October 13, 2011

विरोध के दो तरीके , हमला , और राजनीतिक चालबाजिया - - - - - -mangopeople



                                                             कल एन डी टीवी पर विनोद दुआ प्रशांत भूषण पर हुए हमले की निंदा करते हुए कह रहे हे की विरोध के ये तरीके गलत है आप दूसरों को विचार भिन्नता के कारण पीट नहीं सकते है विरोध के तरीकों का विरोध करते हुए उन्होंने अन्ना और बाबा राम देव की भूख हड़तालो को भी विरोध करने के तरीकों को गलत बताया और कहा की सरकारों पर भीड़ का दबाव डाल कर आप काम नहीं करा सकते है इस तरह से आप दूसरों से अपनी बात नहीं मनवा सकते है | 
                                                       
                                                                 प्रशांत भूषण क्या किसी पर भी वैचारिक भिन्नता के कारण इस तरह हमला करना गलत है |  दूसरे क्या किसी के किसी बयान से आहत हो कर उस पर हमला कर देना उसे सरे आम पीट देना और किसी कानून की मांग के लिए , भ्रष्टाचार के ख़ात्मे और भ्रष्ट व्यवस्था को बदलने के लिए आम जनता द्वारा किसी तरह का आन्दोलन करना या सत्याग्रह करना , सरकार पर दबाव डालने को हम क्या एक श्रेणी का विरोध कह सकते है | मुझे उनकी कोई भी बात समझ नहीं आई जनता के किसी शांतिपूर्ण आन्दोलन को विरोध का गलत तरीका बताना समझ से परे है | क्या ये बुद्धिजीवी टाईप के लोग बताएँगे की यदि जनता को किसी बात का विरोध करना हो तो उसे कौन से तरीके से करना चाहिए | हड़ताल , तोड़ फोड़ सड़क जाम जैसे तरीके गलत है हम सभी उसका विरोध करते है इससे सरकार के साथ आम आदमी को भी परेशानी होती है किंतु यदि किसी स्थान पर लोग शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे है सत्याग्रह कर रहे है तो उसमे क्या बुराई है, क्या जनता वोट दे कर सरकारें बदलने के अलावा कुछ भी नहीं कर सकती है,  वो भी करने के लिए उसे पञ्च साल का इतंजार करना होगा,  क्या तब तक उस सरकारों की हर ज़्यादती सहते रहना चाहिए और हाथ पर हाथ धरे चुपचाप बैठ कर अव्यवस्था को खुद को लुटता हुआ देखते रहना चाहिए | और तब क्या करना चाहिए जब सरकार बनाने वाली हर राजनीतिक पार्टी ही एक जैसी हो और सामान रूप से काम करती हो | तब तो जरुरत व्यवस्था परिवर्तन की ही आ जाती है और इसके लिए एक शांतिपूर्ण सत्याग्रह से अच्छा कौन सा तरीका हो सकता है | क्या उसे हम एक चर्चा के लिए भूखे असभ्य लोगो के हिंसक मार पीट के  तरीके से जोड़ सकते है बिल्कुल भी नहीं |  दुआ जी ये कहने का प्रयास कर रहे थे की जिस तरह अन्ना की टीम ने विरोध के गलत तरीक़े को अपनाया सरकार को ब्लैकमेल किया उस पर दबाव बना कर अपनी बात ज़बरदस्ती मनवाने का काम किया अब वही उनके साथ भी हो रहा है | उनसे भी दूसरे लोग ज़बरदस्ती अपनी बात मनवाने अपनी बात कहलवाने के लिए एक गलत तरीके का प्रयोग कर रहे है  जैसे के साथ तैसा हो रहा है | ऐसी बुद्धिजीवियों की सोच पर तरस ही खाया जा सकता है |
                                                         
                                                                  जहा तक बात प्रशांत भूषण के कश्मीर पर दिए बयान और उन पर हुए हमले की बात है तो ये राज तो अभी काफी अंदर है की पूरा मामला क्या है और शायद ही कभी बाहर आये | क्योंकि कहा नहीं जा सकता है की ये बस एक आम सी बात है या बिल्कुल सोच समझ कर की गई चालबाजी है ताकि अन्ना और उनकी टीम के मुद्दों से ध्यान हटा कर किसी और मुद्दे की तरफ लोगो का ध्यान खीचा जाये भ्रष्टाचार की जगह अन्य मुद्दों पर जनता को बहस करने के लिए मजबूर किया जाये  | ये बात किसी से ज्यादा छुपी नहीं है की प्रशांत भूषण की राय कश्मीर को ले कर क्या है वो अरूंधती के वकील भी है | ऐसे समय पर जब वो अन्ना टीम के बड़े सदस्यों में से एक है उनसे अन्ना के मुद्दे पर सवाल न करके कश्मीर के मसले पर सवाल किया गया क्या ये महज संयोग है ? ये सवाल उनसे ही क्यों किया गया अरविन्द , किरण आदि से ये सवाल क्यों नहीं किये गए ? प्रशांत ने कभी भी कश्मीर को पाकिस्तान को देने की बात नहीं कही किंतु हमलावर बार बार टीवी चैनलों से कह रहा था की उन्होंने कश्मीर पाकिस्तान को देने की बात की इसलिए उन पर हमला किया गया और वो अन्ना टीम के सदस्य है इसलिए ये बयान अन्ना का भी माना जाये या अन्ना से भी कश्मीर पर उनकी राय ली जाये | अन्ना को और उनकी टीम को जानबूझ कर कश्मीर से जोड़ा जा रहा है जिसका कोई मतलब ही नहीं है | 
             
                                                                         अन्ना टीम के कांग्रेस के विरोध में खड़े होने से पूरी कांग्रेस तिलमिलाई हुई है और उसे इसके पीछे आर आर एस , बीजेपी और कांग्रेस विरोधियों की चाल लग रही है और अन्ना टीम के साथ सबसे ज्यादा युवा शक्ति जुड़ीं है और ये सभी कश्मीर को लेकर बड़े संवेदनशील है और युवाओं को कश्मीर का नाम ले कर राष्ट्रवाद के नाम पर बड़ी आसानी से अन्ना टीम के खिलाफ भड़काया जा सकता है उनसे अलग किया जा सकता है | सरकार इस समय बुरी तरीके से भ्रष्टाचार के मुद्दे से घिरी हुई है एक तरफ अन्ना टीम है तो दूसरी तरफ अब तक सोई पड़ी हासिये पर जा चुकी विपक्ष है जो नींद से जाग गई है और मौके का फायदा उठाने के लिए अपने भाग्य से छिका टूटने का इंतजार कर रही है और हर तरफ से परेशान सरकार के लिए लोगो का ध्यान हटाने के लिए इससे अच्छा क्या मुद्दा होगा |
                                                                   इसलिए सभी से निवेदन है की दिखावे पर न जाये अपनी अक्ल लगाये बेकार के मुद्दों पर न उलझ जाये और न ही किसी के खिलाफ कुछ भी कहना शुरू कर दे अन्ना टीम का विरोध करने से पहले ये समझ ले की प्रशांत ने कल एक बात और कही थी की ये सिर्फ और सिर्फ उनका विचार है न की अन्ना टीम का और अन्ना टीम कश्मीर के लिए नहीं भ्रष्टाचार के लिए लड़ रही है और हमें उसी पर ध्यान केन्द्रित करना है |
                                         
                    जम्मू-कश्मीर को बल के ज़रिए देश में रखना हमारे लिए घातक होगा...देश की सारी जनता के लिए घातक होगा...सिर्फ वहां की जनता के लिए नहीं पूरे देश की जनता के हित में नहीं होगा...मेरी राय ये है कि हालात वहां नार्मलाइज़ करने चाहिए...आर्मी को वहां से हटा लेना चाहिए...आर्म्ड फोर्सेज़ स्पेशल पावर एक्ट को खत्म करना चाहिए...और कोशिश ये करनी चाहिए कि वहां की जनता हमारे साथ आए...अगर उसके बाद भी वो हमारे साथ नहीं है...अगर वहां की जनता फिर भी यही कहती है कि वो अलग होना चाहते हैं...मेरी राय ये है कि वहां जनमत संग्रह करा के उन्हें अलग होने देना चाहिए... खुशदीप  जी  के  ब्लॉग  से  लिया  बयान
                                   
                                                      प्रशांत भूषण का वो बयान जो उन्होंने वराणसी में दिया इसे हम इस तरीके से भी देख सकते है--- इस बयान में कभी भी कश्मीर को पाकिस्तान को देने की बात नहीं कही गई है   हा उन्हें आजाद करने की बात कही गई है किन्तु उसके पहले ताकत की जगह प्यार से उनके दिलो को जितने का प्रयास करने के लिए कहा गया उसके बाद भी यदि कश्मीरी अलग होना चाहे तो उन्हें अलग कर देने को कहा गया है वो भी इसलिए क्योकि ये कश्मीर के लिए ही नहीं पूरे देश के लिए घातक होता जा रहा है , वो भी तब जब जनमत संग्रह में बहुमत अलग होने का राय दे | और इस विषय में मेरी राय की हमें जनमत संग्रह की जरुरत ही नहीं है हमें आम लोगो के दिल जीत लेने तक काम करते ही जाना है कूटनीति से राजनीति करने वालो को हरा देना है उसके बाद किसी जनमत संग्रह की या उसे अलग करने की कोई बात ही नहीं बचेगी |


October 11, 2011

जाने वाला चला गया , पीछे छोड़ गये का दुःख - - - - -mangopeople


                                                         दो साल पहले की ही बात है शायद २००९ की जब अखबार में एक खबर पढ़ी थी की चित्रा सिंह के पहले पति से हुई बेटी  ने आत्महत्या कर ली, पढ़ कर चित्रा सिंह के लिए बहुत दुःख हुआ ,  अपनी संतान खोने का ये दूसरा दुःख था उनके लिए | इसके पहले वो अपने बेटे को एक सड़क दुर्घटना में खो चुकी थी और वो दुःख इतना बड़ा था उनके लिए की उन्होंने गाना गाना ही छोड़ दिया | उसके बाद एक और संतान की फिर से आकाल मृत्यु एक माँ के लिए असहनीय जैसा होगा | इस बात से फर्क नहीं पड़ता की बच्चों की आयु क्या थी माँ के लिए उसके बच्चे बस बच्चे होते है |  पति देव से उनके दुख की चर्चा करते हुए कहा था की ये दुख उनके लिए बर्दाश्त करना  बड़ा मुश्किल होगा अब तो उनकी दोनों ही संताने चली गई , अब एक ही सहारा है उनके पास जीने के लिए जगजीत सिंह और अब जो दुःख जगजीत सिंह के इस तरह अचानक चले जाने से उन्हें हो रहा होगा हम उसका अंदाजा लगा सकते है |
                                                                       कुछ समय पहले लता जी के जन्मदिन पर उनका एक साक्षात्कार देखा जिसमे वो बता रही थी की संगीत के लिए अपने जुनून के कारण कभी उन्हें अपने अविवाहित होने को "मिस" नहीं किया | कहते है संगीत आप को कई दुखों परेशानियों और तनाव से बाहर निकालने का काम करता है किंतु चित्रा सिंह ने तो उससे ही परहेज का लिया था | मुझे लगता है की यदि वो गाना गा रही होती संगीत से जुड़ीं होती तो निश्चित रूप से वो उन्हें उनके दुख से बाहर निकालने का काम करता उन्हें जीने का हौसला देता किंतु उन्होंने उससे ही मुंह मोड़ लिया | देखा है मैंने कई बार महिलाओ को किसी क़रीबी अपने के जाने के बाद सारे सुख आनंद को त्याग करते और अपने दुखों को पालते हुए उन्हें अपने सिने से लगा हर समय जिंदा रखे हुए | मेरी परिचित थी उनका जवान विवाहित बेटे की दुर्घटना में मौत हो गई इधर बहु ने अपने सारे श्रृंगार त्यागा उधर उन्होंने भी सब त्याग दिया बस एक सिंदूर ही धारण करती थी | सब उनकी वाह वाह करते थे पर मुझे वो अच्छा नहीं लगता था लगा की जैसे वो अपने दुख को हर समय जिंदा और अपने सामने रखना चाहती है न केवल अपना बल्कि अपनी बहु और उसकी एक मात्र बेटी के भी दुखों को | क्या अच्छा ये नहीं होता की वो अपना क्या अपनी बहु का भी श्रृंगार त्यागने न देती बस सिंदूर और बिझिया जैसे विवाहित होने की निशानियो को ही छोड़ देती ,  उसे भी जीने का हौसला देती और अपने भी एकलौते पुत्र के मौत को भुलाने का प्रयास करती और पोती को भी एक खुश हाल जीवन देती | आखिर क्यों महिलाएँ अपने दुखों को संजो कर रखती है,  क्यों नहीं उसे छोड़ देती है |
 चित्रा सिंह ने भी  वही किया, किसी कलाकार के लिए उसका कला ही उसको सबसे ज्यादा आनंद देता है जो उसे दुनिया के तकलीफों परेशानियों से उबरता है उनसे दूर करता है और उन्होंने उससे ही छोड़ दिया | कभी सोचती हुं की जगजीत सिंह ने उनसे फिर से गाने को नहीं कहा होगा, शायद कहा होगा हो सकता है कई बार मनाया भी होगा,  पता नहीं वो मना नहीं पाए या वो मानना ही नहीं चाहती थी | पुरुष के साथ मजबूरी है कई बार अर्थोपार्जन की तो कई बार दुनियादारी की की वो दुःख को कुछ समय जीता है फिर उसके आगे निकल जाता है या उसे हर समय याद नहीं रखता दिल के कोने में छुपा कर रखता है | एक जगह चित्रा सिंह का साक्षात्कार पढ़ा जहा उन्होंने कहा की जगजीत सिंह का दुख भले न दिखता हो पर वो भी काफी दुखी थे बेटे के जाने से और कई बार रात में उठ कर रियाज़ करने लगते थे | वही संगीत उनका जुनून जिसने उनका साथ दिया उस दुःख तकलीफ़ से बाहर आने में उससे लड़ने में पर चित्र सिंह वो नहीं कर पाई या नहीं करना चाहा |
                                                 जिस दिन सुना की जगजीत सिंह ब्रेन हैमरेज के कारण अस्पताल में वेंटिलेटर पर है , ( ब्रेन हैमरेज और वेंटिलेटर इन दो शब्दों से अच्छे से परिचित हूँ दो अपनों को खोया है इन शब्दों के साथ )  समझ गई की अब वो वापस घर नहीं आयेंगे | उसी समय ज्यादा दुख चित्रा सिंह के लिए हो रहा था | दो दिन पहले ही अपनी एक रिश्ते की मौसी के दुखद मृत्यु की खबर मिली थी | पता चला की तीन महीने पहले ही मौसा जी की कैंसर से मृत्यु हो गई थी तब से ही बिलकुल मानसिक संतुलन खो बैठी थी खुद का कोई होश ही नहीं था अपनी आवश्यक जरूरते भी वो खुद से नहीं कर पा रही थी | कारण था मौसा जी से उनका बेहद लगाव क्योंकि दोनों लोगो को कोई संतान नहीं थी और जीवन में लगभग ५० वर्ष दोनों ने बस एक दूसरे के सहारे एक दूसरे के साथ जी कर ही बिताये थे | भाई के बच्चे को अपने बच्चे की तरह पाला किंतु बड़ा होते ही वो उन्हें छोड़ लड़ झगड़ अपने माँ बाप के पास चला गया | आ कर किसी ख़ुशी का चला जाना दुख को कई गुना बढ़ा देता है इस दुख ने दोनों को और भी करीब ला दिया था ,  दोनों में से किसी एक का जाना वही हाल करता जो अंत में मौसी का हुआ , वो तीन महीने भी उस दुःख को बर्दाश्त नहीं कर पाई | अपने आप को संभालने के लिए किसी को उन्होंने मौक ही नहीं दिया समय ही नहीं दिया |

                                                जाने वाला तो चला गया खुद को सभी तकलीफों तनावों से आज़ाद कर गया , किंतु  जिसे पीछे छोड़ गया है उसके दुख को सहने के लिए जो पहले ही जीवन से निराश हो चला हो उसके बारे में सोच एक चिंता सी होने लगती है | बार बार मन में ख्याल आ रहा है की क्या हालत होगी उनकी क्योंकि जगजीत सिंह की मृत्यु भी आकाल मृत्यु है , जिसके बारे में किसी ने सोचा भी नहीं था उनके लिए एक बड़ा झटका है | बस उम्मीद करती हूँ  की आज जो भी उनके आस पास होगा उन्हें अच्छे से हौसला दे रहा होगा इस दुख से उन्हें उबरने में मदद कर रहा होगा उन्हें अच्छे से संभाल रहा होगा |
                                            

October 07, 2011

आलोचना ,विपरीत विचार, असहमति या खिंचाई इसका फर्क ब्लॉगर को समझना चाहिए - - - - -mangopeople

                   



                                       ब्लॉग जगत में इस बात को ले कर कई बार बहस हो चुकी है की लोगो को अपनी आलोचना बर्दाश्त नहीं होती है लोग आलोचनात्मक टिप्पणियों को पचा नहीं पाते है अक्सर उन्हें या तो प्रकाशित नहीं किया जाता या फिर हटा दिया जाता है | कई बार तो लोग आलोचनात्मक टिप्पणी करने वाले को ही भला बुरा कहने लगते है | किंतु क्या कभी किसी ने इस बात पर भी ध्यान दिया है की आलोचना है किस बला का नाम क्योंकि यहाँ तो यदि कोई आप की बात से असहमत हो जाये या आप की विचारों के विपरीत विचार रख दे,  जो उसके अपने है तो लोग उसे भी अपनी आलोचना के तौर पर देखने लगते है , जबकि वास्तव में कई बार ऐसा नहीं होता है है कि दूसरा ब्लॉगर आप को कोई टिप्पणी दे रहा है जो आप के विचारों से मेल नहीं खा रहा है तो वो आप की आलोचना ही करना चाह रहा है | कई बार इसका कारण ये होता है की वो बस उस विषय में अपने विचार रख रहा है जो संभव है की आप के सोच से मेल न खाता हो , कई बार सिक्के का दूसरा पहलू भी दिखाने का प्रयास किया जाता है | इसका कारण ये है की अक्सर हम अपनी पोस्टो में वो लिखते है जो हमारे विचार है जो हमने अपने आस पास घटते देखा है या हमने किसी चीज के बस एक ही पहलू का देखा है और वही पोस्ट में लिख दिया,  परिणाम स्वरूप पाठक बस विषय के उसी रूप को देख कर अपने विचार रखने लगते है ,  जबकि कुछ विषयों में सिक्के का दूसरा पहलू भी होता है जो हो सकता है जाने अनजाने में लेखक नहीं लिख सका  | दूसरे ब्लॉगर कई बार ऐसी जगहों पर सिक्के का दूसरा पहलू भी वहा टिप्पणी के रूप में दे देते है ताकि अन्य पाठक दोनों बातों को समझ ले फिर अपने विचार रखे संभव है की दोनों पहलुओं को देख कर पाठक अपना सही विचार बना सके भले टिप्पणी में वो लेखक की "वाह वाह"  करके चले जाये  |  हमारे जो भी विचार या सोच होती है वो एक दिन में नहीं बनती है कई बार उसे बनने में सालों लगते है और उसके लिए जिम्मेदार होते है हमारा परिवेस जिसमे हम बड़े होते है,  उसमे उन लोगो के विचार और व्यवहार का भी मिश्रण होता है जो हमारे आस पास होते है , और हम वही लिखते है जो हम देखते है किंतु इसका ये अर्थ नहीं होता की जो हमने देखा नहीं जो हमने सोचा नहीं वो है ही नहीं और यदि  किसी ने वो पहलू हमारे सामने रख दिया तो वो हमारी आलोचना कर रहा है या हमारी खिचाई कर रहा है | मैं ऐसा नहीं मानती की ये कही से भी आप की आलोचना है इसलिए कई पोस्टो पर मैं विषय के दूसरे रूपों को टिप्पणी के रूप में देती आई हूँ | 
                                              
                                               उसी तरह असहमतियो को भी अपनी आलोचना के तौर पर देख लिया जाता है | किसी के विचारों से असहमत होना कई बार उसकी आलोचना करना नहीं होता है बल्कि हम जब उन विषयों को खुद के तर्क की कसौटी पर कसते है और वो हमें सही नहीं लगता है तो हम लेखक से असहमत हो जाते है किंतु इसके ये अर्थ नहीं है  कि लेखक के विचार गलत ही है,  उसने विषय को अपनी नजर से अपने तर्क से देखा है और दूसरे ने अपनी विचार और तर्क से और एक ही विषय में दो लोगो के दो विचार हो सकते है जो दोनों ही अपनी जगह सही भी हो सकते है और उन विचारों को रखना कही से भी दूसरे की आलोचना करना नहीं होता है | हिंदी ब्लॉग जगत में ज्यादातर जगह टिप्पणियों के लेने देने का खेल होता है लोग अक्सर लेखक के विचारों से अपने विचार मेल न खाने के बाद भी "वाह वाह" "बहुत अच्छा लिखा"  लिख कर चले जाते है , कुछ के पास समय नहीं होता और वो बहुतों को पढ़ना चाहते है सो एक लाइन की भी टिप्पणी दे कर चले जाते है | किंतु कुछ ब्लागरो के लिए हिंदी ब्लॉग इन सब से अलग भी बहुत कुछ है जो टिप्पणी टिप्पणी खेलने की जगह इसे  विचारों के आदान प्रदान की जगह मानते है और जो पढ़ते है उस पर अपने निजी सोच अवश्य रखते है वो लेखक के विचारों से मेल भी खा सकता है और नहीं भी ,  पर ये ज़रुरी नहीं है की उसमे टिप्पणी कर्ता लेखक की आलोचना ही करना चाह रहा है | आलोचना, असहमति, विपरीत विचार और खुद की खिंचाई का फर्क लोगो को समझना चाहिए और जिस तरह लोग ये कहते है की हम आलोचना का स्वागत करते है तो उन्हें ये भी समझना चाहिए की हर बार आप की आलोचना नहीं की जा रही है दूसरे के विपरीत विचारों को भी एक विचार की तरह सम्मान से देखना चाहिए न की हर बार उसे अपनी आलोचना समझ कर उसके प्रति कोई ये विचार बना लेने चाहिए की फला मेरा आलोचक है या वो हर बार मेरी खिंचाई कर के जाता है | इस तरह के विचार उन ब्लोगरो के लिए ठीक नहीं है जो हिंदी ब्लॉग जगत को एक स्वस्थ बहस,  एक विचारों के आदान प्रदान की जगह मानते है इस तरह तो निश्चित रूप से वो आप के भी ब्लॉग पर अपने विचार खुल कर रखना छोड़ देंगे | वैसे ये भी संभव है की कुछ लोग हिंदी ब्लॉग जगत में  अपने विचार रखने अपने विचार दूसरों के साथ बांटने भर आये है वो इस तरह के किसी भी संवाद विचार विमर्श या बहस का हिस्सा नहीं बनाना चाहते है या उनके पास ये सब करने का समय ही नहीं है |  जिन ब्लोगरो को ये पसंद नहीं है जो नहीं चाहते की इस तरह का कोई भी काम उनके ब्लॉग पर हो तो उन्हें खुल कर ये कह देना चाहिए की उन्हें इस तरह की टिप्पणियों की आवश्यकता नहीं है और वो इस तरह का कोई संवाद कायम नहीं करना चाहते है जब तक आप कहेंगे नहीं तब तक मुझे नहीं लगता ही की किसी को भी आप के विचार इस सम्बन्ध में पता चलेगा इसलिए दूसरा बेचारा ब्लॉगर तो अपनी इच्छा का करता ही जायेगा और आप को बुरा भी लगता जायेगा अच्छा है की उसे समय रहते उसे बता दे और सबसे अच्छा तरीका तो होता है टिप्पणी बाँक्स के ऊपर साफ लिख दे की कैसी टिप्पणियाँ आप को चाहिए |
                                                              
                                                         ये सच है की हिंदी ब्लॉग जगत में ऐसे कई लोग है जो किसी को निशाना बना कर हर बार उसकी आलोचना ही करते है , या कुछ ऐसे भी है जो बस आलोचना करने के लिए ही किसी किसी के ब्लॉग पर जाते है या जानबूझ कर आप की आलोचना करते है या आप की टाँग खिचाई करते है या आप को अपमानित करते है ऐसे लोगों के होने से इनकार नहीं क्या जा सकता है लेकिन सभी में फर्क करना तो ब्लॉग स्वामी का काम है और ये बात उसे ही समझनी होगी की कौन टिप्पणी के रूप में क्या लिख कर जा रहा है और उसका क्या इरादा है | पर ये फर्क टिप्पणी की भाषा से आसानी से पहचानी जा सकती है आलोचना करने वाले की भाषा तीखी व्यंग्य करती होगी और विपरीत  विचार वाली बात बस सीधे शब्दों में अपनी बात कहने वाली होगी पर इसका अंतर कारण तो ब्लॉग स्वामी को ही होगा यदि ब्लॉगर ये करने में असमर्थ होते है तो ये कही से भी हिंदी ब्लॉग जगत के लिए ठीक नहीं है फिर ये भी अपने मान की भड़ास निकालने की जगह भर बन कर रहा जाएगी जहा सभी अपनी अपनी ढपली अपना अपना राग छेड़ रहे होंगे और कुछ भी सार्थक निकाल कर यहाँ से नहीं आयेगा |


                                                                        अपनी कहूँ तो मैं स्वयं ये कई जगह ऐसा करती आई हूँ बिना ये सोचे की मेरी टिप्पणियों को ब्लॉग स्वामी अपनी आलोचना या अपनी खिचाई के रूप में ले रहा है | एक ब्लॉगर ने इस बारे में मुझे मना किया था की उसे ऐसी टिप्पणियाँ नहीं चाहिए तो मैंने उन्हें टिप्पणी देना बंद कर दिया क्योंकि ये ब्लॉग स्वामी का अधिकार है की वो बताये की उसे कैसी टिप्पणियाँ चाहिए | अत: किसी अन्य को मेरे टिप्पणी देने का तरीका पसंद ना हो तो खुल कर कह दे क्योंकि बिना कहे मुझे कुछ सुनाई नहीं देता है और जब तक कोई कहेगा नहीं मैं अपना तरीका बदल नहीं सकती हूँ  :) 
 

October 04, 2011

उपवास -२ ( खबरों की बाढ़ , उससे होते फायदे नुकसान और फ़िल्टर करने की आवश्यकता ) - - - - - - - -mangopeople

                                                                                 समय बदला और हमारे सामने आया टीवी और इसने हमें दिखाना शुरू किया दुनिया की हलचल,  वो भी घर बैठे और अब ये हालत है की केवल अपनों की ही क्यों आज तो हम देश दुनिया की खबर जानने के लिए भी हमेशा उत्सुक रहते है और इसके लिए सबसे अच्छा माध्यम बना टीवी | आज के समय में शायद ही कोई घर होगा जहा टीवी की पहुँच नहीं होगी जो हमें दुनिया के लगभग हर खबर से जोड़े रखता है किंतु जब टीवी नहीं था तब लोग कैसे खबरों से जुड़े रहते थे शायद तब उतनी दूर तक की खबरों में लोगो की उतनी दिलचस्पी नहीं होती होगी जितनी अब है | आज जितनी ख़बरे लोगो को मिलती है लोगो में उतनी ज्यादा उत्सुकता बढ़ती जाती है और जब नहीं मिलती थी तो बस क़िस्से कहानियाँ होती थी और लोग उसे ही सच मानते थे | कोई व्यापारी या कोई विदेश घूम कर आया जो कह देता वही सच हो जाता | वैसे तो हमारे देश में एक समय तो समुद्र पार जाना ही पाप माना जाता था तो फिर वहा की खबरों में लोगो की कितनी रूचि होगी ये समझा जा सकता है | एक समय बाद अखबार तो आ गया था किंतु लम्बे समय तक उसमे भी राजनीतिक ख़बरे और स्थानीय अपराध की ख़बरे ही ज्यादा होती थी देश के हर कोने की खबर उसमे भी कम से कम तुरंत तो नहीं ही होती थी फिर दूसरे देश की खबरों की तो बात ही क्या,  कोई बहुत बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम हो जाये तब ही शायद अखबारों में छपता होगा | वैसे तब भी सभी के घरों में अखबार नहीं आता था और बहुत सारे लोग तो पान,चाय  की दुकान पर अखबार पढ़ने ही जाते थे ( और कुछ तो इसके लिए भी पड़ोसियों के घर जाते थे ) यही कारण था की पान और चाय की दुकानों पर काफी राजनीतिक बहस बाजिया और चिन्तन होता था और कई बार लोग उन्ही के आधार पर किसी राजनीतिक दल और घटनाक्रम के प्रति अपनी राय भी बनाते थे,  राजनीतिक सामाजिक विचारको, चिंतको का अड्डा होता था चाय पान की ये दुकानें  | धीरे धीरे अखबारों के पन्ने बढ़ते रहे और खबरे भी किन्तु तब भी उसने लोगो के बिच खबरों की वो भूख नहीं पैदा की जो अब है |  उसके बाद दूर दर्शन का जमाना आया कहने के लिए वो था तो वीडियो दिखाने के लिए,  पर समाचारों में वहा प्रधानमंत्री और सरकारी कार्यक्रमों के अलावा शायद ही कोई अन्य वीडियो दिखाया जाता हो, यानि समाचार दिखाया नहीं सुनाया जाता था  और समाचार भी दिखाने का एक निश्चित समय होता था,  आज की तरह नहीं की अपनी सुविधानुसार जब समय मिला तब टीवी खोला और समाचार देख लिया | तब उन समाचारों में ज्यादा रूचि  पुरुषों की ही होती थी (वैसे अक्सर वो महिलाओ के रसोई में होने का समय होता था | ) हा उससे एक फायदा तो था वो ये की भारत की एक बड़ी निरक्षर जनता भी समाचारों को बिना किसी परेशानी और किसी और के सहयोग से जान सकती थी किंतु वो भी सरकारी भोपू  से ज्यादा कभी कुछ नहीं बन सका आज भी उसका वही हाल है |

                                        उसके बाद आया निजी समाचार चैनलों का जमाना और तब तक तो दुनिया से हमारी दूरी लगभग ख़त्म जैसी हो गई,  अब ख़बरे सिर्फ देश नहीं देश के बाहर दुनिया हर कोने  की जानकारी हम तक आने लगी  थी और हम उसे ग्रहण करने के लिए भी तैयार थे हमारी जिज्ञासा और रूचि भी थी उन्हें जानने में  और ये इच्छा केवल युवाओं में ही नहीं है | मुझे याद है मदर टेरेसा की पहली पुण्यतिथि थी तो मेरी दादी ने कहा की एक हफ्ते बाद प्रिंसेस डायना की भी पुण्यतिथि आयेगी मुझे आश्चर्य हुआ की मेरी दादी न केवल दोनों लोगो को जान रही है बल्कि एक साल पहले हुए उनकी मृत्यु भी उन्हें याद है , अभी मार्च में कजन की शादी में गई थी हम सभी बारात में मस्त थे और ताऊ चाचा लोगो में किसी और ही बात पर चर्चा चल रही थी तो पता चला की जापान में भूकंप और सुनामी आ गया जैसे जैसे लोग देर से आ रहे थे वो भी चर्चा में शामिल होते जा रहे थे और नई खबरों को उसमे जोड़ते जा रहे थे जो वो टीवी पर देख कर आ रहे थे |  मतलब ये की न केवल अब सभी तरह के लोग हर तरह की खबरों से जुड़ना चाह रहे है बल्कि उसको याद भी रखते है और अपडेट भी करते रहते है | लोग ओबामा में रूचि तो लेते है साथ की क्लिंटन की प्रेम कहानियो की भी खबर में भी रूचि लेते है , क्रिकेट के देश में टाइगर वुड्स को जानने वाले भी कम नहीं है और उनके निजी जीवन को रस ले कर जानने वालो की भी कमी नहीं है | हर तरह की जानकारियों की बाढ़ आ रही है |  कोई केवल अपनी पसंद की खबरों को देखता है तो कोई हर खबर पर नजर रखता है तो कोई बस सरसरी नजर से ही देख लेता है पर हा देखते सभी है | वजह भी है समय के साथ सब बदल गया , पहले कहा जाता था जिस गांव जाना नहीं उसका रास्ता क्या पूछना अब तो न केवल हर गांव का रास्ता जानने की इच्छा सभी में होती है बल्कि लोग उससे जुड़ी हर खबर तक पहुँचना चाहते है विश्वास न हो तो बताइये कितने लोग रालेगण सिद्धि को लोक पाल आन्दोलन के पहले जानते थे |
                                                   
                                         ये ख़बरे बस मनोरंजन, ज्ञान और जानकारी भर नहीं है,  कई बार तुरंत मिल रही ख़बरे आप को सावधान भी करती है मुझे याद है कुछ साल पहले जब मुंबई में २६ जुलाई को बाढ़ आई थो तो पति और समर ट्रेनिग के लिए दो महीने के लिए आया छोटा भाई दोनों ही आफिस में फंस गए थे तो मैंने उन्हें टीवी पर देख कर बताया की पूरे शहर का कितना बुरा हाल है और वो लोग आफिस में ही रहे बाहर निकालने का प्रयास न करे वो लोग वही ज्यादा सुरक्षित है  उसी तरह ज्यादातर ब्लास्ट की खबरे टीवी पर देख तुरंत पतिदेव को सावधान करती हूँ  की आते जाते समय संभल कर रहे भले देर से घर आये और कई बार कही दूर घट रही खबर हमारे अगले कदम के लिए हमें सावधान करती है  जैसे अभी हाल में ही सिक्किम में आये भूकंप ने मौका दे दिया ये जानने का की पतिदेव को भूकंप के समय क्या करना चाहिए इस बारे में कोई जानकारी नहीं है, उन्हें अच्छे से समझाया की क्या क्या उपाय तुरंत करके हम बचने का प्रयास कर सकते है ( बचे न बचे बाद की बात है बचने का प्रयास कैसे किया जाये ये तो पता ही होना चाहिए )  और दो रातों तक तो मैं खुद रात के कपड़े न पहन कर पूरे कपड़े पहन और सिरहाने एक शॉल रख सोती थी ( ऐसी आपदाओं में व्यक्ति यदि बच जाये तो उसके तन के कपड़े ही उसके पास बचते है और शॉल बेटी के लिए था कही आपदा के बाद मौसम ठंडा हो गया तो )  पहले दिन तो पति देव मेरे डरने पर हँसने लगे जब अगले ही दिन उन्हें पता चला की सिक्किम से चला भूकम्प  महाराष्ट्र में भी आ गया तब जा कर मेरे डर को सही समझा | ( सच कहूं तो बच्चे के जीवन में आते ही आप कही ज्यादा सतर्क और हर चीज के प्रति आप  जरुरत के ज्यादा सावधान हो जाते है सारी तैयारी इसी डर का नतीजा थी शुक्र है तैयारी को आजमाने की जरुरत अभी तक नहीं पड़ी उम्मीद है की आगे भी न पड़े | )
                                              
                                                       अब तो ये हाल है की खबरों और खबर पहुँचने वाले चैनलों का स्थान लोकतंत्र में चौथे खम्भे से आगे बढ़ता जा रहा है | अन्ना आन्दोलन उसका प्रत्यक्ष उदाहरन है , फिर जेसिका केस हो या रुचिका केस कितने ही मामलों में मिडिया ने लोकतंत्र के दूसरे खम्बो के सही काम न करने पर उन्हें अपना काम सही से करने के लिए मजबूर किया है |  वो चाहे तो मिल कर आप के प्रति हवा बना दे और चाहे तो आप को उठा कर मिट्टी में मिला दे | इसके अपने फायदे भी है और नुकसान भी क्योंकि आज भी लोगो में खबरों को फ़िल्टर करने की आदत नहीं है लोग खबरों को जस का तस स्वीकार कर रहे है बिना अपना दिमाग लगाये और जिसके कारण कई बार इसके नुकसान भी सामने आये है | इसलिए जरूरी ये भी है की जहा इतनी तेजी से ख़बरे आ रही है और हम उसे ग्रहण कर रहे है तो खबरों को जाँचना परखना भी हमें शुरू कर देना चाहिए | प्रायोजित ख़बरे ,  निजी दुश्मनी के कारण ख़बरे ,  सरकार के दबाव में दिखाई जा रही ख़बरे , चैनल की अपनी निजी विचारधारा की ख़बरे , और किसी एक राजनीतिक व्यक्ति या उससे जुड़े लोगो द्वारा चलाये जा रहे चैनल की ख़बरे सब तरह की ख़बरे घूम रही है हम सभी को उनमें से हर खबर को फ़िल्टर करके ही अपने दिमाग में संग्रहित करना चाहिए न की जस की तस नहीं तो होगा ये की ये ख़बरे जी का जंजाल बन जाएगी और हमें फायदा पहुचने की जगह हमें नुकसान पहुँचाने लगेगी |
                   

                                                                 पर टीवी के आने के बाद भी ख़बरे एक तरफ़ा ही थी,  यानि हम उन्हें सुन तो रहे थे पर उस पर कोई अपनी प्रतिक्रिया नहीं दे पा रहे थे दुनिया भर के लोगो के बारे में   जान तो रहे थे किंतु उनसे सीधे जुड़ नहीं रहे थे और तब आया इंटरनेट का जमाना जिसमे सब कुछ दो तरफ़ा कर दिया |
         क्रमशः



              

October 03, 2011

सूचना क्रांति के इस दौर में एक अलग तरह का उपवास - - - - - - -mangopeople



खाना खाता लड़का :- आज से मेरा उपवास है |
दूसरा व्यक्ति :- ये कैसा उपवास तुम तो खाना खा रहे हो |
लड़का :-ये उपवास आज के ज़माने का है , टीवी मोबाईल फेसबुक ब्लॉग ट्विटर नेट सब बंद सब से उपवास |

                                                        कुछ समय पहले जब ये चुटकुला पढ़ कर मुस्कराई थी तो ये नहीं सोचा था की जल्द ही ये उपवास मुझे भी ज़बरदस्ती लेना पड़ेगा | सूचना क्रांति के जिस दौर में हम जी रहे है उसमे हमें आदत हो गई है हर पल किसी न किसी सूचना खबर  को सुनने की या ये जानने की दुनिया में कहा क्या घट रहा है और यदि कुछ खास हो रहा हो तो पल पल की  खबरों तक पहुँचने की ललक और बढ़ जाती है |  इस  दौर में यदि हम सूचना के सभी मध्यम से अचानक से कट जाये तो जीवन कितना दुस्कर हो जायेगा,  यदि आप किसी काम में व्यस्त है तब तो ठीक है किंतु यदि करने के लिए कुछ खास नहीं है तो  कितना ख़ालीपन आ जाता है जीवन में ये अभी हाल ही में एहसास हुआ |
                                   अन्ना का उपवास ख़त्म होते ही परिवार समेत घूमने के लिए निकल गई और घूमने के दौरान न तो इतना समय होता है और न ही घूमने के बाद होटल आने पर इतनी शक्ति और इच्छा की देखा जाये की बाकी दिन दुनिया में क्या हो रहा है,  तो सूचनाओं से भी एक तरह की छुट्टी ही थी क्योंकि किसी से ज़रुरी होने पर ही फोन किया जाता है और टेलीग्राम की तरह कम से कम शब्दों या ये कहे की समय में बात ख़त्म कर ली जाती है ( कई बार तो बार बार यही कहने में ही कितना समय निकल जाता है की अभी मैं बाहर हूँ रोमिंग पर हूँ आ कर बात करती हूँ विस्तार में ) जब ये हाल हो  तो तो नेट से किसी तरह के जुड़ाव का सवाल ही कहा होता है | घूम कर जब हर तरह की खबरों की भूख लिया घर आ कर टीवी आन किया तो पता चला की वो तो सो रहा है और फिलहाल उठने का उसका कोई मूड नहीं है | अखबार उठाया और  टाइम्स ऑफ़ इंडिया की खुरचन नव भारत टाइम्स को  पढ़ कर ही संतोष किया गया |    दूसरा नंबर फोन का था , वहा भी कई दिनों से अच्छे से ( अच्छे से का मतलब कम से कम २०- २५ मिनट ) बात नहीं हुई थी , तो घर से भी काफी सूचनाये खबरों की उम्मीद थी जो वही रोमिंग वाले चक्कर के कारण नहीं पता चल रही थी |  वहा फोन किया तो पता चला की हमारे मोबाईल ने अपने नाम के अनुरूप काम कर रहा था "मेरा टेलीफ़ोन नहीं लगता" MTNL  सो नहीं लगा  | अब सूचना और सहारे के लिए नेट बचा था ब्लॉग जगत से जुड़ने के लिए खबरों के लिए और घर से भी जुड़ने के लिए चैट पर तो घंटो बाते हो जाती है चैट से बहनों  से सैकेंड हैण्ड खबर से संतोष करना पड़ा साथ ही वहा पहले से ही एक मेल पड़ा था की दो दिन बाद नेट में समस्या आ सकती है क्योंकि कंपनी अप ग्रेट का काम करने वाली है सो अग्रिम खेद है | इस बिच इंटरनेट आता जाता रहा टीवी वाला भी आता और बताता रहा की ये ख़राब है वो ख़राब है और फोन पर हर रोज दो तीन बार कॉल आता पर पूछा जाता की आप की शिकायत दूर हो गई पर शिकायत दूर नहीं हुई |
                                          पर इस बिच एक बात का चिन्तन हुआ की आखिर पहले लोग खबरों से कैसे जुड़े रहते थे दूर रह रहे अपनों की खबर उन्हें कैसे लगती थी, फोन तो किसी किसी के ही घर होता था और पत्र तो हाल चाल जानने का ज़रिया था किंतु जब तुरंत कोई खबर पहुँचानी हो तब , तब लोग किन साधनों का उपयोग करते थे | कुछ लोग पड़ोसियों का फोन नंबर आपात काल के लिए अपनों को दे कर रखते थे ( हमारे घर बहुतों का फोन तब के ज़माने में आता था कुछ को मैसेज पहुंचा दिया जाता था तो कोई कुछ देर बाद फिर से फोन करता हूँ कह अपने परिवार वालो को बुलाने को कहता था | हमरे पड़ोसी की बेटी का विवाह अमेरिका में हुआ था तो उन्हें बुलाना पड़ता था  ) किंतु कभी कभी तो पूरे मोहल्ले में ही कोई फोन नहीं होता था, तब क्या करते थे , क्या तब लोगो में अपनों की हर खबर जानने की इच्छा नहीं होती थी और  या जानने की सुविधा नहीं थी इसलिए वो कुछ कर ही नहीं पाते थे | आज हम भाई बहन सभी एक दूसरे से काफी दूर रहते है दूसरे रिश्तेदारों से भी काफी दूर है किंतु ऐसी कोई भी खबर नहीं है जो हम सभी को पता नहीं होती,  फोन से लगभग हर दिन हम एक दूसरे से जुड़े रहते है बात करते रहते है जिससे कई बार खुद के सभी से दूर होने का एहसास ही नहीं होता है | आज भी पहले की तरह ही मम्मी पापा हम सभी से हर बात के लिए सलाह मशवरा करते है | कभी सोचती हूँ की जो ये सस्ती फोन सुविधा न होती तो शायद हम जैसो का जीना ही मुहाल होता जो अपने अपनों से इतनी दूर रहते है | संभव है की इसी कारण से पहले के ज़माने में बेटियों का विवाह होने के बाद वो अपने घरों से इस तरह से नहीं जुड़ीं रह पाती जैसे की हम है और धीरे धीरे अपने माँ बाप परिवार से दूर हो जाती है | आज घर में किसी विवाह की तैयारी हो रही हो या कोई बीमार हो हमें हर पल की खबर मिलती रहती है , शायद उस ज़माने में बहनों का अपने घर में किसी भी विवाह या दुख की खबर तब मिलती होगी जब उनके पास विवाह का निमंत्रण या तेरही का निमंत्रण मिलता होगा और कई बार तो शायद दूर रहने वाले बेटा बेटी अंत समय में अपने करीबियों को देख भी नहीं पाते होंगे , और छोटी बड़ी ख़ुशियों की तो बात ही क्या की जाये | तुरंत खबर देने के लिए टेलीग्राम होता था जो अक्सर दो चार लाइनों का होता था और शायद उसे बुरे समाचार की निशानी ही तब ज्यादा माना जाता होगा क्योंकि उसे किसी आपात काल में ही भेजा जाने की परंपरा रही थी ( इस बात के लिए तो कितने चुटकुले भी प्रचलित थे )   पर उसका हाल भी तब बहुत अच्छा नही था | मेरे पति ने लगभग तीस साल पहले का अपना अनुभव बताया की उनका आधा परिवार गांव में और आधा मुम्बई में रहता था उनकी माँ की अकस्मात मृत्यु हो गई सुबह उनका दाह संस्कार मुंबई में ही कर दिया गया और बाकी के काम के लिए सभी लोग गांव के लिए उसी दिन दोपहर में निकल गये, जाने से पहले गांव में टेलीग्राम कर दिया गया की माँ के साथ ऐसा हो गया है हम लोग सभी आ रहे है |  २७ घंटे का सफ़र कर जब गांव पहुंचे तो पता चला की तब तक उन लोगो को टेलीग्राम मिला ही नहीं था और गांव में किसी को कुछ भी पता ही नहीं था ,  उनके पहुँचने के आधे घंटे बाद टेलीग्राम वहा आया |  इस तरह की बाते बड़ी कष्टप्रद लगती है और शायद यही कारण है की लोग बेटी का विवाह भले दूर कर देते थे पर बेटों को काम के लिए बाहर नहीं जाने देना चाहते थे | ख़ुशी आदि की खबर तो पत्रों से दिया जाता था जो पहुँचने में कभी कभी महिना भर भी लग जाता था और उसका जवाब आते आते एक और महिना  | करीब नौ साल पहले मेरे मित्र ने मुझे पत्र लिखा तब हम लोग नेट से नहीं जुड़े थे वाराणसी शहर से चला पत्र मुंबई में मुझे एक महीने बाद मिला , तो सोचिये की आज के ज़माने में ये हाल है तो भारतीय डाक व्यवस्था का उस ज़माने में क्या हाल रहा होगा पत्रों के मामले में | एक किस्सा पढ़ा था की अकबर इलाहाबादी की पत्नी बीमार पड़ी पति को पत्र लिखा की तबियत ख़राब थी अब बेहतर महसूस कर रही हूँ जब उन्हें पत्र मिला तो हाल ये था कि उन्हें लिखना पड़ा की " उनके चालीसवे से हम आ रहे है और वो कहते है की बीमार का हाल अच्छा है " | फिर दूर की बात छोडिये आज कल तो देश दुनिया का माहौल इतना ख़राब हो गया है की अपने पास रह रहे लोग की चिंता भी हम उनसे हर दम जोड़े रहती है | विवाह के इन दस सालों में पतिदेव आज भी मुझे हर रोज दोपहर में फोन कर हाल जानते है , पहले मैं यहाँ नई थी इसलिए अब बेटी की चिंता रहती है ,  अब तो ये हाल है की यदि उनका फोन नहीं आता है तो घबरा कर मैं ही फोन मिला कर पूछ लेती हूँ की सब ठीक तो है न फोन नहीं किया ,  आज का असुरक्षित माहौल आप को इतना ही डरा देता है | यहाँ मुंबई में कुछ घटा नहीं की ( अब तो आतंकवादी हमले रोज की बात बनती जा रही है ) हर तरफ से मेरे अपने मित्रों रिश्तेदारों का फोन आना शुरू हो जाता है कई बार उनके भी जिनसे महीनों हो चुके है बात किये , सोचती हूँ की पहले लोग क्या करते थे बाढ़ कोई आपदा आई हो वहा जहा आप के अपने रह रहे है तो आपदा की खबर तो किसी न किसी तरह लग ही जाती थी किंतु लोग अपनों की खबर कैसे लेते थे बाढ़ और भू चाल जैसे हालातों में तो डाक विभाग भी काम नहीं करता था | शायद तब तक खुद उनके वापस आने का इंतजार करने के अलावा लोगो के पास कोई चारा ही नहीं रहा जाता होगा | वैसे कभी कभी ये भी लगता है की  शायद आज का निश्चित माहौल और लोगो से आसानी से बात कर लेने की सुविधा ने हमें और ज्यादा एक दूसरे से जोड़ दिया है | इन आसन सुविधाओं ने हमें अपनों के प्रति ओ ज्यादा फ़िक्र मंद बना दिया है और दूसरों को ये देखने का मौका भी दे देता है की हमारे करीबियों को हमारी कितनी चिंता है |
  इस तरह की घटनाओं में दो तरह से काम होता है है एक तो टीवी है जो हमें दुनिया भर की खबरों से जोड़ रहा है और दूसरे हमारे पास फोन है जिससे हम तुरंत ही अपने करीबियों का हाल चाल जानने के लिए तुरंत उनसे जुड़ जाते है |
 क्रमश:  


August 29, 2011

इस आन्दोलन ने जगाया हर हिन्दुस्तानी के अंदर का हीरो (आन्दोलन की सफलताये ) - - - - mangopeople

   

                                                                    मुझे लगता है की इस आन्दोलन की सबसे बड़ी सफलता ये है की अब तंत्र को ये बात कुछ हद तक या कह ले मजबूरी में ही ये बात समझ मे आ गई है की जनतंत्र में जन बड़ा है तंत्र नहीं, ये सारा का सारा तंत्र जन, जनता, जनार्दन के लिए है ना की जनता इस तंत्र को चलने के लिए है | तंत्र का निर्माण ही इसी लिए किया गया था की जनता को सहूलियत हो उसका काम व्यवस्थित हो किन्तु धीरे  धीरे तंत्र बड़ा होता गया और जनता छोटी, इस आन्दोलन ने किसी भी व्यवस्था को ना तो पलटा है और ना ही कुछ नया किया है उसने तो बस सारी व्यवस्था और चीजो को फिर से सीधा करने का काम किया है जो उलटी हो गई थी | उम्मीद है अब जनता फिर से एक लंबी नीद पर नहीं जाएगी और समय समय पर तंत्र को ये याद दिलाती रहेगी की वो हमारे लिए है ना की हम उसके लिए और तंत्र जनता के लिए कुछ नहीं करेगा तो फिर वहा पर बैठे लोगों को हटा दिया जायेगा या फिर उन्हें ऐसे ही झकझोर कर याद दिलाया जायेगा |                

                                                     दूसरी सफलता इस बात की है की लोगों को ये लगने लगा था की आज के समय में अहिंसा से बात नहीं बनेगी | अब समय, लोग खास कर युवा इतने बदल गये है इतने  उग्र स्वभाव के हो गए है कि अब शायद ही वो अहिंसा की शक्ति को समझे और उसके माध्यम से अपनी कोई बात कहे | हो सकता है की दो या चार दिन के लिए वो अहिंसा का पाठ याद रखे किन्तु जल्द ही अपना धैर्य खो कर हिंसक हो जाये | किन्तु ऐसा कुछ नहीं हुआ तब भी नहीं जब एक बार लगा रहा था की सरकार इस आन्दोलन को कोई महत्व नहीं दे रही है और अहिंसा से किया जा रहा आन्दोलन उसको समझ नहीं आ रहा है | लेकिन शायद हम सभी युवाओ को और खुद को भी गलत आंक रहे थे और उन्होंने हम सभी को गलत साबित कर दिया ना केवल अहिंसक आन्दोलन पर डटे रहे बल्कि आन्दोलन के इतने दिन तक खीचने के बाद भी अपना धैर्य बनाये रखा और मैदान छोड़ कर भागने के बजाये मैदान में डटे रहे |
                  
                                              आम आदमी में इस आन्दोलन को लेकर एक गजब का आत्मविश्वास जगा है , एक समय था जब लगभग हर आम आदमी एक निराशावादी सोच में जकड कर बस यही कहता रहता था की देश का कुछ नहीं हो सकता, हम कभी भी सरकार से कुछ नहीं करा सकते है , सरकारे अपनी मनमानी करती रहेंगी हम उसका कुछ नहीं कर सकते, हम इस व्यवस्था को कभी नहीं बदल सकते है | किन्तु इस आन्दोलन ने दिखाया की यदि आम आदमी करना चाहे तो जरुर बहुत कुछ कर सकता है |  एक एक आम आदमी का शायद  कोई अस्तित्व ना हो सरकार के लिए किन्तु जब यही आम आदमी एक एक कर लाखो में बदल जाते है और एक सुर में अपनी बात करते है तो सरकारों को ना केवल सुनाई देता है, उसे मजबूर हो कर ही सही काम तो करना ही पड़ता है | अब उम्मीद है की आम आदमी अपनी सोच बदलेगा निराशावादी होने की जगह आशावादी बनेगा अन्ना ने तो कहा है की ६५% भ्रष्टाचार कम होगा पर आम आदमी के लिए तो इतना भी कम नहीं है कि कम से कम कुछ तो कम होगा चाहे चौथाई भाग ही सही कुछ नहीं से कुछ तो भला ही है | बाकि कहने वाले  लोग कहते रहे की लोकपाल से पुरा भ्रष्टाचार बंद नहीं होगा, आम आदमी के लिए तो थोड़ी राहत भी बहुत है, हम तो डूबते को भी तिनके का सहारा देने की बात करते है यहाँ तो सहारा तिनके से काफी बड़ा है |
                                 

                                                                    हम सभी कभी ना कभी एक कहानी सुन चके है या अपने बच्चो को कभी सुनाई होगी  की कैसे यदि पांचो उंगलिया मिल जाये तो मुठ्ठी बन जाती है और फिर हाथ में ज्यादा ताकत आ जाती है इसे कहते है एकता की शक्ति | पर हम में से ज्यादातर इस कहानी को या तो भूल चुके थे या ये कहे की स्वार्थ पूर्ण राजनीति ने हमें भूलने पर मजबूर कर दिया था | हम बटे थे धर्म को लेकर जातियों को लेकर अपने अपने क्षेत्रवाद भाषावाद को लेकर या राजनीतिक वादों को लेकर किन्तु इस आन्दोलन ने उसे कुछ हद तक ( अफसोस से कहना पड़ रहा है की बस कुछ हद तक, कुछ नेताओ की अपनी निजी नेतागिरी के चक्कर में कुछ अति बुद्धिजीवी टाईप के लोगों के कारण जो धर्म और जाति और वाद को इस आन्दोलन से जोड़ कर अपनी राजनीतिक सोच को पोश रहे थे ) उसे आम आदमी के दिमाग से बाहर निकाल दिया और उसे समझने के लिए मजबूर किया की आप चाहे किसी भी धर्म जाति क्षेत्र या वाद के हो भ्रष्टाचार आप सभी को एक ही रूप में देखता है आप सभी को एक ही तरीके से प्रभावित करता है | भले ही किसानो, मजदूरों, दलितों मुस्लिमो से ये कहा जा रहा था की ये आप की लड़ाई नहीं है ये तो खाये पिये ठसक में रह रहे मध्यम वर्ग की लड़ाई है किन्तु ये बात सिर्फ बरगलाने वाली थी जिन किसानो से उनकी जमीने सस्ते में लेकर सरकारे बिल्डरों को करोडो में बेच कर मुनाफा कमा रही थी क्या वो भ्रष्टाचार नहीं है, किसानो को उनकी फसलो का उचित मूल्य नही दिया जाता किन्तु विदेशो से ब्लैक लिस्डेड कंपनियों से ऐसा सडा गेहू दुगने दामो पर मगा लिया जाता है जो जानवरों के खाने के लायक भी नहीं है क्या ये भ्रष्टाचार नहीं है , क्या मजदूरो के घर के लिए रखी जमीनों को बेच बड़ी इमारते बनाई जा रहा है क्या ये भ्रष्टाचार नहीं है क्या मजदूरो को बेरोजगार कर मिले बंद कर वहा बड़े बड़े शापिंग मॉल खड़े करने की नीति भ्रष्टाचार नहीं है , क्या दलितों के नाम पर अल्पसंख्यको के नाम पर हर साल करोडो रूपये की योजनाये बनाई जाती है उसके बाद भी आजदी के ६४ साल के बाद भी उनकी स्थिति में ज्यादा फर्क नहीं आया क्या ये भ्रष्टाचार नहीं है इसके आलावा रोजमर्रा के जीवन में हो रहे भ्रष्टाचार से सभी रूबरू होते है  | समाज का कोई भी ऐसा वर्ग नहीं है जो भ्रष्टाचार से प्रभावित नहीं हो रहा है ये लड़ाई सभी की है किन्तु जानबूझ कर इस आन्दोलन को बार बार ये कह कर झुठलाया गया इसे ख़ारिज करने का प्रयास किया गया की ये दलितों के लिए नहीं है ये अल्पसंख्यको के लिए नहीं है ये किसानी के लिए नहीं है तो ये मजदूरों के लिए नहीं है | फिर भी इन सभी वर्गों से लोग निकल कर बाहर आये और अपनी आवाज सभी के साथ बुलंद की और कई नेताओ और तथाकथित बुद्धिजीवी ? वर्ग को समझाया की अब समाज के किसी भी वर्ग को आप ज्यादा दिनों तक बेफकुफ़ बना कर बाट कर नहीं रख सकते है और एकता से बड़ी कोई शक्ति नहीं होती है |
                                  
                                                        उम्मीद है की जो लोग इस आन्दोलन से अभी तक इन लोगों के बहकावे के कारण नहीं जुड़े थे वो आगे इस आन्दोलन से जुड़ेंगे और सक्रिय रूप से जुड़ेंगे क्योकि ये आन्दोलन ख़त्म नहीं हुआ है इसे अभी और बहुत आगे जाना है और हम सभी को अपनी ताकत, एकता धैर्य को यु ही बनाये रखना होगा क्योकि जैसे जैसे हमारी जीत होती जाएगी वैसे वैसे आगे की लड़ाई और भी कठिन और मुश्किल होती जाएगी |

                एक बात जो अभी तक समझ नहीं आई वो ये की इस आन्दोलन के पीछे आखिर हाथ किसका था ???? और उसे क्या क्या फायदा हुआ ??? एक गुट कह रहा था की इसके पीछे आर आर एस और हिंदूवादी संगठनो का हाथ है,  तो लो जी अब बताया जाये की उन्हें क्या फायदा हुआ इससे क्योकि यदि उनका इरादा अपनी राजनीतिक पार्टी को फायदा पहुँचाना होता तो ये आन्दोलन आज नहीं बल्कि अगस्त २०१३ में हो रहा होता चुनावों से ६ महीने पहले या कम से कम उनकी पार्टी बी जे पी बहुत पहले ही इसका साथ दे रही होती ना की इतने हिल हिलावे के बाद | दूसरे भी थे जो कह रहे थे की इसके पीछे कांग्रेस का हाथ बता रहे थे उनके अनुसार ये राहुल की ताजपोशी के लिए था वो तो हुआ नहीं बस एक मामूली से भाषण के सिवा जिसे कांग्रेसियों के अलावा किसी ने भी तवज्जो नहीं दिया , फिर ये भी लगता है की युवराज को कल का प्रधानमंत्री बनने से हम में से कोई भी नहीं रोक सकता है वो तो एक ना एक दिन हो कर रहेगा क्या राहुल एक जनता द्वारा चुने गये प्रधान मंत्री की जगह किसी को हटा कर थोपे गये प्रधानमंत्री के रूप में पहचाना जाना पसंद करेंगे, मुझे तो नहीं लगता है वैसे इस गुट से जवाब आ गया है की अभी नहीं बाद में पता चलेगा की कांग्रेस की कितनी बड़ी चाल थी :))) ठीक है भईया जब आप को उस चाल का पता चले तो हमको भी जरा खबर कीजियेगा और तीसरा हाथ था अमेरिका का :)))))))) अब क्या कहे वहा तो खुद १८ लाख लोगो की बत्ती गुल हो गई है क्रेडिट रेट घटा दिया गया है ( और ऐसा करने के लिए एक भारतीय की बलि भी ले ले गई ) दूसरी आर्थिक मंदी की आहट से डरे पड़े है , बेरोजगारी बढ़ती जा रही है ओबामा अवतार का खुमार उतर रहा है अब वो अपने देश की अराजकता देखे की हमारे देश में अराजकता फैला कर दक्षिण एशिया को अपने लिए एक और मुसीबत बना ले जहा वो पहले ही चीन और पाकिस्तान से परेशान है |  मतलब की !! कोई है जो बताएगा की आखिर इस आन्दोलन के पीछे कौन सा और किसका हाथ था |
               
                                                                       इस आन्दोलन के पहले कभी सोचा नहीं था की मुझमे भी इस तरह के किसी आन्दोलन में सक्रीय रूप से भागीदारी करने की हिम्मत होगी लेकिन धन्यवाद दूंगी इस आन्दोलन का विरोध करने वालो का खाकर की ब्लॉग जगत के विरोधियो का जिन्होंने मुझमे हिम्मत जगाई की मै कई बार समय निकाल कर धरना स्थल पर गई बल्कि दो बड़ी रैलियों में भी परिवार के साथ गई | वहा का जो माहौल था जो जोश था उसे शब्दों में नहीं कहा जा सकता है उसे तो वही समझ सकता है जो वहा गया | मै अपने पति को एक बार धरने पर ले गई थी अपनी इच्छा से उसके बाद दो बार उन्होंने मुझे बताया की हमारे घर दूर रैलिया है और मुझे ले कर गए ये असर था वहा एक बार जाने का |  एक गाना जो ए आर रहमान ने बनाया है हीरो कंपनी के लिए पर मुझे तो लगता है जैसे ये गाना आन्दोलन के लिए ही बनाया गया था जिसे हर आम आदमी गा रहा है | एक बार अपनी आंखे बंद कीजिये और इस गाने को देखिये नहीं बस सुनिये चाहे यहाँ या चाहे अपने टीवी सेट पर |
                                        हम में है हीरो रो रो रो रो रो
                                   हम में है हीरो रो रो रो रो रो                    
                                 दिल से कहो ये
                               हम में है हीरो
                             मिल के कहो ये
                         हम में है हीरो
                  हर हिन्दुस्तानी में एक हीरो है |
            






August 20, 2011

कल को यही संसद आप का धार्मिक विशेषाधिकार ख़त्म कर दे या कश्मीर को आजाद कर दे क्या तब भी आप संसद की सर्वोच्चता की बात करेंगे - - - - - -mangopeople

 देश में एक वर्ग ऐसा भी है जो भ्रष्टाचार के खिलाफ हो रहे आन्दोलन को बार बार ये कह कर ख़ारिज कर देता है की वो संसद के खिलाफ है एक लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में संसद ही सर्वोच्च है |   लोग सभी को संसद की सर्वोच्चता समझा रहे है और इस आन्दोलन को लोकतंत्र विरोधी कहने में भी पीछे नहीं हट रहे है | देश में अराजकता फैलने, विदेश पैसे , विदेशी हाथ के साथ साथ ट्रैफिक की व्यवस्था तक ख़राब होने की बात कर रहे है ( ६४ साल तक देश में अराजकता रही उसकी फिक्र नहीं है उसे हटाने के लिए किये जा रहे आन्दोलन से अराजकता दिख रही है , अमेरिका से समझौते के लिए परमाणु बिल के लिए अमेरिका से पैसे आ रहे थे सांसद ख़रीदे जा रहे थे तो ठीक था  , मंत्रियो को बनाने में भी अमेरिकियों का हाथ की बात सामने आई अब वही गन्दगी इन्हें सब जगह दिख रही है ) | पूरे आन्दोलन में कई तरह की बाते करके लोगों को भटकाने का प्रयास किया जा रहा है जैसे ये संविधान के खिलाफ है और जो संविधान के खिलाफ है वो अम्बेडकर के खिलाफ है और जो अम्बेडकर के खिलाफ है वो दलित के खिलाफ है | दूसरा देश के एक समुदाय विशेष को ये कहा जा रहा है की ये सरकार के खिलाफ है और उसे बदलने के लिए है,  जिसका फायदा विपक्षी "सांप्रदायिक" पार्टी को मिलेगा तो तुम्हारा क्या होगा , दूसरी तरह राष्ट्रवाद का झंडा लिए हिंदूवादी लोग भी  है जिन्हें तकलीफ है की जब फला बाबा ने विरोध  किया तो लोगों पर असर नहीं हुआ सभी ने उसका ऐसा साथ नहीं दिया तो अब हम भी इस आन्दोलन में साथ नहीं देंगे जब हमारी पसंद वाले बाबा जी विरोध करेंगे तो ही साथ देंगे ( ये कैसा राष्ट्रवाद है जो राष्ट्र से ऊपर किसी बाबा को बना रहा है ) यानी इस तरह के कई कारण है जो इस आन्दोलन का विरोध किया जा रहा है | तो उन सभी से मेरे दो सवाल है


पहला सवाल ये है की कल को एक ऐसी पार्टी सरकार बनाती है, संसद में पूर्ण बहुमत ले कर आती है जिसके मेनोफेस्टो में ही ये है की वो सभी के ऊपर समान कानून लागु करेगी किसी भी धर्म को विशेष अधिकार नहीं देगी सभी पर एक ही कानून लागु होगा और उनके धर्म का विशेषाधिकार ख़त्म कर देती है बाकायदा लोकतान्त्रिक प्रक्रिया के तहत संसद में कानून बदल कर,  तो क्या वो तब भी ये कह कर चुप रहेंगे की लोकतंत्र में संसद ही सर्वोच्च होता है और हम सभी को इसे मान लेना चाहिए चुपचाप  और यदि वो इसका विरोध करेंगे तो कैसे   ?


 दूसरा सवाल दूसरे लोगों से यदि कल को सरकार एक समुदाय विशेष का वोट पाने की लालच में कश्मीर को स्वायत्ता और आजादी के नाम पर पाकिस्तान को परोस दे, क्या वो तब भी संसद को सर्वोच्च मान कर चुप रहेंगे या कोई भी उनके पसंद की पार्टी गोली और डंडो के डर से बाहर नहीं आई तो वो उसका विरोध किसी अन्य के साथ नहीं करेंगे और अपनी पसंद के लोगों के आगे आने का इतजार भर करेंगे ?


   मुझे सवाल का जवाब दीजिये या ना दीजिये किन्तु एक बार अपने आप से जरुर पूछियेगा क्या वास्तव में संसद ही लोकतंत्र में सर्वोच्च होती है और वास्तव में क्या राष्ट्रवाद में राष्ट्र से बड़ा कोई हो सकता है राष्ट्र का भला किसी के भी द्वारा हो क्या उस पर ध्यान देना चाहिए |

August 18, 2011

जन लोकपाल बिल और सरकारी लोकपाल बिल कुछ बिंदु जिन पर दोनों में असहमति है - - - - -mangopeople



सरकार का कहना है की उसने अन्ना हजारे की ज्यादातर मांगे मान ली है कुछ मांगे जो मानने लायक नहीं है बस उन्हें नहीं माना है तो यहाँ मै उन कुछ खास मांगो का जिक्र करुँगी और उस पर सरकार के रुख का भी |
१ - अन्ना की तरफ से सबसे बड़ी मांग है की लोकपाल के दायरे में प्रधानमंत्री को लाना चाहिए
                       जबकि सरकार प्रधान मंत्री को लोकपाल के दायरे में लाने को तैयार नहीं है |

            संसद में  अब तक आठ बार लोकपाल बिल विभिन्न रूपों में आ चूका है जिसमे से पांच बार के बिल में प्रधानमंत्री को भी लोकपाल के दायरे में रखा गया था | प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी पत्रकारों से कहा की उन्हें भी लोकपाल के दायरे में आने से कोई परहेज नहीं है , हाल में ही कांग्रेस की नेता जयंती नटराजन की कमिटी ने भी प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाने की बात की फिर अचानक से इससे परहेज क्यों किया जा रहा है | मतलब ये मांग करके सिविल सोसायटी ने कोई नई बात नहीं कही है ये पहले से ही बिल में मौजूद था जिसे फिर से शामिल करने की मांग की जा रही है |

२- न्यायपालिका को भी लोकपाल के दायरे में आना चाहिए |
         न्यायपालिका को लोकपाल के दायरे में नहीं लाना चहिए जजों के लिए अलग से कानून बना सकते है |
                                                         सौमित्र सेन जिन पर अभी महाभियोग चल रहा है उन पर २००५ में ही आरोप लगे थे पर मुख्य न्यायाधीश ने उनकी जाँच का आदेश २०१० में दिया जब वो रिटायर हो गए | हाल में ही पंजाब के एक जज को पैसे पहंचाए गए पता चला की किसी और जज को पैसे पहुँचने थे |

३-  संसद में सांसदों के आचरण को भी लोकपाल के दायरे में लाना चाहिए |
           संसद में सांसदों का आचरण इस दायरे में नहीं आना चाहिए संसद खुद अपने सांसदों के बारे में फैसले लेगा |
                       सांसदों ने पैसे ले कर संसद में प्रश्न किया राज्यसभा चुनावों में और किसी खास मुद्दे पर सांसदों को ख़रीदा बेचा जाता है जाँच में कुछ नहीं निकलता और किसी को संसद कोई खास सजा नहीं देती |
४- कोई भी जाँच ६ महीने से दो साल में पूरी हो जानी चाहिए |
            जाँच के लिए सात साल तक का समय दिया जाना चाहिए |
                                        सात साल में तो जाँच का क्या हाल होगा सभी जानते है ये तो बस जाँच को टरकाने जैसा है |
५- भ्रष्टाचार में पकडे जाने पर कम से कम ५ साल और ज्यादा से ज्यादा उम्रकैद हो |
                        पकडे जाने पर ६-७ महीने की ही सजा हो ( संभव है की टीवी पर गलत बताया जा रहा हो हजरों करोड़ के घोटाले के लिए इतनी कम सजा का प्रावधान सरकार नहीं कर सकती है आप किसी के पास इस बारे में कोई और जानकारी हो तो दे ) 
                                            कोई हजारो करोड़ का घोटाला करे उसे इतनी कम सजा कैसे दे सकते है |                    
       
६- घोटाले की सारी रकम घोटालेबाजो से वसूली जाये
           रकम वसूली को कोई व्यवस्था नहीं है |
                        राजा ने पौने दो करोड़ लाख का घोटाला किया लगभग तीन हजार करोड़ अपने जेब में डाल लिया मान लीजिये की उन्हें सजा हो गई और वो ५ साल बाद आ कर तीन हजार करोड़ के मालिक हो जायेंगे | जनता के टैक्स के पैसे उनकी जेब में चले जायेंगे | 
७- लोकपाल के दायरे में सभी सरकारी कर्मचारी हो
                        संयुक्त सचिव से नीचे के कर्मचारी लोकपाल के दायरे में नहीं होंगे  |
                                           आम आदमी तो रोज इन बड़े अधिकारियो के चंगुल में नहीं फस्ता है तो आम आदमी जब छीटे अधिकारियो से परेशान होगा तो वो क्या करेगा वही पहले की तरह उसी विभाग के एंटी करप्शन ब्योरो को शिकायत करेगा जहा आरोपी अधिकारी के ही भाई बंधु बैठे है |            
८- लोकपाल को नियुक्त करने की कमेटी में न्यायिक, गैरसरकारी और  वो लोग हो जो लोकपाल दे दायरे से बाहर है 
                       जबकि सरकारी लोकपाल बिल में कमेटी के १० सदस्यों में सत्तासीन पार्टी के सांसदों का बहुमत है |
                                                  जो लोकपाल के दायरे में है वो ही कैसे उसे चुन सकते है क्या आरोपी ही अपने लिए जाँच अधिकारी चुनेगा |
९- सी बी आई का एंटी करप्सन विंग पर लोकपाल का अधिकार हो साथ ही सी वी सी पर भी
                          सरकार सीबी आई को लोकपाल के अधिकार में देने को तैयार नहीं है |
                          सरकार के अधिकार क्षेत्र में रह कर सी बी आई कैसे आज तक काम कर रही है  ये सभी जानते है |
१० लोकपाल और लोकायुक्त दोनों के लिए एक ही कानून बने
                             सरकार का कहना है की लोकायुक्त राज्य के अधिकार में है वो उसमे हस्तक्षेप नहीं कर सकती |
                        जमीन अधिग्रहण की तरह सभी राज्य सरकारे अपने अपने हिसाब से कानून बनाने लगे तो क्या होगा |
११-भ्रष्टाचार का आरोप लगाते ही पद से हटा दिया जाये
                               जाँच होने के बाद दोषी होने पर ही हटाया जाये |
                                यदि आरोपी को उसके पद से हटाय नहीं जायेगा तो वो उसी विभाग या पद पर बैठ कर अपने खिलाफ सबूतों को नष्ट नहीं कर देगा जैसे आदर्श की फाईल एक के बाद एक गायब हो रही है या अपने मातहत लोगों को सूचना देने से रोक नहीं सकता है | ये संभव है की कुछ आरोप गलत लगाये जाये किन्तु जब कोई भी लोकपाल को किसी की शिकायत करेगा तो कुछ ना कुछ दस्तावेज या सबूत के साथ ही करेगा उसे देखा कर तो समझ ही जा सकता है  |
१२- लोकपाल को सजा की सिफारिश करने क अधिकार हो
                                  सरकार के अनुसार उसे केवल निलंबित करने का अधिकार हो |
                                  इस मामले में सरकार से सहमत हूँ एक ही व्यक्ति का जाँच और सजा का धिकार नहीं होना चाहिए | हा यदि सिफारिस कर दे तो भी क्या बुरा है अंत में न्यायालय को ही सजा देना है |
१३- सरकार का कहना है की यदि किसी के आरोप साबित नहीं होते है तो आरोप लगाने वाले को सजा मिलेगी वो भी २ से ५ साल की |
                        जबकि अन्ना की टीम इसका विरोध कर रही है इससे लोग शिकायत करने से डरेंगे बल्कि लोगो का नाम छुपा कर रखना चाहिए और बेनामी शिकायत का भी अधिकार होना चाहिए
                                अब इस प्रावधान को आप क्या कहेंगे आज की तारीख में कितने अधिकारी पैसे लेते रंगे हाथ पकडे जाते है किन्तु बाद में छुट जाते है इअतानी मिली भगत है हर जगह ऐसे में कैसे सारे आरोप एक व्यक्ति साबित कर सकता है वो तो आरोप और सबूत भर दे सकता है | यदि इस तरह सजा का प्रावधान होगा तो कोई ही शिकायत करने ही नहीं आयेगा | आज तो सूचना मागने वाले तक को मार दिया जाता है फिर क्या शिकायत करने वाला सुरक्षित होगा |
१४ - जब लोकपाल ही भ्रष्टाचारी निकले तो को भी उसकी शिकायत मुख्य न्यायाधीस से कर सकता है जो उसको हटाने के लिए अधिकृत होंगे
                                  सरकार का कहना है की ये व्यवस्था ठीक नहीं है कोई भी लोकपाल का शिकायत नहीं कर सकता है |  
                            एक तरफ तो सरकार कहती है की जन लोकपाल बिल का लोकपाल निरंकुश हो जायेगा सुप्रीम पवार बन जायेगा जब उसी के खिलाफ सभी को शिकायत करने की छुट दी जा रही है तो उसे वो भी मंजूर नहीं है |


सूचना    
                                  मेरी पोस्ट टीवी पर बताई जानकारी पर आधारित है यदि किसी तथ्य में कोई गड़बड़ी है तो बता दे या आप के पास कोई जानकारी है तो दे, उसे पोस्ट में शामिल कर लुंगी |

August 17, 2011

भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान में मेरा छोटा योगदान और आप ने कितना दिया - - - - - - - mangopeople

                                                     धार्मिक बातो और कहानियो में मेरी ज्यादा रूचि कभी नहीं रही है किन्तु किसी अच्छे काम में एक छोटा से छोटा योगदान का महत्व समझाती दो कहानिया सुन रखी है एक वो जिसमे एक छोटी सी गिलहरी कैसे राम सेतु बनाते समय उसके पत्थरो पर लगे रेत को अपने बदन में लपेट कर उसे साफ कर रही थी दूसरी कहानी जो इस्लाम धर्म से है जिसमे बताया गया की जब  धर्म युद्ध में आग लगी थी तो एक छोटी चिड़िया अपने चोंच में पानी भर कर वहा डाल उसे बुझाने का प्रयास कर रही थी किसी ने पूछ की क्या तुम्हारे इतने कम पानी से इतनी बड़ी आग बुझ जाएगी तो चिड़िया ने कहा हा पता है की नहीं बुझेगी पर कल को जब इतिहास लिख जायेगा तो लोगों को मेरे इस छोटे योगदान से पता होगा की मै किस तरफ थी  ( कहानी ठीक से याद नहीं है कुछ ऐसा ही ही ) | मतलब ये की आप का योगदान कितना छोटा है ये बात महत्व नहीं रखती है बस आप का कोई ना कोई योगदान होना चाहिए किसी ऐसे अच्छे काम में जिसका आप समर्थन करते है |
                                                         तो भ्रष्टाचार की इस लड़ाई में मैंने भी अपना छोटा सा योगदान दे दिया मेरे पास बस तीन घंटे थे जब तक बेटी स्कुल में थी तो वही तीन घंटे मैंने सड़क पर आ कर इस मुहीम में अपना समर्थन दे दिया |  मै एक आम सी गृहणी हूं और आम आदमी की तरह डरपोक भी हूं कल जब मै भी घर से भ्रष्टाचार की मुहीम में शामिल होने के लिए अकेले निकली तो थोडा अजीब भी लग रहा था और कुछ होने का डर भी किन्तु वहा जाने के बाद कुछ भी ना अजीब लगा ना डर वहा मेरी जैसी कई महिलाए थी जो अकेले ही वहा आई थी और मेरी तरह ही आम गृहणी थी | तो मेरा योगदान तो कल हो गया और आज और आने वाले कल भी होगा भले तीन घंटो का ही आप कितना समय दे रहे है इस भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए |




  ये है मेघा पाटेकर इनके झोपड़पट्टी के लिए चलाये जा रहे अभियान की कई बातो से मै सहमत नहीं हूं और इनका विरोध करती हूं पर कल इनके साथ थी क्योकि कल हम वहा सिर्फ भ्रष्टाचार के खिलाफ थे
                    



       ये भी मेरी तरह आम गृहणिया है जो अपने घरो में बच्चो को छोड़ कर आई थी तो कुछ कालेज में पढ़  रहे अपने बच्चो के साथ आई थी    
 
 
                                              

August 15, 2011

यदि आप को लगता है की आप आजाद है तो आप को आजादी के पर्व की शुभकामनाये- - - - - - - - -mangopeople

देश की आजादी के लिए कितनो ने अपने जीवन का बलिदान दिया हम इसकी सही गिनती नहीं कर सकते है उन्होंने बलिदान दिया ताकि देश आजाद हो सके देश की आने वाली पीढ़ी एक आजाद और बेहतर जीवन जी सके | हम में से ज्यादातर लोग उस स्वतंत्रता संग्राम में अपना कोई भी योगदान नहीं दे सके क्योकि हम तब वहा नहीं थे पर हमने उनके बलिदानों से मिली आजादी का खूब उपभोग किया और उसके उपभोग में इतने खो गये की कब हम भ्रष्टाचार के गुलाम हो गये हमें पता ही नहीं चला |  ६० साल से ऊपर हो गये हमें गुलाम होते अब समय आ गया है की हम फिर से एक नई आजादी की लड़ाई शुरू करे इस भ्रष्टाचार के खिलाफ , अभी और इसी समय क्योकि अब हम पहले से ज्यादा जागरुक है अब हमें दो सौ सालो तक सहने का इंतजार नहीं करना है और अभी उठ खड़ा होना है, ताकि हमारे बच्चे और उनका भविष्य बेहतर हो | आज हमारे  पास मौका है देश में चल रहे एक दूसरे स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने का, स्वतंत्रता भ्रष्टाचार से, फिर क्यों हम इस मौके को हाथ से जाने दे | बाहर आइये और साबित कीजिये की आप है और जिन्दा है और आप भी देश के लिए कुछ कर सकते है | कुछ कीजिये, किसी के समर्थन में नहीं बल्कि भ्रष्टाचार के खिलाफ, सरकारों तक बात पहुचाइए की अब आप से ये सब बर्दास्त नहीं होगा अब आप भ्रष्टाचार का साथ नहीं दे सकते है | ये लोकतंत्र के खिलाफ नहीं है ये संसद के खिलाफ भी नहीं है ये किसी एक राजनितिक दल के खिलाफ भी नहीं है ये बस और बस भ्रष्टाचार के खिलाफ है चाहे वो कोई भी कर रहा हो चाहे वो सरकार करे, नेता करे, मंत्री करे, नौकरशाह करे, आम जनता करे कोई भी करे सन्देश दीजिये अपने विरोध से की अब हम इसे नहीं सहेंगे और हम बदलाव के लिए तैयार है आज और अभी, अब हम हर पांच साल का इंतजार नहीं करेंगे अब हम खुद को पांच साल तक लुटता देख चुप नहीं रहेंगे कि आप को पांच साल बाद बताएँगे, हम अभी ही इसका विरोध करते है और सभी को चेतावनी देते है की अभी तक जो किया सो किया हम चुप रह आप को बढ़ावा देते रहे पर अब नहीं अब हमने अपनी भूल सुधार ली है अब हम इन चीजो को नहीं सहेंगे |
                 विरोध कीजिये कही भी जहा आप है अपने हाऊसिंग सोसायटी में अपने आफिस में अपने मोहल्लो में आप का जे पी पार्क , जंतर मंतर ,या आजाद पार्क जाने की जरुरत नहीं है आप इसका विरोध कही से भी कीजिये जहा आप है , इमारतों  में भ्रष्टाचार के खिलाफ तख्ती टांग दीजिये सोसायटी के कम्पौंड में भ्रष्टाचार के खिलाफ मोर्चा निकालिए , सरकार तक अपना विरोध पहुंचिए, लोगों को खुद से जोडीये, जो नहीं जानते है उन्हें बताइये मिल का इसका विरोध कीजिये, पर कीजिये | अपने आफिस में या ईमारत के परिसर में मोहल्ले में मार्च निकलने या भ्रष्टाचार के विरोध के लिए तख्ती टांगने के लिए आप को पुलिस या प्रशासन से इजाजत की जरुरत नहीं है , पुलिस आप के घरो में घुस कर डंडे नहीं बरसायेगी ना सरकारे हर व्यक्ति के खिलाफ जाँच बैठाएगी , किन्तु  आप के  छोटे से प्रतीकात्मक विरोध का भी उस पर कुछ ना कुछ असर तो जरुर होगा  इसलिए मौन को डर को ख़त्म कीजिये और मुँह खोलिए विरोध कीजिये बताइये की आप कितने परेशान हो चुके है इस भ्रष्टाचार से और आप पूरी व्यवस्था की चुस्त दुरुस्त करने के लिए व्यवस्था में बदलाव के लिए तैयार है |  
                                 आप को किसी व्यक्ति विशेष का समर्थन नहीं करना है आप को भ्रष्टाचार का विरोध करना है उस तरीके से जो आप चाहे आप को अँधेरा नहीं करना है तो मत कीजिये आप आप मोमबत्तिया जला कर रोशनी करके विरोध कीजिये,  आप मत नाम लीजिये व्यक्ति विशेष का आप कहिये की आप बस भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रहे है किसी व्यक्ति या समूह के लिए नहीं | ये किसी और की नहीं हमारी और आप की लड़ाई है ये हमारे और हमारे बच्चो के लिए लड़ी जा रही लड़ाई है सभी को आगे आ कर अपना योगदान किसी ना किसी रूप में करना चाहिए नहीं करेंगे  तो भविष्य में इस लड़ाई में हारने और जितने दोनों ही स्थिति में आप बाद में सिवाय पछताने के कुछ भी नहीं कर पाएंगे |
                                                                                             आज एक आम आदमी एक आम नागरिक के पास मौका है देश के लिए कुछ करने का जहा फायदा घूम कर उसे ही होना है , तो भूल कर भी इस मौके को ना गवाइए और कुछ करीये | ताकि साठ साल बाद हमारे आने वाली पीढ़ी को इस तरह को कोई लड़ाई नहीं लड़नी पड़े आज से ६० साल बाद आज के दिन वो बड़े फक्र से एक विकसित देश के नागरिक के नाते ऐसे ही किसी आधुनिक तकनीक पर अपनी आजादी का असली जश्न मनाये और केवल शब्दों के लिए नहीं माने और गर्व करे की वो भारतीय है |
                       

यदि आप को लगता है की आप आजाद है तो आप को आजादी के पर्व की     शुभकामनाये  |

August 08, 2011

क्या डरपोक भारतीय मध्यम वर्ग अब अन्ना के साथ आयेगा ? - - - - -mangopeople

                         
                                                         
                                                      16 अगस्त से एक बार फिर अन्ना हजारे लोकपाल बिल को लेकर अनशन पर जाने वाले है किन्तु आज परिस्थितिया वैसी नहीं है जैसी की उनके पहले अनशन के समय थी | तब उन्हें और उनकी टीम को बिल्कुल भी ये अंदाजा नहीं था की उनके आन्दोलन को जनता और मीडिया में इस स्तर तक समर्थन मिलेगा | उन्हें मिला समर्थन उनकी उम्मीदों से परे था और सरकार के भी, इसलिए सरकार भी जल्द ही दबाव में आ गई और फौरी तौर पर इस आन्दोलन से निपटने के लिए बिल बनाने  की कमेटी में सिविल सोसायटी के लोगो को शामिल कर लिया किन्तु उसका अंत कैसा होगा ये सरकार को मालूम था, और अंत में हुआ भी वही सरकार ने लोकपाल बिल को जोकपाल बना कर संसद में रख दिया अब अन्ना हजारे और उनकी टीम इसे उनके और जनता के साथ धोखा बता कर एक बार फिर से इस पर आन्दोलन शुरू करना  चाह रही है और 16 अगस्त से अन्ना हजारे ने फिर से अनशन पर जाने की घोषणा कर दी है |
                      किन्तु अब सवाल ये है कि क्या इस बार भी उन्हें जनता खास कर पढ़े लिखे सुविधाभोगी माध्यम वर्ग से वही समर्थन मिलेगा जो उन्हें पिछली बार मिला था | सवाल उठना लाजमी है क्योकि इस बार जनता से उम्मीदे ज्यादा है और आज की परिस्थिति पहले से काफी अलग है | पिछली बार जनता ने जोश में और बिना किसी परिणाम को सोचे सड़को पर उतर कर एस एम एस कैपेनो सोसल साईटों आदि से इस आन्दोलन को खूब समर्थन दिया था किन्तु इस बार इस माध्यम वर्ग को पता है की सरकार किसी आन्दोलन को कुचलने के लिए क्या कर सकती है और किस हद तक जा सकती है | बाबा रामदेव के आन्दोलन का सरकार ने क्या हाल किया और आज भी बाबा रामदेव और उनके सहयोगियों का क्या हाल कर रही है  उसी से पता चलता है की सरकारे कैसे काम करती है | अब इन सब को देखते हुए लगता है की क्या इस बार पढ़ा लिखा तबका और युवा इस अन्दोलन से उसी तरह जुड़ेगा जैसे इसके पहले जुड़ा था |
                          ९० के दशक में इस माध्यम वर्ग ने अपने सपूतो को इसी तरह के एक आन्दोलन में जलते हुए और मरते हुए देखा था तभी से इनकी रुहे भी किसी आन्दोलन के नाम पर कांप जाती है | सड़क पर किये जा रहे आन्दोलन से कम से कम आम आदमी तो दूर ही रहता था | एक दशक बाद जा कर उसे होश आया की ये भ्रष्टाचार तो हमारे सर के ऊपर तक चला गया है यदि अब इसके खिलाफ नहीं बोले तो ये हम को ही ले डूबेगा | अन्ना की टीम ने लोगो को अपनी बात कहने अपना आक्रोश सामने लाने का मंच दे दिया और लोगो ने उसका उपयोग भी किया किन्तु सभी ये सब करते रहे क्योकि उन्हें सरकार की तरफ से कोई भय नहीं था क्योकि तब तक सरकार ने इस तरह के आन्दोलन को कुचलने का कोई काम नहीं किया था | सिविल सोसायटी को लोकपाल बिल बनाने की कमिटी में शामिल करने को ही सभी ने अपनी जीत मान ली और आन्दोलन को यही सम्पन्न भी मान लिया | किन्तु जब यही लोगों ने टीवी पर बाबा रामदेव के आन्दोलन का हाल देखा सरकारी ज्यादती देखी तो उनके होश उड़ गये , तब इन्हें समझ आया की सरकार किसी आन्दोलन को कुचलने के लिए किसी हद तक जा सकती है और क्या क्या कर सकती है उसके लिए आम आदमी और उसके मुद्दे उसके सवाल कोई मायने नहीं रखेते है | जब सरकारे अपने पर आती है तो इसी तरह सत्ता की ताकत का दुरुपयोग करती है | अब अन्ना हजारे फिर से आन्दोलन करने जा रहे है और इस बार सरकार ने पहले ही दर्शा दिया है की उसे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है सरकार से बाहर सरकारी टट्टू लोगों को डराने के लिए ये भी बता रहे है की हर आन्दोलन का वही हाल होगा जो रामदेव के आन्दोलन का हुआ | अब माध्यम वर्ग को पता है की इस बार पहले वाली बात नहीं है इस बार यदि बाहर निकले तो पुलिसिया ज्यादती का शिकार भी होना होगा और डंडे खाने की नौबत भी आ सकती है |
                                 ऐसा नहीं है की सरकार ने बस युही रामदेव के आन्दोलन को इस तरह कुचल दिया वो चाहती तो बड़े आराम से अन्ना हजारे की तरह बाबा को भी योग शिविर के आड़ में अनशन करने की इजाजत नहीं देती लोगों को वहा आने से ही रोकती और इस आन्दोलन को होने ही नहीं देती | किन्तु उसने ये सब होने दिया क्योकि उसकी मंसा तो एक तीर से दो निशाने लगाने की थी उसने सभी टीवी कैमरो  मीडिया के सामने उन लोगों पर लाठी चार्ज किया लोगों का मारा कम उन्हें घसीटा ज्यादा उसका उद्देश्य लोगों को वहा से भगाने से पहले अच्छे से उनकी इज्जत कैमरों के सामने उतारने की थी | सरकार को अच्छे से पता था की ये सब मीडिया रिकार्ड कर रही है और उसे देश के लाखो लोग टीवी पर देखेंगे और वो चाहती भी यही थी की लोग देखे ओर समझ जाये की सरकार क्या क्या कर सकती है | वो आन्दोलन तो सफलता पूर्वक कुचल दिया गया पर वहा जो किया गया उसका दूसरा निशाना था उन चीजो के देख रहा माध्यम वर्ग जो हमेसा ही अपनी इज्जत को लेकर बड़ा सतर्क रहता है जो आन्दोलन तो कर सकता है पर लाठी नहीं खा सकता सड़क पर घसीटा जाना या पुलिस द्वारा गलिया देना उसे बर्दास्त नहीं होगा वो कभी नहीं बर्दास्त करेगा की उसके घर के युवा या महिलाए या वो खुद इस तरह के आन्दोलन में जाये जहा पर ये सब होने की संभावना है |
                                               सरकार का तीर निशाने पर लगा पहले से ही डरपोक रहा माध्यम वर्ग और भी डर गया और पुरा माध्यम वर्ग सहमा डरा हुआ इधर उधर मुँह छुपा रहा है बहाने तलाश रहा है  अन्ना की टीम से ही सवाल पूछ रहा है की आप इससे ज्यादा और क्या चाहते है, सरकार ने तो काफी कुछ दे दिया, आप लोकपाल के नाम पर एक और सत्ता खड़ी कर रहे है ,आप इतना ईमानदार व्यक्ति लोकपाल के लिए कहा से लायेंगे , आप संसद का अपमान कर रहे है, ये लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है, आप सरकार गिराने का प्रयास कर रहे है, आप देश को अस्थिर कर रहे है ,आप खुद को संसद से सर्वोच्च क्यों मान रहे है, देश में संसद ही सर्वोच्च है उसकी बात हम सभी को मान लेनी चाहिए आदि आदि आदि  |   सिविल सोसायटी वालो पर भी सवाल खड़े किया जाना लगा और रामदेव के आन्दोलन  को तो सरकार ने पहले ही सांप्रदायिक घोषित कर उसकी हवा निकाल दी थी |  सरकार ने बड़ी चालाकी से अपने एक कांटे से दूसरे कांटे को निकालने का काम किया | 
                                                                                    बेचारा माध्यम वर्ग भी क्या करे वो शुरू से ही डरपोक रहा है उसे खुद के कामने खाने और इज्जत की दुहाई दे कर चुप रहने और दूसरो को भी चुप रहने की सलाह देने की आदत है और सरकार ने भी उसकी इसी आदत का खूब फायदा उठाया और उसकी दुखती रग पर हाथ रख दिया | अब वो  खुद को दिलासा भी दे रहा है की उसने तो आन्दोलन को सफल बना दिया था और सरकार से अपनी बात भी मनवा ली थी अब वहा गए लोग अपनी बात नहीं मनवा सके तो हम क्या कर सकते है | इस बात को अन्ना हजारे की टीम भी अच्छे से समझ रही है इसलिए पहले कोर्ट में एक याचिका भी दायर की गई की उसके आन्दोलन में सरकार वो सब ना कर सके जो रामदेव के आन्दोलन में किया ताकि लोगो में कुछ विश्वास पैदा हो लोगो का डर कम हो साथ ही अब जगह जगह जा कर लोगो को फिर से जोड़ने का प्रयास भी किया जा रहा है जो पहले इस तरह नहीं किया गया था | पर दूसरी तरफ सरकार और उनकी टीम भी लोगो को डराने के लिए उन्हें हतोस्साहित करने के लिए रोज नये नये बयान जारी कर रही है कभी ये कहती है की उनके आन्दोलन का भी वही हाल होगा जो रामदेव का हुआ, कभी कहती है की करते रहे आन्दोलन हमें कोई चिंता नहीं है, तो कभी कानून व्यवस्था प्रशासन का नाम लेकर जंतर मंतर पर अनशन की इजाजत ही नहीं दे रही है | किन्तु अन्ना की टीम भी लगी है सरकार से दो दो हाथ करने के लिए |
                                 कोई भी क्रांति बड़ा बदलाव या सरकार से उसकी मर्जी के खिलाफ उससे कोई काम करवाना आसान नहीं होता है और ये काम दो या चार दिन में संभव नहीं है इसके लिए पूरे समाज को उठ कर आगे आना होता है और एक लंबी लड़ाई लड़नी पड़ती है  और कई बार सरकारी ज्यादती का शिकार भी होना पड़ता है | जब कोई समाज इन सब के लिए तैयार होगा तभी वो किसी बदलाव को क्रांति को ला सकता है , नहीं तो छोटे छोटे आन्दोलन विरोधो को सरकारे कभी तव्वजो नहीं देती है और नहीं किसी खास व्यक्ति समूह की सुनती है ,अन्ना तो गाँधीवादी भर है आज के समय में स्वयम गाँधी जी भी आ कर अकेले सरकार से कुछ कहते तो वो उन्हें भी बरगलाने के सिवा कुछ नहीं करती | अब तो १६ अगस्त के बाद ही पता चलेगा की परम्परागत भारतीय माध्यम वर्ग किसी बदलाव को लाने को तैयार है की नहीं , उसमे क्रांति लाने की ताकत है की नहीं , उसने अपने डरपोक प्रकृति को छोड़ा है की नहीं |