November 24, 2011

नशा शराब में होता तो नाचती बोतल - - - - - - mangopeople

                                                                नशा शराब में होता तो नाचती बोतल क्या खूब लिखा है लिखने वाले ने पता नहीं लिखने वाला शराब और नशा  से कितना परिचित था पर जिसने भी लिखा है शराब पीने वालो को उसकी वकालत करने के लिए एक अच्छी लाइन दे  दी थी | शराबियो ( भाई शराब पीने वालो को शराबी ही कहेंगे न कितनी मात्रा में पीता है इस बात से क्या फर्क पड़ता है यदि आप के पास कोई और शब्द हो तो बताइए ) और उनसे सहानुभूति रखने वालो में हड़कंप मचा है सब अन्ना के शराबियो को पीट कर शराब छुड़ाने वाले बयान डरे है और उन्हें खुद के पीटे जाने का डर सता रहा है | सभी लगे है अपने अपने स्तर पर इस बात का विरोध करने में , कल को देश के युवराज के इस बयान पर की ,  मायावती सरकार किसानो की जमीने सस्ते में खरीद कर बिल्डरों को दे देती है और किसानो को दिए पैसे को वापस हड़पने के लिए उन किसानो के गांव में शराब का ठेका खोल देती है , पर जोरदार ताली बजाने वाले आज दुखी है परेशान है की हमारे युवराज के उठाये मुद्दों को कोई और हड़प रहा है और गरीबो के बीच से शराब हटाने की बात कहा रहा है न केवल कह रहा है बल्कि शराबियो के पीट पीट कर सुधार देने का दावा भी कर रहा है | लो जी हमारे मुद्दे कोई कैसे हड़प सकता है ये काम तो बस हमारा है हमने जनलोकपाल बिल का मुद्दा लोकपाल को एक अलग संवैधानिक  दर्जा देने की बात कर हड़पने और गड़पने का प्रयास किया असफल हो गया कोई बात नहीं पर ये हडपने का काम बस हमारा है हमें ही शोभा देता है |
                                       शराब और नशा  प्रेमी दुखी है अब क्या अन्ना हमारी पिटाई करके हमसे शराब छुड़वा देंगे क्या कही ऐसा न हो की अन्ना के भ्रष्टाचार के मुद्दे पर परिवार को होश और जोश में ला दिया था कही वो भी शराब का विरोध न करने लगे और शुरुआत घर से विरोध करने का न करने लगे | बड़ी मुश्किल से बीबी बच्चो को समझा कर रखा है की एक पैग शराब तो डाक्टर भी लेने को कहता है ( कम्बखत आज तक ऐसा कहने वाला डाक्टर मुझे मिला नहीं आप के पास उसका पता हो तो बताइयेगा )  शराब  तो  हम  बेचारे   ??? कभी खुशी, कभी गम, कभी थकान उतारने, कभी बोरियत मिटाने और कभी कुछ भी खास न होने की वजह से इस का सहारा लेते हैं." ( चुराई गई लाइन है काहे की हमें शराब पीने के कारणों का नहीं पता था :)) )  इसमे कोई बुराई नहीं है | बुराई तो तब है जब पत्निया, बेटिया और बहुए इन कारणों को बता कर एक पैग मारने की जिद करने लगे | शराब पीने का अच्छा और महान काम बस पुरुषो के लिए ही अच्छा है जब ये काम नारी करे तो वो बुराई और गलत बन जाता है | पीना तो छोडिये कोई महिला सेलेब्रेटी शराब बनाने वाली कंपनी के किसी भी उत्पाद का विज्ञापन भी करे तो वो गलत है पर हम अपने पीने पिलाने का हर जगह प्रचार प्रसार करते रहे तो वो सही है | वैसे महिलाओ का पीना भी सभी के लिए गलत नहीं है बस वो पुरुषो के कहने पर उनकी इच्छा पर उनकी इजाजत पर हो , वो खुद किसी की मर्जी इच्छा इजाजत की जरुरत समझते हो या नहीं किन्तु महिलाओ को इसकी जरुरत पड़ेगी | कभी समाज, सामाजिक स्तर, सामाजिक मेल मिलाप के नाम पर तो कभी बस कोई और नहीं मिला तो पति का साथ देने के नाम पर ही पत्निया शुरुआत कर सकती है या उन्हें इजाजत मिलती है या कभी कभी उन्हें मजबूर किया जाता है | किन्तु यही दृश्य उलटा हो पति न पिये और पत्नी की इच्छा हो तो वो नहीं कर सकती क्योकि शराब एक गन्दी चीज है ये स्वास्थ के लिए अच्छी नहीं है क्योकि महिलाए कोमल नाजुक होती है उन्हें माँ बनना है ( एक रिसर्च के अनुसार अल्कोहल पुरुषो के पिता बनने के सामर्थ को बहुत नुकशान पहुंचा रहा है , अब इसका लिंक न मगियेगा मेरे पास नहीं है खोजना है खुद खोज लीजिये  मानना है मानिये नहीं तो मत मानिये ) ब्ला ब्ला ब्ला | बहुत पहले टीवी पर एक रिपोर्ट देखी थी गांव के एक मजदूर पति पत्नी से बात की जा रही थी , पति से पूछा गया की भाई तुम शराब क्यों पीते हो मजदूरी करते हो सारे पैसे शराब में क्यों उड़ा देते हो तो उसका जवाब था की दिनभर मजदूरी करने के बाद शरीर इतना दुखता है की उसे भुलाने के लिए पीना पड़ता है , बगल में लगभग ५० साल की उसकी पत्नी ने तपाक से कहा की मजदूरी तो मै भी करती हूँ रोज तुम्हारे साथ , घर का काम और इतने साल बच्चो की भी देखभाल की है मैंने तो अपनी थकान मिटाने के लिए कभी शराब नहीं पी रिपोर्टर ने कहा जवाब दीजिये पति मुस्करा का रह गया | वैसे किसी के पास इसका जवाब हो और जवाब देने की हिम्मत हो ईमानदारी से तो हमें जरुर बताइयेगा जानने की इच्छा है :) |
                                                             सब कहेंगे की भाई ये तो गलत है गरीब को शराब का नशा नहीं करना चाहिए उसके पास पैसा नहीं है उसे अपने पैसे शराब में नहीं उड़ाना चाहिए | मतलब शराब में तो अब भी कोई खराबी नहीं है असल बुराई तो पैसा न होना है  जो पैसा हो तो जीतनी चाहो उतनी पीओ और पीने के बाद पत्नियों, माँ , बच्चे भाई बहन पडोसी , मित्र सभी को पीटो झगडा करो गरीब हो तो नाली में गिरो अमीर हो तो गाड़ी रास्ते में चल रहे,  फुटपाथ पर सोये लोगो पर चढ़ा दो  सब करो तुमको पूरी छुट है किन्तु शराबी को पीटने की बात मत करो ये तानाशाही है,  तुगलकी फरमान है,  तालिबानी ????( कल ही एक धर्म के भाई साहब इस शब्द पर आपत्ति कर रहे थे कहते है की हमारे धर्म में तो शराब हराम है कोई नहीं पीता है तो इस मामले में ये शब्द नकारात्मक रूप से क्यों प्रयोग किया जा रहा है बात तो सही लगाती है जी  ) सोच है हम सभी को इसका विरोध करना चाहिए |
                           शराब का नशा एक और जगह गलत हो जाता है वो तब जब ये हमारे बच्चे करे युवा करे तब ये गलत है गलत संस्कार है | युवाओ के ये नहीं करना चाहिए आज के युवाओ को शराब का लत पड़ गई है वो शराबी हो गए है वो बिगड़ गए है, युवा भटक गए है उन पर पश्चिमी संस्कृति का असर हो गया है उनमे बड़ो का लिहाज नहीं रहा है वो माँ बाप के पैसे उड़ा रहे है लेक्चर लेक्चर लेक्चर लेक्चर !!!! एक बात आज तक समझ नहीं आई जब थोड़ी मात्रा में शराब बुरी नहीं है , ये जोश को और बढ़ा देती है ये आन्नद देती है ये बुराई नहीं है तो पीने वाले परिवार के साथ मिल बैठ कर क्यों नहीं पीते कोई भी आन्नद सिर्फ खुद लेना और परिवार को उससे दूर रखना ये तो गलत बात है,  ठीक है भाई शारीरक रूप से आप सभी अलग है तो आप पटियाला पीजिये बीबी बच्चो को एक छोटा पैग बना कर दीजिये क्या बुराई है जितने ये आप के स्वस्थ पर असर करेगी उतना ही आप के बीबी बच्चो पर | कहते है जिस काम को पूरा परिवार मिल बैठ कर करे उसमे आन्नद दुगना हो जाता है पता नहीं क्यों लोग इस आन्नद को बढ़ाने से परहेज करते है कुछ लोग ये करते है और जीवन को भरपूर जीते है पर कुछ मिडिल क्लास भारतीय कभी भी अपनी वो मानसिकता नहीं छोड़ते है पता नहीं क्यों और पत्नी बच्चो को मना करते है | हम सभी समझदार है किसी को भी हमें ये बताने की जरुरत नहीं है कि एक स्वतंत्र देश में हमें शराब पीनी चाहिए की नहीं, ये हमारी मर्जी है हमें जो ठीक लगेगा हम करेंगे | हा ये अलग बात है की ये स्वतत्र  देश , समझदारी आदि आदि बाते बस पुरुषो , पढेलिखे , पैसे वाले , उम्र में बड़े लोगो पर ही लागु होती है महिलाए , युवा और गरीब इन सब में नहीं आते है न वो स्वतंत्र है न समझदार और ना ही अपनी मर्जी से कुछ भी करने का हक़ रखते है  |
                        कभी कभी लगता है  सरकार महँगी अंग्रेजी बेचे तो समझ आता है भाई पैसे वाले ही उसे लेते है लेकिन सरकार सस्ती देशी क्यों बेचती है उसे कौन खरीदेगा,  गरीब न और गरीब कहा से लायेगा पैसा , वही घर चलाने के पैसे से शराब पियेगा और बीबी बच्चे भूखे मरेंगे | पर सरकार ये काम भी गरीबो  के हित में ही करती है यदि सरकार गरीबो का ध्यान न रखे और उन्हें अच्छी सस्ती देशी शराब न मुहैया कराये तो बेचारे ?? नकली शराब जहरीले शराब अवैध शराब पी पी के मर जायेंगे और सरकार उन्हें मारती नहीं है उन्हें तो सस्ती अच्छी देशी शराब दे कर बचाती है |  सरकार नकली जहरीली शराब को बनाने और बिकने से नहीं रोक सकती है थोडा मुश्किल काम है और सरकारे इस तरह के मुश्किल काम नहीं करती है और फिर उनसे सरकार के राजस्व का भी घाटा होता है बस स्थानीय पुलिस अबकारी अधिकारी और नेता को ही हफ्ता या फायदा मिलता है उस पर से गैरकानूनी जबकि सरकारी ठेका वही काम और फायदा क़ानूनी तौर पर कराती है ,  बोलिए है ना बिलकुल सालिड सही तर्क |
                                                                    इस मामले में बेचारे शराबी से ज्यादा तो नेता , टीवी चैनल  और पत्रकार दुखी है | बेचारे मनीष तिवारी :) ( अब बेचारा न कहे तो क्या कहे सार्वजनिक के साथ ही लिखित में आन्ना से माफ़ी मागनी पड़ी थी पार्टी के कारण ) शराब प्रेमियों के गम से गमजदा हो कर कह रहे है की भाई शराबियो को पीटने की बात होगी  तो आधे केरल, तीन-चौथाई आंध्र प्रदेश और अस्सी फ़ीसदी पंजाब को कोड़े (???? अन्ना का डंडा नेताओ के कान तक पहुंचते पहुंचते कोड़ा बन गया )  लगाने होंगे... | बताइए ये सब तो नेताओ के वोटर है हर पञ्च साल बाद इनमे से लगभग आधे शराब की एक बोतले के बदले में हमें पूरा देश सौप देते है,  यदि इनसे यही छुट गई और ये होश में आगये तो हमारा क्या होगा , हमारी शराब खोरी के लिए पैसा कहा से आयेगा शराब से सरकारी खजाने में आ रहे पैसे का क्या होगा | पत्रकार और चैनल वाले तो ऊपर से दुखी दिख रहे है भाई ये तो गलत है आप शराब पर कैसे पाबन्दी लगा सकते है हम में से ज्यादातर को मुफ्त की शराब पीने कि आदत है लोगो ने देना बंद कर दिया गलत मान कर तो हमारा क्या होगा | अन्ना ने तीस साल पहले  अपने गांव का किस्सा बताया है इसका अभी से विरोध करो क्या पता यहाँ जनलोकपाल बिल पास और  वहा फिर अन्ना की हर सामजिक बदलाव को लागु करवाने की हवा चल गई तो , तो फिर हम क्या करेंगे और वो सब छोडो सबसे बड़ी बात ये है की हमारे चैनल को  सरकार ने इतने करोड़ का विज्ञापन दिया है यदि अन्ना टीम का विरोध करती खबर बहस लगातार नहीं दिखाया तो कही वो सारे महंगे विज्ञापन हमसे छीन ना जाये भाई कुछ चैनलों के कर्ता धर्ता के दूसरे कई बिजनेस है उन पर असर ना डाले सरकार या कुछ के ऊपर सी बी आई जाँच चल रही है जो सरकार की चमचागिरी करने से बंद डब्बे में पड़ी है कही वो ना खुल जाये सरकारों का क्या भरोसा वो कुछ भी कर सकती है | टी आर पी के लालच में खूब अन्ना टीम को फुटेज दी है अब मौका है की जरा हिसाब बराबर किया जाये और टी आर पी तो इसमे भी अच्छी मिल रही है |  फिर ये जरुरी तो नहीं आदमी पर हमेशा पत्रिकारिता की हावी रहे आखित पत्रकार भी तो इन्सान ही है न कभी कभी पत्रिकारिता पर निजी विचार भी तो हावी हो सकते है और बेचारा कब तक सीधे खड़ा रहे कभी कभी तो एक तरफ झुक कर टेक तो लगाना ही पड़ता है |
                             
                      कही पर ये टिपण्णी की थी यहाँ भी दे रही हूँ |
                       इस महान ??? काम शुरुआत एन डी टीवी ने किया और अब इसमे सभी विद्वान् लोग शामिल हो गए है जान कर अच्छा लगा :) चैनल खुद ही लिए अन्ना के साक्षत्कार को तोड़ मरोड़ कर टीवी पर बहस का मुद्दा बना दिया | अन्ना ये बात देश भर के शराबियो के लिए नहीं कह रह थे वो साक्षात्कार में तीस साल पहले अपने गांव में किये गए सुधारो की बात कर रहे थे और उसी क्रम में बता रहे थे की उन्होंने शराब को अपने गांव से कैसे दूर किया | जिसमे कहा गया की गांव से शराब हटाने के बाद भी जब कोई बाहर से पी कर आता था तो पहले उसे तीन बार समझाया जाता था फिर मंदिर में ले जा कर भगवन की कसम खिलाई जाती थी और उसके बाद भी वो न माने तो मंदिर के सममाने वाले खम्बे से बांध कर पिटा जाता था बिलकुल उसी तरह जैसे एक माँ अपने बच्चे की गलती पर उसे मारती है सुधारने के लिए | ( एन डी टीवी के उस बहस में शाहनवाज हुसैन ने भी इस तरफ ध्यान दिलाया था की अन्ना अपने गांव की बात कर रहे है पूरे देश की नहीं ) और ये सब तब किया जाता था जब शराबी के घरवाले आ कर शिकायत करते थे | ये बात उन्होंने पहली बार नहीं कही है इसके पहले वो ये बात कई बार अपने कई साक्षात्कारो में कह चुके है | अब आप बातो को तोड़ मरोड़ कर सभी से ये कहे की आन्ना ने ये बात सभी शराबियो के लिए कही है तो निश्चित रूप से सभी इसका विरोध ही करेंगे | भूषण , किरण , अरिविंद के बाद उन्ही का नंबर था बदनाम करने के लिए कुछ नहीं मिला तो बातो को तोड़ मरोड़ कर पेश कर दिया | उन्होंने शराब का विरोध किया था और क्यों इसके पहले वो कई बार कह चुके है |

१ क्योकि गरीब अपने पैसे शराब में उड़ा देते थे

२ शराब के साथ ही कई और सामाजिक बुराइया गांव में आ गई थी जिन्हें दूर करने के लिए सबसे पहले शराब को दूर करना जरुरी था |

३ शराब बनाने वालो को भी उनका काम छोड़ने के बाद उन्हें नए काम करने के लिए सहायता भी की |

४ शराब से सबसे ज्यादा महिलाए परेशान थी और उन्होंने महाराष्ट्र में ये कानून बनवाया की यदि किसी गांव की अधिकांश महिलाए ये मांग करे की उनके गांव में शराब का ठेका न हो तो वहा से सरकारी शराब के ठेके को हटाना होगा |

                                           उन्होंने ये बात बस अपने गांव में किये काम के लिहाज से कही थी पूरे देश के सम्बन्ध में नहीं और किसी गांव में किये जा रहे सुधारो के लिए किये गए काम और देश के लिए कहे जा रही बात के फर्क को आप तो समझाते होंगे बस ऐसे ही तिल का ताड़ बन जाता है | मिडिया से तो कोई उम्मीद नहीं बची थी अब तो ब्लॉग जगत से भी कोई उम्मीद नहीं दिखती है लोग बिना पूरी बात जाने फटाफट अपनी प्रतिक्रिया देने लगते है | 
              बिलकुल सही कहा मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए बात केवल उनके मुद्दे तक ही रखना चाहिए, क्यों बार बार मुद्दों से अलग चीजो की बात की जाती है | क्या अन्ना ने कभी कहा है की वो शराब छोड़वाने के लिए पूरे देश के शराबियो के पिट पिट कर उनकी शराब छोड़वाने का काम करने वाले है यदि उन्होंने ऐसा कहा होता तो आप जरुर उन पर चर्चा करते किन्तु यहाँ उन्होंने ऐसा कुछ कहा भी नहीं है तो इस बात पर चर्चा क्यों वो भी बात को तोड़ मरोड़ कर किया जा रहा है | वो अपने गांव का तीस साल पुराना किस्सा बता रहे है वो भी सवाल पूछे जाने पर और उसे गलत तरीके से रख कर मुद्दों को बदलने का प्रयास किया जा रहा है क्यों | एक गांव में दो या चार लोगो को पीटने की घटना की तुलना आप पूरे देश में सत्ता के नशे में चूर हो कर किये गए कामो से कैसे कर सकते है | आप ने यदि वो साक्षात्कार ठीक से देखा हो तो अन्ना ने ये भी कहा है की हिंसा का सहारा नहीं लेना चाहिए ये गलत था सामजिक और क़ानूनी रूप दोनों से ही किन्तु ये करना पड़ा बिलकुल वैसे ही जैसे एक माँ अपने बच्चो को सुधारने के लिए करती है वो खुद अपने पहले के किये काम को गलत बता रहे है क्या संजय में इतनी हिम्मत थी , आज संजय जिन्दा होते तो जो कांग्रेसी उसे गलत बताते है उनमे भी उसे गलत कहने ही हिम्मत नहीं होती | कई नवो की सवारी अन्ना नहीं कर रहे है वो और उनकी टीम तो लगातार ये कह रही है की आज के समय में बात भ्रष्टाचार और लोकपाल के बारीकियो पर होना चाहिए पर सभी लगे है एक दुसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाने में बेमतल के दुसरे मुद्दे उठाने में | 
                    

                                                          
           
 

27 comments:

  1. शराब पीने वाले उस महिला का दर्द क्‍या जानेंगे जो अपनी सारी खुशियां बोटल के साथ बहते हुए देखती है। जितने भी लोग शराब की पैरवी करते हैं वे बेहद डरे हुए और कमजोर लोग हैं। उनमें दुनिया का सामना या यूं कहूं तो ज्‍यादा ठीक होगा कि परिवार का सामना या महिला का सामना करने की हिम्‍मत नहीं है और वे शराब से हिम्‍मत प्राप्‍त करते हैं। ऐसे सभी लोगों को मेरी राय है कि घर में सूप की तरह शराब को सर्व करना चाहिए, जिससे सभी लाभ लें। ऐसे लोगों को कोडे तो क्‍या महिलाओं की इतनी गालियां सुनने को मिलती हैं कि वो कोडों से भी ज्‍यादा होती हैं। शराब की पैरवी करने वाले लोग एक भी महिला को मेरे सामने लाकर खडा कर दे जो शराब को सही बताती हो। लेकिन उन लोगों का क्‍या किया जाए जो हमेशा ही मनीष तिवारी और दिग्विजय की भाषा को आगे बढाते हैं।

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  2. शराबियों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्यवाही होनी ही चाहिए...

    लेकिन कानून को अपने हाथ में लेने वालो के साथ उससे भी ज्यादा सख्ती से निपटना चाहिए...

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  3. @ शराब तो हम बेचारे ??? कभी खुशी, कभी गम, कभी थकान उतारने, कभी बोरियत मिटाने और कभी कुछ भी खास न होने की वजह से इस का सहारा लेते हैं."
    एक कारण भूलगईं तुम अंशुमाला..दिवाली पर रोकेट छुडाने के लिए खाली बोतल चाहिए न ...कहाँ से आएगी ?:)
    बहुत ही सही और धारदार लिखा है.

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  4. सटीक लेखन... बहुत अच्छा लिखा है आपने शुभकामनायें...समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट परhttp://mhare-anubhav.blogspot.com/2011/11/blog-post_20.html
    वैसे भी बहुत दिनों बाद आपका कोई आलेख आज पढ़ने को मिला। अच्छा लगा पढ़कर...

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  5. शराब तो हम बेचारे ??? कभी खुशी, कभी गम, कभी थकान उतारने, कभी बोरियत मिटाने और कभी कुछ भी खास न होने की वजह से इस का सहारा लेते हैं."
    यह सब भ्रान्ति है की नशा ग़म कम करता पीने की बहाने है .अच्छा सार्थक आलेख

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  6. हमारे एक दोस्त तो पीने की वज़ह नहीं बताते थे बस फख्र से इतना कहते थे कि हम तो बस दो मौकों पर पीते हैं, कोई घर आ जाए तो उसका साथ देने को या किसी के घर जाएँ तो उसका मन रखने को. अब सामाजिक आदमी हैं तो रोज ही आना-जाना लगा रहता है!
    आदत सुधारने की बात अन्ना मुख से प्रकाशित होने के कारण बवाल बन गयी, लेकिन बरसों पहले इन्हीं चैनल वालों ने दिखाया था कि पूर्वोत्तर राज्यों की महिलाओं ने अपने पुरुषों की इस आदत से परेशान होकर यही रास्ता निकाला था... तब इस बात की बड़ी प्रशंसा हुई थी.. और जो लोग नियमित टीवी पर समाचार-मनोरंजन चैनल देखते हैं (मैं नहीं देखता) उन्हें याद होगा.. हमारे लालू जी ने भी अपने चिर परिचित अंदाज़ में "चवनिया मुस्की" के साथ कहा था कि हमारे राज में तीन तरह से कोई काम बनता है ईटिंग (खिलाकर), सीटिंग (बैठकर) और पीटिंग (पीटकर...
    तो फिर यही बात शराब की समस्या पर क्यों नहीं लागू होती!!

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  7. दिल्ली में एक शख्स ने महंगाई पर विरोध जताते हुए शरद पवार को एक थप्पड़ जड़ दिया...कृपाण निकाल कर नेताओं की हत्या की धमकी भी दी...पत्रकारों ने अन्ना का ध्यान जब इस घटना की ओर दिलाया तो उन्होंने त्वरित प्रतिक्रिया दी...बस एक ही मारा...मौजूद सभी लोग हंसने लगे और अन्ना चले गए...जल्दी ही अन्ना को समझ आ गया कि उन्होंने क्या बोला है...अन्ना लौटे और बात को संभालते हुए बोले...वो (थप्पड़ मारने वाला) गुस्से में होगा...लेकिन किसी को मारना सही नहीं है...हमारा लोकतंत्र ऐसे हमलों की इजाज़त नहीं देता...

    उधर, शरद पवार को थप्पड़ जड़े जाने की प्रतिक्रिया में महाराष्ट्र में एनसीपी के कार्यकर्ता सड़कों पर उतर आए...मुंबई के दादर में दुकानें बंद करा दीं...मुंबई-आगरा नेशनल हाईवे को नागपुर के पास जाम कर दिया...कल पुणे बंद का आह्वान किया है...

    सही जा रहा है हमारा देश...

    जय हिंद...

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  10. सही कहा आपने.पीने वालों को पीने का बहाना चाहिए.आपने महिलाओं की बात की,मैं राजपूत जाति से हूँ और हमारी जाति में बहुत सी महिलाएँ भी खूब शराब पीती हैं और किसी खास मौके पर तो जमकर(वैसे पुरुषों की तुलना में तो ये कम ही है).कहने का मतलब जहाँ परंपरा के रूप में ये चलता रहा हैं वहाँ महिलाओं पर भी कोई खास रोक टोक होती हो ऐसा लगता नहीं.हालाँकि हमारे घर में मेरे दादाजी के अलावा किसीने कभी शराब नहीं पी.जहाँ तक बात है महिलाओं द्वारा शराब के विज्ञापनों की तो शायद आप प्रियंका के विज्ञापन की बात कर रही है.उन पर सवाल इसलिए उठे क्योंकि वे विश्व सुंदरी रह चुकी है राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त कर चुकी है और बच्चों के लिए भी काम करती है.जाहिर सी बात है उन्हें ज्यादा जिम्मेदारी बरतनी चाहिये(वैसे मुझे नहीं लगता उनका कोई खास विरोध हुआ है).और यदि आप किसी पोस्ट को ध्यान में रख कह रही हैं तो बात अलग है वैसे वहाँ पुरूष के बारे में भी कुछ कहा गया होगा.

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  11. एक बार आन्दोलन चला था और महिलाओं ने कई शराबियों की लत छुड़वा दी थीं।
    पीट-पीट कर।
    लातों के भूत बातों से नहीं मानते।
    न जाने इसकी लत ने कितने परिवार को नारकीय जीवन जीने को विवश कर दिया है।

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  12. देखिये अंशुमाला जी
    बात बड़ी आसान हैं शराब और शबाब पर हक़ तो पुरुषो का बनता हैं . अब अगर शबाब , शराब पर हक़ जमाये तो पुरुष के पौरुष को ज्यादा दंड बैठक पेलनी पड़ सकती हैं .
    नारी का काम , काम नहीं होता छिनालता होती हैं पुरुष का काम पौरुष हैं
    वो तिलियर लेक की ब्लॉग मीट तो याद होगी आप को वहाँ भी कुछ ऐसा ही हुआ था
    आप का आलेख पढ़ कर याद आगया वो वाकिया

    http://indianwomanhasarrived.blogspot.com/2010/11/blog-post_9611.html


    anna ki baat sae mae sehmat nahin hun kyuki kanun ne ek age limit banaa rakhii haen sharab peenae kae liyae
    jarurat haen samajik badlaav ki yaani sharab ko ban karnae ki

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  13. अन्शुमालाजी शराब ऐसी बला है जिससे किसी को लाभ नहीं पहुँचता ....न पीने वाले को और न ही उसके परिवार , समाज या देश को..... बाकि न्यूज़ चेनल वालों की तो क्या कहें ये जितना करें कम है..... बहुत अफ़सोस होता है इनकी गैरजिम्मेदारी पर .

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  14. सच तो यही है कि पीने वालों को पीने का बहाना चाहिए ...शराब और शबाब का सहारा लेने वाले भीतर से डरे हुए वही लोंग हैं जो महिलाओं के मंदिर में भजन कीर्तन को वास्तविक जीवन से पलायन बता कर अपनी बुद्धिवादिता पर खुश होते हैं, कम से कम पलायन का यह रुख अपना या किसी दूसरे का मानसिक, आर्थिक या शारीरिक नुकसान तो नहीं करती !

    आज हमारे शहर में हालात ये है कि रात गये घर लौटते गली गली में खुल गयी शराब की दुकानों पर खड़ी भीड़ , शराब के नशे में लड़खड़ाते , चिल्लाते लोंग नजर आ जायेंगे , वही राशन या दवा की दूकान आपको ढूंढनी पड़ेगी!!

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  15. @ खुशदीप जी

    मै भी यही कहती हूँ की बस एक ही थप्पड़ दिख रहा है पवार को उनके ही क्षेत्र विदर्भ में जब एक किसान आत्महत्या करता है तो उनके गाल पर एक साथ दस थप्पड़ पड़ते है अब तक हजारो किसानो ने आत्महत्या कर ली है , उनके ही क्षेत्र जिला मुंबई और ठाणे में बच्चे कुपोषण से मर रहे है और दूसरी तरफ हजारो टन अनाज सड रहा है और वो कोर्ट में कहते है की अनाज मुफ्त में नहीं बाटे जायेंगे हर बच्चे की मौत पर उनके गाल पर सौ थप्पड़ अब इसमे पूरे देश के किसानो की आत्महत्या कुपोषण और भूख से मरे लोगो को मौत पर कुल कितने थप्पड़ पड़े आप खुद ही जोड़ लीजिये | बे आवाज थप्पड़ो को परवाह नहीं करने वाले पवार तो अब भी इस आवाज वाले थप्पड़ को भी थप्पड़ मानने से ही इंकार कर रहे है साफ है की उन्हें अभी भी जनता की परवाह नहीं है |

    अन्ना गांधीवाद में विश्वास रखते है किन्तु उन्होंने कई बार ये भी कहा है की उनके अन्दर गाँधी के साथ शिवाजी भी रहते है जो कई मौके पर बाहर आ जाता है उस पर से वो सेना में रह चुके सैनिक है तो वो कभी कभी बाहर आएगा ही | सभी को याद रखनी चाहिए की अन्ना ने कभी नहीं कहा है की वो गाँधी है या वो गाँधी बनना चाहते है वो तो मिडिया है जो बार बार उन्हें गाँधी बनाने का प्रयास करता है वैसे भी गाँधी भी एक दिन में महात्मा गाँधी नहीं बने थे एक लम्बा सफ़र तय किया गया था और बनते बनते गाँधी से महात्मा गाँधी बने थे और मै नहीं मानती की बिना गाँधी बने आप देश के लिए कुछ कर ही नहीं सकते या आप किसी आन्दोलन का नेतृत्व नहीं कर सकते है |

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  16. @ राजन जी

    हा मै इस परम्परा के बारे में जानती हूँ कई जगह महिलाए बीडी और हुक्का भी पीती है किन्तु वो सभी तब ही करती है जब पुरुषो की इजाजत सहमती होती है इसे करने की | क्या कोई भी परम्परा बिना पुरुषो के हामी के चलना संभव है क्या देश के दूसरे जगहों पर कोई महिला ये काम कर सकती है लोगो सीधे उसे बिगडैल चरित्रहीन कह देंगे क्यों जब पुरुष वही गलत करे तो उसके चरित्र पर उंगली नहीं उठता किन्तु जब महिला शराब पिए तो सीधे उसके चरित्र पर उंगली क्यों उठा दी जाती है | और प्रियंका ने सीधे तौर शराब का विज्ञापन नहीं किया था शराब बनाने वाली कंपनी फैशन टूर का विज्ञापन किया था ब्लॉग पर इस पर पोस्ट आने के काफी पहले ही मुझे कई लोगो ने कहा था लो जी अब तो हीरोइने भी खुलेआम शराब का विज्ञापन करने लगी, लगता है बड़ी पियक्कड़ है ये फिम्ल वाली होती ही बर्बाद है | बोलो पुरुष बर्बाद नहीं होते है पर महिलाए ये करे तो बर्बाद होती है |

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  17. सटीक आलेख! बुराई तो बुराई ही है लेकिन यह सच है कि किसी भी बात को जनरलाइज़ करना ठीक नहीं होता। जिनकी पिटाई हुई उनका (और परिवारजनों का भी) सर्वेक्षण कराके पूछा जाना चाहिये कि आज क्या वे अनुशासित रहना पसन्द करेंगे या पहले जैसे पियक्कड़ बनकर रहना। और फिर हर आदमी की हर बात हर समय 100% परफ़ैक्ट हो, यह कैसे सम्भव होगा। जिन्होने समाज-सुधार में थोड़ा भी योगदान दिया है वे उनसे तो बेहतर ही हैं जिन्होने कुछ नहीं किया।

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  18. १.लुत्फ़-ऐ मय तुझसे क्या कहूँ जाहिद
    हाय कमबख्त तूने पी ही नहीं

    २. शैख़ ये कहता गया पीता गया
    है बहुत ही बद मज़ा अच्छी नहीं

    नीरज

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  19. हिंसा तो किसी भी समस्‍या का हल नहीं है। चाहे वह अन्‍ना करें, या हरविंदर।

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  20. anshumala ji,
    मैं बताना चाहता था कि जिस समाज में ऐसा होता हैं वहाँ महिलाओं का शराब पीना किसीको अस्वाभाविक नहीं लगता न ऐसी महिलाओं को बेशर्म माना जाता है क्योंकि ये लोग शुरू से ही ऐसा देखते आ रहे है.हो सकता है कलको महिलाओं का शराब पीना भी आम हो जाएँ जैसा कि महानगरों में धीरे धीरे होता भी दिख रहा है.(ये कितना गलत है और कितना सही वो एक अलग विषय है).हाँ एक सीमा के बाद तो शराब पीना पुरूषों के लिए भी अच्छा नहीं माना जाता और न ही इनकी कोई विशेष इज्जत होती है.इन्हें चौराहे पर ले जाकर कोडे लगाए जाने चाहिए ऐसा मानने वाले पुरूष भी आपको खूब मिल जाऐंगे.युवाओं के बारे में आप पोस्ट में खुद मान रही है.लेकिन ये बात मानने के लिए मुझे कोई बहुत बडे साहस की जरूरत नहीं कि पुरूषों की तुलना में महिलाओं पर चार गुना ज्यादा पाबंदी है.या कहें कि उन्हें ही ज्यादा नियंत्रण में रखने का प्रयास किया जाता है.और ये सब मानकर मैं कोई एहसान नहीं कर रहा बल्कि जो मुझे लगेगा वैसा ही कहूँगा.
    प्रियंका पर थोडी मेहनत इसलिए कर ली क्योंकि पिछली कुछ मर्तबा ये दिखाने कि कोशिश की जा रही है कि बेचारी प्रियंका ने कुछ गलत नहीं किया और सब उसके पीछे केवल महिला होने के कारण ही पडे हैं जबकि मैंने ऐसे एक दो लेख पढे थे जिनमें बस ये कहा गया था कि प्रियंका को समझना चाहिए कि इसका फायदा अंतत: नशे के व्यापारियों को ही मिलेगा.वो भी इसलिए क्योंकि प्रियंका कोई साधारण अभिनेत्री भर नहीं है बल्कि उनके कुछ सामाजिक सरोकार भी है.जैसा आपने बताया कि कई लोगों ने प्रियंका के बारे में ऐसा भी कहा तो कहा ही होगा(वैसे भी कोई महिला यदि कह रही हैं तो विश्वास न करने का कोई कारण तो नहीं है).पर मैं तो अपना अनुभव बता रहा हूँ कि ज्यादातर पुरूषों को अब इन सब बातों से फर्क नहीं पडता वो ये सब देखते हैं लेकिन ज्यादा ध्यान नहीं देते.और कभी कभी नैतिकता को लेकर प्रश्न पुरुषों पर भी उठते है.अमिताभ तो महानायक हैं लेकिन उन पर भी बूम नामक ऐक फिल्म में काम करने के कारण आलोचना हुई थी कि आपने ऐसी चरम अश्लील फिल्म में काम क्यों किया.बच्चन ने फिर इस पर माफी भी माँगी थी ऐसे ही कभी अलविदा ना कहना में उनके किरदार को देखकर उनके किरदार के बारे में क्या कहा गया,यहाँ नहीं बता सकता.ऐसे ही रामायण के राम अरूण गोविल से तो कई लोग आज तक कट्टी है कि तुमने 'भगवान' होते हुए भी सी ग्रेड फिल्मों में अंतरंग दृश्य क्यों दिए.

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  21. मुश्किल ये है कि...अन्ना वाक्पटु नहीं हैं....राजनेताओं जैसी चिकनी-चुपड़ी बातें कर उन्हें वोट नहीं बटोरना.. वे दिल से बोलते हैं....और मीडिया और विरोधी पक्ष उसके मायने-मतलब निकालने में जुट जाते हैं..

    सिर्फ गाँवों की ही क्यूँ..इन महानगरों की ही बात की जाए...जहाँ कामवाली बाइयों के पति शराब पीकर उन्हें पीटते भी हैं और जी तोड़ मेहनत कर कमाए गए उनके पैसे भी छीन लेते हैं.

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  22. This is a really neatly written article. I will make sure to bookmark it and return to read more of your helpful information. Thank you for the post. I’ll certainly comeback.

    From everything is canvas

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  23. गीत लिखने वाले ने ठीक लिखा है, मतलब निकालने वालों ने भी ठीक मतलब निकाला है। अन्ना का फ़ार्मूला भी ठीक है और इस बात पर अन्ना की खिंचाई करने वाले भी ठीक हैं।
    लिखने वाले, कहने वाले इतना कुछ लिख कह गये हैं कि हर कोई अपने मतलब की बात निकाल ही लेता है।
    अनुराग जी का ये कहना "जिन्होने समाज-सुधार में थोड़ा भी योगदान दिया है वे उनसे तो बेहतर ही हैं जिन्होने कुछ नहीं किया" बिल्कुल ठीक है।
    8 A.M. वाली हमारी ये टिप्पणी पता नहीं ठीक है या नहीं:)

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  24. मेरे एक बहुत ही अच्छे मित्र हैं, बहुत ज्यादा पीते हैं, पर उतने ही स्पष्ट,साफ़ दिल वाले और बेहद ही अच्छे इंसान हैं..
    उन्हें सिगरेट की भी जबरदस्त लत है, खुद ही वो कहते हैं, की अभिषेक जी, ये बड़ा खराब नशा है...नहीं करना चाहिए!!

    बहुत सटीक पोस्ट है...

    @शिखा दी..
    रोकेट छोड़ने के लिए पेप्सी और कोको कोला के बोतल नहीं हैं क्या :P

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  25. गलत गलत है, सही सही है

    दुःख का कारण सिर्फ यही है
    सही गलत है गलत सही है।

    सुख के अपने-अपने चश्में
    दुःख के अपने-अपने नग्में
    दिल ने जब-जब, जो-जो चाहा
    होठों ने वो बात कही है।

    गलत गलत है, सही सही है।
    ......धारदार..असरदार..जोरदार ढंग से आपने अपना पक्ष रखा है।

    अन्ना जब शराबियों को पीटने की बात करते हैं तब मेरी समझ में वो उस पिता के समान होते हैं जो गलत कार्य करने वाले बच्चे को सुधारना जाहता है। पिता का थप्पड़ भी प्यार होता है..आशीर्वाद होता है। यदि ऐसा न होता, उनका यह आचरण गलत होता तो उनके गांव के लोग उन्हें इतना सम्मान न देते। सभी थप्पड़ मार कर सुधारने की हैसियत नहीं रखते। थप्पड़ मारने के लिए पिता या गुरू का स्थान प्राप्त करना पड़ता है। इसके विपरीत.. किसी देश के किसी नागरिक का चुने हुए प्रतिनिधि के साथ इस प्रकार हिंसा का सहारा लेना निंदनीय..दण्डनीय है। लोकतंत्र में हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं है। इसकी निंदा ही की जानी चाहिए।

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  26. मीडिया की छिछली छवि ऐसे ही नहीं बन गई है। किसी बात को किस एंगल से घुमा फिराकर बताया जाय यह वे लोग अच्छी तरह जानते और प्रयोग करते हैं। वे ही क्यों हम भी तो अपने लेखन के जरिये किसी बात को एंगल देने में उस्तादी दिखा जाते हैं :)

    खैर, आपने बहुत सटीक और बढ़िया विवेचन प्रस्तुत किया है इस शराबपंती के बारे में। और सब बातें छोड़ भी दें तो मुझे अन्ना के उद्देश्य में कोई खोट नजर नहीं आता। दोमूहे राजनेताओं से लाख गुना बेहतर हैं अन्ना।

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