August 28, 2010

पढ़े लिखे समझदार मुस्लिमो से एक अपील

अभी हाल में ही खबर पढ़ी की मुंबई में मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों ने पोलियो की दवा अपने बच्चों को पिलाने से इंकार कर दिया | अभी तक देखा गया था की जब पल्स पोलियो की दवा पिलाने घरों तक लोग जाते थे तो कुछ लोग झूठ बोल कर अपने बच्चों को पोलियो को डोज नहीं पिलाते थे जैसे की हमारे घर बच्चे नही है या हमने अपने बच्चों को पिला दिया है और ये झूठ  तब सामने आता था जब कुछ बच्चों को पोलियो हो जाता था | अभी तक देश में जितने भी मामले पोलियो के सामने आये है उनमें से एक बड़ी संख्या मुस्लिम समुदाय के बच्चो की थी  ( ये भी अखबारों में पढ़ा और टीवी पर देखे खबर के आधार पर कह रही हुं ) पर कुछ लोग इस बात पर विश्वास नहीं करते थे और न हीं सरकार ने इस समस्या को गंभीरता से लिया | पर इस बार तो हद ही गई खुल्लम खुल्ला एक साथ मुस्लिम समुदाय के  सैंकड़ो परिवारों ने इसे पिलाने से इंकार कर दिया | उनका मानना है की इसे पिलाने से उनके बच्चे कमजोर हो जायेंगे | बी एम सी ने तुरंत ही लोकल मौलवी से संपर्क किया और उन्हें लोगो को समझाने के लिए कहा उनके कहने पर कुछ परिवारों ने तो अपने बच्चों को दवा का डोज दे दिया पर ज्यादातर ने उसके बाद भी दवा पिलाने से इंकार कर दिया |
उस क्षेत्र के लिए एस तरह की बात नई नहीं है दो साल पहले भी वहा पल्स पोलियो दिवस के दो दिन पहले उस पूरे क्षेत्र में रातों रात पोस्टर लगा दिए गए थे जिस पर लिखा था दो बूंद जहर के ठीक  उसका उल्टा जो पल्स पोलियो के प्रचार के लिए किया जाता है दो बूंद जिंदगी के  |
इसकी वजह क्या है | मैंने सुना है ( कितना सच है मैं नहीं जानती) कि मुस्लिम समुदाय के बीच ये बात फैला दी गई है कि पोलियो कि दवा असल में पोलियो को मिटाने के लिए नहीं है बल्कि ये  डब्ल्यू एच ओं और पश्चिमी देशों की एक साज़िश है मुस्लिमों को ख़त्म करने की यदि हम अपने बच्चों को पोलियो की दवा पिलायेंगे तो हमारे बच्चे कमजोर हो जायेंगे और भविष्य में वो बच्चे पैदा करने में असमर्थ हो जायेंगे इस तरह मुस्लिमों को एक दिन दुनिया से समाप्त कर दिया जायेंगे | जिन लोगों ये बाते पता नहीं होगी वो हसेंगे पर जिस देश में एक ही समय में हर जगह गणेश जी दूध पीने लगे किसी मुह नोचवे मंकी मैन या इसी तरह के अफवाहों से लोगो में दहसत फ़ैल जाये वहा लोगों के बीच इस तरह की अफवाह हो तो कोई आश्चर्य की या बड़ी बात नहीं है | पर अफसोस है की जब मुंबई जैसे बड़े शहर का ये हाल है तो छोटे शहरो गावो का क्या हाल होगा |
इससे नुकसान क्या है   अब आप सवाल कर सकते है कि यदि किसी समुदाय के कुछ लोग कोई दवा अपने बच्चों को नहीं पिला रहे है तो इसमे बड़ी बात क्या है कुछ लोगों के न पिलाने से क्या नुकसान हो जायेगा | पल्स पोलियो कार्यक्रम का लक्ष्य है की देश से पोलियो के जीवाणु को जड़ से नस्ट कर दिया जाये जिस तरह बड़े चेचक जिसको बड़ी माता भी कहा जाता है जैसी अन्य कई बीमारियों को ख़त्म कर दिया गया है | लेकिन यदि एक बच्चा भी इसे पीने से छुट जाता है और उसमे पोलियो का जीवाणु बच जाता है तो ये कार्यक्रम फिर से जारी रखना पड़ेगा | यही कारण है की इतने साल बाद भी इसमे सफलता नहीं मिली है क्योकि हर बार कुछ बच्चे छुट जाते है और पोलियो के केस सामने आ जाते है | जिस लाइलाज बीमारी का इलाज मौजूद हो और वो भी मुफ्त में जिसे आपके घर पर आ कर पिलाया जाता है यदि उस बीमारी से देश के बच्चे ग्रसित हो रहे है तो ये हमारे लिए शर्म की बात है | ये कार्यक्रम डब्लू एच ओं की मदद से सरकार चला रही है जिसमे कितना पैसा समय और श्रम जा रहा है केवल कुछ लोगों की नादानी की वजह से ये लम्बा खिचता जा रहा है यदि लोग ये नादानी बंद कर दे तो वही पैसा समय और श्रम किसी और गंभीर लाइलाज बीमारी से लड़ने में गरीब बच्चो की पढाई में या गरीबो की भलाई में  खर्च किया जा सकता है | पर वो सब कुछ बेमतलब में खर्च हो रहा है एक ऐसी बीमारी में जो कुछ लोगों की बेवकूफी के कारण जिन्दा है | ( प्लस पोलियो के बारे में विस्तार से और वैज्ञानिक जानकारी अप किसी डाक्टर से ले सकते है मेरी जानकारी सिमित है ) 
करना क्या है  हम लोगों की एक बुरी आदत है की हम खुद तो कुछ करते नहीं है पर सरकारों को बैठे बैठे कोसते है  हम सभी बस ये मान कर बैठे है की ये परेशानी सरकार की है वही इसको सुलझाये हमसे क्या पर वास्तव में ये परेशानी हम सबकी है क्योंकि इससे हमारे ही देश के बच्चे असुरक्षित हो रहे है | इस लिए जरुरत इस बात की है की मुस्लिम समुदाय के पढ़े लिखे समझदार लोग जरा बाहर निकल के आये और ज़मीनी रूप से कुछ काम करे ना की बैठे  बैठे सिर्फ भाषण बाजी की जाये | हम सभी दूर दराज के इलाको में तो नहीं जासकते है पर आप हर पोलियो दिवस के दिन अपने शहर ( आप काम का बहाना नहीं बना सकते है वो रविवार का दिन होता है ) के  उन क्षेत्रो के पोलियो बुथो पर जाये जहा काम पढ़े लिखे अनपढ़ लोगों की संख्या ज्यादा है या लगता है की वहा के लोग ऐसे मामलों में थोड़े कान के कच्चे है और हर अफ़वाह को सच मान कर प्रतिक्रिया देते है | चेक करे की क्या वहा सभी बच्चों ने पोलियो की दवा पी ली है यदि वो मना करे तो उन्हें हर संभव तरीके से समझाये | मैंने खुद कई कम पढ़े लिखे और कई पढ़े लिखे गवारो को इस बारे में समझाया है की क्यों हर बार अपने बच्चों को पोलियो की दवा पिलाने की जरुरत है उन्हें लगता था की एक बार पिला दिया काफी है हर बार पिलाने की जरुरत नहीं है | पर मैं मुस्लिमों में बैठे इस सक को नहीं मिटा सकती क्योंकि वो मुझपर भरोसा नही करेंगे वो आप पर भरोसा कर सकते है और ये काम आप को ही करना होगा ना केवल अपने समुदाय के सभी बच्चों की सेहत के लिए बल्कि देश के बेहतर भविष्य के लिए |
शक शंका का कोई इलाज नहीं है  कहा  गया की शक शंका का इलाज किसी वैद्य हकीम के पास नहीं होता है मतलब जिन लोगों के मन में ये बात पूरी  तरह से घर कर गई है ये हमारे समुदाय को ख़त्म करने के लिए साज़िश है तो मुझे लगता है  ऐसे लोगों के लिए एक उपाय है कि इनसे कहा जाये की वो चाहे तो उस क्षेत्र में जा कर अपने बच्चों को पोलियो डोज दे जहा बहुसंख्यक समुदाय रहता है पोलियो पिलाने से पहले किसी का नाम पता नहीं पूछा जाता है वो चाहे तो अपनी समुदाय की पहचान छिपा कर अपने बच्चों को ये दवा दे सकते है तब तो उनको कोई नुकसान नहीं होगा | वैसे तो आप सभी खुद काफी समझदार है |
नोट ---------ऊपर दी गई खबर आप मुम्बई से प्रकाशित नवभारत टाइम्स में पढ़ सकते है माफ़ करे मुझे तारीख याद नहीं है पर खबर करीब १० -१२ दिन पहले प्रकाशित हुई थी | चुकी मुझे ये खबर कल मेरे मित्र ने दिखाई इस कारण पोस्ट आज लिखी जा रही है | इस पोस्ट को लिखने का ये मतलब नहीं है की सिर्फ एक समुदाय के कुछ लोगों के कारण ही पोलियो बचा है | इसके लिए और कारण भी जिम्मेदार है जैसे की पल्स पोलियो से जुड़े लोग देश के कई पिछड़े और दूर दराज  के इलाको में नही जा पाते है यदि हम खुद प्रयास करे और कम से कम शहरो से इस बीमारी को भगाने में मदद कर सके तो सरकार भी अपना सारा ध्यान उन इलाको पर लगा सकती है |

August 09, 2010

हाय ये क्या हुआ मेरा तो पंद्रह अगस्त मनाने का सारा उत्साह ही ठंडा हो गया

        उनका हाल देख कर मन बैठ गया चेहरा लटका हुआ उदास, बातों में भी कोई उत्साह नहीं, मुझसे रहा  नहीं गया पड़ोसी धर्म निभाते हुए मैंने पूछ ही लिया क्या हुआ भाई साहब कोई बात हो गई, मेरा पूछना था कि वो शुरु हो गये हाय ये  क्या हो गया पूरे साल जिस पन्द्रह अगस्त का इंतजार रहता था उसने इस बार ये क्या किया सारा उत्साह ही ख़त्म हो गया उसे मनाने का, उसने तो हम पर इतना बड़ा तुसारापात किया जिसकी हमें उम्मीद ही नहीं थी साल के पहले दिन जब नया  कलैंडर घर में आता है तो सबसे पहले हम उसमे २६ जनवरी और १५ अगस्त को ही देखते है और उस दिन को कैसे मानना है  सारा कार्यक्रम आठ महीने पहले ही बना लेते है पर इस बार ये क्या हो गया जिस पंद्रह अगस्त का इंतजार था वो पड़ा भी तो सन्डे के दिन छुट्टी के दिन, चली गई हमारी एक सरकारी छुट्टी हमारी सरकारी हराम खो------मतलब आराम का दिन | अब क्या खाक मनाये पंद्रह अगस्त सोचिये की आखिर हम सभी लोग क्यों भागते है किसी सरकारी नौकरी के पीछे इसीलिए न की हमें ज्यादा से ज्यादा सरकारी वेतन सहित छुट्टियाँ  मिल सके अब सोचिये की इसी तरह सारे तीज त्यौहार पर्व इसी तरह सन्डे के दिन पड़े तो क्या होगा हम सब का | हम तो सोचते है कि कोई न कोई ऐसी व्यवस्था होनी ही चाहिए कि कोई भी पर्व शनिवार या रविवार को ना पड़े | हा ये तो है की कुछ सालो बाद वह पड़ सकते है तो हमारी कामना है की वो साल लिप ईयर पड़ जाये जिससे वो अपने आप ही एक दिन आगे बढ़ जायेगा | तीज त्योहारों का तो जी कोई झंझट नहीं है पंडित जी से कह कर वो सब सेटिंग हो जाता है जी पहले ही हवा में  बात उड़ा दी जाती है की जी फला त्यौहार तो शाम से लगेगा सो दो दिन मनाया जायेगा बस संडेवाली छुट्टी बड़े आराम से मंडे को खसका दिया जाता है | पंडित भी खुश की एक दिन के त्यौहार में सारे जजमान निपटाना मुश्किल होता था अब दो दिन पड़ेंगे तो किसी को पहले दिन निपटा देंगे किसी को दूसरे दिन और हम तो जी हैप्पी ही हैप्पी  |
                 अब आप ही सोचिये अगर हमको आराम ना मिले तो हम पूरी लगन से काम कैसे करेंगे और आप सभी तो जानते ही होंगे की हम सरकारी कर्मचारी कितनी मेहनत से पूरे आठ घंटे काम करते है क्या कहा की काम तो हम सिर्फ छ: घंटे करते है जी बस के धक्के खा कर जो आँफिस आते है और जो पेट पूजा करते है उसे क्या हमारे काम के घंटे में नहीं जोडियेगा अरे हम क्या अपने लिए खाते है जी हम तो दूसरों के लिए खाते है न खाए तो सोचिये क्या होगा, खाने से पहले हमारे काम की रफ़्तार देखिये क्या मजाल की कोई फाइल  एक मेज से आगे पढ़ जाये और खाने के बाद देखिये बदन में क्या स्फूर्ति आती है फटा फट फाइल पास हो जाती है तो बताई ये की क्या हम अपने लिए खाते है | देखिये आप ने बातों बातों में  मुद्दे से भटका दिया ना हा तो हम छुट्टियों की बात कर रहे है आप तो जानती है की हमारे यहाँ तो कहावत ही है की सात वार और नौ त्यौहार और इस मामले में हम सभी बड़े सामाजिक सदभाव  वाले  है हमसे बड़ा धर्मनिरपेछ  तो कोई है ही नहीं, क्या ईद क्या दीवाली होली क्या क्रिस्मस क्या बैशाखी जी हम त्यौहार मनाने में कुछ नहीं देखते हम सब त्यौहार मिल कर मानते है और हर छुट्टी का दिल से स्वागत करते है | त्यौहार क्या जी हम तो महा पुरुषों की जयंतियो का भी दिल खोल के स्वागत करते है  गाँधी जयंती नानक जयंती आम्बेडकर जयंती सब हमारे लिए बराबर है | हम तो कश्मीर से कन्याकुमारी तक पता लगाते है की कही किसी महापुरुष के साथ ज़्यादती तो नहीं हो रही है उसके सम्मान में छुट्टी की माग करते है | अरे  किसी को सम्मान देने का इससे बड़ा और क्या ज़रिया होगा की उसके लिए छुट्टी घोषित किया जाये |  भाई हम सरकारी कर्मचारियों  के सम्मान देने का तो यही तरीका है | हम तो आप लोगों से भी विनती करते है की आप के नजर में है कोई ऐसा महा पुरुष या कोई तीज त्यौहार जिसको सरकार उचित सम्मान नहीं दे रही है तो तुरंत  हमारे पास उनका लेख जोखा भेजिए हम सरकार की तरफ से उन्हें उचित सम्मान दिलवायेगे | घबराइये  नहीं हम इसमे जात पात धर्म जैसे आडम्बर नहीं पालते हम सम्मान दिलाने के मामले में सबको समान रूप से देखते है |
और अंत में
हमारा देश ने फिर से  हमारे पांच हजार साल पुराने वैभव को पा लिया हर तरफ दूध की नदिया बह रही है मंदिर फिर से सोने चाँदी से मढ़ गए है हमारा ख़ज़ाना हीरो जवाहरातो से भरा पड़ा है कही कोई गरीबी नहीं है हर जगह उल्लाश फैला है देश में पैसे की कोई कमी नहीं है इसलिए अब किसी को भी रोज काम करने की जरुरत नहीं है व्यवस्था को उलटा कर दिया गया है अब छ: दिन छुट्टी होगी और सिर्फ एक दिन काम करना होगा सिर्फ सन्डे को काम करना होगा | ये सुनते है एक चीख  की आवाज़ आई  और कोई जोर से  चिल्लाया  क्या कहा सन्डे तो छुट्टी का दिन है एक दिन काम करना होगा क्या ख़राब दिन आगये है |
                

August 06, 2010

आओ मलेरिया फैलाए देश की बढ़ रही जनसंख्या घटाए

आओ हम सब मिल कर देश को सबसे बड़ी समस्या से निजात दिलाने के लिए कुछ योगदान करे बढ़ रही जनसंख्या को थोडा घटाए और मिल कर मलेरिया फैलाए और जनसंख्या घटाए | इतना बड़ा काम सिर्फ मच्छरों पर ही क्यों छोड़े थोडा हम भी हाथ बटाये लोगों को काट कर मलेरिया नहीं फैला सकते ( उससे तो रेबीज फैल जायेगा ) कम से कम मच्छरों की आबादी ही बढ़ाये | घर को भले साफ रखे पर घर के बाहर खूब गन्दगी फैलाये घर में जब कचरा हो तो उसे उठा कर सीधे खिड़की से बाहर फेक दे और डेस्टबिन का पैसा बचाए | यदि आप और ज्यादा योगदान देना चाहते है तो आस पास मच्छरों का मैटरनटी होम भी खोल सकते है  किसी गढ्ढे में पानी जमा करके रखे ताकि मच्छरों को अपनी आबादी और बढ़ाने में मदद मिले | जितना  ज्यादा मच्छरों की आबादी बढ़ेगी उतना ज्यादा मलेरिया डेंगू  फैलेगा | उनकी आबादी बढ़ेगी और हमारी घटेगी | हमारे मुंबई के नेता तो यहाँ की लगातार बढ़ रही जनसंख्या से कुछ ज्यादा ही परेशान है मेरी तो उनसे अपील है की मुंबई कि जनसंख्या को कम करने का सबसे सस्ता और आसान तरीके को और फ़ैलाने के लिए अपने कार्यकर्ताओं को सक्रिय योगदान करने के लिए कहना चाहिए | वैचारिक और राजनैतिक गन्दगी तो वो अक्सर फैलाते रहते है इस बार जरा कचरे की गन्दगी को फैला कर कुछ वास्तविक काम करे यहाँ की जनसंख्या को कम करने के लिए |
                           मुझे मालूम है की हर अच्छे काम में कुछ परेशानियाँ आएँगी और कुछ बेवकूफ़ साफ सफाई पसंद लोग इसका विरोध करेंगे पर हम सभी को इससे डरने की जरुरत नहीं है | दुनिया में ऐसे बेवकुफो की कमी नहीं है जो हर वक्त हर जगह साफ रखने में विश्वास रखते है | मैं रोज जाती हुं अपनी बेटी को स्कुल छोड़ने पॉश इलाके में कमबख्तो को सफाई की बीमारी है उनका घर तो साफ रहता ही है सारी सड़कें पूरा इलाक़ा ही साफ सुथरा दिखता है मुझे तो समझ  नहीं आता की इतनी साफ सफाई में जी कैसे लेते है वो लोग | ये देख कर धक्का लगता है की सफाई कर्मचारी सातों दिन वहा सफाई करते है एक दिन की भी छुट्टी उन बेचारो को नहीं मिलती | एक दिन मैंने पूछ ही लिया उनसे की आप इतनी सफाई क्यों करते है यहाँ तो बेचारा बोला की मज़बूरी है यहाँ के लोग घर के बाहर गन्दगी फेंकते ही नहीं है कभी कदार कोई फेक देता है तो हमें साफ करना मज़बूरी हो जाती है हम न करे तो इनको पता चल जाता है की हमने आज झाड़ू नहीं मारा तुरंत हमारी शिकायत हो जाती है | पर दूसरे इलाक़ो में लोग खुद ही इतना कचरा बाहर फेंकते है की कि यदि हम एक दो दिन वहा सफाई ना भी करे तो पता नहीं चलता और वहा के लोगों को फर्क भी नहीं पड़ता और यदि किसी ने गलती से शिकायत कर भी दी तो निरीक्षण करने आये ऑफिसर को हम सफाई करने के एक घंटे बाद ही बुला कर दिखा देते है कि देखो हमने तो साफ किया था यहाँ के लोगों ने एक घंटे में ही वापस सारा कूड़ा कचरा फैला दिया | अब इससे हमारी काम चोरी कभी पकड़ी ही नहीं जाती |
                                देखा उस गरीब सफाई कर्मचारियों को कितना योगदान दे रहे है इस शुभ काम में शर्म आती है उन सफाई पसंद लोगों पर जो इतने अच्छे काम में बाधा पहुचने की कोशिश कर रहे है | यदि इस शर्म से बचना है तो गन्दगी करने में अपना थोडा और योगदान बढ़ाये थोड़ा और कचरा फैलाये थोडा और मलेरिया फैलाये |
क्या आप अपने शहर में बढ़ रही जनसंख्या से परेशान है ?
क्या आप उसे कम करना चाहते है ?
क्या आप डाक्टर है या आप का अस्पताल ठीक से नहीं चल रहा है ?
और आपको अपना धंधा पढ़ना है ?
तो निराश ना हो तुरंत मेरे लिखे उपायों पर अमल करे या फिर हमें  टोल फ्री नंबरों पर कॉल करके तुरंत मलेरिया के मच्छरों का आर्डर दे अभी एक घंटे के अन्दर कॉल करने वाले को मच्छर फ्री में भेजे जायेंगे | तो देर न करे मौके का फ़ायदा उठाये और कॉल करे |

एक महीने पहले हमारे पड़ोस कि बिल्डिंग में मलेरिया से दो सगे भाईयो की बीस दिनों के अंतर पर मौत हो गई मेरी आधी बिल्डिंग मलेरिया से पीड़ित है पर किसी को सफाई की कोई चिंता नहीं है | परसों रात पड़ोस के एक और १७ वर्षीय युवक की मलेरिया से मौत हो गई | अब तीन मौतों के बाद लोगों की नींद टूटी है बी एम सी में शिकायत करके आज सफाई करवाई जा रही है | अभी तक क्यों इंतजार  किया गया हमारे देश में लोगों की आदत है जब तक पानी सर से ऊपर नहीं चला जाता हम सोते रहते है | मैं हफ्ते भर से सोसायटी को बिल्डिंग में सफाई कराने और अपने तरफ से पेस्ट कंट्रोल के लिए बोल रही हुं पर कोई सुनने वाला नहीं है | थक कर मैंने आज सुबह अपने पति को कहा की जरा मेडिकल इंसोरेंस करने वाले को पता करो की आस पास किस किस अस्पताल में हम कैशलेश इलाज करा सकते है और उसके लिए किस किस डोक्युमेंट की जरुरत पड़ेगी | यहाँ के हालत यही है की हमें आज इस तरह की तैयारी भी करनी पड़ रही है क्योकि यदि हमारी बिल्डिंग साफ भी हो गई तो क्या पर हम सभी शहर के दुसरे ईलाको में भी जाते है वहा पर कैसे बचे |  

July 15, 2010

आग लगे ऐसी साक्षरता को

रोज मजदूरी करने वाले मज़दूर के पास साक्षरता अभियान वाले आते है और उससे कहते है की तुम निरक्षर हो हम तुमको साक्षर बनायेगे बस तुमको रोज एक घंटे हमसे आ कर पढ़ना पड़ेगा, मज़दूर थोड़ा नाराज़ हो कर  बोला साक्षर हो कर मुझे क्या फायदा होगा, उसके गुस्से को देख कर अभियान वाले थोड़ा सकपका गये बोले अरे भाई साक्षर हो जाओगे तो तुमको काफी फायदा होगा तुम सब कुछ पढ़ सकोगे अपना नाम लिख सकोगे कोई तुम्हारे साथ धोखा नहीं कर सकता यदि ठेकेदार तुमसे ज्यादा पैसे पर अंगूठा लगवा कर तुमको कम पैसे दे रहा है तो तुमको पता चल जायेगा कोई तुम्हारा शोषण नहीं कर सकता | इतना सुनते ही मज़दूर हत्थे  से उखड गया और बोला हा हमको पता है सारे फायदे साक्षर होने के दो दिन पहले ऐसा ही एक साक्षर मज़दूर हमारे साथ काम कर रहा था शाम को काम खत्म होने के बाद ठेकेदार ने उसे दो सौ पचास पर नाम लिखवा कर दो सौ रुपया देने लगा तो उसने लेने से मना कर दिया और ठेकेदार से झगड़ा करने लगा की मेरे पूरे पैसे दो नहीं तो मैं शिकायत करूँगा यह सुन कर ठेकेदार ने उसे जम कर पीटा और नौकरी से भी निकाल  दिया बेवकूफ़ फिर पुलिस के पास चला गया वहा भी पुलिस वालो ने रिपोर्ट तो नहीं लिखे उलटा दो तमाचे लगा कर भगा दिया | पिटाई से बे हाल दो दिन से घर पर पड़ा है और बच्चे भूखे रो रहे है, जी खूब फायदा मिला उसे अपने साक्षर होने का हमारा भी दिमाग ख़राब करके चला गया  आज तक तो मैं समझता था की ठेकेदार हमारे दस रूपये मारता है उसे तू मैं भगवान को भोग लगाया सोच  कर भूल जाता था पर जब से पता चला है की वो हमारे रोज के पचास रूपये मारता है तब से हमारा  सुख चैन और नींद सब ग़ायब हो गई है अब लगता है की काश हमें ये पता ही नहीं होता की हमारे कितने पैसे जा रहे है कम से कम आराम से सो तो रहे थे अब तो वो भी चली गई  आग लगे ऐसी साक्षरता को |
                

May 28, 2010

भगवान इस बेटे की पुकारा पर ध्यान दीजो "अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो "

 माँ बाप की उपेक्षा का शिकार एक बेटे का माँ बाप के नाम पत्र  
 माँ पिता जी
              मैं ये बचपन से देखता आ रहा हुं इस ज़्यादती को, माँ पिताजी आप दोनों ही के लिए ही आप की बेटी ही हमेशा ज्यादा लाडली रही और मैं हमेशा से आप लोगों के लिए ज्यादा महत्व नहीं रखता था अपनी बेटियों की आप सब ने हर चीज से रक्षा की उसे हर समय आराम दिया और मुझे कभी आराम से रहने नहीं दिया युही खुले सांड की तरह छोड़ दिया सब कुछ करने के लिए |
 बचपन में ही हमें शहर के टॉप के अंग्रेजी मीडियम स्कूल में डाल दिया और कहा की खूब पढ़ो तुम्हें हर तरह की सुविधा यहाँ मिलेगी जरुरत हुआ तो कोचिंग भी करा देंगे हम पर हर तरह का प्रेशर कि पढ़ाई तो हर हाल में करनी ही है और कोशिश कीजिये कि नंबर भी अच्छे आये कभी हमारा कोर्स देखा था कितना कठिन था वहा तो पास होने के लाले रहते थे तो अच्छे नंबर लाते कैसे और अपनी बेटियों को डाल देते है किसी सरकारी हिंदी मीडियम में या किसी मामूली से अंग्रेजी स्कूल में जहा पर उन पर कोई प्रेसर ही नहीं होता उनसे कहा गया था कि बस पास हो जाओ बहुत है उन्हें तो कोचिग भी नहीं करना होता था  देखो कैसे वो स्कूल के बाद ही फ्री हो जाती थी और हमें स्कूल के बाद कोचिग  भी जाना पड़ता था एक जगह की पढ़ाई समझ में नहीं आती अब दो जगह की कैसे करे | काश हमें भी किसी मामूली स्कूल में डाल दिया होता तो मौज़ का जीवन जी रहे होते आप कि बेटी कि तरह |
               पिता जी बेटियों से इतना प्यार की उनसे कहते है की यदि फेल हुई तो पढ़ाई बंद हो जाएगी पर कभी हमसे नहीं कहा ऐसा एक बार हमसे कहते, दो साल में दसवी और दो साल में बारहवीं पास किया हर बार सोचा की चलो इस साल फेल होने पर आप मेरा स्कूल बंद करा देंगे पर मेरे सारे अरमानो पर आप ने पानी फेर दिया कभी मेरी पढ़ाई नहीं बंद कराई फेटते रहे उसी में मुझको क्योंकि आप को मुझसे प्यार है ही  नहीं जलते थे हमारी आज़ादी से | मेरे खिलाफ साज़िश की बेटी के टॉप करने पर भी उसे मेडिकल में दाख़िला नहीं लेन दिया कहा इतना मुश्किल कोर्स कर पायेगी बेकार में उसके दिमाग़ पर बोझ बढ़ेगा और पैसे भी खर्च होगें नाहक पर मेरा एडमिशन इंजीनियरिग में डोनेशन दे कर करा दिया एक बार भी मेरे बारे में नहीं सोचा की मैं इतनी मुश्किल पढ़ाई कैसे करूँगा पूरे दस लाख डोनेशन दे दिया बेटी के फ़ीस के पैसे नहीं थी तो मेरे डोनेशन के लिए कहा से लाये बेटी को आराम देने और मेरे आराम को हराम करने की साज़िश रची आप सबने  |
                        हर समय बेटी की परवाह उसे हिदायत दी गई कि कॉलेज से सीधे घर आना सूरज ढलने के बाद कभी घर से बाहर नहीं रहना जमाना बहुत ख़राब है कही कोई ऊँच नीच हो गई तो, कभी वो पाच मिनट भी देर से आई तो उसकी फ़िक्र में मरे जाते थे आप दोनों, घर आते ही उससे पचास सवाल किया जाता था की देर कैसे हो गई और मुझे तो कभी घर पर आने जाने के लिए कोई हिदायत नहीं दी क्योंकि मेरे सुरक्षा की कोई चिंता ही नहीं थी आप सब को | मैं देर रात घर आता था क्या मेरे लिए जमाना ख़राब नहीं था क्या मेरे साथ कुछ  बुरा नहीं हो सकता पर आप लोगों को इससे क्या मैं चाहे कितनी भी रात में घर आऊ मुझसे कोई सवाल नहीं किया गया |
                क्या मजाल की कोई आप की बेटी के बारे में कुछ उलटा सीधा कह दे आप लोग बिलकुल ही बर्दाश्त नहीं कर पाते थे एक बार कोई लोफर आवारा उस पर फब्बतिया कस के उसे छेड़ दिया और किसी ने आप को इसकी खबर कर दी ( हा मोहल्ले वालो को भी सबकी बेटियों का ही ज्यादा ख्याल रहता है ) तुरंत ही बेटी का घर से निकलना बंद करा दिया कॉलेज जाना बंद करा दिया पूरा स्नातक घर से पढ़ कर किया यहाँ तक की परीक्षा दिलाने के लिए आप खुद जाते थे उसका बाडीगार्ड बन कर और माँ घर में उसकी बाडीगार्ड बन कर रहती थी उसकी सुरक्षा को ले कर आप सब इतने चिंतित है पर कभी मेरी चिंता करते आप को नहीं देखा कितनी बार लोग आ कर मेरे बारे में शिकायत कर गये की मैं कॉलेज में  आवारागर्दी करता हुं लड़ाई झगड़ा करता हुं यहाँ तक की एक रात जेल भी गुजार आया पर मेरा कॉलेज जाना बंद नहीं कराया मेरी सुरक्षा की चिंता होगी तब ना | 
                    हम बच्चे से बड़े हो गये पर आप लोगों का प्यार चिंता परवाह आपकी बिटिया की तरफ और बढ़ता गया और मेरी तरफ से लापरवाह होते गये |  बिटिया रानी ने स्नातक में भी टॉप किया और बड़ी कंम्पनी से जॉब के आफर भी आ गये पर आप लोगों ने साफ मन कर दिया की तुमको काम करने की जरुरत नहीं है क्यों इन सब झमेले में पड़ती हो नौकरी  करना बेमतलब की सरदर्दी है टेंशन है तुम इन सब में मत पड़ो शादी ब्याह करके सुख चैन से घर पर रहो | पर जब मेरी बारी आई तो मेरे सुख चैन के बारे में नहीं सोचा घुस दे कर मेरी सरकारी नौकरी लगवा दी अरे आप ने अपनी सरकारी नौकरी से इतना तो कमा ही लिया है की सात तो नहीं पर कम से कम मैं और मेरी चार पुश्ते तो सुख चैन से बैठ कर खा ही सकती थी पर नहीं आप ने डाल दिया इस झमेले में आप जानते भी की एक एक ठेकेदार से पैसे निकलवाने के लिए कितनी भाग दौड़ करनी पड़ती है |
              विवाह करते समय भी जिससे चाहा उससे उसका विवाह कर दिया उससे पूछने कि भी जरुरत नहीं समझी और मेरे सामने लड़कियों कि लाइन लगा दी मैं बेचारा कितना कन्फियुज हो गया था कि किससे विवाह करूँ  और शादी के बाद बेटी को पूरी आज़ादी दे दी कि बेटी अब तुम्हारा ससुराल ही तुम्हारा घर है अब हम तुम्हारी लाइफ में कोई इंटर फेयरेंस नहीं करेंगे अब सारे सुख दुख तुम खुद ही हैंडिल करो अब हम तुम्हारे लिए परे हो गये पर मुझे नहीं दी आज़ादी आज भी मेरे जीवन में हर तरह का दखल देते है क्यों माँ पिता जी आखिर आप लोग ऐसा क्यों करते रहे | क्या मै आप का अपना नहीं था |
                  मुझे लगता है कि ऐसा सिर्फ मेरे ही साथ नहीं होता है भारत में ज्यादातर बेटों के साथ यही ज्यादतिया होती है उन सभी को इसी तरह उपेक्षा का शिकार होना पड़ता है | बेटियों को आराम देने के लिए उनकी सुरक्षा के लिए सब कुछ किया जाता है पर हम सब के लिए कुछा भी नहीं | देखिये ना आज भी स्कुलो में लड़कियों कि संख्या लड़कों से कम है आज भी ज्यादातर शिक्षा बोर्डो के दसवी बारहवीं में लड़कियाँ ज्यादा संख्या में पास होती है उसके बाद भी ऊँच शिक्षा में उनकी संख्या कम होती जाती है | लगभग चौदह हजार बच्चे आई आई टी में पास होते है पर उनमें लगभग डेढ़ हजार ही लड़कियाँ है  स्कूल कॉलेज में टॉप करने वाली लड़कियों कि संख्या बढती जा रही है पर आज भी नौकरियों में उनका प्रतिशत दहाई से भी कम है और ऊँचे पदों पर तो मुश्किल से एक दो प्रतिशत है एक बहुत बड़ी संख्या में  लड़कियाँ आज भी प्रोफेशनल कोर्स करने के बाद भी नौकरी नहीं करती है या सेवा नहीं देती इनमें डाक्टर और इंजीनियर भी है या कुछ करती है तो शादी के बाद छोड़ देती है क्यों ? क्योंकि वो सब अपने घर वालो कि लाडली है उनके आराम सुरक्षा के लिए उन्हें सारे झमेलों से बचाने के लिए ये सब किया जाता है | इस लिए आज मैं भी भगवान से ये प्रार्थना करता हुं कि हे भगवान मुझे भी ऐसे ही आराम और चैन का जीवन सबका लाडला बन कर जीना है इस लिए "अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो "|

नोट ---यदि किसी बेटे को इसी तरह कि किसी और ज्यादतियों का सामना करना पड़ा हो जो मेरे साथ नहीं हुआ है तो वो मुझसे यहाँ पर अपना दुख दर्द बाट सकते है |

                                                       माँ बाप के फ़िक्र और चिंता का प्यासा
                                                             एक मासूम बेटा

May 15, 2010

लोकतंत्र और प्रजातंत्र में क्या अंतर है बताये इन पढ़े लिखे बेरोजगारों को

क्यों भईया नोट्स तो पूरे छ: दिए थे पेपर में पांच तो आये थे फिर चार क्यों किया, जब फसा चार तो चार ही न करते, क्यों ये लोकतंत्र वाला क्यों नहीं किया, अरे लोकतंत्र कहा आया था वो तो प्रजातंत्र आया था | ये सवाल जवाब आज से सालों पहले मेरे और मेरे चचेरे बड़े भाई के बीच की थी जब हम दोनों बी ए का पेपर साथ में दे रहे थे (दो साल लगातार बारहवीं में फेल हो कर बड़े भईया मेरे बराबर आ गये थे ) दोनों के कॉलेज बी एच यू से जुड़े थे और हमारे विषय एक थे इसलिए मैं उनको अपने नोट्स(फर्रिया तो बच्चे बनाते है)  देते थी जो वो परीक्षा में बाक़ायदा सामने रख कर टिपा करते थे( इसी अच्छी सुविधा के कारण भईया जैसे सारे लड़के उस कॉलेज में एडमिशन लेते थे ) उनका ज्ञान कितना था अब तक तो आप समझ चुके होंगे | असली झटका मुझे तब लगा जब हमारे नतीजे आये उस लोकतंत्र प्रजातंत्र वाले विषय में उनके नंबर मेरे बराबर थे और बाकी विषयों में मुझसे ज्यादा ( इस वजह से उस समय मुझे मेरे संयुक्त परिवार में मज़ाक का पात्र बनना पड़ा और मुझे आज तक नहीं पता चला की उनके नंबर मुझसे ज्यादा कैसे आये ) वो अलग बात है की अगले साल तक उस ख्यातिमान (कुख्यात ) कॉलेज की प्रसिद्धि बी एच यू तक चली गई और वो परिक्षाए अपने यहाँ कराने लगा और पहला पेपर देने गये भाई साहब जब उपकुलपति को गनर के साथ खुद परीक्षा हाल में टहलते देख तो सादी कापी जमा कर भाग खड़े हुए | ये किस्सा मुझे अचानक कल याद आया जब मेरे एक मित्र ने बताया की उनके पास एक लड़का आया था काम मागने के लिए अपने एम ए और बी एड की डिग्री की काफी देर तक शान दिखता रहा फिर जब मैंने उससे कैलकुलेटर दे कर कहा की जरा प्रतिशत निकाल कर दिखाए तो उन जनाब को कंप्यूटर के ज़माने में भी कैलकुलेटर तक प्रयोग करना नहीं आ रहा था उलटा मुझसे पूछने लगे की काम क्या करना है पहले ये बताईये जब बताया गया की आप को दुकानों  में जा कर माल का आडर लाना है तो बिफर पड़ा की मैंने इतनी बड़ी बड़ी डिग्रिया इस तरह का छोटा काम करने के लिए नहीं ली है और चला गया |
               देश में आज इस तरह के पढ़े लिखे बेरोजगारों की पूरी फौज खड़ी है | जिन्हें अपनी डिग्रियों( बेमतलब की )  और ज्ञान ( जो की किताबी है ) को लेकर एक अजीब तरीके की खुशफहमी है जैसे की उन्होंने बहुत बड़ा तीर मार लिया हो  | यदि इन लोगों से पूछा जाये की वो क्या सोच कर एम ए, बी एड यहाँ तक की पी एच डी कर रहे थे या क्या सोच कर विषय का चयन किया था उनके विषयों का आगे क्या स्कोप है  तो इनके पास कोई जवाब नहीं होगा वो खुद नहीं जानते तो बताएँगे क्या  ( अब ये कैसे कहे की पढ़ाई तो बस बहाना था मकसद तो मित्रों के साथ तफ़री करते रहने का था और इससे सरल कोई और विषय ही नहीं था ) | इनमें भी कुछ ऐसे है जो नकल मार कर या अपनी जगह किसी और से परीक्षा दिला कर या अन्य किसी भी तरीके से डिग्रिया पा जाते है और खुद को डिग्री धारी होने की गलतफहमी में जीते है | इस प्रकार के डिग्रीधारियो को कम से कम इस बात का एहसास होता है (भले कुछ धक्के खाने के बाद ) की उसको जो काम मिले कर लेना चाहिए क्योंकि उसके हाथ में जो डिग्री है उसका मोल ज्यादा कुछ नहीं है बल्कि इनमें से कुछ तो अपनी व्यवहारिक दिमाग के बल पर ज्यादा अच्छा काम पा भी लेते है और उसमे प्रगति भी करते है | दूसरे वो होते है जो रट रट कर डिग्री पा लेते है और खुद को पढ़े लिखे होने की खुशफहमी में जीते है | मुसीबत इन्ही पर ज्यादा आती है क्योंकि किताबों में लिखी किताबी बातों के अलावा इनको कोई भी व्यवहारिक ज्ञान नहीं होता है | जिस सवाल का जवाब इनको नहीं आता उसका सीधा सा जवाब देते है जी ये हमारे कोर्स के बाहर का है | इनसे ज्यादा व्यवहारिक ज्ञान और जानकारियाँ किसी भी बड़े शहर के दसवी के क्षात्रो को होती है |  इनकी डिग्रिया स्टील की राड बन कर इनके रीढ़ की हड्डी में घुस जाती है इसी कारण इनकी गर्दन हमेशा अकड़ी रहती है और नाक ऊँची और उस ऊँचाई से इन्हे हर काम छोटा दिखाई देता है | हर वक्त इनका यही रोना रहता है की इतनी पढ़ाई लिखाई क्या ऐसा छोटा काम करने के लिए की, सालों तक बेरोजगार पड़े रहेंगे पर हर काम को छोटे बड़े के पैमाने में तौलते रहेंगे | साथ ही इस ज्ञान पर तुनक ये की पहली नौकरी भी बीस बाईस हजार से कम की नहीं करेंगे | अब आप बताईये की इन डिग्री धारी अनपढ़ बेरोजगारों का क्या किया जाये | तीसरे तरीके के वो बेरोजगार है जो शायद सबसे ज्यादा बदकिस्मत होते है  बारहवीं या स्नातक के बाद प्रोफेशनल कोर्स के महत्व को समझाते हुए किसी प्रोफेशनल कोर्स में दाख़िला ले लेते है पर दाख़िला लेते समय संस्थान की पृष्ठभूमि का पता नहीं लगाते है | आज कल के समय में प्रोफेशनल कोर्सो के महत्व को सभी जानते है और युवाओं में इनके प्रति आकर्षण को भी इसी कारण अब हर गली मोहल्ले की नुक्कड़ पर हर तरह के व्यावसायिक विषयों में डिग्री डिप्लोमा देने का दावा करने वाले संस्थान कुकरमत्तो की तरह उग आये है | इनमें से ज्यादातर संस्थान फ़र्ज़ी होते है और उनकी डिग्री डिप्लोमा भी, कुछ तो ऐसे है जो किसी अन्य नामी संस्थान ( जिससे जुड़े होने का दावा करते है ) के सेलेबसटीचरों और कुछ आधे अधूरे इन्फ्रास्टकचर द्वारा पूरा कराते है पर कुछ के पास तो ये सब भी नहीं होता है | वैसे बता दे की ऐसे संस्थानों की भी कोई कमी नहीं है जो पूरी तरह से वैध है और कई तरह के प्रोफेशनल कोर्स भी चलते है पर उनके पास भी न तो अच्छे टीचर है और न ही किसी तरह का इन्फ्रास्टकचर यहाँ तक की उनके पास ढंग का सेलेबस भी नहीं है | यहाँ से पढ़े युवाओं को अपने कोर्स की आधी अधूरी जानकारी फ़र्ज़ी डिग्रियों का पता तब चलता है जब वो नौकरी की तलाश में बाहर आते है या दूसरे अच्छे संस्थानों के विद्धायार्थियो से मिलते है पर तब तक काफी देर हो चूकि होती है | इनकी गलती ये होती है की ये ऐसे संस्थानों में दाख़िला लेने से पहले उसके बारे  में कुछ  भी पता नहीं करते है और उनके दावों को सच मान लेते है तो कई बार अच्छे संस्थानों में दाख़िला नहीं मिलने से या इन जगहों पर फ़ीस कम होने की वजह से भी लोग ऐसे फ़र्ज़ीवाडे के चक्कर में फस जाते है | इनमें से कुछ तो अपने निजी योग्यता के बल पर कुछ अच्छी नौकरी पा लेते है और ऊपर भी बढ़ते है पर जिनके पास वो नहीं होता है या तो अच्छी नौकरी की तलाश में भटकते रहते है या फिर उसी लाइन में मज़बूरी में निचले स्तर पर काम करते है जो उनकी उम्मीद और चाहत से काफी कम होता है | ये बेचारे भी सारी जिंदगी खुद को बेरोजगार समझ कर हमेशा दूसरे अच्छे कम की खोज में लगे रहते है | ये बेचारे तो सहानुभूति के पात्र होते है पहले वाले अपनी योग्यता अनुसार कोई न कोई कम पा जाते है पर ये बीच वाले जो काफी पढ़े लिखे होने की ग़लतफहमी में जीते है वो हमेशा बेरोजगारों की फौज में सिर्फ इज़ाफा ही करते है और सारी जिंदगी बेरोजगार ही बने रहते है | अब ऐसे लोगों को उनकी हक़ीकत कैसे बताया जाये ये आप ही बताए |
 

May 08, 2010

भगवान में विश्वास श्रद्धा और भूतो में विश्वास अन्धविश्वास क्यों

सुबह अखबार में एक खबर छपी थी कि एक बेचारा बेरोजगार युवक नौकरी जाने के बाद परेशान हो कर तंत्र  मंत्र से सब कुछ ठीक करने का दावा करने वाले बाबा के चक्कर में पड़ कर ठगा गया | नौकरी तो बेचारे की पहले ही गई थी अब अन्धविश्वास के चक्कर में पड़ कर पचास हजार का कर्ज भी लाद बैठा | पढ़ कर बेचारे के लिए दुख हुआ पर एक सवाल भी मन में उठा की भारत में या ये कहे की पूरे विश्व में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो भूत प्रेत तंत्र मंत्र  जादू टोना जैसी चीजों पर विश्वास करते है पर हम सभी बड़े आराम से उनके विश्वास को अन्धविश्वास करार देते है जबकि कोई यदि भगवान पर विश्वास करता है तो उसे श्रद्धा का दर्जा दे देते है | क्यों भगवान में विश्वास को श्रद्धा और भूतो, तंत्र मंत्र जादू टोना आदि में विश्वास को अन्धविश्वास की श्रेणी में डाल दिया जाता है | दोनों के विश्वास में आखिर फर्क क्या है जब भगवान है तो शैतान भी हो सकता है | जब भगवान के भक्त हो सकते है तो शैतान के क्यों नहीं दोनों के विश्वास को दो अलग रूपों में क्यों देखा जाता है श्रद्धा तो आखिर श्रद्धा होती है वो किसी के प्रति हो सकती है फिर उसमे फर्क क्यों | मुझे लगता है की ना तो किसी ने  भगवान को देखा है और न ही भूतो को, हा भूतो को देखने का दावा काफी लोगों ने किया है पर आज तक भगवान को देखने का दावा किसी ने भी खुल कर नहीं किया है(हा खुद ही भगवान होने का दावा कइयों ने किया है) | उसके बाद भी कहा जाता है की भूत वुत कुछ नहीं होता पर भगवान होता है क्यों | एक बात और है भूतो में विश्वास करने वालो का विश्वास भगवान में विश्वास करने वालो से ज्यादा पक्का होता है क्योंकि भूत प्रेत के डर से हमने लोगों को डरते देखा है लोग कुछ खास जगहों और कुछ खास काम करने से बचते है यदि उनसे ये कह दिया जाये की ऐसा करने से शैतान नाराज़ हो जायेगा या भूत प्रेत आप का बुरा कर देंगे जबकि आज तक भगवान से किसी को मैंने डरते नहीं देखा है जिसकी जो इच्छा होती है करता है | कहने को तो कहा जाता है की कोई बुरा काम मत करो झूठ मत बोलो चोरी मत करो दूसरों का बुरा मत करो भगवान देख रहा है वो तुमको दंड देगा पर आज तक मैंने भगवान के डर से लोगों को ये सारे काम बंद करते नहीं देखा है लोग कभी भी भगवान से नहीं डरते है क्योंकि वो कहने के लिए तो भगवान के होने का विश्वास करते है पर मन ही मन जानते है की जो इच्छा है करो जब ईश्वर होगा तब ना कोई दंड मिलेगा| आप तर्क दे सकते है की भूत प्रेत के नाम पर लोगों को ठगा जाता है तो क्या भगवान के नाम पर लोगों को नहीं ठगा जाता है आप परेशान है फला भगवान की पूजा करा लो ज्यादा पैसे नहीं लगेंगे दुख दूर हो जायेंगे बेटी का विवाह नहीं हो रहा है बेटी को बोलो फला देवी का व्रत जाप करे रोज मंदिर जा कर दूध फल चढ़ाये जल्द विवाह हो जायेगा बेटा नहीं हो रहा है फला मंदिर में सोने की छत्र चढ़ाने की मन्नत मान लो वहा सबकी मन्नते पूरी हो जाती है | क्या इस तरह की बाते करके लोगों को नहीं ठगा जाता है अरे बेटी को विवाह एक दिन तो होना ही है भले पूजा करने के सालों बाद हो पर यही कहेंगे की देखा देवी की कृपा से विवाह हो गया ऐसे मामलों में हम क्यों नहीं मानते की उसे ठगा गया | सोचिये दुनिया में ईश्वर पर भरोसा करने वालो की संख्या कितनी ज्यादा है हर इन्सान को कोई न कोई परेशानी होती है और उसी परेशानीयो  से उबरने के लिए वह भगवान के पास जाता है और उनसे मदद मागता है मन्नते मागता है या जिसके जीवन में परेशानी नहीं है वो आगे भी किसी परेशानी से बचने की दुआ मागता है क्या सबकी दुआ कबूल हो जाती है क्या उन सभी की परेशानियाँ दूर हो जाती है या जिनके जीवन में कोई परेशानी नहीं है उनको कभी मुसीबतें नहीं घेरती मुश्किल से कुछ लोगों की मुसीबतें ही टलती है ( वजह कुछ और भी हो सकती है ) फिर भी हम उनमें से किसी से नहीं कहते है की क्यों बार बार भगवान के पास जाते हो जब कोई फायदा नहीं हो रहा है या ये सब फ़ालतू की चीजें है इन्हें मत करो जबकि यदि कोई  अपनी मुसीबतों से बचने के लिए जादू टोना तंत्र मंत्र या भूत प्रेत के चक्कर में पड़ता है  तो एक तो हम इन चीजों में विश्वास करने वालो को पहले ही अंधविश्वासी करार देते है और जब एक बार में उसकी मुसीबत नहीं टलती तो उसे समझाने लगाते है की तुम्हें ठगा जा रहा है इन चीजों से कुछ नहीं होगा एक बार धोखा खा गये हो अब दोबारा क्यों जा रही हो | वाह भाई भगवान में विश्वास श्रद्धा और भूतो में विश्वास अन्धविश्वास |
                   ऐसे लोगों की कोई कमी नहीं है जो भगवान और (शैतान) जादू टोना तंत्र मंत्र भूत प्रेत सभी में समान रूप से भरोसा करते है और ऐसे मंदिरों और मज़ारो की भी कोई कमी नहीं है जहा ये दोनों चीजें एक साथ होती है | जबकि कहा ये  जाता है की जहा भगवान का वास होता है वहा भूत प्रेत और शैतान जैसी चीजें फटकती भी नहीं | कुछ इस तरह के लोग भी होते है जो भगवान में विश्वास करते है शैतान को पूजते नहीं पर उनसे डरते है ऐसे लोगों से ये कह दिया जाये की तुम पर जो मुसीबत आई है वो किसी ने जादू टोना किया है तो वो तुरंत उस पर भरोसा कर लेते है और भगवान की शरण में चले जाते है जब भगवान में विश्वास है तो शैतान से क्या डरना | दूसरे वो होते है जो भगवान भगवान और मंदिरों के बीच भी फर्क करते ऐसे लोग चारों धाम की यात्रा कर लेते है सिद्धि विनायक और सिर्डी भी दर्शन कर आते है पर अपने जीवन में कभी भी घर की नुक्कड़ पर बने मंदिर में न तो कभी जाते है और न वहा से गुजरते  समय कभी सर झुकाते है उनके अनुसार भगवान सिर्फ बड़े भव्य आलीशान और नामी मंदिरों में ही विराजते है या फिर सारी शक्ति और सिद्धि सिर्फ कुछ प्रसिद्ध और खास देवी देवताओं में ही होती है किसी गाँव कुचे की किसी देवी देवता में नहीं इसलिए सबकी पूजा करने की आवश्यकता नहीं है | इसके अलावा एक और टाईप के भक्त भी होते है जिनके समय जरुरत और फैशन के मुताबिक इष्ट देवता बदलते रहते है |
                     मुझे तो लगता है की दुनिया में भूत प्रेत जादू टोना तंत्र मंत्र के नाम पर जितने लोग ठगे जाते है उनसे कही ज्यादा लोग रोज भगवान के नाम पर ठगे जाते है | जितना धन लोग इन बाबाओ के चक्कर में बर्बाद करते है उससे ज्यादा  धन की बर्बादी वो मंदिरों और पंडितो के ऊपर करते है | ज्यादातर लोगों का भगवान में विश्वास सिर्फ एक दिखावा भर होता है यदि उनका विश्वास सच्चा होता तो कोई बुरा काम करने से पहले वो सौ बार सोचते भगवान की मार से डरते पर ऐसा नहीं है | सभी बस इस लिए विश्वास करते है ताकि अपनी अकर्मठता और अपनी नाकामयाबी का बोझ भगवान पर डाल कर ये कह सके की भगवान की यही मर्ज़ी थी हम क्या करे |
नोट --- जिन लोगों की भावनाएँ हर बात पर ठेस खा जाती है ऐसे कमजोर भावनाओं वाले इस लेख को न पढ़े  


May 07, 2010

क्या कोई निरुपमा की मौत के लिए जिम्मेदार मूल कारण पर गौर करेगा

निरुपमा के मुद्दे को ले कर ब्लॉग जगत दो धड़ो में बट गया है एक धड़े का मानना है कि उसकी हत्या उसके परिवार ने कि है और वो ही इसके लिए जिम्मेदार है तो दूसरा धड़ा भी ये मान रहा है कि उसकी हत्या भले ही उसके परिवार ने कि है पर वह  निरुपमा के चरित्र पर उँगली उठा कर जिम्मेदार उसे मान रहा है | पर मुझे लगता है कि चाहे उसकी हत्या की गई हो या उसने आत्महत्या की हो इसके लिए ज्यादा जिम्मेदार हम और आप है जो मिल कर समाज को बनाते है | ब्लॉग जगत में कितने लोग होंगे जो निरुपमा और उसके परिवार को जानते होंगे या इस घटना कि पूरी सच्चाई को जानते होंगे पर हम सब ने अपनी तरफ से एक कहानी बना ली कोई उसके माँ बाप को कोसने लगा तो कोई उसके चरित्र का चिर फाड़  करने लगा क्या हक़ है हमें ये सब करने का | सोचिये कि उसकी मौत के बाद हम सब जैसे लोग जो खुद को पढ़े लिखे की श्रेणी में रखते है उसके चरित्र पर इतना कीचड़ उछाल रहे है तो यदि वो जीवित होती तो उसके रिश्तेदार और जान पहचान वाले तो उसका और उसके परिवार का जीना ही मुश्किल कर देते | समाज का यही वो रवैया है जिसने आनर किलिग़ जैसी प्रथा को जन्म दिया है | एक सवाल उनसे जो निरुपमा पर सवाल उठा कर इस हत्या (यदि हुई है तो ) को कही न कही जस्टिफाई कर रहे है या उसके परिवार के जुर्म को ( यदि उन्होने किया है तो ) कम आकाने की कोशिश कर रहे है | क्या किसी बेटी का विवाह पूर्व गर्भवती हो जाना इतना बड़ा जुर्म है की उसकी हत्या कर दी जाए यदि ये इतना बड़ा पाप है तो इस पाप में बराबर का भागीदार उसका प्रेमी भी है तो क्या उसकी भी हत्या कर दी जाए क्या आप उस हत्या को भी इसी तरह सही ठहराने का प्रयास करेंगे | सोचिये की जब समाज के ये तथाकथित विद्वान लोगों का ये हाल है तो एक आम जात पात की रुढियो में लिपटे समाज के लोगों की क्या प्रतिक्रिया होगी | हमारी यही सोच परिवारों को बेटियों की हत्या करने तक क्रूर बना देता है और लड़कियों को आत्महत्या करने के लिए मजबूर कर देता है |
                    जो लोग ये मानते है की निरुपमा की हत्या सिर्फ उसके गर्भवती होने के कारण किया गया तो वो सभी इस सारी घटना के मूल कारण को नज़रअंदाज़ करने की कोशिश कर रहे है | जो परिवार उसकी  हत्या करने (यदि उन्होंने किया है तो ) की हिम्मत दिखा सकता है तो वो बड़े आराम से उसका गर्भपात भी करा सकता था लेकिन ऐसा नहीं किया गया क्योंकि मुख्य समस्या जात पात और बड़ी जात छोटी जात का था जो निरुपमा के जीवित रहते ख़त्म होने वाली नहीं थी इसलिए उसको मार दिया गया | समस्या थी कि ऊँची जात की बेटी ने एक छोटे जात के लड़के से विवाह करना चाहा | एक तो लड़का दूसरी जात का था उस पर से छोटी जात का | मैं दावे से कह सकती हुं कि यदि लड़का समान जात का या लड़की से बड़ी जात का होता तो परिवार कि आपत्ति इतनी बड़ी नहीं होती कि उसकी हत्या कर दी जाए और शायद थोड़े ना नकुर के बाद परिवार राजी भी हो जाता |  पर इस समस्या की तरफ किसी की नजर ही नहीं पड़ रही है सब लगे हुए है अपना अपना नज़रिया थोपने में या ये कहे की बच रहे है इस पर लिखने से क्योंकि लिखे क्या हम सभी तो जकडे है इस बुराई से तो दूसरों को क्या उपदेश दे | यदि इसके पक्ष में लिख दिया तो हर जगह थू थू होगी समझदार और विद्वान होने का तमगा छीन जायेगा | विरोध में लिखे क्या जब दिमाग में ऐसा कोई विचार ही नहीं है | इस लिए लगे है सब बड़ी सफाई से मुख्य मुद्दे को किनारे कर एक दूसरी ही समस्या खड़ी कर उस पर बहस करने में | कोई नारी का झंडा उठाये है तो कोई युवाओं कि आज़ादी का रोना रो रहा है तो कोई समाज में गिरती नैतिकता कि दुहाई दे रहा है |
                यदि कोई परिवार इस जात पात को किनारे कर अपनी बेटी की खुशी के लिए अंतर्जातीय विवाह कर भी दे तो उनके प्रति लोगों का व्यवहार भी बड़ा अजीब होता है | सबसे पहले तो लोग ये कहना शुरू करते है कि "वो तो काफी कमजोर निकला जो बेटी के आगे हार मान गया हम होते तो अपनी बेटी को दो हाथ लगा कर उसका विवाह अपनी मर्ज़ी से कर देते " या फिर "ये सब तो वो दहेज़ बचाने के लिए कर रहे है अपनी जात में करते तो काफी दहेज़ देना पड़ता लड़की ने दूसरे जात में लड़का पसंद कर लिया और बाप का सारा दहेज़ बच गया " या फिर उस परिवार से ऐसे बात करते कि जैसी उनकी बेटी कि मौत हो गई है " क्या किया जाए आज कल जमाना ही ऐसा है बच्चों के आगे किसी का बस नहीं चलता " या "आज कल के बच्चे तो माँ बाप को कही मुँह दिखने लायक ही नहीं छोड़ते अब आप की बाकी दो बेटियों कि शादी में बड़ी परेशानी आएगी " | बेचारे परिवार को ऐसी बाते सुन कर अपने फैसले पर अफ़सोस होने लगता है जो हिम्मत वो इस बुराई से लड़ने के लिए बनाये होते है लोग उसे ही तोड़ देते है | क्यों नहीं हम ऐसे लोगों के पास जा कर ये कहते है कि" आप ने इस जात पात कि बुराई को तोड़ कर अच्छा काम किया " या "आप ने समाज कि इस बुराई से लड़ने कि अच्छी हिम्मत दिखाई समाज को आप से प्रेरणा लेनी चाहिए " या "आप काफी समझदार है जो आप ने अपने बच्चों के लिए जीवन साथी चुनते समय उनकी जात की जगह उनकी योग्यता देखी"| इन शब्दों से उन्हें लगेगा कि उन्होंने जो किया वो गलत नहीं था और उन्हें समाज में शर्मिंदा होने कि जरुरत नहीं है और दूसरों को भी ऐसा करने कि हिम्मत आयेगी |
नहीं रखा हम अपनी ही जाती में विवाह को जोर देते है भले ही वह बे मेल विवाह हो | निरुपमा कि मौत ने समाज में तेजी से उठ रहे एक समस्या कि तरफ हमारा ध्यान खींचा है अच्छा हो हम उस पर गम्मभिरता  से सोचे और उससे ज्यादा ज़मीनी रूप से कुछ करे नहीं तो ऐसी घटाने समाज में आम होते देर नहीं लगेगी | जरूरी नहीं कि तब वो सारी घटाने हमारी और मीडिया कि नजर में आये  पर वो समाज को ज़रुर पिछड़ा बनाती रहेंगी और हमारे आप की प्रगति में बाधक बनेगी |

May 04, 2010

ये कसाब कौन है ?

कसाब कौन कसाब ? अरे वही २६/११ वाला आमिर अजमल कसाब, अब ये २६/११ क्या है, अरे भाई  मुंबई में ताज ओबराय पर जो आतंकवादी हमला हुआ था, हाँ हाँ याद आया टीवी पर एक बार देखा था दीदी हा तो ये कसाब कौन है, वही जो जिन्दा आतंकवादी पकड़ा गया था, अच्छा | ये वार्तालाप करीब सात महीने पहले की है और बात कर रही थी दिल्ली के एक २२ साल के युवा से जो कसाब और २६/११ दोनों को या तो भूल चूका था या ये कहे की उसे पता ही नहीं था | इस ब्लॉग को पढ़ने वाले को लगेगा की ऐसा कैसे हो सकता है हमें तो एक एक बात की खबर भी है और याद भी है (तो मै आप जैसे निठल्लो की बात नहीं कर रही जो खबरे पढ़ने और सुनाने का बेकार सा काम करते है )  कोई दूसरा इतनी जल्दी वो सब कैसे भूल सकता है | ये तो हमारे टीवी चैनल और अखबार वालो के लिए डूब मरने वाली बात होगी जो एक संवाददाता को बस ये देखने के लिए काम पर लगाये रखते है की वो कैसे हँसा कैसे रोया कैसे बोला क्या खाया क्या पिया | पर वो सब बेकार गया क्योकि हमेसा एम टीवी और वी टीवी देखने वाला और अखबार का केवल सप्लीमेंट्री पेज पढ़ने वाला युवा के टीवी रिमोट में न्यूज़ चैनल का बटन ही नहीं होता | पर बात बस युवाओ की नहीं है मुंबई से बाहर जा कर और न्यूज़ चैनल न देखने वालो से जरा इस बारे में पूछिए शायद ही अब किसी को याद होगा २६/११,  उनका सीधा सा जवाब होगा कि किस किस हमले को याद रखे ये तो भारत के लिए आम बात होती जा रही है अमेरिका की तरह ९/११ थोड़े ही है की एक हमले के बाद दूसरा हुआ ही नहीं सो लोग एक तारीख को हमेसा याद रखते है अब हम किस किस तारीख को याद रखे मुंबई याद रखे की दिल्ली, अहमदाबाद, बनारस, सूरत, पूना अरे किस किस शहर को याद रखे | बात तो सही है कि किस किस तारीख को याद रखे और क्यों याद रखे क्या याद रखने से हमारा कुछ भला हो जायेगा जिन लीगो को याद है और एक एक खबर की जानकारी है उससे उनका क्या भला हो गया | असल में जिसे याद रखना चाहिए वो तो उसे कब का भूल चुके है हमारी सरकारे हमारे मंत्रिगढ़ हमारी पुलिस हमारी सुरक्षा एजेंसिया | यदि हमारी सरकारे चाहे केंद्र कि या राज्यों की आतंरिक सुरक्षा, सुरक्षा एजेंसियों की आधुनिक ट्रेनिग और ख़ुफ़िया जानकारियों  को ले कर सतर्क होती तो न तो दंतेवाडा जैसे हादसे होते और न हीं माधुरी जैसे गद्दार को पकड़ने में इतनी देर होती | हम सब ने भी याद रख कर कौन सा तीर मार लिया क्योकि जो याद रखना चाहिए था वो हमने याद ही नही रखा सतर्क रहना सरकार से सवाल करना और उसे इस मसाले पर सोने न देना | पर इसमे से एक काम भी हमने नहीं किया यदि हमें तारीख और घटाने याद है तो वो भी न्यूज़ चैनलों की कृपा से | हममे से कितने लोग है जो आज भी लावारिस सामानों अनजान संदिग्ध लोगों के प्रति सतर्क है | मै आप को मुंबई के अपने सोसायटी की बात बताती हु हमारी बिल्डिंग में गाड़ी पार्किंग नहीं है चूँकि दो चार बिल्डिंगो के बाद रास्ता बंद है इस लिए सभी की कार रास्ते में कही भी खड़ी रहती है जिसमे से आधी से ज्यादा कार किसकी है इस बात की किसी को जानकारी नहीं है और न ही कोई ये जानने की कोशिश करता है की कोई अजनबी अपनी गाड़ी यहाँ क्यों खड़ी करके जा रहा है | लोकल ट्रेनों में आज भी लोग सीट के नीचे रखे सामान को देखा कर ये पूछने की जहमत नहीं उठाते की ये किसका है (क्योंकी  लोग अपना सामान ऊपर बने रैक पर रखते है ) यदि पुरे डब्बे में वो अकेले है तो भी यही मानते है की कोई अपना सामान भूल कर चला गया होगा पर वह उसकी जानकारी भी पुलिस को नहीं देते है | यदि कभी आप भूल कर पुछ ले कि ये सामान किसका है तो लोग आप की तरफ हँस कर ऐसे देखने लगते है की आप को लगेगा की आप ने कौन सी बेवकूफी की बात पूछ ली है और आप को खुद पर ही शर्म आने लगेगी | यही हाल पूरी मुंबई का या ये कहे पुरे देश का है यदि अमेरिका में भी लोगों का यही रवैया होता तो आज हम सभी टीवी पर टाइम्स स्क्वायर में हुए धमाके की खबर को देख रहे होते | वहा पर आतंकवादियों द्वारा कार बम रखने के बाद भी लोगों की सतर्कता ने उस हमले को नाकाम कर दिया | हमें सरकार से सवाल करना था की वो लोगों की सुरक्षा के लिए क्या कर रही है पर हम सभी खुद गेटवे पर मोमबत्ती जला कर अपने घरो में जा कर सो गये | कुछ दिनो तक खबरे आती रही की इतने करोड़ की फला सुरक्षा उपकरण खरीदी गई  इतने करोड़ की फला उपकरण , फला फला स्टेसन पर मेटल डिडेक्टर लग गये या सी सी  टीवी कैमरा लग गया हम सब खुश हो गये चलो कुछ  हो रहा है हम सब संतुष्ट हुए और सब भूल गये | इस कदर भूल गये की उसके बाद होने वाले चुनावों में सुरक्षा व्यवस्था कोई मुद्दा ही नहीं रहा | हमने कभी सवाल नहीं किया की करोडो में ख़रीदे गये सुरक्षा उपकरण क्या काम कर रहे है स्टेसनो पर लगे मेटल डिडेक्टर अब क्यों नहीं काम कर रहे है क्या वो कभी ठीक होगे क्या सी सी  टीवी ठीक  से काम कर रहे है क्या उनकी कोई मानेट्रिंग हो रही है या हम सब को बस हाथी के दात दिखा कर बेवकूफ बनाया जा रहा है | हा सवाल तो लोगों ने उठाये पर उलटे कि स्टेसनो पर क्यों मेटल डिडेक्टर लगाये गये है उससे हम सभी को परेशानी होती है क्यों हर जगह चेकिंग हो रही है हमें परेशानी हो रही है क्यों नाकेबंदी कर के गाडियों की जाँच हो रही है हमें देर होती है क्यों केरायदारो का वेरिफिकेसन करवाया जा रहा है हमें परेशानी हो रही है क्यों कसाब को जिन्दा पकड़ा अब उसकी सुरक्षा कारण रास्ते बंद  है हमें परेशानी हो रही है हमारी ही सुरक्षा के लिए होने वाली हर जाँच हमारे लिए परेशानी है यहाँ तक की अमेरिका में जब शाहरुख खान की तलाशी ( यदि उनके कहे को सच्च माने तो ) पर भी हम हो हल्ला मचाने लगाते है | ये सारी बाद सिर्फ मुंबई के लिए  नहीं है पुरे देश में यही हो रहा है हर जगह लोगों का यही रवैया है | तो जब हम ही अपनी सुरक्षा को लेकर गंम्भीर नहीं है और हम खुद सो रहे है तो हम सरकार को क्या जगायेंगे | जो आम आदमी को सबसे अच्छे से करने आता है वो उसने किया सरकार और सुरक्षा एजेंसियों को भला बुरा कहना |
      अब तो कसाब दोषी साबित हो गया है कल परसों में उसे बिना किसी संदेह के फाँसी की सजा भी सुना दी जाएगी | लेकिन अभी इतनी जल्दी उसे फाँसी पर चढ़ाया नहीं जायेगा क्योकि जब अभी तक अफजल को फाँसी पर नहीं चढ़ाया गया क्योकि उसका नंबर २७ है तब तो कसाब का नंबर काफी बाद में आएगा | तब तक उसकी जान की सुरक्षा के लिए करोडो खर्च होंगे ताकि जिस दिन उसका नबर आये पुलिस उसे फाँसी पर चढ़ा कर उसको मार सके | तब तक तो न्यूज़ चैनल वाले भी उसे भूल जायेंगे और हम सभी भी और शायद तब तक कोई और हमला या कोई और कसाब हमारे लिए कोई नई याद और टीस ले कर आ चूका हो |

March 31, 2010

आपने अपने बच्चो को क्या संस्कार दिया है

सुबह सुबह अखबार में दो खबरे पढने को मिली दोनों युवा पीढ़ी से जुडी थी पहली खबर थी की इम्तहान में पेपर अच्छे न होने के कारण फेल होने के डर से एक किशोर ने आत्हत्या कर ली अख़बारो में ऐसी खबरे अब आम हो गई है पढ़ और सुन कर दुख होता है लेकिन दूसरी खबर और चौकाने वाली और भयानक थी कि दोस्तों ने पैसे के लिए अपने ही दोस्त का अपहरण किया और उसके  घरवालो से फिरौती मागी पर फिरौती मिलने के बाद भी उसकी हत्या कर दी, निश्चित रूप से उन्हें अपने पहचाने जाने का डर था | दोनों ही खबरे आज के युवाओं के दो रूपों को दिखा रही थी | एक ओर तो कुछ युवा इतने कमजोर निकले की जीवन में अपनी पसंद की चीज न मिलने और एक स्कुल के परीक्षा में फेल होने का डर वो बर्दास्त नहीं कर पा रहे है और आत्महत्या जैसा कड़ोर कदम उठा ले रहे है | वो मानसिक रूप से इतने कमजोर है की वह जीवन की इतनी छोटी समस्या को भी हल नहीं कर पा रहे है | दुसरे वो युवा है जो जीवन में अपनी पसंद की चीज पाने के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार है उनके लिए जीवन ऐसो आराम से जिने के लिए है और वो इसे पाने के लिए लुट और हत्या  जैसे जघन्य अपराध करने से भी नहीं हिचकते है | माथे पर बल तब और बढ़ जाता है जब पता चलता है की ये सभी युवा अच्छे घरो से है | ज्यादातर लोगों का मानन है कि इनके इस व्वहार का एक कारण  इनका पश्चिमी समाज का अंधाधुंन अनुसरण करना और भारतीय संस्कारो की कमी | किसी से इस पर राय मागिये  तो एक ही जवाब मिलेगा की आज की युवा पीढ़ी को टीवी फिल्मो और इंटरनेट ने बिगाड़ दिया है उनमे हमारे तरह संस्कार ही नहीं है भाई हमारे जीवन में भी काफी मुश्किले आई पर हम तो उनसे परेशान हो कर आत्महत्या करने नहीं चले गये या कई बार हमारी  जरूरते भी ज्यादा थी पर हम तो किसी का खून करने नहीं गये क्योकि हम मे संस्कार थे और हम जानते थी की क्या सही है और क्या गलत है | पर आज की पीढ़ी को देखिये इन्हे तो भारतीय संस्कृति और रीती रिवाज पिछड़ेपन की निशानी लगते है | आज भारत के युवाओ के बोल चाल खान पान पहनावे से लेकर विचारो (सिर्फ वो विचार जिनमे उनका फायदा हो )पसंद नापसंद को देखा कर हम अंदाजा लगा सकते है कि उन पर पश्चिमी सभ्यता (उनके अनुसार आधुनिक) का प्रभाव कितना ज्यादा है | ऐसे युवाओ कि कमी नहीं है जिनके अनुसार हर भारतीय परंपरा रुढ़िवादी है उनको मानना अन्धविश्वास है इनका कोई तर्क नहीं होता ये विज्ञानं से कोसो दूर है | अगर कुछ आधुनिक है तो पश्चिमी समाज वहां  काफी खुलापन है आजादी है पर भारतीय समाज में बंधन के सीवा कुछ नहीं है यहाँ व्यक्ति की आजादी नहीं होती है और  युवा पीढ़ी बध कर नहीं रहना चाहती है उसे तो खुलापन पसंद है आजादी पसंद है | अपनो से बड़े और बुजर्गो को हाय हलो  कहने वाले इस नई जनरेशन के लिए बड़े बुजर्गो के पाव छूना साल में एक दो बार किसी खास मौके की बात है नहीं तो जरुरत नहीं है अपने गुरु का आदर करने की वो जरुरत नहीं समझते सयुक्त परिवार में रहना या किसी तरह के आभाव में रहना उन्हें मंजूर नहीं है यहाँ तक की वो अपने माता पिता से भी आदरपूर्वक बात भी नहीं करते बाहर के लोगों कि तो बात ही छोडिये दूसरो कि मदत करना जैसी बाते तो इनके डीसनरी में ही नहीं होते  इस सो काल्ड न्यू जनरेशन का अपने पैरेंट्स से किसी बात को लेकर डिबेट या फाईट होना तो अब आम बात है  | उनके अनुसार समय के साथ सभी को बदलते रहना चाहिए  अगर आप ऐसा नहीं करेंगे तो आप दूसरो से पिछड़ जायेगे "माडन"नहीं कहलायेंगे |
            इस फैलती आधुनिक संस्क्रृति (बड़े बुड़ो के अनुसार अपसंस्कृति) से सबसे ज्यादा कोई परेशान है तो वो है माता पिता जिनके लिए बच्चो के पास न तो समय है और न ही सम्मान जिसकी उन्हें चाहत है |  वो इस हालत के लिए कभी टीवी फिल्मो और इंटरनेट को तो कभी आज के बदलते माहौल और समाज को दोषी बताते है |  पर क्या यही सच्चाई जी नहीं पूरी सच्चाई ये नहीं है इस पूरी बात में खुद को संस्कारवान होने कि दुहाई देने वाले माता पिता और पुरानी पीढ़ी बड़ी आसानी से अपनी गलती को छुपा रही है | वे कहते है कि हम बहुत संस्कारवान सबका सम्मान करने वाले है हमारे परिवार ने हमें हमेसा अच्छे संस्कार और सीख दी अब ऐसा कहने वाले आज के माता पिता और घर के बुजुर्ग भी बताये कि उन्होंने अपने घर के बच्चो का क्या सीख दी है क्या कभी उन्होंने अपने बच्चो को औपचारिक रूप से कोई संस्कार कोई भारतीय रीती रिवाज या हमारी सभ्यता के बारे में कुछ बताया है जवाब है नहीं शायद कभी नहीं | विश्व में कोई भी संस्कृति या रीती रिवाज  एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित करने से ही आगे बढती है पर आज हमारे समाज में खासकर बड़े शहरो में ये होना बंद हो गया है | आप सभी अपने आप से पूछिये कि आप में से कितने लोगों ने अपने बच्चो को सिखाया है कि हमें सभी बड़ो का आदर करना चाहिए, दूसरो कि मदद करना चाहिए, सुबह जल्दी उठाना चाहिए, झूठ बोलना चोरी करना गलत बात है ( जी हम जब छोटे थे तो ये 'पाप' होता था पर आज के ज़माने में अब ये पाप नहीं रहा सिर्फ गलत बात रह गई है ताकि मौका पड़ने पर हमें ये गलती करने कि छुट मिल सके और पकडे जाने पर गलती कि माफ़ी माग ले) आप को ये सारी बाते किताबी लग रही होगी (वैसे ये बाते आप को आज के बच्चो कि किताबो में भी नहीं मिलेंगी ) सोचेंगे कि अब कौन बेवकूफ ऐसी बाते अपने बच्चो से करता है ये हम करे भी तो बच्चे या तो उसे समझेगे नहीं या हम पर हेसेंगे | यदि आप ऐसा सोच रहे है तो आप बिलकुल गलत भी नहीं है एक ही तारीख में सोने और उठने वाले आधुनिकता कि दौड़ में शामिल माता पिता कैसे अपने बच्चो को जल्दी सोने और उठने कि शिक्षा दे सकते है ऐसा कहने पर बच्चे उन पर हसेंगे ही आफिस कि स्टेशनरी से लेकर टैक्स चुराने वाले पिता कैसे अपने बच्चो को चोरी न करने का ज्ञान दे सकता है बात बात में सहेलियों से लम्बी लम्बी हाकने वाली माँ कैसे अपने बच्चो को झूठ न बोलने की सीख दे सकती है | हम सभी आज उन्हें सीख तो देते है पर कुछ अलग तरह की  कि कैसे उन्हें दूसरो से अपना काम निकालना चाहिए ,जरुरत पड़ने पर झूठ बोलने से नहीं हिचकिचाना चाहिए सामने वाले की हैसियत देखा कर उसका सम्मान करना चाहिए दूसरो की सहायता तभी करना चाहिए जब उसमे हमारा फायदा हो  मौके  और समय कजे अनुसार बच्चो को ये सिख दी जाती है या बच्चे घर के लोगों को ऐसा करते देखा खुद ही सिख जाते है और हम सभी यह कह कर इसको सही ठहराते है की आज तो जमाना ही ऐसा है की यदि बच्चे ये सब न सीखे तो वह कभी आगे ही नहीं बढ़ पाएंगे और वो दब्बू बन जायेंगे | लेकिन जब यही बच्चे ये वव्हार अपने ही माता पिता या भाई बहन के साथ करते है तो उन्हें बुरा लगता है वो इसके लिए समाज और आज कल के माहौल को दोष देने लगते है | बात सिर्फ संस्कारो पर ख़त्म नहीं होती भारतीय रीती रिवाजो के प्रति नई पीढ़ी की अनभिज्ञता का कारण भी यही है | इस भाग दौड़ भरी जिंदगी में समय किसके पास है  हम सभी को हर काम सॉर्ट कट में करने की आदत हो गई है चाहे वो पूजा पाठ तीज त्यौहार यह तक की शादी विवाह और अंतिम संस्कार में भी पुरे रीती रिवाजो से नहीं किया जाता सब कुछ  सॉर्ट कट में बेचारे बच्चे भी आधे अधूरे किसी रिवाज को क्या समझेंगे अगर बच्चे ने गलती से पूछ लिया की ये रस्म क्यों की जाती है या इस रिवाज का क्या मतलब है तो तो उसे १ ही जवाब मिलता है की बस ऐसे ही किया जाता है | अब ऐसे में युवा एक तो न हो रहे रिवाजो को जान ही नहीं पते और जो आधे अधूरे हो रहे है उनका मतलब उनको नहीं पता होता है ऐसे में उन्हें भारतीय परम्पराए अर्थहिन और बेमतलब लगे तो उसमे उनका क्या दोष है | इसी तरह धीरे धीरे एक एक करके अपनी परम्पराए और रीती रिवाजो को हम भूलते जाते है |  कोई भी सभ्यता संस्कृति तभी तक बची रहती है जब तक उसका हस्तांतरण होता रहता है |
             ये आप के ऊपर है की आप अपनी परम्पराव और रीतिरिवाजो को किस तरह युवा पीढ़ी को देते है  जैसे हम बड़े समझदारी से बता सकते है की भारतीय रिवाज भी विज्ञानं से दूर नहीं है हमारे पूर्वजो को भी मालूम था की किसी चीज से क्या फायदा है और किससे क्या नुकसान बस उन्हें शायद उसका कारण ठीक से नहीं पता था इस लिए वो उन बातो को दूसरो से करवाने और उन्हें करने से रोकने के लिए उस समय के हिसाब से लोगों को उसी तरह बताते थे जैसे उन्हें ये नहीं पता था की उगते सूरज से हमें विटामिन डी मिलाता है पर उगते सूरज का सेक लेने से हम सभी को फायदा होता है वो जानते थे इसलिए ही यहाँ सूर्य नमस्कार और उगते सूरज को जल देने की परम्परा बनी उसी तरह सूर्य ग्रहण के समय सूर्य को नंगी आखो से देखने से नुकसान से भी वह परिचित थे और दुसरो को ऐसा करने से रोकने के लिए शुभ अशुभ का हवाला देते थे | उन्हें बताये हा समय के साथ इनमे कुछ दकियानुसी बाते जुड़ती चले गई उन सभी चीजो को हमें मानाने की आवश्यकता नहीं है | यदि आप ये कहते है की खुद हमें ही नहीं मालूम की इन परम्पराव का क्या मतलब है या कहे की जी भारत की सारी परम्पराए है ही बेकार उनका कोई तर्क है ही नहीं उन्हें बस यु ही बना दिया गया है | तो निशचित रूप से आज की जनरेशन उसे अंधविश्वास से ज्यादा कुछ नहीं समझेगी |
   एक समय था जब बच्चो को ये बाते घर के बुजुर्ग औपचारिक रूपों से दे देते थे या बच्चे संयुक्त परिवार में रहते थे और अपने से बड़ो को देख कर संस्कारो को अपना लेते थे पर अब न तो संयुक्त परिवार रहा और शहरों के ज्यादातर घरो में या तो बुजुर्ग होते नहीं या होते भी है तो अब परिवार में उनका न तो पहले जैसा स्थान रहा और न भूमिका | तो आखिर आज की ये पीढ़ी संस्कार सीखेगी कहा से उसे कैसे पता चलेगा की कैसे उसे परिस्थितियों से लड़ना है उसके लिए क्या सही है और क्या गलत नैतिकता का क्या मतलब है और किसी त्यौहार पर हमें कौन से रीती रिवाज करने है और हमारी परम्परा क्या है | इसके बाद आप के पास दो ही रास्ते है या तो आज और अभी से अपने बच्चो को अपनी सभ्यता संस्कारो रीती  रिवाजो से औपचारिक रूप से परिचय करना शुरू कर दे या फिर अपने बिगड़ते बच्चो और युवाओ को या किसी अन्य को इसके लिए दोष देना बंद कर दे |

March 09, 2010

जी हम तो टैक्स बचाते है चुराते नहीं

 इस बार तो प्रणव दा ने हद ही कर दी लगा था कि बजट में पेट्रोल डीजल के दाम भले बढाने कि धोषणा कर दी गई हो पर शायद ये कुछ दिनों बाद सोनिया गाँधी की कृपा से या तो इसे वापस ले लिया जायेगा नहीं तो कम से कम इसमे कोई कमी तो कर ही दी जाएगी | पर ये क्या सोनिया ने तो हमारी सारी आशाओ पर तुषारपात  कर दिया और पेट्रोल डीजल के बड़े दामो को हरी झंडी दे दी | आस पास कोई चुनाव नही है अच्छा हो यदि हर साल मार्च अप्रैल में किसी न किसी राज्य में चुनाव हो इस तरह महगाई के बीच बजट में किसी चीज का दाम बढ़ाने से पहले दस हजार बार सोचेंगे  | अब बेचारे आम आदमी का क्या होगा एक तो पहले से ही महगाई की मार से मरे जा रहा था उस पर से पेट्रोलियम पदार्थो के दाम बढने से तो हर चीज के दाम और बढाने का दुकानदारो को वजह मिल जायेगा (वैसे उन्हें दाम बढाने के लिए किसी वजह की जरुरत नहीं है) | सही कहा गया है कि आम आदमी की कोई सुध नहीं लेता है | अब देखीये न प्रणव दा ने कहने के लिये तो आय कर में राहत दी है पर ये राहत मिल किसको रही है उन्हें जो ज्यादा कमाते है | साल के तीन लाख तक कमाने वाले को कोई फायदा ही नहीं है जिसे असल में इस राहत की जरुरत थी पर राहत मिल किसे रही है जो इससे ज्यादा और ज्यादा कमा रहा है | आखिर आम आदमी है कौन जो चार से आठ लाख सालाना कमाता है वो या जो तीन लाख से काम घर लता है वो | कहने के लिये तो ये आम बजट होता है पर आम आदमी से इसका कोई मतलब ही नहीं होता है |
      मंत्री जी कहते है कि देश के विकाश के लिये ये किया जा रहा है, विकाश के लिये पैसे की जरुरत है ( तो विकाश के घरवालो से मागो ना ) इसलिये हमारी जेब काटी जा रही है सीधे से नहीं पीछे से | अरे लेना है तो उन उद्यियोगपतियों से मागो जो फोर्ड पत्रिका के रईसों कि सूची में दिन पर दिन ऊपर चढ़ते जा रहें है, पुरे विश्व में बड़ी बड़ी कंपनिया खरीद रहे है, हम तो राशन की  दुकान से राशन भी नहीं खरीद पा रहे है | वो सब तो लाखो खर्च करके(सी ए को देकर) करोडो अरबो बचा लेते है पर एक नौकरीपेशा आम आदमी की तो ये हालत है कि पहले टैक्स कटता है फिर वेतन हाथ में आती है | वो चोरी कर करके दिन बार दिन और अमीर बनते जा रहे है और हम टैक्स भर भर कर आम आदमी ( आम आदमी का मतलब ही है गरीब बेचारा) बनते जा रहे है |
       ऊपरवाला जनता है जो हमने एक ढ़ेले कि टैक्स चोरी की हो अब जब ऊपरवाले का नाम लिया है तो थोड़ी ईमानदारी बरतनी चाहिए हा एक दो बार थोडा सा टैक्स बचाया है देखीये मै पहले ही कह दे रही हु की टैक्स बचाया है चोरी नहीं की है |
अरे भाई जहा से गहने खरीदे थे वो हमारे परचित है हम सात पुस्तो से वहा से गहने खरीद रहे है इस नाते उन्होंने सलाह दिया कि क्यों बेकार में पक्का रसीद बनवा रही है टैक्स देना पडेगा कच्चा रसीद बनवाइये टैक्स बच जायेगा तो हमने टैक्स बचा लिया इसमे कौन से बड़ी बात है कौन से हमने रईसों की तरह लाखो करोडो के गहने ख़रीदे थे , सरकार का ज्यादा कुछ नहीं गया | देखीये एक हाथ से जो थोडा बचाया वो दुसरे हाथ से भरवा भी दिया गाँव में पिताजी ने नया मकान खरीदा पुरे बीस लाख का और रजिस्ट्री कराने लगे सिर्फ पांच लाख की मैंने सीधा विरोध किया ये भी कोई बात हुई बीस का मकान और सिर्फ पांच की दिखा रहे है इतना टैक्स की चोरी ठीक नहीं है कम से कम छ: लाख तो दिखाइए ही, पड़ोस का घर भी इतने में ही गया है इससे कम दिखाया तो फस जायेगे जितना बचाया है उससे ज्यादा चले जायेगे | देखीये कई बार क्या होता है की टैक्स बचाना मजबूरी हो जाती है अब जब पिता जी ने घर लिया है तो उसके लिए फर्नीचर वगैरा तो लेना ही पड़ेगा भैया ने सीधा कह दिया की पापा चुप चाप  फर्नीचर लीजिये और घर चलिए रसीद पुर्जा के चक्कर में मत पड़िए बेकार में ऐट वैट भरना पड़ जायेगा फिर टैक्स ही भरते रहियेगा क्योकि फिर कुछ और खरीदने के लिए पैसा ही नहीं बचेगा | बात तो वह सही कह रहा है अब इस मजबूरी को तो सरकार को समझाना ही चाहिए |
        देखा हम तो फिर भी भले लोग है जितना हो सके टैक्स भरते रहते है (क्या करे मजबूरी है वेतन टैक्स काट कर ही मिलता है ) नहीं तो लोग टैक्स बचाने  (चुराने) के लिए क्या नहीं करते | अब हमारे पड़ोसी को ही ले लीजिये एन जी ओ चलाते है कोई ऐसा वैसा एन जी ओ नहीं है बाकायदा सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त है | काफी अच्छी इनकम होती है और काम कुछ नहीं करना पड़ता है बस लोगों के सफ़ेद को काला करते है (ताकि दिखाई न दे) लोगों से दान लेते है और दो प्रतिशत काट के बाकि  पैसे वापस कर देते है | सुना है कभी कभी कुछ भलाई का काम भी करते है  कुछ गरीब बच्चो को पढ़ा देते है या गरीब महिलाओ को कुछ सिलाई वगैरा भी सिखा देते है | हमसे भी कितनी बार कहा की भाई साहब क्या खामखाह में वेतन से इतना टैक्स कटवा देते है आखीर हम और हमारी संस्था किस काम आयेगी | पर मैंने साफ मना कर दिया की मुझे इन चीजो में बिलकुल भी विश्वास नहीं है मैने उनकी संस्था को कोई दान नहीं दिया | पड़ोसी है उनका क्या भरोसा पड़ोसियों का काम ही जलना होता है क्या पता पैसे ले और वापस ही न करे तो, जितना टैक्स बचेगा नहीं उससे ज्यादा चला जायेगा | मै तो कोई दूसरा ज्यादा विश्वसनीय संस्था खोज रही हु जहा पैसे वापस मिलाने की गारंटी हो | हम जो भी काम करते है सोच समझ कर करते है और पहले ही कर लेते है | मेरे पति ने तो हमारा घर ही हमारे नाम पर लिया एक तो माहिला के नाम घर लेने पर ही कुछ कर में छुट मिल गई फिर हमारे उन्होंने कहा की घर तुम्हारे नाम रहा तो सारे जिंदगी तुम्हारे किरायेदार के रूप में रहूँगा और जो तुम्हे किराया दूंगा उस पर कर की बचत हो जाएगी | मेरे वो दूसरो की तरह नहीं है की खुद को किरायदार बताये और अपने मकान मालिक पत्नी,माँ या पिताजी को किराए का पैसा न दे महीने की पहली तारीख को मेरे बैंक खाते में किराया जमा कर देते है अजी उन्ही पैसो से तो घर चलता है |
           हम पत्नियों पर पतियों को किसी अन्य मामले में विश्वास और हमारा ख्याल हो न हो  पर उनकी साइड इनकम और इनवेस्टमेंट हमारे ही नाम होती है हमारा भविष्य सुरक्षित रखने के लिये (इसे ऐसे पढ़े अपने इंवेस्टमेंट से होने वाली इन्कम को सुरक्षित करने के लिए ) चाहे शेयर बाजार में पैसा लगाना हो या कोई बड़ी रकम फिक्सडिपोसिद करना हो या फिर कोई जमीन जायदाद खरीदना हो सारे इन्वेस्टमेंट  घर गृहस्थी में सारा जीवन गुजार देने वाली हम पत्नियों के नाम ही होता है | इस तरह शेयर बाजार में बढ़ा पैसा और मिलनेवाला ब्याज उनकी आय में नहीं जुड़ता है और न ही उस पर कर देना पड़ता है जरुरत हुई तो हमारे नाम भी रिटर्न फाइल कर दिया जाता है कुछ छोटा मोटा व्यापर दिखा कर, पर आय उतनी ही दिखाई जाती है कि कर न भरना पड़े |  
         अब सौ करोड़ से ऊपर की आबादी में से यदि एक हम कुछ टैक्स बचा भी लेते है तो क्या फर्क पड़ने वाला है | यदि एक बड़े घड़े में एक बूंद पानी हम न डाले तो कोई बड़ा फर्क नहीं होने वाला है | कहते है की देश के विकाश के लिये पैसे चाहिए अरे भाई जितना देते है उसमे ही कितना विकाश कर लिया है | बिजली सड़क पानी कौन सी हमारी समस्या हल हो गई है इन सब चीजो का हाल बेहाल है | ज्यादा दे भी दिया तो कोई भी फायदा नहीं होने वाला है सब नेताओ के भ्रष्टाचार के भेट चढ़ जायेगा | इससे अच्छा है इन पैसो से कुछ अपना विकाश किया जाये | देश के विकाश के लिए पैसे देने के लिए तो पुरा देश पड़ा है |  
        
 
 

February 27, 2010

हम तो छोटे अपराधी है

एक बहस जो आम लोगों के बीच काफी प्रसिद्ध है की देश के सभी नियम कानून सिर्फ गरीबो के लिए है अमीरों को हर कानून से छुट मिली होती है | पैसे वाले हर नियम कानून को तोड़ कर आसानी से बच कर निकल जाते है और बेचारा आम गरीब आदमी कानून तोड़ना क्या कई बार तो बिना कानून तोड़े भी फस जाता है | ताकतवर को सब छुट  है बेचारा कमजोर आम आदमी  हर जगह मारा जाता है | पर क्या वास्तव में ऐसा  है की देश में सारे कानून  सिर्फ आम लोगो  पर ही लागु होते है ,क्या सिर्फ आम आदमी ही कानून का पालन करता है और अमीर ताकतवर लोग अपने हिसाब से कानून मानते है | इस सवाल का जवाब हा और नहीं दोनों ही है क्योकि ताकतवर और अमीर होने की परिभाषा व्यक्ति और केस के हिसाब से बदलती  रहती है |
जब रुचिका केस में इतने  सालो बाद आये फैसले में राठौर को सिर्फ ६ महीनो की सजा हुई तो सभी के जुबान पर एक  ही बात थी कि देश में कानून धनवान  ऊँचे पदों पर बैठे  और ऊँची पहुच वालो का कुछ नहीं बिगाड़  सकता  | यह कोई  पहला मामला नहीं था इसके पहले जेसिका लाल , प्रियदर्शनी मट्टू ,नितीश कटारा  जैसे कई मामलो में हम देख चुके थे की कैसे कानून अमीर  पैसे वालो की जागीर बन जाती है | ये वो मामले थे जो मीडिया  के कारण  नजर में आये  | पर इस तरह के न जाने देश में रोज कितने मामले है जो लोगों के सामने आते ही नहीं | इन सारे केसों को देख कर सभी इस बात पर हाय तौबा मचाते रहे  की अमीर लोग तो अपने पहुंच के बल पर इंसाफ  को भी प्रभावित कर दे रहे है | पर यदि हम गौर करे तो इन सारे केसों में पीड़ित पक्ष कोई आम गरीब भारतीय परिवार नहीं थे फिर क्या कारण है की इन्हे सही समय पर  और उचित न्याय नहीं मिला पाया | असल में तो नियम कानूनों का पालन इस बात पर निर्भर करता है की दो पक्षों में कौन ज्यादा ताकत वाला है ये ताकत शारीरिक ,धन, पद और पहुँच किसी की भी हो सकती है | एक छोटे से उदाहरण से इसे समझाना आसान होगा जैसे आप ने ट्रैफिक का कोई नियम तोडा और ट्रैफिक हवलदार ने आप को पकड़ लिया अब आप पर कोई नियम कानून लागु हो या नहीं ये आप पर निर्भर है यदि आप किसी ऊँचे  सरकारी पद  पर विराजमान है तो मान कर चलिए की आप को न तो फाइन  भरने की जरुरत है और न ही आप को कोई सजा होगी बस आप को जरा सा अपने पद का रौब झाड़ना है हवलदार आप को कुछ  कहे उसके पहले आप ही उसकी खबर लेना सुरु कर दीजिये कि उसकी हिम्मत कैसे हुई आप को रोकने की आप कितने बड़े पद  पर शोभायमान है उसने आप को रोक के आप का अपमान किया है और आपके जरुरी सरकारी काम में बाधा डाली है अब तो वो अपनी खैर मनाये बस  वो तुरंत ही आप को साँरी बोल कर  जाने को कहेगा | यदि आप किसी पद पर नहीं है तो भी कोई बात नहीं हवलदार को बताइए  की कोई बड़ा लोकल नेता या कोई बड़ा ऑफिसर आदि आप का कितना सगावाला है फिर वो आप को प्यार से कहेगा की आगे से ये मत करीयेगा और आप को जाने देगा | अगर ये दोनों काबीलियत आप में नहीं है तो फिर बचने का एक तरीका और है वो है की आप के जेब में माया हो  माया की माया से कोई नहीं बच पाता हजार का फाइन भरना है तो बात दो या तीन सौ में जरुर बन जाएगी बस उसकी रसीद नहीं मिलेगी मिलेगी तो एक कड़क नसीहत की आगे से मत करना नहीं तो लाइसेंस  ले लूँगा | अगर ये तीनो चीजे आप के पास नहीं है तब आप आम आदमी होंगे और  सारे नियम कानून  आप पर लागु होंगे समझीए गया लाइसेंस आप के हाथ से और उसे पाने के लिये अब आप को एक तो मोटी फाइन भरनी पड़ेगी साथ ही लाइसेंस पाने के लिए लगाने पड़ेगे कई चक्कर | लेकिन आप को पकड़ने वाला कोई बड़ा ट्रैफिक ऑफिसर है तो समझ लीजिये कि फिर तो आप सभी आम आदमी है और कानून सब पर लागु होगा | अब  आप समझ गए होंगे की कानून किसके लिए होता है | इस उदाहरण को बस मात्र एक ट्रैफिक नियम कह कर ख़ारिज मत कीजिये यही नियम ज्यादातर मामलो  पर लागु होता है |
              हम कानूनों का पालन न करने के लिए अमीर और पहुँच वालो को भला बुरा कहते समय ये क्यों भूल जाते है की देश में रोज हर जगह कानूनों को तोडा जाता है और लोग पकडे भी जाते है वो सारे  काम  खास लोग नहीं आम लोग भी करते है | कई बार उनके किये की सजा उन्हें मिलती  है तो कई बार नहीं क्योकि आम आदमी भी सजा से बचने के लिए वो सब करता है जो कोई  खास आदमी करता है धन, बल, पहुच और  झूठ का प्रयोग  | इस मामले में आम और खास में कोई  फर्क नहीं है  फर्क है तो बस दोनों के लेबल का | हम सभी  ने कई बार गौर किया होगा की एक ही धारा के तहत दर्ज  दो मामलों में वादी और प्रतिवादी के साथ  अलग अलग व्यवहार किया जा रहा है | कुछ मामलो  में रिपोर्ट लिखने में ही देर की जाती है या रिपोर्ट लिखने के बाद कोई कार्यवाही नहीं की जाती जबकि कुछ मामलों में पुलिस की तत्परता देखते बनती है रातोरात आरोपियों को न केवल पकड लिया जाता है बल्की पुरा केस ही सुलझा लिया जाता है जबकि वो सब भी आम आदमी ही है बस फर्क होता है उन दोनों के आर्थिक और सामाजिक रुतबे में |  दहेज़ के मामले  ,घरेलु हिंसा और सम्पति विवादों को ही ले लीजिये इन कानूनों के तहत दर्ज होने वाले ज्यादातर मामले आम लोगों के होते है इन में भी ज्यादातर मामलों में आप देखेंगे की कानून के तहत निष्पछ* जाच की जगह कार्यवाही किसी एक पक्ष की और झुकी हुई दिखाई देगी | हर व्यक्ति अपने पक्ष में फैसला पाने के लिये अपने ताकत अनुसार पुरे न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने की हर संभव कोशिश करता है | चाहे दुसरे पार्टी को  डरा धमका के किया जाये या  पुलिस को पैसे और पहुंच के बल पर प्रभावित करके या फिर झूटे गवाह खड़ा करके |
           ऐसा नहीं है कि हर बार किसी केस से जुड़े लोग ही न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करते है कई बार तो ये अपने आप ही होता है जैसे हमने देखा है कि कई मामलो में न्यायपालिका ही खुद केस को अपने संज्ञान में लेते है तो कई बार वह केस को फास्ट ट्रैक कोर्ट को दे देती है वह उस कानून के तहत आने वाले सारे मामलो में ऐसा क्यों नहीं करती | कुछ मामलो में ये काम सरकार करती है क्यों ?  कभी मिडिया समाज के दबाव में कभी अपने राजनितिक  फायदे के लिए तो कभी उस केस से जुड़े हाई प्रोफाइल लोगों के कारण |
          पर  हम बात आम आदमी कि कर रहे थे हम सब रोजमर्रा के जीवन में कितने कानून का पालन करते है | हम सारे कानून अपनी सुविधानुसार मानते है जिसे मानाने में हमारा फायदा हो या न मानने से नुकसान तो उस कानून का हम सब पालन करते है लेकिन उससे कोई नुकसान हो तो हम उन कानूनों को अनदेखा करते रहते है पर  जब दुसरे भी  उसे नहीं मानते तो हम उन्हे  भला बुरा कहने लगते है | घर कि गलत रजिस्ट्री करना(पूरी स्टैम्प डियूटी नहीं भरना)  घर बनाते समय अतिक्रमण करना, खाने पीने कि चीजो में मिलावट करना, झूठे कागजात बनाना, बिना टिकट यात्रा करना, रेलवे ट्रैक क्रास करना, ट्रैफिक नियम न मानना इस तरह है के ढेरो कानूनों को हम सब रोज तोड़ते है वो भी बिना किसी अपराध बोधा के क्योकि इन कानूनों को तोड़ते समय हम मानते ही नहीं कि हम कोई कानून तोड़ रहे है | अब ये मत कहिये कि ये छोटे कानून  है इन्हें तोड़ कर हम कोई बड़ा अपराध  नहीं करते | कानून कानून होता है छोटा या बड़ा नहीं उसे तोड़ना अपराध है क्या आप छोटी  चोरी  और बड़ी चोरी  करने वाले दो चोरो में , एक व्यक्ति कि हत्या या कई लोगों कि हत्या करने वालो के बीच फर्क करते है क्या हम कहते है कि एक का अपराध कम है इसलिए उसे छोड़ दिया जाये, नहीं हम दोनों को सजा देने कि मांग करते है क्योकि अपराधी तो दोनों ही है | अपराध अपराध होता है छोटा या बड़ा अमीर या गरीब का नहीं हमें हर अन्याय का विरोध करना चाहिए चाहे वो कोई भी करे और किसी के भी खिलाफ हो |
               फिर सवाल ये भी है कि खुद हम भी गरीबो को न्याय दिलाने  के प्रति कितने गंम्भीर है हम चीख चीख कर कहते है कि गरीब  आम आदमी के साथ अन्याय हो रहा है पर क्या हम उस गरीब बेसहारा के साथ भी वैसे ही खड़े होते है जैसे कि हम जेसिका प्रियदर्शनी मट्टू के केस में खड़े हुए थे | उनको इंसाफ दिलाने के लिए मीडिया से लेकर आम आदमी भी आगे आया मोमबत्तिया ले कर मोर्चा निकला गया हो हल्ला मचाया गया क्या किसी भवरी  देवी के लिए भी हम ये करेंगे क्या किसी गाव के दलित, आदिवासी या सड़क पर रहने वालो के लिये भी मोमबत्तिया ले कर मार्च निकालेंगे  जवाब है नहीं शायद  कभी नहीं |  हम अपने ऊपर हो रहे अन्याय का विरोध तो करते ही नहीं दुसरो के लिये क्या करेंगे | हम अगर कुछ कर सकते है तो वो है दूसरो को दोषारोपण करना और हर बुरे चीज के लिए सिस्टम को कोसना जबकि हम खुद भी उसी  सिस्टम का एक हिस्सा है |

February 11, 2010

जस प्रजा तस राजा और तस सेवक

शर्मा जी राशन कार्ड ऑफिस के चक्कर लगा लगा के थक चुके है | उन्हें अपने राशन कार्ड से स्वर्ग सिधार चुके पिता जी का नाम कटवाना है और घर में ६ महीने पहले आ चुकि बहु का नाम डलवाना है | पर राशन कार्ड ऑफिस का बाबु है कि  चक्कर लगवा लगवा कर परेशान कर रहा है | अब शर्माजी  समझ  गए है कि बिना कुछ  दिए काम नहीं होने वाला है परेशान हो कर कहते है कि क्या किया जाये आम आदमी की  सुनता कौन है आम आदमी तो इसी तरह पिसता है | ये हालत सिर्फ शर्मा जी की ही  नहीं है हर  सरकारी दफ्तर में काम के लिये जाने  वाले  हर खासो आम  की  यही हालत  होती है | हम सभी को उनकी शर्तो पर काम करवाना पड़ता है | पर  जरा इसी तस्वीर का एक रुख और देखीये  अब पाटिल बाबु अपना लाइसेंस बनवाने के लिए आर टी ओ का चक्कर लगा लगा कर परेशान है पर उनकी फाइल चार नंबर की मेज  से आगे नहीं बढती क्योकि चार नंबर पर बैठने वाले शर्मा जी ( वाही शर्मा जी जो राशन कार्ड ऑफिस में परेशान थे ) कहते  है की जब तक फाइल का वजन नहीं बढेगा फाइल भी आगे नहीं बढेगी | जो शर्माजी किसी दुसरे सरकारी दफ्तर में आम आदमी थे वही शर्माजी अब सरकारी बाबु  बनते ही वही कर रहे है जिससे वो खुद परेशान थे | मतलब ये की सरकारी दफ्तर में बैठने वाला बाबु किसी और दुनिया से नहीं आता वो हमारे आप के बीच का  ( कृपिया इस" बीच का" का मतलब कुछ और न समझीए )  एक आम आदमी ही होता है जो सरकारी बाबु बनते ही अपने रौब के आगे हमें कुछ  समझाता ही नहीं | वो दिन और हम हिन, वो भगवन और हम तुच्छ प्राणी बन जाते है | वो भूल जाता है कि इस ऑफिस  से बाहर आते ही वो भी  एक आम आदमी ही हो जाता है | 
           सोचिये जब कभी हमें किसी सरकारी ऑफिस में कोई काम करवाने जाना होता है (इस ब्लॉग को पढने वाले हर किसी के लिए ऊपर वाले से दुआ करुँगी की आप को कभी किसी सरकारी ऑफिस में न  जाना पड़े) तो सर से पाव तक एक सिहरन सी दौड़ जाती है लो हो गई मेरे ऑफिस  की दो चार छुट्टी  और हो गई जेब ढीली बिगड़ गया महीने का बजट | अगर जल्दी काम करवाना है तो इतना त्याग तो करना ही होगा नहीं तो लगाते रहो चक्कर, फाइल में गलतिया तो निकलती ही रहेंगी और आप उनको दूर करने के लिए भागते रहेंगे | 
                          जब खुद को आम आदमी बता कर हम पानी पी पी कर किसी गवर्मेंट ऑफिसर  को कोसते है तो ये भूल जाते है कि कई बार हम खुद ही चाहते है कि ऑफिसर पैसे ले ले और जल्द से जल्द बिना हमारी फाइल ठीक से जाचे हमारा काम कर दे | कभी  हमारे पास नियमानुसार  पुरे कागजात नहीं होते तो कभी पुरा काम ही गैरकानूनी होता है और कभी तो बस अपना काम जल्दी कराने के लिये खुद ही घुस देने लगते है | ज्यादातर तो होता ये है कि हम पहले ही मान कर  जाते है कि किसी सरकारी दफ्तर में बिना पैसा दिए हमारा काम ही नहीं होगा और हम पहले से ही घुस देने के लिए तैयार रहते है उसने मागा नहीं कि  हमने निकल कर दे दिया | इस तरह से एक तो हम स्वयम ही सरकारी कर्मचारियों को रिश्वत लेने के लिए उकसाते है और उनके मागने पर  बिना देर किये उन्हें रिश्वत दे कर उन्हें और बढ़ावा देते है | क्योकि हम सभी  खुद भ्रष्ट है और चाहते है कि वो भी भ्रष्ट बने रहे ताकि हमारा काम बिना किसी विघ्न के होता रहे | 
                कहने के लिए तो हम कहते है कि यदि हमारे नौकरशाह सुधर जाये तो ये देश सुधर जायेगा पर किसी ईमानदार  ऑफिसर  की और किसी बेईमान ऑफिसर के लिये हमारी क्या सोच होती  है जरा इसका भी नमूना देख लेते  है | खुद हमारे भी कई अपने या जान पहचान वाले  इस तरह के सरकारी ऑफिसों में बैठते है और हम बड़े फक्र के साथ बताते है की  हमारे फलाने, फलाने पोस्ट पर है और उनकी कमाई कितनी ज्यादा है |  अपनी बेटी और बहन की शादी के लिए किसी सरकारी पद पर बैठे लड़के की पोस्ट काम और वेतन देखने से पहले ये देखा जाता है की उसकी  ऊपरी कमाई कितनी है | यदि वो गलती से ये कह दे की वो तो बड़ा ईमानदार है और घुस नहीं लेता  तो लोग आईएस ओफिसर से भी अपनी लड़की की शादी न करे बोलेगे की पहले जा का कर इसका इलाज कराओ  जब घुस ही नहीं लेना था तो सरकारी नौकरी की ही क्यों | मतलब ये की सरकारी नौकरी तो घुस लेने के लिये ही की जाती है आप ले या न ले पर  आप से सब यही उम्मीद करते है |  अगर आप कहे की आप थोड़े ईमानदार टाईप के है और किसी से पैसे ले कर काम करना अच्छा नहीं लगता तो आप के आस पास के लोग कहेंगे की अरे वो तो डरपोक है पकडे जाने से डरता है इस लिय नहीं लेता, अरे उस बेफकुफ़ (जी हा रिश्वत न लेने वाला लोगों की नजर में बेवकूफ ही होता है)  की जगह हम होते तो अब तक दो चार बंगले खड़े कर चुके होते सरकार  भी कैसे इन बेवकूफो को नौकरी पर रखा लेती है | जैसे की सरकार अपने कर्मचरियो को घुस के रूप में जनता से धन उगाहने के लिए ही रखती हो | किसी सरकारी कर्मचारी के प्रति हमारी सोचा कितनी  बंधी हुई है जरा इसका भी मुजाहिरा कीजिये | हमारा काम नहीं हुआ तो फाइल में पांच सौ का नोट रखा कर आगे कर दिया जवाब आता है की अरे इसकी जरुरत नहीं है तो हमारे दिमाग  में तुरंत आता है लगता है की इतने में नहीं मानेगा इसे और चाहिए | हम ये कभी मान कर चलते ही नहीं की वो ईमानदार भी हो सकता है |
             एक आम आदमी कितना भ्रष्ट है इस बात का अंदाजा हम इसी से लगा सकते है की मामूली से मामूली सरकारी पदों के लिये लाखो रूपए की घुस देने को हम सभी तैयार हो जाते है | सोचिये की सात से आठ हजार की सरकारी नौकरी के लिए भी सात से आठ लाख की घुस किस बिना पर दे दी जाती है निश्चित रूप से उस पद पर हो रही  ऊपरी कमाई को देख  कर | सीधी सी बात है भाई वो आठ लाख तो हम आठ महीनो में वापस  कमा लेंगे बस एक बार नौकरी मिल तो जाये फिर देखीये हमारी प्रतिभा, क्या मजाल है  कि कोई हमें पकड के दिखा दे | यदि रिश्वत लेते पकडे भी गये तो रिश्वत दे कर आराम से छुट भी जायेगे | देखा जितना विश्वास रिश्वत कि ताकत पर है उतना तो ईश्वर पर भी नहीं होगा | ये है हमारे आम आदमी कि भ्रष्ट  सोच जो एक दिन सरकारी कर्मचारी बनता है | जस प्रजा तस राजा और तस सेवक | इस लिए आगे से किसी सरकारी कर्मचारी को बुरा भला कहने से पहले अपना गिरेबान जरुर  झांक  लिजियेगा |








February 05, 2010

हम सभी भ्रष्ट है

अपने देश में (और अपने पड़ोसी देशों में भी )अगर ये सवाल किया जाये की सबसे भ्रष्ट कौन है तो सबकी  उंगलिया नेताओं की तरफ ही उठेगी | हर आम आदमी देश  में व्याप्त भ्रष्टाचार और भाई भतीजावाद की जड़ नेताओं को ही मानता है | हमारे अनुसार इन नेताओ के किये भ्रष्टाचार का नतीजा हमारे और आप जैसे बेचारी, भोली भाली और ईमानदार आम जनता को भुगतना पड़ता है | हम सभी को लगता है कि यदि  नेता भ्रष्टाचार और परिवारवाद छोड़ दे  तो सारी समस्या ही समाप्त हो जाये पर क्या वास्तव में  ऐसा  है क्या वास्तव में हमारी और आप के जैसी  आम जनता भोलीभाली और  ईमानदार  है | चुनावो के  समय हम में से ज्यादातर अपना वोट अपने ही धर्म,जाती और बिरादरी के लोगो  को किस आधार पर देते है क्या  हमारी   सोच ये नहीं होती की धर्म जाती बिरादरी और प्रान्त के नाम पर हम सभी कभी भी अपना काम नेताओं से आसानी से  करा सकते है और नेता अपने धर्म जाती के लोगों को फायदा पहुचने का काम करेगा| क्या ये सोच ईमानदार है क्या ये भ्रष्टाचार नहीं है | जो आम आदमी हर समय नताओं को कोसता रहता है वो खुद भी अपने निजी फायदे के लिए नेताओं के पास दौड़ा चला जाता है |  कोई टेंडर पास करना हो किसी घर  दुकान आदि का गैरकानूनी नक्सा पास करना हो किसी वाजिब पुलिस केस से छुटने से लेकर बच्चो के स्कूलों में दाखिले तक के  लिए   नेताओ  से सिफारिसे  मागी  जाती  है | यहाँ  तक  की  लोग  अपने  पारिवारिक  विवाद और बटवारे जैसे निजी झगड़ो में भी  नेताओं कि  नजदीकियों का फायदा उठाते है, और ये सारे काम  किया जाता है  नेताओं  को  पैसा  दे  कर या फिर   उनसे  दूर या पास की जान पहचान  के बल  पर | क्या  इस तरह के निजी लाभ के लिए नेताओं  से काम  करना भाई भतीजावाद और भ्रष्टाचार को बढावा देना नहीं है क्या इसके लिये हम जिम्मेदार नहीं है |  नेताओ को भ्रष्ट और  खुद को ईमानदार बताने वाला हर आम इन्सान किसी विवाद  में फसने  पर और मुसीबत  में पड़ने  पर  यही  सोचता  है की  काश  हमारी   भी  किसी सांसद मंत्री  से  पहचान   होती   तो  हम  अपना  काम  आसानी  से  करा  लेते  या  विवाद  से  जल्दी  छुटकारा पा जाते |  ऐसा  नही   है  कि   हर  बार  लोग  गैरकानूनी  काम  के  लिये   ही  नेताओ  के  पास  जाते  है  कई  बार  तो  क़ानूनी  रूप  से  ठीक  काम  के  लिये  भी किसी पोलिटीसियान   के  पास  महज  इस  लिये  चले  जाते  है  ताकि हमको कोई  परेशानी  न  हो  और हमारा काम  जल्द से जल्द हो जाये | जब हमारा काम हो जाये तब तो नेता अच्छा है नहीं तो भ्रष्ट है |
हम सोचते है कि यदि हम नेता होते तो हमेसा ईमानदारी से काम करते और सारा समय देश कि सेवा और आम जनता कि भलाई  में गुजार देते नेता तो आम आदमी होता नहीं इसलिए  वो हमारी परेशानी को नहीं समझाता है |  तो सवाल उठता है कि क्या हर नेता खास बन कर ही पैदा होता है | मुँह में चाँदी का चम्मच ले कर पैदा हुआ लोगों को छोड़  दे तो राजनिती  में ऐसे लोगों कि भी  कमी नहीं है जो कभी हम लोग जैसे आम आदमी ही थे और संघर्स करके सत्ता के ऊँचे पायदान पर पहुचे | तो क्या वो सारे नेता दुसरे खानदानी (अर्थात जिसका  पुरा खानदान ही नेतागिरी करता हो दादा से लेकर पोता तक)  और पैसे वाले नेताओ से अलग है क्या वो भ्रष्टाचारी नहीं है वो भाई भतीजावाद नहीं करते | सभी करते है किसी में कोई फर्क नहीं है क्योकि हम सभी अन्दर से बेईमान है बस हम सभी  को मौका चाहिए  और मौका मिलते  ही सभी सिर्फ अपने निजी फायदे कि बात सोचते है | चाहे वो नेता हो या हमारे और आप जैसा  आम आदमी | इसलिए आगे से नेताओं सांसदों और मंत्रियो कि तरफ उँगली  उठाते समय ये जरुर ध्यान रखियेगा कि खुद हमारी तीन उंगलिया हमारी ओर ईशारा कर रही है | 
 हमारा देश महान सौ में से निन्यानबे बेईमान  











January 29, 2010

मैंगो पीपल

मैंगो पीपल यानी हम और आप वो आम आदमी जिसे अपनी हर परेशानी के लिए दूसरो को दोष देने की बुरी आदत है . वो देश में व्याप्त हर समस्या के लिए भ्रष्ट नेताओं लापरवाह प्रसाशन और असंवेदनशील नौकरशाही को जिम्मेदार मानता है जबकि वो खुद गले तक भ्रष्टाचार और बेईमानी की दलदल में डूबा हुआ है. मेरा ब्लाग ऐसे ही आम आदमी को समर्पित है और एक कोशिश है उसे उसकी  गिरेबान दिखाने  की.


मेरा देश महान सौ में से निन्न्यानबे बईमान