October 03, 2011

सूचना क्रांति के इस दौर में एक अलग तरह का उपवास - - - - - - -mangopeople



खाना खाता लड़का :- आज से मेरा उपवास है |
दूसरा व्यक्ति :- ये कैसा उपवास तुम तो खाना खा रहे हो |
लड़का :-ये उपवास आज के ज़माने का है , टीवी मोबाईल फेसबुक ब्लॉग ट्विटर नेट सब बंद सब से उपवास |

                                                        कुछ समय पहले जब ये चुटकुला पढ़ कर मुस्कराई थी तो ये नहीं सोचा था की जल्द ही ये उपवास मुझे भी ज़बरदस्ती लेना पड़ेगा | सूचना क्रांति के जिस दौर में हम जी रहे है उसमे हमें आदत हो गई है हर पल किसी न किसी सूचना खबर  को सुनने की या ये जानने की दुनिया में कहा क्या घट रहा है और यदि कुछ खास हो रहा हो तो पल पल की  खबरों तक पहुँचने की ललक और बढ़ जाती है |  इस  दौर में यदि हम सूचना के सभी मध्यम से अचानक से कट जाये तो जीवन कितना दुस्कर हो जायेगा,  यदि आप किसी काम में व्यस्त है तब तो ठीक है किंतु यदि करने के लिए कुछ खास नहीं है तो  कितना ख़ालीपन आ जाता है जीवन में ये अभी हाल ही में एहसास हुआ |
                                   अन्ना का उपवास ख़त्म होते ही परिवार समेत घूमने के लिए निकल गई और घूमने के दौरान न तो इतना समय होता है और न ही घूमने के बाद होटल आने पर इतनी शक्ति और इच्छा की देखा जाये की बाकी दिन दुनिया में क्या हो रहा है,  तो सूचनाओं से भी एक तरह की छुट्टी ही थी क्योंकि किसी से ज़रुरी होने पर ही फोन किया जाता है और टेलीग्राम की तरह कम से कम शब्दों या ये कहे की समय में बात ख़त्म कर ली जाती है ( कई बार तो बार बार यही कहने में ही कितना समय निकल जाता है की अभी मैं बाहर हूँ रोमिंग पर हूँ आ कर बात करती हूँ विस्तार में ) जब ये हाल हो  तो तो नेट से किसी तरह के जुड़ाव का सवाल ही कहा होता है | घूम कर जब हर तरह की खबरों की भूख लिया घर आ कर टीवी आन किया तो पता चला की वो तो सो रहा है और फिलहाल उठने का उसका कोई मूड नहीं है | अखबार उठाया और  टाइम्स ऑफ़ इंडिया की खुरचन नव भारत टाइम्स को  पढ़ कर ही संतोष किया गया |    दूसरा नंबर फोन का था , वहा भी कई दिनों से अच्छे से ( अच्छे से का मतलब कम से कम २०- २५ मिनट ) बात नहीं हुई थी , तो घर से भी काफी सूचनाये खबरों की उम्मीद थी जो वही रोमिंग वाले चक्कर के कारण नहीं पता चल रही थी |  वहा फोन किया तो पता चला की हमारे मोबाईल ने अपने नाम के अनुरूप काम कर रहा था "मेरा टेलीफ़ोन नहीं लगता" MTNL  सो नहीं लगा  | अब सूचना और सहारे के लिए नेट बचा था ब्लॉग जगत से जुड़ने के लिए खबरों के लिए और घर से भी जुड़ने के लिए चैट पर तो घंटो बाते हो जाती है चैट से बहनों  से सैकेंड हैण्ड खबर से संतोष करना पड़ा साथ ही वहा पहले से ही एक मेल पड़ा था की दो दिन बाद नेट में समस्या आ सकती है क्योंकि कंपनी अप ग्रेट का काम करने वाली है सो अग्रिम खेद है | इस बिच इंटरनेट आता जाता रहा टीवी वाला भी आता और बताता रहा की ये ख़राब है वो ख़राब है और फोन पर हर रोज दो तीन बार कॉल आता पर पूछा जाता की आप की शिकायत दूर हो गई पर शिकायत दूर नहीं हुई |
                                          पर इस बिच एक बात का चिन्तन हुआ की आखिर पहले लोग खबरों से कैसे जुड़े रहते थे दूर रह रहे अपनों की खबर उन्हें कैसे लगती थी, फोन तो किसी किसी के ही घर होता था और पत्र तो हाल चाल जानने का ज़रिया था किंतु जब तुरंत कोई खबर पहुँचानी हो तब , तब लोग किन साधनों का उपयोग करते थे | कुछ लोग पड़ोसियों का फोन नंबर आपात काल के लिए अपनों को दे कर रखते थे ( हमारे घर बहुतों का फोन तब के ज़माने में आता था कुछ को मैसेज पहुंचा दिया जाता था तो कोई कुछ देर बाद फिर से फोन करता हूँ कह अपने परिवार वालो को बुलाने को कहता था | हमरे पड़ोसी की बेटी का विवाह अमेरिका में हुआ था तो उन्हें बुलाना पड़ता था  ) किंतु कभी कभी तो पूरे मोहल्ले में ही कोई फोन नहीं होता था, तब क्या करते थे , क्या तब लोगो में अपनों की हर खबर जानने की इच्छा नहीं होती थी और  या जानने की सुविधा नहीं थी इसलिए वो कुछ कर ही नहीं पाते थे | आज हम भाई बहन सभी एक दूसरे से काफी दूर रहते है दूसरे रिश्तेदारों से भी काफी दूर है किंतु ऐसी कोई भी खबर नहीं है जो हम सभी को पता नहीं होती,  फोन से लगभग हर दिन हम एक दूसरे से जुड़े रहते है बात करते रहते है जिससे कई बार खुद के सभी से दूर होने का एहसास ही नहीं होता है | आज भी पहले की तरह ही मम्मी पापा हम सभी से हर बात के लिए सलाह मशवरा करते है | कभी सोचती हूँ की जो ये सस्ती फोन सुविधा न होती तो शायद हम जैसो का जीना ही मुहाल होता जो अपने अपनों से इतनी दूर रहते है | संभव है की इसी कारण से पहले के ज़माने में बेटियों का विवाह होने के बाद वो अपने घरों से इस तरह से नहीं जुड़ीं रह पाती जैसे की हम है और धीरे धीरे अपने माँ बाप परिवार से दूर हो जाती है | आज घर में किसी विवाह की तैयारी हो रही हो या कोई बीमार हो हमें हर पल की खबर मिलती रहती है , शायद उस ज़माने में बहनों का अपने घर में किसी भी विवाह या दुख की खबर तब मिलती होगी जब उनके पास विवाह का निमंत्रण या तेरही का निमंत्रण मिलता होगा और कई बार तो शायद दूर रहने वाले बेटा बेटी अंत समय में अपने करीबियों को देख भी नहीं पाते होंगे , और छोटी बड़ी ख़ुशियों की तो बात ही क्या की जाये | तुरंत खबर देने के लिए टेलीग्राम होता था जो अक्सर दो चार लाइनों का होता था और शायद उसे बुरे समाचार की निशानी ही तब ज्यादा माना जाता होगा क्योंकि उसे किसी आपात काल में ही भेजा जाने की परंपरा रही थी ( इस बात के लिए तो कितने चुटकुले भी प्रचलित थे )   पर उसका हाल भी तब बहुत अच्छा नही था | मेरे पति ने लगभग तीस साल पहले का अपना अनुभव बताया की उनका आधा परिवार गांव में और आधा मुम्बई में रहता था उनकी माँ की अकस्मात मृत्यु हो गई सुबह उनका दाह संस्कार मुंबई में ही कर दिया गया और बाकी के काम के लिए सभी लोग गांव के लिए उसी दिन दोपहर में निकल गये, जाने से पहले गांव में टेलीग्राम कर दिया गया की माँ के साथ ऐसा हो गया है हम लोग सभी आ रहे है |  २७ घंटे का सफ़र कर जब गांव पहुंचे तो पता चला की तब तक उन लोगो को टेलीग्राम मिला ही नहीं था और गांव में किसी को कुछ भी पता ही नहीं था ,  उनके पहुँचने के आधे घंटे बाद टेलीग्राम वहा आया |  इस तरह की बाते बड़ी कष्टप्रद लगती है और शायद यही कारण है की लोग बेटी का विवाह भले दूर कर देते थे पर बेटों को काम के लिए बाहर नहीं जाने देना चाहते थे | ख़ुशी आदि की खबर तो पत्रों से दिया जाता था जो पहुँचने में कभी कभी महिना भर भी लग जाता था और उसका जवाब आते आते एक और महिना  | करीब नौ साल पहले मेरे मित्र ने मुझे पत्र लिखा तब हम लोग नेट से नहीं जुड़े थे वाराणसी शहर से चला पत्र मुंबई में मुझे एक महीने बाद मिला , तो सोचिये की आज के ज़माने में ये हाल है तो भारतीय डाक व्यवस्था का उस ज़माने में क्या हाल रहा होगा पत्रों के मामले में | एक किस्सा पढ़ा था की अकबर इलाहाबादी की पत्नी बीमार पड़ी पति को पत्र लिखा की तबियत ख़राब थी अब बेहतर महसूस कर रही हूँ जब उन्हें पत्र मिला तो हाल ये था कि उन्हें लिखना पड़ा की " उनके चालीसवे से हम आ रहे है और वो कहते है की बीमार का हाल अच्छा है " | फिर दूर की बात छोडिये आज कल तो देश दुनिया का माहौल इतना ख़राब हो गया है की अपने पास रह रहे लोग की चिंता भी हम उनसे हर दम जोड़े रहती है | विवाह के इन दस सालों में पतिदेव आज भी मुझे हर रोज दोपहर में फोन कर हाल जानते है , पहले मैं यहाँ नई थी इसलिए अब बेटी की चिंता रहती है ,  अब तो ये हाल है की यदि उनका फोन नहीं आता है तो घबरा कर मैं ही फोन मिला कर पूछ लेती हूँ की सब ठीक तो है न फोन नहीं किया ,  आज का असुरक्षित माहौल आप को इतना ही डरा देता है | यहाँ मुंबई में कुछ घटा नहीं की ( अब तो आतंकवादी हमले रोज की बात बनती जा रही है ) हर तरफ से मेरे अपने मित्रों रिश्तेदारों का फोन आना शुरू हो जाता है कई बार उनके भी जिनसे महीनों हो चुके है बात किये , सोचती हूँ की पहले लोग क्या करते थे बाढ़ कोई आपदा आई हो वहा जहा आप के अपने रह रहे है तो आपदा की खबर तो किसी न किसी तरह लग ही जाती थी किंतु लोग अपनों की खबर कैसे लेते थे बाढ़ और भू चाल जैसे हालातों में तो डाक विभाग भी काम नहीं करता था | शायद तब तक खुद उनके वापस आने का इंतजार करने के अलावा लोगो के पास कोई चारा ही नहीं रहा जाता होगा | वैसे कभी कभी ये भी लगता है की  शायद आज का निश्चित माहौल और लोगो से आसानी से बात कर लेने की सुविधा ने हमें और ज्यादा एक दूसरे से जोड़ दिया है | इन आसन सुविधाओं ने हमें अपनों के प्रति ओ ज्यादा फ़िक्र मंद बना दिया है और दूसरों को ये देखने का मौका भी दे देता है की हमारे करीबियों को हमारी कितनी चिंता है |
  इस तरह की घटनाओं में दो तरह से काम होता है है एक तो टीवी है जो हमें दुनिया भर की खबरों से जोड़ रहा है और दूसरे हमारे पास फोन है जिससे हम तुरंत ही अपने करीबियों का हाल चाल जानने के लिए तुरंत उनसे जुड़ जाते है |
 क्रमश:  


August 29, 2011

इस आन्दोलन ने जगाया हर हिन्दुस्तानी के अंदर का हीरो (आन्दोलन की सफलताये ) - - - - mangopeople

   

                                                                    मुझे लगता है की इस आन्दोलन की सबसे बड़ी सफलता ये है की अब तंत्र को ये बात कुछ हद तक या कह ले मजबूरी में ही ये बात समझ मे आ गई है की जनतंत्र में जन बड़ा है तंत्र नहीं, ये सारा का सारा तंत्र जन, जनता, जनार्दन के लिए है ना की जनता इस तंत्र को चलने के लिए है | तंत्र का निर्माण ही इसी लिए किया गया था की जनता को सहूलियत हो उसका काम व्यवस्थित हो किन्तु धीरे  धीरे तंत्र बड़ा होता गया और जनता छोटी, इस आन्दोलन ने किसी भी व्यवस्था को ना तो पलटा है और ना ही कुछ नया किया है उसने तो बस सारी व्यवस्था और चीजो को फिर से सीधा करने का काम किया है जो उलटी हो गई थी | उम्मीद है अब जनता फिर से एक लंबी नीद पर नहीं जाएगी और समय समय पर तंत्र को ये याद दिलाती रहेगी की वो हमारे लिए है ना की हम उसके लिए और तंत्र जनता के लिए कुछ नहीं करेगा तो फिर वहा पर बैठे लोगों को हटा दिया जायेगा या फिर उन्हें ऐसे ही झकझोर कर याद दिलाया जायेगा |                

                                                     दूसरी सफलता इस बात की है की लोगों को ये लगने लगा था की आज के समय में अहिंसा से बात नहीं बनेगी | अब समय, लोग खास कर युवा इतने बदल गये है इतने  उग्र स्वभाव के हो गए है कि अब शायद ही वो अहिंसा की शक्ति को समझे और उसके माध्यम से अपनी कोई बात कहे | हो सकता है की दो या चार दिन के लिए वो अहिंसा का पाठ याद रखे किन्तु जल्द ही अपना धैर्य खो कर हिंसक हो जाये | किन्तु ऐसा कुछ नहीं हुआ तब भी नहीं जब एक बार लगा रहा था की सरकार इस आन्दोलन को कोई महत्व नहीं दे रही है और अहिंसा से किया जा रहा आन्दोलन उसको समझ नहीं आ रहा है | लेकिन शायद हम सभी युवाओ को और खुद को भी गलत आंक रहे थे और उन्होंने हम सभी को गलत साबित कर दिया ना केवल अहिंसक आन्दोलन पर डटे रहे बल्कि आन्दोलन के इतने दिन तक खीचने के बाद भी अपना धैर्य बनाये रखा और मैदान छोड़ कर भागने के बजाये मैदान में डटे रहे |
                  
                                              आम आदमी में इस आन्दोलन को लेकर एक गजब का आत्मविश्वास जगा है , एक समय था जब लगभग हर आम आदमी एक निराशावादी सोच में जकड कर बस यही कहता रहता था की देश का कुछ नहीं हो सकता, हम कभी भी सरकार से कुछ नहीं करा सकते है , सरकारे अपनी मनमानी करती रहेंगी हम उसका कुछ नहीं कर सकते, हम इस व्यवस्था को कभी नहीं बदल सकते है | किन्तु इस आन्दोलन ने दिखाया की यदि आम आदमी करना चाहे तो जरुर बहुत कुछ कर सकता है |  एक एक आम आदमी का शायद  कोई अस्तित्व ना हो सरकार के लिए किन्तु जब यही आम आदमी एक एक कर लाखो में बदल जाते है और एक सुर में अपनी बात करते है तो सरकारों को ना केवल सुनाई देता है, उसे मजबूर हो कर ही सही काम तो करना ही पड़ता है | अब उम्मीद है की आम आदमी अपनी सोच बदलेगा निराशावादी होने की जगह आशावादी बनेगा अन्ना ने तो कहा है की ६५% भ्रष्टाचार कम होगा पर आम आदमी के लिए तो इतना भी कम नहीं है कि कम से कम कुछ तो कम होगा चाहे चौथाई भाग ही सही कुछ नहीं से कुछ तो भला ही है | बाकि कहने वाले  लोग कहते रहे की लोकपाल से पुरा भ्रष्टाचार बंद नहीं होगा, आम आदमी के लिए तो थोड़ी राहत भी बहुत है, हम तो डूबते को भी तिनके का सहारा देने की बात करते है यहाँ तो सहारा तिनके से काफी बड़ा है |
                                 

                                                                    हम सभी कभी ना कभी एक कहानी सुन चके है या अपने बच्चो को कभी सुनाई होगी  की कैसे यदि पांचो उंगलिया मिल जाये तो मुठ्ठी बन जाती है और फिर हाथ में ज्यादा ताकत आ जाती है इसे कहते है एकता की शक्ति | पर हम में से ज्यादातर इस कहानी को या तो भूल चुके थे या ये कहे की स्वार्थ पूर्ण राजनीति ने हमें भूलने पर मजबूर कर दिया था | हम बटे थे धर्म को लेकर जातियों को लेकर अपने अपने क्षेत्रवाद भाषावाद को लेकर या राजनीतिक वादों को लेकर किन्तु इस आन्दोलन ने उसे कुछ हद तक ( अफसोस से कहना पड़ रहा है की बस कुछ हद तक, कुछ नेताओ की अपनी निजी नेतागिरी के चक्कर में कुछ अति बुद्धिजीवी टाईप के लोगों के कारण जो धर्म और जाति और वाद को इस आन्दोलन से जोड़ कर अपनी राजनीतिक सोच को पोश रहे थे ) उसे आम आदमी के दिमाग से बाहर निकाल दिया और उसे समझने के लिए मजबूर किया की आप चाहे किसी भी धर्म जाति क्षेत्र या वाद के हो भ्रष्टाचार आप सभी को एक ही रूप में देखता है आप सभी को एक ही तरीके से प्रभावित करता है | भले ही किसानो, मजदूरों, दलितों मुस्लिमो से ये कहा जा रहा था की ये आप की लड़ाई नहीं है ये तो खाये पिये ठसक में रह रहे मध्यम वर्ग की लड़ाई है किन्तु ये बात सिर्फ बरगलाने वाली थी जिन किसानो से उनकी जमीने सस्ते में लेकर सरकारे बिल्डरों को करोडो में बेच कर मुनाफा कमा रही थी क्या वो भ्रष्टाचार नहीं है, किसानो को उनकी फसलो का उचित मूल्य नही दिया जाता किन्तु विदेशो से ब्लैक लिस्डेड कंपनियों से ऐसा सडा गेहू दुगने दामो पर मगा लिया जाता है जो जानवरों के खाने के लायक भी नहीं है क्या ये भ्रष्टाचार नहीं है , क्या मजदूरो के घर के लिए रखी जमीनों को बेच बड़ी इमारते बनाई जा रहा है क्या ये भ्रष्टाचार नहीं है क्या मजदूरो को बेरोजगार कर मिले बंद कर वहा बड़े बड़े शापिंग मॉल खड़े करने की नीति भ्रष्टाचार नहीं है , क्या दलितों के नाम पर अल्पसंख्यको के नाम पर हर साल करोडो रूपये की योजनाये बनाई जाती है उसके बाद भी आजदी के ६४ साल के बाद भी उनकी स्थिति में ज्यादा फर्क नहीं आया क्या ये भ्रष्टाचार नहीं है इसके आलावा रोजमर्रा के जीवन में हो रहे भ्रष्टाचार से सभी रूबरू होते है  | समाज का कोई भी ऐसा वर्ग नहीं है जो भ्रष्टाचार से प्रभावित नहीं हो रहा है ये लड़ाई सभी की है किन्तु जानबूझ कर इस आन्दोलन को बार बार ये कह कर झुठलाया गया इसे ख़ारिज करने का प्रयास किया गया की ये दलितों के लिए नहीं है ये अल्पसंख्यको के लिए नहीं है ये किसानी के लिए नहीं है तो ये मजदूरों के लिए नहीं है | फिर भी इन सभी वर्गों से लोग निकल कर बाहर आये और अपनी आवाज सभी के साथ बुलंद की और कई नेताओ और तथाकथित बुद्धिजीवी ? वर्ग को समझाया की अब समाज के किसी भी वर्ग को आप ज्यादा दिनों तक बेफकुफ़ बना कर बाट कर नहीं रख सकते है और एकता से बड़ी कोई शक्ति नहीं होती है |
                                  
                                                        उम्मीद है की जो लोग इस आन्दोलन से अभी तक इन लोगों के बहकावे के कारण नहीं जुड़े थे वो आगे इस आन्दोलन से जुड़ेंगे और सक्रिय रूप से जुड़ेंगे क्योकि ये आन्दोलन ख़त्म नहीं हुआ है इसे अभी और बहुत आगे जाना है और हम सभी को अपनी ताकत, एकता धैर्य को यु ही बनाये रखना होगा क्योकि जैसे जैसे हमारी जीत होती जाएगी वैसे वैसे आगे की लड़ाई और भी कठिन और मुश्किल होती जाएगी |

                एक बात जो अभी तक समझ नहीं आई वो ये की इस आन्दोलन के पीछे आखिर हाथ किसका था ???? और उसे क्या क्या फायदा हुआ ??? एक गुट कह रहा था की इसके पीछे आर आर एस और हिंदूवादी संगठनो का हाथ है,  तो लो जी अब बताया जाये की उन्हें क्या फायदा हुआ इससे क्योकि यदि उनका इरादा अपनी राजनीतिक पार्टी को फायदा पहुँचाना होता तो ये आन्दोलन आज नहीं बल्कि अगस्त २०१३ में हो रहा होता चुनावों से ६ महीने पहले या कम से कम उनकी पार्टी बी जे पी बहुत पहले ही इसका साथ दे रही होती ना की इतने हिल हिलावे के बाद | दूसरे भी थे जो कह रहे थे की इसके पीछे कांग्रेस का हाथ बता रहे थे उनके अनुसार ये राहुल की ताजपोशी के लिए था वो तो हुआ नहीं बस एक मामूली से भाषण के सिवा जिसे कांग्रेसियों के अलावा किसी ने भी तवज्जो नहीं दिया , फिर ये भी लगता है की युवराज को कल का प्रधानमंत्री बनने से हम में से कोई भी नहीं रोक सकता है वो तो एक ना एक दिन हो कर रहेगा क्या राहुल एक जनता द्वारा चुने गये प्रधान मंत्री की जगह किसी को हटा कर थोपे गये प्रधानमंत्री के रूप में पहचाना जाना पसंद करेंगे, मुझे तो नहीं लगता है वैसे इस गुट से जवाब आ गया है की अभी नहीं बाद में पता चलेगा की कांग्रेस की कितनी बड़ी चाल थी :))) ठीक है भईया जब आप को उस चाल का पता चले तो हमको भी जरा खबर कीजियेगा और तीसरा हाथ था अमेरिका का :)))))))) अब क्या कहे वहा तो खुद १८ लाख लोगो की बत्ती गुल हो गई है क्रेडिट रेट घटा दिया गया है ( और ऐसा करने के लिए एक भारतीय की बलि भी ले ले गई ) दूसरी आर्थिक मंदी की आहट से डरे पड़े है , बेरोजगारी बढ़ती जा रही है ओबामा अवतार का खुमार उतर रहा है अब वो अपने देश की अराजकता देखे की हमारे देश में अराजकता फैला कर दक्षिण एशिया को अपने लिए एक और मुसीबत बना ले जहा वो पहले ही चीन और पाकिस्तान से परेशान है |  मतलब की !! कोई है जो बताएगा की आखिर इस आन्दोलन के पीछे कौन सा और किसका हाथ था |
               
                                                                       इस आन्दोलन के पहले कभी सोचा नहीं था की मुझमे भी इस तरह के किसी आन्दोलन में सक्रीय रूप से भागीदारी करने की हिम्मत होगी लेकिन धन्यवाद दूंगी इस आन्दोलन का विरोध करने वालो का खाकर की ब्लॉग जगत के विरोधियो का जिन्होंने मुझमे हिम्मत जगाई की मै कई बार समय निकाल कर धरना स्थल पर गई बल्कि दो बड़ी रैलियों में भी परिवार के साथ गई | वहा का जो माहौल था जो जोश था उसे शब्दों में नहीं कहा जा सकता है उसे तो वही समझ सकता है जो वहा गया | मै अपने पति को एक बार धरने पर ले गई थी अपनी इच्छा से उसके बाद दो बार उन्होंने मुझे बताया की हमारे घर दूर रैलिया है और मुझे ले कर गए ये असर था वहा एक बार जाने का |  एक गाना जो ए आर रहमान ने बनाया है हीरो कंपनी के लिए पर मुझे तो लगता है जैसे ये गाना आन्दोलन के लिए ही बनाया गया था जिसे हर आम आदमी गा रहा है | एक बार अपनी आंखे बंद कीजिये और इस गाने को देखिये नहीं बस सुनिये चाहे यहाँ या चाहे अपने टीवी सेट पर |
                                        हम में है हीरो रो रो रो रो रो
                                   हम में है हीरो रो रो रो रो रो                    
                                 दिल से कहो ये
                               हम में है हीरो
                             मिल के कहो ये
                         हम में है हीरो
                  हर हिन्दुस्तानी में एक हीरो है |
            






August 20, 2011

कल को यही संसद आप का धार्मिक विशेषाधिकार ख़त्म कर दे या कश्मीर को आजाद कर दे क्या तब भी आप संसद की सर्वोच्चता की बात करेंगे - - - - - -mangopeople

 देश में एक वर्ग ऐसा भी है जो भ्रष्टाचार के खिलाफ हो रहे आन्दोलन को बार बार ये कह कर ख़ारिज कर देता है की वो संसद के खिलाफ है एक लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में संसद ही सर्वोच्च है |   लोग सभी को संसद की सर्वोच्चता समझा रहे है और इस आन्दोलन को लोकतंत्र विरोधी कहने में भी पीछे नहीं हट रहे है | देश में अराजकता फैलने, विदेश पैसे , विदेशी हाथ के साथ साथ ट्रैफिक की व्यवस्था तक ख़राब होने की बात कर रहे है ( ६४ साल तक देश में अराजकता रही उसकी फिक्र नहीं है उसे हटाने के लिए किये जा रहे आन्दोलन से अराजकता दिख रही है , अमेरिका से समझौते के लिए परमाणु बिल के लिए अमेरिका से पैसे आ रहे थे सांसद ख़रीदे जा रहे थे तो ठीक था  , मंत्रियो को बनाने में भी अमेरिकियों का हाथ की बात सामने आई अब वही गन्दगी इन्हें सब जगह दिख रही है ) | पूरे आन्दोलन में कई तरह की बाते करके लोगों को भटकाने का प्रयास किया जा रहा है जैसे ये संविधान के खिलाफ है और जो संविधान के खिलाफ है वो अम्बेडकर के खिलाफ है और जो अम्बेडकर के खिलाफ है वो दलित के खिलाफ है | दूसरा देश के एक समुदाय विशेष को ये कहा जा रहा है की ये सरकार के खिलाफ है और उसे बदलने के लिए है,  जिसका फायदा विपक्षी "सांप्रदायिक" पार्टी को मिलेगा तो तुम्हारा क्या होगा , दूसरी तरह राष्ट्रवाद का झंडा लिए हिंदूवादी लोग भी  है जिन्हें तकलीफ है की जब फला बाबा ने विरोध  किया तो लोगों पर असर नहीं हुआ सभी ने उसका ऐसा साथ नहीं दिया तो अब हम भी इस आन्दोलन में साथ नहीं देंगे जब हमारी पसंद वाले बाबा जी विरोध करेंगे तो ही साथ देंगे ( ये कैसा राष्ट्रवाद है जो राष्ट्र से ऊपर किसी बाबा को बना रहा है ) यानी इस तरह के कई कारण है जो इस आन्दोलन का विरोध किया जा रहा है | तो उन सभी से मेरे दो सवाल है


पहला सवाल ये है की कल को एक ऐसी पार्टी सरकार बनाती है, संसद में पूर्ण बहुमत ले कर आती है जिसके मेनोफेस्टो में ही ये है की वो सभी के ऊपर समान कानून लागु करेगी किसी भी धर्म को विशेष अधिकार नहीं देगी सभी पर एक ही कानून लागु होगा और उनके धर्म का विशेषाधिकार ख़त्म कर देती है बाकायदा लोकतान्त्रिक प्रक्रिया के तहत संसद में कानून बदल कर,  तो क्या वो तब भी ये कह कर चुप रहेंगे की लोकतंत्र में संसद ही सर्वोच्च होता है और हम सभी को इसे मान लेना चाहिए चुपचाप  और यदि वो इसका विरोध करेंगे तो कैसे   ?


 दूसरा सवाल दूसरे लोगों से यदि कल को सरकार एक समुदाय विशेष का वोट पाने की लालच में कश्मीर को स्वायत्ता और आजादी के नाम पर पाकिस्तान को परोस दे, क्या वो तब भी संसद को सर्वोच्च मान कर चुप रहेंगे या कोई भी उनके पसंद की पार्टी गोली और डंडो के डर से बाहर नहीं आई तो वो उसका विरोध किसी अन्य के साथ नहीं करेंगे और अपनी पसंद के लोगों के आगे आने का इतजार भर करेंगे ?


   मुझे सवाल का जवाब दीजिये या ना दीजिये किन्तु एक बार अपने आप से जरुर पूछियेगा क्या वास्तव में संसद ही लोकतंत्र में सर्वोच्च होती है और वास्तव में क्या राष्ट्रवाद में राष्ट्र से बड़ा कोई हो सकता है राष्ट्र का भला किसी के भी द्वारा हो क्या उस पर ध्यान देना चाहिए |

August 18, 2011

जन लोकपाल बिल और सरकारी लोकपाल बिल कुछ बिंदु जिन पर दोनों में असहमति है - - - - -mangopeople



सरकार का कहना है की उसने अन्ना हजारे की ज्यादातर मांगे मान ली है कुछ मांगे जो मानने लायक नहीं है बस उन्हें नहीं माना है तो यहाँ मै उन कुछ खास मांगो का जिक्र करुँगी और उस पर सरकार के रुख का भी |
१ - अन्ना की तरफ से सबसे बड़ी मांग है की लोकपाल के दायरे में प्रधानमंत्री को लाना चाहिए
                       जबकि सरकार प्रधान मंत्री को लोकपाल के दायरे में लाने को तैयार नहीं है |

            संसद में  अब तक आठ बार लोकपाल बिल विभिन्न रूपों में आ चूका है जिसमे से पांच बार के बिल में प्रधानमंत्री को भी लोकपाल के दायरे में रखा गया था | प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी पत्रकारों से कहा की उन्हें भी लोकपाल के दायरे में आने से कोई परहेज नहीं है , हाल में ही कांग्रेस की नेता जयंती नटराजन की कमिटी ने भी प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाने की बात की फिर अचानक से इससे परहेज क्यों किया जा रहा है | मतलब ये मांग करके सिविल सोसायटी ने कोई नई बात नहीं कही है ये पहले से ही बिल में मौजूद था जिसे फिर से शामिल करने की मांग की जा रही है |

२- न्यायपालिका को भी लोकपाल के दायरे में आना चाहिए |
         न्यायपालिका को लोकपाल के दायरे में नहीं लाना चहिए जजों के लिए अलग से कानून बना सकते है |
                                                         सौमित्र सेन जिन पर अभी महाभियोग चल रहा है उन पर २००५ में ही आरोप लगे थे पर मुख्य न्यायाधीश ने उनकी जाँच का आदेश २०१० में दिया जब वो रिटायर हो गए | हाल में ही पंजाब के एक जज को पैसे पहंचाए गए पता चला की किसी और जज को पैसे पहुँचने थे |

३-  संसद में सांसदों के आचरण को भी लोकपाल के दायरे में लाना चाहिए |
           संसद में सांसदों का आचरण इस दायरे में नहीं आना चाहिए संसद खुद अपने सांसदों के बारे में फैसले लेगा |
                       सांसदों ने पैसे ले कर संसद में प्रश्न किया राज्यसभा चुनावों में और किसी खास मुद्दे पर सांसदों को ख़रीदा बेचा जाता है जाँच में कुछ नहीं निकलता और किसी को संसद कोई खास सजा नहीं देती |
४- कोई भी जाँच ६ महीने से दो साल में पूरी हो जानी चाहिए |
            जाँच के लिए सात साल तक का समय दिया जाना चाहिए |
                                        सात साल में तो जाँच का क्या हाल होगा सभी जानते है ये तो बस जाँच को टरकाने जैसा है |
५- भ्रष्टाचार में पकडे जाने पर कम से कम ५ साल और ज्यादा से ज्यादा उम्रकैद हो |
                        पकडे जाने पर ६-७ महीने की ही सजा हो ( संभव है की टीवी पर गलत बताया जा रहा हो हजरों करोड़ के घोटाले के लिए इतनी कम सजा का प्रावधान सरकार नहीं कर सकती है आप किसी के पास इस बारे में कोई और जानकारी हो तो दे ) 
                                            कोई हजारो करोड़ का घोटाला करे उसे इतनी कम सजा कैसे दे सकते है |                    
       
६- घोटाले की सारी रकम घोटालेबाजो से वसूली जाये
           रकम वसूली को कोई व्यवस्था नहीं है |
                        राजा ने पौने दो करोड़ लाख का घोटाला किया लगभग तीन हजार करोड़ अपने जेब में डाल लिया मान लीजिये की उन्हें सजा हो गई और वो ५ साल बाद आ कर तीन हजार करोड़ के मालिक हो जायेंगे | जनता के टैक्स के पैसे उनकी जेब में चले जायेंगे | 
७- लोकपाल के दायरे में सभी सरकारी कर्मचारी हो
                        संयुक्त सचिव से नीचे के कर्मचारी लोकपाल के दायरे में नहीं होंगे  |
                                           आम आदमी तो रोज इन बड़े अधिकारियो के चंगुल में नहीं फस्ता है तो आम आदमी जब छीटे अधिकारियो से परेशान होगा तो वो क्या करेगा वही पहले की तरह उसी विभाग के एंटी करप्शन ब्योरो को शिकायत करेगा जहा आरोपी अधिकारी के ही भाई बंधु बैठे है |            
८- लोकपाल को नियुक्त करने की कमेटी में न्यायिक, गैरसरकारी और  वो लोग हो जो लोकपाल दे दायरे से बाहर है 
                       जबकि सरकारी लोकपाल बिल में कमेटी के १० सदस्यों में सत्तासीन पार्टी के सांसदों का बहुमत है |
                                                  जो लोकपाल के दायरे में है वो ही कैसे उसे चुन सकते है क्या आरोपी ही अपने लिए जाँच अधिकारी चुनेगा |
९- सी बी आई का एंटी करप्सन विंग पर लोकपाल का अधिकार हो साथ ही सी वी सी पर भी
                          सरकार सीबी आई को लोकपाल के अधिकार में देने को तैयार नहीं है |
                          सरकार के अधिकार क्षेत्र में रह कर सी बी आई कैसे आज तक काम कर रही है  ये सभी जानते है |
१० लोकपाल और लोकायुक्त दोनों के लिए एक ही कानून बने
                             सरकार का कहना है की लोकायुक्त राज्य के अधिकार में है वो उसमे हस्तक्षेप नहीं कर सकती |
                        जमीन अधिग्रहण की तरह सभी राज्य सरकारे अपने अपने हिसाब से कानून बनाने लगे तो क्या होगा |
११-भ्रष्टाचार का आरोप लगाते ही पद से हटा दिया जाये
                               जाँच होने के बाद दोषी होने पर ही हटाया जाये |
                                यदि आरोपी को उसके पद से हटाय नहीं जायेगा तो वो उसी विभाग या पद पर बैठ कर अपने खिलाफ सबूतों को नष्ट नहीं कर देगा जैसे आदर्श की फाईल एक के बाद एक गायब हो रही है या अपने मातहत लोगों को सूचना देने से रोक नहीं सकता है | ये संभव है की कुछ आरोप गलत लगाये जाये किन्तु जब कोई भी लोकपाल को किसी की शिकायत करेगा तो कुछ ना कुछ दस्तावेज या सबूत के साथ ही करेगा उसे देखा कर तो समझ ही जा सकता है  |
१२- लोकपाल को सजा की सिफारिश करने क अधिकार हो
                                  सरकार के अनुसार उसे केवल निलंबित करने का अधिकार हो |
                                  इस मामले में सरकार से सहमत हूँ एक ही व्यक्ति का जाँच और सजा का धिकार नहीं होना चाहिए | हा यदि सिफारिस कर दे तो भी क्या बुरा है अंत में न्यायालय को ही सजा देना है |
१३- सरकार का कहना है की यदि किसी के आरोप साबित नहीं होते है तो आरोप लगाने वाले को सजा मिलेगी वो भी २ से ५ साल की |
                        जबकि अन्ना की टीम इसका विरोध कर रही है इससे लोग शिकायत करने से डरेंगे बल्कि लोगो का नाम छुपा कर रखना चाहिए और बेनामी शिकायत का भी अधिकार होना चाहिए
                                अब इस प्रावधान को आप क्या कहेंगे आज की तारीख में कितने अधिकारी पैसे लेते रंगे हाथ पकडे जाते है किन्तु बाद में छुट जाते है इअतानी मिली भगत है हर जगह ऐसे में कैसे सारे आरोप एक व्यक्ति साबित कर सकता है वो तो आरोप और सबूत भर दे सकता है | यदि इस तरह सजा का प्रावधान होगा तो कोई ही शिकायत करने ही नहीं आयेगा | आज तो सूचना मागने वाले तक को मार दिया जाता है फिर क्या शिकायत करने वाला सुरक्षित होगा |
१४ - जब लोकपाल ही भ्रष्टाचारी निकले तो को भी उसकी शिकायत मुख्य न्यायाधीस से कर सकता है जो उसको हटाने के लिए अधिकृत होंगे
                                  सरकार का कहना है की ये व्यवस्था ठीक नहीं है कोई भी लोकपाल का शिकायत नहीं कर सकता है |  
                            एक तरफ तो सरकार कहती है की जन लोकपाल बिल का लोकपाल निरंकुश हो जायेगा सुप्रीम पवार बन जायेगा जब उसी के खिलाफ सभी को शिकायत करने की छुट दी जा रही है तो उसे वो भी मंजूर नहीं है |


सूचना    
                                  मेरी पोस्ट टीवी पर बताई जानकारी पर आधारित है यदि किसी तथ्य में कोई गड़बड़ी है तो बता दे या आप के पास कोई जानकारी है तो दे, उसे पोस्ट में शामिल कर लुंगी |

August 17, 2011

भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान में मेरा छोटा योगदान और आप ने कितना दिया - - - - - - - mangopeople

                                                     धार्मिक बातो और कहानियो में मेरी ज्यादा रूचि कभी नहीं रही है किन्तु किसी अच्छे काम में एक छोटा से छोटा योगदान का महत्व समझाती दो कहानिया सुन रखी है एक वो जिसमे एक छोटी सी गिलहरी कैसे राम सेतु बनाते समय उसके पत्थरो पर लगे रेत को अपने बदन में लपेट कर उसे साफ कर रही थी दूसरी कहानी जो इस्लाम धर्म से है जिसमे बताया गया की जब  धर्म युद्ध में आग लगी थी तो एक छोटी चिड़िया अपने चोंच में पानी भर कर वहा डाल उसे बुझाने का प्रयास कर रही थी किसी ने पूछ की क्या तुम्हारे इतने कम पानी से इतनी बड़ी आग बुझ जाएगी तो चिड़िया ने कहा हा पता है की नहीं बुझेगी पर कल को जब इतिहास लिख जायेगा तो लोगों को मेरे इस छोटे योगदान से पता होगा की मै किस तरफ थी  ( कहानी ठीक से याद नहीं है कुछ ऐसा ही ही ) | मतलब ये की आप का योगदान कितना छोटा है ये बात महत्व नहीं रखती है बस आप का कोई ना कोई योगदान होना चाहिए किसी ऐसे अच्छे काम में जिसका आप समर्थन करते है |
                                                         तो भ्रष्टाचार की इस लड़ाई में मैंने भी अपना छोटा सा योगदान दे दिया मेरे पास बस तीन घंटे थे जब तक बेटी स्कुल में थी तो वही तीन घंटे मैंने सड़क पर आ कर इस मुहीम में अपना समर्थन दे दिया |  मै एक आम सी गृहणी हूं और आम आदमी की तरह डरपोक भी हूं कल जब मै भी घर से भ्रष्टाचार की मुहीम में शामिल होने के लिए अकेले निकली तो थोडा अजीब भी लग रहा था और कुछ होने का डर भी किन्तु वहा जाने के बाद कुछ भी ना अजीब लगा ना डर वहा मेरी जैसी कई महिलाए थी जो अकेले ही वहा आई थी और मेरी तरह ही आम गृहणी थी | तो मेरा योगदान तो कल हो गया और आज और आने वाले कल भी होगा भले तीन घंटो का ही आप कितना समय दे रहे है इस भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए |




  ये है मेघा पाटेकर इनके झोपड़पट्टी के लिए चलाये जा रहे अभियान की कई बातो से मै सहमत नहीं हूं और इनका विरोध करती हूं पर कल इनके साथ थी क्योकि कल हम वहा सिर्फ भ्रष्टाचार के खिलाफ थे
                    



       ये भी मेरी तरह आम गृहणिया है जो अपने घरो में बच्चो को छोड़ कर आई थी तो कुछ कालेज में पढ़  रहे अपने बच्चो के साथ आई थी    
 
 
                                              

August 15, 2011

यदि आप को लगता है की आप आजाद है तो आप को आजादी के पर्व की शुभकामनाये- - - - - - - - -mangopeople

देश की आजादी के लिए कितनो ने अपने जीवन का बलिदान दिया हम इसकी सही गिनती नहीं कर सकते है उन्होंने बलिदान दिया ताकि देश आजाद हो सके देश की आने वाली पीढ़ी एक आजाद और बेहतर जीवन जी सके | हम में से ज्यादातर लोग उस स्वतंत्रता संग्राम में अपना कोई भी योगदान नहीं दे सके क्योकि हम तब वहा नहीं थे पर हमने उनके बलिदानों से मिली आजादी का खूब उपभोग किया और उसके उपभोग में इतने खो गये की कब हम भ्रष्टाचार के गुलाम हो गये हमें पता ही नहीं चला |  ६० साल से ऊपर हो गये हमें गुलाम होते अब समय आ गया है की हम फिर से एक नई आजादी की लड़ाई शुरू करे इस भ्रष्टाचार के खिलाफ , अभी और इसी समय क्योकि अब हम पहले से ज्यादा जागरुक है अब हमें दो सौ सालो तक सहने का इंतजार नहीं करना है और अभी उठ खड़ा होना है, ताकि हमारे बच्चे और उनका भविष्य बेहतर हो | आज हमारे  पास मौका है देश में चल रहे एक दूसरे स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने का, स्वतंत्रता भ्रष्टाचार से, फिर क्यों हम इस मौके को हाथ से जाने दे | बाहर आइये और साबित कीजिये की आप है और जिन्दा है और आप भी देश के लिए कुछ कर सकते है | कुछ कीजिये, किसी के समर्थन में नहीं बल्कि भ्रष्टाचार के खिलाफ, सरकारों तक बात पहुचाइए की अब आप से ये सब बर्दास्त नहीं होगा अब आप भ्रष्टाचार का साथ नहीं दे सकते है | ये लोकतंत्र के खिलाफ नहीं है ये संसद के खिलाफ भी नहीं है ये किसी एक राजनितिक दल के खिलाफ भी नहीं है ये बस और बस भ्रष्टाचार के खिलाफ है चाहे वो कोई भी कर रहा हो चाहे वो सरकार करे, नेता करे, मंत्री करे, नौकरशाह करे, आम जनता करे कोई भी करे सन्देश दीजिये अपने विरोध से की अब हम इसे नहीं सहेंगे और हम बदलाव के लिए तैयार है आज और अभी, अब हम हर पांच साल का इंतजार नहीं करेंगे अब हम खुद को पांच साल तक लुटता देख चुप नहीं रहेंगे कि आप को पांच साल बाद बताएँगे, हम अभी ही इसका विरोध करते है और सभी को चेतावनी देते है की अभी तक जो किया सो किया हम चुप रह आप को बढ़ावा देते रहे पर अब नहीं अब हमने अपनी भूल सुधार ली है अब हम इन चीजो को नहीं सहेंगे |
                 विरोध कीजिये कही भी जहा आप है अपने हाऊसिंग सोसायटी में अपने आफिस में अपने मोहल्लो में आप का जे पी पार्क , जंतर मंतर ,या आजाद पार्क जाने की जरुरत नहीं है आप इसका विरोध कही से भी कीजिये जहा आप है , इमारतों  में भ्रष्टाचार के खिलाफ तख्ती टांग दीजिये सोसायटी के कम्पौंड में भ्रष्टाचार के खिलाफ मोर्चा निकालिए , सरकार तक अपना विरोध पहुंचिए, लोगों को खुद से जोडीये, जो नहीं जानते है उन्हें बताइये मिल का इसका विरोध कीजिये, पर कीजिये | अपने आफिस में या ईमारत के परिसर में मोहल्ले में मार्च निकलने या भ्रष्टाचार के विरोध के लिए तख्ती टांगने के लिए आप को पुलिस या प्रशासन से इजाजत की जरुरत नहीं है , पुलिस आप के घरो में घुस कर डंडे नहीं बरसायेगी ना सरकारे हर व्यक्ति के खिलाफ जाँच बैठाएगी , किन्तु  आप के  छोटे से प्रतीकात्मक विरोध का भी उस पर कुछ ना कुछ असर तो जरुर होगा  इसलिए मौन को डर को ख़त्म कीजिये और मुँह खोलिए विरोध कीजिये बताइये की आप कितने परेशान हो चुके है इस भ्रष्टाचार से और आप पूरी व्यवस्था की चुस्त दुरुस्त करने के लिए व्यवस्था में बदलाव के लिए तैयार है |  
                                 आप को किसी व्यक्ति विशेष का समर्थन नहीं करना है आप को भ्रष्टाचार का विरोध करना है उस तरीके से जो आप चाहे आप को अँधेरा नहीं करना है तो मत कीजिये आप आप मोमबत्तिया जला कर रोशनी करके विरोध कीजिये,  आप मत नाम लीजिये व्यक्ति विशेष का आप कहिये की आप बस भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रहे है किसी व्यक्ति या समूह के लिए नहीं | ये किसी और की नहीं हमारी और आप की लड़ाई है ये हमारे और हमारे बच्चो के लिए लड़ी जा रही लड़ाई है सभी को आगे आ कर अपना योगदान किसी ना किसी रूप में करना चाहिए नहीं करेंगे  तो भविष्य में इस लड़ाई में हारने और जितने दोनों ही स्थिति में आप बाद में सिवाय पछताने के कुछ भी नहीं कर पाएंगे |
                                                                                             आज एक आम आदमी एक आम नागरिक के पास मौका है देश के लिए कुछ करने का जहा फायदा घूम कर उसे ही होना है , तो भूल कर भी इस मौके को ना गवाइए और कुछ करीये | ताकि साठ साल बाद हमारे आने वाली पीढ़ी को इस तरह को कोई लड़ाई नहीं लड़नी पड़े आज से ६० साल बाद आज के दिन वो बड़े फक्र से एक विकसित देश के नागरिक के नाते ऐसे ही किसी आधुनिक तकनीक पर अपनी आजादी का असली जश्न मनाये और केवल शब्दों के लिए नहीं माने और गर्व करे की वो भारतीय है |
                       

यदि आप को लगता है की आप आजाद है तो आप को आजादी के पर्व की     शुभकामनाये  |

August 08, 2011

क्या डरपोक भारतीय मध्यम वर्ग अब अन्ना के साथ आयेगा ? - - - - -mangopeople

                         
                                                         
                                                      16 अगस्त से एक बार फिर अन्ना हजारे लोकपाल बिल को लेकर अनशन पर जाने वाले है किन्तु आज परिस्थितिया वैसी नहीं है जैसी की उनके पहले अनशन के समय थी | तब उन्हें और उनकी टीम को बिल्कुल भी ये अंदाजा नहीं था की उनके आन्दोलन को जनता और मीडिया में इस स्तर तक समर्थन मिलेगा | उन्हें मिला समर्थन उनकी उम्मीदों से परे था और सरकार के भी, इसलिए सरकार भी जल्द ही दबाव में आ गई और फौरी तौर पर इस आन्दोलन से निपटने के लिए बिल बनाने  की कमेटी में सिविल सोसायटी के लोगो को शामिल कर लिया किन्तु उसका अंत कैसा होगा ये सरकार को मालूम था, और अंत में हुआ भी वही सरकार ने लोकपाल बिल को जोकपाल बना कर संसद में रख दिया अब अन्ना हजारे और उनकी टीम इसे उनके और जनता के साथ धोखा बता कर एक बार फिर से इस पर आन्दोलन शुरू करना  चाह रही है और 16 अगस्त से अन्ना हजारे ने फिर से अनशन पर जाने की घोषणा कर दी है |
                      किन्तु अब सवाल ये है कि क्या इस बार भी उन्हें जनता खास कर पढ़े लिखे सुविधाभोगी माध्यम वर्ग से वही समर्थन मिलेगा जो उन्हें पिछली बार मिला था | सवाल उठना लाजमी है क्योकि इस बार जनता से उम्मीदे ज्यादा है और आज की परिस्थिति पहले से काफी अलग है | पिछली बार जनता ने जोश में और बिना किसी परिणाम को सोचे सड़को पर उतर कर एस एम एस कैपेनो सोसल साईटों आदि से इस आन्दोलन को खूब समर्थन दिया था किन्तु इस बार इस माध्यम वर्ग को पता है की सरकार किसी आन्दोलन को कुचलने के लिए क्या कर सकती है और किस हद तक जा सकती है | बाबा रामदेव के आन्दोलन का सरकार ने क्या हाल किया और आज भी बाबा रामदेव और उनके सहयोगियों का क्या हाल कर रही है  उसी से पता चलता है की सरकारे कैसे काम करती है | अब इन सब को देखते हुए लगता है की क्या इस बार पढ़ा लिखा तबका और युवा इस अन्दोलन से उसी तरह जुड़ेगा जैसे इसके पहले जुड़ा था |
                          ९० के दशक में इस माध्यम वर्ग ने अपने सपूतो को इसी तरह के एक आन्दोलन में जलते हुए और मरते हुए देखा था तभी से इनकी रुहे भी किसी आन्दोलन के नाम पर कांप जाती है | सड़क पर किये जा रहे आन्दोलन से कम से कम आम आदमी तो दूर ही रहता था | एक दशक बाद जा कर उसे होश आया की ये भ्रष्टाचार तो हमारे सर के ऊपर तक चला गया है यदि अब इसके खिलाफ नहीं बोले तो ये हम को ही ले डूबेगा | अन्ना की टीम ने लोगो को अपनी बात कहने अपना आक्रोश सामने लाने का मंच दे दिया और लोगो ने उसका उपयोग भी किया किन्तु सभी ये सब करते रहे क्योकि उन्हें सरकार की तरफ से कोई भय नहीं था क्योकि तब तक सरकार ने इस तरह के आन्दोलन को कुचलने का कोई काम नहीं किया था | सिविल सोसायटी को लोकपाल बिल बनाने की कमिटी में शामिल करने को ही सभी ने अपनी जीत मान ली और आन्दोलन को यही सम्पन्न भी मान लिया | किन्तु जब यही लोगों ने टीवी पर बाबा रामदेव के आन्दोलन का हाल देखा सरकारी ज्यादती देखी तो उनके होश उड़ गये , तब इन्हें समझ आया की सरकार किसी आन्दोलन को कुचलने के लिए किसी हद तक जा सकती है और क्या क्या कर सकती है उसके लिए आम आदमी और उसके मुद्दे उसके सवाल कोई मायने नहीं रखेते है | जब सरकारे अपने पर आती है तो इसी तरह सत्ता की ताकत का दुरुपयोग करती है | अब अन्ना हजारे फिर से आन्दोलन करने जा रहे है और इस बार सरकार ने पहले ही दर्शा दिया है की उसे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है सरकार से बाहर सरकारी टट्टू लोगों को डराने के लिए ये भी बता रहे है की हर आन्दोलन का वही हाल होगा जो रामदेव के आन्दोलन का हुआ | अब माध्यम वर्ग को पता है की इस बार पहले वाली बात नहीं है इस बार यदि बाहर निकले तो पुलिसिया ज्यादती का शिकार भी होना होगा और डंडे खाने की नौबत भी आ सकती है |
                                 ऐसा नहीं है की सरकार ने बस युही रामदेव के आन्दोलन को इस तरह कुचल दिया वो चाहती तो बड़े आराम से अन्ना हजारे की तरह बाबा को भी योग शिविर के आड़ में अनशन करने की इजाजत नहीं देती लोगों को वहा आने से ही रोकती और इस आन्दोलन को होने ही नहीं देती | किन्तु उसने ये सब होने दिया क्योकि उसकी मंसा तो एक तीर से दो निशाने लगाने की थी उसने सभी टीवी कैमरो  मीडिया के सामने उन लोगों पर लाठी चार्ज किया लोगों का मारा कम उन्हें घसीटा ज्यादा उसका उद्देश्य लोगों को वहा से भगाने से पहले अच्छे से उनकी इज्जत कैमरों के सामने उतारने की थी | सरकार को अच्छे से पता था की ये सब मीडिया रिकार्ड कर रही है और उसे देश के लाखो लोग टीवी पर देखेंगे और वो चाहती भी यही थी की लोग देखे ओर समझ जाये की सरकार क्या क्या कर सकती है | वो आन्दोलन तो सफलता पूर्वक कुचल दिया गया पर वहा जो किया गया उसका दूसरा निशाना था उन चीजो के देख रहा माध्यम वर्ग जो हमेसा ही अपनी इज्जत को लेकर बड़ा सतर्क रहता है जो आन्दोलन तो कर सकता है पर लाठी नहीं खा सकता सड़क पर घसीटा जाना या पुलिस द्वारा गलिया देना उसे बर्दास्त नहीं होगा वो कभी नहीं बर्दास्त करेगा की उसके घर के युवा या महिलाए या वो खुद इस तरह के आन्दोलन में जाये जहा पर ये सब होने की संभावना है |
                                               सरकार का तीर निशाने पर लगा पहले से ही डरपोक रहा माध्यम वर्ग और भी डर गया और पुरा माध्यम वर्ग सहमा डरा हुआ इधर उधर मुँह छुपा रहा है बहाने तलाश रहा है  अन्ना की टीम से ही सवाल पूछ रहा है की आप इससे ज्यादा और क्या चाहते है, सरकार ने तो काफी कुछ दे दिया, आप लोकपाल के नाम पर एक और सत्ता खड़ी कर रहे है ,आप इतना ईमानदार व्यक्ति लोकपाल के लिए कहा से लायेंगे , आप संसद का अपमान कर रहे है, ये लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है, आप सरकार गिराने का प्रयास कर रहे है, आप देश को अस्थिर कर रहे है ,आप खुद को संसद से सर्वोच्च क्यों मान रहे है, देश में संसद ही सर्वोच्च है उसकी बात हम सभी को मान लेनी चाहिए आदि आदि आदि  |   सिविल सोसायटी वालो पर भी सवाल खड़े किया जाना लगा और रामदेव के आन्दोलन  को तो सरकार ने पहले ही सांप्रदायिक घोषित कर उसकी हवा निकाल दी थी |  सरकार ने बड़ी चालाकी से अपने एक कांटे से दूसरे कांटे को निकालने का काम किया | 
                                                                                    बेचारा माध्यम वर्ग भी क्या करे वो शुरू से ही डरपोक रहा है उसे खुद के कामने खाने और इज्जत की दुहाई दे कर चुप रहने और दूसरो को भी चुप रहने की सलाह देने की आदत है और सरकार ने भी उसकी इसी आदत का खूब फायदा उठाया और उसकी दुखती रग पर हाथ रख दिया | अब वो  खुद को दिलासा भी दे रहा है की उसने तो आन्दोलन को सफल बना दिया था और सरकार से अपनी बात भी मनवा ली थी अब वहा गए लोग अपनी बात नहीं मनवा सके तो हम क्या कर सकते है | इस बात को अन्ना हजारे की टीम भी अच्छे से समझ रही है इसलिए पहले कोर्ट में एक याचिका भी दायर की गई की उसके आन्दोलन में सरकार वो सब ना कर सके जो रामदेव के आन्दोलन में किया ताकि लोगो में कुछ विश्वास पैदा हो लोगो का डर कम हो साथ ही अब जगह जगह जा कर लोगो को फिर से जोड़ने का प्रयास भी किया जा रहा है जो पहले इस तरह नहीं किया गया था | पर दूसरी तरफ सरकार और उनकी टीम भी लोगो को डराने के लिए उन्हें हतोस्साहित करने के लिए रोज नये नये बयान जारी कर रही है कभी ये कहती है की उनके आन्दोलन का भी वही हाल होगा जो रामदेव का हुआ, कभी कहती है की करते रहे आन्दोलन हमें कोई चिंता नहीं है, तो कभी कानून व्यवस्था प्रशासन का नाम लेकर जंतर मंतर पर अनशन की इजाजत ही नहीं दे रही है | किन्तु अन्ना की टीम भी लगी है सरकार से दो दो हाथ करने के लिए |
                                 कोई भी क्रांति बड़ा बदलाव या सरकार से उसकी मर्जी के खिलाफ उससे कोई काम करवाना आसान नहीं होता है और ये काम दो या चार दिन में संभव नहीं है इसके लिए पूरे समाज को उठ कर आगे आना होता है और एक लंबी लड़ाई लड़नी पड़ती है  और कई बार सरकारी ज्यादती का शिकार भी होना पड़ता है | जब कोई समाज इन सब के लिए तैयार होगा तभी वो किसी बदलाव को क्रांति को ला सकता है , नहीं तो छोटे छोटे आन्दोलन विरोधो को सरकारे कभी तव्वजो नहीं देती है और नहीं किसी खास व्यक्ति समूह की सुनती है ,अन्ना तो गाँधीवादी भर है आज के समय में स्वयम गाँधी जी भी आ कर अकेले सरकार से कुछ कहते तो वो उन्हें भी बरगलाने के सिवा कुछ नहीं करती | अब तो १६ अगस्त के बाद ही पता चलेगा की परम्परागत भारतीय माध्यम वर्ग किसी बदलाव को लाने को तैयार है की नहीं , उसमे क्रांति लाने की ताकत है की नहीं , उसने अपने डरपोक प्रकृति को छोड़ा है की नहीं |
                                 

July 15, 2011

इन हमलो में बेचारे मंत्री पुलिस का क्या दोष है - - - - -- - mangopeople

                                                           देखीये ये जीवन क्या है बस एक छड भंगुर है हर किसी को एक दिन इस दुनिया से जाना है कोई आज जायेगा, कोई कल जायेगा किन्तु याद रखियेगा की हम सभी की आत्मा नहीं मरती है, मरता है तो ये शरीर आत्मा तो जीवित रहती है और जल्द ही किसी और शरीर में प्रवेश कर जाती है किसी और बम ब्लास्ट में मरने के लिए किसी और आतंकवादी हमले में किसी रेल दुर्घटना में मरने के लिए, उसके जाना का दुख नहीं करना चहिए |  जो लोग मुंबई में हुए विस्फोटो में घायल हुए है तो लोगों को उनके लिए दुखी होने की जरुरत नहीं है क्योकि ये आतंकवादियों के कृत्य नहीं है असल में तो ये उनके ही पूर्व जन्मो के और इस जन्म के कर्मो का नतीजा है उनके बुरे कर्मो का फल है जिसको उन्हें भोगना ही पड़ेगा आतंकवादी तो बस उसे पुरा करने में हमारी मदद करते है वो तो बस निमित्य मात्र है साधन है हमारे कर्मो का फल हमें देने में | अब इन सबके बीच बेचारे हमारे मंत्री गण हमारी सुरक्षा एजेंसिया क्या कर सकती है आखिर वो ऊपर वाले के काम में दखलंदाजी क्यों करे | अब कुछ लोग केंद्रीय गृह मंत्री शिवराज पाटिल और महाराष्ट्र के गृह मंत्री भुजबल से पूछ रहे है की- - - --- -- क्या कहा मैंने गलत नाम लिखे है अच्छा तो ठीक है आप को यदि लगता है की सही नाम या कुछ और नाम लिखने से देश की आतंरिक सुरक्षा व्यवस्था सुधर जाएगी देश सुरक्षित हो जायेगा तो मुझे वो नाम बता दीजिये मै उसे वहा लिख दुँगी - - - -  की २६/११ के बाद जो करोडो के अत्याधुनिक हथियार ख़रीदे गये बख्तर बंद गाड़िया खरीदी गई उसक क्या फायदा है वो क्या काम आये अब कोई इन मूर्खो से पूछे की भाई इसमे मंत्री क्या कर सकता है इस बार जब आतंकवादियों ने बिना बताये अपना पैटर्न बदल दिया वो वापस से अपने पुराने तरीके पे आ गये, तो बेचारे मंत्री क्या कर सकते है उन्होंने तो ये सोच कर बख्तर बंद गाड़ी ली थी की २६ /११ की तरह फिर से दस बारह आतंकवादी देश में घुस जायेंगे ( देश के  युवराज  ने कहा है की हम १००% सुरक्षा की गारंटी नहीं दे सकते है एक दो घटनाये तो हो ही सकती है सो आतंकवादी इतनी बार घुसपैठ करते है एक दो बार घुस कर हमला तो कर ही सकते है इतनी छुट तो हमारे भविष्य के प्रधान मंत्री भी आतंकवादियों को देते है )  तो हमारे पुलिस वाले कम से कम सुरक्षित हो,  बख्तर बंद गाडियों के अंदर से वो आतंकवादियों से आसानी से लड़ सकते है अपना मुँह छुपा सकते है, और रही अत्याधुनिक हथियारों की बात तो उसी से तो उन्हें मारते पर कम्बख्त आये ही नहीं पिछले हमले की तरह ,ये भी कोई बात हुई एक बार में आतंकवादी कुछ तय नहीं कर रहे है की उन्हें हम पर कैसे हमला करना है वो एक तरह से हमला करते है हम उस तरीके से लड़ने के सारे इंतजाम करते है वो दूसरे तरीके से हमला कर देते है अब इसमे बेचारे हमारे मंत्री सुरक्षा एजेंसियों का क्या दोष है | वैसे कुछ शक उन्हें पहले से था की इस बार आतंकवादी सामने से हमला नहीं करने वाले है इसलिए सारे हथियार बेकार जाने वाले है सो उन हथियारों को पहले से ही बेकार कराने के लिए सभी आधुनिक हथियार सीलन वाली जगहों पर ख़राब होने के लिए सुरक्षित रख दिये गये थे  और वो इतनी कड़ी सुरक्षा में थी की उनके ख़राब होने की खबर देने वाले पत्रकार  को भी  नहीं बख्सा गया उसे ना केवल पकड़ कर जेल में बंद कर दिया गया बल्कि कई धाराओ में सुरक्षा भंग करने के लिए मुकदमे भी दायर  कर दिये गये |
                                               पर लोगों को कुछ भी समझ नहीं आता है लोग बेकार में मंत्रियो को पुलिस वालो को बुरा भला कहने से बाज नहीं आते है लोग कहते है की सुरक्षा के लिए कुछ भी नहीं किया जा रहा है लोग मर रहे है | अब बताइये जब संसद पर हमला हुआ था तो कैसे सारे संसद की किले की तरह सुरक्षा व्यवस्था कर दी गई थी रातो रात करोडो के सुरक्षा उपकरण बाकायदा योजना बना कर ख़रीदे गये और वही उपकरण ख़रीदे गये जिससे सच में सांसद की कुछ सुरक्षा हो सके | बताइये उसके बाद हुआ संसद पर हमला उसके बाद हुआ किसी नेता मंत्री पर आतंकवादी हमला राजीव जी के बाद आज तक मरा कोई बड़ा ढंग का नेता आतंकवादी हमले में नहीं ना फिर भी लोग कहते है की इन्हें किसी के जान की परवाह नहीं है,  देखीये कितनी है मंत्री नेता सांसद के जान की परवाह क्या उनकी परवाह करना उनकी सुरक्षा के लिए कुछ करना कुछ नहीं होता है |
                                          लोग कहते है की सुरक्षा एजेंसियों के पास अंदर की ख़ुफ़िया खबर नहीं होती लीजिये अभी ज्यादा दिन नहीं हुए है जब सभी जगह शोर हुआ था की वित्त मंत्री की जासूसी हो रही थी उसके पहले राडिया, टाटा, बरखा की जासूसी हुई यहाँ तो अमर सिंह जैसे टुच्ची नेता तक की जासूसी की जाती है और लोग इल्जाम लगते है की हमारी सुरक्षा एजेंसियों के पास ख़ुफ़िया खबर नहीं होती | लोग कहते है की हमारे पुलिस को कुछ खबर ही नहीं होती हमले हो जाते है और वो कुछ नहीं कर पाती | देश के किसी भी कोने के पुलिस स्टेशन में चले जाइये इलाके के एक एक अपराध के बारे में उन्हें पहले से पता होता है पुलिस वालो की धाक तो इतनी है की खुद अपराधी आ कर बताता है की उसने कहा कौन सा अपराध किया है और उसके हाथ कितना पैस लगा है अरे उसी हिसाब से तो हफ्ता बनता है सभी पुलिस वालों का |
                               लोगों के पास कुछ काम नहीं है इल्जाम लगाने के सिवा उन्हें पता नहीं है किसी देश को चलाना किसी बच्चे का काम नहीं है हमें हर जगह संतुलन बना कर रखना पड़ता है | अब मुंबई में भीड़ कितनी बढ़ गई है यदि सरकारे किसी से बोलेंगे की भाई यहाँ मत आओ तो कोई भी उनकी बात सुनने वाला नहीं है तो दो उपाय है एक तो इस जगह पर हमलो की खुद छुट दो एक तो यहाँ की कुछ भीड़ कम ( चुपचाप रहिये इस भीड़ को लोग जनता आदि कहने की भूल मत करीये ) होगी दुसरे ये जगह इतनी असुरक्षित हो जाएगी की लोग खुद बा खुद यहाँ आने से डरने लगेंगे | पर ये सब बाते भीड़ तो समझती नहीं है ये सब काम देश के हित के लिए जनसंख्या के नियंत्रण के लिए करना पड़ता है कभी बाढ़ के नाम पर तो कभी आतंकवादी हमलो के नाम पर ये नियंत्रण का काम होते रहना चाहिए संतुलन बनाने के लिए जरुरी है |
                                        फिर हर एक दो साल में एक बम ब्लास्ट होना या कोई आतंकवादी हमला मुंबई की सुरक्षा के लिए भी जरुरी है और यहाँ के सुरक्षा में लगे लोगों के लिए भी |  अब देखीये साल दो साल के लिए मुंबई पूरी तरह सुरक्षित है क्योकि एक बार बम ब्लास्ट हो जाते है तो दूसरे को होने में इतना ही समय लगता है इस बीच सभी लोग बिकुल सुरक्षित हो कर रहते है साथ ही सुरक्षा एजेंसियों को भी आराम की नीद आती है की चलो अब कुछ दिन आतंकवादी हमला नहीं होगा नहीं तो साल दो साल होते ही सभी की नीद ख़राब हुई रहती है की कब कहा कोई हमला हो जाये | एक बार जब हमला हो जाये तो चलो शांति क्योकि आतंकवादियों को दूसरी आतंकवादी टीम बनने नई जगह की खोज करने और बम बनाने में इतना ही समय लगता है तब तक तो सभी सुरक्षित ही रहते है |
                                      इसलिए कम अक्ल वाली भीड़ हर बात के लिए मंत्री संत्री  नेता परेता और पुलिस वालो को दोष ना दिया करे कुछ अपनी भी अक्ल लगाये और एक आतंकवादी हमले की उपयोगिता को समझे |



 चलते चलते

                       
आतंकवादी देश पर इतनी बार हमला करते है खासकर पाकिस्तान परस्त आतंकवादी इतनी बार हमला करते है पर वो कभी भी सीधे किसी नेता मंत्री आदि के ऊपर हमला क्यों नहीं करते है उन्हें मारने का प्रयास क्यों नहीं करते है   क्योकि उन्हें देश के लोगों को दुखी करना है उन्हें परेशान करना है उन्हें दहशत में डालना है उन्हें खुशिया मानने का मौका नहीं देना है | ये अच्छा काम कम्बख्त बस अपने यहाँ ही करते है |
      ( याद रखे की १३ दिसंबर को हुआ हमला संसद पर था किसी नेता मंत्री पर नहीं | वो हमला प्रतीकात्मक ज्यादा था नुकशान पहुचने के उद्देश्य से कम था तभी कोई नेता नहीं मरा और बाकि मंत्री नेता पर  आतंकवादी हमले होने के पहले ही पकडे जाने की कई खबरे हम सुनते है उनका असली सच सभी जानते है  )
                

July 12, 2011

कल से देश में भ्रष्टाचार घोटाले बंद राम राज का आगमन हो गया - - - - - - -mangopeople

कल से देश से भ्रष्टाचार मिट जायेगा अब कल से देश में कोई नया घोटाला नहीं होगा अब कल से महंगाई कम होने लगेगी कल से देश का आम आदमी ज्यादा सुरक्षित होगा अब कल से कोई नई रेल दुर्घटना नहीं होगी, हर मुसाफिर एक साफ सुथरी सुरक्षित रेल यात्रा करेगा | क्योकि इन सारे  सवालो को दर किनारा कर या ये कहे की जनता द्वारा सरकार से पूछे जा रहे इन सारे सवालो के जवाब में हमारे "ईमानदार" प्रधानमंत्री ने अपने कुनबे का या मंत्री मंडल का या घोटालेबाजो का जो आप चाहे कह ले उसका विस्तार कर लिया है | लीजिये जी हो गया मंत्री मंडल का विस्तार अब देश में राम राज होगा | जनवरी में भी हमारे "ईमानदार" साहब ने अपने कुनबे का इसी तरह विस्तार किया था या ये कहिये की अपने कुनबे के लोगों को तास के पत्तो की तरह फेट दिया था लेकिन उससे क्या बदला कुछ भी नहीं आम आदमी का जीवन तो आज भी वैसे का ही वैसा ही है मंहगाई वैसे की वैसे ही है | लेकिन सरकार को शायद जनता के सवालो का कोई जवाब ना सुझा तो उन्होंने भी हवा में उछाल दिया मंत्री मंडल के विस्तार की खबर और इस खबर को पकड़ लिया हमारे खबरनवीसो ने  जिस भी चैनल को देखीये सभी के सभी लगे थे हफ्ते भर से ये बताने में की मंत्री मंडल के फेरबदल में कौन कौन नया मंत्री बनेगा किसका कद बढेगा, किसका विभाग बदलेगा और किसका मंत्री मंडल से छुट्टी होना तय है | सभी के अपने अपने सूत्र है सभी के सूत्र कोई ना कोई दावा कर रहे थे और सभी लगे है मंत्री मंडल के विस्तार होने के पहले ही सारी जानकारी जनता को दे देने में | पर सवाल ये है की क्या जनता ये जानने के लिए उत्सुक थी कि मंत्री मंडल के विस्तार में क्या होने वाला है, कोई पूछे इन खबर देने वालो से की कुछ दिन पहले या कुछ घंटो पहले इस बात को जान लेने से क्या फर्क पड़ेगा की कौन मंत्री बनने वाला है और कौन नहीं क्योकि जब मंत्री शपथ लेंगे तो अपने आप ही सारी बाते साफ पता चल जायेगी, पहले से जानने में जनता का तो कोई भला होने वाला नहीं है और यदि जनता बाद में भी जान जाये तो भी उसका कोई भला नहीं होने वाला है | मंत्रियो के विभागों में फेरबदल हो या किसी को निकाला जाये या किसी को रखा जाये जनता को किसी भी बात से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है जनता पहले भी त्रस्त थी और कैबिनेट विस्तार के बाद भी वैसे ही त्रस्त रहेगी | मंत्री मंडल में चाहे कोई भी नया मंत्री आ जाये महंगाई नहीं घटने वाली है घोटाले नहीं रुकने वाले है, भ्रष्टाचार कम नहीं होने वाला है सब कुछ वैसा ही रहेगा जैसा पहले था | रेल मंत्री कोई भी हो रेल दुर्घटनाओ में कोई कमी नहीं आने वाली है और ना ही रेल प्रशाशन द्वारा हर दुर्घटना के बाद उसके कारणों के ले कर वही लिपा पोती करना बदलने वाला है | ना तो कोई मंत्री देश की सेवा या जनता की सेवा के लिए बनता है और ना ही किसी मंत्री मंडल में फेर बदल जनता के लिए या उसकी परेशानियों को दूर करने के लिए होता है | पूरी कवायद सरकार का,  सरकार के लिए, सरकार द्वारा किया जाता है | मतलब की मंत्री मंडल में नये चेहरों को लाना कुछ पुराने को इधर उधर करना और कुछ की छुट्टी करना सरकार अपने मतलब के लिए करती है, कही किसी को संतुष्ट करना है, कही सरकार की बिगड़ी छवि को ठीक करना है, कही किसी का कद उसके चमचागिरी से बढ़ना है, तो किसी के उग आये ज्यादा परो को काटना है | जो भी होगा वो सरकार केवल और केवल अपने लिए करती है आम आदमी के बारे में ना तो सोचा जाता है ना उसकी कोई सुध ली जाती है, यदि उसके बारे में कुछ सोचा जाता है तो ये कि कैसे सरकार की आम आदमी के सामने हो रही बदनामी कम हो जाये, या फिर काम हो या ना हो पर आम आदमी को लगना चाहिए की काम हो रहा है सरकार को उसकी चिंता है तभी तो देखो कैसे सरकार ने जनता के भलाई के लिए तुरंत कुछ मंत्रियो को हटाया बढाया है नये लोगो को लाया है जो जनता की अच्छी सेवा करेंगे | पर असल में होगा क्या की अब नये मंत्री नये घोटाले करेंगे नये तरीके के भ्रष्टाचार होंगे अब मंहगाई बढ़ने के शायद कुछ नये कारण गिनाये जायेंगे या एक और नई तारीख दे दी जाएगी महंगाई कम होने के, अब नये लोग कुछ तो नया करेंगे ही बाकि जनता के लिए तो बस नेताओ मंत्रियो के नाम बदलने के अलावा और कुछ भी नहीं बदलने वाला है | पर हा इन सभी बातो के बीच कम से कम जनता का ध्यान कुछ सरकार विरोधी मुद्दों से तो हट ही जाता है और इसे हटाने में सबसे बड़ा साथ देता है मीडिया | मंत्री मंडल में होने वाले फेरबदल या विस्तार को इस तरह बड़ी खबर बना कर पेश करने लगा था जैसे की बस इसके बाद तो देश में क्रांति ही आ जाएगी सब कुछ सुधर जायेगा देश से भ्रष्टाचार कम हो जायेगा घोटाले बंद हो जायेंगे महंगाई रुक जाएगी सभी देशवासी नेताओ की तरह ही सुरक्षित जिंदगी जियेंगे, अब तो देश में सब कुछ अच्छा हो जायेगा | ये भी कम नहीं था जो अब नेताओ के संतुष्ट असंतुष्ट इस्तीफे की नौटंकी को बड़ी खबर बना कर पेश किया जा रहा है | पर जनता भी अब पहले की तरह ना तो भोली रही और ना ही बेफकुफ़ जो वो इन तिकड़मो को समझ ना सके सरकार की इन चालबाजियो को समझ नहीं सके | जनता ना तो भ्रष्टाचार के मुद्दे को भूलेगी ना महंगाई के मुद्दे को भूलेगी और ये बात सरकार के साथ मीडिया भी समझ ले तो उसके लिए ज्यादा अच्छा होगा |

July 04, 2011

आप इसे क्या कहेंगे उच्च कोटि का बलिदान, नादानी या बेवकूफ़ी - - - - - - -mangopeople

आज ये खबर पढ़ी आप भी पढिये और बताइये की आप इसे क्या कहेंगे उच्च कोटि का बलिदान, नादानी या  बेवकूफ़ी जो एक १२ साल की छोटी लड़की ने की है असल में ये लड़की नहीं बेटी है |

आशीष पोद्दार
नादिया (पश्चिम बंगाल) ।। 12 साल की मंफी से किसी ने कुछ नहीं कहा, लेकिन परिवार में सभी चिंतित थे। उसे पता था कि उसके पिता की आंखों की रोशनी जा रही है और भाई की जिंदगी भी खतरे में है। पिता के लिए आंख और भाई के लिए किडनी का बंदोबस्त करना परिवार के बूते की बात नहीं थी। आखिर उसने एक योजना बनाई जो उसके मुताबिक सभी समस्याओं का हल थी।


वह अपनी जिंदगी खत्म कर देगी। उसकी मौत से दहेज का पैसा तो बचेगा ही, उसके अंग भी पिता और भाई के काम आ जाएंगे। मंफी ने अपनी योजना पर अमल भी कर दिया, लेकिन मौत से पहले मां के नाम लिखा गया उसका खत परिवार वालों को तब मिला जब उसका अंतिम संस्कार हो चुका था।


यह घटना 27 जून को झोरपाड़ा के धंताला में हुई। छठी क्लास की छात्रा मंफी सरकार परिवार की समस्याओं को लेकर काफी परेशान थी। उसके नौवीं में पढ़ने वाले भाई मोनोजीत की एक किडनी खराब हो गई थी और दूसरी भी कमजोर हो रही थी। दिहाडी मजदूर पिता मृदुल सरकार की आंखों की रोशनी कम होती चली जा रही थी।


धंताला पंचायत के प्रधान तापस तरफदार बताते हैं,'परिवार ने लोकल एमएलए से संपर्क किया था। हमने फैसला किया कि उन्हें कुछ पैसा डोनेट करेंगे, लेकिन अचानक यह हादसा हो गया।'


मंफी ने 17 जून की सुबह ही अपनी योजना के बारे में आठवीं में पढ़ने वाली बड़ी बहन मोनिका से बात की थी। लेकिन, मोनिका ने उसकी बात को हंसी में उड़ा दिया और स्कूल चली गई। पिता काम पर थे और मां रीता सरकार चावल लाने गई थी। खुद को अकेला पाकर मंफी ने कीटनाशक पी लिया। उसके बाद वह पिता से मिलने दौड़ी।
जहर की बात पता चलते ही पिता उसे पास के दवाखाने ले गए। वहां से उसे लोकल अस्पताल भेज दिया गया। वहां भी हालत बिगड़ने पर मंफी को अनुलिया हॉस्पिटल ले जाया गया, लेकिन उसने रास्ते में ही दम तोड़ दिया।


मंफी का अंतिम संस्कार किए जाने के अगले दिन पिता मृदुल सरकार को मंफी के बिस्तर पर वह खत मिला जो मंफी ने मां के नाम लिखा था। खत में मंफी ने लिखा था कि उसकी आंखों और किडनी का इस्तेमाल करते हुए पिता और भाई का इलाज करवा लिया जाए। इस खत ने दुखी परिजनों का और बुरा हाल कर दिया। मां सदमे में हैं। पिता मृदुल सरकार रोते हुए कहते हैं,'हम उस छोटी सी बच्ची की भावनाओं को समय रहते समझ नहीं पाए।' 
  आप  इसे चाहे बलिदान कहे या नादानी या बेफकुफी आप की नजर में ये चाहे जो भी हो पर ऐसा कोई भी काम परिवार के लिए, उसके दुखो के अंत के लिए बस एक बेटी ही कर सकती है बेटा नहीं आप चाहे तो ऐसा कहने के लिए मुझे भी नारीवादी कह ले पर सच यही है | धन्य है वो महान लोग जो अपनी बेटियों को कोख में ही मार देते है, धन्य है वो लोग जो अपनी बेटी का लिंग बदलवा कर उसे बेटा बनवा रहे है,  धन्य है वो लोग जो राजेस्थान सरकार द्वारा बेटी के जन्म के एवज में मिलने वाले पैसे के लालचा में अब कन्या भ्रूण हत्या नहीं करते है बल्कि अब बेटी को जन्म देते है पैसे लेते है और उसके बाद उसे मार देते है |  ये सब हमारे २१ वी सदी के भारत में हो रहा है धन्य है हमारा भारत देश और यहाँ के लोग |

June 28, 2011

किसने कहा की ये "बेशर्मी मोर्चा" बाकि दुनिया से भारत आया है ये तो पूरी तरह से भारतीय है - - - - - - mangopeople




                                                                    आज कल काफी चर्चा है "बेशर्मी मोर्चा" की अब तक तो आप सभी इसकी इतिहास, भूगोल , पृष्ठभूमि और भारत में इसके प्रवेश आदि पर काफी कुछ पढ़ सुन और कह चुके होंगे | किन्तु सभी जगह लगभग यही बात दुहराई जा रही है की ये कनाडा से होते हुए बाकि दुनिया घूम कर भारत आया है किन्तु वास्तव में भारत में इस तरह का विरोध प्रदर्शन कोई नई बात नहीं है , हा पहले इतनी चर्चा नहीं हुई | कारण दो हो सकते है एक तो ये की अभी तक इस तरह का विरोध गरीब लाचार और कानून के आगे मजबूर तबके ने किया था दूसरा ये की हम सभी भारतीयों को विदेश से आई चीज की ज्यादा चर्चा की आदत होती है पर अफसोस की ये "बेशर्मी मोर्चा " तो भारतीय कांसेप्ट है |
                             भारत में बलात्कार का विरोध करने के लिए और महिलाओ की सुरक्षा के लिए इस तरह का मोर्चा निकालने की एक घटना सालो पहले देश के पूर्वोत्तर भाग में हो चुकी है | किन्तु वो मोर्चा आज के इस "बेशर्मी मोर्चा" से कही ज्यादा बोल्ड था क्योकि उस मोर्चे में महिलाओ ने एक भी वस्त्र धारण नहीं किये थे, सर से पांव तक वो नग्न थी और "आओ और मुझसे बलात्कार करो" के नारे भी लगा रही थी | ये मोर्चा निकाला गया था हमारे ही देश की सुरक्षा में लगे सेना के खिलाफ ( ये भी क्या गजब का संजोग है की कनाडा में भी ये विरोध मार्च सुरक्षा में लगे एक पुलिस वाले की कथन के बाद ही निकला गया था ) जिन पर आरोप था ( मै इसे सिर्फ आरोप नहीं मानती ये अपराध हुए थे ) की सेना के जवान वहा की लड़कियों का अपहरण करके सामूहिक बलात्कार करने के बाद हत्या कर देते है | इस तरह की कई घटाने हुई थी और सेना के जवानों पर आरोप लगाये गये किन्तु सेना ने कोई कार्यवाही नहीं की जिसके विरोध में वहा की ४५ से ६० साल की आम बुजुर्ग महिलाओ ने सेना के खिलाफ निर्वस्त्र हो कर प्रदर्शन किया और नारे लगाये की आओ और हमारा बलात्कार करो | ये सब मिडिया को दिखाने के लिए नहीं किया गया था (शायद वहा तो मिडिया के जाने की इजाजत तक नहीं थी) किन्तु फिर भी इस मोर्चे को घरो से छुप पर सुट किया गया और राष्ट्रिय न्यूज चैनलों ने इसे दिखाया भी गया | किन्तु मिडिया द्वारा इसे उस तरह  चर्चा में नहीं लाया गया ( आप देखिएगा अभी कुछ दिनों बाद आज के "बेशर्मी मोर्चे " को मिडिया कितना हाथो हाथ लेती है कितना इसे उछाला जाता है इस पे परिचर्चा की जाएगी बड़े बड़े लोगो को बुला कर इस पर राय ली जाएगी और महीनो तक प्राइम टाइम में ये छाया रहेगा )  जैसा इसे लाना चाहिए था कारण सरकार का दबाव भी हो सकता है क्योकि ये सेना के खिलाफ था और वैसे भी देश के उस हिस्से से हम सभी हमेसा से सौतेला व्यवहार करते आये है उसके दर्द परेशानी से हमें कभी कोई मतलब नहीं रहा है |
                                                                       ये तो रहा एक समूह द्वारा निकला गया मोर्चा किन्तु इस तरह का मोर्चा एक अकेली महिला ने भी निकला था | शहर था कोई यु पी का ( माफ़ करे घटना कुछ साल पुरानी है इसलिए शहर का नाम तो याद नहीं आ रहा है ) महिला गरीब तबके से थी और २७-२८ साल विवाहित महिला थी |  उसे इलाके का गुंडा काफी परेशान करता था छेड़छाड़ करता था उसको उठा ले जाने की धमकी देता और उसके पति द्वारा रोकने पर उसके साथ भी मारपीट करता था | महिला कई बार उसकी शिकायत पुलिस में कर चुकी थी किन्तु पुलिस कभी उसकी एफ आई आर दर्ज नहीं करती बस मुंह जबानी उसे आश्वासन दे देती थी | एक दिन जब उसके बर्दास्त करने की सारी हदे पार हो गई तो वो घर से निकल पड़ा पुलिस स्टेशन वो भी पहने जाने वाले सबसे कम कपड़ो में ( आप उसे बिकनी कह सकते है हिंदी में उसे जो कहते है उसे ठीक से लिख नहीं पा रही हूँ ) इस तरह के मोर्चे को देख पुलिस भी हडबडा गई और उसे तुरंत महिला की शिकायत दर्ज करनी पड़ी और थोड़ी कड़ी कार्यवाही भी करनी पड़ी और मिडिया के जाने के बाद महिला के इस कदम की खूब आलोचन भी की कि महिला को ये सब करने की कोई जरुरत नहीं थी | अब पुलिस वाले ने सारी कार्यवाही महिला के उस रूप को देख कर किया या मिडिया का मजमा लगने के कारण किया पता नहीं किन्तु जो बात वो महिला शालीनता से कहती रही उसे पुलिस वालो ने अनसुना कर दिया और सुना तभी जब महिला ने शर्म छोड़ बेशर्मी को अपना हथियार बना लिया | वैसे कुछ चैनल वालो का भी जवाब नहीं  उन्होंने ने भी महिला को टीवी पर जस का तस दिखाने में कोई गुरेज नहीं की दो तीन बार पूरी किलिपिंग दिखाने के बाद शायद उन्हें शर्म आई और तब जा कर महिला की तस्वीर को धुंधला करना शुरू किया ( पर यहाँ  भी संजोग देखिये की यहाँ भी बेशर्मी मोर्चा निकालने का कारण सुरक्षा में लगे लोगो की लापरवाही रही )
    
                                                   ये तो एक आध धटनाये है जब महिलाओ ने अपने खिलाफ हो रहे बलात्कार, शारीरिक शोषण और अपनी सुरक्षा के कारण शर्म त्याग कर "बेशर्मी मोर्चा" निकला | किन्तु हमारे भारतीय समाज में तो इस तरह की घटनाओ से भरा पड़ा है जब समाज के लोगो ने शर्म छोड़ कर महिलाओ का इस तरह का बेशर्मी मोर्चा निकाला हो | ये घटनाये इतनी आम सी है की हम तो उस पर ध्यान देने की जरुरत भी नहीं समझते है अख़बार के किसी एक कोने में या टीवी के समाचार में दो लाइनों की ये खबर सुनाई जाती है की फलाने गांव में कुछ दबंग लोगो ने महिला को निर्वस्त्र कर पुरे गांव में घुमाया कुछ दबंग लोग बेशर्म हो कर ये बेशर्मी का मोर्चा निकालते है और बाकि बेशर्म उसे चुपचाप होता देखते है | ये भी हमारे देश में निकाला जाने वाला एक तरह का बेशर्मी मोर्चा है जो समाज में बेशर्मी का सबूत हमें देता है |
      
                                                     समझ नहीं आता की ज्यादा बेशर्म कौन है वो बलात्कार करने वाला जो कुछ पलो के शारीरिक आन्नद के लिए किसी का पूरा जीवन नष्ट कर देता है या उसका जीवन ही ले लेता है या वो समाज और लोग जो ऐसे कृत्य के लिए पीड़ित को ही दोषी करार देते है और जीवित रहते भी उसे हर पल मारते है या वो सरकार, प्रशासन और सुरक्षा व्यवस्था जिसमे महिलाओ को अपने हक़ के लिए इस तरह के मोर्चे निकालने पड़ते है  या वो महिलाये जो अपने इसी शरीर के साथ सुरक्षित जीवन जीने के लिए, अपनी इच्छा का जीवन जीने के लिए एक सुरक्षित समाज की मांग करती है | 

  मुझे तो लगता है की सबसे बेशर्म तो वो महिलाए है जो महिला हो कर खुद को इन्सान समझने की भूल करती है , अपने लिए सुरक्षित समाज की मांग करती है , महिला हो कर भी अपने लिए हक़ और अधिकार जैसी चीजो की मांग करती है बड़ी बेशर्म है ये महिलाये |


नोट - कोई लिंक आदि खोजना और आप को देना मेरे बस कि बात नहीं है जिन घटनाओ का जिक्र किया है सभी के वीडियो सबूत है आप खुद यु ट्यूब पर खंगाले आप को जरुर मिल जायेगा | किन्तु इस मुद्दे पर और जानकारी के लिए ये लिंक दे रही हूँ ( प्रवीण शाह जी के आभार )|
                                                                      
                                                             



June 20, 2011

काश होती मै लता मंगेशकर - - - - - mangopeople



                                                                       अचानक से कुछ महीनो से अपने लता मंगेशकर न होने क अफसोस हो रहा है, काश की मै भी लता जी जैसी कोई बड़ी सेलिब्रेटी होती, नहीं नहीं अचानक से मुझे गाने का शौक नहीं हुआ है असल में मै सोच रही थी की 
यदि होती मै लता मंगेशकर तो मै भी अपने घर की तरफ आने वाले हवा, पानी, धुप को रोकने वाली सारी बाधाओ  को अपनी ऊँची पहुँच और रुतबे का प्रयोग कर रोक लेती किन्तु मै ऐसा कुछ नहीं कर पा रही हूँ | लता जी ने तो एक बार धमकी दी की यदि उनके घर के आगे फ्लाई ओवर बना तो वो मुंबई ही छोड़ कर चली जायेंगी राज्य के मुख्यमंत्री तक से इस विषय में मिल आई और उनके सम्मान और सेहत को ध्यान में रखते हुए उस प्रोजेक्ट को रोक दिया गया | किन्तु मै आम आदमी हूँ मेरे और मेरे परिवार के सेहत की चिंता किसी नेता की किसी भी लिस्ट में नहीं आता है मरता है तो मरे हमें क्या ,जीता है तो हमें वोट दे नहीं तो जा कर कही मरे, बिगड़ती है उसकी सेहत तो बिगड़े हमें क्या |
                                      एक तो पहले से ही मै कंक्रीट के जंगल मुंबई में रहती हूँ जहा हरियाली कम और सीमेंट के बड़े बड़े पेड़ चारो तरफ उगते जा रहे है जो खुद एक दुसरे का भी और कुछ छोटे पौधा का भी हवा पानी धुप रोक रहे है उस पर से विकास के नाम पर चल रहे नए प्रोजेक्ट ने तो हमारा साँस लेना भी मुहाल कर रखा है | पिछले एक दो सालो से अचानक लगने लगा की जैसे गर्मी कुछ ज्यादा ही पड़ रही है अब हवा चलना बंद हो गया है, पश्चिम की तरफ हमारे बेडरूम की खिड़की से अब वैसी हवा नहीं आती जैसी की कुछ समय पहले तक आती थी | राज कुछ महीनो पहले पता चला जब एक दिन सुबह सुबह वो खिड़की खोली और सूरज की तेज रोशनी से आँखे चौंधिया गई | लगा ये भगवान क्या दुनिया ख़त्म होने का समय आ गया है सूरज पश्चिम से क्यों उग आया है | असल में सड़क के उस पार और ठीक हमारी खिड़की के सामने जो टावर खड़ा हो रहा था उस पर बड़े बड़े कांच लगा दिए गए थे जिससे सूरज की रोशनी टकरा कर सीधे हमारी खिड़की के अन्दर आ रहा था और तब पता चला की वही टावर हमारे घर आ रहे हवा को भी रोक रहा था | सड़क के उस पार एक पुरानी बंद पड़ी मिल थी और उसके बाद रेलवे ट्रैक था जिसके कारण दूर दूर तक खुली जगह थी जो बिना किसी बाधा के हमारे घर तक समन्दर से आने वाली हवा लाती थी साथ ही डूबते सूरज का सुन्दर नजारा भी दिखाता था जो उस टावर के खड़े होने के बाद बंद हो गई | वो टावर हमारे इलाके की शान बनता जा रहा है इस प्रचार के साथ की वो दक्षिण मुंबई का सबसे ऊँचा व्यवसायिक ईमारत  है और कोई हम लोगो से पूछे की वो इलाके का शान कैसे पुरे इलाके की हवा को रोका रहा है | मामला यही ख़त्म नहीं होता है मेरे लिविंग रूम की बड़ी खिड़की दक्षिण दिशा में खुलती है वहा पर मैंने ३० -३५ गमले लगा रखे है (पहले गार्डेन में गमले होते थे, मुंबई में तो गमलो में ही गार्डेन है ) वहा पर पौधो को तो अच्छी धुप लगती ही है साथ ही वो रास्ता है मेरे घर में धुप आने का ,किन्तु अब कुछ महीनो बाद उस धुप पर भी रोक लगने वाली है क्योकि हमारे घर के सामने से मोनो रेल का ट्रैक बनने जा रहा है जो हमरी मंजिल से ऊपर बनेगा | हम जो पहले ही दूसरी मंजिल पर रहते है सामने से गुजर रहे फ्लाई ओवर से त्रस्त थे ( शुक्र था की वो मुख्य रास्ता न हो कर बस दो मुख्य सड़को को जोड़ने वाला छोटा रास्ता ही था जहा सुबह शाम ही भीड़ होती थी ) अब हमारे सर पर से मोनो रेल गुजरने वाली है वो लगभग तीसरी मजिल तक बनेगा | मोनो रेल दिल्ली की मैट्रो की तरह ही ब्रिज बना कर उस पर चलाया जायेगा | ये प्रोजेक्ट हमसे हमारी धुप ही नहीं छिनेगा बल्कि बरसात में मिलने वाला नजारा और मेरे पौधो को मिलने वाला बरसाती पानी भी रोकेगा जो बरसात के दिनों में उन्हें मिलता है |
                                                             किसानी के जमीन की और किसानो की , कटते जंगल की वहा रहते आदिवासियों की ,  पर्यावरण को हो रहे नुकशान की सभी को चिंता है आन्दोलन हो रहे है किसानो के हक़ में उद्योगपतियों को भगाया जा रहा है आदिवासियों के लिए आन्दोलन हो रहे है जंगल बचाने के लिए आन्दोलन हो रहे है | पर हम शहरो में रहने वाले मध्यमवर्ग के हवा पानी धुप को जो रोका जा रहा है उसकी सेहत के साथ जो खिलवाड़ हो रहा है उसकी चिंता किसी को नहीं है न केंद्र सरकारों को न राज्य सरकारों को ( कम्बखत दोनों जगह तो एक ही सरकार है तो किसको हमारी चिंता होगी, उड़ीसा ,पश्चिम बंगाल, यु पी की तरह अलग अलग सरकारे होती तो बात कुछ बन सकती थी )  न यहाँ के समाज सेवको को ( मेधा पाटेकर तो उड़ीसा जा रही है कभी हम लोगो का दर्द भी देख लेती ) अब हमारे लिए कौन आन्दोलन करेगा क्योकि हम लता मंगेशकर तो है नहीं जो अकेले कुछ कहे ( मिल कर भी कहे तो कौन सुनने वाला है ) और कोई सुन ले या यहाँ से जाने की धमकी दे तो कई सुन लेगा ( ये तो गलती से भी नहीं कह सकती, यहाँ तो पहले से ही एक नहीं दो पार्टिया हमें भागने में लगी है कह दिया तो जरुर घर तक आ जाएँगी हमारी मदद के लिए सामान बंधवा कर स्टेशन तक छोड़ने के लिए ) | फिर आन्दोलन करे भी तो क्या करे हमारे पास जमीन तो है नहीं जिसके जाने का नाम ले कर लड़े,  हम तो हवा में लटक रहे है न जमीन अपनी है न तो छत अकेले हमारी है और लड़े तो हवा पानी धुप के लिए कितने लोग साथ देंगे और हमारी सुनेगा कौन | हा ये हो सकता है की साथ देने कोई नहीं आये किन्तु आवाजाही की परेशानी झेल रहा एक बड़ा वर्ग हमारा विरोध करने जरुर चला आये |
  मोनो रेल के लिए हमारे घर के सामने खड़े तीन बड़े बड़े पेड़ काट दिए गये जो हमारे घर आने वाली हवा का दूसरा स्रोत था और हमारे घर के आगे से जब वो आगे दो किलीमीटर तक बढ़ता है तो पुरे रास्ते में जो पहले पूरी तरह से पेड़ो से भरा था और पुरे रास्ते को बारह महीने पड़ने वाली मुम्बईया गर्मी से राहत देता था को जड़ से काट दिया गया | फर्क कल नहीं आज से ही पता चल रहा है दिन पर दिन असनीय गर्मी बढ़ती जा रही है अब उस रास्ते पर चलना उतना आराम दायक सकून भरा नहीं रहा , जबकि पहले ऐसा नहीं था पेड़ो से भरा वो रास्ता न केवल सूरज की गर्मी जमीन पर कम कर देता था साथ ही अच्छी हवा भी देता था , जो अब हमें नहीं मिल रहा है उस पर से बीच में ब्रिज बनने रास्ते के सकरे होने के कारण होने वाला ट्रैफिक जाम हमारे लिए बोनस है | जो गाडियों के प्रेट्रोल की खपत और बढ़ा रहा है साथ ही और ज्यादा  धुँआ और ज्यादा शोर की जगह भी बनता जा रहा है | सिर्फ एक दो सालो में ये पूरा क्षेत्र विकास के नाम पर पर्यावरण पुरे वातावरण की बलि चढ़ा चूका है और लोग खुश है की विकास हो रहा है |
                                                                            किन्तु सभी को इससे परेशानी नहीं है कुछ लोगो का नजरिया हमसे बिलकुल अलग है वो हमें मोनो रेल बनने और पुरे क्षेत्र में खड़े हो रहे बड़े बड़े कंक्रीट के जंगलो के लिए बधाई देते है की आप का एरिया तो काफी विकास कर रहा है मोनो रेल के आने से तो आप के घर की कीमत तो और भी बढ़ जायेगी ( जो पहले से ही आसमान पर है ) | आप को कही भी आने जाने के लिए और भी आराम हो जायेगा मुंबई को जोड़ने वाली तीनो लाइने आप के घर के दरवाजे पर होगी ( जिसका प्रयोग हम कभी कादर ही करते है शायद इसीलिए हमारा नजरिया दूसरो से अलग है ) | जबकि हमें अब लगने लगा है जैसे कुछ ही दिनों बाद हमें लगेगा की हम किसी स्लम में रह रहे है सामने ओवर ब्रिज ऊपर मोनो रेल आस पास तीन रेलवे स्टेशन , फिर शोर, भीड़, धुल, गर्मी, तो बोनस में हमें और मिलने ही वाले है |
                                         ये सब हमारे ही क्षेत्र में नहीं हो रहा है ये तो पुरे मुंबई का हाल है | कहने के लिए तो संजय गाँधी नेशनल पार्क मुंबई का सबसे बड़ा हरित क्षेत्र है किन्तु अब ये धीरे धीरे सिकुड़ता जा रहा है लोग नेशनल पार्क को काट काट कर घर बनाते जा रहे है और कुछ तो उनके अन्दर ही पूरी बस्ती बना कर रह रहे है | अब सुना है की सी लिंक परियोजना बंद कर दी जायेगी क्योकि ये महंगा पड रहा है अब उसकी जगह समुन्द्र के किनारों को पाट कर समुन्द्र के किनारे किनारे एक सड़क का निर्माण किया जायेगा | जबकि कई बार समुन्द्र को इस तरह पाटने को लेकर विरोध किया जा चूका है और इससे होने वाले नुकशान को भी बताया जा चूका है पर सुनने वाला कोई नहीं है, तब भी नहीं जब ये मुंबई कुछ साल पहले २६ जुलाई को आई बाढ़ की भयानकता को झेल चूका है जिसके लिए एक बड़ी वजह यहाँ पर बह रही मीठी नदी को पाट कर बिलकुल गायब कर देना भी था ( तभी से मीठी नदी भी गंगा बन चुकी है उसकी सफाई और रख रखाव के नाम पर करोडो हजम हो चुके है पर नदी अब भी वैसी की वैसी ही है जैसे की गंगा के गन्दगी कभी साफ नहीं हुई करोडो रुपये जरुर सरकारी तिजोरी से साफ हो गये ) |
                              ऐसा नहीं है की विकास बिना पर्यावरण को नुकशान पहुचाये हो ही नहीं सकता है किन्तु उसके लिए शायद ज्यादा दिमाग और पैसे खर्च करने पड़े जिसका काफी टोटा है हमारे देश में | नीति निर्माता हर प्रोजेक्ट वर्तमान देख कर बना रहे है भविष्य के बारे में कोई कुछ भी सोचने के लिए तैयार नहीं है और न ही इस अंधाधुंध होने वाले विकास के नाम के बर्बादी के बारे में | सभी हर मुश्किल का फौरी इलाज कर रहे है और इस इलाज से होने वाले साइड इफेक्ट के बारे में कोई भी सोचने के लिए तैयार नहीं है सभी का रवैया वही है तब की तब देख ली जाएगी या तब फिर उसके लिए भी कोई फौरी नीति बना ली जायेगी | इन सब से सबसे ज्यादा नुकशान किसे होगा शायद हमारे बच्चो को जो अभी अपने शारीरिक मानसिक विकास के दौर से गुजर रहे है पता नहीं उन पर क्या असर हो रहा है | बड़ो में दिन पर दिन बढ़ता चिडचिडापन गुस्सा तो हमें दिख रहा है पर बच्चो पर क्या असर हो रहा है हमें नहीं पता क्या पता जब तक हमें पता चले तब तक सब कुछ हमारे हाथ से जा चूका हो और हम सिवाय पछताने के उस समय कुछ न कर पाये |
      
 चलते चलते 
             पेड़ लगाओ पेड़ लगाओ का नारा दिया जा रहा है | करोडो रुपये का हर साल वृक्षा रोपण होता है लोगो से अपील की जाती है की तोहफे में पेड़ दे अपने आस पास पेड़ लगाये पर समझ नहीं आता की पेड़ लगाये कहा पर घर की छत पर या बीच रास्ते पर शहरों में पेड़ लागने के लिए भी जगह कहा है | मुंबई में तो कुत्ता भी अपनी पूंछ दाये बाये नहीं ऊपर निचे हिलाता है |  
                                     
       

June 17, 2011

अभी हम सभी ने एक हिंदूवादी बाबा को निपटाया है अब भ्रष्ट अन्ना हजारे की बारी है - - - - - - - mangopeople



                                                               लीजिये अन्ना हजारे ने फिर अनशन की धमकी दे कर अपनी राजनीतिक नौटंकी शुरू कर दी | अभी हम सभी ने एक भ्रष्ट, राजनीतिक महत्वाकांक्षा रखने वाले गेरुवा वस्त्रधारी हिंदूवादी बाबा को निपटाया है अब भ्रष्ट अन्ना हजारे की बारी है | आप सभी को आश्चर्य क्यों हो रहा है ,क्या आप को नहीं पता की अन्ना हजारे भी भ्रष्टाचार में लिप्त पाए गये थे,  बाकायदा उसकी जाँच हुई थी और वो दोषी भी पाये गए थे, वो अलग बात है अपनी ऊँची पहुँच और नाम के चलते वो बच गए | कुछ साल पहले उन्होंने महाराष्ट्र के दो भ्रष्ट कांग्रेसी मंत्रियो के खिलाफ अनशन किया था वहा की सरकार को मजबूर हो कर मंत्रियो को हटाना पड़ा हटाये गए माननीय मंत्री जी ने अन्ना पर अपने ट्रस्ट के पैसे का दुरुपयोग करने का आरोप लगाया बाकायदा माननीय पूर्व मंत्री जी के आरोप पर एक जाँच बैठाई गई और पता चला अन्ना के जन्मदिवस पर ट्रस्ट के दो लाख रुपये खर्च किये गए | ये भ्रष्टाचार नहीं है तो क्या है क्या लोगो ने ट्रस्ट को पैसे अन्ना के जन्मदिवस के लिए दिया था नहीं, उन्होंने जनता के सेवा के लिए मिले पैसे को अपने निजी कार्यो के लिए खर्चा किया था ( अब उन्होंने किया या उनके लोगो ने किया बात तो एक ही है ना, उन्होंने मना तो नहीं किया तो वो भी इस भ्रष्टाचार में उतने ही दोषी है जितने की कोई अन्य  ) | भ्रष्टाचार तो भ्रष्टाचार होता है चाहे वो हजारो करोड़ का हो या कुछ हजार का ही एक भ्रष्टाचारी को कोई हक़ नहीं बनता की वो किसी दुसरे भ्रष्टाचारी पर किसी तरह का आरोप लगाये उस पर उंगली उठाये या उसे भ्रष्ट तक कहे | जो खुद ये काम कर चूका है हम सभी महान ईमानदार आम जनता उस व्यक्ति का कैसे साथ दे सकते है | इसलिए जरुरी है की हम जैसे उच्च कोटि के ईमानदार आम जनता का नेता बिल्कुल उच्च कोटि का ईमानदार हो | क्योकि गाँधी जी ने कहा था की एक सच्ची और अच्छी चीज को पाने के लिए प्रयोग किये जा रहे साधन भी पवित्र होने चाहिए | क्या आप सभी को गाँधी जी की ये बात याद नहीं है, क्यों नहीं याद है, जब गाँधी जी याद है तो उनके विचार क्यों नहीं याद है शायद इसलिए याद नहीं है की हम सभी भेड़ चाल वाले भारतीय व्यक्ति पूजा में विश्वास करते है हम व्यक्ति का समर्थन करते है व्यक्ति का विरोध करते है, उसने क्या कहा उसके क्या विचार है उससे हमें मतलब नहीं है हम तो उसे सुनने की भी जरुरत नहीं समझते है, तो याद क्या खाक रखेंगे तभी तो गाँधी जी याद है किन्तु उन्होंने कहा क्या था गाँधी जी के विचार क्या थे गांधीवाद क्या था  ये हम सब भूल चुके है | हमें बाबा याद है हमें अन्ना याद है किन्तु वो दोनों कह क्या रहे है वो हममे से किसी को भी याद नहीं है व्यक्ति के आगे मुद्दे गुम हो गये | कोई बाबा का विरोध कर रहा है तो कोई उसका समर्थन कर रहा है हर जगह बस बाबा ही छाये हुए है पर उनके उठाये मुद्दे गुम हो गये है | 
                                   अब अँधा क्या चाहे दो आँखे और सरकार क्या चाहे भ्रष्टाचार के मुद्दे हवा हो जाये और लीजिये जी वो हवा हो गये | अब सरकार से कोई नहीं पूछ रहा है कि आप ने तो बाबा की सारी मांगे मान ली थी तो जरा बतायेंगे की उस पर कमेटिया बनाने के अलावा क्या जमीनी काम चल रहा है क्या बतायेंगे की कमेटिया कब तक अपना काम कर लेंगी, कब तक सरकार को अपनी रिपोर्ट दे देंगी, क्या उनका कोई समय सीमा तय किया है | चलिए वो जाने दीजिये विदेश से जो धन आएगा वो तो आएगा पर देश के अन्दर ही जो कला धन छुपा है उसका क्या हुआ उसको बाहर लाने के लिया आप क्या कर रहे है | सालो पहले आप लोगो ने खूब स्कीम लाई थी इतने प्रतिशत सरकार को दो और अपना सारा कला सफ़ेद में बदला लो | बहुतो ने अपना काला सफ़ेद किया था तब से तो आप को पता होगा ही की किस किस के पास कितना काला है उसके बाद आप लोगो ने उस पर रोक लगाने के लिए क्या कार्यवाही की है | चलिए वो भी छोडिये  कोर्ट ने आप की गर्दन पकड़ कर जब झकझोरा तब जा कर आप ने हसन अली को गिरफ्तार किया अब वो कई राज आप को बता चूका है की उसके पास किस किस का पैसा था सुना था की उसमे दो पूर्व कांग्रेसी मुख्यमन्त्रियो और वर्तमान केन्द्रीय मंत्रियो का पैसा था उनके खिलाफ आप क्या कर रहे है ये सवाल तो आम जनता क्या देश की अदालत भी आप से पूछ पूछ कर परेशान हो चुकी है आप क्या कर रहे है | २ जी में जो सरकारी पैसा डूब गया उसको फिर से पाने के लिए क्या कर रहे है उन कंपनियों पर क्या कार्यवाही कर रहे है जो असल में मंत्रियो द्वारा फर्जी बना कर सारा खेल खेला गया , उन बड़ी कंपनियों पर क्या कार्यवाही कर रहे है जो इन सरे खेल में शामिल थी | इस केस में जो की आप ने एक और विरोधी सांसद के और कोर्ट के दखल के बाद मज़बूरी में कार्यवाही के आलावा दुसरे लोगो के नाम आ रहे है उनके खिलाफ आप क्या करने वाले है आदि आदि आदि सवाल तो कई है  किन्तु आज कोई भी ये सवाल सरकार से नहीं पूछ रहा है क्योकि सरकार ने ऐसे हवा चलाई की ये सारे सवाल हवा में गुम हो गये |
                                                सरकार ने पहले हम सभी को बाबा के कपडे का रंग दिखाया ( वैसे समझ नहीं आता की जब एक दो नहीं तीन तीन केन्द्रीय मंत्री हवाई अड्डे पर बाबा की अगवानी में लगे थे तब क्या उन्हें बाबा के कपड़ो का रंग नहीं दिखाई दे रहा था ) अब वो बता रही है की आन्ना के सफ़ेद कपड़ो के नीचे भी वही गेरुआ कपडे है जिससे हम सभी को डरना चाहिए क्योकि गेरुआ रंग आम जनता के लिए भारत की राजनीति के लिए बड़ा खतरनाक है | पहले उसने बाबा के कपड़ो का रंग दिखा कर उनके मुद्दे को हवा में गुम कर दिया अब वही चाल वो आन्ना के साथ भी चल रही है | और हम व्यक्ति पूजक आम जनता हम तो व्यक्ति के पीछे भागते है हमें तो मुद्दों से कभी ना मतलब था और ना रहेगा हम सदा से व्यक्ति पूजक रहे है और रहेंगे जब तक हमें व्यक्ति अच्छा लगेगा हम उसकी हर बात को कान बंद कर हा में हा मिलाते रहेंगे जिस दिन व्यक्ति हमें ख़राब लगने लगेगा उस दिन हम उसकी अच्छी से अच्छी बात को भी नकारते चलेंगे और इस बात को सरकारे भी खूब जानती है | तभी तो देखिये सरकार के मुंह से जब भी निकालता है तो बाबा या अन्ना ही निकालता है उन्होंने जो सवाल उठाये थे उस बारे में सरकार की मुंह कभी नहीं खुलता है | फिर उसे दिग्गी राजा ने थोड़े काटा है की वो अपने मन से ही इन विषयों पर कुछ बोले जब आम जनता , महान भारितीय बुद्धिजीवी वर्ग और हमारा तथाकथित लोकतंत्र का चौथा खम्बा मिडिया और अपने आप को जबरजस्ती लोकतंत्र का पांचवा खंबा ?? बनाने का प्रयास करने वाला स्वघोषित विद्वान ?? ब्लोगर इस बारे में कुछ नहीं कह रहे है कोई सवाल नहीं कर रहे है तो उसे क्या पड़ी है कुछ भी कहने की | सभी यहाँ अपने निजी विचारो, संकुचित सोच को पोषित करने उसे बढ़ाने सभी से उसे मनवाने और सबसे सही और सभी का भला सोचने वाला साबित करने में लगे है ( मै भी इनमे शामिल हूँ मै कोई दुसरे ग्रह से थोड़े आई हूँ ) | असल में सभी अपने राजनीतिक सोच की खाल से बाहर आने को तैयार नहीं है सभी का अपना ही विचार उत्तम लग रहा है | किसी को तो ये सारा आन्दोलन ही लोकतंत्र पर हमला लग रहा है तो किसी को कांग्रेस विरोधियो बजापा की राजनीतिक साजिस लग रहा है | सही भी है ६० साल से ऊपर चिर निद्रा में सोये हुए हम आम जनता ये कैसे बर्दास्त करे की कोई बेवजह हमारे नीद में खलल डाले हम अपने घरो में सोफे पे पसर कर भ्रष्टाचार पर बकर बकर तो कर सकते है पर जब सड़क पर आ कर कुछ करना हो तो हम हर आन्दोलन में दुनिया जहान के मीन मेख निकाल कर बड़े आराम से इससे बचना चाहते है, हम क्रांति तो चाहते है बदलाव तो चाहते है पर वो सब बस हमारे आराम से बैठे बैठे बकर बकर बकने से आ जाये तो क्या बात है | हा जब बदलाव आ जाये और उसका क्रेडिट लेना होगा तो हम सब माला पहनने के लिए जमीन तक अपना सर और कमर झुकाने के लिए तैयार मिलेंगे | तो चलिए हमारी बकर बकर ख़त्म हुई कुछ आप के मन में हो तो यहाँ बक कर मन हल्का कर लीजिये मेरी तरह , बाकि हम इससे ज्यादा ना तो कर सकते है और ना ही करना चाहते है |