May 13, 2022

विवाह स्त्री जीवन की धुरी नहीं हैं

स्त्रियों से जुड़े तीन अलग अलग मामलों में कोर्ट का फैसला आया हैं और फैसले हमें स्त्रियों की समाजिक स्थिति सोच पर ज्यादा काम करने को कहती हैं | 

पहले मामले में एक पिता अपनी चौदह साल की बेटी  से लगातार  रेप कर उसे गर्भवती  कर देता हैं और जब अस्पताल से मामला पुलिस तक पहुंचता हैं तो माँ बेटी दोनों पिता का नाम लेने से इंकार कर देती हैं | पुलिस का दबाव बढ़ने पर किसी और का नाम ले लेती हैं | 

पुलिस उनके आस पास के लोगों से पूछताछ और भ्रूण का टेस्ट कर पिता के  खिलाफ मुक़दमा  दर्ज करती हैं अब कोर्ट ने पिता को बीस साल की सजा दी हैं लेकिन माँ बेटी ने   पिता के   खिलाफ गवाही नहीं दी | 

दूसरा मामला ज्यादा महत्वपूर्ण हैं क्योकि इस फैसले से कोर्ट ने पति के खिलाफ रेप का मामला दर्ज करने के लिए कहा हैं | पत्नी दस सालो से ज्यादा समय तक क्रूर तरीके का यौन दुर्व्यवहार  सहती हैं जिसमे बार अप्राकृतिक  यौन सम्बन्धो के साथ बेटी के सामने यौन सम्बन्ध बनाने जैसे आरोप हैं | 


पत्नी ने क़ानूनी मदद तब ली जब नौ साल की बेटी के सामने यौन सम्बन्ध बनाने के बाद बेटी का भी यौन शोषण किया गया | पहले पॉक्सो एक्ट में मामला दर्ज किया गया था फिर कोर्ट ने फैसला दिया कि पत्नी से रेप के भी चार्जेस लगाये जाए क्योकि रेप तो रेप होता हैं चाहे वो कोई भी पुरुष करे | 

तीसरे मामले में कोर्ट ने अपने जीवनसाथी के चरित्र पर शक करने या चरित्र को लेकर निराधार आरोप बार बार  लगाने को क्रूरता माना हैं और इसके आधार पर तलाक को स्वीकार किया हैं | ये फैसला पत्नी के खिलाफ और पति के पक्ष में दिया हैं | 

1 - पहले मामले में पत्नी गरीब और पति पर निर्भर है | उन्हें ऐसे अपराधों से संरक्षण और सजा के लिए पहले से कानून मौजूद हैं लेकिन उनकी सामाजिक स्थिति और खुद उनकी सोच के आगे कानून का संरक्षण बेकार हैं | स्त्री सशक्तिकरण और अपराधों से उनके बचाव के लिए बना हर कानून तब तक इन जैसी स्त्रियों के लिए बेकार हैं  जब तक नीचे के स्तर तक स्त्रियों की सोच को नहीं बदला जाता | 


2 - दूसरे मामले में महिला काम तो नहीं करती लेकिन एक करोड़ से ज्यादा की संपत्ति उनके नाम है | जिसके  सहारे वो अपनी बेटी के साथ अलग जीवन बिता सकती थी इस विवाह से बाहर निकल कर | लेकिन एक दशक तक वो अत्याचार सहती हैं  जब तक पानी सर के ऊपर नहीं चला जाता और बेटी का भी   शोषण शुरू होता हैं  |  वो कानून का सहारा पहले भी लेकर अपना और अपनी बेटी को बुरे अनुभवों से बचा सकती थी  | 

3 - तीसरे मामले में महिला ना केवल पढ़ी लिखी है बल्कि एक कॉलेज में पढ़ाती भी हैं मतलब हर तरीके से आत्मनिर्भर  हैं  | लेकिन जिस पति  के चरित्र पर  शक है वो उसी के साथ रहने की ज़िद पर अड़ी है तब भी जब पति उन्हें तलाक देना चाहता हैं | आखिर वो कौन सी सोच हैं जो उन्हें उसी पति के साथ रहने के लिए मजबूर कर रहा हैं जिसको वो पसंद नहीं करती | 


जब तक स्त्रियां विवाह को अपने जीवन की धुरी , आधार मानना बंद नहीं करेंगी | जब तक वो  विवाह की सफलता असफलता को अपने जीवन की सफलता असफलता से जोड़ना बंद नहीं करेगी उनका कोई भला होने वाला नहीं हैं | उनके बचाव के लिए बने सैकड़ों कानूनों का कोई मतलब नहीं होगा जब तक वो अपने रूढ़िवादी सोच से बाहर नहीं निकलेंगी |


May 12, 2022

पापा की परी

बिटिया जब ढाई तीन साल की हुयी तो बर्थडे पार्टी का मतलब समझने लगी थी | अपना बर्थडे और सहेलियों के बर्थडे में जा कर उनके दिमाग में पार्टी का एक दृश्य फिक्स हो  गया |  


फिर आया इनके पापा का बर्थडे , आदत के अनुसार पतिदेव  सुबह  से मुझसे  कहने लगे कहाँ दे रही  हो  मेरे बर्थडे की पार्टी  | बिटिया बड़ी खुश की आज पापा का बर्थडे भी हैं और शाम को पार्टी भी हैं | 


शाम को हम सब बाहर खाना खाने जाने के लिए तैयार होने लगे तो ये  एक्साइटेड हो गयी कि बाहर पार्टी हैं तो बहुत ही बढियाँ होगी | हम लोग अपने वही पेट जगह पर खाने पहुँच गए  तो बिटिया थोड़े आश्चर्य में बाहर ही बोल पड़ी यहाँ पार्टी कैसे होगी ये तो रेस्टोरेंट हैं | 


अंदर जा कर कह रही हैं बाकी मेहमान कहा हैं , पार्टी कहाँ हैं | हमलोगों के ये कहने पर की यही पार्टी हैं तो वो  नाराज हो गयी की  तुम लोग तो सुबह से कह रहें थे पार्टी हैं ये तो हम लोग बस बाहर खाना खाने आये हैं | ये कोई पार्टी नहीं हैं , तीन लोगों की कहीं पार्टी होती हैं |  


उसके बाद अगले कई साल तक  वो पापा के बर्थडे पर  सरप्राइज पार्टी देती रही  | गुब्बारे से सजाने से लेकर पंखे पर फूल रखना , कार्ड बनाना , गिफ्ट लाना अलाना ढेकाना सब कुछ | साथ में ताने भी कि तुम लोगों को पार्टी करना नहीं आता , पार्टी ऐसे करते हैं | 


कई सालों तक मम्मी को सरप्राइज पार्टी नहीं दे पायी  तो अफसोस करती थी क्योकि मम्मी तो हर समय घर में ही उनके साथ रहती थी | 


वैसे वो आज भी कहती रहती  हैं कि तुम दोनों की लाइफ कितनी बोरिंग हैं मैंने उसे अच्छा बनाया हैं | मैं ना   होती तो तुम लोगो का क्या होता | ये तो वैसे सही ही बात हैं 


#पापाकीपरी 

May 11, 2022

कन्यापूजन कन्यादान

एक बार वैष्णव देवी गयी थी , वहां बहुत से लोग दर्शन करने के बाद  कन्या पूजन मतलब छोटी लड़कियों को खाना खिलाते  हैं | एक जने ऐसे ही वहां दर्शन करने आयी छोटी लड़कियों को खोज खोज पूड़ी हलवा दे रहें थे | 


मेरी कम हाइट और फ्रॉक पहने होने के कारण उन्होंने मुझे भी थमा दिया |  मुझे पता था कि पीरियड शुरू हुयी लड़कियों को कन्या पूजन में नहीं  बिठाया जाता  |  मैं उतनी बड़ी हो चुकी थी सो मैं उन्हें मना करने लगी कि मुझे   नहीं लेना हैं  लेकिन वो मानने को ही तैयार नहीं | 


हमें लगा हम ये सब माने ना माने वो तो मानते ही होंगे | बेकार उनका धर्म भ्रष्ट होगा और पाप अलग से लगेगा उन्हें  | सो हमने उनके जाने के बाद पूड़ी हलवा वही किनारे रख दिया | भिखारी तो वहां होते नहीं |   


बहुत बड़ी संख्या में लोग नवरात्रि में अपने अपने घरो में कन्या पूजन करते हैं | हमारे यहाँ  इसको कुआरी खिलाना कहते हैं | पीरियड शुरू होने से पहले लड़कियां कन्या कहलाती हैं | तभी उन्हें पवित्र और पैर पूजने लायक माना जाता हैं | पीरियड शुरू होने के बाद उन्हें स्त्री समझा जाने लगता हैं और फिर वो कन्या  नहीं कहलाती | 


उसी तरह हमारे धर्म और  शास्त्र में जो कन्यादान  हैं वो छोटी अर्थात पीरियड शुरू ना हुयी लड़कियों के दान की बात करता हैं |  इसलिए ही कन्यादान के समय दामाद और  बेटी दोनों के पैर पूजे जाते हैं | पहले अत्यंत छोटी लड़कियों के  विवाह का कारण यही शास्त्रों के अनुसार असली पुण्य कमाने का लालच ही होता था |  

ये बात आप अच्छे से समझ ले कि ये जो आजकल बीस तीस या चालीस साल की लड़कियों के विवाह में लोग कन्यादान कर रहें हैं ना , असल में वो शास्त्रों को अनुसार फर्जी हैं | जब लड़की कन्या रही ही नहीं तो कन्यादान कैसा | स्त्री दान , बिटिया दान की कोई व्यवस्था हमारे शास्त्रों में तो नहीं हैं | 


भले पंडित जी विवाह के समय बोले की कन्या को बुलाइये पर स्त्री बन चुकी लड़की कन्या नहीं होती | जब लड़की कन्या नहीं होती तो उसका कन्यादान भी अपने दिल की तसल्ली और बस नाम के लिए रस्मो को निभा देने भर से आपको उसका पुण्य भी नहीं मिलने वाला | मतलब आपका किया कन्यादान शास्त्रों और धर्म के लिए आपके लेडीज संगीत के बराबर का हैसियत रखता हैं , मतलब की कुछ भी नहीं  | 


जिस जिस को लगता हैं कि उसके लिए उसका धर्म और शास्त्रों में लिखा उसकी पहचान हैं उसका पालन करना उसके लिए जरुरी हैं तो दिखाए अपने दस साल की बिटिया का कन्यादान करने का जिगरा | बाकि लोग समझ ले कि वो धर्म और शास्त्र को बहुत पहले ही  पीछे छोड़ आये हैं उसके बाद भी आराम का जीवन जी रहें हैं और दे रहें हैं अपने बेटियों को खुशहाल जीवन  |  

May 10, 2022

केंद्रीय विश्वविद्यालयों संयुक्त प्रवेश परीक्षा

 यूजीसी इस  साल से  केंद्रीय विश्वविद्यालयों में ग्रेजुएशन के लिए संयुक्त प्रवेश  परीक्षा शुरू करने वाला हैं | मेरी नजर में ये एक बहुत अच्छा कदम हैं | इससे बारहवीं में 99%नंबरों की बेतुकी  होड़ ख़त्म होगी जो बहुत सारे बच्चो पर अनावश्यक दबाव डाल  तनावों से भर देता था | 

इसके साथ ही देशभर  के विद्यार्थियों के साथ हो रहा भेदभाव ख़त्म होगा जो  अलग अलग शिक्षा बोर्ड  के कारण होता था | आप किसी यूपी बिहार राजस्थान आदि राज्य शिक्षा बोर्ड में पढ़ने वाले से उम्मीद ही नहीं कर सकते की वो  बच्चे  नब्बे प्रतिशत से ऊपर नंबर लायेंगे |  मैरिट लिस्ट में आने वाले बच्चे भी शायद ही नब्बे प्रतिशत से ऊपर नंबर लाते हो | 


आप सोचिये केंद्रीय बोर्ड में पढ़ने वाले उन बच्चो से जिनके पच्चीस तीस प्रतिशत बच्चे नब्बे प्रतिशत से ऊपर 99.96 प्रतिशत तक नंबर लाते हैं , उनका  मुकाबला राज्य शिक्षा बोर्ड वाले आम बच्चे कर क्या कर  पाएंगे | ये सारे बच्चे अपने पसंद के  विषय और विश्वविद्यालय   में कभी प्रवेश नहीं ले  पाते थे | राज्य और केंद्रीय शिक्षा बोर्ड के परीक्षा और नंबर देने का  पैटर्न  बहुत अलग था और यही भेदभाव का कारण था  | 


अब सभी विद्यार्थियों का कम से कम एक पैटर्न में परीक्षा देने और अपने पसंद का विषय तथा विश्वविद्याय चुनने का बरबरी का मौका मिलेगा | 


वैसे बता दूँ बीएचयू हमेशा से अपने सभी कोर्स में प्रवेश के लिए  खुद प्रवेश परीक्षा लेते आया हैं | पहले उससे जुड़े दो ग्रेजुएशन कॉलेज मैरिट से और एक खुद का प्रवेश परीक्षा लेते थे   | जिसमे बहुत तरह की गड़बड़ियां की जाती इसी को देखते बीएचयू ने खुद से जुड़े सभी कॉलेज में प्रवेश भी अपने इंट्रेंस एग्जाम से देने लगा | 


देश के बाकि के कॉलेज  से भी समय समय पर एडमिशन में गड़बड़ी की शिकायत आती रहती हैं कि  मैरिट के नाम पर 99 प्रतिशत से कम वालों को प्रवेश शुरू में नहीं दिया जाता लेकिन बाद में कोटा डोनेशन या जैसे भी उससे कम मैरिट वालों को प्रवेश दिया गया | 


वैसे इसमें बारहवीं को बिलकुल नजर अंदाजा नहीं किया गया हैं  जैसे ( हमारे समय में )  बीएचयू में बारहवीं में पैंतालीस प्रतिशत से कम नंबर वाले प्रवेश परीक्षा नहीं दे सकते थे | इसी तरह यूजीसी अभी भी विश्ववियालयों को ये छूट देगी कि वो बारहवीं के लिए कोई  प्रतिशत अपनी तरफ से तय कर ले | 


बस देखना हैं कि इसमें भी केंद्रीय विश्वविद्यालय इतना ज्यादा कटऑफ ना तय कर दे बारहवीं के लिए कि फिर राज्यों के शिक्षा बोर्ड के बच्चे प्रवेश से वंचित रह जाए | 

ऑनलाइन शॉपिंग और पैसे ट्रांसफर के लफड़े

लोगों को एसबीआई पर चुटकुले बनना छोड़ देना चाहिए क्योकि अब प्राइवेट बैंक में भी अगर आपके पैसे अटक जाये तो वपस लेने के लिए वैसे ही चक्कर लगाने पड़ते हैं जैसे की किसी  सरकारी बैंक में | जनवरी में अटका  पैसा अप्रैल में आखिर तब  मिला जब हम दस चक्कर लगाने के बाद भी छोड़ने को तैयार ना थे और रिजर्व बैंक में भी शिकायत तक दर्ज करा दी |  


ट्रांजेक्शन फेल होने के बाद भी पैसा ट्रांसफर कर दिया गया बैंक द्वारा अमेजन को | हम  में से ज्यादातर लोग ध्यान नहीं देते लेकिन जब हम अमेजन जैसे किसी कंपनी को पेय करते हैं तो पैसा सीधा अमेजन के पास नहीं बल्कि एक तीसरी पार्टी पेय इंडिया जैसो के पास जाता हैं और वो अमेजन को ट्रांसफर करती हैं | 


बैंक से पैसा ट्रांसफर हो गया  लेकिन वो अमेज़न को मिला नहीं | बैंक जिद पर अड़ा रहा कि उसने पैसे दे दिये उसकी जिम्मेदारी ख़त्म जिसके पास पैसा गया हैं उससे बात करूँ | अमेजन को पैसा मिला नहीं इसलिए वो भी मानने को तैयार नहीं कि उसे पैसा मिला तो वो रिटर्न करने को तैयार नहीं | 


मेरा और पेय इंडिया का कोई सीधा रिश्ता बिजनेस ही नहीं हैं तो में कैसे और किस बिना पर उससे बात करू ये मेरी समस्या थी | 


चुकीं बैंक ने ट्रांजेक्शन फेल बता कर पैसा ट्रांसफर किया था तो उसकी जिम्मेदारी थी कि वो पैसे तीसरी पार्टी से लेकर मुझे वापस करे | अमेज़न की भी भी जिम्मेदारी थी कि जब वो ग्राहको से सीधा पैसा अपने अकाउंट में नहीं लेती तीसरी पार्टी के माध्यम से लेती हैं तो उसे तीसरी पार्टी से भी चेक करना चाहिए था कि पैसा उसके पास तो नहीं गया | 


लेकिन दोनों अपना अपना पिंड छूटा कर  ग्राहक को मुर्ख बना उसे सब कुछ करने के लिए कह रहें थे | जबकि पहली जिम्मेदारी उन दोनों की थी | पेय इंडिया का हालत ये थे कि वो बैंक के भेजे दो तीन मेल का जवाब नहीं दे रहा था | अब सोचिए मैं उनसे संपर्क करती तो क्या मेरे किसी भी मेल और फोन का वो कोई जवाब देते | 


बैंक और अमेजन का कस्टमर सर्विस तो कस्टमर को साफ कहा दिया हमारी समस्या नहीं हैं आपकी समस्या हैं शिकायत हमारी तरफ से क्लोज हो गया , जा कर मरिये कहीं  |  बैंक में लिखित शिकायत दी गयी फिर दूसरे कम्प्लेन  नंबर के लिए एक और चक्कर लगाना पड़ा तब नया नंबर जनरेट हुआ | 


जूनियर वाले तो बैंक में भी हमें कॉल सेंटर वालों का फोन थमाने की कोशिश करते रहें | हमने  मना  कर दिया ब्रांच में हमारा खाता हैं और ये आपका काम हैं | उन्होंने तो एकबार ये भी कहा दिया ये ब्रांच का काम ही नहीं हैं आपको कॉल सेंटर पर बात करनी चाहिए | 


हमने कहा खाता ब्रांच में  खुलवाया था | आप सारे ब्रांच बंद कर दीजिये डिजिटल ही सब काम कीजिये हम भी पैसे मिलने के बाद अपना खाता बंद किये देते हैं | दो चार चक्कर में मैनेजर डिप्टी से लेकर ब्रांच मैनेजर तक पहुँच गए | फिर मैनेजर ने डिप्टी से कहा अमेजन , पेय इंडिया का कांफ्रेंस कॉल कर सबको एक साथ ला कर बात करो | 


उसके बाद भी ये डिजिटल कम्पनियाँ मानने को तैयार नहीं | अंत में हमने आरबीआई में शिकायत कर ही दी | लेकिन शिकायत के तीन दिन बाद ही बैंक से फोन आया कि पैसा आ गया हैं कल मिल जायेगा | आरबीआई में शिकायत सिर्फ शिकायत दर्ज होने के स्तर पर थी उसके आगे नही बढ़ी थी | तो मान कर चलते हैं कि बैंक ने अपने स्तर पर काम  किया लेकिन पैसे  मेरी ज़िद पर  मिले | 


मैंने अपनी शिकायत को लगातार फॉलो ना किया होता तो वो सब हर बार शांत बैठ जा रहें थे और आगे कुछ नहीं कर रहें थे | आरबीआई में शिकायत करने में देरी  इसलिए हुई  क्योकि वो लिखित शिकायत मांग रहें थे और औपचारिक रूप से लिखित शिकायत तो हमने ब्रांच में की थी | डिजिटल वाले में तो फोन पर हुयी बातों को मेल पर बस आगे बढ़ा रहें थे | 


इसलिए याद रखिये फोन पर कितनी भी बातें हो बैंक को पहले दिन ही एक औपचारिक लिखित शिकायत कर दीजिये | उसके बाद उनके रिप्लाई को भी लिखित में लीजिये | हमारे केस में भी बैंक हमारे मेल का जवाब बड़ी मुश्किल से मेल पर लिखित में दे रहा था | रिप्लाई ना करे तो एक रिमांडर भी डाले | 


आरबीआई बैंक को लिखित शिकायत के एक महीने बाद अपने यहाँ शिकायत लेता हैं और ये तीन चीजे मांगता हैं | अगली बार आपकी रकम अटके तो कम से कम एक लिखित शिकायत कर दे भले पैसे लेने में आपकी रूचि हो या ना हो | क्योकि किसी गरीब या आम आदमी के लिए वो रकम बड़ी हो सकती हैं | 


लोग पैसा भूल जाते हैं छोटी रकम कह करके तो बैंक भी बाकियो के साथ भी वही करने का सोचती हैं कि ग्राहक पैसा भूल जाए या परेशांन हो कर आना बंद करदे | बैंको में या आरबीआई में शिकायतों का भंडार लगेगा तब ये बैंक एक बार में काम करना सीखेंगे या शिकायतों को गंभीरता से लेंगे | बैंक के चक्कर लगाने की जरुरत नहीं हैं बस घर बैठे शिकायत दर्ज करा दीजिये डिजिटली | इससे दूसरों का भला होगा |  


April 23, 2022

विज्ञापन , पैसा और नैतिक जिम्मेदारी



अक्षय कुमार की खूब  ट्रोलिंग हुयी  उनके गुटका का विज्ञापन करने पर | ये ट्रोलिंग होनी भी चाहिए थी क्योकि जो व्यक्ति अपने नीजि जीवन में सेहत और खानपान को लेकर बड़ी बड़ी बात करता हो अगर वो पैसे के लिए तंबाकू बेचने  वाली कंपनी का दिखावटी इलायची का विज्ञापन करे तो वो इसी के लायक हैं | 


अगले ही दिन उन्हें इस विज्ञापन के लिए माफ़ी मांगनी पड़ी और खुद को विज्ञापन से अलग होने की घोषणा भी करनी पड़ी | उनके लिए तालियां बजाने से पहले रुकिये जरा पेंच समझिये विज्ञापन से अलग होने के बाद भी विज्ञापन बंद नहीं होगा क्योकि उन्होंने विज्ञापन के पैसे नहीं लौटाये हैं | उन पैसो को वो दान करेंगे और विज्ञापन अपने क्रांट्रेक्ट की समय तक दिखता रहेगा | 


इसके पहले अमिताभ बच्चन की भी खूब ट्रोलिंग हुयी थी गुटका कंपनी का विज्ञापन करने पर | पहले उन्होंने सफाई दिया लेकिन बाद में उस विज्ञापन से ना केवल खुद को अलग किया बल्कि पैसे भी लौटा कर तुरंत विज्ञापन को बंद करवाया | अमिताभ शराब का विज्ञापन भी नहीं करते हैं क्योकि शराबी जैसी फिल्मे उन्होंने भले की हो पर वो शराब नहीं पीते | लिवर में लगा चोट और फिर हिप्पेटाइटस से संक्रमित ब्लड चढाने से उनका लिवर बहुत ख़राब हैं | 


बहुत से खिलाडी जैसे सचिन विराट आदि भी शराब का विज्ञापन नहीं करते |  कुछ सेलेब्रेटी हमेशा से इन चीजों का ध्यान रखते हैं कि समाज को वो कैसा सन्देश दे रहें हैं | अभी खबर आयी हैं कि अल्लू अर्जुन को भी गुटके के विज्ञापन का प्रस्ताव था लेकिन उन्होंने तुरंत ही मना कर दिया | 


लॉकडाउन के बाद शाहरुख ने भी गुटके का विज्ञापन किया था और उनकी भी खूब ट्रोलिंग हुयी थी लेकिन उन्हें कभी कोई फर्क नहीं पड़ा | जबकि शाहरुख ने एक बार खुद से ये कहा था कि वो कभी गुटके का विज्ञापन नहीं करेंगे | इसलिए नहीं कि वो सेहत के लिए खराब चीज हैं  बल्कि इसलिए क्योकि डाउन मार्केट की चीज हैं | ऐसे चीज का विज्ञापन करके वो खुद को छोटा गिरा हुआ नहीं बनायेंगे | 


लेकिन लॉकडाउन की बेरोजगारी , लगातार फेल हो रही फिल्मे , पैसे की भूख ने उनसे ये करवा दिया | वैसे पैसा कमाने की उनकी भूख ने एक और परंपरा की शुरुआत की थी बरसो पहले जिसको आज सभी हिंदी फिल्म स्टार फॉलो करने लगे हैं | वो हैं लोगों की शादियों में नाचना | 


पहले हिंदी फिल्मो के कलाकार विदेशो में बड़े बड़े टूर पर  जाते थे | ताकि विदेशो में बैठे भारतीय और बाकि फैन उनको सामने से देख मिल सके और हिंदी फिल्म उद्योग का प्रचार भी हो जाये , पैसे कमान के साथ | लेकिन लोगों के शादियों में नाचना बहुत ही बेकार का पैसे की हवस जैसा था |  


वैसे कुछ लोग कलाकारों के विज्ञापन करने को भी पसंद नहीं करते तो कुछ कलाकार भी विज्ञापन करना पसंद नहीं करते थे | सनी दयोल ने एक बार कहा था कि वो कभी विज्ञापन नहीं करेंगे क्योकि वो अभिनेता हैं और विज्ञापन करना  बार में डांस करने , या कैबरे या तवायफ होना हैं जैसा कुछ कहा था | लेकिन सालो बाद वो भी बनियान मसाले बेचते दिख गये | 


कुछ पुराने या फ्लॉप हो चुके फ़िल्मी कलाकार जैसे जैकी और गोविंदा तो ताबीज , मंतर जंतर तक बेचने लगे थे पैसे के लिए | वो तो शुक्र हैं कि ऐसे विज्ञापनों पर कोर्ट ने रोक लगा दी | 


ब्लॉग के समय हम बहुत ही महिलाओं ने एक विज्ञापन के लिए किसी फ़िल्मी हस्ती को ट्रोल करने का  खूब विरोध किया और फ़िल्मी हस्ती के साथ खड़े हो गए थे | पुराने ब्लॉग साथी और एक राष्ट्रवादी न्यूज चैनल से उस समय जुड़े एक जने ने प्रियंका चोपड़ा का विरोध किया इस बात के लिए कि वो शराब बनाने वाली एक कंपनी के फैशन टूर का विज्ञापन कर रही हैं | 


महिला हो कर शराब बनाने वाली कंपनी से क्यों जुड़ी , खुद शराब पीती होंगी आदि इत्यादि उनके लिए कहा गया | हम महिलाएं जिन्हे तब नारीवादी कहा जाता था इसका विरोध किये कि उनका विरोध क्यों हो रहा हैं जब पुरुष अभिनेता  का  इस बात पर विरोध नहीं होता | और ये क्या बात हुयी कि किसी महिला को शराब पीने ना पीने के लिए नैतिकता की  दुहाई दी जा रही हैं | 


जब किसी पुरुष अभिनेता  को ऐसे नैतिकता का दुहाई नहीं दी जाती तो महिला अभिनेत्री को क्यों दी जा रही हैं | अगर यह  गलत हैं तो दोनों के लिए गलत हैं विरोध सबका होना चाहिए केवल महिला होने के कारण किसी एक का नहीं  | 


तब आज वाला सोशल मिडिया नहीं था वरना वो भी ये कहते अपना बचाव करते कि ये तो कोई बात नहीं हैं , ये  व्हाटबॉटिज़्म हैं , हमारी मर्जी हम जिस पर चाहे बोले जिस पर चाहे चुप रहें | आज वालों को बोल कर देखिये भाई अमिताभ अक्षय पर तो खूब बोले शाहरुख पर क्यों चुप रहे या शाहरुख पर बोले बाकि पर चुप क्यों रहें तो व्हाटबॉटिज़्म का राग अलापते भाग जायेगा |  


लेकिन कम से कम अभिताभ अक्षय जैसे ट्रोल होने पर लोगों की बात को कुछ तो मान दिया विज्ञापन से खुद को अलग तो किया | लेकिन शाहरुख ने तो इसका सोचा भी नहीं | वैसे भी वो गैर क़ानूनी होने के  बाद भी सार्वजनिक जगहों पर आराम से सुट्टे मारते दिखते हैं और युवाओं में उन्हें रोल मॉडल के रूप में  देखने के कारण उनकी पहले भी इस बात के लिए आलोचना भी हो चुकी हैं लेकिन उन्हें कभी कोई फर्क नहीं पड़ा | 


#सिने_मा

August 29, 2020

यहाँ निष्पक्ष कोई नहीं ------mangopeople





                                    जिस एनडीटीवी पर रविश कहते हैं , जब टीआरपी की होड़ में सभी सिर्फ सुशांत केस को दिखा रहें हैं तो हम आपको असली खबर दिखा रहें हैं | उसी चैनल पर इस पंद्रह अगस्त के जय जवान में 2017 में सुशांत के साथ वाले एपिसोड दिखाते हैं | ये ठीक हैं इस साल नया नहीं बना होगा लेकिन 2018-19 वाला एपिसोड भी दिखा  सकते थे , लेकिन  टीआरपी की चाहत सभी को होती हैं  | 

                                   फिर कहा जाता हैं कि मिडिया ट्रायल हो रहा हैं केस कोर्ट में हैं उसे ही ट्रायल करने दीजिये  और उसके बाद रिया का इंटरव्यू दिखाते हैं | किसी एक पक्ष के बयान को सहानभूति पूर्वक इंटरव्यू दिखाना मिडिया ट्रायल नहीं हैं क्या , आप दोनों पक्षों का कुछ  भी ना दिखाते सिर्फ इससे जुड़े खबर से मतलब रखते तो बेहतर होता | 

                                 वो कहतें हैं कि मीडिया एक तरफा खबर दिखा रहा हैं बकवास कर रहा हैं रहा हैं जबरजस्ती खुद ही फैसले सूना रहा हैं और फिर मनोरंजन भारती कहते हैं वो कौन सी ताकतें हैं जो रिया को इस केस में फंसाने का प्रयास कर रही हैं | किसी एक पक्ष को कोर्ट के पहले अपराधी बता देना गलत हैं तो किसी को निर्दोष मासूम बता देना भी उतना ही गलत हैं | ये चैनल भी इस केस में वही गलती कर रहें हैं जो बाकि के चैनल | 

                                एनडीटीवी को निष्पक्ष भी दिखना हैं और एक का पक्ष भी लेना हैं ऐसा कैसा चलेगा भैय्या | हम जैसे दर्शक मिडिया ट्रायल खिलाफ हैं और  बकवास खबरों , बयानों और आरोपों के भी इसलिए ही एनडीटी देखते हैं | लेकिन वहां भी  आरोपी पक्ष को सहानभूति से और निर्दोष बताया जायेगा   तो ये भी नहीं चलेगा | चैनल को तय कर लेना चाहिए कि उसे निष्पक्ष रहना हैं या एक पक्ष में जाना हैं , जो भी करना हैं खुल कर करों , दोनों हाथो में लड्डू लेने का  प्रयास ना करो | ताकि हम निर्णय कर सके की इस केस में मामले में हम तुमको देखना भी बंद कर दे | 

August 28, 2020

विद्यार्थियों का हित किसमे -------mangopeople

 

 

                                      कितने लोगों को लगता हैं कि चार महीने बाद कोरोना चला जायेगा और सब कुछ इतना सामान्य हो जायेगा कि स्कूल खोल दिए जायेंगे | शायद दुनियां के सबसे   आशावादी व्यक्ति को भी ऐसा नहीं लगता होगा , बल्कि तब तक शायद हालत आज से भी ज्यादा  ख़राब हो जाये | 

                                     फिर किस आधार पर ये कहा जा रहा  हैं कि JEE NEET की प्रवेश परीक्षाएं चार महीने के लिए टाल दिया जाये | चार महीने टालने की बात असल में बस एक बहाना हैं उसके बाद फिर ऐसा ही विरोध होगा क्योकि हालत इससे भी ख़राब होंगे | फिर कहा जायेगा जब इससे बेहतर हालत में परीक्षायें टाल दी  गई तब अब क्यों कराया जा रहा हैं | ये मान कर चलिए परीक्षाये टालने का अर्थ हैं इस  पूरे  सत्र को  ख़त्म करना | तो इससे बेहतर होगा कि जो लोग कोरोना के डर से या किसी अन्य कारण से परीक्षा नहीं देना चाहते वो ना दे और अगले साल इसके लिए प्रयास करे और जो देना चाहतें हैं उन्हें देने दिया जाये | 

 
                                    सबसे पहले तो प्रवेश परीक्षा देने वालों को बच्चा कहना बंद कीजिये वो सभी अठारह साल से ऊपर के बालिग युवा हैं और उनमे से ज्यादातर पांच महीनो से घरों ,में कैद नहीं हैं और वैसे ही बाहर निकल कर अपने काम कर रहें हैं जैसे अन्य लोग | 

                                  इस साल की प्रवेश परीक्षा रद्द होने अर्थ  उन सभी मेहनती विद्यार्थियों की मेहनत तैयारी पर पानी फेर देना हैं जो परीक्षा देने के लिए पूरी तरह तैयार हैं और देना चाहतें हैं | उन सामान्य घरों के  विद्यार्थियों के साथ भी अन्याय हैं जिन्होंने बड़ी मुश्किल से कोचिंग सेंटरों की फ़ीस भरके तैयारी की हैं और अब दुबारा एक साल के लिए कोचिंग की फ़ीस नहीं भर सकते और घर पर रह कर पढाई पर फोकस करना उस तरह संभव नहीं हैं | 

                                 उन लड़कियों के साथ भी अन्याय  हैं जो बड़ी मुश्किल से अपने घर वालों को मना पाती हैं इंजीनियरिंग और मेडिकल में प्रवेश के लिए और उन्हें बस एक या दो वर्ष  मिलते हैं ऐसी प्रवेश परीक्षाओं को देने और उनमे चुने जाने की |  उसके बाद बीए बीएससी करो और फिर शादी | उन लडको के साथ भी अन्याय हैं जो अपने पिता के काम दुकान बिजनेस  आदि से अलग कुछ करना चाहते हैं और उन्हें भी सिर्फ एक दो साल ही मौका मिलता हैं | फिर उन्हें भी दूकान , खेती और बिजनेस में लगा दिया जाता हैं |  

                               उन विद्यार्थियों के साथ भी जो अगले साल परीक्षा देने की अधिकतम आयु पार कर लेंगे | उन सामान्य विद्यार्थियों के साथ तो घोर अन्याय हैं जिन्हे अगले साथ दुगने प्रतियोगियों के साथ मुकाबला करना होगा और अच्छे  नंबर लाने के बाद भी प्रवेश नहीं मिल पायेगा | क्योकि सीट उतनी ही होगी और दावेदार हर साल से दुगने | उन विद्यार्थियों के साथ भी अन्याय हैं जिन्होंने पिछले साल डेंटल और आयुर्वेद आदि में प्रवेश को छोड़ एक बार फिर से एमबीबीएस के लिए  तैयारी की थी | उन गरीब और मिडिल क्लास के बच्चों के साथ भी जो बेहतर नंबर ला  सरकारी संस्थान या अपने मनचाहे कॉलेज आदि में प्रवेश की सोच रहें हैं | क्योकि अगले साथ दुगने प्रतियोगी में वो प्रवेश तो  पा जायेंगे लेकिन फिर ख़राब या महंगे प्राइवेट कॉलेजों में प्रवेश लेने के लिए फ़ीस और इच्छा नहीं  होगी | इस तरह के अनेक विद्यार्थी हैं जो परीक्षाये टालने से नुकशान में होंगे | 


                            जो ईमानदारी से विद्यार्थियों के हित का सोचता तो वो बेहतर सुविधाओं  की मांग करता ,  ज्यादा से ज्यादा सेंटर बनाने की मांग करता | छोटे छोटे शहरों में सेंटर बनाने की मांग करता या गांवों से विद्यार्थियों को सेंटर तक ले जाने लाने के लिए वाहनों को इंतजाम की बात करता | दूर दराज से आ रहें अभिवावको के रहने का इंतजाम  मांगता | दूसरे देशों में जैसे JEE की ऑनलाइन परीक्षाएं दूतावासों में हो रही हैं वैसे ही NEET की परीक्षाओं के लिए भी  उन देशो के दूतावासों में परीक्षाओं की   मांग करता | 

                            लेकिन यहाँ मिडिया कोटा वाले कोचिंग माफियाओ को बुला   कर उनसे पूछ रहा हैं कि बताइये प्रवेश परीक्षा होनी चाहिए की नहीं | वो तो कहेगा ही कि परीक्षाये ना हो ,  सुविधा संपन्न वर्ग का युवा एक साल बाद दूसरे साल भी उसके यहाँ कोचिंग करने आएगा और फ़ीस भरेगा | अपने सुपर 30 कोचिंग वाले माफिया कहते हैं कि बच्चा लोग मास्क लगा कर परीक्षा कैसे देंगे उनको साँस नहीं आएगी उनका दिमाग काम नहीं करेगा | तीन महीने होने जा रहा हैं अनलॉक हुए कितने लोगों का दिमाग काम नहीं कर रहा हैं मास्क लगाने के बाद बताये जरा और कितने युवाओं ने मास्क का मुंह नहीं देखा होगा अभी तक | 






August 26, 2020

मास्क अब जीवन का हिस्सा हैं -------mangopeople

                                   दुनियां और देश के बाकि हिस्सों का हाल मार्च में जो भी था लेकिन मुंबई में मास्क की कमी कभी नहीं रही | मार्च में यहाँ फुटपाथों पर 30 ,50 , १०० रुपये तक के मास्क के ढेर लगे थे , अब भी लगे हैं |  वो अलग बात हैं कि वो थ्री लेयर नहीं थे  और  जरुरत के मुताबिक भी ,  लेकिन मास्क थे | इसलिए कोई कम से कम तब और अब मास्क ना मिलने का बहाना मार कर मास्क पहनने से इंकार नहीं कर सकता हैं | | 


                                   सड़क वाले मास्क के साथ समस्या ये हैं कि एक तो केवल एक लेयर का हैं , दूसरे कई जगह कपड़ा होजरी का हैं जो जल्दी पानी सोख दूसरी तरफ पहुंचा देता हैं | कई मास्क का साइज इतना छोटा हैं कि वो दोनों होठो और नाक के दोनों छेदों को एक साथ मुश्किल से ढँक पा रहा हैं ,  ऐसे मास्क किसी काम के नहीं हैं | कुछ मास्क बाहर से सिलाई कर चोंच की तरह  ऐसा आकार दे  हैं कि वो चेहरे  पर फिट नहीं बैठता और बोलने के समय बार बार नीचे गिर जाता हैं |  कुछ मास्क आयातकार कपड़ा  भर हैं उसमे चेहरे के बनावट के हिसाब से चुन्नट या आकार नहीं दिया गया हैं ,  नतीजा उन्हें बार बार सही जगह पर रखने के लिए हाथ लगाना पड़ता हैं | 

                                 हमारे पास हरा वाला तीन मास्क दस साल पुराना पड़ा था H1N1 के समय का |  उसके  घर में  होने की जानकारी भी हमें नहीं  थी ,  संजोग से पिछली दिवाली की  सफाई में दिखा और फिर भी उसे फेका नहीं | शायद भविष्य  दिख गया था कि इसकी जरुरत पड़ने वाली हैं ,  शुरू में तो उसने ही साथ दिया | 

                               लॉकडाउन  खुलने के बाद अब तो घर में दो बड़े ब्रांड के चार मास्क आ गये हैं ,  तीन वैन हुसैन का हैं और एक जॉकी का | जिसमे से तीन तो तीन लेयर का  हैं लेकिन एक दो लेयर का भी ले लिया था | शुरू में एक लेयर वाले हरे मास्क से भी  कभी कभी मेरी साँस फूलने लगती थी , लगा पता नहीं तीन लेयर वाला पहन भी पाऊँगी की नहीं | वो साँस फूलना शायद मास्क की आदत ना होने और ज्यादा समय तक चलना फिरना ना होने के बाद चलने से हुआ था , जो बाद में नहीं हुआ |  अच्छे ब्रांड  और लोकल में यही फर्क होता हैं कि उन्हें जरूरतों और परेशानियों को समझ कर बनाया जाता हैं | उनकी डिजाइन भी चेहरे के अनुसार होती हैं ,  सभी तरह के लोगों के  लिए फिट हो  और जिस तरह के सुरक्षा की जरुरत हो उसके हिसाब से बनाया जाता हैं | 

                               मास्क का बाजार आज कितना बड़ा बन चूका हैं इसका अंदाजा आप इस बात से ही लगा लीजिये कि अकेले वाइल्डक्राफ़्ट ने लगभग ढाई सौ करोड़ का बिजनेस  अभी तक कर लिया हैं | उसने आपदा को बिलकुल सही समय पर अवसर में बदल दिया | लॉकडाउन खुलने के बिलकुल पहले उसने ना केवल टीवी पर जोरदार विज्ञापन  देना शुरू किया बल्कि ये भी सुनिश्चित किया कि लोगों को हर जगह वो आसान से उपलब्ध हो | बाकि कंपनियों ने मास्क की तैयारी देर से की , विज्ञापन नहीं दिया और बाजार में लोगों को आसानी से उपलब्ध नहीं हो पाया , नतीजा  पिछड़ गये | 

                              आप किसी मेडिकल स्टोर पर जाइये आपको जॉकी , वैन हुसैन , पीटर  इग्लैंड जैसे ब्रांड के मास्क कम और लोकल ज्यादा मिलेगें | रिटेलर दूकानदार को एक  एन 95  लोकल मास्क 85 से 90 रुपये में मिलते हैं जिसे वो दो से ढाई सौ से बेचता हैं ,  आप रिटेलर की मार्जिन  देखिये कितनी ज्यादा हैं | जबकि बड़े ब्रांड अपनी अकड़ में होते हैं वो अपने उत्पाद पर वैसे भी ज्यादा कमीशन नहीं देते लेकिन उपभोक्ता में  उन ब्रांड की मांग ज्यादा होती हैं तो दूकानदार को भी  उन उत्पाद को कम मार्जिन के बाद भी रखना होता हैं | मास्क में वो बात नहीं बनी , लोगों में ब्रांड को लेकर वो उत्साह नहीं था और बहुत  सारे लोगों को तो पता ही नहीं हैं कि ये कंपनियां भी मास्क बना रही हैं | इसलिए ये ब्रांड ऑनलाइन ही ज्यादा मिल रहें हैं क्योकि ज्यादातर दुकानदारों को उसमे ज्यादा फायदा नहीं मिल रहा और वो उन्हें रखने से ही इंकार कर दे रहें हैं | 

                             मैंने बहुत सारे लोगों को देखा जो एक बार प्रयोग करने के बाद फेक देने वाले नील मास्क को भी महीनो से बार बार पहन रहें हैं , बेकार हैं ऐसे मास्क | आप भी अगर किसी मास्क को ले रहें हैं तो एक बार ध्यान से उन पर लिखे निर्देशों को भी पढियेगा | उन पर उनको धोने के तरीके से लेकर कितनी बार उनका प्रयोग कर सकते हैं का भी निर्देश लिखा हुआ हैं | कोई भी मास्क अनंत काल तक पहनने के लिए नहीं बना हैं  , बार बार धोने से उनकी गुणवत्ता ख़राब होती जाती हैं और वो जरुरत के हिसाब से आपको सुरक्षा नहीं दे पाएंगे | इसलिए निर्देशों को ध्यान से पढ़ कर अपने मास्क को बदल दे | मुझे लगता हैं रोज काम पर जाने वालों को निश्चित रूप से अपने मास्क बदल देने चाहिए अब और बाकी लोग भी अपने मास्क चेक कर बदलना शुरू कर देना चाहिए | सभी को समझ लेना चाहिए कि मास्क अब हमारी जिंदगी का एक जरुरी हिस्सा बन चुका हैं और अभी लंबे समय तक ये हम सभी के जीवन में रहेगा तो अपने शॉपिंग लिस्ट में बार बार शामिल कर लीजिये | 



पुरुष तो एक मात्र कृष्ण हैं बाकी तो सब गोपियाँ ---------mangopeople



                                            वो तुम थे कृष्ण  जिसने बताया कि माँ होने के लिए किसी  बच्चे का लालन  पालन कहीं बड़ा होता हैं उसको जन्म देने  से | तुमने बताया कि स्त्री मात्र  जन्म देने से माँ का दर्जा नहीं पाती ,  वो सभी स्त्रियां जो  किसी भी बच्चे को अपना संतान मान लेती हैं वो माँ हो जाती हैं | वो तुम ही तो थे जिसने ब्रज की हर गोपी से दुलार पा उस भ्रम को भी तोड़ा कि हर माँ  अपनी संतान  से ज्यादा किसी और बच्चे  को प्रेम नहीं करती  | 

                                           वो तुम थे कृष्ण  जिसने राधा से प्रेम कर बताया किसी स्त्री पुरुष के बीच का प्रेम अपवित्र नहीं होता  और विवाह के बिना प्रेम अधूरा भी नहीं होता | प्रेम तो अपने आप में सम्पूर्ण हैं , उसका जीवन में होना ही  हमें पूर्ण कर देता हैं | 

                                          वो तुम थे कृष्ण  जिसने द्रौपती से अपनी मित्रता निभा बताया बताया कि एक स्त्री पुरुष कहीं अच्छे मित्र  हो सकते हैं | जीवन में जब अपने ही हमें हार जाते हैं तो सखा ही संकट में याद आतें हैं | तुम जैसे सखा से अच्छा,  जीवन का मार्ग दर्शक कौन हो सकता हैं | 

                                         वो तुम थे कृष्ण जिसने विवाह के लिए बहन  शुभद्रा की इच्छा को सर्वोपरि रखा परिवार के इच्छाओं के आगे और समाज की मर्यादाओं को तोड़ने में उसका साथ दिया  | तुमने बताया द्रौपती , शुभद्रा , रूपमणि को कि स्वयंबर का अर्थ  पिता भाई की पसंद  में से किस एक वर को चुनना नहीं होता | स्वयंवर का अर्थ हैं स्वयं की इच्छा से एक वर चुनना | 

                                       वो तुम थे कृष्ण जिसने उन हजारों स्त्रियों को एक बार में अपना लिया जिन्हे समाज ने  सिर्फ इसलिए त्याग दिया था क्योकि किसी दुष्ट पुरुष ने अपनी इच्छाओं के लिए उनका हरण कर लिया था | तुमने ही तो समाज की उन रूढ़ियों को तोडा जिसमे पुरुषों के किये अपराधों की सजा निर्दोष स्त्रियों को दिया जाता था | 

                                      वो तुम्हारी ही  भक्ति और प्रेम था कृष्ण जिसने मीरा को संसार की बेड़ियों को तोड़ने का साहस दिया , जिसमे  किसी स्त्री को पारिवारिक जिम्मेदारी को छोड़ भक्ति , संन्यास की भी इजाज़त नहीं होती | 

 राधा और यशोदा का जीवन जी लिया अब अगर कभी कुछ होने इच्छा हुई तो मैं तुम ( कृष्ण ) हो  जाना चाहूंगी | 


August 23, 2020

काबलियत ही आगे बढ़ायेगी --------mangopeople


                                  बिटिया कोई  छः सात साल  की रही होंगी , उनके स्कूल  के एक कार्यक्रम में उन्हें मराठी डांस के लिए चुन लिया गया |  अभी तक वो स्कूल के  कार्यक्रमों में कुछ बोलने के लिए ही भाग लेती पहली बार शौक में डांस में भाग ले रही थी | हफ्ते भर बाद एक दिन घर आ कर बोली आज वाइस प्रिंसपल हमारे डांस की प्रेक्टिस  देखने आयी थी और मुझे देख कर बोली कितनी क्यूट गर्ल हैं इसे पीछे क्यों खड़ा किया हैं इसे आगे खड़ा करों | 


                                ये बता वो बहुत खुश थी लेकिन मुझे अजीब लगा क्योकि मैंने देख और सुन रखा था डांस में लोगों की क्यूटनेस को ज़रा भी भाव नहीं दिया जाता जो सबसे अच्छा डांस करता हैं सबसे आगे वही होता हैं | वो  एक प्रसिद्द  मराठी गाने पर डांस करने वाली थी मैंने तुरंत गूगल से सर्च कर उस गाने को लगा उन्हें अपना डांस दिखाने के लिए कहा | उनका डांस देख हमने तो अपना माथा ही ठोक लिया वो डांस के नाम पर पीटी कर रही थी | खैर उस दिन से हमने उनके डांस में थोड़ा सुधार करवाना शुरू  कर दिया और डांस में थोड़ा लचक लाने का प्रयास   किया | कार्यक्रम के दिन सभी टीचर ने भी कहा कि उन्होंने थोड़ा बेहतर डांस किया था उससे जो वो स्कूल में सीख रही थी | 


                              कई साल बीत गये और फिर एक  बार उन्होंने स्कूल के वार्षिक सामारोह में भाग लिया | कार्यक्रम बड़ा होता हैं इसलिए बाहर से कोरियोग्राफर भुलाया गया था कुछ आठ दस युवा लडके लड़कियां थे | थीम डिस्को था और ये लोग जिस गाने पर डांस करने वाले थे वो सैटरडे नाईट फीवर  का था | हमने पूछा किस लाइन में हो डांस के ,तो बोलती हैं तीसरी | हमने उन्हें फिर डांस दिखाने के लिए कहा इस बार भी उन्होंने डांस के नाम   पर पीटी ही दिखाया | 


                             असल में वार्षिक समारोह में बहुत कम बच्चे ही भाग लेते हैं क्योकि स्कूल के बाद भी रुकना पड़ता हैं और  क्लास पढाई छोड़ भी प्रैक्टिस करनी पड़ती हैं  | इसलिए जिन बच्चों ने भी भाग लेने की हामी भरी उन्हें ही  लेना पड़ता हैं | हमने सोचा कोरियोग्राफर पर हजारों रूपये खर्च किये हैं ड्रेस पर भी सैकड़ो रुपये खर्च हो रहें हैं और दो तीन मिनट के डांस में हमारी छुटकी सी बिटिया तीसरी लाइन में रहीं तो हमें दिखायी भी नहीं देंगी | उस दिन से उनकी घर पर भी प्रेक्टिस शुरू करवाई और वो तीसरी से किसी तरह दूसरी लाइन में ही आ पायी | खैर कार्यक्रम बहुत अच्छा  था और दूसरी लाईन में भी हमने कहा चलो पैसे वसूल हुये  | 


                          असल जीवन में भी हमें बहुत लोग मिलते हैं जो क्यूटनेस , सुंदरता , सरनेम , पहुँच , किसके बेटा/बेटी हो आदि से प्रभावित हो कर लोगों को मौका दे देंतें हैं , किसी क्षेत्र आदि में प्रवेश करना आसान बना देते हैं , संघर्ष को कम या ख़त्म कर देते हैं | लेकिन जब जीवन में प्रोफेशनल लोगों से पाला पड़ता हैं तो योग्यता ही देखी जाती हैं , बाकी सब धरा रह जाता हैं | अपने काम में आगे बढ़ते रहने के लिए , सफलता की नयी ऊचाँइयाँ छूने के लिए टिके रहने के लिए काबलियत ही काम आती हैं और कुछ नहीं चलता | संभव हो जितनी  योग्यता अपने बच्चो को दे सकते हैं वो उन्हें बचपन से दीजिये | जीवन में शॉर्टकट और गलत लोगों का साथ से मिली सफलता ज्यादा लंबी नहीं होती | 

#क्याबनोगीबिटिया 

March 18, 2020

बुजुर्ग , कोरोना और इटली की प्राथमिकताएं --------mangopeople

मुंबई में एक अच्छी आदत हैं यहां बड़ी संख्या में लोग बस ट्रेन आदि में बुजुर्गों को तुरंत अपनी सीट दे देतें हैं | लेकिन कभी कोई गर्भवती महिला और बुजुर्ग दोनों आ जाए तो लोग गर्भवती महिला को सीट पहले देतें हैं बुजुर्ग  मुकाबले |  परिस्थितियां बदलते ही हमारी प्राथमिकताए बदल जाती हैं | अब यदि गर्भवती महिला के साथ कोई ऐसा आ जाये जो अपाहिज  हो खड़ा ना हो सके तो व्यक्ति  एक कदम और आगे बढ़ता  हैं और अपनी सीट एक को दे दूसरे यात्री को भी अपनी सीट  देने के लिए कहता हैं | कभी कभी बढ़िया तालमेल भी हो जाता हैं , बुजर्ग भी हैं और छोटा बच्चा गोद में लिए महिला तो बुजुर्ग को सीट दे कर बच्चा उसकी गोद में दे दिया जाता  हैं |
हमारी एक मित्र एक एनजीओ में हैं जो गरीब कैंसर पीड़ित बच्चों का मुफ्त इलाज कराती हैं | कैंसर का इलाज मंहगा भी हैं और लंबा चलने वाला भी | इजाज के साथ महीनो  पीड़ित के साथ उसके माता पिता के भी रहने खाने पीनी की व्यवस्था भी संस्था अपने यहाँ करती हैं |  किसी भी संस्था के पास इतने संसाधन नहीं होते कि हर किसी  को ये सुविधा दे सके इसलिए उन्हें चुनाव करना पड़ता हैं | वो उन्ही बच्चों की मदद करती हैं जिनके कैंसर से  बचने की संभावना कम से कम साठ प्रतिशत हो , उससे कम वालों को , वो नहीं लेती हैं |
इसका कारण  जहां सिमित संसाधनों का सही जगह उपयोग करना हैं वही उनका कहना हैं जब संस्था में बहुत प्रयास के बाद और कई बार माता पिता की लापरवाही , जिसमे वो इलाज बीच में छोड़  कर चले जाते हैं और फिर वापस आतें हैं  के कारण किसी बच्चे की मौत हो जाती  हैं तो बाकी बच्चों और परिवारो मेंउसका बुरा असर होता हैं वो  बहुत निराश हो जातें हैं | एक मौत के बाद सभी की फिर से कॉउंसलिंग करनी पड़ती हैं |
अब देख रहीं हूँ जब से इटली में कोरोना को लेकर बुजुर्गों के इलाज में बाकियों से कम ध्यान देने की खबर आई हैं लोग उस समाज , देश , सरकार , संस्कृति को भला बुरा कह रहें हैं | बिलकुल गलत सोच और रवैया हैं इटली के लिए लोगों का |
जब  परिस्थितियां बहुत  ख़राब हो और संसाधन बहुत सिमित तो हमें इस तरह की प्राथमिकताए तय करना मजबूरी भी होती हैं और जरुरी भी | सिमित संसाधनों का प्रयोग पहले उनके लिए करना पड़ता हैं जिनके बचने की संभावना ज्यादा हो | 80 साल से ऊपर के उन बुजुर्गों की बात की जा रही हैं जिन्हे कोरोना के पहले ही अनेक तरीके की शारीरिक समस्याएं हैं | कोरोना होने के बाद ये इतनी बढ़ जा रहीं हैं कि हर बुजुर्ग को अपने सहायता और समस्याओं के लिए एक  नर्स  और  डॉक्टर की जरुरत हैं | ऐसे समय पर जब हजारों लोग एक साथ बीमार हो तो क्या किसी एक मरीज  के लिए ऐसी व्यवस्था की जा सकती हैं और इसके बाद भी उसके बचने की संभावना बहुत कम हैं |
बाढ़ आदि जैसी प्राकृतिक आपदाओं के समय महिलाओं बच्चों बुजुर्गों को पहले बचाया जाता हैं | क्या आजतक हमने इस पर सवाल उठाया हैं कि क्या किसी हट्टे कट्टे पुरुष की जान कम कीमती होती हैं जो उसे प्राथमिकता नहीं दी जाती | यहाँ पर देखा जाता हैं कौन ज्यादा लम्बे समय तक  दुबारा लौट कर आने तक खुद को बचा कर रख सकता हैं | लेकिन यही अगर नाव पलट जाए तो प्राथमिकता बदल जाती हैं जो पहले सामने आता हैं पहले उसे बचाया जाता हैं बिना किसी भेदभाव के ,  तब स्त्री पुरुष बच्चा नहीं देखा जाता |
इसलिए किसी भी समाज ,  संस्कृति देश आदि को कुछ कहने से पहले सभी परिस्थितियों को  व्यावहारिक रूप से सोच समझ लेना चाहिए | हमारे समाज में कौन हैं जो अपने 80 के ऊपर के  बुजुर्ग को बचाने के  लिए अपने जवान या छोटे बच्चों  को कुर्बान करेगा ऐसी खराब स्थिति में  | बेहतर हैं  अपने बुजुर्गों की देखभाल अभी ही कीजिये और उन्हें जितना हो सके घर में रखिये आसपास की साफ़ सफाई पर ध्यान दीजिये | हम इटली के मुकाबले काफी गरीब देश हैं , हमारे संसाधन उनसे भी कम हैं | 

January 20, 2020

वो बस आपको थका रहें हैं -----mangopeople

बॉक्सिंग के फ़ाइनल मैच की तैयारी नए खिलाडी को एक ऐसे बॉक्सर के खिलाफ करनी थी जो बहुत आक्रमक था अपने प्रतिद्वंदियों के प्रति | उसकी भाव भंगिमा उससे भी ज्यादा आक्रमक थी | मैच होने से पहले ज्यादा चिल्लाता और उसके बाद भी |
 सुरक्षात्मक खेलना सही ना होता क्योकि लाख बचाव के बाद भी एक एकाध मुक्का  लग ही जाना था | तय हुआ आक्रामक खेल का जवाब और आक्रमक हो कर देना होगा | मैच शुरू हुआ और ताबड़तोड़ हमला शुरू कर दिया गया , लेकिन ये क्या हुआ जो बॉक्सर अभी तक आक्रमक था वो अचानक बचाव की मुद्रा में आ गया | वो मारने के बजाय खुद को बचाने में ही व्यस्त था |
नए खिलाड़ी का और उत्साह बड़ा और उसने और हमला तेज कर दिया | अब तो उसने बचाव की जगह  अपने प्रतिद्वंदी से दूर भागना शुरू कर दिया | वो एक भी हमला नहीं कर पा रहा था | नए खिलाड़ी को जीत की उम्मीद दिखने लगी | अब वो उसकी तरफ भाग भाग कर हमला  कर रहा था | उसके मुक्के लग नहीं रहें थे नामी खिलाड़ी को क्योकि वो सिर्फ बचाव में व्यस्त था लेकिन नया खलाड़ी उम्मीद कर रहा था प्रयास करते करते मार ही लेगा |
मैच ख़त्म होने में कुछ ही समय था कि नामी खिलाड़ी रुका ध्यान केंद्रित किया और एक जोरदार मुक्का अपने प्रतिद्वंदी को दे दिया | नया खिलाड़ी हमला कर कर के और उसके पीछे भाग भाग कर इतना थक चुका था कि उस एक मात्र प्रहार का बचाव भी ना कर सका और नॉक आउट | लोगों ने नामी खिलाडी के उस चालाकी की खूब तारीफ की कि कैसे उसने पहले खिलाडी को खूब  थकाया , छकाया और फिर आखिर में एक पंच में मैच जीत लिया | नए खिलाड़ी के समर्थक भी उसे कोसने लगे इतना हमला किया , क्या फायदा एक भी ढंग का मार ना सका , बेकार था वो |

CAA और NRC को लेकर भी कुछ ऐसा ही मैच चल रहा हैं | अभी तक NRC को संसद में पेश तक नहीं किया गया हैं यहां तक कि उस पर कैबिनेट में चर्चा तक नहीं हुई हैं |  मोदी ने सही कहा था उसकी चर्चा तक नहीं हुई हैं | किसी भी बिल को संसद में रखने के पहले केबिनेट में चर्चा की जाती हैं वहां से मंजूरी मिलने के बाद संसद में पेश होता है , बहस होती हैं , पास होता हैं फिर कहीं जा कर कानून बनता हैं | किसी के घोषणापत्र में होने और गृहमंत्री का संसद या बाहर कहना की कानून बनेगा इस पर,  का कोई महत्व नहीं होता हैं | ऐसी घोषणाएँ तो मंदिर वही बनाएंगे जैसा भी हुआ था लेकिन संसद और सरकार कुछ नहीं कर पाई |  निर्णय उसी कोर्ट से आया जहां से उसका आना तय था , लेकिन नारों का प्रयोग कर उसे अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया गया |
   NRC आएगा की घोषणा बार बार लगातार करके लोगों में उसका खौफ पैदा किया गया | जानबूझ कर CAA के साथ ये सब किया गया और क्रोनोलॉजी भी संमझायी गई ताकि लोग आक्रमक हो विरोध करे उन कानूनों का जिसमे से एक उन पर लागु ही नहीं होता और दूसरा तो अभी तक बना ही नहीं |
ऐसे किसी भी कानून को आप कोर्ट में चैलेंज नहीं कर सकतें जो अभी तक बना ही नहीं | आप विरोध करते रहिये कोई उस पर ध्यान भी नहीं देगा | क्या किसी ने भी देखा की शाहीन बाग़ और उसके जैसे दूसरे आंदोलनों को रोकने के लिए किसी भी प्रकार की दिलचस्पी सरकार ने दिखाई हो | अब कोर्ट के कहने पर खानापूर्ति की जा रही हैं और आगे भी जो किया जाएगा वो सब कोर्ट के नाम पर और आम लोगों के परेशानी के नाम पर किया जाएगा |
सरकार की मंसा इसे और लंबा खींचने की हैं ताकि आम जनता सड़क बंद होने रोज रोज के विरोध प्रदर्शन से इतनी परेशान हो जाए कि वो धीरे धीरे आंदोलनकारियों के खिलाफ हो जाए | विरोध करने वाले के अव्यवस्थित होने , कानून का पालन ना करने , हिंसक होने जैसी मान्यताएं समाज में पहले से प्रचलित हैं , ऐसा विरोध उन्ही मान्यताओं को और पुख्ता करेगा | उन आम लोगों में जो राजनीति में कोई दिलचस्पी नहीं लेते , जो  मात्र वोटर हैं ,  वो  NRC का विरोध करने वालों के खिलाफ होतें जायेंगे ये सोच कर कि जो कानून बना ही नहीं उसका विरोध क्यों हो रहा हैं अभी से | जबकि दूसरा कानून उन पर लागू ही नहीं  होता हैं | सरकार के समर्थक तो पहले ही उनके विरोध में हैं |
सरकार विरोध करने वालों को सिर्फ थका रही हैं और इस बात का इंतज़ार कर रही हैं कि कब आप बेवजह का , समय से पहले वार कर कर के थक कर पस्त जाए , उस दिन वो अपना पंच मारेगी | विरोध कर और  उसका कोई नतीजा , असर ना निकला देख कर विरोध करने वाले भी , जिस दिन कानून आयेगा , उस दिन  सिर्फ निराश हताश हो कर कागजों के लिए दौड़ भाग करेंगे विरोध नहीं | और आज का विरोध उन लाखों करोड़ों को उनके खिलाफ कर चुका होगा जो शायद कानून लागू होने के समय उनका साथ देने के लिए सड़क पर आ सकते थे , क्योकि परेशानियां तो उस कानून से उन्हें भी होंगी | लेकिन तब तक ये विरोध एक धार्मिक रंग ले चुका होगा , जनता के लिए परेशानी का कारण हो चूका होगा और विरोध करने वालों में शायद निराशा भर चुका होगा | 

December 31, 2019

जीवनसाथी ------mangopeople


ठकठक ठकठक
"बोलो क्या काम हैं ,  क्यों बाथरूम का दरवाजा इतना पीट रहें हो "
" नहा चुकी हो ना , तो अब क्या कर रही हो बाथरूम में "
" अपने कपडे धो रही हूँ "
" बाहर निकलों मैं नहाते समय धो दूंगा | तुम बस जल्दी से तैयार हो जाओ पहले ही बहुत देर हो चुकी हैं , हम लेट हो जायेंगे "
" ज्यादा नहीं हैं बस एक ब्रा हैं , दो मिनट में हो जायेगा   "
" लाओ इधर दो मुझे , मैं धो देता हूँ "
" इधर दो मुझे |  कोई जरुरत नहीं हैं , मैं कर लुंगी | किसी ने देखा तो कहेगा नई  नवेली अपने कपडे तक धुलवा रही हैं "
" तुम जा कर जल्दी तैयार हो जाओ , उतना ही बहुत हैं |  जीतनी देर तुम बड़बड़ कर रही हो देखों मैंने  धो भी दिया "
" ठीक से नहीं किया "
" वैसे एक बात बताओ  क्या साइज हैं तुम्हारा "
" तुम्हे क्या करना हैं | मेरे लिए खरीद कर लाने वाले हो क्या "
" नहीं ,  मैं नहीं खरीदने वाला | मेरे कहने का मतलब हैं कि शादी के बाद तुम्हारा साइज बदल गया होगा "
" छी ! तुम्हे शर्म नहीं आ रही हैं | तुम शादी के पहले मुझे ऐसे देख रहे थे "
"  इतना गुस्सा क्यों हो रही हो | इसमें शर्म किस बात की , अब तुम्हे देख रहा था तो नजर जाना  नेचुरल था ना |  "
" छी छी ! कितने गंदे हो तुम "
" मैं नहीं सभी की नजर जाती हैं | तुम्हे पता हैं मेरे दोस्त के पापा एक बार दोस्त के लिए लड़की देखने गए थे | आ कर बोलते हैं लड़की इतनी पतली दुबली थी की सामने से तो पता ही नहीं चल रहा था लड़का हैं या लड़की "
" चुप रहों मुझे नहीं सुननी तुम सबकी ये बकवासगिरि "
" अरे यार , तुम गलत मतलब निकाल रही हो "
" अब एकदम चुप रहों |  इसमें सीधा मतलब क्या निकालता हैं , बताओ जरा '
 " मतलब वैसे नहीं देखते , अब ऐसे ही चली जाती हैं नजर, मतलब एकदम नार्मल  सा "
 " तुम मुझे इतना गुस्सा दिला रहें हो की ये बकेट का पानी तुम्हारे ऊपर डाल दूंगी मैं सच कह रही हूँ "
" अरे तुम्हे देखने आया था तो तुम्हे देख ही तो रहा था "
" लो नहाओ इस ठंडे पानी से , अपना दिमाग ठंडा  करों | ताकि ये सब बेशर्मी दुबारा ना करो "

बकेट का पानी उस पर डाल जैसे ही वो गुस्से में जाने के लिए पलटी गिरे पानी में फिसल ही पड़ी थी कि , दो मजबूत हाथों ने उसे थाम कर गिरने से बचा लिया और एक बार फिरउन्ही हाथों की पकड़ दुबारा महसूस कर वो उन यादों के समंदर से बाहर आ गई |

सामने बैठी डॉक्टर अब भी कुछ बोले जा रही थी
" ज्यादा देर नहीं हुई हैं | समझो ये ब्रेस्ट कैंसर का पहला ही स्टेज हैं | कोई समस्या नहीं हैं एकदम ठीक हो जाएगी |  बस इलाज शुरू करने में अब जरा भी देर मत करना "
वो अब भी शून्य में थी लेकिन दो मजबूत हाथों में उसकी हाथ को अब भी मजबूती से पकड़ रखा था |



December 30, 2019

जीवन चलने के नाम ------- mangopeople

" ये नया विज्ञापन देखा "
" क्या हैं 🤔"
" पति अपने मरने के बाद भी बीवी के हर बर्थडे के लिए फूलों का गुलदस्ता बुक कर गया हैं और बीवी के हर बर्थडे पर वो बुके दे जातें हैं 😊 "
" हम्म बढ़िया हैं , प्यार करने वाला पति 🥰 "
" बकवास हैं 😏| काहे का प्यार करने वाला पति | मर गया लेकिन इस बात का इंतजाम कर गया की बीवी कभी उसे भूले नहीं और जिंदगी में आगे ना बढे | सोचो इस तरह कोई हर साल अपनी याद दिलाता रहेगा और ये याद दिलाता रहेगा कि वो उसे कितना प्यार करता था तो कभी कोई आगे बढ़ पायेगा अपने जीवन में | उसकी जिंदगी तो वहीँ ठहर जायेगी | मरने के बाद भी बीवी की जंदगी चले गए पति के ही इर्द गिर्द घूमती रहेगी 😔"
" बताओ प्यार से भी समस्या हैं 😅"
" अच्छा होता विज्ञापन , यदि उसमे यंग कपल की जगह किसी बूढ़े कपल को दिखाया जाता 🥰| मैं तो ऐसा प्यार कभी ना करूँ | सुनो मुझे कुछ हुआ तो तुम हमारी शादी का एलबम समुन्दर में फेक देना और आगे की सोचना , मूव ऑन 😍😘"
" अच्छा मुझे कुछ हुआ तो तुम फटाफट मूव ऑन 😲 "
" तुम्हे कुछ हुआ तो 🤔, तुम्हारी जैसी हरकतें हैं ना मुझे लगता हैं तुम्हारे जीते जी एक दिन सच में मैं ना छोड़ कर चली जाउंगी ये सब 😅😁 "
" मुझसे अच्छा ना , तुम्हे कोई मिलेगा नहीं 😂😂"
" तुम्हे ये क्यों लगता हैं कि मुझे कोई मिलेगा तो ही मैं जाउंगी , या तुम्हे ये क्यों लगता हैं कि मुझे अब भी किसी का इतंजार हैं | खुश हो जाओ ,मैं ऐसे भी जा सकती हूँ 😄 "
कुछ सवाल को माजक में उड़ा दे लेकिन उनके जवाब काफी मुश्किल होते हैं |

December 28, 2019

महिलाओं के लिए जरुरी महिला डॉक्टर ------- mangopeople



                                     दिन भर आप कितना भी सकारात्मक सोच ले , अच्छी बाते बोल दे , शुभ शुभ का मनन कर ले लेकिन सरसत्ती मैया जबान और दिमाग की उसी बात पर विराजेंगी जो ख़राब हो | ख़राब सोचो ,किसी बात से डरो तो वो झट से पूरा हो जाता हैं |

                                    हमारी ही बिल्डिंग में हमारी फैमली डॉक्टर का क्लिनिक हैं | पतिदेव लोग बचपन से उनके पास जाते रहें हैं | विवाह के बाद मेरी भी डॉक्टर बन गईं छोटी मोटी हर समस्या के लिए | १७ सालों में मुझे और मेरी समस्याओं से अच्छे से अवगत भी हो गई थी |

                                   तो हुआ ये कि जुलाई में हमारी डॉक्टर दो महीने बाद अमेरिका से आईं ( उनके भाई , माता जी और बेटी सब वही सेटल हो गए हैं तो ये खुद दो महीने के लिए हर साल मिलने वहीँ चली  हैं )  तो मुझे अचानक से वो कुछ ज्यादा ही वृद्ध और कमजोर दिखने लगी | उनकी आयु का अंदाजा लगाया तो 65 -70  के आस पास लगी |मुझे चिंता होने लगी इनकी तो आयु हो रही हैं , कहीं इन्हे कुछ हो गया तो मेरा क्या होगा | आस पास कोई एमबीबीएस अच्छी महिला डॉक्टर नहीं हैं | इनके साथ तो पारिवारिक रिश्ते जैसा हैं , कितने आराम से इन्हे सब बता देतीं हूँ ,  इन्हे कुछ हुआ तो क्या करुँगी |

                                   इस बारे में पतिदेव से चर्चा भी की , तो वो बोले अरे अभी कुछ नहीं होगा शारीरिक रूप से एकदम ठीक हैं | कल जब उनसे मिलने गई तो उन्होंने बताया वो अब रिटायरमेंट ले रहीं हैं , पहली जनवरी से नहीं आएँगी | उसके जाने का दुःख उसके सामने ही तुरंत प्रकट कर दिया , जो बिलकुल असली थी | क्योकि इस बारे में दो चार महीने पहले ही विस्तार से सोच लिया गया था | उन्होंने भी आश्वासन दिया , घर ज्यादा दूर नहीं हैं फोन करके आ जाना |

                                  माथा ठोक लेने का जी किया , डॉक्टर रिटायर भी होते हैं ऐसा तो हमने कभी सोचा ही नहीं था | पतिदेव को बताया गया देखा मैं ना कहती थी कि मुझे सब कुछ पहले ही पता चल जाता हैं , लो एक और उदहारण सामने हैं | अब हमारा लोहा नहीं सोना पीतल चाँदी सब मान लो |

                                 डॉक्टर यदि स्त्री को तो स्त्री रोगियों के लिए वरदान जैसा होता हैं |  स्त्रियों को अपनी शारीरिक बनावट के चक्कर में कई समस्यांओं से दो चार होना पड़ता हैं , जिसके लिए वो किसी महिला डॉक्टर के पास जाना ही ज्यादा अच्छा समझती हैं | कई बार पुरुष डॉक्टर से कहने में झिझक होती हैं  , तो कई बार लगता हैं बता तो दे लेकिन वो समझेगा नहीं , क्योकि उसने सिर्फ पढाई की हैं उसक अनुभव नहीं किया हैं |

                                आप विश्वास नहीं करेंगे लेकिन स्त्रियों की समस्याओं का ऐसा हैं कि लगता हैं कि बिना इसका अनुभव किये डॉक्टर ठीक से समझ ना पायेगा |  कई बार तो समस्याओं के लिए महिला डॉक्टर को ज्यादा बताना भी नहीं पड़ता एक दो लाइन में ही पूरी बात समझ जाती हैं | फिर इन सब को किनारे रखे तो बहुत सी महिलाऐं ऐसी भी हैं जिन्हे  सामान्य शारीरिक जाँच को लेकर भी पुरुष डॉक्टरों के पास जाने में झिझक होती हैं |


                               तो कुल मिला कर बात इतनी हैं कि यदि अपनी आस पास की सभी स्त्रियों का बेहतर स्वास्थ ,  सेहत चाहतें हैं तो ढेर सारी  लड़कियों को डॉक्टर बनाइये | हम जिस समाज में रहतें हैं वहां महिलाए और उनके  परिवार वाले उनके स्वास्थ के प्रति लापरवाह होते हैं |उनकी छोटी , मोटी  बिमारियों , समस्याओं को जितना हो सके टाल दिया जाता हैं |  ये सब तो महिलाओं को होता रहता हैं अपने आप ठीक हो जाएगा , या ये तो हर महीने की समस्या हैं इसके लिए डॉक्टर के पास क्या जाना , थोड़ा बर्दास्त करों कोई बड़ी बात नहीं जैसे जुमले से उन्हें बहला दिया जाता हैं , या महिलाए आस पास कोई महिला डॉक्टर ना होने से झिझक में नहीं जाती या खुल कर नहीं बताती |

                               नतीजा छोटी बीमारिया , समस्यांए बड़ी और विकराल रूप धारण कर लेती हैं और फिर महिलाए को उसके लिए भी कोसा जाता  हैं कि पहले क्यों नहीं दिखाया डॉक्टर को , लापरवाही क्यों किया आदि इत्यादि | कोई ये नहीं सोचता कि हमने खुद पहले ही क्यों नहीं उन्हें ले जा कर दिखाया डॉक्टर को , हमने उसकी समस्याओं को गंभीरता से क्यों नहीं लिया |


December 26, 2019

हाल कैसा हैं जनाब का -----mangopeople

"  क्या कहा डॉक्टर ने "

" कहूँगी तो तुम  विश्वास करने वाले नहीं हो , तो कहने से क्या फायदा "

" ऐसा क्या कह दिया उसने "

" कहा हैं अभी बुढ़ापा नहीं आया हैं तुम्हारा , ये क्या हर समय बुर्के में रहती हो | थोड़े सॉर्ट्स पहनो  , बैकलेस  पहनो , बाहर घूमो फिरो  क्या घर में पड़ी रहती हो | ऐसे घर में रहोगी तो फंगस लग जायेगा  "

" अच्छा डॉक्टर ने ऐसा कहा "

" और क्या ,  उसने तो मुझे सदा सेक्सी रहो का आशीर्वाद भी दिया हैं "

" हो गई तुम्हारी बकवासगिरी "

" बकवासगिरि नहीं हैं ये , फटाफट मेरी गोवा की टिकट कटाओ , वहां जा कर आराम से सनबाथ लूंगी "

" अच्छा समझा , विटामिन डी की कमी हैं "

" मेरे साथ रहते रहते स्मार्ट होते जा रहे हो "

" दवा क्या दी हैं |  देखो जरा गूगल पर किस किस चीज में विटामिन डी मिलता हैं "

" मैंने मना कर दिया उस दवा को और खाने को "

" क्यों "

" क्यों का क्या मतलब , उसे खा कर अपना धरम भ्रष्ट करूँ |  बोला हैं एक ख़ास मछली में ही  विटामिन डी मिलता हैं या तो मछली खाओ या उसका निकला तेल पियों |  बताओ ,  उससे अच्छा तो मैं गोवा जा कर -----"

" तुम्हे धुप ही सेकना हैं ना मै इंतजाम कर देता हूँ | तुम्हारे घर का टिकट कटा देता हूँ तुम्हारा ठंडी का , छत पर जा कर खूब धुप सेकना वहां और छुट्टियां भी मना लेना | एकदम तबियत ठीक हो जाएगी तुम्हारी "

" पता था मुझे मेरी ऐयासिया बर्दास्त ना होंगी तुम्हे , कुछ ना कुछ अड़ंगा लगाओगे ही "


पापा की परी 2 ------mangopeople


बिटिया एकदम छोटी सी थी तो हम सब हर चीज में उनसे जान बुझ कर हार जाते और वो "मैं वीन मैं वीन" कह कर खूब उछलती | थोड़ी बड़ी हुई स्कूल में स्पोर्ट डे आया तो  इन्होने भी उसमे हिस्सा लिया ,  मैंने सोचा इनकी थोड़ी प्रेक्टिस करा दी जाए बाकी बच्चों के साथ |
शाम को पार्क में दूसरे बड़े बच्चों के साथ इनकी प्रेक्टिस में ये तीसरे स्थान पर आई लेकिन मै वीन मैं वीन कह कर फिर ख़ुशी से उछलने लगी | तब मुझे समझ आया कि ये तो जीतने हारने का मतलब ही नहीं जानती |
उन्हें लाख समझाया कि वो तीसरे स्थान पर थी जीत किसी और की हुई , लेकिन वो मानी ही नहीं |
उसके बाद बिटिया के पापा जी को समझाया गया अब  जानबूझ कर मत हारों , इन्हे जीतने हारने का मतलब भी पता चले और हर बार कोई जीत नहीं सकता कभी कभी हारते भी ये भी सीखे |
लेकिन पापा जी कहाँ मानने वाले थे , बोले इतनी छोटी है उसे कुछ भी पता नहीं होगा | उसे तो लगता होगा वही जीत रही हैं मैं कोई जानबूझ कर थोड़े हार रहा हूँ | मैंने तो जानबूझ कर हारना छोड़  दिया उस दिन से , नतीजा ये हुआ की बिटिया मेरे बजाये अपने पापा के साथ ज्यादा खेलती |
एक दिन पापा जी घर पर बिटिया के लिए कोई  सामान लाये , देखा तो वो  बहुत ख़राब क़्वालिटी का था  | खूब गुस्सा आया और गुस्से में उन्हें डांट लगा दी  |  वो कहने लगे सामान रख दो बाद में बदल दूंगा |
मैंने भी चिढ़ाने के लिए बोला तुम सामान रहने दो इस बार तो मैं उसका पापा ही बदलने वाली हूँ , ये पापा एकदम अच्छा नहीं हैं |
ये बात बिटिया भी सुन ली अब उन्हें ये तो पता चला नहीं कि मम्मी  मजाक कर रहीं हैं ,   बोली नहीं मुझे अपना पापा नहीं बदलना हैं | मुझे उनकी इस बात पर हँसी आई लेकिन मैंने उन्हें भी चिढ़ाने के लिए फिर कहा ये पापा कुछ भी ढंग का काम नहीं करता , मैं पक्का ये पापा बदल दूंगी  |
उस पर वो अपने पापा से लिपटते बोली नहीं मेरे पापा बहुत अच्छे हैं |  इतने में मारे ख़ुशी के पापा जी की तो गर्दन ही अकड़ गई , बिटिया से प्यार जताने लगी | लेकिन बिटिया यहीं नहीं रुकी बोली कितने अच्छे हैं मेरे पापा  , हर खेल में मुझे जीताते हैं , वो खुद हर खेल में जानबूझ कर हार जाते हैं | कल पंजा लड़ाने में भी मुझसे हार गए थे , मुझे मेरे पापा ही चाहिए  |
इतना सुनते ही मैं हँस हँस कर लोट पोट हो गई और पापा जी का चेहरा देखने लायक था | हँसी उन्हे  भी आ रही थी लेकिन शायद खुद पर ज्यादा ,कि वो इतने दिनों से ये सोच रहें थे कि बिटिया कुछ नहीं समझती और बिटिया सब समझ कर भी पापा जी का दिल खुश कर रहीं थी |

December 25, 2019

पापा की परी-------mangopeople


पांच साल की बिटिया स्कूल से आते ही ख़ुशी ख़ुशी अपना हाथ दिखाने लगी |
" मम्मी देखो आज मैम ने मुझे हाथ में एक गोल्डन स्टार दिया हैं और दो दो चॉकलेट दिया हैं "
" अरे वाह ऐसा क्या किया हैं "
" मैम ने एक सवाल पूछा था और उसका जवाब लिखना था | मैंने अच्छा सा लिख दिया तो मैम ने वैरी गुड बोल कर कॉपी में भी थ्री स्टार दिया हैं और दो चॉकलेट दिए "

" क्या पूछा था मैम ने "

" पूछा था तुम्हे सबसे अच्छा दिन कौन सा लगता हैं "
इतना बोल वो खेलने में व्यस्त हो गई और मुझे लगा ऐसा क्या जवाब अपने मन से लिखा हैं कि टीचर ने इतनी शाबासी दे दी हैं | कॉपी निकली तो उस पर लिखा था

" मुझे संडे पसंद हैं क्योकि उस दिन पापा घर पर होते हैं और मैं उनके साथ खूब खेलती हूँ "
ना जाने कितने सालों तक मैंने वो कॉपी संभाल कर रखी थी 🥰 

December 24, 2019

बिल्ली रानी बड़ी सयानी ------mangopeople


                                         बात कुछ साल पहले की हैं एक दिन बाहर से घर वापस आई तो दरवाजा खोलते  देखा खिड़की पर एक बिल्ली बैठी हैं | एकबारगी एकदम से  चौक गई बंद दरवाजे से वो अंदर कैसे आई , शायद जंगले से घुसी हैं तो दूसरी मंजिल तक चढ़ी कैसे | इस बात पर और आश्चर्य हुआ कि वो कमरे के अंदर थी , मेरे आने पर खिड़की पर भागी लेकिन वहां से नहीं गई | थोड़ा अजीब सा ख्याल आया लेकिन  उसे आगे बढ़ कर भगा दिया | थोड़ी देर में बिटिया भी स्कूल से आ गई | वो हाल में बैठी थी और अचानक से चीखते हुए रसोई में आई कि मम्मी घर में बिल्ली आ गई हैं | अब तो आश्चर्य का और  ठिकाना नहीं रहा , दुबारा बिल्ली अंदर क्यों आई |

                                        बिल्लियों को लेकर ना जाने कैसे कैसे बुरी बातें कहीं गई हैं , सब एक साथ याद आने लगा | मुंबई के लिए बिल्ली बड़ी आम बात हैं लेकिन खिड़की से दूसरी मंजिल तक इतने सालों में पहली बार आना , बिलकुल भी आम बात नहीं थी | उसे फिर से भगा के खिड़की को बंद कर दिया | थोड़ी देर बाद बिटिया फिर आई बोली बिल्ली की आवाज आ रही हैं | अब तो दिल की धड़कने भी बढ़ गई लगा बिल्ली जा क्यों नहीं रही हैं शायद जंगले पर बैठी हैं | देखा तो वहां नहीं थी लेकिन बहुत धीमे धीमे उसकी आवाज आ रही थी | फिर ध्यान दिया कि  आवाज घर से ही आ रही हैं सब जगह झुक कर कान लगा कर सुनने लगी तो पता चला सोफे के निचे से आ रही हैं | सोफे के गैप से देखा तो दो चमकती आँखे दिखी |
फिर तुरंत समझते देर ना लगा , बिल्ली अपने बच्चे मेरे घर छोड़ गई हैं |

                                     हाथ डाल उसी छोटी जगह से बिल्ली के बच्चों को ऊपर खिंचा , लगा कहीं सोफे को हिलाया तो कोई उसमे दब  ना जाए ,  एक बच्चा तो होगा नहीं | दो निकले फिर अच्छे से जाँच लिया और कोई तो नहीं हैं | बिटिया  तो दो दो बच्चे देख मारे ख़ुशी के चींख ही पड़ी | उनका जन्मदिन आने वाला था और बहुत सालों से वो अपने लिए एक पेट की मांग कर रहीं थी | उन बिल्लियों को देख उन्हें लगा उनकी तो इच्छा ही पूरी हो गई |
                                   सबसे पहले सोचा उनमे से एक जो लगातार बोले जा रहा हैं शायद वो भूखा हैं उसे दूध कैसे पिलाया जाए |घर में एक भी दवा का ड्रॉपर नहीं मिला , फिर रुई भिंगो कर पिलाने का प्रयास किया लेकिन दोनों ने पीने से ही इंकार कर दिया | हमने बिटिया से कहा कि इन्हे इसी कमरे में छोड़ कर दूसरे कमरे में चलो | इनकी मम्मी फिर से आएगी और इन्हे दूध पीला देगी | उपाय काम किया और बिल्ली आ कर अपने बच्चों को दूध पीलाने  लगी | लेकिन उम्मीद के मुताबिक उन्हें ले कर नहीं गई |

                                  फिर अपने गोदाम से जा कर एक गत्ते का बॉक्स ला उसमे पुराना कपड़ा पीछा उनके रहने का इंतजाम किया गया और उसे खिड़की पर रख दिया गया |  दो दिन में ही ये हाल था की हम वही बैठे रहते बिल्ली चुपचाप आती बॉक्स में जाती और आराम से बच्चों को दूध पिलाती उनकी सफाई करती और चली जाती | कितनी बार तो उसके आने का पता ही नहीं चलता , अचानक से टीवी देखते खिड़की को देखती तो वहां उसे आराम से बैठ कर टीवी देखते अपने बच्चों को दूध पीलाते , उसे देख चौक सी जाती मैं  | लेकिन उसे जरा भी फर्क नहीं पड़ता जैसे मैं उस कमरे में हूँ ही नहीं |

                               बिटिया के दिन गुलजार हो गए , पूरी बिल्डिंग में खबर फ़ैल गई और बच्चों के जमवाड़े हमारे घर लगने लगे | दोनों का नामकरण भी हो गया ब्लैकी और व्हाटी |  बच्चों के मार्फ़त बिल्ली की पूरी रिपोर्ट आ गई , बच्चे ढेड़  हफ्ते के हैं , पहली मंजिल वाले फ़्लैट में पैदा हुए थे ,  कुल चार थे लेकिन दो की मौत हो गई बारी बारी , फिर पहली मंजिल के ही दूसरे फ़्लैट में गए  | हमने भी सुन रखा था बिल्ली अपने बच्चों के लिए दस या सात घर बदलती हैं , हमारा तीसरा था |

                               ये  और दस दिन बाद ही हमें अपने घर जाना हैं याद कर बिटिया को ये समझाया  कि भाई ये बच्चे हमेसा के लिए हमारे पास नहीं रहने वाले , इन्हे जाना होगा | जितना खेलना हैं खेलों लेकिन हमेसा साथ रखने का ख्याल मत रखों | हम चले जायेंगे तो  इनका क्या होगा , खिड़की खुली छोड़ कर नहीं जा सकते हैं | कुछ उपाय करके बिल्ली को ले जाने के लिए मजबूर करना होगा |

                               सात दिन आराम से इन दोनों के साथ खेलते निकल गए | फिर हमने सातवे दिन  से बॉक्स को खिड़की के बाहर रख दिया रात में खिड़की का दरवाजा भी बंद कर देतें | बिल्ली वैसे ही रोज आती खिड़की के बाहर  ही बॉक्स में अपने बच्चों की देखभाल करती | उम्मीद थी बिल्ली हमारा इशारा समझ जाएगी और बिल्ली बड़ी समझदार निकली हमारे जाने वाले दिन ही सुबह अपने बच्चों को लेकर चली गई | पहली को ले जाते हमें तो आहाट भी ना लगी , जब दूसरी को ले जाने लगी तब मेरी नजर गई | शुक्र था की उसी दिन मुझे घर जाना था तो बिटिया थोड़ी दुखी तो हुई लेकिन फिर नानी के घर जाने के ख़ुशी में जल्द ही भूल गई |

                              एक पालतू जानवर  के लिए बिटिया आज भी ज़िद  करतीं हैं , हम साफ़ मना कर देतें हैं | हमारे घर कुत्ता , तोता , खरगोश , गाय , बंदर तक पालतू के रूप रह चुके हैं , जानते हैं उनके साथ कितनी जिम्मेदारियां जुडी होती हैं | घर में ला तो कोई भी देता हैं लेकिन उन्हें संभालने का काम सिर्फ मम्मियों को करना पड़ता हैं | उनके ना होने पर जानवर कितने उदास हो जाते हैं , खाना छोड़ देतें हैं | जिम्मेदारी तो दूसरी तरफ रखिये एक तीसरे मोह के बंधन में तो बिलकुल नहीं पड़ना हैं  , पहले के  दो ही काफी हैं |


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अहिंसक आंदोलन , विरोध और गाँधी जी ------mangopeople



1922 में जब गोरखपुर के चौरी चौरा में भारतीयों ने पुलिस चौकी जला कर पुलिस वालों को जला कर मार दिया तो गाँधी जी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया था | उनके अनुसार उनके अहिंसक आंदोलन की शुरुआत हिंसा से हुई इसलिए वो इस आंदोलन की ख़त्म कर रहें हैं |
उनके इस निर्णय से रामप्रसाद बिस्मिल जैसे उनके शिष्यों ने विरोध स्वरुप उनसे खुद को अलग कर लिया और अपना एक गरम आंदोलन शुरू किया | गाँधी जी ने उनका भी कभी समर्थन नहीं किया |
गाँधी जी से बहुत लोग इसलिए भी नाराज होतें हैं आज भी , कि उन्होंने भगतसिंह की फांसी को रोकने का कोई प्रयास नहीं किया | एक अहिंसक आंदोलन चलाने वाले ये ये उम्मीद करना कि किसी हिंसक आंदोलनकारी के बचाव में आएगा , बहुत ही गलत सोच हैं | भगत सिंह को बचाने का कोई भी उनका प्रयास , उनके तरीकों को समर्थन देना होता | फिर हजारों हजार नौजवान भगत  सिंह के उग्र तरीके का अनुसरण करने आगे आ जाते और अहिंसक आंदोलन से भी लोग दूर हो जाते |
हर दमनकारी सरकार बड़ी आसानी से हिंसक आंदोलनों का दमन कर लेती हैं वो ज्यादा लंबा नहीं चलता और ना कभी अपनी मंजिल तक पहुँच पाता हैं |
वो सभी जो आज के समय में देश में चल रहें विरोध प्रदर्शन में हुए हिंसा पर एक लाइन का भी विरोध नहीं करतें हैं और केवल सरकारी दमन की निंदा करतें हैं | उन सभी को गाँधी जी का नाम नहीं लेना चाहिए | अहिंसा को लेकर उनके मानदंड बहुत ऊँचे थे , उनका पालन करना आपके बस का नहीं हैं | इसलिए गाँधी जो को कम से कम इससे दूर रखिये | बाकी आपकी अपनी जो विचारधारा हैं उसे आगे बढ़ाते रहिये |

December 23, 2019

सीखना सिखाना अब बेटों को हैं --------mangopeople


                                          नीचे  अखबार की खबर पढ़िए और उसमे ये सब करने वाले बच्चों की उमर देखिये | मुंबई में देश के सबसे बड़े उद्योगपति के स्कूल में ये सब हुआ हैं | १३ से १४ साल के लड़कों के व्हाट्सएप्प ग्रुप में लडके स्कूल की कुछ लड़कियों का नाम ले कर एक दूसरे से पूछतें हैं क्या तुमने इसके साथ सेक्स किया हैं उसके साथ सेक्स किया हैं | जवाब  ना  में मिलने पर  कहतें हैं चलों इनका गैंग रेप करतें हैं |

                                          इनकी पोल ऐसे खुली कि एक लड़का जो उस समय सो रहा था वो इस बातचीत में शामिल नहीं हुआ | इस पर बाकी लडके उसका नाम लेकर उसे बुलिंग करने लगे,  उसे गे कहने लगे | अगले दिन जब उसने ये सारा चैट देखा तो उसने पूरी चैट उन लड़कियों से शेयर कर दिया जिनका नाम इसमें लिया जा रहा था | फिर उनके माता पिता ने स्कूल में जा कर शिकायत की और सभी नौ लड़कों को  ( पोल खोलने वाले लड़के को छोड़ कर ) सस्पेंड कर दिया और मामले को वार्षिक समारोह तक के लिए ताल दिया गया |

                                        आई बी स्कूल हैं के ये बच्चे किसी गरीब बस्ती के गरीब , संस्कारहीन  घरों से नहीं आ रहें हैं बल्कि सब के सब मुंबई के  अमीर और पढ़े लिखे के घरों से हैं | इनके माँ बाप की समाज में खूब प्रतिष्ठा हैं और सभी उन्हें जानते हैं | एक सस्पेंड लड़का एक पुराने फिल्मअभिनेता का नाती हैं जिनका राजनीति में भी काफी नाम था और आजकल उनकी बेटी राजनीति  की  विरासत को आगे बढ़ा रही हैं |
आप जानकार आश्चर्य करेंगे कि एक लड़की उसी लडके के मामा की दूसरी पत्नी ( उनसे भी तलाक हो )  दूसरे पति जो एक नामी खिलाड़ी हैं की बेटी हैं |

                                       एक लड़की देश के बहुत बड़े उद्योगपति जो अक्सर आपको पेजथ्री पार्टी में भी नजर आतें हैं , अक्सर उनका ही सरनेम फिल्मो सीरियल में अमीरों के लिए होता है , की बेटी हैं |
एक लड़की के  माता पिता मशहूर मॉडल रह चुके हैं और पिता एक फिल्म स्टार हैं जिनका अभी हाल में ही तलाक हुआ हैं |

                                      चुकी लड़कियां भी बड़े घरों से थी तो कोई दबा नहीं और तुरंत स्कूल में शिकायत की गई | लेकिन नतीजा क्या निकला वही जो आम से स्कूल ऐसे मामलों में करतें हैं , खबर को दबाना , लड़कों को सिर्फ सस्पेंड करना , मामले को किसी ना किसी बहाने आगे के लिए टाल  देना |
लड़कों के माँ बाप का रवैया तो और भी चौकाता हैं |  वो कहतें हैं ये तो लड़कों की चुहलबाजी मजाक था , इसे ऐसे गंभीरता से क्यों लिया जा रहा हैं | लडके तो ऐसा बोलतें ही हैं कि चलो ये करतें हैं चालों वो करतें हैं , पर उनका वो मतलब नहीं होता हैं |

                                     पूरी खबर पढ़ने के बाद आप को कहीं से भी ये नहीं लगेगा  कि ये सब समाज के संभ्रात पढ़े लिखे लोगों के बीच की बात हैं | स्कूल का , या लड़कों के माँ बाप किसी का भी रवैया  वैसा ही हैं जैसे की किसी अन्य भारतीय माध्यम या निम्न घरों के लोगों का होता | लडको को लडके होने के नाम पर कुछ भी करने की आजादी देने वाल |

                                     लड़कियां भी वही आम लड़कियों जैसी ही हैं सबके सब डरी हुई हैं और स्कूल जाने से डर   रही हैं | खबर अखबार में इसलिए आ गई क्योकि लड़कियों  के माता पिता सेलेब्रेटी हैं और पत्रकारों से जुड़े हैं | मन तो ये भी जा रहा हैं कि ये खबर दो हफ्ते बाद जानबूझ कर तब लिक किया गया जब वार्षिक समारोह होने वाला था | ताकि स्कूल पर कोई दबाव पड़े उन लड़कों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही करने के  लिए |

                                हे प्रभु ,  इस देश में लड़कियां कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं , क्योकि लड़कों की मानसिकता ये समाज सुधारना ही नहीं चाहता हैं |

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December 19, 2019

छेड़ों ना मेरी जुल्फे ------mangopeople


देखिये मैं टीवी दस फिट दूर से देखतीं हूँ | पहले उसी जगह से टीवी पर मैच देखते समय रन विकेट और ओवर तीनों अच्छे दिखता था | लेकिन अब रन और विकेट तो दिखता हैं लेकिन ओवर थोड़ा छोटा लिखा होता हैं वो ठीक से नहीं दिखता हैं |

दो साल पहले ये सुन कर मेरी आँखों की जाँच करने के लिए खड़ा लड़का थोड़ी देर तक मुझे देखता रहा |  शायद जिंदगी में किसी ने ऐसी समस्या अपनी आँखों  की रोशनी के लिए नहीं बोला होगा | फिर पूछता हैं और क्या नहीं दिखता और क्या समस्या हैं | हमने कहा और कुछ नहीं हैं बसओवर नहीं दिखता |

बन्दे ने अपने सभी लेंस लगा कर जाँच लिया बोला नंबर तो नहीं दिख रहा हैं लेकिन आपकी जीतनी उम्र हैं उसमे नजदीक का चश्मा लगाना शुरू कर देना चाहिए | हमने कहा हमें समस्या हैं कि हमें दूर से नहीं दिख रहा हैं और आप हमें नजदीक का चश्मा लगाने का राय दे रहें हैं , आप जाने ही दे |

अपनी आँखों की जवानी पर इतराते चश्मिश पतिदेव को चिढ़ाते  बाहर निकली ही थी कि ऊँची ऊँची सीढ़ियों ने किनारे लगे रेलिंग को पकड़ने पर मजबूर कर दिया | पतिदेव धाड़ धाड़ निचे उतरे और मुड़ कर मुझे ऊपर ही खड़ा देख मुस्कराएं , आधा खून तो उनके इस मुस्कान पर ही जल गया , फिर बोलते  हैं आज की डेट में उतर जाओगी या कल आऊं |

दो साल हो गए आज भी ओवर ना दिखता तो मोबाईल पर स्कोर लगा कर देख लेती हूँ कितने ओवर और कितने बॉल हुए |


December 18, 2019

विरोध को धार्मिक रंग ना दे ------mangopeople


                                          नागरिकता कानून के खिलाफ और समर्थन में  कुल मिला कर साठ याचिका दायर हुआ हैं कोर्ट में | आज  बीस पर सुनवाई होने वाली हैं | कानून के खिलाफ और समर्थन में याचिका लगाने वाले  वकीलों का टीवी पर इंटरव्यू देख रही थी | विरोध करने वाला ये जवाब नहीं दे पा रहा था कि इससे भारतीय नागरिकों पर क्या प्रभाव पडेगा | वो जवाब में बार बार NRC की बात करने लग रहा था और एंकर उसे टोक रहा था कि वो कानून तो अभी आया ही नहीं आपने तो याचिका नागरिकता  संशोधन पर लगाया हैं उसकी बात कीजिये | लेकिन उसके पास इसका कोई जवाब नहीं था वो फिर NRC पर आ जाता और मुस्लिमों की लीचिंग पर चला गया  |

                                         सोचिये कानून के खिलाफ याचिका लगाने वाले के पास एक मामूली से एंकर के सवालों का कोई वाजिब जवाब नहीं था वो कोर्ट में जा कर वह क्या और किस तरह की  दलील रखेगा | वहां तो बड़े बड़े धुरंधर कानून के जानकार होंगे और उनके पास भारी भारी सवाल , उनका जवाब वो क्या दे पायेगा | नतीजा उसकी याचिका ही ख़ारिज हो जाएगी और इस पर  लोग कहेंगे कि कोर्ट और जज सरकार की भाषा बोलती हैं लोगों की नहीं सुनती |

                                         क्या इस तरह की तैयारियों के साथ किसी को कोर्ट में जाना चाहिए | ऐसे लोग तो आम लोगो का भरोषा न्यायलय से भी ख़त्म कर देंगे | एक आम गृहणी होने के बाद भी मैं बता सकती हूँ कि उसको इसका  सीधा सा जवाब ये देना चाहिए था कि  ये याचिका किसी वर्ग विशेष को बचाने के लिए नहीं हैं , मैंने ये याचिका देश के संविधान को बचाने के लिए लगाया हैं | उसके धर्मनिर्पेक्षता  के मूल सोच को बचाने के लिए लगाया हैं | मैं यंहा मुस्लिमो की पैरोकारी करने नहीं आया हूँ मैं यहां संविधान की पैरवी करने आया हूँ |

                                          लेकिन वो ये नहीं बोल पायेगा क्योकि ऐसी उसकी ये सोच ही नहीं हैं , क्योकि विरोध को समर्थन देने वालों में से ज्यादातर की ये सोच नहीं हैं | ज्यादातर सरकार के खिलाफ खड़े लोग बस मुस्लिम के नाम पर इसका समर्थन कर रहें हैं , उनके कंधे पर रख अपने विरोध की बन्दुक चला रहें हैं | किसी को संविधान से मतलब नहीं हैं और ना ही इस बात से फर्क पड़ता हैं कि ये कानून कहीं से भी भारत के किसी नागरिक को प्रभावित नहीं करता हैं और ना ही इस बात से फर्क पड़  रहा हैं कि वो विरोध के नाम पर दूसरी तरफ के लोगों के घार्मिक ध्रुवीकरण के एजेंडे को वह पूरी ताकत से सफल बना रहें हैं | सिर्फ मुस्लिमो की बात कर इस विरोध को पूरी तरह से धार्मिक रंग में रंग चुके हैं |

December 16, 2019

जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध ------mangopeople


जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध ।
                               
                               हे कविवर जो तटस्थ हैं वो देख पा रहें हैं कि ये युद्ध सत्ता की हैं जिसमे आम जन बस मोहरे से ज्यादा कुछ नहीं हैं | वो सत्ताधारी और सत्ता के लालची हैं जो किसी युद्ध , आंदोलन को धर्म युद्ध , जन आंदोलन नाम दे कर उसमे आम जन को आहुति देने का आवाहन करतें हैं और स्वयं बाद को सत्ता का भोग करते हैं उसके करीब पहुंचते हैं | आम जनता पहले भी खाली हाथ होती हैं और ऐसे हर आंदोलन , युद्धों के बाद भी | हां ये जरूर होता हैं कि कई बार उसके पास जो हैं वो भी चला जाता हैं |
                               
                              ज्यादा समय नहीं हुआ जब हमने भी एक बार, एक बड़ी भ्रष्टाचार के खिलाफ चली मुहीम में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया था | देश बदलने के लिए चली इतनी बड़ी अहिंसक मुहीम जो आजादी की लड़ाई सी रह रह कर मुझे प्रतीत होती थी , जिसे जन आंदोलन नाम दिया गया था | आज उस आंदोलन का क्या परिणाम निकला , केंद्र में सत्ता परिवर्तन हो गया और आंदोलन चलाने वाले बड़े नाम सत्ता पर काबिज हो गए | आज उन्हीं को भ्रष्टाचार करते और वो सब करते अपने आँखों से देख रहें हैं जिनके खिलाफ उन्होंने आंदोलन छेड़ा था |
                               
                              उस आंदोलन में हिस्सा लेने पर मेरे पापा हँसे थे , क्योकि परिणाम उन्हें  पहले ही पता था | एक ज़माने में उन्होंने जेपी आंदोजन में भाग लिया था और उसका अंत भी महज सत्ता परिवर्तन और कुछ लोगों के सत्ता में आने से ज्यादा कुछ नहीं हुआ था | व्यवस्था कभी नहीं बदली और ना ही आम लोगों की समस्याएं | क्योकि ये सभी आंदोलन का आरंभ , जनता में बैठे असंतोष का प्रयोग लोगों ने अपने स्वार्थ के लिए सत्ता पाने के लिए किया था और वो अपने अभियान में सफल रहें और आहुति देने वाली जनता ठगी गई |
                             
                             कुछ लोग इसे छात्र आंदोलन बता कर इसमें सभी को साथ देने का आह्वान कर रहें हैं , वो अलग बात हैं कि सोशल मिडिया पर बैठ कर क्रांति करने के सिवा वो खुद भी कुछ नहीं कर रहें हैं | सवाल किया जाए क्या हर छात्र आंदोलन समर्थन के लायक होता हैं | एक छात्र अंदोलन 90 के दसक में भी हुआ था बड़ी संख्या में छात्रों ने उसमे हिस्सा लिया और बस ट्रेन को जलाने की जगह खुद को जलाना शुरू कर दिया था | आज जो इस छात्र आंदोलन को समर्थन दे रहें हैं वो उस छात्र आंदोलन के खिलाफ बोलेंगे और जो आज जो इस अंदोलन का विरोध कर रहें हैं वो उस आंदोलन का समर्थन करने आगे आ जायेंगे |

                              आज जिन्हे छात्र मासूम , सही लग रहें हैं वो ९० के छात्रों को जातिवादी , बरगलाये , भड़काए गए घोषित कर देंगे जो एक वर्ग विशेष से थे | उनका आंदोलन जन आंदोलन भी नहीं लगेगा और ना ही समाज के हित में , जबकि उस समय के कानून से छात्र सीधे प्रभावित हो रहें थे | वही आज के आंदोलन का विरोध करने वालों को आज के छात्र भड़काए हुए और वर्ग विशेष के नजर आएंगे |

                               मुझे तो अभी तक समझ नहीं आ रहा कि CAA से भारत के किसी भी नागरिक ( पूर्वोत्तर को छोड़ कर ) पर इसका क्या दुष्प्रभाव पडेगा | छात्रों का साथ किस बात के लिए दिया जाए कि पाकिस्तान बंगलादेश और अफगानिस्तान में मुस्लिमों पर अत्याचार हो रहा हैं , वो भाग कर भारत आ रहें हैं और भारत सरकार उन्हें नागरिकता नहीं दे रही हैं | क्या दूसरे देश के काल्पनिक पीड़ित नागरिकों के लिए हम अपने घर में हिंसा करे ट्रेने ,बसों को जलाएं | जबकि उनका देश ये भी मानने को तैयार नहीं हैं कि उनके यहां किसी का भी उत्पीड़न हो रहा हैं |

                               जिस दिल्ली में जेएनयू के छात्रों ने इतनी बार आंदोलन किया , पुलिस से झड़प हुई , लाठी खाया लेकिन ना कोई पत्थरबाजी हुई और ना ही अंदोलन कभी इतना हिंसक हुआ | उसी दिल्ली के जामिया के अंदोलन में वो कौन लोग थे जो मुंह ढक कर पुलिस पर पत्थर बरसा रहें थे , (छात्र कब से मुंह ढक कर आंदोलन करने लगे ) , आआप के नेता अपने समर्थकों के साथ क्यों किसी छात्र आंदोलन में भाग लेने आये और क्यों उसी दिन आंदोलन हिंसक हो गया |

                             कुल मिला कर कानून लागु करने वाले मोटा भाई लोग (नया नाम रंगा बिल्ला हो गया हैं 😂😂 ) हो या उसका विरोध करने वाले दूसरे राजनितिक लोग दोनों सत्ता की राजनीति कर रहें हैं और आम लोगों , समुदाय का ध्रुवीकरण करने में लगे हैं | ये कोई छात्र आंदोलन नहीं हैं और ना ही इसका भारत के आम लोगों से कोई संबंध हैं | इसलिए कविवर हम तो ना इसका समर्थन करेंगे और ना ही विरोध , तटस्थ रह कर सिर्फ सबकी राजनीति देखेंगे और देखेगें की अब सोशल मिडिया ने आम लोगों को भी कितना बड़ा राजनीतिज्ञ बना दिया हैं जो यहां बैठे बैठे सिर्फ अपनी सोच और विचारधारा के अनुसार छात्रों को उकसा रहें हैं फर्जी खबरे वीडियों लगा कर अफवाहें फैला रहें हैं |

                             मेरी माने तो छात्र दूसरों के हाथ का मोहरा बनने की जगह अपनी ऊर्जा बचा कर रखें अभी उन्हें एक बड़ी लड़ाई में आगे आना हैं जिसमे आम लोग भी उनका साथ देंगे वो हैं NRC | पर याद रखियेगा उसमे भी हिन्दू मुस्लिम मत कीजियेगा उससे सभी को परेशानी होने वाली हैं | गरीब सिर्फ मुस्लिम नहीं होता गरीब धर्म जाति से ऊपर होता हैं उसकी बात कीजियेगा , ना की फिर मुस्लिम गरीब को परेशानी होगी तो मैं अपना धर्म बदल मुस्लिम होने जा रहन हूँ कहने वाले स्वार्थी लोगों की बातों में ना आ जाना |

अच्छाइयों , खुशियों के जीवन में आगमन पर रोक नहीं ---mangopeople


                                 कभी कभी बहुत सारी अच्छी चीजों के साथ एक आध बुरी , ख़राब चींजों को भी अपनाना पड़ता हैं , परेशानियां झेलनी पड़ती हैं | सोशल मिडिया पर सबने अपने अपने बाग़ बगीचों की सुंदर सुंदर फोटो लगा लगा इतना जी कराया कि  कबूतरखाने में रहने वाले हमको भी , हार कर एंटी से पैसे ढीले कर अपनी बगिया भी सवारने का मन हो गया , जो विकास की भेट चढ़ चूका था | मोनो रेल की पटरियों ने हमारी बगिया तक आने वाले सूरज का रास्ता रोक दिया था | तो हमने भी अपनी बगिया और आगे बढ़ा लिया |

                               हमारी बगिया के रास्ते  घर में मोटे मोटे चूहों का भी आगमन हो जाता था रात में , तो कभी पौधे जड़ से कुतर जाते सब | अब जब पैसा खर्च हो रहा था तो जंगले में चूहे रोकने वाली जाली लगाने का विकल्प था | दिल सोच में पड़ गया चूहे तो रुक जायेंगे लेकिन उसके साथ ही बगिया में आने वाली तितलियों , भौरों , गौरैय्या , हनी बर्ड , कौआ , कबूतरों जैसे पंक्षियों आदि का रास्ता भी रुक जायेगा |
तय हुआ भला एक परेशानी के लिए इतने सारी अच्छाइयों का रास्ता क्यों रोका जाए | उस एक परेशानी के लिए कुछ और उपाय कर लिया जाएगा और चूहे की जाली कैंसिल कर दी गई | अब इन पुराने रहिवासियों का घर बदला था तो उनके आने में भी देर हो रही हैं | लेकिन धीरे धीरे सब अपने पुराने ठिकाने लौट रहें हैं | गौरैय्या के लिए घर बना दिया गया , एक घर केरल से भी खरीद कर लाया गया |

                                नए फूल लगा दिए गए , कुछ जड़ जमा लिए तो कुछ नहीं जमा पाए तो  कुछ को समय लग रहा हैं | कुछ बीमार हो गए थे अनदेखा करने से उनका ईलाज हो रहा हैं | इतने के बाद अब और सवारने का काम रोक दिया गया हैं |

                               सूरज अपनी दिशा बदलने वाला हैं , उसका भी इंतजार कर ले , उसके बाद देखतें हैं कि हमारी बगिया में  उनकी पहुँच कहा तक होगी | उसके हिसाब से फिर और फूल पौधों का आगमन होगा |कुछ धुप वाले फूल आएंगे तो कुछ छांव वाले पौधे जिनमे सिर्फ हरियाली होगी शायद फूल नहीं | फूल की जगह हरियाली से ही संतोष करेंगे |

                               जीवन में सब कुछ अपनी इच्छा और मन का होता ही कहाँ हैं |  कुछ अच्छाइयों के लिए कुछ बुराइयां परेशानियां , कुछ मन से इतर बर्दास्त करनी ही पड़ता  हैं | या तो उन्हें ख़ुशी ख़ुशी स्वीकार कर लीजिये , बर्दास्त कीजिये या उनके लिए कुछ और उपाय कीजिये |  लेकिन उनके चक्कर में हमें अच्छाइयों , खुशियों के जीवन में आगमन पर रोक नहीं लगानी चाहिए |

#सालीजिंदगी