January 19, 2019

पंचम वेद भाग तीन ------------ mangopeople



भरतमुनि अपने शिष्यों को अपने नाट्यशास्त्र के लिखने और प्रयोगिग रूप में करने  के पीछे की कहानी बताते हुए कहतें है --
सतयुग बीत जाने के बाद त्रेता युग आने के साथ ही लोंगो में लोभ और काम की भावना अत्यंत बढ़ गई जिससे उनका आचरण ख़राब होने लगा | लोगो में ईर्ष्या क्रोध बढ़ने से उनकी बुद्धि भ्रष्ट होने लगी , इसके कारण लोगों का जीवन में दुःख का प्रवेश होने लगा | इसके फलस्वरूप जम्बूद्वीप पर देव दानवों , राक्षसों , सर्पों आदि में युद्ध होने लगा | इन सब से परेशान हो कर देवताओं के राजा इंद्र के साथ सभी देवता ब्रह्मा के पास पहुंचे और उनसे आग्रह किया की वो सभी के मनोरंजन के लिए कुछ नया रचित करे  ,कुछ ऐसा जिसे देखा और सुना जा सके , कुछ ऐसा रचित करें जिसे शूद्र भी सुन देख सके , कुछ ऐसा जो सभी वर्णो के लोग सुन देख सके सभी के लिए सुलभ हो  | सभी का मनोरंजन हो और वेदों के सामान महान और सभी के लिए हितकर हो |
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१- हम सभी आज के समय में कलयुग को ही सबसे बुरा समझते हैं | हमें लगता है इससे बुरा समय क्या होगा आज के पहले के युग सतयुग , त्रेता , द्वापर ही अच्छा समय था | यहाँ हम देख सकते हैं कि त्रेता युग से ही बुराइयों और दुखों को प्रवेश मनुष्य जीवन में हो गया है | ये बिलकुल वैसा ही है जैसा आज भी  हर पीढ़ी अपनी अगली पीढ़ी से कहती हैं की हमारा ही समय सबसे अच्छा था आज कल तो जमाना कितना ख़राब हो गया है | जबकि उसके युवावस्था में उससे पिछली पीढ़ी ने भी उससे यही बात कही होती है |  हमें हमेशा बिता समय ही सबसे अच्छा लगता है और वर्तमान ख़राब और ये कहते हुए हम ये भूल जातें है कि उस वर्तमान समय को वैसा हमी ने बनाया होता है |
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ब्रह्मा  ने तथास्तु कह कर सभी देवताओं को बिदा कर अपने ही रचित चारों वेदों का स्मरण किया और ब्रह्मा ने ऐसा सोचा
                                    ( नेमे वेदा यतः श्राव्याः  स्त्रिशूद्राद्यासु जातिषु |
                                       वेदमन्यत्ततः  स्त्रक्ष्ये सर्वश्रव्यं तू पञ्चमं  ||  ) १-१३ ( )

( क्योकि स्त्री और शूद्र इत्यादि  जातिंयां चारों  वेदों के श्रवण का अधिकार नहीं रखतीं हैं , इसलिए मैं ऐसे पांचवे वेद की रचना अब करूँगा जो सभी के लिए सुलभ हो अर्थात उसे सभी सुन सके )
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२- किसी पुरातन ग्रन्थ को हम धार्मिक के अलावा साहित्य और इतिहास की दृष्टि से भी देख पढ़ सकतें है | इतिहास का अर्थ सिर्फ कौन सा राजा कहाँ शासन किया कितना किया आदि ही नहीं होता ऐसे पुरातन ग्रन्थ हमें तत्कालीन समाज की संरचना आम लोगों का समाज में स्थान उनकी स्थिति आदि के बारे में भी बताते हैं | साफ दिखता हैं कि समजा में इस ग्रन्थ को लिखे जाने के समय स्त्री और शूद्र की स्थिति वेदों के श्रवण के मामले में कम से कम एक समान ही थी |
३- लेकिन इसके साथ ही ये भी देखना चाहिए कि ग्रन्थ में  कही गई बात वास्तव में समाज में कितनी चलन में थी और वह ग्रन्थ समाज में कितना मान्यता प्राप्त था | उस बात को सत्यापित करने के लिए और कितने सबूत है , क्या अन्य ग्रंथो में भी  ऐसे ही उल्लेख है और धार्मिक के साथ क्या उस समय के साहित्य आदि में भी ऐसे ही चलन का वर्णन है |  ऐसे किसी भी निष्कर्ष को  निकालने में सावधानी रखनी चाहिए |
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उसके बाद ब्रह्मा ने नाट्य नमक ग्रन्थ की रचना आरम्भ की  जिसके अंदर संसार के सभी ललित कलाओं का वर्णन था , जो भविष्य में ललित कला के किसी भी क्षेत्र में जाने वाली पीढ़ी के लिए यह ग्रन्थ पथ प्रदर्शक का काम करेगी |
 ये ग्रन्थ इतिहास युक्त , धर्म अर्थ और  यश की प्रेरक अर्थात उपदेश देने लायक थी |
इस ग्रन्थ को रचने के लिए लिए ब्रह्मा ने सभी चार वेदों से कुछ अंग लिया ऋग्वेद से पाठ्य ( कथा वस्तु ,प्लॉट ) सामवेद से संगीत , यजुर्वेद से अभिनय ( कर्मकांड विधान ) और अथर्ववेद से रस लेकर एक पांचवे वेद नाट्यशास्त्र की रचना की |
फिर इन सिद्धांतो के प्रयोग के लिए ब्रह्मा ने यह ग्रन्थ इंद्र को देना चाहा तो इंद्र ने प्रयोग रूप में इसे करने में  असमर्थता जाहिर कर दिया |
तब ब्रह्मा ने भरतमुनि को बुला कर इस ग्रन्थ को अपने सौ पुत्रो ( वास्तव में शिष्य , ग्रन्थ में उनके एक सौ पांच  पुत्रो /शिष्यों  के नाम है जिनमे से सौवें नंबर पर शिष्य अंशुमाली  का नाम है  ) के साथ मिल कर प्रयोग के रूप में करने का आदेश दिया | भारत मुनि ने फिर ग्रन्थ में लिखी हर कला अभिनय नाट्य  को अपने शिष्यों को सीखाना अरंभा कर दिया |
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३- शास्त्र किसे कहते हैं ,  शास्त्र का अर्थ है विज्ञान अर्थात कोई भी सिद्धांत रचने के बाद प्रयोग द्वारा जब उसे सही सिद्ध किया जाता है तब वो शास्त्र बनता कहलाता  है , जैसे योग शास्त्र है , आयुर्वेद शास्त्र , काम शास्त्र , अर्थशास्त्र  , नाट्य शास्त्र आदि | हर धार्मिक पुस्तक , ग्रन्थ को शास्त्र नहीं कहा जाता शास्त्र एक अलग श्रेणी है जिसके अंतर्गत कुछ ग्रन्थ ही आते हैं  | इसलिए बात बात में यह शास्त्रों में लिखा है कहना हमें छोड़ देना चाहिए  और समझना चाहिए कि किसी ग्रंथ को शास्त्र  बनाने के अलग  अर्थ हैं |
जारी ---------



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