January 29, 2019

देश निर्माण और राजनैतिक परम्पराएं -------------- mangopeople


                 
         
                                                  देश सिर्फ संविधान से सही नहीं चलता , उसे सही तरीके से चलाने में उससे ज्यादा योगदान होता है राजनैतिक जीवन में परम्पराओं का जो देश की आजादी के साथ ही शुरू हुई |  कांग्रेस और नेहरू की नापसंदगी का सबसे बड़ा कारण था कि उन्होंने देश की आजादी के बाद ही राजनीति में गलत परंपराओं की शुरुआत की | नेहरू ने कभी नहीं कहा कि जब मेरी साथियों को मुझसे ज्यादा किसी और पर भरोषा है देश के नेतृत्व के लिए तो मुझे ये पद नहीं चाहिए | मैं एक सहयोगी की भूमिका में भी देश की सेवा कर सकता  हुँ | देश में पार्टी सुप्रीमो की परंपरा और पार्टी के अंदर लोकतंत्र की उपेक्षा की शुरुआत वही से हो गई | भाई भतीजावाद , अपने लोगों को संरक्षण देना , भ्रष्टाचार को नजरअंदाज करना , गलत फैसलों के लिए जिम्मेदारियां तय नहीं करना , भारतीय राजनीती में वीआईपी संस्कृति  जैसे अनेको परम्पराओं की शुरुआत उन्होंने की | जिसका पालन संविधान से भी ज्यादा हमारे राजनेता आज भी कर रहें है | देश के विकास के लिए क्या किया के प्रवचन की आवश्यकता नहीं है | वह कर उन्होंने अहसान नहीं किया था उनका चुनाव ही ये करने के लिए हुआ था किन्तु जब एक देश का निर्माण हो रहा था तो नैतिकता , लोकतान्त्रिक व्यवस्था , देशसेवा , भेदभाव रहित , और जिम्मेदारी की जो अटल व्यवस्था उन्हें स्थापित करनी चाहिए थी वो उन्होंने नहीं की , जिसका नतीजा हम आज भी भुगत रहें है |
                 
                                                                  ऐसी ही एक कामचोरी की ख़राब परंपरा की शुरुआत कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्ष के कई पार्टियों ने शुरू किया जार्ज फर्नाडिस के रक्षा मंत्री रहते | उस समय ताबूत घोटाले में रक्षा मंत्री नाम लिया जा रहा था बजाये रक्षा मंत्री से सवाल जवाब के उस मुद्दे पर बहस के कांग्रेस ने उनके बहिष्कार के नाम पर संसद से बाहर जाने,  हो हल्ला कर संसद में काम ना होने की परंपरा की शुरआत की | संसद  बहिष्कार के लिए नहीं, सवाल किये जाने के लिए बनी थी वहां पर काम के लिए सांसदों को चुना जाता है | लेकिन उसके बाद संसद में काम ना करके भी काम करने का पूरा भुगतान लेने की एक घटिया चलन उसने शुरू किया जो आज भी बिना किसी भेदभाव के देश की  हर पार्टी द्वारा अपनाया गया है |



              

January 19, 2019

पंचम वेद भाग तीन ------------ mangopeople



भरतमुनि अपने शिष्यों को अपने नाट्यशास्त्र के लिखने और प्रयोगिग रूप में करने  के पीछे की कहानी बताते हुए कहतें है --
सतयुग बीत जाने के बाद त्रेता युग आने के साथ ही लोंगो में लोभ और काम की भावना अत्यंत बढ़ गई जिससे उनका आचरण ख़राब होने लगा | लोगो में ईर्ष्या क्रोध बढ़ने से उनकी बुद्धि भ्रष्ट होने लगी , इसके कारण लोगों का जीवन में दुःख का प्रवेश होने लगा | इसके फलस्वरूप जम्बूद्वीप पर देव दानवों , राक्षसों , सर्पों आदि में युद्ध होने लगा | इन सब से परेशान हो कर देवताओं के राजा इंद्र के साथ सभी देवता ब्रह्मा के पास पहुंचे और उनसे आग्रह किया की वो सभी के मनोरंजन के लिए कुछ नया रचित करे  ,कुछ ऐसा जिसे देखा और सुना जा सके , कुछ ऐसा रचित करें जिसे शूद्र भी सुन देख सके , कुछ ऐसा जो सभी वर्णो के लोग सुन देख सके सभी के लिए सुलभ हो  | सभी का मनोरंजन हो और वेदों के सामान महान और सभी के लिए हितकर हो |
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१- हम सभी आज के समय में कलयुग को ही सबसे बुरा समझते हैं | हमें लगता है इससे बुरा समय क्या होगा आज के पहले के युग सतयुग , त्रेता , द्वापर ही अच्छा समय था | यहाँ हम देख सकते हैं कि त्रेता युग से ही बुराइयों और दुखों को प्रवेश मनुष्य जीवन में हो गया है | ये बिलकुल वैसा ही है जैसा आज भी  हर पीढ़ी अपनी अगली पीढ़ी से कहती हैं की हमारा ही समय सबसे अच्छा था आज कल तो जमाना कितना ख़राब हो गया है | जबकि उसके युवावस्था में उससे पिछली पीढ़ी ने भी उससे यही बात कही होती है |  हमें हमेशा बिता समय ही सबसे अच्छा लगता है और वर्तमान ख़राब और ये कहते हुए हम ये भूल जातें है कि उस वर्तमान समय को वैसा हमी ने बनाया होता है |
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ब्रह्मा  ने तथास्तु कह कर सभी देवताओं को बिदा कर अपने ही रचित चारों वेदों का स्मरण किया और ब्रह्मा ने ऐसा सोचा
                                    ( नेमे वेदा यतः श्राव्याः  स्त्रिशूद्राद्यासु जातिषु |
                                       वेदमन्यत्ततः  स्त्रक्ष्ये सर्वश्रव्यं तू पञ्चमं  ||  ) १-१३ ( )

( क्योकि स्त्री और शूद्र इत्यादि  जातिंयां चारों  वेदों के श्रवण का अधिकार नहीं रखतीं हैं , इसलिए मैं ऐसे पांचवे वेद की रचना अब करूँगा जो सभी के लिए सुलभ हो अर्थात उसे सभी सुन सके )
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२- किसी पुरातन ग्रन्थ को हम धार्मिक के अलावा साहित्य और इतिहास की दृष्टि से भी देख पढ़ सकतें है | इतिहास का अर्थ सिर्फ कौन सा राजा कहाँ शासन किया कितना किया आदि ही नहीं होता ऐसे पुरातन ग्रन्थ हमें तत्कालीन समाज की संरचना आम लोगों का समाज में स्थान उनकी स्थिति आदि के बारे में भी बताते हैं | साफ दिखता हैं कि समजा में इस ग्रन्थ को लिखे जाने के समय स्त्री और शूद्र की स्थिति वेदों के श्रवण के मामले में कम से कम एक समान ही थी |
३- लेकिन इसके साथ ही ये भी देखना चाहिए कि ग्रन्थ में  कही गई बात वास्तव में समाज में कितनी चलन में थी और वह ग्रन्थ समाज में कितना मान्यता प्राप्त था | उस बात को सत्यापित करने के लिए और कितने सबूत है , क्या अन्य ग्रंथो में भी  ऐसे ही उल्लेख है और धार्मिक के साथ क्या उस समय के साहित्य आदि में भी ऐसे ही चलन का वर्णन है |  ऐसे किसी भी निष्कर्ष को  निकालने में सावधानी रखनी चाहिए |
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उसके बाद ब्रह्मा ने नाट्य नमक ग्रन्थ की रचना आरम्भ की  जिसके अंदर संसार के सभी ललित कलाओं का वर्णन था , जो भविष्य में ललित कला के किसी भी क्षेत्र में जाने वाली पीढ़ी के लिए यह ग्रन्थ पथ प्रदर्शक का काम करेगी |
 ये ग्रन्थ इतिहास युक्त , धर्म अर्थ और  यश की प्रेरक अर्थात उपदेश देने लायक थी |
इस ग्रन्थ को रचने के लिए लिए ब्रह्मा ने सभी चार वेदों से कुछ अंग लिया ऋग्वेद से पाठ्य ( कथा वस्तु ,प्लॉट ) सामवेद से संगीत , यजुर्वेद से अभिनय ( कर्मकांड विधान ) और अथर्ववेद से रस लेकर एक पांचवे वेद नाट्यशास्त्र की रचना की |
फिर इन सिद्धांतो के प्रयोग के लिए ब्रह्मा ने यह ग्रन्थ इंद्र को देना चाहा तो इंद्र ने प्रयोग रूप में इसे करने में  असमर्थता जाहिर कर दिया |
तब ब्रह्मा ने भरतमुनि को बुला कर इस ग्रन्थ को अपने सौ पुत्रो ( वास्तव में शिष्य , ग्रन्थ में उनके एक सौ पांच  पुत्रो /शिष्यों  के नाम है जिनमे से सौवें नंबर पर शिष्य अंशुमाली  का नाम है  ) के साथ मिल कर प्रयोग के रूप में करने का आदेश दिया | भारत मुनि ने फिर ग्रन्थ में लिखी हर कला अभिनय नाट्य  को अपने शिष्यों को सीखाना अरंभा कर दिया |
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३- शास्त्र किसे कहते हैं ,  शास्त्र का अर्थ है विज्ञान अर्थात कोई भी सिद्धांत रचने के बाद प्रयोग द्वारा जब उसे सही सिद्ध किया जाता है तब वो शास्त्र बनता कहलाता  है , जैसे योग शास्त्र है , आयुर्वेद शास्त्र , काम शास्त्र , अर्थशास्त्र  , नाट्य शास्त्र आदि | हर धार्मिक पुस्तक , ग्रन्थ को शास्त्र नहीं कहा जाता शास्त्र एक अलग श्रेणी है जिसके अंतर्गत कुछ ग्रन्थ ही आते हैं  | इसलिए बात बात में यह शास्त्रों में लिखा है कहना हमें छोड़ देना चाहिए  और समझना चाहिए कि किसी ग्रंथ को शास्त्र  बनाने के अलग  अर्थ हैं |
जारी ---------



#पंचमवेद
#नाट्यशास्त्र












January 15, 2019

पंचम वेद भाग दो -------- mangopeople





                                                    ज्ञान देने वाले  गुरु की पूजा हमारे देश में ऐसे ही   नहीं होती  | गुरु किसी ज्ञान और विधार्थी के बीच एक पुल का काम करता है | ज्ञान के लिए जिस आयु में हम कदम बढातें हैं , तब ना तो हमारी समझ बड़ी होती है और ना हमें संसार का अनुभव होता है | ग्रंथो किताबों में लिखी बातों को हमारी समझ के हिसाब से हमें बताने का काम गुरु ही करता है | पुराने समय में जो ग्रन्थ लिखे जातें थे उनकी तो भाषा और श्लोक वाली  शैली भी कठिन होती थी | इसलिए पहले गुरुजनो द्वारा उन्हें शिष्यों को समझाया जाता | जैसे जैसे शिष्यों की समझ बढ़ती भाषा का ज्ञान होता और जीवन का अनुभव मिलता उसके बाद वो उस ग्रन्थ को खुद पढ़ने और समझने में सक्षम होते | कुछ उसे अपने हिसाब से समझते विश्लेषण करते , कुछ गुरु के कहे को ही सही मानते  कुछ उसका कुछ अन्य ही अर्थ निकालते | सभी का अपना नीजि अनुभव और सोच  ही उसे ग्रंथो के विश्लेषण उनके राय में दिखाता है |

                               
                                                   एक बार हमारी बिटिया बोली कबीर के "साईं इतना दीजिये" वाले दोहे का अर्थ  बता दू | मेरे कहने पर कि कबीर यहाँ स्वार्थी ना हो कर दूसरों के बारे में भी सोचने की सीख दे रहें है , वह बोली लेकिन टीचर ने तो हमें लालच नहीं करना चाहिए ऐसा बोला है | अब कबीर ने क्या सोच कर ये दोहा लिखा है ये कबीर से बेहतर और कोई नहीं बता सकता है लेकिन  आज हम उनका कई अर्थ निकाल सकतें है अपने सोच के हिसाब से | ये अर्थ  सब सही भी हो सकता है और सब गलत भी और शायद थोड़ा थोड़ा सब सही और गलत |

                                                  आगे की कड़ियों में मै जो लिखने जा रहीं हूँ , वो मेरे गुरु का दिया ज्ञान , हिंदी के दो अनुवाद टिका ( जिसमे से एक प्रथम अनुवाद टिका है दूसरा ८० के दशक का) और मेरा नीजि सोच विचार उनके कहे पर का मिश्रण है | किसी अन्य जगह पर उसी एक ग्रन्थ के बारे  में आप को कुछ  भिन्न या ऐसा ही  अर्थ पढ़ने सुनने को मिल सकता है ,क्योंकि सभी अपने तरीके से इन संस्कृति के श्लोंको का अर्थ निकालतें  हैं | अतः यहाँ कहा गया ही परम सत्य है ये जरुरी नहीं लेकिन यहाँ कहा सब व्यर्थ है और गलत अर्थ है ऐसा भी नहीं है |


                                 

January 14, 2019

पंचम वेद - भाग एक ----------- mangopeople



क्या आप को पता है एक ऐसा वेद भी है जिसे शूद्र भी पढ़ सकते है |
क्या आप पांचवे वेद के बारे में जानतें हैं |
कभी सोचा है अप्सराओं का जन्म क्यों कब और कैसे हुआ |
क्या अप्सराओं के भी विवाह होते हैं |
आखिर सौराष्ट्र गुजरात के लोग हर बात पर गरबा क्यों करतें है , उन्हें नृत्य इतना पसंद क्यों है |
आखिर ये ऋषिमुनि सौकड़ो साल जी कर इतने ग्रन्थ कैसे लिख लेते हैं |
देवदासी प्रथा असल में क्या थी |
जो इन सवालों के जवाब में और  धार्मिक कहानियों में आप की रूचि है तो मेरे वॉल से इस महीने जुड़े रहिये | हम मौखिक ज्ञान बांटने वाले देश से हैं तो जो ज्ञान प्राप्त कर रहें है उसे सब में बांटते चलना चाहिए , क्योकि लिखा पढ़ा , सुना कहा  गया कभी बेकार नहीं जाता , कभी ना  कभी वो किसी के काम आता है |
किसी भी ज्ञान की शुरुआत में  उसके बेसिक नियम रूल , सोच सिद्धांत जो भी कहा जाए उसे समझ लेना चाहिए |
 पहला  किसी भी किताब ग्रन्थ ज्ञान आदि को पढ़ने समझने से पहले अपने दिमाग से पूर्वाग्रहों को निकाल देना चाहिए | सिर्फ ये इच्छा होना चाहिए कि इसमें लिखा क्या गया है पहले ये जानना है|
 यदि आप ये सोच पर कुछ पढ़ेंगे सुनेंगे की आप को उसे गलत साबित करना है तो आप को हर चीज गलत ही लगेगी और इरादा उसे सही साबित करने का है तो आप को गलत कुछ नजर ही नहीं आयेगा |
 इसलिए सबसे पहले उस किताब ज्ञान को पढ़ना सुनना चाहिए बिना किसी पूर्वाग्रह के, उसके बाद उसका अपने स्तर पर हम विश्लेषण करसकते हैं |
लेकिन विश्लेषण करते समय ध्यान रखना चाहिए कि ग्रन्थ कब और किन सामाजिक परिवेश  में लिखा गया है | किसी ग्रन्थ में लिखी कोई  बातउस समय के हिसाब से लिखा जाता है  आज के समय में वो भिन्न हो सकता है |
बिना समझे उसे पूर्णतः गलत कहना उतना ही गलत है जितना उसे आज के समय में लागु करने का प्रयास करना |
  इसलिए पोस्ट में कही जा रही बातों को सामान्य नजरिये से लीजियेगा  ना तो अक्षत ले कर बैठने की जरुरत है ना ही चुभाने के लिए पिन |