबाशी भी , बिना ये देखे की जिनके ऊपर उन्होने ये सब लिखा उस पर क्या बीती
    सही बात हैं जिसके खिलाफ अपराध हो , माफ़ी देने का अधिकार भी उसी का हो .
    कुछ देशो में an eye for an eye वाला कानून लागू हैं . यानी अगर आप ने किसी की एक आँख फोड़ी हैं तो आप भी एक आँख फोड़ी जायेगी और एक किस्सा तो मीडिया में काफी आया भी जहां एक महिला की तेजाब फेकने से आँख चली गयी थी तो मुजरिम को भी आँख निकाल देने की सजा मिली थी और जब उस महिला ने माफ़ किया था तब ही कानून ने उसकी सजा रोकी थी
    ऐसे ही कुछ लोग कहते हैं आगे बढ़ो , भूल जाओ , पर जिनके घर का सदस्य मरा वो कहा आगे जाए . और उसके अलावा भी अगर अपमान मेरा हुआ हैं तो माफ़ी समाज कैसे दे देता हैं ये बात आज भी मुझे अचंभित करती हैं

    अब आते है राष्ट्रपति द्वारा माफ़ी देने की बात पर तो जितना कानून का ज्ञान हैं उसके अनुसार लोग कपिटल पनिशमेंट को सही नहीं मानते हैं इस लिये अब फांसी की सजा को उम्र कैद में परिवर्तित कर दिया गया हैं . लेकिन अब उम्र कैद १४ वर्षो की नहीं आजीवन , मृत्यु तक मानी जाती हैं . कुछ कैदी जो कम आयू में अपराध कर के इस सजा को पाते हैं और अपनी उम्र का ज्यादा समय जेल में बिता चुके हैं उनको माफ़ कर देने का प्रावधान हैं जैसे ३० साल लेकिन
    इस प्रकार से इतने अपराधियों को माफ़ी देना बहुत ही गलत सन्देश देता हैं
    अंशु
    क्या आप जानती हैं जिनको माफ़ी दी गयी हैं उन में से एक पहले ही नरक सिधार चुका हैं
    ये है हमारा सिस्टम , हमारे यहाँ कानून को नहीं राजनीति को महत्व हैं फिर चाहे वो घर हो , समाज हो या देश या भी ये छोटी सी ब्लॉग की दुनिया
    लोग कहते है सुधरने का मौक़ा दो , माफ़ करो पर वही लोग उस समय जब अपमान होता हैं अपने को विवाद से दूर रखते हैं जैसे जब क़ोई मर्डर होता हैं कहीं खुली जगह में पुलिस को एक गवाह नहीं मिलता पर माफ़ी के पैरोकार बहुत मिलते
    और फांसी देने के लिये अब तो हमारे देश में फांसी पर लटकाने वाले ही नहीं हैं सो कसाब को कब तक पोसना हैं पता नहीं

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    1. पढ़ते हुए हर बात से सहमती बनती चली गयी...

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    2. रचना जी
      क्या बात कर रही है क्या सच में ऐसा हो हुआ है ,तब तो बड़े अफसोस की बात है की लोगों ने ऐसे व्यक्ति को इतनी जल्दी मांफ कर दिया , माफ़ी देने वालो से कहूँगी की वो यहाँ आ कर एक बार उसका कारण भी बता दे और ये भी बताये क्या वो इस तरह राष्ट्रपति के द्वारा दिये गये माफ़ी से सहमत है और अपराधी के मानवाधिकार की बात करने वालो को एक बार उन घरो में भी देखा आना चाहिए जिनके खिलाफ अपराध हुआ है और उनकी पीड़ा को भी महसूस करना चाहिए |

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    3. क्या आप जानती हैं जिनको माफ़ी दी गयी हैं उन में से एक पहले ही नरक सिधार चुका हैं

      one of the persons has already died who was in the list of pratibha patil whom she pardoned

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  4. अंशुमाला जी,
    ब्लॉगजगत में तो कई बार देखा हैं कई लोग सीधे सीधे कुछ नही कहते न कोई गाली देते हैं खासकर महिलाओं के बारे में पर घुमा फिराकर कोई ऐसी बात कह देते हैं कि गंदी से गंदी गाली भी शर्म से डूब मरने की सोचने लगती हैं और अगर इनका विरोध किया जाए तो बडे भोले बनकर बैठ जाते हैं कि हमारा वो मतलब नहीं था और कुछ लोग इनके साथ भी हो लेते हैं बल्कि उसे ही पीडित बना दिया जाता हैं.और फिर आगे ऐसे लोग इसे रणनीति के तौर पर ही इस्तेमाल करने लगते हैं

    आपको याद होग एक बार कोलकाता के धनंजय चैटर्जी नामक एक बलात्कारी को फाँसी से बचाने के लिए वहाँ कथित मानवाधिकारियों की अगुवाई में हजारों लोगों ने प्रदर्शन किए थे.लेकिन फिर भी कलाम साहब ने उसकी दया याचिका ठुकरा दी थी.और वर्तमान राष्ट्रपति ने तो दया दिखाने का रिकॉर्ड ही बना डाला है.पर ऐसे दरिंदो को मौत की सजा के पक्ष में तो मैं भी नहीं हूँ यह सजा पीडिताओं के साथ न्याय नहीं करती बल्कि कोई ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि इन्हें सामान्य कैदियों से अलग किसी काल कोठरी में रखा जाए और वो यातनाएँ दी जाए कि ये खुद मौत की भीख माँगने लगे.ऐसे दरिंदे जब तक जिंदा रहे जेल में ही इनकी जिंदगी नर्क से भी बदतर बना दी जाए और हर रोज इन्हें थोडी थोडी मौत दी जाए.

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    1. राजन जी
      मै धंनजय वाली बात पोस्ट में शामिल करने वाली थी, कि जब उसे फांसी दे दी गई थी तो उसी तरह का अपराध करने वाले को कैसे माफ़ कर दिया गया | इसलिए मैंने कहा है की इन माफियो में कही कोई तर्क नहीं होता होगा |

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  5. हर अपराध के लिये दंड की व्यवस्था तो होनी ही चाहिए.

    क्षमा माँगना तभी शोभता है जब अपराधी के मन में 'किये अपराध' के प्रति ग्लानि हो.

    हुए अपराध के पश्चात... मन में पश्चाताप का भाव आये तो 'क्षमा' विचारणीय हो जाती है. लेकिन जरूरी नहीं कि वह क्षमा किया ही जाये.

    "यदि कोई दोषी प्रायश्चित नहीं करता तो उसके लिये 'कठोरतम दंड' ही न्याय है."


    अंशुमाला जी, आपका ये आलेख आत्म-मंथन को भी प्रेरित करता है. इस सचेतना के लिये आभारी हूँ.

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    1. प्रतुल जी
      धन्यवाद !
      सम्राट अशोक ने जब हिंसा का मार्ग त्याग कर प्रयाश्चित करने का सोचा तो जुबानी खर्च माफ़ी मांगने की जगह जमीनी रूप से उसे करता रहा, बाकि का जीवन बुद्ध के अहिंसा के मार्ग का प्रचार कर जो आज भी सैकड़ो सालो के बाद भी हमारे सामने उसके सच्चे प्रायश्चित को दिखाता है बाकि आज क्या हो रहा है ये सभी पाठको की टिप्पणी से ही पता चला जाता है |

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  6. बात समाज में अपराध/अपराधी की सजा/माफ़ी तक ठीक है, गर ब्लॉग्गिंग की बात हो रही है तो कृपा पूरा मामला क्लेअर कर देना चाहिए.

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    1. मैंने तो बस राष्ट्रपति की माफ़ी के कारण पोस्ट को लिखा और सामजिक रूप से लोगो को माफ़ी का नाटक करते और लोगो के माफ़ करते देख दोनों खबरों को जोड़ा है , आप ब्लॉग जगत को छोड़ बस मुद्दे पर टिप्पणी कर सकते है |

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  7. जो कहने वाली थी, दीपक बाबा जी कह ही चुके हैं |

    इससे आगे ब्लॉग जगत को लेकर इतना कहूँगी -

    ब्लॉग्गिंग में जब से आई हूँ - हैरान हूँ यहाँ के माहौल को देख कर |

    कौन , कब , किसको क्या कहे, कब सही साबित करे, कब गलत साबित करे, कब दीदी कहे, कब चरित्रहीन कहे, कब तारीफें करे, कब गालियाँ दे- कुछ समझ ही नहीं आता |

    आज कोई मित्र होता है, कल वही आपसे ऐसे बात करता है जैसे आपने पता नहीं क्या और कितना बड़ा गुनाह कर दिया हो | मेरी समझ से तो बिलकुल ऊपर है यहाँ अधिकतर जो भी होता दीखता है | किसी एक के प्रति अपशब्दों के, अपमानों के, अन्यायों के विरोध में किसी और को खड़े देखा, मन में बड़ा आदर आया , और अगली ही पोस्ट पर उसी व्यक्ति को किसी और उतना ही का अपमान करते देखा | शुरुआत में एक मित्र ने कहा था -"initially blogging casts a spell , BUT it soon passes " यही अनुभव मेरा भी रहा यहाँ |

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    1. दीपक बाबा जी को दी प्रति टिप्पणी से आप के सवाल का जवाब भी अब शायद मिल गया होगा |
      जहा तक बात आप ने ब्लॉग जगत की की है तो मुझे लगता है की इसमे कुछ भी अनोखा नहीं है ये सब तो पूरे समज में होता है फर्क इतना है की कुछ चीजे हमरी पीठ के पीछे चलाती है जिसे हम नहीं देख पाते है किन्तु यहाँ तो सब लिखित में है और हर व्यक्ति उसे पढ़ सकता है इसलिए इतना खुल कर हम सभी को पता चला जाता है | हा शुरू में मुझे भी लोगो के कुछ विचार देख कर बिल्कुल धक्का सा लग जाता था किन्तु अब लगता है की अच्छा ही है मै अब समाज और लोगो की सोच को ज्यादा अच्छे से जानती हूँ |

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    2. हाँ - सामाजिक न्याय के सम्बन्ध में तो बहुत सटीक है आपकी बात | सच ही - किस basis पर माफियाँ बांटी गयीं यह पूछने के अधिकार देश को, और खास तौर पर उन बलात्कारियों और हत्यारों के victims के परिवारजनों को होना चाहिए |

      ब्लॉग जगत के बारे में bhi आपकी बात से सहमत हूँ |

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    1. मेरी पोस्ट चर्चा में शामिल करने के लिए धन्यवाद !

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  9. राष्‍ट्रपति या समाज को माफी तभी देनी चाहिए जब कि स्‍वयं व्‍यक्ति और समाज इसके लिए तैयार हो।

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    1. समाज तो अपने फायदे के हिसाब से सभी को माफ़ी देने को तैयार है मुझे लगता है की माफ़ी उसे मिलनी चाहिए जो सच में प्रायश्चित कर रहा है |

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  10. आजकल कैपिटल पनिशमेंट के विरुद्ध एक मुहिम सी चल पड़ी है...और कई बार तो ये होता है कि सजायाफ्ता कैदी (जिसमे बड़ी माफिया के सरगना शामिल रहते हैं) के पैसों से ही कुछ NGO चलते हैं...जो फांसी की सजा के विरुद्ध अपील करते हैं...और मुहिम चलाते हैं.
    माफ़ी दिलवाने के पीछे एक बहुत बड़ी राजनीति काम करती है...और लोगों के अपने अपने इंटरेस्ट होते हैं..

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    1. माफ़ी के पीछे राजनीति वाली बात तो पता थी किन्तु ये एन जी ओ वाली तो आप ने मुझे नई जानकारी दी धन्यवाद ! पर जानकारी भयानक है |

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  11. मेरी सोच के मुताबिक हर अपराध के लिए सजा तो होनी ही चाहिए। तभी सही न्याय होगा। हाँ सजा कैसी हो यह अपराध के आधार पर तय होनी चाहिए। मगर माफी हर लिहाज से गलत है, जब तक पीड़ित बिना किसी दबाव के अपराधी को माफ न करदे किसी और को उसे माफ करने का कोई अधिकार नहीं ,मुझे तो कभी-कभी यह कानून व्यवस्था भी पसंद नहीं आती हालाकी वह भी ज़रूर है। मगर कभी-कभी लगता है की शायद सही निर्णय तभी हो सकता है। जब पीड़ित खुद अपने हाथों से अपराधी को मौकाय वारदात पर ही सजा दे डाले। मैं जानती हूँ यह बहुत ही गलत विचार है और शायद बहुत हद तक अकर्मक भी,मगर जिस तरह की कानूनी व्यवस्था आज कल देखने को मिलती है। जिसमें सिर्फ पैसे और पावर का बोल बाल है। तो उस समय मुझे ऐसे ख्याल स्वतः ही आते है।

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    1. हा ये सही है की पैसे और पावर हर चीज को प्रभावित करता है किन्तु यदि हम हा किसी को कानून खुद हाथ में लेने का अधिकार दे दे लोगों को सजा देने का धिकार दे दे तो समाज में फिर रहना मुश्किल हो जायेगा क्योकि यहाँ तो हर दूसरा किसी ना किसी के नजर में अपराधी है |

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  12. आपने सही लिखा है। यह दुर्भाग्य है हमारा जो इस तरह की घटनाएं हो रही हैं।

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    1. सहमती के लिए धन्यवाद !

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  13. इस तरह के विषयों पर विमर्श करते हुए हमें इस बात का ध्‍यान रखना चाहिए, कि उसका संदर्भ क्‍या है और किन बातों को ध्‍यान में रखकर यह निर्णय लिए गए हैं। अगर हम वह नहीं जानते हैं तो केवल सतही टिप्‍पणी करना कोई अच्‍छी बात नहीं है। बल्कि इससे कुछ कट्टर विचारधारा वाले लोगों को अपनी बात कहने का मौका मिलता है।

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    1. देश में जिस भी व्यक्ति को फांसी की सजा होती है उसका केस सर्वोच्च न्यायालय से होते हुए ही और वहा भी दुबारा अपील के बाद ही राष्ट्रपति के पास आता है मतलब की क़ानूनी रूप से गलती की कोई जगह नहीं होती है फिर राष्ट्रपति किस कानून के आधार पर उसे माफ़ी देता है , जहा तक मेरी जानकारी है वो मात्र मानवीय आधार है , क्या फांसी की सजा पाये अपराधियों को प्रति कोई मानवीय दृष्टिकोण रखना चाहिए, फिर सिर्फ इसलिए की कुछ कट्टरवादी लोग भी इस केस में खड़े हो सकते है तो क्या हमें गलत को गलत कहने से रुक जाना चाहिए |

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    2. अंशु जी कानून सबके लिए बराबर है। लेकिन मानवीयता की परिभाषा और आधार सबके लिए अलग अलग हो सकते हैं। तो होना यह चाहिए कि सर्वोच्‍च न्‍यायालय में दी गई सजा ही अंतिम मानी जाए।
      क्‍योंकि राष्‍ट्रपति अंतत: एक व्‍यक्ति है अगर उसे मानवीय आधार पर फैसला करना है तो वह अपनी परिभाषा से करेगा न कि किसी अन्‍य की।
      और जहां तक मानवीय दृष्टिकोण की बात है तो हर अपराधी अपराधी है, उसमें फांसी की सजा पाए और न पाए में अंतर क्‍यों किया जाए।
      सवाल यह भी है कि आखिरकार सजा का उद्देश्‍य क्‍या है।

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  14. अपराध किया है तो सजा मिलनी ही चाहिए, इस विषय पर मैं पहले भी कह चुका हूँ कि वर्त्तमान में कई निर्णय ऐसे हुए हैं कि जंगल का क़ानून ही ठीक लगता है| आप तो खैर असहमत हो ही चुकी हैं पहले, लेकिन देख रहा हूँ कि ऐसा सोचने वाला मैं अकेला नहीं ही हूँ| फिर दोहराता हूँ, जब तक गुनाहगार को धर्म, जाति और जेंडर या क्लास के तौर पर देखा जाता रहेगा, ये सब चलता रहेगा|

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    1. जंगल के कानून की सहमती इसलिए नहीं है क्योकि यहाँ भी पावर वालो का ही बोलबाला होगा और निर्दोष ज्यादा सजा पाएंगे | आप के जैसा सोचने वाले बहुत से है संभव है की कोई मेरे अपने का अपराधी सजा ना पा सके ओ मेरा विचार भी ऐसा ही हो जाये

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  15. बडे दिनों बाद आपकी पोस्ट पढ़ी। मुद्दा सही ही उठाया है कि मानवता के नाम पर कब तक इस तरह की बातों को सहन किया जायगा लेकिन जब पर ही ऐसी शख्सियत अपनी काबलियत की बल पर नहीं बल्कि किन्हीं अन्य वजहों से चुन कर रखा गया हो तो इस तरह के फैसलों से इन्कार नहीं किया जा सकता। शतरंज के प्यादे कभी कभी जान बूझकर गलत जगह रखे जाते हैं ताकि आगे की चाल मनमाफिक रहे।

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    1. मेरी पोस्ट के लिए समय निकालने के लिए धन्यवाद ! अब फिर से २०१४ के लिए प्यांदो बिठाये जा रहे है |

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  16. पहले पैरे की कहानी को यदि मैं ठीक समझ रहा हूं,तो माफी की सराहना करने वालों में मैं भी था। निर्णय मौजूदा परिस्थितियों के अनुसार ही लिए जाते हैं और जब कोई माफी मांगता है,तो उसपर तत्काल यक़ीन करना ही पड़ता है। आखिर,हम सब यही चाहते हैं कि अपराधी सुधर जाए। माहौल को अनुकूल बनाकर ही ऐसे व्यक्ति को सुधरने का अवसर दिया जा सकता है। लिहाजा,पीड़ित पक्ष को भी इसका स्वागत करना चाहिए। ध्यान रहे कि माफी दिए जाने के बाद भी कौन सुधरा-नहीं सुधरा,यह जानने का कोई स्पष्ट पैमाना नहीं है। बहुधा,यही देखा गया है कि स्वयं पीड़ता भी माफ कर दे,तब भी उसके मन से बात मिटती नहीं है।

    माफी मांगने से अपराध कम भले न होता हो,मगर बगैर दंडित हुए भी अपराधी दंडित और लज्जित महसूस करता है,इसीलिए तो वह माफी मांगता है।

    समाज से माफ़ी मांगने का एक अर्थ यह होता है कि व्यक्ति के भीतर न सिर्फ अपराध-बोध है,बल्कि वह यह भी मानता है कि उसके अपराध से केवल प्रत्यक्षतः पीड़ित व्यक्ति ही नहीं,समाज के अन्य लोग भी आहत हुए हैं। अपराधी और पीड़ित- दोनों समाज का हिस्सा हैं,अतः,समाज से माफी मांगना सिर्फ पीड़ित से माफी मांगने से वृहत्तर है। सिख समुदाय में,जब किसी को दंड देना होता है,तो उसे किसी की व्यक्तिगत सेवा में लगाने की बजाए,सामुदायिक सेवा में लगाया जाता है,जैसे-सबके जूते साफ करना आदि।

    निचली अदालतें भ्रष्टाचार का शिकार हैं। जो ऊपरी अदालत तक जाने का साहस जुटा पाए हैं,उनके लिए अदालती फैसला ही अंतिम होना चाहिए।

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    1. राधारमण जी
      आप ने इस बात को स्वीकार किया उसके लिए बहुत बहुत धन्यवाद , वरना तो कोई इस बात को स्वीकार कारने के लिए भी तैयार नहीं है | मै यहाँ उन लोगों की बात नहीं कर रही हूं जो सच में अपनी गलती मान कर मांफी मंगाते है मै तो उनकी बात कर रही हूं जो मांफी का नाटक करते है सिर्फ अपने स्वार्थो के लिए , समय सभी को खुद बता देंगे की किसकी मांफी में कितनी सच्चाई है |

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