January 10, 2017

रोओ रुदालियों अपना अपना रोना रोओ -----mangopeople




                                                    बहुत समय पहले की बात है एक बार एक पति ने अपने मरने का नाटक किया ताकि देख सके रुदाली बुला कर रोने का दावा करने वाली पत्नी कितना रोती है । पत्नी ने पति के मरते ही रुदाली बुला ली तय हुआ दो मक्के की रोटी और दो रुपये पर रुदाली रोयेगी । रुदाली ने सर्त रखी कि चूल्हे पर मक्के की रोटी लगा दी जाये उसके पकने तक रो लेगी । पत्नी ने रोटी लगा दी और दोनों ने रोना शुरू कर दिया पत्नी ने रोना शुरू किया कि हाय रुदाली उसके दो समय की रोटी ले जा रही है , एक तो कमाने वाला पति मर गया उस पर से दो रूपये और गये । रुदाली ने रोना शुरू कि हाय रोटियां तो ये देख नहीं रही कही जल गई तो खाने लायक भी न रहेगी पैसे देने से पहले इतना रो रही है पता नहीं पैसे मुझे देगी भी नहीं । कुछ देर दोनों अपना रोना रोती रही मरने का नाटक कर रहा पति झुंझुला कर उठ बैठा , बोला मरा तो मैं हूँ और मेरे लिए कोई रो ही नहीं रहा है , दोनों के दोनों अपने लिए रो रहे है ।

                       कल एक सैनिक ने सीमा पर अपने खाने पिने के ख़राब हालातो के बारे में एक वीडियो पोस्ट की।  मंशा हालात सुधारने की रही होगी , सरकार तक वहां हो रही धांधलियों की खबर देने की रही होगी । किन्तु यहाँ मोदी भक्त और मोदी विरोधी रुदालियाँ अपना रोना ले कर बैठ गई । एक सीमा पर सैनिको को ख़राब खाने की सप्लाई के लिए सीधा प्रधानमंत्री और सरकार को ही दोषी बना रहा है दूसरा पिछले ७० सालो का हिसाब दे सैनिक के अगले पिछले का पोस्मार्टम कर रहे है । उन दोनों को सैनिक उसके बुरे हालातो , उसकी समस्या से अब कोई मतलब ही नहीं है । एक मोदी और सरकार को जिम्मेदार बता कर उसे गालियां दे रहा है और दूसरा बेमतलब के तर्क दे कर उन्हें बचा रहा है । सैनिको की समस्याओ पर चर्चा कौन करेगा , उनके लिए बेहतर हालातो के बारे में कौन आवाज उठाएगा , फिलहाल कोई नहीं , क्योकि सोशल मिडिया की सभी रुटे सीधे जा कर राजनीति के चौराहे पर मिलती है , और हर समस्या को बस एक ही नजर और सोच से देखा जाता है , इसलिए सभी लाईने उसी में व्यस्त है ।


                             ये कोई पहली बार नहीं है , सूना है कि युद्ध के दौरान सैनिको की बंदूके जाम हो गई थी , सूना है की एक रक्षा मंत्री को अफसरों को धमकी देनी पड़ी थी कि यदि सैनिको के लिए बर्फ पर चलने वाली गाड़ियों की फाईल तुरंत पास नहीं किया गया तो उन अफसरों को सियाचिन के सीमा पर भेज दिया जायेगा , सूना है सैनिको के लिए जो ताबूत ख़रीदा गया उसमे भी घोटाले हुए , सूना है मैडल लेने के लिए कुछ बड़े अफसरों ने फर्जी बहादुरी दिखाई , सुना है हथियारों की और सैनिको के लिए लिए जा रहे साजो सामानों पर सेना के अंदर भी कमीशन लिया जाता है , सुना है की तलाशी के नाम पर लोगो को लुटा भी गया है , सूना है सैनिको की विधवाओ के लिए बनी इमारतों में से सैनिको को ही बेदखल कर दिया गया । सुना है सैनिको के मदद के लिए बने एक फंड में  पैसे न के बराबर आये , सोशल मिडिया में जवानों की विरता की कसमे खाने वाले और जवानों के नाम पर सरकारो को कोसने वाले किसी ने भी पैसा वहा नहीं भेजा ।   बहुत कुछ सुना है , पर चर्चा नहीं होती क्योकि इस समय देश में दो ही पंथ और पंथी है , पागलपंथी और घटियापंथी । रोओ रुदालियों अपना अपना रोना रोओ ।












January 09, 2017

चीजो का नॉनवेज एंगल --------- mangopeople




                                                     ज़माने पहले कही पढ़ा  पहले नाइस का अर्थ बेवकूफ होता था फिर धीरे धीरे इसका मतलब बदल गया , सोचा क्या फालतू की बात लिखी है ।  एक शब्द को कई जगह कई तरीके  से प्रयोग कर सकते है ये बात तो समझ आती है किन्तु उसका मतलब ही बदल जाये वो भी बिलकुल विपरीत अर्थ हो जाये, ये कैसे हो सकता है । बाद में समझ आया की हो सकता है ।  सालो बाद एक फिल्म के पोस्टर और प्रचार में " तेरी लूंगा " "तेरी कह कर लूंगा" जैसे वाक्य प्रयोग हुए तो समझ न आया की आखिर कहा क्या जा रहा है ।  इससे जुड़ा और एक वाक्य  "तेरी बजेगी" या " तेरी बजायेंगे " भी सुन रही थी । लगा जब हम छोटे थे तो ली जाती  खबर मतलब आप को डांट पड़ेगी और बजती थी बैंड मतलब अब पिटाई होगी । इससे ज्यादा इसका कोई मतलब नहीं था । लेकिन धीरे धीरे सुन कर और लोगो के बोलने के अंदाज से इसके आधुनिक मतलब पता चल गये और मान लिया की अब आगे से इसका आधुनिक वर्जन यानि नॉनवेज वर्जन को ध्यान में रखा जायेगा और इसका प्रयोग नहीं किया जायेगा । 

                                                     ये पहली बार नहीं था , मुम्बई में जब पहली बार आई तो एक और शब्द सुना  "फटी पड़ी है" । लोगो के बोलने का अंदाज ऐसा था कि कभी लगे वेज कभी लगे नहीं इसमे कुछ तो नॉनवेज है । एक दिन पति से पूछ ही लिया कि ये " फटी पड़ी" में क्या  फट रहा है , हमारा तो दिमाग ही फटता है पर लोग जिस तरीके से बोलते है उससे लगता है कि कुछ नॉनवेज सा फट रहा है ।पति ने हंसते हुए कहा कि है तो नॉनवेज लेकिन तुमको  क्यों जानना है कि क्या फट रही है । जवाब दिया पता तो चले की अंडा है या मिट ताकि कोई बोले तो उसे टोका जा सके , वैसे क्या जहा मिर्ची लगती है वही । ठहाके मारते उन्होंने कहा अरे वाह ये पता है कि मिर्ची कहा लगती है । मैंने कहा नहीं वो भी लगता था कि मिर्ची बदन में  मुंह में लगती होगी एक दिन एक दादी टाईप ने खुल कर पूरा बोला कि तुम्हारी कार में मिर्ची लगी तब पता चला की ये तो बोलने वाले की  इच्छा पर है कि वो मिर्ची कहाँ  लगाये । उन्होंने आश्चर्य में पूछा कार में मिर्ची कैसे लगती है । अरे यार उसका हिंदी सोचो ना , ग्रीन मैंगो मच की तरह ,अभी मेरे दिमाग में  नॉनवेज चल रहा है तो उसको हिंदी में नहीं बोल पा रही , गाली जैसा लग रहा है । उनका हस हस बुरा हाल बोले पर गाली को थोड़ा अलग तरीके से बोलते है । मैंने कहा जाने दो हमें पता है किसे क्या कहते है , अभी दिमाग जरा उधर चल रहा है तो वही लग रहा है नहीं तो बोलने में क्या था । कुछ साल बाद देखा मेरी एक मित्र भी ये बोलती , अच्छा तो नहीं लगता लेकिन कभी टोका नहीं एक दिन उन्होंने बच्चो के लिए बोल दिया तो मुझे लगा की उन्हें भी इसका मतलब  नहीं पता होगा ।  तुरंत उन्हें ज्ञान दिया बेचारी शर्म के मारे हाय हाय मुझे तो पता ही नहीं था करती रही । 


                                               कुछ दिनों पहले फेसबुक पर पढ़ा आलू कचालू बेटा  कहा गए थे जैसा बचपन में गाई कविता , जो हर बच्चा धड़ल्ले से गाता आ रहा है उसका भी एक नॉनवेज एंगल है । वहा लोगो के कमेंट पढने के बाद जब दुबारा इस कविता को पढ़ा "आलू कचालू बेटा कहाँ गये थे मम्मी के बिस्तर पर सो रहे थे " तो लगा बस एक गन्दा दिमाग होना चाहिए आप आराम से इस कविता मतलब नॉनवेज कर सकते है । कविता क्या एक गंदा दिमाग किसी भी चीज का एक नॉनवेज एंगल देख सकता है ।  

January 06, 2017

शाबास धोनी -------mangopeople



                                                  शाबास धोनी आप से इसी की उम्मीद थी । कई बार विदेशी खिलाड़ियों के देख कर कोफ़्त होती थी की कैसे वो अपने खेल के पीक  पर सन्यास ले लेते है , कैसे वो खुद से कप्तानी छोड़ देते है , कैसे वो कहते है कि मैंने अपनी काबलियत दिखा दी अब बहुत हुआ , दुसरो को भी अपनी काबलियत दिखाने का मौका मिलना चाहिए , टीम में जगह सिमित है , दुसरो को भी टीम में आने का और अपना कौशल दिखने का मौका मिलना चाहिए । किन्तु हमारे भारत में जब तक खिलाड़ियों को धक्के मार कर बाहर न निकाला जाये , वो मैदान में दर्शको की हूटिंग बर्दास्त करते है लेकिन खेलना और कप्तानी नहीं छोड़ते है । 

                                                  जब तक घिसा जा सके तक तक घिस लो वाले अपने देश में बाप भी घर दुकान अपने जीते जी बेटे को नहीं देता है , यहाँ तो बाप गद्दी देने के बाद वापस भी मांग सकते है । जब पुरे देश का यही हाल हो तो खिलाडी उनसे अलग कैसे हो सकते है , वो भी जब तक  हो सके टीम में चिपके रहते है या कप्तान का पद नहीं छोड़ते । उन्हें लगता है जब तक खेलने की काबलियत का एक कतार भी उनके अंदर है तो उन्हें खेलते रहना चाहिए । कई बार कप्तानी छोड़ने में ये डर होता है कि फिर विशुद्ध रूप से अब खिलाडी के खेल पर ध्यान दिया जायेगा , टीम में चयन का आधार उसका निजी खेल प्रदर्शन होगा न कि कप्तान के रूप में उसका प्रदर्शन । कई बार अहम भी आड़े आता है कि किसी और के मातहत खेलना होगा । 

                                               दुसरो को भी अपनी काबलियत दिखाने का मौका भी मिलना चाहिए जैसी चीजे तो यहाँ सोची ही नहीं जाती । जो चल रहा है वो ही ठीक है उसे ही चलते रहना चाहिए , अच्छी खासी चल रही चीज को डिस्टर्ब नहीं करना चाहिए , विनिंग कॉम्बिनेशन वाली सोच कुछ और आजमाने की हिम्मत ही नहीं देती लोगो को । कितनी ही बार कई अच्छे खिलाड़ियों को टीम में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्स करना पड़ता है क्योकि कोई सीनियर खिलाडी २० साल खेलने के बाद भी जाना नहीं चाहता और अपनी असली खेल दिखाने की जगह उसे हर हाल में अपना प्रदर्शन ठीक रख टीम में जगह बनाये रखने के लिए ही लड़ता रह जाता है । कप्तानी में भी अभी है वो अच्छा है इसलिए जो हमारे पास एक और प्रतिभा दिख रही है उसे व्यर्थ जाने दो संभव हो कि  वो उससे भी अच्छा हो , उसे अपनी काबलियत दिखाने का मौका कब मिलेगा । पता चला एलिजाबेथ के जाने तक चार्ल्स का नंबर ही न आये सीधे विलियम को ही गद्दी पर बैठना नसीब हो । 
                                             इस लिए मेरी तरफ से शाबास धोनी , हिम्मत भरा फैसला लिया है और सही फैसला लिया है । एक खिलाडी और कप्तान के रूप में आप ने लगभग हर बड़ी सफलता को पा लिया है , उसके बाद आगे ही बढ़ना चाहिए था आप को  और आप बढे , धन्यवाद , उम्मीद है आप दुसरो के लिए मिशाल बनेंगे और खेल से सन्यास लेने के फैसले में भी ऐसे ही उदाहरण  रखेंगे ।  

January 04, 2017

ये शहर नहीं जंगल है , सतर्क रहिये -------mangopeople



                                                                   कोई कुछ भी कहे किन्तु मुझे भी गलती उन लड़कियों की ही दिख रही है । आये दिन जिस तरह की वारदाते हो रही है उसे देखते हुए उन्होंने कैसे सोच लिया की वो एक सुरक्षित समाज में है और उन्हें सुरक्षा के कोई उपायो की कोई जरूररत नहीं है । कितनी बार पर्स में पेपर स्प्रे रखने की सलाह दी गई , चाकू ब्लेड से लेकर कुछ भी अपने लिए रख सकती है । कितनो ने अभी तक हथियारों के लाइसेंस के लिए अप्लाई किया है । दुसरो को कुछ मत कहिये गलती आप की है जो आप समझती है कि आप एक सभ्य समाज में रह रही है , जब आप घर से निकले तो समझिये आप जंगल में है और चारो तरफ जंगली जानवर , जिनसे आप को हर समय सतर्क रहना है और आप का शिकार करने के लिए बढे तो सीधा गोली मार दीजिये ।
                                                                   पढाई लिखाई किसी इंसान की सोच नहीं बदल सकते है , ये सब बाते आप की अपनी गलतफहमी है पढ़ा लिखा आदमी ये सब नहीं करता । कितना भी पढ़ ले आदमी आदमी ही होता है इंसान नहीं बन जाता । पढ़ा लिखा आदमी सीना ठोक कर रोज बताता है , Men will be Men और पुरातनपंथी कहता है कि आदमी के अंदर जानवर होता है , उसे उकसाना नहीं चाहिए । वो तो स्त्री रूपी प्लस्टिक के उन पुतलो को भी देख भड़क जाता है , जो कम कपड़ो में हो , मुम्बई में उन्हें हटवाया गया , क्योकि वो आदमी को आदमी बना रही थी , अंदर के जानवर को उकसा रही थी । आप तो जीती जागती है और आप की जान बहुत कीमती , हर हाल में उन जानवरो से ज्यादा , जो अपनी जरुरत के लिए आप के जान की भी परवाह नहीं करेंगे ।

                                                                  मैं अब भी कहा रही हूँ , पुरुषो को और उनकी सोच को दोष देना अब बंद कर दीजिये , जो चीज नहीं बदल सकती उसे हर बार दोष नहीं दिया जा सकता है । उसे उसके हाल पर छोड़ आगे बढ़ाना चाहिए और अपनी तैयारी करनी चाहिए, यदि सुरक्षित रहना चाहती है । जब दूसरे न सुधरे तो अपने आप को बदल देना चाहिए । आप के साथ कोई पुरुष हो न हो , आप दिन में चले या रात में , सुनसान जगह या भीड़ में , अपनी जिम्मेदारी खुद लीजिये । इस पागलपन में मत जिये की कोई और जरुरत पड़ने पर आप की मदद को आयेगा , सोचिये की जब आप घर से निकलती है तो जंग पर जा रही है , और दुश्मन कोई भी हो सकता है , और जंग पर जुबानी हथियार से नहीं जाते । तैयार कीजिये अपने शरीर को दिमाग को मन को , तैयारी हर तरह के हथियारों के साथ ।



December 31, 2016

राजनीति के घोड़े की अढाई चाल -------mangopeople



                                                     राजनीति में किसी भी चीज और फैसलो पर न तो ज्यादा आश्चर्य करना चाहिए और न ही ये सोचना चाहिए की जो हो रहा है वही सत्य है | कई बार उसके मायने बहुत अलग अलग और कई सारे होते है और निशाने पर कोई और होता है | जिन्हें लगता है कि यूपी चुनाव का तिराहा ( सपा बसपा ,बीजेपी ) अब चौराहा बनाने वाला है ( २-सपा ) तो उन्हें अभी इंतजार करना चाहिए , चुनाव के आधिकारिक धोषणा तक | ये कमाल की बात नहीं है की आज से मात्र ५ साल पहले तक हम जिस सपा को उसकी जातिवादी , अल्पसंख्यक तुष्टिकरण , और बाहुबलियों गुंडों का पार्टी के रूप में जानते थे अचानक से वो पार्टी आज विकासवादी नजर आ रही है | ये विकास आदि पिछले ५ सालो तक इस तरह उभर के सामने नहीं आ रहा था जैसा की अब दिखाया जा रहा है , अब से पहले तक उसकी वही पुरानी छवि ही थी | यही करना है कि विकास के नाम पर केंद्र कि सत्ता पाने वाली बीजेपी भी यहाँ ध्रुवीकरण कि राजनीती कर रही थी |

                                                  किन्तु अचानक से अंसारी बंधुओ और अतीक अहमद जैसो का विरोध कर अखिलेश ने बीजेपी को सकते में ला दिया और विरोध भी इतना प्रबल की परिवार में ही दंगल की स्थिति हो गई | अब बीजेपी के ध्रुवीकरण की राजनीति का क्या होगा , जो अंसारी , अतीक अहमद के धर्म और उनके आपराधिक कार्यो को जोड़ सपा के मुस्लिम तुष्टिकरण से अपनी राजनीति चला रहे थे | अखिलेश ने एक झटके में इन दोनों का विरोध कर एक ही बार में उसकी राजनीति की हवा निकाल दी | सन्देश साफ दिया की पिता की तरह उनके लिए धर्म मायने नहीं रखता है , गलत आदमी गलत ही रहेगा चाहे वो किसी भी धर्म का हो वो उन्हें स्वीकार नहीं है |

                                                उसके बाद अखिलेश को विकास पुरुष के रूप में प्रोजेक्ट करना शुरू कर दिया गया | छवि को पूरी तरह से बदल दिया गया , धर्म , जाति, की राजनीति करने वाली पार्टी अब विकासवाद की और बढ़ रही है | एक दिन में विकास के लिए सैकड़ो उद्घाटनों और फीता कटाई का काम शुरू हो गया , जो परियोजनाए आधी अधूरी भी पूरी हुई थी उनका भी उद्घाटन कर प्रदेश को समर्पित कर दिया गया | ये जवाब था उस राजनीति का जो केंद्र में सत्ता पाने के लिए बीजेपी न की थी | जब ढाई साल पहले लोग २००२ को याद कर उनके खिलाफ प्रयोग कर रहे थे तब वह भारत के उज्जवल भविष्य का विजन लोगो के सामने रखा रहे थे , नजीता सभी को पता है | आज अखिलेश ने वो विकाश पुरुष का दांव भी चल दिया , जो असल में मोदी यहाँ चलने वाले थे | बुआ से उनकी अदावत बस भाषणों तक सिमित थी , वो दिखा रहे थे की उनकी लड़ाई बसपा से है किन्तु मात देने का काम वो बीजेपी को कर रहे थे , जो उनके लिए उनका मुख्य प्रतिद्वंदी है |

                                               अब दुनिया के सामने दो विकल्प है पुरानी राजनितिक दांव चलने वाले मुलायम और आधुनिक विकास की बात करने वाले पुत्र अखिलेश | लोग अब इन दोनों में से एक का चुनाव कर रहे है , बसपा और बीजेपी तो गायब ही हो गई , कांग्रेस तो पहले ही उनके पाले में जाने के लिए लालायित है | उसको भी घुटनो पर आने तक इंतजार में रखा जायेगा | अब बीजेपी के पास न विकास का मुद्दा बचा है न ध्रुवीकरण का उस पर से कोई ऐसा स्थानीय चमत्कारिक नेता भी नहीं है जिसे वो मुख्यमंत्री के रूप में घोषित कर सके , जैसा की केंद्र में उन्होंने मोदी को किया था | जबकि अब सपा के पास अखिलेश का नाम और चेहरा है मुख्यमंत्री पड़ के लिए ,जो न केवल काम कर रहे है बल्कि पुराने पड़ चुके राजनितिक दावो से भी खुद को अलग कर चुके है | उनके किया काम भी लोगो के सामने है बिलकुल वैसे ही जैसे मोदी गुजरात में किये अपने कामो को दिखा कर केंद्र में सता पा गए |

                                            सपा का एक बहुत ही अच्छा दांव जिसने न केवल सारा ध्यान लोगो और मिडिया का अपने ऊपर केंद्रीत कर लिया बल्कि अपनी छवि भी बदल दी | अब वो अखिलेश जो पहले ही राहुल , तेजप्रताप , तेजस्वी के आगे ज्यादा काबिल नजर आ रहे थे वो अब और योग्य उम्मीदवार लगने लगे | इस दांव पर वाह वाह किया जा सकता है और अब सवाल बीजेपी और मोदी से अब आप का जवाब और चाल क्या होगी |



December 22, 2016

अच्छे विचार पढाई और पद के मोहताज नहीं - - - - - mangopeople


                                                             भले समाज किसी की पढाई लिखाई, काम और पद से उसको, उसके विचारो को , बोलने समझने को आंकता हो किन्तु वास्तव में इसका संबंध हो ये जरुरी नहीं है । आज बेटी के स्कूल में प्रोजेक्ट डे था विषय था मुम्बई । आज से पहले ही स्कूल में डब्बे वाले से लेकर जितने भी तरह के लोग यहाँ की खासियत है उन्हें स्कूल में बुलाकर बच्चो से मिलवाया गया उनके बारे में विस्तार से बताया गया था और बच्चो को धारावी तक घुमाया गया था । आज कायर्क्रम में इन सब के जिक्र के आलावा भविष्य के मुम्बई बात की गई यहाँ लगे सभी मूर्तियों माध्यम से । जो सबसे खास था वो था बच्चो ने बताया कैसे मुम्बई में पुरे देश से लोग आ कर रहते है और करीब हर राज्य समुदाय से आये बड़े बड़े सफल नामो को गिनाया गया । 
                                                                आज मुख्य अतिथि के रूप में डब्बा वालो के एसोसिएशन के प्रमुख और रेलवे के कोई बड़े ऑफिसर आये थे । कार्यक्रम के बाद मुख्य अतिथियों को बोलने के लिए कहा गया । पहले डब्बा वाले आये ठीक ठाक हिंदी में छोटी सी बात कही कि , आज कार्यक्रम देख कर बहुत अच्छा लगा बच्चो ने बताया की मुम्बई मिनी भारत है , यहाँ पुरे देश की संस्कृति देखने को मिलती है , सब यहाँ मिल कर रहते है । आप सभी ने बच्चो को बहुत ही अच्छी शिक्षा दी है यही कल के भविष्य है और यही शिक्षा उन्हें मिल कर रहना सिखायेगी । बिना रुके अटके सीधी बात कह दी , जो रटा रटाया नहीं बल्कि कार्यक्रम को देख पर बोला गया एक विचार था ।
                                                              फिर बारी आई रेलवे वाले की , बड़े ऑफिसर थे किन्तु वो यही समझ नहीं पा रहे थे की बोले क्या । शुरुआत बच्चो की और कार्यक्रम की तारीफ से की वो भी अटक अटक कर , साफ कहा की मुझे पता नहीं था कार्यक्रम इस प्रकार का होगा ( लगा होगा बच्चे गानो पर नाचेंगे बस ) , फिर बोले रेलवे पर बोलूंगा , बड़ी मुश्किल से ये बोल पाये की बच्चो को रेल में कैसे सफर करना चाहिए ये बताये ( ये नहीं कह पाये की बच्चो को ट्रेन में सफर के दौरान सुरक्षा उपयो के बारे में बताइये , जैसे चलती लोकल ट्रेन में न चढ़े , उतरे या दरवाजो पर खड़े न हो आदि ) फिर तुरंत ही कैशलेस पर कूद पड़े , बच्चो को बताइये की वो रेलवे में कैशलेस सेवा ले सकते है और हमने अब शुरू किया है सभी को प्रयोग करना चाहिए , इसके आगे उनकी ट्रेन नहीं जा पाई। पुरे भाषण में एक लाईन भी बिना अटके नहीं बोल पाये उससे ज्यादा साफ दिख रहा था कि वो जो बोल रहे है , असल में बोलना नहीं चाह रहे , क्योकि वो बच्चो से और उस कार्यक्रम से मेल नहीं खा रहा था ।

                                                              ये ठीक है कि सभी अच्छे वक्ता नहीं होते किन्तु जब आप मुख्य अतिथी है तो आप को पता होना चाहिए की आप को बोलना होगा और बोलने के लिए आप के पास विचार होना चाहिए । संभव है कि आप ने कुछ और तैयार किया था और स्थिति कुछ और हो गई , किन्तु आप के सोचने समझने की शक्ति और पढाई लिखाई इसी दिन के लिए होती है की आप हर स्थिति को संभाल ले , यदि वो विपरीत होतो और भी । किन्तु उससे भी ज्यादा जरुरी है विचारो का होना , तैयारी तो डब्बे वाले ने भी नहीं की होगी , किन्तु उस कार्यक्रम को देख कर ही बोलने लायक विचार तो दिमाग में आ ही गये , जो एक पढ़े लिखे व्यक्ति के दिमाग में नहीं आये ।

December 20, 2016

फेयरनेस क्रीम एक नस्लवादी सोच -------mangopeople


                                                     कुछ साल पहले एक सेल्स गर्ल आई मैम हमारी कंपनी का फेयरनेश क्रीम ले लीजिये उसका कोई मुकाबला नहीं है , मैंने कहा मैं फेयरनेस क्रीम नहीं लगाती । अपनी आंखे बड़ी बड़ी कर बोली क्या आप फेयरनेस क्रीम नहीं लगाती , ठीक है पहले कौन सी लगाती थी । मैंने जवाब दिया मैंने कभी फेयरनेस क्रीम नहीं लगाई है , अब धुप से बचने के लिए आप की कंपनी का क्रीम लगाती हूँ लेकिन फायदा कोई नहीं है । फिर उसने ज्ञान दिया की मुझे तो फेयरनेस क्रीम लगनी चाहिए । हम चार भाई बहन चार अलग अलग रंग के है , पूरा खानदान ही करीब मिली जिला प्रजाति का है , इसलिए घर में कभी काला गोरा रंग मुद्दा ही नहीं रहा और न कभी हमें गोरे होने की क्रीम लगाने के लिए कहा गया । विवाह मे ये समस्या बनी किन्तु अंत में विवाह के लिए आप का व्यवहार , स्वभाव ही महत्वपूर्ण होता है । बाद में सांवली दीदी और खुद मेरा विवाह भी गोरे, दूध से गोर ( शब्द जो समाज प्रयोग करता है ) लोगो से हुआ , साफ है उनके लिए भी रंग कोई मुद्दा नहीं था । जबकि मेरे गोरे भाई बहन के जीवन साथी सांवले आये ।

                                                  एक न्यूज चैनल बता रहा है कि उसने एक साल से गोरे होने की क्रीम का विज्ञापन नहीं दिखाया है , उसके अनुसार गोरे होने की क्रीम एक तरह की नस्लवादी सोच है । उसका कहना बिलकुल सही है की आज की तारीख में जिस तरह से इन क्रीम को बेचने के लिए आक्रमक प्रचार किया जाता है उससे ये एक बड़ी समस्या जैसी बन गई है । आप गोरे नहीं है तो जीवन में आप का कुछ हो ही नहीं सकता । पहले इसे केवल विवाह में समस्या के तौर पर देखा जाता था किन्तु अब तो साफ प्रचारित किया जाता है कि जीवन के किसी भी क्षेत्र में आप सफल ही नहीं हो सकते यदि आप गोरे नहीं है । लडकिया क्या लड़को में भी ये हीन भावना और तेजी से भरी जा रही है । उनके लिए अलग से गोर होने के लिए क्रीम लाया गया है । खूब अच्छे से समझाया जाता है कि लड़कियों की क्रीम आप पर नहीं चलेगी और बिना गोरे हुए आप भी कुछ नहीं कर सकते । आप के तो जीवन लक्ष्य ही है कि दो चार लडकिया आप के आगे पीछे चिपक कर खड़ी रहे और रंग गोरा न हुआ तो आप ये लक्ष्य नहीं पा सकते ।
                                              ऐसा नहीं है कि हमारे समाज में रंग को लेकर कोई भेद ही नहीं था , था और बहुत गहराई से था , इसे तो वर्ण व्यवस्था तक से जोड़ दिया गया था । लेकिन तब लड़कियों के रंग को ही देखा जाता और विवाह ही एक मुद्दा होता था और उसके लिए घरेलु उबटन आदि का प्रयोग किया जाता था । किन्तु उसका स्तर ये नहीं था कि हर किसी को बस गोरी बहु ही चाहिए या समाज में हर जगह बस गोर लोग ही चाहिए । किन्तु आज बच्चे होते ही उसके रंग को लेकर चर्चा होने लगती है , ये बात लोग अक्सर नहीं समझते की रंग तो ज्यादातर परिवार के सदस्यो के रंग जैसा ही होगा । लोग तुरंत गोर होने के उपाय बताने लगते है , यहाँ तक की बच्चे के जन्म के पहले बच्चे गोर हो उसके लिए भी उपाय बताये जाते है  गर्भवती स्त्रियों को करना चाहिए । आजकल कंपनियों ने इसे महामारी की तरह बना दिया है । गोरी बहु चाहिए से मामला कर्मचारी खासकर यदि वो फ्रंट डेस्क के लिए हो तो गोरा ही होना चाहिए तक पहुँच गया है । इस कारण लडके और लडकिया में सवाले होने पर आत्मविवास कम हो जाता है और शुरू हो जाते है इन कंपनियों का बैंक बैलेंस बढ़ाने । जबकि वास्तव में किसी क्रीम से गोरा होना संभव नहीं है । आप धुप से बचने के उपाय कर सकते है किन्तु अपनी त्वचा के वास्तविक रंग को क्रीम से गोरा नहीं कर सकते है ।

                                               कई बार इस पर चर्चा समाज में हो चुकी है इसे ख़राब भी माना गया किन्तु शायद हमारे अपने अंदर ही ये कमी है की इसको एक मुहीम जैसा नहीं बना सके की बाजार अपने रुख को बदल सके , जबकि कई मुद्दों पर बाजार ने अपने आप को बदला है । शायद समाज भी उसी नस्लवादी सोच का बना गया है जिसका फायदा बाजार उठा रहा है । एक बार नादित दास को इस मुहीम से जोड़ा गया और जो तस्वीर उनकी ली गई उसमे भी उन्हें उनके वास्तविक रंग से ज्यादा साफ दिखाया गया । अब आप सोच सकते है कि समाज की समझ क्या है । टीवी पर कितने ही धारावाहिक आये जो इस सवाल रंग की समस्या को लेकर शुरू हुए किन्तु दो तीन साल बाद ही जब अभिनेत्री की पुरानी तस्वीर से जब धारावाहिक शुरू हुआ था से मिलाया गया तो पता चला की अभिनेत्री को भी मेकअप लगा कर दो साल में धीरे धीरे पहले से और साफ रंग का बना दिया गया ।
                                             ये सोच बचपन से समाज , परिवार द्वरा बच्चो में भर दी जाती है । मेरी बेटी जब कुछ तीन साल की हुई तो मुझे पता चला की इतने समय में ही सभी ने उसके साफ रंग को लेकर इतनी तारीफ की , इतनी बाते उसके सामने की कि उसे लगने लगा काला या सांवला रंग होना एक बुराई है और इस बात को उसके छोटे से दिमाग से निकालने में मुझे काफी मेहनत करनी पड़ी । अब अंदाज लगा सकते है कि समाज से इस सोच को बाहर निकालने में कितनी मेहनत करनी पड़ेगी , पर शुरुआत तो करनी ही होगी । ऐसे उत्पाद के विज्ञापन को नहीं दिखाने के लिए चैनल को बधाई दिया जाना चाहिए सराहना चाहिए और दुसरो को भी ऐसा कुछ करने के लिए दबाव डालना चाहिए ।

     फेयरनेस क्रीम एक नस्लवादी सोच 

December 17, 2016

लघु कथा पॉजिटिव एटीट्यूट -------mangopeople



 "क्या बात है शीशे में खुद को इतना गौर से देख खुद ही मुस्कुरा रही हो " 
" हां यार पता न था कि मैं अभी भी इतनी जवान जहान हूँ " 
" ये लो अभी हफ्ता भर पहले बालो को रंगने की सोच रही थी , आँखों के निचे रिंकल देख , रिंकल क्रीम को गाली दे रही थी अचानक सब बदल गया "
" हां वही तो , मेरा बर्थडे आने वाला था सोच रही थी बाप रे चालीस की हो जाऊंगी अब अपनी और केयर करना शुरू कर देना चाहिए , फिर ऐसी तारीफ मिली की लगा मैं बेकार की बात सोच रही थी ।  "
" तारीफ किसने की जरा हमें भी तो बताओ , कौन है जो हमारे पीछे इतनी तारीफे कर चला जाता है तुम्हारी "
" तुम्हारे पीछे कहा तुम्हारे सामने ही तो कल रात किया तुम्हारी मामी बहन ने , पहली बार देखा न मुझे , फ़िदा हो गई "
" तुम्हारी तारीफ कब "
" अरे तुमने सूना नहीं , उन्होंने मुझे क्या कहा , बहु सिंदूर बिछिया पायल कुछ नहीं पहनती , बाहर कुँआरी दिखना चाहती हो क्या , ताकि चार लडके लाईन मारे । बस तब से ही सोच रही हूँ कि हाय अभी भी ऐसी दिखती हूँ की बाहर लडके मुझे लाईन मारे । 
" वाह क्या गजब सोचती हो , सच्ची , इसे कहते है पॉजिटिव एटीट्यूट "
" करना पड़ता है , ऐसा सोचना पड़ता है , उन्हें तो मैंने मुंह तोड़ जवाब दे दिया जीवनभर याद रखेंगी मुझे , अंत में मेरी हा में हा मिला कर गई । लेकिन खुद को कैसे संतुष्ट करू खुद को कैसे बहलाऊ कि किसी ने मेरे पति के सामने मेरे चरित्र पर उँगली उठा दी और वो चुपचाप सुनता रहा । फिर अपने दिल को बहलाने के लिए ऐसा सोचना पड़ता है ।" 

December 15, 2016

आज़ादी की आड़ में अनुशासन से परहेज ------mangopeople




                                                                              मुम्बई में स्कूलों में बच्चो को मेहंदी,नेल कलर , बिंदी , टिका आदि फैशन वाली चीजे लगाना मना है । कुछ लोग बाज नहीं आते और बच्चो में मेहंदी लगा देते है नतीजा बच्चो को भुगतान पड़ता है । कुछ मम्मियां इस पर भिनभिनाती रहती है और मुझे समझ नहीं आता की किसी शादी में बच्चो ने मेहंदी न लगाया तो उससे उनके उत्साह में क्या कमी आ जायेगी ।  आम लोगो की सुरक्षा के लिए कोई नियम बनता है जाँच पड़ताल होती है तो सबसे ज्यादा आम लोग ही उस पर चिल्ल पो मचा देते है । अरे मॉल में पर्स चेक कर रहे है जैसे उसमे बम हो , जाँच से क्या होगा , कोई पर्स बम ले कर आयेगा क्या । सबको पता है की दो पहिया वाहन चलाते समय हेलमेट लगाना है , जैसे ही चेकिंग शुरू होती है लोग बोलना शुरू कर देते है , कमाई के लिए खड़े है , टारगेट मिला है , बेवजह परेशान कर रहे है, जल्दी है , जाम लगा है । यहाँ तक की शौचालय बनाने और शहर साफ करने जैसे मुद्दों के खिलाफ भी लोग बोलने लगते है । सभी को रातभर डांडिया करना है , शादियों में नाचना है तेज आवाज में संगीत बजा कर , रात १० -११ बजे सब बंद का नियम आजादी के खिलाफ है । 

                                                                            असल में तो लोगो को नियम मानने अनुशासन में रहने से परेशानी है । जैसे ही कोई नियम बनता है लोग आपत्तियां उठाना शुरू कर देते है , और कई बार इसमे सबसे आगे वो होते है जिनका उस नियम से कोई मतलब ही नहीं होता है । खबर आई सरकार ने कुछ पॉर्न साईट पर बैन लगा दिया , लो जी सभी को कुछ भी देखने की आजादी याद आ गई उसका विरोध ऐसा शुरू हुआ जैसे की पढाई करने पर रोक लगा दी गई है । विरोध करने वाले से पूछा भाई दिन में कितनी बार पॉर्न देखते है , नहीं नहीं हम नहीं देखते है ये सब , जब नहीं देखते है तो विरोध क्यों कर रहे है , जो देखते है उनकी तो आजादी के खिलाफ है ना । हे प्रभु जिस चीज को लोग देखते है किन्तु उसको स्वीकार करने को तैयार नहीं है , हिम्मत नहीं है उस पर किसी भी तरह का बैन इन्हें स्वीकार नहीं , जबकि उन्हें ये भी नहीं पता की सारे पॉर्न साईट पर बैन नहीं हुआ था , सिर्फ उन पर हुआ था जिन पर बच्चो के पॉर्न वीडियो थे , वो भी कोर्ट के कहने पर , वरना ये सारे मुद्दे तो हमारी सरकारों के लिस्ट में कही आती ही नहीं ।

                                                                       आजादी के नाम पर असल में हम अनुशासित होने से डरते है , आजादी का मतलब हमारे लिए ये है कि हम जो चाहे करे और हमें कोई न रोके , लेकिन जैसे ही किसी और की घूमती छड़ी हमारे नाक पर लगती है हमें सारे नियम कानून अनुशासन याद आ जाता है इस देश में तो कोई नियम कानून ही नहीं है , कोई देखने वाला ही नहीं है , किसी को पड़ी ही नहीं है । अब राष्ट्रगान का मामला ले लीजिये , कोर्ट ने जैसे ही सिनेमा में राष्ट्रगान बजने की बात की सबसे पहले याद आये विकलांग , वो कैसे खड़े होंगे , बेचारे विकलांग । सामान्य स्कुल में पढने , रोजगार के समान अवसर , सार्वजनिक इमारतों को विकलांगो के लायक बनाने जैसे अपने अधिकारों के लिए वो कितना लड़े आंदोलन किया कोई उनके साथ न आया , आज सिनेमा हॉल में ५२ सेकेण्ड वो कैसे खड़े रहेंगे इसके लिए अचानक सभी को उनकी याद आ गई । कोई बीमार हुआ तो वो कैसे खड़ा रहेगा , वो बेचारा बीमार तीन घंटे बैठ कर फिल्म देख सकता है बस , हमारी देखने की सुनने की आजादी का क्या हमें नहीं सुनना है तो मत जाइये सिनेमा हॉल , कोई जबरजस्ती नहीं है । किसी भी संस्थान, जगह स्कुल कॉलेज का जो नियम है उसके तहत ही आप वहां रहा सकते है तो रहिये वरना मना कर दीजिये । हम अपने बच्चो को मदरसों, गुरुकुलो में नहीं भेजते , हमें नहीं पसंद वहां ही शिक्षा व्यवस्था , आप भी मत जाइये जहाँ के नियम कानून आप को पसंद नहीं ।

                                                                               

December 06, 2016

खेल खेल में -------mangopeople




                                                                     करीब चार महीने पहले बेटी का चुनाव इंटर स्कूल खेल प्रतियोगिता के लिए हुआ । स्कूल में तो वो मैडल जीतती रहती थी ये पहली बार स्कूल से बाहर जा रही थी । हम भी खुशी ख़ुशी वह पहुंचे वहा का नजारा कुछ देर देखने के बाद लगा जैसे ओलंपिक में आ गये है । कुछ बच्चे से जिनके अपने नीजि प्रशिक्षक थे , पैरो में महंगे स्पोर्ट शूज जो खेल के लिए बने थे , कपडे भी खेल के लिए बने खास ,वो महंगे स्कूलों से थे । कुछ क्लब के लोग ग्रुप में थे सभी के एक जैसे कपडे , कपड़ो पर क्लब का नाम , खेल के तमाम इंस्टूमेंट भी उनके पास थे । लगा जैसे वो यूरोप , अमेरिका की टीमें , बिलकुल प्रेक्टिस करते दिख रहे थे की खिलाडी है उनके सामने हमारी ये भारतीय टीम कहा टिकेगी । हमारे ५ बच्चो ने स्कूल पीटी ड्रेस पहन रखी थी कॉटन के सफ़ेद पैंट और शर्ट और पैरो में सफेद पीटी वाले जुते । माथा ठोक लिया सारे हालात को देख और सोच कर , खुद हमें एक दिन पहले पता चला की हमारे बच्चे किस किस प्रतियोगिता में थे , ५० और २०० मीटर की रेस के लिए उनका प्रशिक्षण था जाओ मैदान के २० चक्कर लगा लो । मैंने बच्चो से सवाल किया क्या कभी तुम्हारी खेल टीचर ने तुम्हारे रेस का टाइम आदि देखा एक दूसरे से रेस करवाई , जवाब था नहीं । लगा २० चक्कर लगाव के टीचर क्या मैराथन की तैयारी करवा रही थी और २०० मीटर में मेरी बेटी को ले लिया वो हमेसा ५० और १०० में स्कूल में भाग लेती है ।

                                                                 वैसे हमारी भारतीय टीम अकेली नहीं थी कुछ और एशियाई और अफ़्रीकी टाइप टीम भी थी , पर इन सब में एक टीम चाइना भी थी जो कम संसाधन के बाद भी अच्छे प्रशिक्षण के कारण कई प्रतियोगिता जीती कोई बहुत छोटा स्कूल था । हम भी अपने बच्चो के अपने लेबल पर तैयारी करवा सकते थे किन्तु हमें तो जानकारी तक नहीं थी । ५० से ६० बच्चो के बीच हमारे बच्चे दो के सेमीफाइनल और रीले रेस के फ़ाइनल में पहुंची किन्तु मैडल नहीं जीती । बच्चे बहुत उदास हुए और एक तो रोने ही लगी जो सबसे धीमी थी और उसके चयन पर भी आश्चर्य हो रहा था ,हमने उन्हें सांत्वना दे काम चलाया । अब कुछ दिन पहले फिर से एक दो दिन पहले हमें खबर कर दिया गया , नतीजा वही निकाला इस बार तो ७० से ८० बच्चे थे किन्तु हमारे बच्चे उदास नहीं थे , वो दूसरी बार में ही हार के आदि हो गये और वह ४ दिन की पिकनिक मना कर चले आये । इस बार हम सब ने तय कर लिया की स्कुल में इस बात की शिकायत की जाएगी की बच्चो का स्तर दूसरे स्कूलो से प्रतियोगिता के लायक हो तभी उन्हें भेज जाये केवल हार का अनुभव लेने और उसकी आदत पड़ने के लिए न भेजे । जितने की संभावना होने पर ही लोग और मेहनत करते है किन्तु जहाँ जितने की उम्मीद ही न हो तो जरुरी मेहनत भी नहीं की जाती ।

                                                                 लगा ऐसे ही हमारी भारतीय टीम भी जाती होगी बड़े खेल प्रतियोगिताओ में , न ढंग का प्रशिक्षण , न संसाधन , न ढंग के खिलाड़ियों का चयन और न जितने का जज्बा । ये ठीक है प्रतियोगिता में भाग लेने से आप का अनुभव बढ़ता है और हर कोई जीत नहीं सकता किन्तु वहा से आने के बाद उनके खेल का आंकलन होता है ,क्या ये देखा जाता है की उनका प्रदर्शन पिछली बार से बेहतर हुआ है तब उन्हें आगे भेजा जाये । यहाँ होती है राजनीति और अब तो साजिस कर खिलाडी को फंसा कर प्रतियोगिता से बहार करने का भी प्रयास होने लगे । जब पहले स्तर पर बच्चो की प्रतियोगिताओ का ये हाल है की जितने और हारने वालो में एक बड़ा अंतर है तो वो जितने वालो को बड़ी चुनौती नहीं देता है और न जितने वाले का स्तर बढ़ता है । फिर ये भी देखा की जो आयोजक ये प्रतियोगिता करा रहे थे उनको जीतने वालो या कुछ प्रतिभावान बच्चो से कोई मतलब नहीं था , उनको आगे बढ़ाने या अच्छा प्रशिक्षण देने में उनकी कोई रूचि नहीं थी , जो होना था वो अपने स्तर पर होना था । जो इस लायक है वो अपने बच्चो को खेलो में ज्यादातर भेजते नहीं और जिन्हें भेजना है उनके पास संसाधन नहीं ।

November 30, 2016

सोशल मिडिया - लब खोल कुछ बोल ---------mangopeople



                                                                संभवतः मैं नौंवी में रही होंगी जब राजनीति पर अपनी राय रखना शुरू किया था , सामने पापा होते थे ज्यादातर , जब बात क्रिकेट की हो तो छोटका दादा और स्कूल के मुश्किल से एक या दो मित्र , खाना और सामजिक मुद्दों पर ज्यादातर मम्मी , महिलाओं पर तो कॉलेज के बाद कोई मिला जिस पर बात कर सकती थी और न जाने उस ज़माने में कितने ही मुद्दों पर बोलने की इच्छा होती थी किन्तु ज्यादातर उसके लायक लोग ही नहीं मिलते थे बात करने के लिए । फिर कई बार अपनी बात खुल कर कहने में शर्म आती कई बार सामने वाले के विचारो पर सवाल नहीं उठा सकते थे , कभी बड़े बुजुर्ग , तो कभी कही उसको बुरा न लग जाये , कही सामने वाला नाराज न हो जाये , मेरी बातो का गलत मतलब न निकाल ले , पता नहीं वो मेरे बारे में ये सुन कर क्या सोचे , कही हमारा रिश्ता न ख़राब हो जाये आदि इत्यादि न जाने कितने ही कारण थे की मुंह खोलने और बोलने से पहले सौ बार सोचना पड़ता था , न जाने कितनी बाते दिल ही दिल में रह गई । कोई भाई , दोस्त,मामा, चाचा , माँ , मौसी , गुरु शिष्य न जाने कितनो के लिहाज ने मुंह पर ताला लगा दिया । कोफ़्त होती थी टीवी आदि में उन बड़के बड़के लोगो को देख कर जिनसे पत्रकार माईक घुस घुसा पूछा करते की इस विषय में आप की क्या राय है । उफ्फ हमारे पास भी तो कितना कुछ है कहने को कोई नहीं आता जिससे सूना सके बतिया सके ।

                                                जमाना बदला तकनीक ने हमें सोशल मिडिया दिया , दिल ने कहा वाह वाह वाह ! क्या बात है किसी माईक की जरुरत नहीं किसी प्रत्रकार की जरुरत नहीं किसी का शर्म लिहाज , किसी का सम्मान आड़े नहीं , छोटे बड़े सभी की दीवारे गिरी , विषयो का तो अंबार ही लग गया , रोज नई बाते रोज नये विषय , कुछ अपनी कहो कुछ दुसरो की सूनो , विचारो के आदान प्रदान के लिए अथाह समंदर मिला , कोई समर्थक कोई विरोधी मिला , समर्थको से अपना पक्ष मजबूत हुआ तो विरोधियो ने दूसरे पक्ष को और सही से देखने में मदद की । सोशल मिडिया ने हर एक आम को आवाज दी और उनके विचारो को एक औकात दी , मुंह में जुबान दी , गुगो को भी बोलना सीखा दिया । मन को ताकत दी , विरोध की ताकत दी , गलत को गलत कहने की ताकत दी , इस ताकत ने दुनिया को बदलना शुरू किया , क्रांतियों का रूप बदल दिया , लोगो के सोचने के तरीको को बदल दिया । वाह वाह वाह !

                                              पर मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और हम भारतीय तो सबसे ज्यादा , सो हमने इस काल्पनिक दुनिया में भी अपना समाज बनाया , कोई दोस्त बना तो कोई हमदर्द , कोई मामा - काका , चाचा - ताऊ , माँ - मौसी , गुरु शिष्य , दीदी भैया सब बने , जो समाज पीछे छोड़ आये उस समाज को भी यहाँ बसा लिया , कितनी ही बार तो विश्वास न हुआ कि ये दुनिया उस दुनिया से अलग है , सब एकाकार हो गया । फिर शुरू हुआ उस समाज की तकलीफे इस समाज में , कोई बुरा मान गया कोई नाराज हो गया , कोई विचारो की सहमति न होने से झगड़ पड़ा तो दूसरे ने उस झगड़े तो दिल से लिया और अपराधबोध में जीने लगा , बड़े बुजुर्गो का , बड़े छोटे लिखको का लिहाज होने लगा , कही भाषा से नियंत्रण छूटा तो कही किसी ने अपने बातो में ही नियंत्रण ला दिया । हम घूम फिर कर वही पहुँच गये जिसे छोड़ कर यहाँ आये थे , जुबानो पर फिर ताले लगने लगे ।
                                        
                                          शुक्र है कि जो तीसरे पैर में कहा वो मैंने कभी नहीं किया , अच्छे खासे प्लेटफार्म का सत्यानाश नहीं किया , इस दुनियां को उस दुनियां से सदा अलग रखा , उसकी मुसीबते सदा यहाँ से दूर रखा , दिमाग वाले इस दुनियां को बेवजह दिल से नहीं लिया । इसलिए अपनी जुबा आज भी आज़ाद है , दुसरो के नियंत्रण से आज़ाद है , अपने नियंत्रण में लेने वाले कुछ शातिर दिमागों से आजाद है । मेरी सोच , मेरे विचार , मेरा दिमाग आज भी मेरे अपने है । मुझे आज भी अपने विचार लिखते समय किसी और का विचार नहीं करना पड़ता , और आप को ?



October 15, 2016

आओ नास्तिको सोहर गाये नये धर्म का जन्म होने वाला है - - - - - - mangopeople

आओ नास्तिको सब मिल सोहर गाये अपने देश में एक नये धर्म का जन्म होने वाला है ।

                                                         अभी तक देश दुनिया के नास्तिक अनाथ टाइप के थे बिखरे थे अब उन सभी को एक करने का प्रयास शुरू हो गये है ताकि वो भी अपनी शक्ति और नास्तिकता के प्रति अपनी भक्ति दिखा सके । बिन शक्ति सब सून ॥ इसलिए सभी को इकठ्ठा कर उसे शक्ति के रूप में दिखाना जरुरी है , एक दूसरे के तर्क सून अपनी अपनी भक्ति को बढ़ाना है । कुछ दिन बाद नास्तिकता भी अपने आप में धर्म होगा जैसे अब तक लोग कहते आये की मैं हिन्दू मुस्लिम आदि इत्यादि हु उसी प्रकार धर्म के कालम में नास्तिक भरेंगे । अन्य धर्मो की तरह नास्तिकता का भी प्रचार प्रसार किया जायेगा ज्यादा से ज्यादा लोगो को इस महान धर्म से अवगत करा कर उन्हें शांति के पथ पर बढ़ाया जायेगा ।
                                                  फिर उनकी बढती संख्या देख उन्हें संभालने के लिए नियम कायदों की एक किताब बनेगी जिसे बाद में नास्तिको का धर्म ग्रन्थ मान लिया जायेगा । जिसमे बताया जायेगा की एक नास्तिक को कैसे रहना सहना चाहिए , कैसे खाना पीना चाहिए और कैसे पकड़े पहनने चाहिए । स्त्रियों के लिए वहाँ भी अलग से सबका वर्णन होगा , स्त्रियां ज्यादा खुश न हो यहाँ भी उनका दर्जा दोयम ही होगा ।
                                                           इन ग्रंथो को लिखने वाले महान तर्कवादियों को उच्च दर्जा मिलेगा वो ब्राह्मण समान होंगे और उसे पालन कराने वाले क्षत्रिय , उसका अर्थ से प्रचार प्रसार करने वाले वैश्य और हम जैसे नास्तिक जो दुसरो की आस्था पर बे मतलब के सवाल न उठाते हो वो शुद्रो के समान हिकारत की नजरो से देखे जायेंगे और उन्हें धर्म भ्रष्ट करने वालो में रखा जायेगा । नास्तिकता पर बड़े बड़े तर्क देने वाले भाषण बाजो को बाबा माना जायेगा वो हमें बताएँगे की दूसरे धर्मो में क्या क्या खामिया है और अपना धर्म कितना महान। बहुसंख्यक धर्म की बुराई बताने वाला अच्छा और सभी धर्म में सामान रूप से बुराई देखेने वालो को सेक्युलर नास्तिक होने ही गाली दी जायेगी । पुरे साल दुसरो के भगवान के अस्तित्व को नकारा जायेगा और तीज त्यौहारो पर उनके भगवान की बुराइयो को गिनाया जायेगा ।
                                                                फिर इतिहास को खंगाल महान नास्तिको को निकाल उन्हें पूजा जायेगा उनसे मन्नते मांगी जाएगी और उन्हें पूरा होने पर उन्हें उनका चमत्कार घोषित कर उन्हें नास्तिको का भगवान बनाया जायेगा । वामपंथियो और गैर वामपंथी नास्तिको में इस बात पर तर्क होगा की वामपंथियो को ही नास्तिक होने के कारण अपना राजनितिक दल घोषित कर दे या अपना नया राजनीतिक दल बना अपने लोगो को सत्ता तक पहुंचाया जाये । बिन सत्ता शक्ति सून ॥
नास्तिको का अपना धर्म होगा अपनी धार्मिक किताब होंगे अपने भगवान होंगे और उन्हें पूजने के अपने कर्मकांड । एक दिन ये सब बहुत बढ़ जायेगा , धर्म और राजनीति का घालमेल हो जायेगा , दोनों जगह सत्ता का संघर्ष चरम पर होगा , फिर एक दूसरा सुधारक निकलेगा और बतायेगा सब गलत हो रहा है , यहाँ आडम्बर बहुत बढ़ गए है हम दूसरा पंथ बनाएंगे । नास्तिक धर्म के दो पंथ हो जायेंगे आस्तिक नास्तिक और दूसरे उसमे से बाहर आये नास्तिक नास्तिक ।
                                                                 अभी ये जन्म न हो सका क्योकि कल तक जो बहुसंख्यक कुछ अल्पसंख्यको को तलाक विवाह आदि पर देश के संविधान कानून को सर्वोपरी रख सभी के लिए समान कानून और कानून का सम्मान करने की सिख दे रहे थे वो आज खुद कानून हाथ में ले हाजिर थे इस जन्म को रोकने अपना झंडा विथ डंडा लिए ।

October 07, 2016

भंवरे ने खिलाया फूल , फूल को दे रहे खाद पानी राजकुँवर - - - - - mangopeople


                                                           जिस दिन सर्जिकल स्ट्राइक हुई उसके दूसरे दिन रविस ने अपने प्राइम टाइम में बताया की कैसे सरकार की तरफ से इस मामले में सब आज चुप है और सामान्य तरीके से काम कर रहे है जैसे कुछ हुआ ही नहीं है । सन्देश साफ था की इस मामले को ज्यादा तूल नहीं देना है । हा छूट भैये नेता और भक्तगड़ जरूर लगे हुए थे , सीन फुलाने नापने और स्तुति गान में किन्तु ये कितने दिन चलता बहुत हुआ तो हफ्ते दस दिन फिर कोई नया मुद्दा मिल जाता और सर्जिकल स्ट्राइक सिर्फ चुटकुलों में बचा रहता । किन्तु हमारे यहाँ लोग कुल्लहाणी को पैर पर नहीं मारते पैर ही कुल्लहाणी पर दे मारते है , जो मुद्दा अपने आप ही समाप्त हो जाने वाला था उस पर नकारात्मक बयानबाजी करके उसे खाद पानी दे जीवित रखने का काम किया , पहले अरविन्द और अब राहुलगांधी ने ।

                                                              मोदी ने हमेसा एक रणनीति पर काम किया है कि लोगो को अपने दिए मुद्दे में उलझा कर रखो ताकि लोग उसी पर बात करते रहे और वो अपने मुद्दे उठाना तो दूर उसे याद भी न रख पाये । कई बार लोग उनकी रणनीति में फंसे है किन्तु इस बार तो लोग खुद ब खुद उनके जाल में घुस रहे है वो भी जबरजस्ती । इतनी लंबी किसान यात्रा करके आये राहुल किसानों पर बोल अपने मुद्दे उठाने की जगह सर्जिकल स्ट्राइक पर बेतुका बयान दे बैठे , किसने सलाह दी थी, दिग्विजय सिंह ने क्या उसके पहले पीके से पूछा था जिन्होंने उनके इस किसान रैली की सारी रणनीति बनाई थी ,( बेचारे पीके को भगवान ये सब सहने की शक्ति दे, उसका अपना कैरियर दांव पर है ) होना ये चाहिए था कि , जय जवान जय किसान का नारा लगाते हुए कहना चाहिए था की जवानों का बदला ले लिया अब किसानों की बात की जाये , अपने मुद्दों का केंद्र में लाना था पर किया उसका उलटा अपना मुद्दा पीछे छोड़ वो मोदी पोलिटिकली ज्यादा फायदा न उठा ले इस चक्कर में पड उनके मुद्दों में उलझ पड़े । प्यास क्या चाहे दो घुट पानी लीजिये अब मोदी और उनके भक्तो को और मौका मिल गया इस सारे मामले को और लंबा खीचने और इस पर चर्चा करने का ।

                                                            किसी सैनिक कार्यवाही पर वोट नहीं पडते ये बात शायद इन नेताओ को समझ नहीं आती । याद कीजिये ७१ का युद्ध जितने के कुछ साल बाद भी इंदिरा गाँधी को देश में आपातकाल लगने की नौबत आ गई , अटल जी के साथ बुद्धा मुस्कराने और कारगिल के बाद भी क्या हुआ पता है सभी को । यू पी के किसी गांव में जब आप कहेंगे की हमें किसी की जमीन नहीं हड़पनी तो वो बोलेंगे की आप मत हड़पो किन्तु यहाँ दबंगो की पूरी फ़ौज है जो हमारी जमीने हड़प रहा है उसकी बात करो , गोवा वाला बोलेगा ये क्या युद्ध का मौहाल बना दिया सारे पर्यटक ही गायब हो गए , और तमिलनाडु कर्नाटक वालो बोलेंगे कौन सा सिंधु जल यहाँ हम अपने कावेरी में उलझे है उसकी बात करो । आज भी भारत में आतंकवाद और पाकिस्तान जैसे मुद्दे बड़े और कुछ छोटे शहरो के उन लोगो तक ही सीमित है जो टीवी अख़बार और सोशल मिडिया से जुड़े है , उसके बाहर के ज्यादातर भारतीयों के लिए ये कोई मुद्दा ही नहीं है और न जाने किस अदृश्य राजनीतिक फायदे के लिए हमारे महान नेतागड़ इस मामले को लंबा और लंबा खीचते जा रहे है ।


                                                            मोदी को इतना बड़ा बनाने में उनके काम से ज्यादा फायदा उनके खिलाफ जगह जगह नकारात्मक बोलने और लिखे जाने से हुआ है , ये पहले भी हुआ है और अब फिर से होने जा रहा है । ये नकारात्मकता सकरात्मक और सही सवालो को दबा देती है , वो जवाबो से बच जाते है और पीड़ित से नजर आते है । जिससे उनके वोटो का ध्रुवीकरण आसानी से होता है । धन्यवाद मोदी की तरफ से राहुल , कांग्रेस और अरविन्द को ।

October 05, 2016

अ सर्जिकल स्ट्राइक टोल्ड बट अनवॉच स्टोरी


 रिक्रिएट :- कई बार पुलिस सबूतों के लिए या घटना की सभी कड़ी को ठीक से जोड़ने के लिए घटना ,एनकाउंटर, अपराध आदि को फिर से वैसे ही दुबारा उसी घटना स्थल पर फिर से करती है जैसे वास्तव में हुआ था ।
मेडिकल टूरिजम :- घूमने फिरने के लिए यात्री हमारे देश आते रहते है किन्तु करीब एक दसक से ज्यादा भारत में लोग अपना ईलाज करने भी भारत आते रहे है ।
                                       जिन जिन लोगो को सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत चाहिए सेना को उन सभी को सीमा पर ले जा कर और सीमा के उस पर भेज कर वापस से उन सभी चीजो को वैसे ही रिक्रिएट करके सबूत दे देने चाहिए । जिन्होंने लोगो को खूब स्टिंग करने का प्रवचन दिया है वो अपने साथ अपना स्टिंग कैमरा भी ले जा सकते है , और और पाकिस्तान क्या दुनिया को सबूत दिखा कर जितना चाहे पोलिटिकल माइलेज ले सकते है ।


                                     हमने देर कर दी किन्तु पाकिस्तान ने सर्जिकल स्ट्राइक टूरिजम शुरू भी कर दिया और देश विदेश के पत्रकारों को टूर भी करा दिया , जबकि सारा काम किया हमने था । किन्तु अभी भी देर नहीं हुई है , हम भी वहा जा कर अपनी आँखों से सब कुछ देखने की इच्छा रखने वालो के लिए ये एक एडवेंचर टूर शुरू कर सकते है और वहाँ की सैर करा सकते है खासकर आतंकी कैम्पो की और उनकी ट्रेनिग की और टी एस दराल जी के अनुसार कुछ दिन "पाकिस्तानी और आतंकी हॉस्पिटेलिटी " का आन्नद लेने का मौका दे सकते है । चाहे तो पूरा पैकेज दे सकते है पहले आने वालो को अगली बार किसी सर्जिकल स्ट्राइक या एनकाउंटर मुठभेड़ में उन्हें साथ ले जाया जायेगा , ताकि वो सब कुछ न केवल लाइफ देख सके बल्कि उसमे साथ में सहयोग भी कर सकते है ।

                                                   किसी फिल्म डायरेक्टर को कम्प्लेमेंट्री टूर दे सकते है जिससे वो बाद में एक फिल्म बना सके "अ सर्जिकल स्ट्राइक टोल्ड बट अनवॉच स्टोरी " ताकि बाकि लोग जो वहाँ न जा सके क्योकि वो सबूत मांगने वालो जैसे महान बहादुर न थे और वहाँ जा कर कुछ देखने की हिम्मत नहीं कर सके , वो उसके नाटकीय रूप को देख खुश हो सके ।

October 01, 2016

भारत और पाकिस्तानी सर्जिकल स्ट्राइक





                                           भारत की सर्जिकल स्ट्राइक तो सफल हो गई किन्तु भारतीय  सीमा से लोगो को क्यों हटाया जा रहा है समझ से परे है । हम सभी को पता है की पाकिस्तान प्रत्यक्ष  युद्ध की जगह अप्रत्यक्ष युद्ध भारत से करता रहा है , फिर ये क्यों समझा जा रहा है कि वो सीमा पर कुछ करेगा । ये हमला भारत का पाकिस्तान पर नहीं था , बल्कि भारतीय सेना और ख़ुफ़िया एजेंसियों का पाकिस्तानी सेना और पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी और आतंकवादियो पर था ।  अब ये उनके अस्तित्व की बात है , तो उनका रिएक्शन सीमा पर नहीं होने वाला , आम लोगो के बीच होगा , और किसी भी रूप में हो सकता है | हम भारतीय पहले से ही किसी भी तरीके के पाकिस्तानी सर्जिकल स्ट्राइक को सफल बनाने के लिए बिलकुल तैयार है । हम अभी से इस बात पर झगड़ रहे है कि किसको किस तरह समर्थन देना चाहिए और किस तरह के बयान देना चाहिए , लोगो की गिनती धर्म के हिसाब से शुरू हो गई है । हम सामने से बता रहे है जी लो  ये देखो ये रहा हमारा लांच पैड हम यहाँ इकठ्ठा है , बस एक अफवाह , एक फर्जी वीडियो , कुछ नहीं तो गाय,  सूअर ,  कुछ भी दागो हम दंगे कर तुम्हारे सर्जिकल स्ट्राइक को कामयाब करने के लिए तैयार है । तुम्हे अपने कमांडो यहाँ भेज कर उनकी जान जोखिम में डालने की कोई जरुरत नहीं है , तुम्हे बस हमारे अपने सबसे जरुरी मसलो झगड़ो के आगे एक दिया सलाई और कही कही तो बस पंखा रखने की जरुरत है , हम खुद आपस में मर कट लेंगे  । कोई बम ब्लास्ट की भी जरुरत नहीं है उसमे भी तुम्हारे लोगों के पकड़े जाने का डर है ।  बस एक पहले से मरी गाय भी रख दोगे, या कोई सूअर मरा हुआ , तो काफी है , । देखो ताको किसी ने बूढी होने पर ऐसे ही सड़क पर छोड़ दी होगी , या खरीद लो दूध न देने वाली गाय को लोग आराम से पिंड छुटाने के लिए किसी को भी बेंच देते है , और सूअर कहा फेकना है तुम्हे पता है । वो न मिले तो बोलो दूसरे धर्म की लड़की छेड़ दो , अपने धर्म का तेजाब डाल दे , जीना मुहाल कर दे लड़की का, चलता है ,कोई नहीं आता बचाने साथ देने, पर दूसरी धर्म वाला करे तो सब अपने धरम वाले मिल जाते है कुछ भी करने के लिए । आओ जल्दी आओ मौका है नवरात्र में चूक गये तो मुहर्रम पर मत चूकना , हमें पता है तुमने तो रमजान की भी कदर नहीं की , मुहर्रम की क्या करोगे । उसके बाद चुनाव भी तो है सभी को अपना खास वोट भी तो पक्का करना है साथ देने के लिए तुम्हारा यहाँ बहुत लोग है उसकी चिंता चिंता न करो  हमने तो खूब मजे लिए  इस मौके के इतने दिनों बाद तुम्हे ठीक से मजा चखाया है ,  पर अफसोस की पाकिस्तान के  लोगो को ये मजा न मिल पायेगा , क्योकि तुम अपने लोगो को बता न पाओगे सीना ठोक कर की हर बार की तरह इस बार भी तुम्हारी सर्जिकल स्ट्राइक सफल रही ।  

September 27, 2016

आम नेता की किस्मे





रिपोर्टर :-  आज हम आप को मिलवाते है एक ऐसे व्यक्ति से जो आमो की नई नई किस्मे  बनाने के लिए मशहूर है , आज उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के नाम का एक नये किस्म को बनाया है । हा जी तो बताइये इस आम का स्वाद कैसा है । 
आम विशेषज्ञ :- यह एक बहुत खास तरह का आम है , इस आम की रंगत को देखिये वही आप को सबसे खास दिखेगी ये दो रंगों में रंग हुआ है ऊपर का हिस्सा आप को हरा दिखेगा और निचे का आप देख सकते है ये पिला है और इसकी खुशबू का तो कहना ही क्या, पका हुआ क्या कच्चा भी होगा तो दूर तक इसकी खुशबू जाएगी -------
रिपोर्टर बीच में टोकते हुए :- जी अच्छी बात है इस आम का स्वाद कैसा है । 
आम विशेषज्ञ :- जी हा जी है वही बता रहा हु अब जरा इस आम के आकार को देखिये , लंगड़े की तरह नोकीला दशहरी की तरह लंबा -----
रिपोर्टर :- जी जी ठीक है ठीक है  इसका स्वाद -----
आम विशेषज्ञ :- और आप को एक सबसे खास बात बताऊ की इसका छिलका देखिये इतना पतला और अंदर बिना रेशे वाला गुदा , मतलब आदमी देखते ही खरीदने के लिए आतुर हो जायेगा । 
रिपोर्टर:- जी देखिये हमारे पास समय कम है तो ये बताइये इसका स्वाद कैसा है । 
आम विशेषज्ञ :-  जी वो को कोई खास नहीं है । 
 रिपोर्टर:- क्या मतलब । 
 आम विशेषज्ञ :- अब आप को क्या लगा इसका नाम मोदी क्यों रखा है । 
 हडबडाया रिपोर्टर:-जी जी समझ गया तो आप ने देखा लिया मोदी आम अब दर्शको से विदा ले.---------  एक मिनट ठहरिये । मैं दर्शको को दिखाना चाहता हूँ एक बहुत है खास आम मुझे यहा मेज पर रखा दिख रहा है । रिपोर्टर आम विशेषज्ञ को किनारे हटाते हुए आगे बढ़ जाता है । ये देखिये ये एक खास आम यहाँ रखा है इसकी खुशबू ही इतने तेज है की मैं तो खीचा चला आया इसके पास इसकी रंगत तो देखिये हल्का पीलापन लिए कितना सुन्दर आम है तो मैंने आज तक नहीं देखा , बिलकुल लाजवाब आम दिख रहा है ये , मैं  कहता हु की ये आम बाजार में आया तो तहलका मच जायेगा ।  ये कहते हुए उसने आम को हाथ में उठा लिया । 
तभी आम विशेषज्ञ लपक कर उससे आम लेकर मेज पर रख देता है । 
रिपोर्टर :- इस खास आम को आप ने कहा छुपा रखा था और इसको आप ने क्या नाम दिया है । 
आम विशेषज्ञ :- जी ये ऐसा ही आम मैंने बनाया है की मिडिया वाले और लोग देखते है खुद बा खुद इसकी तारीफ करने लग जायेंगे । ये उन लोगो के लिए है जो दुनिया को दिखाना चाहते है की उनके घर में भी अच्छी किस्म का आम है , इसे मैंने राहुल नाम दिया है । 
रिपोर्टर :- लेकिन एक बात बताइये जब मैंने इसे उठाया तो ये काफी हल्का था । ये इतना हल्का क्यों है । 
आम विषयज्ञ :- क्योकि ये सिर्फ दिखाने के लिए है खाने के लिए नहीं , ये प्लास्टिक का है , इसे मैंने रंग कर आम की खुशबू का सेंट डाला है । 
सकपकाया सा रिपोर्टर बात संभालने की कोशिश करने लगा । अच्छा ये बताइये आप ने देश के बड़े बड़े नेताओ के नाम कर आम की किस्मे ईजाद की है , एक और नेता आज कल देश में बहुत प्रसिद्द है । केजरीवाल जी उनके नाम का कोई आम ईजाद नहीं किया है , क्या बाद में करेंगे । 
आम विशेषज्ञ ने मुंह बिचकाते हुए कहा भाई साहब मैं आम की किस्मे बनाता हु "रायते" का नहीं ;)  



नोट :- तकनीकि  समस्या के कारण किसी और के ब्लॉग और स्वयं के ब्लॉग पर भी टिपण्णी नहीं कर पा रही हूँ । इन दो सालो में तकनीक में कुछ फेर बदल हुआ है , क्या गूगल प्लस आदि पर भी अकाउंट बनाना होगा । 

September 23, 2016

स्मार्ट फोन से ज्यादा स्मार्ट




                                                         लोगो को इतना तो स्मार्ट होना ही चाहिए  जितना की उनका फोन है , किन्तु ऐसा होता नहीं है । कल दो बच्चो ने मुम्बई के पास संदिग्ध लोगो को देखने की सूचना क्या दी , स्मार्ट फोन का सही प्रयोग करना सभी ने शुरू कर दिया । बच्चो ने स्कुल का नाम भी लिया था , नतीजा आधी रात तक सभी स्कुल के व्हाट्सएप्प के ग्रुप में यही चर्चा चलती रही की फला फला स्कुल ने बंद डिक्लेयर कर दिया है , मुम्बई हाई अलर्ट पर है अपने स्कुल का क्या ।  लाख समझाने के बाद भी की कुछ नहीं हुआ है फिर भी किसी को शंका हो तो सुबह स्कुल में फोन कर पता कर ले , हर नई माँ स्कुल बंद डिक्लेयर करने वाले नये स्कुलो की लिस्ट ला कर वही सवाल दोहरा देती थी । ये हाल लगभग पूरी मुम्बई का था और नया भी नही था । पिछले साल भी मुम्बई में एक अफवाह  फैली की एक स्कुल के बाहर से कुछ लोग बच्चे उठा कर गये , एक ही फारवर्ड खबर में कई अलग अलग स्कुलो के नाम बारी बारी लिए गए , एक स्कुल का नाम देख मेरी एक मित्र ने टोका भी कि उस स्कुल में उनका बेटा पढता है और वहाँ ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है , बल्कि वहा से भी उन्हें ये फारवर्ड न्यूज़ मिली है किन्तु उसमे स्कुल का नाम दूसरा था । हम दोनों की बहस भी हो गई लोगो से की इस तरह की अफवाह फ़ैलाना बंद करे  और कुछ भी भेजने से पहले अपना भेजा प्रयोग किया करे । हालात ये हो गये की पुलिस कमिश्नर को सामने आ कर लोगो को बताना पड़ा की ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है । लोगो के पास स्मार्ट फोन तो आ गये पर उसको प्रयोग करने की स्मार्टनेस अभी तक नहीं आई , दोनों  बार मैंने लोगों को टीवी या किसी न्यूज़ साईट पर जा कर अपनी खबर पक्की करने के लिए कहा किन्तु ज्यादातर ने इसकी जरूरत नहीं समझी , जबकि स्मार्ट फोन का सही प्रयोग यही था । 
                                     
                                                            ऐसे ही एक बार स्कुल प्रोजेक्ट  के समय कई मातापिता  एप्प पर सवाल के जवाब दुसरो मांग रहे थे , दे कोई नहीं  रहा था , घंटो से प्लीज प्लीज किये पड़े थे मेरी नजर जब उस पर पड़ी तो मैंने तुरंत कहा  यही सवाल यदि आप ने अभी तक गूगल पर किया होता तो जवाब कब का मिल गया होता , बाद में लोगो ने वही किया । नई तकनीक लोगो को स्मार्ट बनाना तो छोड़िये मुझे लग रहा है और ज्यादा मुर्ख और अन्धविश्वासी बना रहा है । हर खबर पर आँख मूंद कर भरोशा कर बड़ा ही परोपकारी भाव में उसे आगे भी भेज देने में लोग जरा भी कोताही नहीं करते । इसे ११ लोगो को भेजिये से लेकर , तुरंत इन्हें खून की जरुरत है , गरीब के बच्चे को पैसे चाहिए ईलाज के लिए लिए , या मेरे दोस्त का ये बच्चा खो गया है जैसे एक ही फारवर्ड खबर सालो तक चलती है और घूम घाम कर साल में एक बार आप के पास आ जाती है , उन लोगो की कृपा से जिन्होंने कुछ समय पहले ही स्मार्ट फोन लिया है । ये सब करने में जाति , धर्म , अमीर , गरीब , छोटे , बड़े आदि आदि का कोई फर्क नहीं होता सब बराबर शामिल है । 
                                     लोग करे भी क्या जब आज सुबह ६ बजे फोन की घंटियां भी घनघनाने लगी की स्कुल चालू है की नहीं तो लगा की एक बार टीवी ऑन की कर लेते है , पर ये क्या सुबह ६ बजे तो वहा अलग की स्यापा चल रहा था , " पाकिस्तान युद्ध को तैयार , पाकिस्तान युद्धाभ्यास कर रहा है ,  लड़ाकू विमान उड़ते रहे कल रात पाकिस्तान में, ब्रेकिंग न्यूज़ , हद है किसी का कुछ नहीं हो सकता फोन जाने दीजिये इनका तो पालतू भी इनसे स्मार्ट होगा ।




  

December 27, 2013

चाय से ज्यादा केतली गर्म - - - - - -mangopeople




                                                                                बिटिया को जब भी दूध का ग्लास पकड़ाती हूँ तो , वो चीखती है की ग्लास इतना गर्म है की पकड़ा नहीं जा रहा है , दूध कितना गर्म होगा मै  उसे कैसे पी सकती हूँ और मै  उन्हें हर बार समझाती हूँ कि ग्लास के गर्म होने से दुध के गर्म होने का अंदाजा उसे नहीं लगाना चाहिए दूध गर्म नहीं है उससे ज्यादा ग्लास गर्म है :) । यही हाल हमारी राजनीतिक पार्टियो के समर्थको का है , नेता जितना नहीं बोलते है उससे कही ज्यादा उनके समर्थक बोल पड़ते है । इधर "आप" विधायक बिन्नी केजरीवाल के घर से मीटिंग छोड़ कर बाहर आये उधर समर्थक चिल्लाना शुरू कर दिए की कल पोल खोलने वाली पार्टी कि ही पोल उनके माननीय नेता जी खोलेंगे , दूसरे दिन मामला सुलटने के बाद बेचारे नेता जी को अपने ही समर्थको की बातो का जवाब नहीं देते बन पड रहा था , केजरीवाल ने अभी शपथ भी नहीं लिया किन्तु उनके समर्थक राम राज्य लाने के सपने दिखाने लगे है , चार राज्यो के  बुरी गत करने के बाद कांग्रेस और जीत की रथ पर सवार बीजेपी भी अपनी हार जीत  को भूल आगे की राजनीति में लग गई , नए समीकरण तलाशने लग गई किन्तु समर्थक आज भी वही अटके पड़े है और सोशल मिडिया में पानी पी पी कर " आप " को गालिया दे रहे है उसे घेरने का प्रयास कर रहे है । इधर राहुल उनसे कुछ सीखने की बात करते है , अपने नेताओ को "आप" की तरह जनता से जुड़ने की नसीहत देते है ,कांग्रेस उसे समर्थन दे रही है तो उधर कुछ उसके ही खिलाफ मोर्चे ले कर निकल रहे है और गिन गिन कर उनके वादे याद  दिला उन्हें पूरा होने के लिए असम्भव बता रहे है । सही भी है जब ६६ सालो में हम नहीं कर पाये तो ये क्या करेंगे, किन्तु वो नहीं कर पाएंगे उस बात पर भी पूरा विश्वास नहीं है , डर में है कि सच में पञ्च साल में पूरा न कर दे इसलिए पञ्च साल का भी समय देने को तैयार नहीं है कहते है की सब ६ महीने में ही कर के दिखा दीजिये नहीं तो आप फेल है। बीजेपी के शीर्ष नेता कब के विवादित मुद्दो को ठन्डे बक्से में डाल कर भूल गई है किन्तु समर्थको को उसका भान भी नहीं है , मोदी कहते है देवालय से पहले शौचालय , सही बात है देवालय जैसे मुद्दो से कही ज्यादा जरुरी हर घर तक विकास शिक्षा और प्राथमिक जरुरतो को पूरा करना है , नेता जानते है कि दिल्ली की कुर्सी का रास्ता विकास की रोड से जाता है सभी को ले कर चलने से मंजिल मिलती है ,न की किसी एक समुदाय को लेकर बोलने से ,आखिर वो इतने शीर्ष पर अपनी उसी काबलियत और बुद्धि से पहुंचे है  कि  कब क्या बोलना है और कब किन मुद्दो को गायब कर देना है ,  वो तो जम्मू भी जाते है तो कश्मीरी पंडितो पर एक लाईन भी नहीं बोलते है किन्तु समर्थक ये सब समझते ही नहीं है और ऐसी ऐसी बाते बाहर बोलते है उनसे उम्मीद करते है कि बेचारे नेता की छवि लाख चाहने प्रयास करने के बाद भी नहीं बदल पाती है । नेता वही सही और सफल है जो समय के साथ बदले और जनता के इच्छानुसार मुद्दे उठाये, कहते है की काठ की हांड़ी बार बार नहीं चढ़ती है , मझा नेता बार बार एक ही संवेदनशील और भावनात्मक मुद्दो को नहीं उठाता है ।  अब देखिये जिस मनरेगा ने गरीबो की भलाई वाली स्कीम ने यु पी ए को दूसरी बार चुनाव जिताया , वही दूसरी गरीबो की स्कीम भोजन का अधिकार और कैश ट्रांसफर उसे चार राज्यो में जीत क्या सम्मान जनक सीट भी नहीं दिला सकी , उसका भ्रष्टाचार सब स्कीम पर भारी पड़ा। बीजेपी भी जानती है की उसकी हिंदूवादी छवि न कभी उसे सरकार दिला पाई है और न आगे दिला पायेगी , वो उसे सीटे तो दिला सकती है किन्तु सत्ता नहीं , सही समय पर उसने अडवाणी को किनारे किया और वाजपेयी को आगे , मोदी ने सही समय पर सिखा और अपनी छवि विकास पुरुष की बना ली । किन्तु समर्थक राजनीति की इन हकीकतो को समझते नहीं है और उसी पुराणी छवि को पकड़ कर अपने ही नेता को मुसीबतो में डालते रहते है ।

                                               सोसल मिडिया हो या अन्य जगह दिल्ली और " आप " को लेकर ऐसी ऐसी राजनीतिक चालो का वर्णन है कि समझ नहीं आ रहा है की शिकारी कौन है और शिकार कौन , लगा बीजेपी सरकार बनाएगी किन्तु उसने " आप" की नैतिकता वाली चाल चल दी और गेंद " आप" के पाले में इस उम्मीद में डाल दी कि वो तो सरकार बनाएंगे नहीं ६ महीने विधान सभा स्थगित हो जायेगी फिर लोकसभा चुनावो के बाद कांग्रेसियो की अंतरात्मा जगा कर सरकार बना ली जायेगी  , लगे हाथ कांग्रेस ने भी समर्थन इस उम्मीद में दे दिया कि वो तो लेंगी ही नहीं हम दोनों चचेरे भाई उसे भगोड़ा घोषित कर देंगे और मामला फिलहाल लोकसभा चुनावो तक टाल देंगे और सरकार न बनाने पर "आप " वालो की जम कर खबर लेंगे ताकि वो लोकसभा चुनावो में ज्यादा कुछ न कर पाये , किन्तु हाय रे हाय जो " आप " वाले एक समय फसंते दिख रहे थे उन्होंने ने तो फिर से वोटिंग करा कर सरकार बनाने की ठान ली और अपने वादो को पूरा करने की भी , लो जी अब तो कांग्रेस और बीजेपी दोंनो की ही चाल उलटी पड़ती दिखने लगी , नतीजा दोनों की ही तल्खी और बढ़ गई " आप " के प्रति , बीजेपी के तो मुंह से निवाला चला गया , और अब कांग्रेस को डर है कि पिछले १५ सालो में जो खाया है दिल्ली में वो कही बाहर न आ जाये , जो थोड़ा बाहर आया है उससे तो ये हाल है जब और आयेगा तो आगे क्या होगा । अब दोनों उम्मीद लगाये बैठे है कि उनका तारण हार दिल्ली की बाबू ब्रिगेट करेगी , एक भी फाईल आगे नहीं बढ़ने देगी एक भी काम नहीं होने देगी , किन्तु उनकी इस उम्मीद पर भी तुषारपात होता दिख रहा है , अब खबर या अफवाहे जो भी आ रही है कि बाबू ब्रिगेट तो खुद ही अपनी जान बचाने में लगी है , कोई फाईले फड़वा रहा है तो कोई ट्रांसफर ले रहा है तो कोई आफिस में ताले लगा कर काम कर रहा है । एक हंसी मुझे तब आई थी जब टीवी चैनलो में मैंने अपने जीवन में पहली बार ( शायद दुसरो ने भी ) कांग्रेस और बीजेपी को गलबहिये करते एक दूसरे की पीठ थपथपाते और एक दूसरे की हा में हां मिलाते देखा लोकपाल के मुद्दे पर वो भी खुलम खुल्ला , चोरी छुपे तो दोनों ये करती ही आई थी , दूसरी हंसी अब आ रही है इस बाबू ब्रिगेट का हाल देख कर , मुझे कमल हासन की फ़िल्म इन्डियन याद आ रही है जिसमे वृद्ध स्वतंत्रता सेनानी बने थे और रिश्वतखोरो को सजा देते है उनका डर सब में इतना हो जाता है कि उनके जाने के बाद भी दूसरे लोग उनके जैसी बेल्ट पहन कर ही लोगो को डरा देते है ।


                                                                समझ नहीं आता की अरविन्द से लोगो को इतना डर और चिढ क्यों है क्यों उनकी पार्टी बनाने से दोनों बड़ी पार्टिया इतनी खीजे हुई है , शरद पवार , राजठाकरे , देवगौड़ा , जगन मोहन , येदुरप्पा , कल्याण सिंह , उमा भारती जैसे न जाने कितने लोगो ने पार्टी तोड़ कर या नई राजनीतिक दलो को खड़ा किया , सभी ने किसी न किसी का वोट काटा और राजनीति में अपने लिए जगह बनाई या हार कर ख़त्म हो गए , उनके लिए ये तल्खी कभी भी इन दो बड़ी पार्टियो ने नहीं दिखाई जो वो आज "आप " के लिए दिखा रही है । शायद ये पहला मौका है जब उन्हें लग रहा है कि " आप " राजनीति में उनके बनाये नियमो के तहत नहीं काम कर रही है , लोकतंत्र का जो रूप उन्होंने आज तक जनता में फैला दिया था  जिसमे से लोक ही गायब है " आप " फिर से उस लोकतंत्र में लोक को सामिल करके उनका खेल बिगाड़ रही है , वो राजनीति करने के तरीके को बदल रही है , वो आम लोगो में अपने अधिकारो के प्रति जागने की जो भावना बैठा रही है वो आगे उन्हें परेशान करने वाले है , वो उनमे से ही एक नहीं है , जो सत्ता पैसे ताकत के लिए हर तरीके से समझौते कर लेती है , ये जिद्दी लोगो का वो गुट है जो सच में कुछ बदलने का ठान के आई है । इतना विश्वास तो खुद मुझे भी नहीं है "आप " पार्टी पर ,मै  मानती हूँ कि अरविन्द और उनके आस पास के कुछ लोग बदलाव के मकसद से काम कर रहे है जिसमे सत्ता का लालच नहीं है , क्योकि वो खुद एक बड़ा पद जो काफी ताकतवर होता है को छोड़ कर आये है और जमीनी रूप से काफी काम किया है कित्नु जिस बदलाव की वो बात कर रहे है वो ये काम अकेले नहीं कर सकते है , समग्र विकाश के लिए और ऐसे लोग की फौज वो कहा से लायेंगे , उनकी पार्टी में लगभग सभी नए है जिनमे से कई तो सता की ताकत को कभी महसूस ही नहीं किया है , वो उसे त्यागते हुए कैसे अपनाएंगे । इसके लिए तो भारतीयो का डी एन ए ही बदलना पडेगा जो भ्रटाचार का नमक खा खा कर उसका आदि हो गया है :)) ।

                                            राजनीति के इस बिसात में राजनीतिज्ञो और बाबू के बाद नंबर आएगा आम लोगो का जो कटिया डाल कर बिजली लेते है , मीटर में गड़बड़ी करके बिल कम करते है , ट्रैफिक रूल नहीं मानते है ,  जो पुरे कागजात न होने के बाद भी चाहते है कि कुछ ले दे कर उनका काम हो जाये , जो सरकारी दफ्तरों की लम्बी लाइनो से बचने के लिए दलालो का सहारा लेते है , जो घर बैठे ही ड्राइविंग लाइसेंस ले लेना चाहते है , जो अपने घरो में अवैध निर्माण करते है , पानी का गलत कनेक्शन लेते है आदि आदि क्या वो आम आदमी सुधरने के लिए तैयार है , कही ऐसा न हो जो आम आदमी वोट दे कर अरविन्द को उस गद्दी पर बैठाया है वही उनकी कड़ाई से उब कर खुद ही उन्हें गद्दी से उतार दे या ये हो सकता है कि आम आदमी ने पिछले ६६ वर्षो से जो गलती की है , उसे फिर से न दोहराए , इन दलो को फिर से अपने मुद्दो से भागने न दे,  जो सुधर गए है उन्हें बिगड़ने न दे , अपने नेताओ पर नजर रखे , अपने अधिकारो के प्रति सजग रहे , सिर्फ वोट डी कर पञ्च साल के लिए अपने हाथ न कटा ले , अपने नेताओ से सवाल करता रहे और लोकतंत्र से फिर से लोक को गायब होने का मौका न दे । तो लोगो से निवेदन है कि अपना दिल और दिमाग खुला रखे राजनीति को राजनीति की तरह ही ले सही को सही ओए गलत को गलत कहे ।


चलते चलते

               कुछ्महिनो पहले एक ब्लॉग पर पढा की सभी न्यूज चैनल हिन्दू विरोधी है और बीजेपी की खबर नहीं दिखाते है , मैंने भी अपनी गन्दी आदत के अनुसार वहा टिप्पणी दे दिया की भाई कोई भी तीज त्यौहार हो या ग्रह नक्षत्र की गड़बड़ी हिंदी न्यूज चैनलो तो इन्ही खबरो से भरेपड़े है , १५ अगस्त को जब आँख खुली और टीवी खोला तो एक बार तो मै कन्फ्यूज ही हूँ गई लगा की मै  कोमा से बाहर आई हूँ , मोदी जी प्रधानमत्री बन गए है और भाषण दे रहे है हर न्यूज चैनल पर  भाषण सीधा आ रहा था , वो कही रैली करे और उसका सीधा प्रसारण ये चैनल न करे से तो सम्भव ही नहीं है और कितना प्रसारण चाहते है । भाई साहब नाराज हो गए कह दिया कि मुझे हिन्दू धर्म छोड़ देना चाहिए हिन्दू होने के लायक नहीं हूँ , और तो और मै  देश द्रोही हूँ गद्दार हूँ , तब से दुखी थी की कोई मोदी समर्थक मिल जाये और मुझे राष्ट्रभक्ति का सटिफिकेट दे दे नहीं तो कम से कम हिन्दू होने का तो देदे मै  दोनों से निकल बाहर हो गई हूँ किन्तु वो मिल नहीं रहा था , कारण आज पता चला कि मै तो कामरेड हूँ ;-) अपने लिए ये सम्बोधन सुन कर अच्छा लगा गर्व सा हुआ बिटिया कई बार पूछ चुकी है कि मै बड़ी हो कर क्या बनूँगी क्या बताऊ उन्हें कि कुछ नहीं बनी बस उसकी मम्मी भर हूँ , अब कह सकती हूँ कि मै कामरेड बन गई :) वैसे हद है यार दुनिया की खबर लेने के चक्कर में मुझे ये भी नहीं पता चला की मै  कब से नारीवादी के साथ कामरेड भी बन गई । ब्लॉग जगत में आ कर बहुत सारे तत्व ज्ञान अपने बारे में पता चल रहा है , पता नहीं अब तक कैसे जी रही थी । निवेदन है की बताये की ये कामरेड किस धर्म जाति और देश का निवासी होता है , अपने बारे में इतनी तो  जानकारी हो :))))


नोट :-चलते चलते की बात अपने ऊपर यु ही किये गए टिप्पणी को हँसने हँसाने के लिए मजाक में लिखी गई है उसे कटाक्ष का गम्भीरता से न ले , ऐसा मेरी सहज बुद्धि कहती है ;-)

                                       





December 10, 2013

रणनीति या मौके की नजाकत - - - - -mangopeople



                                        शायद ये हमारे भारतीय राजनीति  का ऐतिहासिक समय  है ,जो न तो आजादी के बाद से आज तक आया है और न ही आगे के ६०० सालो तक आयगा जब दो राजनीतिक  दल कुर्सी और सत्ता खुद लेने के लिए नहीं बल्कि उसे न लेने के लिए बहस कर रहे  है , ये शायद पहला मौका है जब  राजनीतिक  दल पक्ष की  जगह विपक्ष में बैठने के लिए लड़ रहे है , शायद ये पहला मौका है जब पक्ष में कोई है ही नहीं और विपक्ष के लिए दो दो पार्टिया खड़ी है । किन्तु जिस तरह इस संसार में कुछ भी स्थाई नहीं है उसी तरह ये समय काल और व्यवहार भी स्थाई नहीं है , निश्चित रूप से इस त्याग के पीछे ६ महीने बाद होने वाला लोकसभा चुनाव है , जिसमे सभी साफ सुथरे दिखाई देना चाहते है ,साथ में एक  डर और भी है , भले सीडी और स्टिंग के किंग जेल में है किन्तु उनके अर्जुन एकलव्य जैसे शिष्य बाहर है क्या पता सामने वाला बिकने की  जगह   सीडी बना रहा है , आखिर अभी लोकसभा चुनाव भी तो जीतने  है , जहा कांग्रेस को बी जे पी के खिलाफ कुछ ऐसे ही सबुत चाहिए जैसे एक बार उनके पास छत्तीसगड़ में अजित जोगी के खिलाफ था , और "आप" को भी बीजेपी के लिए वैसे ही अभियान चला कर जितना है जैसा उन्होंने कांग्रेस के खिलाफ जीता है , भ्रष्टाचार के आरोप लगा कर । सो बीजेपी भी फूंक फूंक कर कदम रख रही है और एक राज्य में सरकार बनाने ,जो अंततः उसकी ही होने वाली है ,के  लिए वो अपने उस खेल में पानी नहीं फेरना चाहती है जो वो देश में सरकार बनाने के लिए खले रही है । ये बात " आप " भी जानती है सो वो भी चुचाप तमाशा देख रही है और अति उत्साहित मिडिया की जमात  की तरह व्यवहार नहीं कर रही है । इन दोनों के सामने कुछ साल पहले के बिहार राज्य का उदहारण भी है की कैसे त्रिशंकु विधान सभा को रात के २ बजे भंग किया गया और नितीश की सरकार नहीं बनने दी गई और परिणाम स्वरुप हुए चुनावो में नितीश को प्रचंड बहुमत मिल गया । मजेदार स्थिति है दोनों ही बड़ी पार्टी एक ही दाव खेल रही है , देखना होगा अंत में जीत किसके हाथ लगेगी , यदि दुबारा चुनाव हुए तो । "आप " चुप है कि जब एक साल में यहाँ आ गए तो ६ महीने और बिना किसी जिम्मेदारी ( सरकार चलाने ) के वो अपना सारा समय और ऊर्जा लोकसभा के चुनावो की  तैयारी और  दूसरे राज्यो में अपनी पहुंच को बढाने के लिए कर सकते है , और बीजेपी ये दिखाने की सोच रही है की देखिये कांग्रेस के विकल्प के लिए हम सही है सच्चे ईमानदार तीसरे विकल्प की  जरुरत ही क्या है ।

                                               " आप " इतने कम समय में दिल्ली में जो जगह बनाने में कामयाब रही है उसके लिए बधाई के पात्र किन्तु याद रखिये की सत्ता के बाहर रह कर सिद्धांतो और उसूलो की बात करना आसान है किन्तु जब सत्ता हाथ में आ जाये तो उस ताकत के साथ अपना व्यवहार सामान्य रखना आसान नहीं होता है , ये सत्ता की ताकत कइयो को अपने नशे के लपेटे में ले लेती है , और ये शुरू भी हो गया , जब उनके एक विधायक ने शानदार विजय जुलुस निकाल दिया ( जहा उनका हांरे कांग्रेसी विधायक से झगड़ा भी हो गया और उन पर हारे विधायक की पत्नी से छेड़छाड़ का केस भी दर्ज हो गया  ) हा बाद में मनीष सिसोदिया ने उन्हें ऐसा न करने के लिए कह दिया , किन्तु " आप " को ये बात ध्यान में रखनी होगी की हम सभी के खून में पारम्परिक  राजनीतिक दलो  ने ऐसी बातो को भर दिया है की हम उन आडम्बरो और ताकत प्रदर्शन को भी लोकतंत्र का हिस्सा मानने लगे है । अब उनके ऊपर और जिम्मेदारी आ गई है की खुद को आम आदमी कहने वाले और अब खास बन चुके ये लोग अपना व्यवहार भी आम आदमी जैसा ही रखे और उसी नैतिक मूल्यो और सिद्धांतो की बात पर कायम रहे , जिसके दम पर वो यहाँ आये है । कुछ को छोड़ दे तो आम भारतीय इस व्यवस्था परिवर्तन और सरकारो के बदले व्यवहार के लिए तैयार है ,गेंद अब उनके पाले में है , निभा ले गए तो बड़े बन जायेंगे नहीं निभा पाये तो उनका हाल भी बाकि विकल्प बन कर उभरी तीसरी शक्तियो जैसा ही होगा । वैसे " आप " की जीत ने पुराने राजनीतिक दलो पर ये दबाव तो बना ही दिया की भ्रष्टाचारी , बाहुबली और अपराधियो को टिकट देना अब उनके लिए आसान नहीं होगा और उन्हें चुनावो में साफ सुथरी छवि वाले उम्मीदवारो को खड़ा करना होगा । देखते है की कितने राजनीतिक दल इस सबक को सिखते है ।
                                                                 

                                  बीजेपी दुखी है वो तिन राज्यो में चुनाव जीत गई उसके बाद भी मिडिया का फोकस उन पर न हो कर आम आदमी पार्टी की तरफ है , दुखी होना लाजमी है , मोदी को मीडिया का सारा एटेंशन लेनी की आदत हो गई थी अब उसका फोकस बदलना दुखी कर रहा है , और डर भी पैदा कर रहा है की कही जो लहर ,हवा चलने की बात वो अपने लिए कर रहे थे , वो कही किसी और की तरफ से न बहने लगे । डरना भी चाहिए , क्योकि वो भी कांग्रेस का विकल्प बन कर , बदलाव की बात कर और खुद को डिफरेंट कह कर इस राजनीतिक मैदान में कूदे थे , और आज स्थिति ये है कि उनका भी कांग्रेसीकरण हो गया है , नतीजा आज फिर उन्ही बातो को कह कर कोई और भी मैदान में है जो उनका खेल बुरी तरह बिगाड़ सकता है । वो तो सोच बैठे थे की बिल्ली के भाग से छीका टुटा और लोकपाल आंदोलन में बढ़ चढ़ कर अपने लोगो को हिस्सा लेनी दिया उसे कांग्रेस विरोधी  आंदोलन बनाया , किन्तु पता न था कि एक दिन वही आंदोलन उनके खिलाफ भी चला  जायेगा ,बीजेपी के लिए तो ये भष्मासुर जैसा हो गया । वैसे चाहे तो वो अभी से सबक सिख सकती है वैसे उसने प्रयास भी शुरू कर दिया था , और दिल्ली  में हर्षवर्धन जैसे साफ दिखने वाले व्यक्ति को अपना मुख्यमंत्री घोषित करके लेकिन देर से , अब ये देरी उसे लोकसभा के चुनावो में नहीं करनी चाहिए और कम से कम तब तक के लिए ये अपने कांग्रेसी चोले को उतार कर उससे अलग दिखना शुरू कर देना चाहिए ताकि दोनों को एक ही तराजू में न तौला जा सके ।

                                                 कांग्रेस तो निश्चित रूप से इस समय शॉक की स्थिति में है और उसके लिए अब बहुत देर भी हो चुकी है न केवल ६ महीने बाद होने वाले आम चुनावो के लिए बल्कि उसके बाद होने वाले कुछ अन्य राज्य के चुनावो के लिए भी जहा उसकी ही सरकार है । ये ठीक है की आत्मविश्वास बनाये रखने के लिए हम सभी सामने खड़ी चुनौती को अनदेखा करते है और दिखाते है की कुछ है ही नहीं किन्तु सच में ऐसा नहीं मान बैठते है , यही पर कांग्रेस ने गलती कर दी उसने तो कहने के साथ ही ये मान भी लिया था की मोदी और अरविंद उसके लिए कुछ है ही नहीं , ये अहंकार उसे ले डूबा और आगे भी ले डूबेगा ये तय है । राहुल आज भी सिख ही रहे है , हद हो गई अब वो साल पहले बनी पार्टी से भी सिख रहे है, उनका ये रवैया उन्हें भी ले डूबेगा और जल्द ही कांग्रेसी प्रियंका प्रियंका के नारे लगाते दिखेंगे , अच्छा हो वो जल्द सिख कर उसे आजमाना शुरू करे और पुराने घाघ कांग्रेसियो को रिटायर करके कमान पूरी तरह से अपने हाथ में ले ताकि जो वो कहते है उसे अपनी पार्टी में लागु करवाने में उन्हें कोई परेशानी न हो और हर बार कांग्रेस के विकल्प के रूप में न कोई उभरे और न उसे राजनैतिक वनवास पर जाना पड़े। अच्छा होगा की २०१४ -१९ को छोड़ उन्हें अब २०२४ की तैयारी करनी चाहिए , कांग्रेस इससे ज्यादा सत्ता से दूर नहीं रहती है और हर बार की तरह पलट कर वापस आएगी , यदि बीजेपी ने खुद से कांग्रेस को बाहर नहीं निकाला , यदि अरविंद अपने सिद्धांतो पर नहीं टिके रहे तो ।


                      व्यक्ति पूजा शायद इंसानी स्वभाव है जिसे हम कभी भी नहीं बदल सकते है , आजादी से आज तक हम यही करते रहे है , हमेसा एक चहरे के पीछे भागते है , वैसे ये चलन हमारे देश तक ही सिमित नहीं है हाल हर जगह का यही है ।  चाहे नेहरु ,इन्दिरा हो या वाजपेयी ,मोदी या  जेपी और अब अरविंद , हम  अपने ढरे पर चल रहे है । ईमानदारी से हम बता सकते है की वोट उम्मीदवारो को नहीं अरविंद , शिवराज, वसुंधरा , रमन , मोदी और चुनाव चिन्हो को पड़े । हम  लोकतंत्र के उस मौजूदा रूप के लिए नहीं बने है जो इस समय देश में लागु है । इसे देखते हुई लगता है कि वाकई समय आ गया है की इस बात पर विचार किया जाये कि क्यों न जनता अपने प्रतिनिधियो के साथ ही अपने  प्रधानमत्री या मुख्यमंत्री का चुनाव  खुद ही करे न कि उसके चुने प्रतिनीधि जो की वास्तव में भी करते नहीं है , चुने गए प्रतिनीधि सदन के नेता का चुनाव करेंगे जैसी बाते केवल संविधान में लिखा भर है असल में क्या होता है ये हम सभी को पता है । जब जनता नेता और चुनाव चिन्हो को ही वोट देती है तो उसे ही ये अधिकार मिलना चाहिए की वही सीधे अपना सर्वोच्च नेता क्यों न चुने जैसे कई अन्य देशो में चुना जाता है , कम से कम आज दिल्ली में जैसी हालत है वो तो न होगी , चुनाव के बाद ही दूसरे चुनावो की बात होने लगी एक सरकार तो बन ही जायेगी और देश को उसके पसंद का नेता मिलेगा ।

                                   कहते है की एक झूठ बार बार बोला जाये तो वही सच बन जाता है , वही हाल हम भारतीयो का है । जोड़ तोड़, खरीद फरोख्त , दल बदल , मौका परस्ती , हर हाल में सत्ता की चाहते, उसूल सिद्धांत नैतिकता बेमतलब  और राजनीति में सब जायज है जैसी बाते हम इतना देखते आ रहे है की अब  हमें वो सब भी लोकतंत्र का ही एक हिस्सा लगने लगा है । आज कितने ही आराम से हम सब और मिडिया भी खुले आम ये बाते कर रहे है की कोई भी किसी से भी समर्थन ले ले कोई किसी को भी खरीद ले और सरकार बना ले , " आप " और बीजेपी  पार्टी की नैतिकता वाली बात तो हमें हजम ही नहीं हो रही है और लोग साफ कह रहे है कि ये क्या बकवास है चुपचाप सरकार बनाओ जो भी समर्थन दे , ये तो हाल है अपने देश का और बात करते है राजनैतिक व्यवस्था को बदलने की ।

चलते चलते 

                      बीजेपी को सरकार नहीं बनानी है उसे विपक्ष में बैठना है " आप " को भी सरकार नहीं बनानी है उसे भी विपक्ष में ही बैठना है और कांग्रेस सोच रही है कि  कम्बखत दोनों को विपक्ष में ही बैठना था तो मेरी सरकार ही क्या बुरी थी , मेरा ये हाल क्यों किया ।