February 23, 2011

ऐसे ऐसे कैसे कैसे ये पति - - - - - - - mangopeople

 सौ देश के सौ पुरुष सौ तरह के हो सकते है किन्तु दुनिया के किसी भी कोने से पति को लाइए वो सब के सब एक ही तरह के होते है मतलब की पत्नी को लेकर उनकी सोच लगभग एक जैसी होगी पत्नी के साथ उनका व्यवहार बातचित लगभग एक सी होगी  | दुनिया के किसी भी कोने से किसी पत्नी से अपने पति की खराबिया बुरी आदते पूछिये सब मेल खाती होंगी बस संस्कृति और रहन सहन के तरीके के कारण दो चार इधर उधर हो सकती है नहीं तो सभी पत्नियों को एक सी समस्याए पतियों से होती है | कुछ खास का जिक्र यहाँ कर रही हूँ देखिये की आप के पति किस श्रेणी में आते है या आप किस श्रेणी के पति है |

प्यार का दावा करने वाले पति :- ज्यादातर पति दावा करते है की वो अपनी पत्नियों को बहुत प्यार करते है, करते है तो करते है , इसमे कहने की क्या जरुरत है ( खास कर अरेंज मैरिजवाले, वैसे लव मैरिज वालो की स्थिति भी कुछ साल बाद अरेंज मैरिज वालो जैसी ही हो जाती है या ये कहू कुछ ज्यादा ही बत्तर ) " सिर्फ एहसास है इसे रूह से महसूस करो " और ये वाला गाना उनकी टैग लाइन होती है | पर जिस पत्नी को इस एहसास को, कि उसका पति उसे बहुत प्यार करता है,  महसूस करना चाहिए उसकी रूह सारा जीवन उसे प्यार को बस ढूंढ़ते गुजर देती है पर वो मिलती नहीं |  जिस बेचारी को असल में प्यार को महसूस करना चाहिए वो उसे कभी ऐसा कर ही नहीं पाती | करे भी कैसे पति जब उसके साथ दो घडी बैठे तब ना सुबह का समय तो मान कर चलिए की शायद ही किसी को एक दुसरे के लिए समय हो आफिस से आने के बाद पति फ्रेस हो कर सीधा गली के नुक्कड़ पर दोस्तों के पास या जहा भी उनकी मंडली जमती हो कुछ तो आफिस के बाद मंडली जमा कर ही वापस घर आते है और कुछ परिवार के बाकि सदस्यों के साथ टीवी के पास या काम के मारो के पास आफिस का काम तो कुछ को विवाह के बाद भी एकांत से प्यार , अब तो टीवी के साथ निगोड़ी इंटरनेट भी है कभी सोसल नेटवर्किंग साइड तो कभी ब्लोगिंग | ब्लोगिंग से अपने विचार अनजाने को पहुंचा दिया दुसरो का सुन लिया पर पत्नी के विचारो से बिलकुल अनजान , नेटवर्किंग साइड पर अपना नेटवर्क खूब मजबूत कर लिया पर पत्नी को इनके नेटवर्क में कभी आती ही नहीं | जो पत्नी को कुछ कहना है तो अब सुबह सुबह मेरे पास समय नहीं है तुम्हारा रोना धोना  सुनने के लिए बाद में बताना , शाम को लो घर में अभी घुसा नहीं की तुम्हारा रोना धोना शुरू हो गया और रात में अब सोने के समय में अपना रोना धोना ले कर मत बैठ जाओ और छुट्टी के दिन में अब अपना ये सब लेकर सुरु मत हो जाओ मेरी छुट्टी ना बर्बाद करो | अब तो नरसिंह देव ही कोई बेला ( समय ) बता सकते है इन पतियों से बात करने का जो उन्हें हमेशा पत्नियों का रोना धोना लगता है | अब इन से क्या बात करे ???

बचत करने वाले पति  :-  पतियों की बड़ी शिकायत रहती है की पत्निया बड़ी फिजूल खर्च होती है पैसे बचत नहीं करती है |  " फलाने की पत्नी को देखो कितना बचत करती है सेल से ढूंढ़ ढूंढ़ कर सस्ते में सामान लाती है और एक तुम हो की ब्रांड के निचे बात ही नहीं करती हो तुम्हारे लिए तो महंगी चीज ही अच्छी होती है सस्ता मतलब बेकार | हर सामान के लिए मॉल भागोगी सामने की दुकान से कुछ भी नहीं लोगी जहा वही चीज सस्ते में मिल जाएगी  , कभी बचत भी किया करो" और जैसे ही पत्नी ने बचत की पति  " ये कौन से ब्रांड का डियो ले आई हो मै इस ब्रांड का नहीं लगता हु " पत्नी " अजी पहले तो यही लगाते थे ,एक पर एक फ्री मिल रहा था ले आई " पति " क्या सेल से उठा लाई हो तुम्हारा तो कोई क्लास ही नहीं है कहने के लिए मॉल में जाती हो पर ढंग का सामान नहीं लाती कुछ भी सेल से उठा लाती हो और ये शर्ट कहा से लाई हो " " जी सामने वाली दुकान से " " क्या वो सामने वाली फटेहाल सी दुकान से वहा से तो मै अपने लिए रुमाल भी न लू उसके पास कुछ ढंग का मिलाता भी है तुम भी कही से भी कुछ उठा लाती हो "| लो कल्लो बात अब इनके लिए क्या ख़रीदे ???

साफ सफाई पसंद पति  :- इस टाईप के पति को घर हमेशा साफ सुथरा दिखना चाहिए | साफ सुथरे घर में ये आफिस से आते ही अपना बैग सोफे पे फेका और वही पर जूता उतर कर छोड़ दिया मोजो को ऊतार कर जूते में नहीं डालेंगे उसे सामने सेंटर टेबल पर रख देंगे फिर बेडरूम में जा कर कपडे बिस्तर पर छोड़ फ्रेस होने बाथरूम में चले जायेंगे और बाहर आ कर कहेंगे ये घर की क्या हालत बना दी है जब देखो पूरा घर फैला रहता है यहाँ वहा सामान फैला पड़ा है घर को ढंग से रखना आता ही नहीं | कुछ थोड़े व्यवस्थि होते है और अपने फैलाए सामान को समेटना शुरू कर कहते है इस घर की हालत देखो यदि मै यहाँ वहा से सामान न समेटू घर ढंग से न रखु तो घर घर नहीं कूड़ा खाना लगेगा | अब इनको क्या कहे ???

भोजन पसंद पति :- पत्नी ने बड़े प्यार उनकी फेवरेट वाला संभार बनाया और पति देव पहला चम्मच मुहं में डालते ही " तुमको तो संभार बनाना ही नहीं आता है कितना सडा सा लगा रहा है उस दिन देखो मिसेस रेड्डी ने कितना अच्छा संभार बनाया था और उस दिन छोले भी कितना बेकार बने थी मिसेस भल्ला के हाथ के छोले की तो बता ही कुछ और है " और बेचारी पत्नी " जिस सांभर को तुम सडा हुआ कह रहे हो और छोलो को बेकार उसी दोनों की रेड्डी जी और भाल्ला जी तारीफ करते नहीं अघाते एक कटोरी भेजती हूँ दूसरी कटोरी मांग कर ले जाते है " | अब इनको क्या खिलाए ???

मैनर वाले पति :- ऐसे पतियों के साथ यदि पत्नी उनके बॉस या किसी अति खास व्यक्ति के साथ भोजन करने जाये तो उसे इतने टेबल मैनर बताये जांयेंगे की पत्नी को लगेगा की उससे बड़ा गावर तो कोई होगा ही नहीं शायद वो किसी जंगल से पकड़ कर आई है पर जब पत्नी कभी पति साथ कही बाहर खाने को जाये तो पति देव खाना सर्व होते ही बिना किसी की और देखे खुद खाना शुरू कर देंगे  चाहे किसी और के प्लेट में खाना सर्व भी नहीं हुआ हो खाना खाते समय बड़ा बड़ा मुंह खोल कर आवाज करते हुए ऐसे खायेंगे की सामने बैठा क्या बगल की सिट वाला भी मुड़ कर देखने लगे , खाने के बाद पेट पर हाथ फेर कर जोर का डकार मार देंगे, वो भी तब जब कभी सामने पत्नी की सहेलिया हो या वो रिश्तेदार हो जिनको पत्नियों ने अपने पति के मैनर वाला होने की शान बघारी हो | मुफ्त का टूथ पिक देख उस पर टूट पड़ेंगे और वही सबके सामने दांत साफ करना शुरू कर देंगे भले घर पर कभी खाने के बाद दांत न साफ करते हो  | नाक में उंगली डालना , छिकते, खासते और जम्हाही लेते समय हाथ न रखना, सबके सामने कही भी खुजली करना सुरु कर देना , बिना हाथ धोए खाने बैठ जाना और  तुर्रा ये की ये सब चोचले है इन्हें घर पर करने की जरुरत नहीं है घर तो आराम से रहने की जरुरत है और यही हरकते जब उनका देख कर बच्चे करे तो " कैसी माँ हो बच्चो को जरा भी ढंग के मैनर नहीं सिखाया है करती क्या हो " |  अब इनको क्या सिखाये ???

पत्नी की हिफाजत करने वाले पति :- ऐसे पति बड़े हिफाजती होते है अपनी पत्नी को बहार ले जाने में बड़ा डरते है, दोस्तों के साथ कही घूमने का कार्यक्रम बना या एक दिन के पिकनिक का, कुछ अपनी पत्नी समेत जायेंगे पर कुछ पत्नी हिफाजती पति पहला फर्ज निभाते हुए पत्नी को हर कष्टों से दूर करने का प्रयास करेंगे , अरे कही तुम बीमार पड़ गई तो, तुम वहा क्या करोगी बोर हो जाओगी ,  वहा बहुत चलना पड़ता है तुम नहीं चल पाओगी, इतनी ठंडी गर्मी तुम बर्दास्त नहीं कर पाओगी ,अरे बच्चा इतना छोटा है उसे लेकर कहा बेकार में परेशान होगी ,तुम थक जाओगी नाहक, यही घर पर आराम से रहो मै हो कर आता हूँ | फिर बेचारे पत्नी को न ले जा पाने का कष्ट सह नहीं पाते है और जब वहा दूसरो को अपनी पत्नियों के साथ नाचे गाते आन्नद उठाते देखते है तो अपना गम  दूसरो की पत्नियों के साथ ही नाच गा मिटाते है " क्या भाभी जी एक डांस मेरे साथ भी क्या डांस करती है आप " अपने बच्चे घर पर छोड़ कर आते है और दूसरो के बच्चो के साथ वहा बड़ा प्यार जताते है सबके फेवरेट अंकल बन जाते है |
                        ऐसे पति प्रकृति प्रेमी भी होते है जब बाकि अपने बीबी बच्चो के साथ फोटो ले कर अपनी यादो को समेटते है तो ये बेचारे अपने कैमरा में प्रकृति की सुन्दरता को ही कैद कर संतुष्ट होते है | पहाड़, झरना, नदी, नाला, समंदर, रेत बर्फ आदि आदि की फोटो लेते रहते है पर ये अन्य प्रकृति प्रेमियों से थोड़े अलग होते है इसलिए इनकी फोटो में प्रकृति के सुन्दर नजारों के साथ ही आप पाएंगे की फोटो के एक कोने में या कभी कभी बीच में ,तस्वीर की सुन्दरता बढ़ाने के लिए कोई सुन्दर सुकोमल महिला या लड़की अवश्य होती है जो गलती से अचानक से इनकी प्राकृतिक फोटो में आ जाती है | अब इनको कहा घुमाये ???

 पत्नी की सुनने वाले पति :-पत्नी जब टोक दे की फलाने बाजार मत जाओ यो आज बंद रहता है तो उसकी बात अनसुना कर चल देंगे जब उसकी बात सही निकलेगी तो कहेंगे की मै तो जनता ही था कि  नहीं मिलेगा बाजार बंद होगा तुम पहले ही टोक जो दी थी, तुम टोको और कोई काम हो जाये होई नहीं सकता और जब पत्नी न टोके तो पहले क्यों नहीं टोका की आज वो बाजार बंद होगा बेवजह उतनी दूर जा कर पैसा समय बर्बाद किया | पत्नी याद दिलाए की बिल आया है जमा कर दीजिये तो कहेंगे की अभी कल आया है न आज समय नहीं है बाद में याद दिलाना जमा कर दूंगा और दो चार बार याद दिलाने पर कहेंगे की क्या किसी चीज के पीछे पड़ गई हो बार बार एक चीज की रट लगा दी है कहा ना समय मिलेगा तो जमा कर दूंगा आखरी तारीख बीतने के बाद पत्नी पूछेगी की जमा कर दिया तो कहेंगे की पहले क्यों नहीं याद दिलाया अब बता रही हो आखरी तारीख बीतने के बाद, पत्नी उत्तर देगी जिस दिन आया था उसी दिन याद दिला दिया था, तो जवाब मिलेगा की दो चार बार याद दिलाना था ना | अब इनको क्या क्या याद दिलाए ???

गैजेट पसंद पति :- हा इन पतियों को गैजेट काफी पसंद होते है खास कर अपनी पत्नियों के मोबाईल | उन्हें अपने मोबाईल  से ज्यादा अपनी पत्नियों के मोबाईल  पसंद होते है उसके गेम, उनकी मोबाई से ली तस्वीरे आदि आदि और इस की आड़ में ये पत्नियों की आई गई काल से लेकर सारे सन्देश भी छान मारते है की उनके पीछे पत्नी ने किस किस से बात की और किस किस का कितना फोन आया और कौन कौन किस किस तरह के संदेस पत्नियों के पास भेज  रहा है | वैसे ऐसे लोग सिर्फ पत्नियों के नहीं अपनी सभी महिला रिश्तेदारों के और जान पहचान वाले खासकर महिलाओ के फोन इसी तरह खंगाल डालते है | ( इस बारे में अगली पोस्ट में और विस्तार से लिखूंगी फ़िलहाल के लिए इतना ही | )

 बच्चो से प्यार करने वाले पति :- ऐसे पतियों को बच्चो से बड़ा प्यार होता है जैसे विवाह के बाद पत्नी कहती है की वो अभी बच्चे नहीं चाहती पहले कुछ साल एक दुसरे को समझने और अपने कैरियर को देना चाहती है तो तुरंत ऐसे पतियों को बच्चे के प्रति बड़ा प्यार पैदा हो जाता है और शुरू हो जाता है बच्चे की रट की मुझे बच्चे बड़े प्यारे लगते है, मै तो अभी एक बच्चा चाहता हूँ, हमें लगता है की पहले हमें एक बच्चा कर लें चाहिए फिर आराम से दूसरी चीजो के बारे में सोचना चाहिए, कही हम देर करे तो कल को बच्चे के लिए हमें तरसना ना पड़े उनको देखो उन्होंने देर की तो उन्हें हुआ ही नही, या घर में सभी हमारे बच्चे के लिए इंतजार कर रहे है माँ पापा की आँखे अपने पोता पोती के लिए तरस रहे है ऐसा करो एक बच्चा कर लेते है माँ उसे देखेगी तुम आराम से अपने काम को देखना कोई परेशानी नहीं होगी आदि आदि | अब पहला बच्चा हो गया तो, अरे मेरी माँ उसकी कैसे देखभाल कर पायेगी वो इतने छोटे बच्चे को कैसे संभालेगी , बच्चे की देखभाल तुम ही करो माँ अपने बच्चे को जितने अच्छे से संभाल सकती है कोई और उसे नहीं कर सकता वगैराह वगैराह, लो निकल गए चार साल और | चार साल बाद एक बार फिर पत्नी की इच्छा ने अंगड़ाई ली और वो बोली मुझे लगता है की अब मुझे अपने काम करने के बारे में सोचना चाहिए अब हमारी बेटा \ बेटी स्कुल जा रहे है मै खाली हूँ तभी पति की दुसरे बच्चे की इच्छा अंगड़ाई लेने लगती है | मुझे लगता है की हमें दूसरा बच्चा कर लेना चाहिए ,क्या है न की एक बेटा \बेटी तो है इस बार बेटा \बेटी हो जाये तो परिवार एक तरह से पूरा हो जायेगा, घर में दो बच्चे तो होने ही चाहिए दोनों के कम्पनी मिलती है फिर पत्नी को दो बच्चे होने के सारे फायदे गिना दिए जाते है और घर में दूसरा बच्चा आ जाता है और चार साल की छुट्टी |
 इनमे से भी कुछ ऐसे होते है जो बच्चो को कितना प्यार करते है की पूछिये मत पत्नी को सीधा फरमान रहता है की मेरे आने से पहले उसे सुला देना , मेरे सामने इसकी चिल्ल पो नहीं होनी चाहिए, यदि बच्चे बड़े है तो बच्चो को पापा के घर आते ही उनके कमरे में न जाने का फरमाना सुना दिया जाता है या तो उन्हें उनके कमरे में चुप चाप रहने को कह दिया जाता है या फिर उन्हें घर से बाहर खेलने के लिए कहा दिया जाता है और खाने और सोने के समय ही आने के लिए कहा जाता है | उफ़ ये प्यारे पापा ???

               वैसे ये लिस्ट यही ख़त्म नहीं होती है अभी तो इसमे कई और बाते जुड़ सकती है जो मुझसे छुट गई है वो आप पाठक पूरा कर दे मै पोस्ट में जोड़ती जाउंगी |
 एक नई फिल्म आई है उसका एक संवाद पोस्ट पर बिलकुल ठीक बैठता है तो उसका जिक्र कर देती हूँ कि
 " दुनिया की हर पत्नी कभी न कभी , कभी न कभी अपने पति से हमेशा के लिए छुटकारे के बारे में जरुर सोचती है " |
 वैसे पूरी तरीके से नहीं ( मतलब वो तरीका नहीं अपनाती या सोचती जो फिल्म में दिखाया गया है और छुटकारा की सोच कुछ समय के लिए ही हो सकती है  ) पर कुछ हद तक तो मुझे लगता है प्रियंका डार्लिंग ठीक ही कह रही है | :)))


February 18, 2011

ये कौन सी श्रेणी की ईमानदारी है - - - - - mangopeople




                                                        सेठ जी की दुकान में चोरी हो गई सेठ जी परेशान जाँच कराई तो पता चला की चोर तो दुकान के कर्मचारी ही निकले जो रात में आ कर दुकान से सामान चोरी कर गए थे पता चला की इस काम में सभी कर्मचारी लगे थे सिवाए एक के वो था दुकान का चौकीदार | सेठ जी ने उसे बुला कर पूछा की तुम्हारे रहते चोरी कैसे हो गई | चौकीदार बोला जी ईमानदारी तो मेरे खून में है इसी कारण तो आप ने मुझे दुकान का चौकीदार बनाया था | मैंने देखा की ये लोग दुकान से चोरी कर रहे है मैंने इन्हें ऐसा न करने को कहा भी पर ये नहीं माने और फिर मुझे लगा की अपनी ही दुकान है ये ज्यादा नहीं चुरायेंगे पर मै इमानदार बना रहा दुकान मेरे सामने खुली पड़ी थी पर मैंने उसमे से एक पैसा हाथ नहीं लगाया ये मेरी ईमानदारी का सबूत है आप जितना दोषी मुझे समझ रहे है उतना मै हूँ नहीं | 
                                        
                                                            अब ये बताइए की इस तरह की ईमानदारी को आप किस श्रेणी में रखेंगे , ऐसे ईमानदार चौकीदार का क्या किया जाये क्या हमें ऐसे साफ सुथरे चरित्र वाले व्यक्ति को फिर से चौकीदार बना कर अपने देश की बागडोर सौप देनी चाहिए | देश के प्रधान मंत्री के बारे में बार बार ये कहा जाता है की वो काफी ईमानदार है साफ सुथरी छवि वाले है योग्य है , पर ऐसी ईमानदारी का क्या फायदा की वो भले खुद न कुछ गलत करे पर दूसरो को करता देख चुप रहे घोटाले होते रहे और वो इसे गठबंधन की मजबूरी बताते रहे | देश का प्रधान मंत्री जिस को पुरे देश की खबर होनी चाहिए वो  ये कहे की उसे तो पता ही नहीं की उसके मंत्री इतनी बड़ी गड़बड़ी कर रहे है | जिस के नेतृत्व में देश को काम करना चाहिए वो ये कहे की उसने तो कहा था पर उसके मंत्रियो ने उसकी बात सुनी ही नहीं तो वो क्या करे | मंत्री मंडल का निर्माण करना प्रधान मंत्री का विशेषाधिकार होता है वो अपने टीम का चुनाव कर देश पर साशन करता है और  वो ये कहे की कौन मंत्री बनेगा ये वो तय नहीं कर सकता है और गठबंधन की राजनीती की मजबूरी गिनाये की उसे तो हर हल में दूसरो का सुनना है तो आप क्या कहेंगे, क्या देश को ऐसे प्रधानमंत्री  के भरोसे होना चाहिए | क्या उस व्यक्ति को ईमानदार कहा जा सकता है जो भले खुद कोई गलत काम न करे पर सब होता देखता रहे | कम से कम मै इसे ईमानदारी की श्रेणी में नहीं रखती हूँ और मनमोहन सिंह को उतना ईमानदार नहीं मानती जितना की उनके लिए प्रचारित किया जाता है |
                                                                         
                                                              ये बात सभी जानते है की यदि आज मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री की गद्दी पर है तो उसकी वजह उनका सीधा साधा, ईमानदार होना, चुपचाप हुकुम के गुलाम की तरह काम करना , षडयंत्र ,गद्दी, जमीनी और तिकड़म की राजनिति से उनका दूर होना है, उनका योग्य होना नहीं क्योकि उनकी योग्यता सिर्फ आर्थिक मामलों में है जो देश के वित्त मंत्री बनने (?) की योग्यता है प्रधानमंत्री की नहीं | देश को चलाने के लिए जिस मजबूती ,कूटनीति और शातिर दिमाग की जरुरत है वो मनमोहन सिंह के पास नहीं है वो योग्यता कांग्रेस में कई दुसरे नेताओ के पास थी पर उन्हें सत्ता नहीं सौपी गई क्योकि किंग मेकर को एक ऐसे व्यक्ति की जरुरत थी जो कठपुतली की तरह उनके इशारो पर काम करे और युवराज  के परिपक्त होने तक ही उसे संभाले उनके लिए एक साफ सुथरा काँटों से रहित रास्ता बनाये, ना की कुछ समय बाद गद्दी को हथिया ले | अपनी पहली पारी में वो उनकी उम्मीदों पर पूरी तरह खरे उतरे और ईनाम के तौर पर उन्हें दूसरी पारी भी खेलने के लिए दे दी गई | ये इनाम कठपुतली बने रहने के लिए दी गई थी ना की कोई अच्छा काम करने के बदले |
                                        
                                      कल जिस प्रधानमंत्री को अमेरिका से परमाणु समझौते के मुद्दे पर गढ़बंधन को तोड़ने में कोई हिचक नहीं थी आज वही प्रधानमंत्री एक भ्रष्ट व्यक्ति को फिर से मंत्री बनाने पर सफाई देते है की ये गठबंधन की मजबूरी है मंत्री बनाना उनके हाथ में नहीं था | गठबंधन की राजनीति में कुछ मजबूरिय होती है सभी जानते है किन्तु ये सरकार बचाने और बनाने की मजबुरिया इतनी बड़ी भी नहीं होती की उन्हें देश हित से ऊपर रख कर जानबूझ कर एक ऐसे व्यक्ति को मंत्री बना दिया जाये जो पहले की देश को लाखो करोड़ का चुना लगा चूका हो और अपनी तिजोरिया भर चूका हो | प्रधानमंत्री का ये बयान तो ये दरशाता है की कल को वो जेल में बंद किसी अपराधी को भी मंत्री बनाने से नहीं हिचकेंगे बस उनकी सरकार बननी चाहिए | क्या ये ईमानदारी है अपने हित के लिए देश हित को भुला देने ईमानदारी है | इसको छोडिये कामनवेल्थ गेम्स में जो घोटाले हो रहे थे उन्हें नहीं रोक पाना और सब पता लगने के बाद भी कलमाड़ी को उनके पद से नहीं हटाने की क्या मज़बूरी थी यहाँ तो कोई गठबंधन की मज़बूरी नहीं थी फिर उन्हें हटाने में इतना समय क्यों ले लिया गया |
                                                २- जी घोटाले पर वो कहते है उन्हें कुछ पता ही नहीं की राजा इतनी बड़ी गड़बड़ी कर रहे है |  क्या ये सही है की देश के प्रधानमत्री को अपने मंत्रियो के कारनामे ही पता नहीं है जबकि ऐसे लोगो की कोई कमी नहीं है जो ये बात साबित कर चुके है की इस गड़बड़ी की शिकायत तुरंत ही प्रधानमंत्री को कर दी गई थी | आर्थिक मामलों के महान जानकर(?) हमारे प्रधानमंत्री ये नहीं जानते की मंहगाई कैसे काबू में किया जाये किसानो की आत्महत्याए कैसे रोकी जाये | ये मामले सिर्फ कृषि मंत्री के जिम्मे नहीं है (वैसे वो अपनी तरफ से पूरा प्रयास कर रहे थे और अपने बयानों से मंहगाई को बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे ) ये सीधे सरकार की नीति से सम्बंधित है जिसके लिए प्रधानमंत्री जिम्मेदार है , पर आर्थिक मामलों के जानकर प्रधनमंत्री ने किया क्या कुछ भी नहीं सिवाए कोरे आश्वासनों के जो कभी पुरे नहीं हुए |  
                                                                             अब इसे देश की विडम्बना ना कहे तो क्या कहे जब देश का प्रधनमंत्री सबसे ईमानदार है तभी देश में घोटालो की लाइन लगी है एक घोटाले की खबर ख़त्म नहीं होती दूसरी सामने आ जाती है अब इसरो से जुड़ा घोटाला सामने आ गया है कहा जा रहा है की डील तो हुई थी किन्तु उसे लागु नहीं किया गया था इसलिए इसे घोटाला नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे "घेलुवा"  | ये सब देख कर तो यही कहना होगा की भगवान बचाए ऐसे ईमानदार प्रधानमंत्री से जिसके रहते इतने घोटाले हो रहे है और ईमानदारी का लेबल नहीं उतरता | जिस तरह कभी अटल जी एन डी ए के मुखौटा भर थे आज उसी तरह मनमोहन सिंह भी यु पी ए के मुखौटा बन गए है |



चलते चलते 
               सरकार विपक्ष के जेपीसी जाँच की मांग को नहीं मान रही है आप को क्या लगता है क्यों ?
 उसे सच सामने आने का डर है |
वो विपक्ष के आगे झुकाना नहीं चाहता |
वो विपक्ष के हाथ अपने अपराध का सबूत नहीं देना चाहता |
  नहीं जी ये बात नहीं है इसके पीछे एक अंधविश्वास है कि जिस भी सरकार ने जेपीसी की मांग मानी है अगली बार उसकी सरकार चली गई है | अब तक दो बार जेपीसी बनी है और उसे बनाने वाली सरकारे चली गई है | जिसमे एक बार तो खुद कांग्रेस की ही सरकार थी जब राजीव ने लगभग ४५ दिनों के हंगामे के बाद बोफोर्स पर जेपीसी बनाने की मांग मान ली थी और उसके बाद क्या हुआ सब जानते है | अब सुनने में आ रह है कि बजट सत्र में ये मांग मान ली जाएगी तो क्या मनमोहन सिंह के दिन पुरे होने वाले है .........





February 15, 2011

हम टैक्स बचाते है चुराते नहीं - - - - - - -mangopeople



                                                          मार्च आने वाला है सब लगे है अपना अपना टैक्स चुराने उप्स बचाने में कैसे कितना टैक्स बचा ले | नौकरी पेशा वालो में ज्यादातर तो पहले ही अपना अपना इंतजाम कर चुके है लेकिन अपना काम  धंधा करने वाले और नौकरी के अलावा साईड इनकम वाले पैसे ठिकाने लगने में लगे हुए है | मुझे लगता है की वो लोग बेफकुफी करते है, टैक्स बचाना ( चुराना ) कोई एक या दो महीने का काम नहीं है ये तो पूरे साल चलने वाली सतत गतिविधि है जो निरंतर चलते रहनी चाहिए ना की फ़रवरी में आ कर हड़बड़ी करनी चाहिए | टैक्स बचाऊ मौसम में मेरा एक प्रकाशित लेख फिर से प्रकाशित कर रही हूं कुछ संसोधनो के साथ ताकि जो बेचारा आम आदमी अब तक ये ना कर सका हो उसे कुछ उपाय पता चले अपने करो को बचाने के |

                                                                   बस बजट आने वाला है सभी की निगाहे बजट का बाट जो रही है जैसे की कोई जादू हो जायेगा और रातो रात महंगाई ख़त्म हो जाएगी जबकि दादा ने खुद कह दिया है की उनके पास कोई जादुई चिराग नहीं है जो मंहगाई कम कर दे फिर भी हम भारतीय हमेशा चमत्कार की आस लगाये बैठे रहते है | वैसे आम आदमी को मुझे नहीं लगाता है की कुछ मिलेगा पर हा इस बार कुछ ऐसा भी नहीं होने वाला है जिससे उसकी जेब ढिली होने की संभावना हो , नहीं जी प्रणव दादा को हमारी फिकर नहीं है जी उन्हें तो अपने राज्य में होने वाले चुनावों की फिकर है इसलिए लगता है की दादा और दीदी दोनों इस बार अपने अपने बजट में आम आदमी को कमर तो नहीं तोड़ेंगे |  अच्छा हो यदि हर साल मई जून  में किसी न किसी राज्य में चुनाव हो इस तरह महगाई के बीच बजट में किसी चीज का दाम बढ़ाने से पहले दस हजार बार सोचेंगे हमारे वित्त मंत्री लोग  | अब बेचारे आम आदमी का क्या होगा एक तो पहले से ही महगाई की मार से मरे जा रहा था उस पर से पेट्रोलियम पदार्थो के दाम लगातार बढने से तो हर चीज के दाम और बढाने का दुकानदारो को वजह मिल जाता है  (वैसे उन्हें दाम बढाने के लिए किसी वजह की जरुरत नहीं है) | सही कहा गया है कि आम आदमी की कोई सुध नहीं लेता है | अब देखीये न प्रणव दा ने पिछले साल कहने के लिये तो आय कर में राहत दी है पर ये राहत मिल किसको रही है उन्हें जो ज्यादा कमाते है | साल के तीन लाख तक कमाने वाले को कोई फायदा ही नहीं है जिसे असल में इस राहत की जरुरत थी पर राहत मिल किसे रही है जो इससे ज्यादा और ज्यादा कमा रहा है |  कहने के लिये तो ये आम बजट होता है पर आम आदमी से इसका कोई मतलब ही नहीं होता है |
 
                                                              आयकर विभाग कहता है की विकास  के लिये हमें आयकर और हर तरह का कर भरना चाहिए , विकास  के लिये पैसे की जरुरत है ( तो विकास  के घरवालो से मागो ना ) इसलिये हमारी जेब काटी जा रही है सीधे से नहीं पीछे से | अरे लेना है तो उन उद्यियोगपतियों से मागो जो फोर्ड पत्रिका के रईसों कि सूची में दिन पर दिन ऊपर चढ़ते जा रहें है, पुरे विश्व में बड़ी बड़ी कंपनिया खरीद रहे है, हम तो राशन की  दुकान से राशन भी नहीं खरीद पा रहे है | वो सब तो लाखो खर्च करके(सी ए को देकर) करोडो अरबो बचा लेते है पर एक नौकरीपेशा आम आदमी की तो ये हालत है कि पहले टैक्स कटता है फिर वेतन हाथ में आती है | वो चोरी कर करके दिन पर दिन और अमीर बनते जा रहे है और हम टैक्स भर भर कर आम आदमी ( आम आदमी का मतलब ही है गरीब बेचारा) बनते जा रहे है |
   
                                                 ऊपरवाला जनता है जो हमने एक ढ़ेले कि टैक्स चोरी की हो, अब जब ऊपरवाले का नाम लिया है तो थोड़ी ईमानदारी बरतनी चाहिए हा एक दो बार थोडा सा टैक्स बचाया है देखीये मै पहले ही कह दे रही हु की टैक्स बचाया है चोरी नहीं की है अरे भाई जहा से गहने खरीदे थे वो हमारे परचित है हम सात पुस्तो से वहा से गहने खरीद रहे है इस नाते उन्होंने सलाह दिया कि क्यों बेकार में पक्का रसीद बनवा रही है टैक्स देना पडेगा कच्चा रसीद बनवाइये टैक्स बच जायेगा तो हमने टैक्स बचा लिया इसमे कौन से बड़ी बात है कौन से हमने रईसों की तरह लाखो करोडो के गहने ख़रीदे थे , सरकार का ज्यादा कुछ नहीं गया |
                                       
                                              देखीये एक हाथ से जो थोडा बचाया वो दुसरे हाथ से भरवा भी दिया गाँव में पिताजी ने नया मकान खरीदा पुरे बीस लाख का और रजिस्ट्री कराने लगे सिर्फ पांच लाख की मैंने सीधा विरोध किया ये भी कोई बात हुई बीस का मकान और सिर्फ पांच की दिखा रहे है इतना टैक्स की चोरी ठीक नहीं है कम से कम छ: लाख तो दिखाइए ही, पड़ोस का घर भी इतने में ही गया है इससे कम दिखाया तो फंस जायेगे जितना बचाया है उससे ज्यादा चले जायेगे | देखीये कई बार क्या होता है की टैक्स बचाना मजबूरी हो जाती है अब जब पिता जी ने घर लिया है तो उसके लिए फर्नीचर वगैरा तो लेना ही पड़ेगा भैया ने सीधा कह दिया की पापा चुप चाप  फर्नीचर लीजिये और घर चलिए रसीद पुर्जा के चक्कर में मत पड़िए बेकार में ऐट वैट भरना पड़ जायेगा फिर टैक्स ही भरते रहियेगा क्योकि फिर कुछ और खरीदने के लिए पैसा ही नहीं बचेगा | बात तो वह सही कह रहा है अब इस मजबूरी को तो सरकार को समझाना ही चाहिए |
   
                                                                        देखा हम तो फिर भी भले लोग है जितना हो सके टैक्स भरते रहते है (क्या करे मजबूरी है वेतन टैक्स काट कर ही मिलता है ) नहीं तो लोग टैक्स बचाने  (चुराने) के लिए क्या नहीं करते | अब हमारे पड़ोसी को ही ले लीजिये एन जी ओ चलाते है कोई ऐसा वैसा एन जी ओ नहीं है बाकायदा सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त है | काफी अच्छी इनकम होती है और काम कुछ नहीं करना पड़ता है बस लोगों के सफ़ेद को काला करते है (ताकि दिखाई न दे) लोगों से दान लेते है और दो प्रतिशत काट के बाकि  पैसे वापस कर देते है | सुना है कभी कभी कुछ भलाई का काम भी करते है  कुछ गरीब बच्चो को पढ़ा देते है या गरीब महिलाओ को कुछ सिलाई वगैरा भी सिखा देते है | हमसे भी कितनी बार कहा की भाई साहब क्या खामखाह में वेतन से इतना टैक्स कटवा देते है आखीर हम और हमारी संस्था किस काम आयेगी | पर मैंने साफ मना कर दिया की "मुझे इन चीजो में बिलकुल भी विश्वास नहीं है हम तो पुरा कर भरेंगे " मैने उनकी संस्था को कोई दान नहीं दिया | पड़ोसी है उनका क्या भरोसा पड़ोसियों का काम ही जलना होता है क्या पता पैसे ले और वापस ही न करे तो, जितना टैक्स बचेगा नहीं उससे ज्यादा चला जायेगा | मै तो कोई दूसरा ज्यादा विश्वसनीय संस्था खोज रही हु जहा पैसे वापस मिलाने की गारंटी हो |
                                                                     
                                            हम जो भी काम करते है सोच समझ कर करते है और पहले ही कर लेते है ई नहीं की बाद में अफसोस हो की ये पहले ही क्यों नहीं किया | मेरे पति ने तो हमारा घर ही हमारे नाम पर लिया एक तो माहिला के नाम घर लेने पर ही कुछ कर में छुट मिल गई फिर हमारे उन्होंने कहा की घर तुम्हारे नाम रहा तो सारे जिंदगी तुम्हारे किरायेदार के रूप में रहूँगा और जो तुम्हे किराया दूंगा उस पर कर की बचत हो जाएगी | मेरे वो दूसरो की तरह नहीं है की खुद को किरायदार बताये और अपने मकान मालिक पत्नी,माँ या पिताजी को किराए का पैसा न दे महीने की पहली तारीख को मेरे बैंक खाते में किराया जमा कर देते है अजी उन्ही पैसो से तो घर चलता है |
       
                                                                           हम पत्नियों पर पतियों को किसी अन्य मामले में विश्वास और हमारा ख्याल हो न हो  पर उनकी साइड इनकम और इनवेस्टमेंट हमारे ही नाम होती है हमारा भविष्य सुरक्षित रखने के लिये (इसे ऐसे पढ़े अपने इंवेस्टमेंट से होने वाली इन्कम को सुरक्षित करने के लिए ) चाहे शेयर बाजार में पैसा लगाना हो या कोई बड़ी रकम फिक्सडिपोसिद करना हो या फिर कोई जमीन जायदाद खरीदना हो सारे इन्वेस्टमेंट  घर गृहस्थी में सारा जीवन गुजार देने वाली हम पत्नियों के नाम ही होता है | इस तरह शेयर बाजार में बढ़ा पैसा और मिलनेवाला ब्याज उनकी आय में नहीं जुड़ता है और न ही उस पर कर देना पड़ता है जरुरत हुई तो हमारे नाम भी रिटर्न फाइल कर दिया जाता है कुछ छोटा मोटा काम दिखा कर, पर आय उतनी ही दिखाई जाती है कि कर न भरना पड़े |  
    
                                                                    अब सौ करोड़ से ऊपर की आबादी में से यदि एक हम कुछ टैक्स बचा भी लेते है तो क्या फर्क पड़ने वाला है | यदि एक बड़े घड़े में एक बूंद पानी हम न डाले तो कोई बड़ा फर्क नहीं होने वाला है | कहते है की देश के विकाश के लिये पैसे चाहिए अरे भाई जितना देते है उसमे ही कितना विकाश कर लिया है | बिजली सड़क पानी कौन सी हमारी समस्या हल हो गई है इन सब चीजो का हाल बेहाल है | ज्यादा दे भी दिया तो कोई भी फायदा नहीं होने वाला है सब नेताओ के भ्रष्टाचार के भेट चढ़ जायेगा | इससे अच्छा है इन पैसो से कुछ अपना विकाश किया जाये , देश के विकाश के लिए पैसे देने के लिए तो पुरा देश पड़ा है |  
        
 
 

February 08, 2011

राजनीतिक हत्याये कितना सच कितना झूठ ? - - - - - - mangopeople



                                                              अभी हाल में ही टीवी पर एक फिल्म देखी थी "राजनिती" देखने से पहले सोचा था की अच्छी राजनीतिक दांव पेंच दिखाया जायेगा ऐसी फिल्मे अच्छी लगती है, किन्तु फिल्म देख कर निराशा हुई क्योकि फिल्म में जिस तरह से एक के बाद एक राजनितिक हत्याए दिखाया जा रहा था कि कैसे लोग अपने विरोधियो की हत्या किये जा रहे थे वो सही और वास्तविक नहीं लगा | अपने विरोधियो की हत्या करना गैंगवार लगता है राजनिती नही वास्तविक राजनीति में ऐसा कम ही देखने में आता है की कोई अपने राजनितिक विरोधियो का एक के बाद एक हत्या करवाता चला जाये | हा लोग एक दूसरे पर झूठे सच्चे मुकदमे करते है सरकार में आने के बाद तरह तरह की जाँच करवाते है और सबूत हाथ में आने के बाद उसका राजनीतिक फायदा उठाते है समय समय पर उनका अप्रत्यक्ष सहयोग लेते है उन्हें हमेशा के लिए जेल में नहीं डालते या सजा नहीं दिलाते है | कई बार हमने देख होगा की इधर सरकार पर कोई संकट आया उधर मुलायम, मायावती ,लालू  और किसी भी छोटे मोटे विरोधियो पर सी बी आई कोई जाँच, मुक़दमा की कार्यवाही शुरू हो जाती है सरकार को समर्थन मिल जाता है और जाँच फिर से ठन्डे बस्ते में चली जाती है | अभी हाल में ही सी वी सी थामस के मुद्दे पर जो सुषम स्वराज मीडिया में बोल रही थी की वो सरकार के खिलाफ  हलफनामा देंगी वो बाद में चितम्बरम के एक फोन के बाद शांत हो जाती है यानी विपक्ष भी सरकार को किसी ऐसे मामले में नहीं फसाती की वो क़ानूनी पचड़े से बाहर  ही ना आ सके या तकनीकी रूप से उसमे बुरी तरह से फंस जाये |
                           ये देख कर साफ लगता है की सारे नेता एक दूसरे से अच्छे से मिले होते है और भले बाहर एक दूसरे की गलतियों, नीतियों पर उँगली उठा कर राजनीतिक फायदा उठाते हो पर एक दूसरे की हत्या करनी जैसी बाते थोडा गले नहीं उतरती है | अब पाकिस्तान में बेनजीर भुट्टो की हत्या में मुशर्रफ के खिलाफ भी मुक़दमा किया गया है उन्हें हत्या के षड्यंत्र में शामिल बताया जा रहा है | ये सुन कर समझ नहीं आता की सच क्या है क्या वाकई ऐसा है या पाकिस्तानी सरकार मुशर्रफ के पाकिस्तान लौटने और उनके राजनीतिक पार्टी बनाने से डर कर उनके खिलाफ ये सब कर रही है | अंत में होना कुछ भी नहीं है, ये करके शायद मुशर्रफ को पाकिस्तान आने से रोकने का प्रयास किया जा रहा है उन्हें गिरफ़्तारी का डर दिखाया जा रहा है | पाकिस्तान के लोगों की भावनाए भारत के लोगों से बहुत अलग नहीं होती है इस वास्तविकता से मुशर्रफ़ भी परिचित होंगे क्या वो इतना भी नहीं समझ सकते है की चुनावों के समय एक बड़े नेता की इस तरह हत्या लोगों में उनकी पार्टी के प्रति सहानभूति की लहर पैदा कर सकती है और अंत में हुआ भी वही| फिर किस किस नेता को मारते बेनजीर की तो हत्या हो गई क्या उसके बाद उनके लिए हालात बदले, बेनजीर नहीं तो किसी और नेता को तो गद्दी पर बैठना ही था | हालात ये है कि आज खुद निरवासित जीवन जी रहे है अपने देश आने की हिम्मत भी नहीं है | बेनजीर होती तो भी उनका यही हाल होना था |
                          ये केवल पाकिस्तान का मामला नहीं है भारत में हुए कई हत्याओ और मृत्यु के पीछे भी षडयंत्र की बात सामने आती रही है उनमे कितना सच है कितना झूठ पता नहीं | कही पढ़ा था की शास्त्री जी के रूस में मृत्यु को भी संदेह की नजर से देखा जाता है | अभी हाल ही में उनके मौत के मामले में सूचना के अधिकार के तहत कुछ जानकारिया मांगी गई तो वो नहीं दी गई और बताया गया की उनका कोई पोस्मार्टम नहीं हुआ था जिस पर काफी सवाल उठाये गए थे और उनकी प्राकृतिक मृत्यु पर संदेह जताया गया था | पता नहीं सच क्या है  फ़िलहाल तो उनका परिवार उसी कांग्रेस में है और उसे कोई परेशानी नहीं है |
                        इसी तरह सोनिया गाँधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद भी जिस तरह से एक के बाद एक बड़े कांग्रेसी नेताओ की दुर्घटना में मौत हुई उसमे भी कुछ गड़बड़ी मानी जाती है जैसे राजेस पायलट की मौत एक सड़क दुर्घटना में और माधवराव सिंधिया की मौत प्लेन क्रैस में हुई | कहा जाता है की जिस प्लेन से सिंधिया की मौत हुई उसमे उनके साथ शीला दीक्षित और कुछ और बड़े नेता जाने वाले थे किन्तु बिल्कुल अंतिम समय पर वो नहीं गये और अकेले सिंधिया जी गये और उनकी मौत हो गई | ये बाते तो उनकी मौत के समय ही काफी फैली थी खुद मुझे भी इसमे सक होता था पर उतने विस्तार से जानकारी नहीं थी पर ब्लॉग जगत में आ कर  इस बारे में और विस्तार से पढ़ लिया | पर लगता नहीं कि ये सच कभी भी बाहर आयेगा कि ये मात्र अफवाह है या वाकई ऐसा है |
                     कभी कभी तो इन रहस्यमयी मौतों को लेकर ऐसी ऐसी बाते लोगो के बीच फ़ैल जाती है की एक बारगी सोचना पड़ जाता है की इन्सान आखिर क्या क्या सोचता है और राजनीति जगत को ले कर उसके मन में कितनी नकारात्मक बाते भरी है | जब संजय गाँधी की मृत्यु हुई थी तब मेरा जन्म भी नहीं हुआ था अतः ये तो नहीं पाता की उनकी मौत के बाद क्या क्या बाते खबरों में आई या फैली किन्तु बड़े होने के बाद लोगो के मुंह से सुना जो यहाँ तक कह जाते है की उनकी हत्या की गई थी और उसके पीछे इंदिरा जी थी जो उनके रवैये और अपनी सत्ता के उनकी तरफ खीचने से परेशान थी | यहाँ तक कह दिया गया की जब उनके मौत की खबर आई तो इंदिरा एयरपोर्ट गई और मृत संजय के हाथ से एक घडी निकाल ली असल में उसमे उनके स्विस बैंक का खाता नंबर और कोड था ( लो जी यदि आप से सोचते है की ये स्विस बैंक में ब्लैक मनी वाली बात आज की है तो ये आप की भूल है  उस ज़माने में भी स्विस बैंक और उसके खाते को लेकर इतनी बाते थे ) और बेचारी मेनका गाँधी के हाथ कुछ नहीं आया जो वहा पहुँचने में देर कर दी | मतलब ये की माँ और पत्नी वहा घडी के लिए गई थी उनको देखने के लिए नहीं |
                                 उफ़  ये सब सुन कर थोडा अजीब लगता है की राजनितिज्ञो के लिए लोगो के मन में कैसी कैसी भावनाए होती है लोग उनको कितना गिरा हुआ समझते है |  पता नहीं उन्हें इस बात की जानकारी है की नहीं की एक आम आदमी उन लोगो के बारे में कितना कुछ सोच जाता है |  ये बाते पहले बस सुनी सुनाई सी थी पर ब्लॉग जगत में कही लेख पढ़ा जिसमे बाकायदा सबूत भी दिए गए थे कुछ तकनीकी सवाल भी उठाये गए थे | उसी तरह पायलट और सिंधिया के मौत पर भी वहा काफी कुछ कहा गया था |
               मुझे लगता है की यदि कोई किसी को राजनीति से हटाना चाहता है तो उसके कई उपाय है और लोग उसे अपनाते भी है अपने विरोधियो को परास्त करने के लिए वो विरोधी चाहे दूसरी पार्टी के हो, सहयोगी पार्टी के हो, या अपने ही पार्टी के लोग है | आज उमा भारती , गोविन्दाचार्य , नटवर सिंह  , अमरसिंह जैसे कई बड़े नाम है जिनका एक समय राजनिती में बड़ा नाम था पर ये सब आज कहा है कोई नहीं जनता राजनीति के ये सब लगभग शून्य हो चुके है | सभी जानते है की इसके पीछे उनके विरोधियो का हाथ था | यहाँ तक की लोग अपने सहयोगी दलों से भी लोगों को निकलवा दिया जाता है सभी जानते है की शिव सेना से संजय निरुपम को बाहर का रास्ता बी जे पी नेता प्रमोद महाजन के कारण दिखाया गया था | इस तरह की लोगों की लिस्ट काफी लंबी है |
            ऐसा नहीं है की राजनीतिक हत्याए होती ही नहीं पर उनमे वो लोग ज्यादा शामिल होते है जो पहले से ही अपराधी प्रवित्ति के होते है और कई बार तो विरोधी होने के कारण नहीं बल्कि अपना राज छुपाने के लिए भी अपनो की हत्या कर दी जाती है  जैसे झारखण्ड के गुरु जी के ऊपर आज भी हत्या के केस में फंसे है | अब क्या कहा जाये की इसमे सच क्या है, वैसे भी हम जिस देश के वासी है वहा गद्दी के लिए अपनो की हत्याओं की पुरानी परम्परा है |

 चलते चलते 

             जब राजीव गाँधी की हत्या हुई थी तो सभी को सुबह अखबारों के जरिये ही पता चला था जिसने पढ़ा उसे ही आश्चर्य हुआ और कइयो को तो इस खबर पर विश्वास ही नहीं हुआ | उनकी मौत के कुछ दिनों बाद मेरे एक रिश्तेदार बिहार के छपरा से आये बताने लगे की जिस दिन छपरा में सभी को उनकी मौत के बारे में पता चला लोग विश्वास नहीं कर पा रहे थे तभी सभी जगह ये अफवा फ़ैल गई की असल में राजीव जिन्दा है और उनको अपने हत्या के षडयंत्र के बारे में पहले ही पता चला गया था इसलिए वो अमेरिका चले गए थे और अपनी जगह नकली राजीव वहा गए थे और उनकी हत्या हो गई राजीव किसी भी समय अमेरिका से विमान से भारत आ जायेंगे | वो दूरदर्शन का जमाना था और कार्यक्रम २४ घंटे नहीं आते थे एक निश्चित समय बाद कार्यक्रम नहीं आता और टीवी केवल झिलमिल करता था जिसे हम सभी कहते थे की बारिस हो रही है | इस खबर की पुष्टि को  देखने के लिए लोग पुरा दिन वहा पर टीवी खोल कर उसकी बारिस देखते रहे |
           


                                    
               

February 01, 2011

द्वन्द एक पश्चिम की नारी और एक भारतीय माँ - - - - - - - mangopeople


                                                     

                                          बात आज से सात साल पहले की है मेरी एक मित्र को गर्दन में बार बार दर्द होता था अक्सर हमें गलत तरीके से सोने या तकियों की वजह से हो जाता है वैसा ही, वो फिजियो थेरेपिस्ट के पास जा कर उसकी सिकाई करवाने लगी साथ ही उसकी बताई कसरत भी करने लगाई | जो बीमारी ये सब करने के बाद दस दिन में ही ठीक हो जानी चाहिए थी वो महीने भर तक ठीक नहीं हुई फिजियो थेरेपिस्ट थोडा शंकित होने लगा बोला आप का पुरा चेकअप करता हु और जैसे वो हथोडी से शरीर के कुछ खास बिन्दुओ पर मार मार कर चेकअप करते है करने लगा फिर बोला आप काफी हाइपर है क्या अक्सर आप को शारीरिक रूप से परेशानी होती है | तो मेरी मित्र ने बताया की नहीं वो काफी शांत स्वभाव की थी किन्तु तीन साल के बच्चे के कारण अभी थोड़ी चिडचिडापन आ गया है हा थोड़ी शारीरिक परेशानी अभी एक साल से हो रही है | डाक्टर ने कहा नहीं बात सिर्फ यही नहीं है आप क्या काम करती है उसने कहा फिलहाल कुछ नहीं बच्चे के कारण तीन साल से छोड़ दिया है पहले करती थी |  वो इंटीरियर डिजाइनर थी और आठ साल उसने ये काम किया और बच्चे होने के बाद छोड़ दिया | डाक्टर ने कहा की आप फिर से काम शुरू कर सकती है तो करे आप की समस्या मानसिक ज्यादा है शारीरिक कम | उसने घर आ कर मुझे ये बताया हमने मिल कर सौ खरी खोटी उस डाक्टर को सुनाई की फिजियो हो कर वो हमें मनोवैज्ञानिको की तरह सलाह दे रहा है इलाज नहीं कर सका तो बहाना मार रहा है | फिर भी मैंने अपने सहेली से कहा की अब तो बच्चा स्कुल जाता है तुम घर में ही एक दो काम क्यों नहीं ले लेती तुम्हारी बिल्डिंग में ही कई लोग घर रिन्यू करा रहे है उनसे बात करो और कुछ करो | एक साल बाद ही वो घर बैठ कर अपना काम करने लगी जितना समय मिलता बस उतना ही काम लेती और आराम से घर और अपना कैरियर संभालने लगी | साल भर बाद आ कर मुझसे कहने लगी की जानती हो उस फिजियो ने शायद सही कहा था, मेरी समस्या शारीरिक कम मानसिक ज्यादा थी अब मुझे बार बार वह गर्दन की समस्या नहीं होती है और मेरा चिड़चिड़ापन भी चला गया जो मै बच्चे के कारण समझती थी |
                             

                                                                         आप को भी सुन कर थोडा आश्चर्य होगा किन्तु ये सच है ये समस्या केवल मेरी मित्र की नहीं है बल्कि भारत की उन लाखो महिलाओ की है जो योग्यता और इच्छा होने के बाद भी परिवार बच्चे के लिए अपना काम बंद कर देती है | कुछ महिलाए है जो बच्चो को परिवार के अन्य सदस्यों के पास छोड़ कर या आया के पास छोड़ कर अपना काम जारी रखती है किन्तु कुछ है जो अपने बच्चो को दूसरो के भरोसे नहीं छोड़ना चाहती और खुद ही अपना कैरियर त्याग देती है | ऐसा नहीं है की वो घुट कर जी रही है या परिवार का दबाव है, वो खुद अपनी इच्छा से ये करती है किन्तु बच्चे के बड़े होने के साथ ही जब उन्हें थोडा समय मिलने लगता है तो उनके अंदर एक खीज एक गुस्सा धीरे धीरे पनपने लगता है अपने ही उस फैसले के खिलाफ जो उन्होंने अपनी ख़ुशी से लिया है  जिसको ज्यादातर महिलाए पहचान ही नहीं पाती है | बार बार  शारीरिक समस्या होना बात बात पर चिढाना हर बात को दिल से लेना कभी कभी गुमसुम हो जाना दूसरो पर चीखने चिल्लाने लगाना हर किसी को सक की नजर से देखना जैसे अनेक लक्षण सामने आते है इस अंदरूनी खीज और दर्द के कारण  | ये समस्या उनमे ज्यादा होती है जिनके लिए काम उनका जूनून होता है १० से ५ का नौकरी नहीं या जिन्होंने अपने काम के लिए विशेस योग्यता पाने के लिए खासी मेहनत की हो खूब पढाई की हो जैसे डाक्टर, इंजीनयर, आर्किटेक, वकील, अनेक है | काम के प्रति जुनून होने और मेहनत से पाई योग्यता जब बेकार जाती है तो अंदर ही अंदर एक दर्द पलने लगता है जिसे वो खुद ही नजर अंदाज करती चलती है |
             
                                                     मै कॉलेज में थी तो मेरी राजनीति शास्त्र की लेक्चरर ने एक बात कही थी |  ३४ की उम्र में उनका विवाह हुआ और ३५ में बच्चे , जे एन यु से गोल्ड मेडलिस्ट पीएच डी ,  लम्बा ना छोड़ने लायक कैरियर पर बच्चे की चिंता, इन सब के बीच जब वो हमें पढ़ाने आई तो बोली की रोज यहाँ आने से पहले मुझे खुद से एक युद्ध लड़ना पड़ता है युद्ध होता है एक पश्चिम की नारी और एक भारतीय माँ के बीच, मै दोनों को ही हारता नहीं देखना चाहती है और दोनों ही अपनी जगह सही है ,या तो दोनों रोज थोडा थोडा हारेंगी या ये रोज का द्वन्द एक दिन किसी एक की मौत के साथ बंद होगा | यही कारण है की ये समस्या एक भारतीय माँ के लिए बड़ी हो जाती है वो एक पश्चिम की नारी ( इसका अर्थ यहाँ नारी के अस्तित्व की पहचान बनाने से है ) तो बन गई है पर उसके अंदर की एक भारतीय माँ कही नहीं गई है और वो अपने बच्चे और परिवार को भी उतना ही या कहु थोडा ज्यादा महत्व देती है और जिंदगी एक मोड़ पर उसे दो में से एक चीज चुनने के लिए कह देती है | बच्चा और परिवार उसके लिए साँस लेने जैसा है तो उसका काम और कैरियर उसके लिए जीवन में पानी जैसा है और जीवन के एक मुकाम पर आ कर उन्हें दोनों में से एक चुनना पड़ता है | यानी उस महिला की मौत निश्चित है साँस लेना छोड़ा तो अभी मर जाएगी पानी छोड़ा तो कुछ दिन बाद मर जाएगी | माँ का अस्तित्व या खुद का अस्तित्व दोनों में से एक की मृत्यु तो होगी है |
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January 26, 2011

आखिर देश है क्या ???- - - - - - - -mangopeople



                                                             हर नागरिक को झंडा फहराने की आजादी मिलने के बाद आम आदमी अब ज्यादा झंडे से जुड़ा दिखता है आज रास्ते से गुजरते समय आधे से ज्यादा लोगों के सिने पर झंडा लगा दिखा और रास्ते में चल रहे लगभग सभी बच्चे के हाथ में छोटे छोटे झंडे इस दिन को बच्चो से भी जोड़ रहे थे इन बच्चो में हमारी बिटिया भी थी हाथ में झंडे को झुलाती चली आ रही थी तो लगा जब उन्हें ये दिलाया है तो उससे जुडी कुछ जिम्मेदारिया भी बताते चले सो उन्हें कहा की कभी भी अपने तिरंगे को जमीन से छूने नहीं देते है और ना ही उसे कभी नीचे करते है उसे हमेसा ऊपर की और रखते है | बिटिया ने कहा की ये करना बैड मैनर्स होता है मम्मी, मैंने जवाब हा में दिया तो उन्होंने तुरंत तिरंगे वाला हाथ ऊपर कर लिया |
                                                हमें याद है की हमारे बचपन में हमें इस तरह तिरंगे को हाथ में लेने की आजादी नहीं थी और ना ही हमें कोई देश के बारे में बताने वाला था देश को लेकर जो विचार बने वो अपनी समझ से बने | जो देखा सुना उसी के आधार पर अपने दिमाग से देश के लिए एक विचार बना लिया | ऐसे ही अपने देश के लिए भी मन में भी बचपन में एक विचार बना की हमारा देश दुनिया में सबसे अलग है सबसे ज्यादा गर्व करने के लायक | जितने अलग अलग तरह के लोग  विभिन्न संस्कृति, परम्परा, खान पान, भाषा बोली के लोग यहाँ मिल जुल कर रहते है वो और किसी भी देश में नहीं होगा | ये विचार यु ही नहीं बना इस के पीछे की वजह थी हमारे " दूरदर्शन " के वो धारावाहिक जिसमे दिखाया जाता था की कैसे एक ही ईमारत में पंजाबी, मद्रासी ( उस समय हम लोगों के लिए हर दक्षिण भारतीय मद्रासी ही होता था ) बंगाली मराठी मुस्लिम ईसाई सब साथ में रहते है और बड़े ही प्यार से मिलजुल कर रहते है हर मुसीबत में एक दूसरे का साथ देते है | क्या करे बच्चे थे उन्हें देख कर लगता था की ये भले ये नकली है पर वास्तव में सब लोग ऐसे ही रहते होंगे | अब बनारस में तो इतने तरीके के लोगों से सामना होता नहीं था ये पता था की हा मुंबई में ये कहानिया बनती है वहा ये सब ऐसे ही मिल कर रहते होंगे |
                                    बचपन में ये भ्रम बना गया और विवाह के बाद मुंबई आने तक ये अपने देश पर अतिरिक्त गर्व की भावना बनी रही | अब भ्रम है तो एक ना एक दिन तो उसे टूटना ही था और मुंबई आते ही वो टूटने लगा | बड़े होने के साथ मुंबई में हो रही राजनीति से तो परिचित होने लगे थे पर ये भरोसा था की ये सब बस राजनीति तक ही सिमित होगा | लेकिन भला हो मुंबई वालो का जो उन्होंने ये वाला भ्रम ज्यादा दिनों तक नहीं बने रहने दिया और ये ये भ्रम जल्द ही  तोड़ दिया की ये सब बस राजनीति है | यहाँ आने पर पता चला की कैसे हमारे देश के अन्दर ही कितने देश पल रहे है सभी का अपना देश है और सभी के दिलो में एक दूसरे के लिए कितना द्वेष नफरत भरा पड़ा है खुद को दूसरो से श्रेष्ठ समझने की नाजीवादी सोच भी यहाँ पल रही है | कोई अपनी विपन्नता के लिए दूसरो को दोष मढ़ा रहा है तो कोई अपनी सम्मपनता का दुश्मन किसी को बता रहा है , कोई किसी को फूटी आँख भी नहीं सुहाता | अपने देश के अन्दर ही लोगों के साथ परायो जैसा व्यवहार किया जा रहा है देश के एक हिस्से के लोगों को दूसरे हिस्से में रहने की आजदी नहीं है उन्हें वहा से भगाया जाता है |  बाजार हर जगह हावी है तो यहाँ भी है बाजार में आते ही सब एक दुसरे से बिल्कुल धंधे से जुड़ जाते है पर धंधा ख़त्म होते ही ये मिल कर काम करने की गांठ भी खुल जाती है |
       ऐसा नहीं है की यहाँ तलवार ले कर एक दूसरे को मारने पर उतारू है लोग यहाँ भी लोग वैसे ही रहते है जैसे देश के दूसरे हिस्से में , सभी पड़ोसी जानने वाले एक दूसरे के यहाँ आते जाते है दोस्ती बनाते है मिलते जुलते है वैसे ही यहाँ भी करते है किन्तु एक दूसरे के लिए मन में एक गांठ बना कर चलते है | यहाँ पर आप से मिलने पर आप के नाम पूछने के बाद दूसरा सवाल ये होता है की तुम्हारा गांव कहा है मतलब आप अपना गांव बताइये ताकि वो जान सके की आप देश के किस हिस्से से आये है और आप के लिए किस तरह की ग्रंथि मन में बनाई जाये | देश के अलग अलग लोगों के लिए अलग अलग तरह की सोच है और सम्मान देने का स्तर भी है यहाँ सभी को समान रूप से सम्मान नहीं दिया जाता है आप को इज्जत की नजर से देख जाये या घुसपैठिये की नजर से ये आप के जड़ो पर निर्भर होगा | ये सब केवल मुंबई में नहीं हो रहा है ये सब देश के लभग सभी हिस्से में हो रहा है और हर लगभग हर जगह के लोगों की सोच ऐसे ही बनी हुई है या बनती जा रही है | ये सब कुछ केवल राजनीति की देन नहीं है और ना ही केवल उनके द्वारा मन में भरा गया है | असल में ये बिज तो हम सभी के दिल की गहराई में हमेसा से था , उन्होंने तो बस उसे खाद पानी दे कर बड़ा किया है और हमने उन्हें खाद पानी देने की छुट और मौका दोनों दिया है | वैसे भी ये राजनीति आज की नहीं है ये तो देश के आजाद होने के बाद दो देश के रूप में सामने आया फिर देश के अन्दर राज्यों की सीमा खीचने की वजह बना | ऐसा नहीं है कि अब ये सब देखने के बाद देश के लिए सम्मान नहीं रहा या हम देश पर शर्मिंदा है पर हा वह जो बचपन में अतिरिक्त गर्व वाली भावना थी वो चली गई |
                                                       कभी कभी लगता है कि आखिर देश का मतलब लोग क्या लगाते है आखिर देश का मतलब लोग समझते क्या है,  क्या लोगों के लिए देश का मतलब सिर्फ जमीन के एक खास टुकडे से है  |  कभी तो लगता है कि हम केवल जमीन के टुकडे से प्यार करते है और उसे ही देश मानते है यहाँ रह रहे लोगों को हम देश कि गिनती से नहीं रखते है और ये प्यार भी किस जमीन के टुकडे से, उस जमीन के टुकडे से जिसके बारे में हमें बचपन में ही भ्रम बना दिया जाता है कि ये हमारा है उस टुकडे को भी जो कभी हमारा था ही नहीं और ना कभी भविष्य में होगा और उस टुकडे को भी जो कब का हमारे हाथ से जा चूका है और कभी वापस नहीं मिलने वाला है  | बस उसे तो कागजो पर लकीर खीच खीच कर हमारा बना दिया गया है | हमारे देश के जमीन के एक खास टुकडे  से हमें कितना प्यार है , कितना प्यार है हमें उससे हम अपना सब कुछ गवा देंगे उसके लिए मर मिटेंगे पर उस टुकडे को देश से अलग नहीं होने देंगे सच्चा देश प्रेम है हमारा, और वहा के लोग निकाल फेको उन सभी को जो हमसे हमारे जमीन का टुकड़ा छिनना चाहते है निकाल फेको उन सब को जिनकी वजह से वो हमारे हाथ से जा सकता है मार डालो उन सब को चाहे जो भी हो कश्मीरी हो, नक्सली हो, बरगलाये भटके नौजवान हो, उपेक्षा के शिकार दलित आदिवासी हो जो ईसाई बनते जा रहे हो और हम उनकी बढाती संख्या से बड़े परेशान है तो  सभी को मार डालो या देश से निकाल दो  ,  क्यों ? क्योकि हमारे देश की  परिभाषा में लोग नहीं आते है बस जमीन का टुकड़ा आता है और देश प्रेम के नाम पर हम बस उसे ही प्यार करते है |
                               
                       
 चलते चलते
                                              एक बार एक किसान ( किस्से में तो पंजाब का किसान है पर यहाँ सिर्फ किसान ही काफी है ) अपनी गरीबी कर्ज से परेशान हो कर चढ़ गया पानी की टंकी पर धर्मेन्द्र की तरह सुसाइड करने के लिए, अब माँ आई बोली, बेटा नीचे आ जा तू मर गया तो मेरा क्या होगा मेरा बुढ़ापा ख़राब हो जायेगा, बेटा बोला नहीं आऊंगा, फिर पत्नी आई बोली तुम चले गये तो मेरा क्या होगा जीवन कैसे कटेगा, वो बोला नहीं आऊंगा, फिर बच्चे आये बोले पिता जी आप चले गये तो हमारा क्या होगा हमारा तो पुरा जीवन ख़राब हो जायेगा, फिर भी किसान उतरने को तैयार नहीं हुआ बोला नहीं जीना है जीवन से उब गया हु परेशान हो चूका हु | तभी एक पड़ोसी आ कर बोला जल्दी नीचे आ अभी तू मरा नहीं और तेरे जमीन पर तेरे चचेरे भाई हल चला रहे है | किसान आग बबूला हो कर जल्दी जल्दी नीचे आने लगा और गुस्से में बोला माँ लाठी निकाल मै अभी नीचे आ कर एक एक को मजा चखाता हूँ |



                                                               




 









January 20, 2011

बधाई हो आज से देश में नेता , मंत्री पोर्टेबिलिटी की सुविधा सुरु हो गई है - - - - - - - mangopeople

बधाई हो आज से देश में नेता , मंत्री  पोर्टेबिलिटी की सुविधा सुरु हो गई है |
 क्या मंत्री जी अपने विभाग से खुश नहीं है ?
 क्या वो अपने विभाग से परेशान हो गये है ?
 क्या मंत्री जी को अपना विभाग मलाईदार नहीं लग रहा है ?
 क्या मंत्री जी को अपने विभाग से ज्यादा दूसरे विभाग में ज्यादा मलाई दिख रही है ?
 क्या मंत्री जी अब अपने विभाग के सारी मलाई चट कर चुके है और अब वो अपनी भूख मिटाने के लिए दूसरे विभागों की और        नजरे गडाए है ?
 क्या अब मंत्री जी राज्य मंत्री रहते कैबिनेट मंत्री की झूठन खा खा कर उब चुके है अब उन्हें ताजा मलाई खानी है ?
 क्या नेता जी नेतागिरी कर कर थक चुके है अब उन्हें मंत्री बनने की इच्छा जागृत हुई है ?
 क्या मंत्री जी की इच्छा हर विभाग की मलाई खाने की है ?
   तो सभी मंत्रियो और नेताओ के लिए खुशखबरी है देश में अब नेता ,मंत्री पोर्टेबिलिटी सुविधा शुरू हो गई है | नेता वही मंत्री वही बस विभाग बदलिए और काम पर चलिए | अब मंत्री जी को सारी परेशानिया सहते हुए उसी विभाग में पड़े रहने की जरुरत नहीं है वो इस  सुविधा का लाभ उठाये और नेता मंत्री रहते हुए बस अपना विभाग बदल लीजिये |
 बस कॉल कीजिये १० जनपथ पर वहा से एक कोड मिलेगा उसे सीधे मन्नू जी को जा कर दिखाइये और अपनी सारी समस्याओ से निजात पाइये और अपना विभाग बदल डालिए |
पहले ये सुविधा नहीं होने से मंत्री नेताओ को काफी परेशानी होती थी एक बार जब मंत्री पद मिल गया तो मिला गया जो विभाग दिये उसे ही संभालो विभाग बदलने की चेष्टा में आप का मंत्री पद भी जा सकता था और मंत्री जी को परेशानी हो सकती थी किस किस को उन्होंने अपने मंत्री होने का नंबर दे रखा था पुराना कीमती पद चला जायेगा इस डर से मंत्री बेचारे सब सहते हुए उसी विभाग में पड़े रहते थे | पर अब ऐसा नहीं है कुछ भी कीजिये मंत्री पद जाने का कोई डर नहींअब आप को अपने विभागों के ख़राब कमाई से दो चार होने की जरुरत नहीं है तुरंत इस सेवा का लाभ उठाइए और मंत्री रहते अपना विभाग बदलिए |
 अपडेट - - - - -
मोबाइल नंबर पोर्टेबिलिटी की शुभारंभ तो प्रधान मंत्री आज करेंगे पर मंत्री पोर्टेबिलिटी सुविधा का शुभारंभ तो उन्होंने कल ही कर दिया और केन्द्रीय मंत्री परिषद के विस्तार के नाम पर बस मंत्रियो के विभाग ऐसे बदल दिया जैसे ताश के पत्तो को फेट दिया हो | जिन्हें मंत्री मंडल से निकाल देना चाहिए था उनके बस विभाग भर बदले | अब इसे मंत्री पोर्टेबिलिटी सुविधा ना कहे तो क्या कहे |

January 15, 2011

गाली पुराण -२ हम विरोध से क्यों बचते है - - - - - - mangopeople

                                                        हम सभी इस बात को ले कर काफी चिंतित और दुखी है कि आज कल समाज में फिल्मो में टीवी पर गालियों का प्रचलन काफी बढ़ गया है हम उसे पसंद नहीं कर रहे है और चाहते है कि ये सब बंद हो क्योकि हम डरे हुए है कि ये हमारे बच्चो को बिगाड़ सकता है किन्तु हम इसके लिए क्या कर रहे है शायद कुछ भी नहीं | अब आप कहेंगे की हम इसके लिए क्या कर सकते है टीवी फिल्मो पर हमारा बस नहीं है वो जो चाहते है दिखाते है ज्यादा से ज्यादा हम उन कार्यक्रमों को नहीं देखते है और समाज में किस किस का इसके लिए मना करे हमारी सुनेगा कौन | लेकिन जहा आप विरोध दर्ज करा सकते है क्या आप वहा इन चीजो के लिए विरोध दर्ज कराते है कि क्यों आप अमर्यादित शब्दों का प्रयोग कर रहे है या क्यों ऐसे मजाक या चुटकुलों को लिख रहे है जिसमे  माँ बहन की गाली दी जा रही है |
                                         कल मैंने अपनी पोस्ट पर यहाँ  ऐसा ही एक निरर्थक चुटकुला दिया था पर किसी ने भी इसका विरोध नहीं किया की ऐसी गाली से भरे चुटकुले की क्या जरुरत है | मै ये नहीं मान सकती की किसी का उस पर ध्यान नहीं गया होगा | सिर्फ सलिल जी ने संकेत में कहा की उसे पढ़ा कर उन्हें अपनी नजर नीचे करनी पड़ी और संजय जी ने कहा की वो लिख कर मैंने हिम्मत दिखाई है वो ऐसा नहीं कर सकते | दोनों लोगों को धन्यवाद कहूँगी की कुछ तो कहा | मै इसे क्या समझू की हम सब ने वास्तव में अब इन सब चीजो को स्वीकार करके अपने हाथ खड़े कर दिये है अब हमें ये बुरे ही नहीं लगते है या लोगों को लगा की उन्होंने यदि इस विषय में कोई विरोध किया तो मै बुरा मान जाउंगी |
                                                                तब तो सोचने वाली बात है की यदि हम मौका मिलने पर भी इन गालियों का विरोध नहीं करते है तो सिर्फ कहने के लिए कि हमें ये पसंद नहीं है क्या फायदा है और जब हम कुछ सौ ब्लोगों के ब्लॉग जगत को ही इस अमर्यादित शब्दों से साफ सुथरा नहीं रख सकते तो पुरे समाज से कैसे इसे बाहर निकालेंगे | जब हम अपने जानने वाले को ही ऐसे शब्दों, चुटकुलों और बातो से नहीं रोकेंगे तो फिर अपने विरोधियो और दूसरो को कैसे रोकेंगे | आखिर हम सब किसी गलत बात का विरोध करने से क्यों बचते है सिर्फ इस लिए की सामने वाला इस बात का बुरा मान जायेंगा क्या सिर्फ उसके बुरा मानने के डर से हम अपने सामने किसी गलत बात को होते देखते रहेंगे | यदि वास्तव में ये परम्परा है तो गलत है मुझे तो लगता है की गलत बात गलत ही होती है और उसका विरोध करना चाहिए चाहे वो कोई भी करे | जिन्हें हम अपना मानते है जो हमारे परचित है जिनसे हमारी जान पहचान है मुझे तो लगता है की हम उन्हें ज्यादा अच्छे से कह सकते है की आप की ये बात गलत है और वो उसे सकारात्मक रूप में लेंगे जबकि हमारे विरोधी उसे गलत पूर्वाग्रह से ग्रसित मानेगे |
                                                                  कुछ लोगो को ये भी लग सकता है की वो तो एक मामूली सा चुटकुला था इतना बुरा नहीं था की उसका विरोध किया जाये या वो तो कोई गंभीर बात नहीं थी इसलिए उसका क्या विरोध करना | तो ये सोच भी गलत है मजाक में ही सही गाली गाली ही होती है यदि हम किसी भी रूप में उसे स्वीकार करेंगे तो उसे कभी भी अपने बीच से समाज से बाहर नहीं निकाल सकते है | हर विरोध का असर होता है बस हमें किसी गलत बात का विरोध करना भर है पर हम वही नहीं करते है और चाहते है सब अपने आप हो जाये | जब हम सब लेखन के क्षेत्र में रह कर अपनी भाषा को ही साफ सुथरा नहीं रख सकते या उसे साफ सुथरा रखने का प्रयास नहीं कर सकते तो हम समाज को क्या साफ रख पाएंगे भ्रष्टाचार से, अन्याय से |  सभी से निवेदन है बस बाते ना करे कुछ काम भी करे हर गलत बात का विरोध करे असर होगा जरुर होगा |

यदि आप को गाली पर कोई गंभीर लेख पढ़ना है तो  यहाँ    इस लिंक पर जाये जो प्रवीण शाह जी ने कल दिया था | प्रवीण जी धन्यवाद |

January 14, 2011

साली है तो गाली है - गाली पुराण - - - - - - - -mangopeople

                                                       
                                                           रानी मुखर्जी की नई फिल्म का गाना तो सुना होगा " साली रे " जी हा गाने की शुरुआत गाली से होती है | ये कोई पहला गाना नहीं है जिसमे गाली का प्रयोग हुआ है  इसके पहले " बुलशिट बुलशिट" गाना आया था उसके पहले तो "कमीने"  नाम से गाना क्या पूरी फिल्म ही बन गई थी, ये भी नई बात नहीं थी काफी साल पहले शाहरुख इश्क को कमीना कह चुके थे | किसी ज़माने में रहे होंगे ये सब गाली पर आज के समय में ये कोई गाली नहीं रह गई है | भ्रष्टाचार की तरह हमने भी इन शब्दों को एक आम शब्द की तरह बाइज्जत अपना लिया है आत्मसात कर लिया है  |
                                                    इस तरह की गालिया देने वालो से आप कहे की ये गाली है तो वो आप पर हंस कर कहेंगे क्या यार ये गाली नहीं तेरे लिए मेरा प्यार है ( भगवन बचाये ऐसे प्यार भरे शब्दों से ) | जी हा समय के साथ इसी तरह शब्दों के मतलब बदलने लगते है ये केवल भारत में नहीं है | कही पढ़ा था कि अंग्रेजी का शब्द " नाइस " को जब बनाया गया था तो उसका अर्थ बेफकुफ़ होता था जो समय के साथ बदल गया | अब इसे भारत के परिपेक्ष में सोचिये कि हमारे पोता पोती आयेंगे और जब हम उन्हें कोई उपहार देंगे  और वो धन्यवाद के तौर पर कहेंगे " साले दादा जी साली दादी जी थैंक्यू  आप लोग सच में कमीने लोग है हमारा कितना ख्याल रखते है " उफ़ सुन कर कितनी कोफ़्त होगी हम लोगो को, पर तब तक तो हमारे पास इसको सुनने के अलावा कोई चारा ही नहीं होगा |
                                                         ऐसा नहीं है की ये बदलाव एक तरफ़ा है कुछ अच्छे शब्द भी गाली बना दिए गए जैसे कि  "साला" ,"साली" , क्योकि सोचिये तो ये एक रिश्ते का नाम है किन्तु कैसे धीरे धीरे गाली बन गया |  जीजा तो गाली ना हुआ साला साली गाली बन गये  | ये बिल्कुल वैसा ही है जैसे आज नारी की आजादी और उसके लिए कुछ करने वाली नारियो को "नारीवादी " इस तरह कहा जाता है जैसे की ये कोई गाली हो वैसे ही जैसे  कुछ लोगों के लिए "कम्युनिष्ट" होना गाली हो गई " साला एक नंबर का कम्युनिष्टि है " | सोचिये तो एक समय कम्युनिष्ट से जुड़ना मतलब समाज के सबसे गरीब लाचार लोगों से जुड़ना उनके लिए काम करना समाज में समानता की बात करना था पर आज वो गाली बना गया वही हाल "नारीवाद" शब्द का हो रहा है |
                                                         इसी तरह कुछ और रिश्ते है जो किसी किसी के लिए गाली जैसे होते है | जैसे हमारे यहाँ एक कहावत है " गरीब की लुगाई ( पत्नी) सबकी भौजाई"  मतलब की गरीब की पत्नी को पूरा मोहल्ला, गांव भाभी ही कहता है, चाहे मर्दों की उम्र कुछ भी हो | भाभी का रिश्ता हंसी मजाक का होता है और कुछ लोग इस हंसी मजाक में कोई सीमा का बंधन रखना पसंद नहीं करते है और ऐसे लोग मेहरी से लेकर धोबन को भी भाभी ही कहेंगे  खास कर उन महिलाओ को भाभी कहते है जो इनकी बातो का कोई विरोध ना कर सके और करे तो ये बड़ी आसानी से ये कह कर निकल ले कि अरे वो तो भाभी के नाते मजाक कर रहे थे | जब ऐसे लोग किसी को भाभी कहे तो वो गाली की तरह ही होता है |
                                                             मेरी एक मित्र है उनकी भी एक विशेष गाली है मर्दों के लिए "मर्द कही के" जैसे "कुत्ते कही के" , "कमीने कही के" उसी तरह ये भी है "मर्द कही के" | उनसे पूछा ये कौन सी गाली है तो बोली " ये बताने की जरुरुत तो नहीं है की ज्यादातर मर्दों की महिलाओ को लेकर क्या गन्दी घटिया सोच होती है उस पर पति बन जाये तो  गलतियों बुराइयों का एक पुरा पिटारा बन जाते है अब रोज रोज एक एक बुराई को क्या गिनाना सारी महिलाए जानती है, सो एक शब्द में कह दो "मर्द कही के"  यानि तुम दुनिया के सारी बुराइयों के मिश्रण हो | :))))) सॉलिड वेज गाली है मैंने भी सिख ली है | :))))
                                                                                          कुछ लोग गालिया कितने सम्मान के साथ देते है की सामने वाले को लगता ही नहीं की गाली दी  उसका एक नमूना बताती हु | एक परिचित के घर गई उनके बेटी ने घर में घुसते ही अपने भाई से कहा " D.O.G. साहब आप किससे पूछ कर मेरी घडी लगा कर गए थे " जवाब मिला " मैडम P.I.G. आप भी तो मेरी टी-शर्ट पहनती है " | मुझे लगा की ये बच्चे शायद किसी पोस्ट का नाम ले रहे है जैसे  I.A.S. या  P.C.S अक्सर बच्चे बड़े हो कर जो बनना चाहते है तो बचपन से हम उन्हें उसी नाम से चिढाने के लिए बुलाते है जैसे डाक्टर साहब , वकील साहब उसी तरह ये भी है | मैंने उनकी माता जी की तरफ देखा तो वो बेचारी थोड़ी शर्मिंदा सी बोली अरे बच्चे भी ना कुछ भी बोलते है मुझे भी इनका गाली देना पसंद नहीं है | जब उन्होंने गाली शब्द कहा तब पता चला की अरे बाप रे ये तो कुत्ते सूअर की गाली दी जा रही थी |  हे प्रभु गाली वो भी इतने सम्मान और प्यार के साथ, भाई वाह |
                                                हमारे यहाँ गाली देने की सख्त मनाई थी महिलाए देती नहीं थी बच्चो की हिम्मत नहीं हो सकती थी और घर के  पुरुष( दादा जी को छोड़ कर वो बराबर देते थे)  घर में किसी के सामने कभी गाली नहीं देते थे ( पता तो नहीं पर बाहर जरुर देते होंगे )| यानि गाली देना हम लोगो के लिए एक बड़ा पाप कर्म था लेकिन हमारा बड़ा कजन एक नंबर का शैतान था उसकी शरारते तो वही सब लड़को वाली थी | एक दिन हम लोगो के पास आया हम और मेरी चचेरी बहन उस समय काफी छोटे थे बोला की मै अंग्रजी के तीन शब्द बोलूँगा तुम दोनों में जो उसका अर्थ जल्दी से हिंदी में बताएगा वो जीत जायेगा तीनो का अर्थ जल्दी से जोड़ कर बोलना है चलो बताओ की ग्रीन मैगो मच का क्या मतलब हुआ मैंने फटा फट बता दिया हरा आम जादा अब इन तीनो को मिला का जल्दी बोलिए, गाली बनती है "हरामजादा" | अरे बाप रे इतना बोलना था की उसने चिढाना शुरू कर दिया की गाली दी गाली दी और हम बेचारे चिल्लाये जा रही थी नहीं नहीं हमने गाली नहीं दी वो हँसे जा रहा था और हम दोनों रुआंसी होती जा रहे थे |
                                                                    कुछ गालिया या कहे भारत में ज्यादा प्रचलित गालिया ऐसी है जो हम सभी लोगो को नहीं दे सकते है लेकिन लोग इस बात की परवाह नहीं करके मुक्त कंठ से सभी को एक सुर में वो गाली दे देते है बिना इस बात की परवाह किये की वो उलट कर उन्हें ही लग रही है | कई बार देखा है की माँ बाप अपने ही बच्चे को "हरामजादे"  की गाली दे देते है | मुझे समझ नहीं आता की वो क्या सोच कर ये गाली अपने बच्चे को दे रहे है ये गाली तो उनको पड़ रही है खासकर जब महिलाये ये गाली अपने बच्चे को दे | ये तो बिल्कुल वैसा ही है जैसे कोई बाप अपने बच्चे को उल्लू के पठ्ठे या शैतान की औलाद की गाली दे | मुंबई में मेरी एक रिश्तेदार को आदत थी ये गाली देने की अपने ही बच्चे को, एक दिन मुझसे नहीं रहा गया और मैंने उनसे पूछ ही लिया की आप जो कह रही है क्या आप को उसका मतलब पता है, फिर क्या था "हरामजादे" का अर्थ सन्दर्भ सहित व्याख्या कर दी उनके सामने फिर उनको खीचा की इसके पापा तो आफिस गये है डैडी कहा है ???? बेचारी हे हे हे करने के अलावा कुछ कर नहीं सकी और सही व्याख्या करने के लिए बीस में से दस नंबर मिल गये मतलब की गाली तो उनकी छुटी नहीं ये अच्छी आदते इतनी जल्दी नहीं छूटती है, हा मेरे सामने रहने पर वो अब गाली नहीं देती है |
                                                               उसी तरह जब लोग दिल खोल कर अपने ही भाई बहन को माँ बहन की गाली देते है तो समझ नहीं आता की वो क्या कर रहे है | उन सब को सुन कर तो यही लगता है की असल में लोग गालियों  का मतलब जानते ही नहीं बस उसे निरर्थक बक देते है  क्योकि वो गाली है  | निरर्थक क्यों , क्योकि मैंने देखा है की जिन लोगों को इस तरह की गालियों से सजाया जा रहा है सुनने वालो में ज्यादातर को कोई फर्क ही नहीं पड़ता है यदि वो कमजोर तबके के है  तो वो उसे चुपचप सुन लेते है नहीं तो बदले में वैसी ही गालियों से जवाबी हमला कर देते है , दोनों बकते है सुनते है और फर्क किसे भी नहीं पड़ता है | असल में जिन्हें गालियों से फर्क पड़ता है उन्हें इतनी बड़ी गाली देने की जरुरत ही नहीं पड़ती है | आप ने उन्हें बेफकुफ़ ,पागल इडियट कह दिया, तो वो या तो उतने में ही सुधर जायेंगे या फिर इतने में ही इतनी हाय तौबा मचाएंगे की इससे आगे की या बड़ी गाली देने की हिम्मत ही आप की नहीं होगी | दूसरे जिन्हें इस तरह की गाली खाने की आदत नहीं होती वो तो गाली देने वालो से पहले ही दूर भाग जाते है या उनके मुहं नहीं लगते है | एक छोटी गाली भी उनको इज्जत उतारू लगती है और अपनी इज्जत अपने हाथ |
                           इन गालियों के सन्दर्भ में एक काम था जो मै कभी नही करना चाहती थी और ना ही कभी किया था वो ब्लॉग जगत ने करवा दिया |  वो काम था गालियों को बाकायदा लिखा हुआ पढ़ना | एक बार लिखा पढ़ा लिया था उसके बाद समझ गई थी की सार्वजनिक टायलेट और दिवालो पर लिखा हुआ ये उच्च कोटि का साहित्य हम जैसो को पढ़ने के लिए नहीं है | इसलिए कही कुछ लिखा देखा तो तुरंत नजर घुमा लिया ताकि गलती से भी पढ़ा ना लू | लेकिन ब्लॉग पर तो हम पढ़ने के लिए ही आये थे तो यहाँ कैसे बचते बाकायदा साफ साफ अच्छे से लिखा, हिंदी के लगभग सभी उच्च कोटि की सभी महान गलिया यहाँ पढ़ा ली | क्या करे ये आशा नहीं थी की यहाँ ये भी पढ़ने को मिलेगा और टिप्पणियों को पढ़ते पढ़ते उन्हें भी पढ़ गये | जैसे गालियों को सुनने के बाद कहा जाता है कि " छि छि कितनी गन्दी गाली बोली घर जा कर कान धोने  पड़ेंगे " वैसे ही यहाँ पढ़ने के बाद तो आँख कान मुहँ तीनो ही धोना पड़ गया | अभी तक कुछ गालिया ऐसी थी जो लोगो को बोलते तो सुना था पर वो ठीक से समझ नहीं आती थी की आखिर बोला क्या, वो यहाँ पर बाकायदा पढ़ने के बाद समझ में आ गई | कुछ लोग तो बाकायदा उन गालियों को सजा कर अब भी अपने पोस्ट पर रखे हुए है जैसे वीरता के कोई तमगे हो |
  
 चलते चलते 
चलते चलते पोस्ट से जुड़ा एक चुटकुला सुने मेरा नहीं है सुना है | बुरा है पर कभी कभी ऐसी बुरी चीजे सुन कर भी हंसी आ ही जाती है |
 एक बार एक अमेरिकी एक जापानी और एक पंजाबी बैठे थे | अमेरिकी ने कहा की हमारे यहाँ बिल्डिंगे इतनी ऊँची है की छत पर चढ़ कर i love u  चिल्लाओ तो वो शब्द घूम कर छ बार वापस आती है इस पर जापानी ने कहा की ये तो कुछ भी नहीं है  हमारे यहाँ तो बिल्डिंगे इतनी ऊँची है की छत से i love u  चिल्लाओ तो वो आठ बार वापस आती है | इस पर पंजाबी ने कहा ये तो कुछ भी नहीं है हमारे यहाँ पंजाब में छत पर जा कर एक बार चिल्लाओ तो शब्द बदल कर दस बार वापस आते है | इस पर अमेरिकी और जापानी ने कहा क्या ये कैसे होता है उस पर पंजाबी बोला बस छत पर जा कर एक बार चिल्लाओ  " माँ की " तो दस छतो से शब्द बदल कर वापस आते है "भेंण की "|

अपडेट - - - -
स्पष्टिकरण --- अभी अभी पढ़ा की ब्लॉग जगत में फिर से किसी पोस्टो पर गाली गलौज की गई है तो मै स्पष्ट कर दू की इस पोस्ट की सम्बन्ध किसी भी पोस्ट से नहीं है और ना ही किसी पोस्ट को पढ़ने के बाद लिखा गया है | अत: पाठक मेरी पोस्ट को किसी और प्रकरण से जोड़ कर ना देखे | मेरी ये पोस्ट पहले से लिखी गई थी प्रकाशित अभी हुई है जिसका जिक्र मैंने शिखा जी के पोस्ट पर यहाँ टिप्पणी के रूप में किया है |
                                                              
 अपडेट - - - - यदि आप को गाली पर कोई गंभीर लेख पढ़ना है तो http://hastakshep.com/?p=१२८४  इस लिंक पर जाये जो प्रवीण शाह जी ने दिया है | प्रवीण जी धन्यवाद | 
                 और कल इस पोस्ट का पार्ट -२ पढ़ना नहीं भूलियेगा |
                                                                          
                                                                               समाप्त
       
       
                                          
         

January 10, 2011

घिसो जब तक घिसता है - - - - - - - mangopeople

                                                     भारत में चीजो को तब तक घिसा जाता है जब तक की उसे घिस सकते है या तब तक जब की चीज की इज्जत ना उतार जाये या अपनी इज्जत ना उतरने लगे, चीजो का एक एक कतरा हम प्रयोग करते है  | सबूत के तौर पर किसी के घर से फेकी जा रही टूथपेस्ट के ट्यूब की हालत आप देख लीजिये उसकी हालत बात देगी की कैसे उसमे से पेस्ट का आखरी कतरा भी निकालने के लिए उस पर क्या क्या जुल्म नहीं किये गये है किस किस तरह से उसे नहीं तोडा मरोड़ा गया है कभी कभी तो उसे काट कर उसमे से काछ कुछ कर पेस्ट निकाल ली जाती है ,और टूथ ब्रस बनाने वाली कंपनिया भले चिल्लाती रहे की अपने ब्रस हर तीन महीने में बदल दे लेकिन कोई भी उनके अपने सामान की बिकी बढ़ाने वाले चोचलो में नहीं पड़ते है हम सब से तो उसे तब तक नहीं बदला जाता, जब तक की वो बिल्कुल घिस कर काम करने के लायक ना रहे |
                                             
                                                    असल में हम भारतीय हर चीज की पूरी कीमत वसूलना जानते है | याद है बचपन में वो हवाई चप्पल उसकी सबसे पहले आगे से बेल्ट टूट जाती थी तुरंत मोची को आठ आना दे कर सिलवा लिया जाता था क्या मजाल की किसी के दिमाग में उसे फेकने का खयाल भी आ जाये | जब मोची की सिलाई भी दो तीन बार करवाने के बाद  बेकार हो जाये तो पिता जी से शिकायत होती थी, नहीं नही उसे फेक कर दूसरी लाने की फरमाइश नहीं होती, कहा जाता की अब तो इसके लिए नया पट्टा ला दीजिये और सात रुपये में नया पट्टा आ जाता और चप्पल फिर से काम के लायक हो जाती पर कई बार ये भी होता था की आगे का छेद ही बड़ा हो जाता था और पट्टा बार बार उसमे से निकल जाता था उसके बाद भी उसे बदलने का ख्याल नहीं आता चलते चलते या खेलते दौड़ते समय बार बार  निकलता था तो तुरंत रुकते चप्पल का हाथ से उठते छेद में फीर से पट्टे का सर घुसाते और काम पर चल जाते | चप्पल तब तक नहीं फेकी जाती थी जब तक की वो पीछे से घिस कर पैर को गन्दा करना ना शुरू कर दे और जूतों में जब तक छेद ना हो जाये | फटे और अंगूठा दिखाने वाले मोजो की तो बात ही मत कीजिये वो तो हर दूसरे के पैर में नजर आ जाता था ( है ) |
              
                                            कपड़ो की भी यही हालत थी रंग फीका हो जाना या घिस जाना कभी भी उसे फेकने या छोड़ने की वजह नहीं बनती थी उसे तब तक घिसा जाता था जब तक की वो फट ना जाये | बाहर कही पहने जाने वाले कपडे ही रंग उड़ने पर छोड़ा जाता था मतलब की उसे बाहर पहन कर जाना छोड़ा जाता था फिर उन कपड़ो को घर पर पहना जाने लगता था तब तक जब तक की वो पूरी तरह फट ना जाये | जी नहीं इसमे उधडी हुई सिलाई नहीं जोड़ी जाती है उसे तो सिल कर फिर से पहनने के लायक (?) बना दिया जाता था | उसी तरह शर्ट की कॉलर घिस गई कोई बात नहीं अभी तो बहुत चलेगा दर्जी को बीस रुपये दे कर कॉलर पलटवा  लिया जाता है अरे अभी तो इस शर्ट को काफी चला सकते है बाकि जगह तो ठीक है | यहाँ तक की थोडा बहुत दाग लगे कपडे भी नहीं फेके जाते थे रखा दो जाड़े के दिनों में स्वेटर के निचे पहनने के काम में आयेंगे | पैंट घुटने से फट गया कोई बात नहीं जी काट कर हाफ पैंट बना दो | माँ की पुरानी साड़ियाँ यदि फटी नहीं है तो बर्तन खरीदने के काम आती थी यदि कही से फट गई है तो कई पुरानी फटी साड़ियों को साट साट कर कथरी ( घर में कपडे से बना पतला गद्दा ) बना दो |
                                                    
                                                     पुराने स्वेटर का रंग पहन पहन कर उतर गया है या स्वेटर चढ़ कर छोटा हो गया है या तो उसे खोल कर दूसरे रंग मिला कर घर पहनने के लिए स्वेटर बना दो या फिर उस चढ़े स्वेटर को छोटे भाई को दे दो | कई बार देखा है की घर का बना कोई स्वेटर दस बीस रंगों का होता है देखते ही समझ आ जाता है की ये किसी के कल्पना या रचनात्मकता के रंग नहीं है सालो से कई स्वेटरो से बचे ऊन का एक बढ़िया प्रयोग भर है, यानी बचा ऊन भी लाख ( काम ) का | हम तो बित्ता दो बित्ता पतंग का नख भी नहीं फेकते थे उससे हाथ से पेंच लड़ने का खेल खेल लेते थे | साबुन घिस का छोटा हो गया कोई बात नहीं अभी तो काफी बड़ा टुकड़ा है अभी तो काफी काम आयेगा उसे टायलेट के बाहर रख दो हाथ धोने के काम आयेगा |
                 
                                                      लिस्ट तो बहुत लम्बी है अब किस किस का नाम ले  | कहने का अर्थ ये है की हम सामान क्या यहाँ तो आदमी खुद को भी तब तक घिसते है जब तक उसे घिसा जा सके | भरोसा नहीं है तो देख लो दादा को, अरे मेरे नहीं देश के दादा सौरभ दादा को ,आई पी एल में खिलाडियों की दो दिन नीलामी हुई पर हमारे गांगुली दादा को एक भी खरीदार नहीं मिला सब जानते है की दादा अब उपयोग के लायक घिसे जा चुके है उनमे अब कुछ नहीं बचा है लेकिन दादा है की मानने को तैयार ही नहीं है | उनको लगता है की थोडा काछ कुछ कर वो अब भी थोडा और घिसे जा सकते है | कहा था ना कि हमरे यहाँ लोग तब तक नहीं मानते जब तक कि उनकी इज्जत ना उतरने लेगे अब बताइये की अब क्या इज्जत बची दादा की, कि कोई खरीदार नहीं मिला | कुछ समझदार थे अनिल कुम्बले जैसे जो पहले ही बात को ताड़ गये और समझदारी दिखा कर पहले ही नाम वापस ले लिया और कह दिया कि वो आई पी एल से जुड़े तो रहेंगे पर खिलाडी के तौर पर नहीं | लेकिन गांगुली ने पिछली बार उनकी और उनकी टीम की फजीयत देख कर भी हकीकत को समझने से इनकार कर दिया और नतीजा सबके सामने है | अब शाहरुख़ ने उन्हें टीम से जुड़ने का प्रस्ताव तो दिया है लेकिन एक खिलाडी के तौर पर नहीं शायद उनकी इज्जत बचाने के लिए या ये कहे की उनका प्रयोग किसी और रूप में करने के लिए | यानी अब वो नहाने के नहीं हाथ धोने के लिए प्रयोग किये जायेंगे |
                                                     
                                                     सौरभ ऐसा करने वाले पहले भारतीय खिलाडी नहीं है भारत में तो इसकी लम्बी लिस्ट है | खिलाडी तब तक खेल से सन्यास नहीं लेते है जब तक कि उन्हें टीम से निकाले बरसों ना हो जाये | अपना अच्छा दौर निकलने के बाद भी वो बार बार टीम के अन्दर बाहर होते रहते है लेकिन सन्यास नहीं लेते है जब तक की चयनकर्ता उन्हें टीम  में लेने से साफ इनकार ना कर दे उसके बाद भी कई खिलाडी लगे रहते है टीम में वापसी की कोशिश में | वही कई विदेशी टीमो में खिलाडी अपने श्रेष्ठ प्रदर्शन के दौर में ही सन्यास ले लेते है शेनवार्न , गिलक्रिस्ट , मैग्राथ , नतिनी , मुरलीधरन कई नाम है जिन्होंने अपने अच्छे दौर में ही सन्यास ले लिया | इससे हुआ ये की जहा उनका सम्मान सन्यास के बाद भी बना रहा लोग उन्हें याद करते रहे वही नये खिलाडियों को भी खेलने का मौका मिला | लेकिन हमारे यहाँ तो कई सीनियर खिलाडी ये जानते हुए की अब उनके कैरियर में कुछ नहीं बचा वो सन्यास लेने की सोचते भी नहीं सब यही कहते है की अभी तो उनमे काफी खेला बाकि है | ये केवल आज की बात नहीं है भारतीय टीम में ये रोग हमेशा से था | आप में से काफी लोगों ने देखा होगा रवि शास्त्री को छ छक्के उड़ाते,पर जब से मैंने उन्हें देखा है तब से तो यही देखा था की मैदान में आते ही उनकी हुटिंग शुरू हो जाती उनकी वो बोरिंग टुक टुक देख कर तो इतना खीज आता था की हम तो उनके आउट होने की दुआ करने लगते थे और उनके आउट होने पर सब खुशी मनाते थे | वन डे मैच को भी टेस्ट से भी बोरिंग बना देने का हुनर था उनमे | पर क्या मजाल की उन्होंने सन्यास के बारे में सोचा हो |
   
                                                    सौरभ गांगुली अपने समय के सफलतम कप्तानो में एक थे कायदे से तो कप्तानी से हटाये जाने के बाद ही बाइज्जत सन्यास ले लेना चाहिए था जिस तरह उनके ही समय के आस्ट्रेलियन कप्तान स्टीव वॉ ने किया था लेकिन नहीं अपनी जिद में कई बार टीम से अन्दर बाहर हुए और फिर बड़े बेआबरू हो दबाव में सन्यास की घोषणा करनी बड़ी | अनिल कुम्बले और श्रीनाथ जैसे खिलाडियों ने भी समय रहते सन्यास ले लिया था , महान हरफनमौला खिलाडी कपिलदेव का भी प्रदर्शन अंत में ख़राब होने लगा था किन्तु उनके विश्व रिकार्ड के लिए उन्हें टीम में रखा जाता था और उन्होंने भी समझदारी दिखाते हुए रिकार्ड बनते ही सन्यास की घोषणा कर दी |
                     
                                                 कुछ ऐसा ही हाल अब मेरे फेवरेट राहुल द्रविण का है पता है की अब एकदिवसीय टीम में वापसी नामुमकिन है फिर भी वो सन्यास की बात ना करके टीम में वापसी की बात करते है | अच्छा होता की वो एकदिवसी से सन्यास ले कर केवल टेस्ट मैच में खेलते | शुक्र है इस बार आई पी एल में उन्हें खरीदार मिला गया पर ये तो निश्चित है की ये उनकी आखरी डील आई पी एल में है उम्मीद करनी चाहिए की वो गांगुली वाली गलती नहीं दोहराएंगे और समय रहते सही फैसला लेंगे |
          
                                                        गांगुली को लेकर दुःख भी होता है कि आज  भारितीय टीम का जो रूप है वो उन्ही की देन है उन्ही की सोच का नतीजा है एक समय डरी सहमी हर समय रक्षात्मक खेल खेलनेवाली टीम को सौरभ ने ही इतना साहस भरा की वो आगे आ कर फ्रन्ट फुट पर खेलना शुरू किया मैच बचाने के लिए नहीं जितने के लिए खेलने लगी | आज उसी गांगुली का ये हाल अपनी ना समझी के कारण हो रहा है | अब फूकते रहे कोलकाता वाले शाहरुख का पुतला जो होना है वो तो हो चूका अब दादा कितने घिसे जायेंगे |


                         

December 31, 2010

नए साल की कुछ नई कसमे - - - - - - - - -mangopeople

                                                     
                                  लो जी कल से नया साल शुरू हो जायेगा कुछ लोगों के लिए तो बस तारीख बदलने वाली है पर कुछ महान, सामर्थवान, हिम्मत वाले लोगों के लिए ये एक नई शुरुआत है असल में हर साल वो एक नई शुरुआत करते है | ये वो विशेष लोग है जो हर साल नवम्बर से ही कुछ कसमे वादे खाने की रस्म खुद से परिवार से दोस्तों से करना शुरू कर देते है कि अगले साल से मै अपनी एक बुरी आदत छोड़ दूंगा या कुछ नया शुरू करूँगा | सभी अपने हिसाब से एक कसम खाते है जैसे


सिगरेट पीना छोड़ दूंगा या
शराब पीना छोड़ दूंगा या
 जिम जाना शुरू कर दूंगा  |
 रोज सुबह जागिंग शुरू करूँगा |
 घर पर ही कसरत शुरू कर दूंगा  |
मीठा, तला भुना, जंक फ़ूड खाना बंद कर दूंगा  |
अब से जम कर पढाई करूँगा |
जीवन को और कैरियर को गंभीरता से लूँगा | 
सारा समय घर गृहस्थी में बर्बाद हो जाता है इस बार जरुर कुछ नया सीखूंगी  |
इस साल छुट्टियों में हम कही जरुर घूमने जायेंगे |
इस साल से फिजूल खर्ची नहीं करूँगा कुछ बचत भी करूँगा |

                                                     
                                      आदि इत्यादि | जब भी कोई कसम पूरा करने के लिए मुहर्त देखा जाने लगे तो समझ लीजिये की वो कभी भी पूरा नहीं होने वाला है जैसे यदि आज गुरुवार है तो मुहर्त सोमवार का निकलेगा " पक्का सोमवार से ये सब बंद या सोमवार से शुरू " यदि तारीख बीस के ऊपर की है तो मुहर्त एक तारीख का निकलेगा और नवम्बर है तो फिर दो महीने इंतजार कीजिये मुहर्त सीधे एक जनवरी का निकलेगा " नए साल से नई शुरुआत पक्का एक जनवरी से सब बुरी आदते बंद " | जैसे ही इन कामो के लिए मुहर्त निकले समझ जाइये की अब ये कसम पूरी नहीं होने वाली है बस चार दिन के चोचले होने वाले है | मुझे समझ नहीं आता है की लोग आखिर ऐसी कसमे खाते ही क्यों है जिनको पुरा किया ही ना जा सके | अरे कसमे खाइए तो ऐसी जो पुरी की जा सके जिनको पुरा कर सके जैसे 


इस साल सिगरेट छोड़ दूंगा - - - इतनी पी चूका हु की साल के अंत तक अस्पताल पहुच ही जाऊंगा |
रोज जिम के सामने से गुजरूंगा 
कम से कम जॉगिंग सूट या सूज खरीद कर लाऊंगा
दिन में एक बार कसरत करने के बारे में जरुर सोचूंगी
मीठा ,तला भुना ,जंक फ़ूड खाना बंद, रोज रोज
जम कर पढूंगा, पेपर के एक दिन पहले
घर गृहस्थी से समय निकाल कर एक दिन नए कोर्सो के बारे में पता करने जरुर जाउंगी
इस साल छुट्टी में हम पूरा शहर घूमेंगे, अपना
इस साल एक बचत खाता तो खोल ही लूँगा
कैरियर को गंभीरता से लूँगा और कम से कम अपना बायोडेटा तो बना ही लूँगा |
शराब तो जरुर छुट जाएगी - - - - लोगों ने उधर देना बंद ही कर दिया है |

                        
                                            देखिये कितना आसन है इन कसमो को पूरा करना | एक ब्लोगर होने के नाते मै भी कुछ ब्लोगरी  कसमे खाती हु कि


टिप्पणियों की मोह माया से बाहर आउंगी
टिप्पणिया पाऊ पोस्टो की जगह कुछ सार्थक अच्छा और सकरात्मक लिखूंगी - - - मतलब एक भी टिप्पणी नहीं मिलेगी
 अपने ब्लोगिंग का एक उद्देश्य बनाउंगी
 किसी को नकारात्मक टिप्पणी नहीं करूंगी
किसी की आलोचना नहीं करुँगी
 लोगों पर व्यंग्य बाण नहीं चलाऊँगी
 सभी नए ब्लोगरो का उत्साह बढ़ाउंगी |
 अपनी हिंदी और सुधारुंगी
हिंदी साहित्य का स्तर हिंदी ब्लोगिंग में और ऊपर उठाउंगी
सभी को टिप्पणिया दुँगी
टिप्पणिया आदान प्रदान का खेल नहीं करुँगी  
ब्लोगिंग से समाज, लोगों, गरीबो, दलितों, बेचारो, दिन हीनो , पीडितो , को न्याय दिलाउंगी उनकी मदद करुँगी उनकी आवाज लोगों के सामने लाऊंगी |
                                 
                                         ये सब मै १ जनवरी २०२० से शुरू करुँगी | तब तक जो चल रहा है वैसा ही चलेगा |

      
                   आप सभी को नए साल की ढेरो शुभकामनाये |

December 29, 2010

क्या आप को नहीं लगता की एक ब्लॉग अख़बार की जरुरत है - - - - - - - mangopeople

                                            ब्लॉग जगत में यदि किसी चीज की बड़ी शिद्दत से कमी महसूस हो रही है तो वो है एक अदद ब्लॉग समाचारपत्र की, क्यों ? देखिये किसी समाचार पत्र की जरुरत क्यों होती है निश्चित रूप से ये जानने के लिए की कहा क्या हो रहा है अब हमारा हिंदी ब्लॉग जगत भी इतना बड़ा हो चूका है की हमें कभी कभी पता ही नहीं चलता है की हम जिन ब्लोगों पर जाते है उनके आलावा दूसरे ब्लोगों पर क्या हो रहा है कही दूर किसी ऐसे ब्लॉग पर जहा हम कभी गये ही नहीं या जहा ज्यादा लोग जाते ही नहीं वहा भी कुछ अच्छा बुरा हो सकता है वहा की हमें तो खबर ही नहीं लगती है | वहा की खबर लगे तो क्या पता कुछ और अच्छे पाठक हमें मिल जाये या कुछ ऐसे पाठक मिल जाये जो हमारे विचारो से मेल खाते हो और कुछ तारीफ वाली टिप्पणिया भी मिले इन विरिधियो के सवालो का जवाब दे देकर तो अब तंग आ चुके है या कुछ नया और अच्छा पढ़ने को मिले |
                                                      कई बार तो ये भी होता है की हम दो चार दिन के लिए ब्लोगिंग से दूर रहे और उसके बाद आये तो पता ही नहीं चलता है की हमारे पीछे क्या क्या हो गया और कोई जोरदार बहस चल रही होती है और हम अनाड़ियो की तरह तब पुछते है की क्या हुआ भाई हमें तो प्रसंग का पता ही नहीं चला जबकि बाकि धुरंधर दे दना दन एक से एक टिप्पणिया वहा दे कर महफ़िल लुट चुके होते है और हम अज्ञानियों की तरह बस सबको पढ़ने के सिवा कुछ नहीं कर पाते है , और कभी कभी किसी ब्लॉग पर कोई झन्नाटेदार विषय पर टिप्पणियों की बारिश हो रही होगी और हम उस पर तब पहुचते है जब मेले का डेरा तम्बू उखड रहा होता है तब लगता है की अब टिप्पणी देने से क्या फायदा काश की हमें पहले ही पता होता की यहाँ पर ये हो रहा है तो हम भी आग में थोडा घी डालते या नमक छिड़कते | अब क्या फायदा सारे बाजीगर तो अपनी बाजीगरी दिखा कर जा चुके है अब तो दर्शक भी नहीं मिलेंगे  अब मेरी बाजीगरी कौन देखेगा  या कभी लगता है की अरे इतने अच्छे विषय का भी लोगों ने विरोध किया है और सबके विरोध  से डर कर अकेला बेचारा लिखने वाला ब्लोगर सबसे माफ़ी मांगे जा रहा है या कुछ घिसा पीटा सा सफाई दे रहा है , तो लगता है की हाय हम यहाँ होते तो लेखक का भरपूर साथ देते और सभी विरोध करने वालो की अकेले बैंड बजा देते और कभी कभी तो ये भी होता है की बेचारा कोई ब्लोगर किसी एक पोस्ट पर आहात हो कर एक अपनी पोस्ट डाल देता है " आज मन बड़ा उदास है " टाईप और पढ़ने वाले बेचारे अपना सर नोचते रहते है की भाई बताया नहीं की हुआ क्या और बस मन उदास है बताओगे की मन क्यों उदास है तब तो कुछ कहा जाये |
                                       मतलब की ये की इस तरह की ढेरो ऐसे कारण है जिसके लिए लगता है की एक ऐसा समाचारपत्र  ब्लॉग जगत में तो होना ही चाहिए जो हम सभी को पूरे ब्लॉग जगत की खबर दे जैसे घर बैठे ही अखबार हमें पूरी दुनिया की खबर देते है | बस उस ब्लॉग अखबार पर जाओ और हमें पता चल जाये की कहा कहा कुछ खास हो रहा है कहा जोरदार बहस हो रही है, कहा लड़ाई हो रही है, कहा पर सब मिल कर एक को धो रहे है, कहा पर कुछ गासिप चल रही है और कहा किस चीज के मजे लिए जा रहे है , ताकि हम भी समय रहते वहा जा कर अपनी टिप्पणियों की आहुति दे सके और पूरे प्रसंग का मजा उठा सके | जरूरत हुआ तो बहती गंगा में हाथ धो लेंगे या कोई पुराना हिसाब चुकता कर लेंगे या चुप चुप मजे ले कर चल देंगे, ब्लॉग जगत में हम से कुछ भी छूटे नहीं |
                                 भाई आज कल संचार का खबरों का जमाना है वो दिन गये जब लोग कहा करते थे की जिस गांव जाना नहीं वहा का पता क्या पूछना | अब तो लोग ढूंढ़ ढूंढ़ कर पिपिली जैसे गांव के बारे में भी खबर रखते है | भाई ऐसा ना हो की विद्वानों की कोई सभा हो और हम कहे की जी हमें पता ही नहीं की मल्लिका शेरावत कौन है | कभी रेखा के दीवाने रहे लोगों को आज भले पता ना हो की रेखा कहा क्या कर रही है पर मल्लिका ,राखी कैटरीना कहा क्या कर रही है सभी को पता रहती है भाई खबरे रखने का जमाना है | खबरे काम आती है क्या कहा ई खबरे कहा काम आती है अब ई भी हम ही बताये|
                                        अपना ब्लॉग जगत अब इतना बड़ा हो गया है की किसी साप्ताहिक पत्रिका से काम नहीं चलेगा इसके लिए तो रोज का एक बुलेटिन चाहिए | जहा तक मेरी समझ है एक बार रोज का बुलेटिन शुरू तो हो जाये कुछे दिन में उसको दिन में दो बार अप डेट करने की नौबत आ जायेगी | ई ना सोचे की मैटेरियल की कमी है भरपूर मैटेरियल यहाँ मिल जायेगा बल्कि लगता है की एक बार शुरू तो हो उसके बाद फिर देखिएगा कैसे धड़ा धड पेज बढाना पड़ेगा | दो चार दिन में ही सभी को इसके फायदे नजर आने लगेंगे | आज की ताजा खबर फलाने के ब्लॉग पर कल दोपहर से एक जोरदार बहस चालू है समाचार लिखे जाने तक टिप्पणियों की संख्या ६० के पार पंहुच चुकी थी | लो जी अख़बार निकने के दो घंटे बाद है टिप्पणियों की संख्या १०० के पार | बहस शुरू करने वाला ब्लोगर सीना फुलाए कहेगा वहा आज तो मेरा ब्लॉग फ्रंट पेज पर था |
                         कुछ और मुख्य समाचार ऐसे होंगे की फला ब्लॉगर ने हास्य  के फुहारों से सभी को भिंगो दिया या ढेकाने ब्लॉग पर का और ख के बीच घमासान छिड़ा हुआ है ,या जनानियों के ब्लॉग पर दो जनानियों और एक जन आपस में भिड़े पड़े है या इस ब्लॉग पर इनकी टिप्पणी से ये आहात हुए या उनका उपहास उड़ाया गया या फिर उनकी टिप्पणी से आहत हो उन्होंने एक पूरी पोस्ट ही दे मारी ,या आज तीसरे दिन भी दोनों ब्लोगरो में पोस्ट प्रति पोस्ट जारी है और अब तो उसमे ई ई ब्लोगर भी शामिल हो कर एक ही विषय में चार और पोस्ट ठेल दी है पाठक झेल सके तो झेल ले , ये हास्य के राजा फला ब्लोगर ने सभी को हंसा हंसा कर लोट पोट कर दिया | अब देखिये कैसे बहस ,वाद विवाद, झगड़ो ,हास परिहास और व्यंग्य से दूर भागने वाले और सार्थक निरर्थक बहस पोस्ट पर बहस करने वाले  ब्लोगर भी कैसे इस तरह की पोस्ट के इंतजाम में लग जायेंगे जिसमे अच्छी खासी बहस झगड़े की गुन्जाईस हो | तब लोग इस बात पर बुरा नहीं मानेगे की आप को बहस की आदत है तब लोग कहेंगे की आप की आदत बड़ी ख़राब है आप बहस नहीं करते है | यदि ये नहीं करेंगे तो साहित्य की सेवा कैसे करेंगे विषय को ऊपर कैसे उठाएंगे |
                                            अब जब बात फ्रंट पेज की हुई है तो पेज थ्री की बात ना हो हो ही नहीं सकता है कोई भी अख़बार बिना पेज थ्री के पूरी हो सकती है क्या | पेज थ्री पर होगा ब्लोगर मिट की फोटो और उससे जुड़े मजेदार चटकारी खबरे | अब ये मत पूछियेगा की चटकारी खबरे क्यों ???? तो पता दू पेज थ्री लोग चटखारी खबरों और रंगीन फोटो के लिए ही देखे उप्स पढ़े जाते है | कई बार ये भी होता है कि कही कोई ब्लोगर मिट हो जाती है और कुछ लोग बेचारे जो काफी दोनों से इसकी बाट जोह रहे होते है उनको पता ही नहीं चलता है | उन बेचारो को तब पता चलता है जब मिट पर पोस्टे आने लगती है | समाचार पत्र निकालने से ये भी फायदा होगा की एक कालम इसके लिए बुक रहेगा जिसपे सिर्फ ये बताया जायेगा की देश के किस हिस्से में कहा कब कोई ब्लोगर मिट होने वाला है | जिसे भी ब्लोगर मिट में जाने की ज्यादा इच्छा है वो इस कालम को पढ़ पढ़ कर सभी मिटो में लोगों से मिट कर सकता है वैसे ब्लॉग जगत में ऐसे मिटनसार लोगों की कोई कमी नहीं है , उनके लिए ये बड़ा काम का होगा और बोनस में फोटो छपेगी वो अलग | बस आप को अपने मिट को कुछ मजेदार चटकारेदार बनाना होगा और कुछ खास बड़का, महान, विवादित ब्लोगरो को बुलाना होगा ताकि खबर भी बने और फोटो देखने को सभी ब्लोगर उत्सुक भी  रहे | यदि ई सब माल मसाला आप के ब्लोगर मिट में नहीं होगा तो आप के मिट को डाल दिया जायेगा कही किसी पीछे के पेज पर | सोचिये ब्लॉग अखबार प्रकाशित होने के बाद होने वाले ब्लोगर मिट कितने धमाकेदार हुआ करेंगे | भाई पेज थ्री पर आने का मजा ही कुछ और होता है | 
                         अब अख़बार है तो कुछ एक्सक्लूसिव खबरे भी होंगी ही जैसे कई बार ये भी होता है की टिप्पणी देने के बाद उस पर विवाद होता है और टिप्पणी और कभी कभी तो पूरी पोस्ट ही हटा दी जाती है | बेचारे बाद में आये पाठको को पता ही नहीं चलता की क्या कहा गया किसने क्या क्या कहा बेचारे मन मसोस कर रह जाते है की एक मजेदार धमाकेदार जानदार और जितने भी दार वाली पोस्ट और टिप्पणी को पढ़ने से वंचित रह गए | तो ये अखबार ऐसी पोस्टो को संभाल कर रखेगा एक एक टिप्पणी सहित | ब्रेकिंग न्यूज फलाने की हटाई गई विवादित टिप्पणी और पोस्ट पूरी की पूरी एक्सक्लूसिव पोस्ट हमारे पास है | बच्चे, महिलाओ और सभ्य, परिवार वाले शाकाहारियो के लिए रात ११ के पहले फ़िल्टर वर्जन बीप के साथ पढ़े और ज्यादा मनोरंजन चाहने वाले मासाहार पसंद करने वालो के लिए रात ११ के बाद पूरी पोस्ट और टिप्पणी लेकिन अपने रिस्क पर पढ़े |
           फिर कुछ लोगों को ये चिंता रहेगी की यहाँ भी गुटबाजी होगी अपने लोगों को अखबार में ज्यादा जगह दी जाएगी | तो फिर उसके जवाब में कुछ और नए अखबार निकलेंगे प्रतियोगिता बढ़ेगी ज्यादा से ज्यादा ब्लोगों को अपने अखबार में जगह दे कर पाठक अपनी तरफ खीचा जायेगा और हम ब्लोगरो की बल्ले बल्ले हो जाएगी | फिर तो किसी के आगे हाथ पैर नहीं जोड़ने पड़ेंगे की भईया ब्लॉग अग्रीगेटर चालू करो चालू करो | अखबार होगा तो विज्ञापन भी मिलेगा और कमाई भी होगी फिर ना कोई बस ऐवे ही एक दिन सब बंद बूंद कर चल देगा |
                अब रही बात की खबर लाने के लिए रिपोर्टर कहा से आयेंगे सारे ब्लोगों पर नजर रखेगा कौन तो मुझे नहीं लगता है की अखबार निकालने वालो को संवाददाता की कमी होगी अरे भाई हर ब्लोगर खुद रिपोर्टर होगा और अपनी खबरे खुद अख़बार मालिक तक पहुचायेगा जितनी मजेदार, धमाकेदार, झन्नाटेदार  ब्लॉग होगा उसे ज्यादा जगह मिलेगी | कम से कम ब्लॉग जगत से थोड़ी नीरसता चली जाएगी जो कुछ कुछ समय बाद वापस आ जाती है ना कोई ढंग का विवाद ना कोई बहस ना कोई ढंग का झगडा और सबसे बुरी बात काफी समय से कोई ढंग का लफडा भी नहीं सुना | ब्लॉग अखबार इस बोझिलता नीरसता को दूर करेगी |
              बोलिये आप का क्या ख्याल है |