Showing posts with label माफ़ी. Show all posts
Showing posts with label माफ़ी. Show all posts

July 13, 2012

गुवाहाटी मामले में पहले लड़की की असलियत जानिए फिर लड़को को कुछ कहिये - - - - -mangopeople

                                                                                          

                                                    गुवाहाटी में एक लड़की के साथ  क्या क्या हुआ सब ने देखा मुझे उसका विवरण देने की आवश्यकता नहीं है | बहुत से लोग जुबानी खर्च में लगे है कह रहे है की ऐसा करने वालो को कड़ी सजा होनी चाहिए आदि आदि किन्तु बिना सच्चाई को जाने जिसके मुंह में जो आये जा रहा है वो बके जा रहा है  | कितने है जो असलियत को जानते है शायद ही कोई हो,  मेरी ही तरह कईयो के मन में ये विचार आ रहे होंगे किन्तु बेचारे लोगो के डर से नहीं कह पा रहे है (बस अभी के लिए जब तक उस लड़की के प्रति लोगो के बेमतलब की सहानभूति उफान पर है) जब ये उफान ख़त्म होगा तो मेरी तरह कई विद्वान् लोग ये सवाल कर रहे होंगे |
                                                                          सबसे पहले सवाल ये है कि ये बताइये आप सब ने वीडियो में देखा होगा की ये रात की घटना है सोचिये की इतनी रात को कोई भले घर की लड़की घर से बाहर निकलती है और निकली भी तो क्या घर से अकेली निकलती है या कभी भी किसी "बार"  के आस पास नजर आती है,  बिलकुल भी नहीं किसी भी भले घर की लड़की जो अभी मात्र ११वि में पढ़ रही है ( मिडिया रिपोर्ट के अनुसार ) इनमे से ऐसा कोई भी काम नहीं करती है | फिर आप लोगो ने उसके कपडे देखे,  उसने किस तरह "बदन दिखाऊ", " भड़काऊ "  आधुनिक कपडे पहन रखे थे जो सीधे सीधे लड़को को आमंत्रित करने के लिए काफी थे | अब आप सोचिये की इस तरह के आधुनिक कपडे पहने रात में अकेली कोई लड़की किस दारू बार के पास जाएगी तो उसके साथ ये नहीं होगा तो और क्या होगा,  वो लड़की इसी के लायक थी , संभव तो ये भी है की उसने ही लड़को को ये सब करने के लिए उकसाया होगा वरना लड़को को क्या पड़ी थी की उससे छेड़खानी या मारपीट करने की | वीडियो को ध्यान से सुनिए उसमे हमारी संस्कृति हमारी परंपरा की रक्षा करने वाले लोग है जो लड़की से पूछ रहे है की  तुने शराब पी है , बोल शराब पीयेगी , बार में जाएगी , मतलब साफ है की लड़की ने शराब पी रखी है ( जब वो लडके पूछ रहे है तो जरुर पी रखी होगी वो बेमतलब का ये बात तो पूछेंगे नहीं ) अब सोचिये की कोई  अच्छी सभ्य लड़की कभी भी शराब पीयेगी या किसी बार में जाएगी,   पर क्या है की आज कल की लड़कियों को बराबरी के नाम पर पुरुषो की तरह ही शराब पीने बार , पब में जाने की आदत लग गई है तो ऐसी परम्पराव के खिलाफ जाने वाली हमारी महान संस्कृति को बदनाम करने वाली लड़कियों के साथ ऐसा ही होना चाहिए ताकि उन्हें सबक मिले की उन्हें ऐसा करने का अधिकार नहीं है ये सब बस पुरुषो के करने का काम है वो इसे नहीं कर सकती है | याद होगा कुछ साल पहले दिल्ली में भी इसी तरह एक महिला को सरेआम खूब पिटा गया था उसके ही मोहल्ले वालो ने क्योकि उसने अपने मकान मालिक पर बलात्कार का आरोप लगाया था और बाद में एक दिन सभी समाज के ठेकेदारों ने  मिल कर उस महिला को भी अच्छे से सबक सिखाया था सब ने कहा की महिला ने शराब पी रखी थी और महिलाओ का शराब पीना जुर्म है तो इस जुर्म की सब ने मिला कर खूब सबक सिखाया,  | कुछ समय पहले हिन्दू धर्म के ठेकेदारों ने भी बंगलोर में भी इसी तरह पब  में गई लड़कियों को ऐसे ही सबक सिखाया था हम सब ने देखा था | इस तरह की हर घटना के बाद लोग जुबानी जमा खर्च शुरू कर देते है चिल्ल पो करते है और फिर शांत हो जाते है पर इन चिल्ला पो मचने वालो को हमरी परम्परा संस्कृति की जरा भी चिंता नहीं है | जब तक लड़किया ठीक से सबक न सिखा ले उनके साथ ऐसा ही किया जाता रहना चाहिए |
                                                 ये भी संभव है की वो लडके लड़की के लिए अनजान हो ही नहीं मतलब की अभी कुछ समय पहले की घटना है अपने मित्रो के साथ जन्मदिन की पार्टी में गई लड़की के साथ उसके दोस्तों ने ही उसे शराब पिला कर बलात्कार किया था बाद में हमारी महानी खोजी पुलिस ने पता लगाया था असल में वो लड़की एक वेश्या थी भला कोई सभ्य  घर की  लड़की लड़को के साथ अकेले जा कर पार्टी करती  है या शराब पीती है या  लड़को को मित्र बनाती  है , असल में लड़की  और लड़को के साथ पैसे के लिए झगडा हुआ था और कोई बात नहीं हुई थी और इस तरह के धंधा करने वालो के साथ भी कोई बलात्कार होता है | संभव है की इस मामले में भी लड़की ही चरित्रहिन हो और लड़को को फ़साने का प्रयास किया हो और कामयाब नहीं हो पाई या उसने पैसे की ज्यादा मांग की हो या लड़को पर  इल्जाम लगाने लगी हो और तब उसे मात्र सबक सिखाने के लिए लड़को ने उसे दो चार हाथ मार दिया हो जिसे बढ़ा चढ़ा कर दिखाया जा रह है | कुछ समय पहले एक टीवी चैनल पर पुलिस वालो ने देश में हो रही सारी बलात्कार और छेड़ छड की घटनाओ की असलियत सभी को बताई थी की कोई भी सभ्य महिला या लड़की कभी भी अपने साथ हुए बलात्कार या छेड़छाड़ की रिपोर्ट पुलिस स्टेशन में लिखवाने नहीं आती है अरे भाई वो तो अपने इज्जत को यु सरे आम क्यों ख़राब करेगी वो तो सब छुपा कर घर में बैठ जाती है , जो भी इस तरह की घटनाओ की रिपोर्ट लिखाने पुलिस स्टेशन में आती है वो सभी अच्छे और सभ्य घरो की नहीं होती है उन्हें रिपोर्ट लिखवाने से फायदा होता है तभी आती है , वो मर्दों को फंसा कर पैसा ऐठना चाहती है इसलिए ही पुलिस के पास आती है | सोचिये कितना बड़ा सच उजागर किया था पुलिस ने और लोग है की इस तरह की घटनाओ पर लगते है लड़की के प्रति सहानभूति जताने और पुरुषो को गाली देने | लोगो की आदत है की बिना सोचे वो भावनाओ में बहने लगते है और कुछ भी कहने लगते है | अब जैसे बागपत की पंचायत ने एक सही और महान फैसला लिया है की अब उस गांव से कोई भी ४० वर्ष तक की महिला बाजार नहीं जाएगी , मोबाईल नहीं रखेगी सोचिये की यदि ये फैसला पहले ही सारे देश में लागु हो जाती तो कितना अच्छा होता तब तो ये घटना होती ही नहीं महिलाए अपने अपने घरो में सुरक्षित होती | जिस तरह चोर डाकू से बचा कर आप अपनी संपत्ति तिजोरी में रखते है उसी तरह लड़किया भी घर के पुरुषो की इज्जत है उसे बचाने के लिए पुरुषो को अपने अपने घरो की महिलाओ को घरो में ताला बंद कर रखना चाहिए | कुछ लोग हर बात में पुरुषो को गाली देने लगते है उन्हें भला बुरा कहते है किन्तु वो ये नहीं समझ पाते है की किसी स्त्री के प्रति किसी पुरुष का आकर्षित होना प्राकृतिक क्रिया है बनाने वाले ने ही उनके अन्दर ऐसा कैमिकल लोचा किया है की वो महिला के प्रति आकर्षित होंगे ही उसमे उनका कोई भी दोष नहीं है,  यदि मौका हो ,उद्दीपन हो, भड़काऊ तत्व हो तो कई "सभ्य" के दिलों में धड़कता पुरुष जानवर पैजामे से बाहर आएगा ही 
इसलिए मै तो कहती हूँ की लड़कियों को घरो में नहीं बल्कि घर के एक कमरे में बंद रखना चाहिए ताकि उन पर उनके भाइयो पिता चाचा मामा फूफा किसी भी पुरुष की नजर ना पड़े क्योकि प्राकृतिक नियम के अनुसार स्त्री को देखते ही पुरुषो के मन में उनके शिकार की भावना जगा जाएगी क्योकि बाहर तो उन्हें देखने तक के लिए लड़किया नहीं मिलेगी और घर में रह रही लड़किया भी तो स्त्री लिंग ही है ना  इसलिए अच्छा है की उन्हें सभी पुरुषो से दूर कमरों में बंद रखा जाये |  किन्तु लोग समझते नहीं है और पंचायतो के फैसलों को  भी बुरा कहने लगते है अब क्या जवाब है उनके पास , क्या अब भी आप को लगता है की पंचायत ने कोई गलत फैसला किया है | लोग नाहक इमोशनल होते है असल में तो ये घटना इस लायक है ही नहीं की इस पर चर्चा भी की जाये किन्तु "चर्चाए" हो रही है क्योकि  इन सब के लिए  पुलिस व्यवस्था जलील पत्रकार जिम्मेदार हैं और इसे मिठाई बनाकर प्रस्तुत करने वाले लोग |
                                                                   
चलिए यदि आखिर में हम मान भी ले की ठीक है लड़को ने जवानी को जोश में भड़काने के करण कुछ मारपीट कर दिया या लड़की को छू दिया ( अब लड़की को इतना भी छुई मुई होने की क्या जरुरत है ) तो क्या उन्हें आप मार ही डालेंगे क्या, कुछ लोग बार बार कड़ी सजा की पैरवी करते है,  किन्तु ये सही नहीं है हिंसा कभी भी किसी भी मर्ज का इलाज नहीं होता है हिंसा गलत बात है हर किसी को सुधरने का एक मौका तो मिलना ही चाहिए,  ना की उनको सजा दे कर उनका जीवन बर्बाद करना चाहिए | इन सभी लड़को को सुधरने का मौका देते हुए हम सभी को इन्हें माफ़ कर देना चाहिए ये बच्चे है और इन्होने "मात्र " "छोटी " सी "मुर्खता" की है जिसकी सजा की कोई जरुरत नहीं है माफ़ी बड़ी जीज है ये जरुर इन की पहली गलती होगी सौवी भी हो तो क्या आखिर गलती तो इन्सान से ही होती है याद रखिये माफ़ी देने वाला बड़ा होता है और उस लड़की से भी उम्मीद करती हूँ की वो अपने साथ हुए "छोटी मोटी" घटना को भूल कर उसे माफ़ कर देगी |
                                      जारी ..................................................

                                                                                   कुछ समय पहले रचना जी ने बताया था कि  सटायर को ब्लैक ह्यूमर भी कहा जाता है । पर अपनी पोस्ट को ये नाम देते डर लगा कही कालापन मुझ पर अपने अपमान का मुक़दमा न कर दे और रही बात ह्यूमर की तो हा ये हो सकता है तभी तो वो लडके लड़की के साथ ऐसा करते हँस रहे थे | वो करते हँस रहे थे आप पढ़ कर हँस लीजिये हमें तो नहीं आई ............


July 04, 2012

पीड़ित कौन और मांफी देने वाला कौन - - - - mangopeople

                                                                   
                                                                मुद्दे को ठीक से समझने के लिए उसे एक कहानी किस्से की तरह सुनाती हूँ, मान लीजिये की एक गांव क़स्बा शहर जैसा कुछ है, जहा सब एक दूसरे को जानते है जैसे की अपना ब्लॉग जगत है, कुछ वैसा ही, वहा कई तरह के लोग है ,उनमे एक ऐसा भी व्यक्ति है जिसकी आदत है चर्चा में बने रहने के लिए कुछ भी करने की,  सब उसकी बाते करे उसे देखे उसके लिए वो कुछ भी करता है , तो कभी बस अपने  आन्नद के लिए,  महिलाए उसके निशाने पर ज्यादा रहती है महिलाए के लिए अपने घर की छत पर चढ़ कर अश्लील टिप्पणिया करना उसके सबसे प्रमुख आदतों में एक थी , ये सबसे आसान तरीका है चर्चा में आने के लिए और मजे लेने के लिए तैयार कुछ लोगो को अपने पास बुलाने के लिए | कुछ लोगो को गलतफहमी थी की वो बड़े आदमी है ( अभी हाल में ही ननद की बेटी की शादी थी, गाने वाले लडके की तरफ किसी ने इशारा कर कहा बहुत बड़ा सिंगर है,  मैंने कहा वो आर्केस्ट्रा वाला,  तो उन्होंने कहा की अरे नहीं भाई टीवी पर एक प्रतियोगिता में आया था बड़ा सिंगर है,  मैंने कहा काहे का बड़ा आज भी शादियों के आर्केस्ट्रा में गा बजा रह है, तो जबाब मिला आर्केस्ट्रा मत कहिये बैंड  है | मतलब टीवी पर आने के बाद आदमी बड़ा हो जाता है और आर्केस्ट्रा बैंड बन जाता है ) कुछ एक लोग बड़ा आदमी है के कारण उन्हें कुछ कहते नहीं थे कुछ अपने मतलब के लिए उन्हें समय समय पर उकसा कर मजे लिया करते थे ( कई बार लोग खुद कई गिरी हुई हरकते नहीं कर पाते है तो ऐसे लोगो को सहारा लेते है अपना दामन भी साफ और खुद की खुन्नस भी निकल गई ) सालो तक उनकी यही हरकते रही लोगो को व्यक्तिगत टिप्पणी  करना उल जुलूल हरकते करना आदि आदि | एक दिन उनको ये एहसास  हुआ की इन हरकतों के कारण वो बड़े आदमी बस माने जाते है कुछ लोगो के लिए,  किन्तु उन्हें वो सम्मान नहीं मिलता है कोई पुरुस्कार नहीं मिलता है उनकी हरकते बीच में आ जाती है , तो उन्होंने सोच लिया की अब से वो ये सारी हरकते बंद कर देंगे ताकि उन्हें वो सब मिल सके और उन्होंने अपने घर की छत पर चढ़ चिल्लाना शुरू किया की पिछले किये की माफ़ी मांगता हूँ आगे से ऐसी कोई हरकत नहीं करूँगा सब लोग मांफ कर दे | उनका ऐसा कहना था की अचानक से उस समाज  ,जगत के बहुत से  विद्वान् बुद्धिजीवी और आम लोग  निकल कर बाहर आ गये और लगे उन्हें माफ़ करने,  उनकी माफ़ी की सराहना करने और ये बताने की उन्होंने माफ़ी मांग कर कितना बड़ा काम किया है अब तो वो महान लोगो में शामिल हो गये सब ने मिल कर उन्हें माफ़ कर दिया | किन्तु वो बेचारे सब बिलकुल आश्चर्य में पड़ गये जिनको उन्होंने सारा जीवन व्यक्तिगत टिप्पणिया की उन्हें परेसान किया महिलाओ से अश्लील बाते की , वो सोच में पड़ गये की इस व्यक्ति ने अपराध तो हमारे खिलाफ किया है तो ये माफ़ी देने वाले ये कौन लोग है , माफ़ी मांगने वाले ने तो इनके खिलाफ कोई अपराध किया ही नहीं है तो ये माफ़ी क्यों दे रहे है और ये बात भी समझ नहीं आती है जब अपराध करने वाले ने कुछ व्यक्ति विशेष लोगो के खिलाफ परोक्ष और अपरोक्ष रूप से अपराध किया है तो उसे माफ़ी उनसे मांगनी चाहिए या पूरे उस समाज से | बेचारे इस सोच में अपने सर के बाल नोच रहे थे और सोच रहे थे की आज वही लोग उस अपराधी को माफ़ी दे रहे है जो कभी भी अपराध के होते समय उसका विरोध करने नहीं आये आज अचानक से एक अपराधी को माफ़ करने कैसे चले आये |
                                                           
                                                            
                                                                         अब मुद्दा क्या है,  नहीं वो व्यक्ति या उनका व्यवहार मुद्दा नहीं है ( ऐसे लोग तो ध्यान देने के लायक भी नहीं होते है ) मुद्दा है अपराध और अपराधी के प्रति समाज का व्यवहार | क्या अनेक अपराध करने के बाद व्यक्ति माफ़ी मांग ले तो उससे उसका अपराध कम हो जाता है या उस व्यक्ति की पीड़ा कम हो जाती है जो उसके अपराध से पीड़ित है , क्या ये समाज का सही न्याय है की उस अपराधी को माफ़ कर दे | मुझे तो ये बात भी हास्यापद लगती है की अपराध किसी के प्रति और माफ़ी किसी और से , जिसका पूरे मामले से सम्बन्ध ही नहीं है वो कौन होता है माफ़ करने वाला, न्याय देने वाला अधिकारी भी अपराधी का दोष सिद्ध होने पर अपराध और कानून के मुताबिक सजा देता है माफ़ी नहीं , माफ़ी यदि कोई दे सकता है मेरी नजर में तो वो बस और बस पीडित ही हो सकता है | किन्तु वहा ये भी देखा जाना चाहिए की अपराध की प्रकृति क्या है कही ऐसा तो नहीं की किया गया अपराध उस व्यक्ति विशेष के साथ ही पूरे समाज को भी प्रभावित कर रहा है क्योकि फिर ऐसी जगह पर पीड़ित भी माफ़ी देने के लायक नहीं होता है |  इस तरह अपराधी को माफ़ कर दिया जाये तो समाज में दूसरे भी ये सोच कर अपराध करने लगेगे, अपने स्वार्थो के कारण की ठीक है बाद में माफ़ी मांग लेंगे तो सब माफ़ कर देंगे अभी तो अपने स्वार्थो की पूर्ति कर लो,  जिसे जो कहना है जिसके साथ जो करना है कर लो , समाज में इस तरह का सन्देश जाना कभी भी ठीक नहीं है | सजा का कई मायने होते है पहला की अपराधी को उसके किये की सजा मिले , दूसरा पीड़ित को न्याय मिले और तीसरा  समाज में अन्य को भी ये चेतावनी मिले की कोई भी इस तरह की हरकत दुबारा न करे , किन्तु किसी को भी माफ़ी दे कर हम समाज में क्या संदेस दे रहे है खासकर उन लोगो को जो अपराधी प्रवित्ति के है जो बार बार कई तरह के सामाजिक अपराध करते रहते है |  इस तरह के लोगो का समाज के माफ़ कर देने वाले रेवैये से मन बढ़ता है | माफ़ी देने वाले क्या कभी एक बार भी ये सोचते है की वो किस अधिकार से किसी को मांफी दे रहे है, क्या कभी वो देखते है की जिस व्यक्ति को पीड़ा पहुंचाई गई उसका क्या कहना है जुर्म करने वाले के प्रति, उस पर क्या बीती होगी जब उसे भला बुरा या अश्लील बाते कही गई थी , क्या वाकई माफ़ी मांगने वाले का अपराध इतना छोटा और कम है की उसे बिना विचार के ही तुरंत माफ़ कर दिया जाये , शायद नहीं,  वो विद्वानजन और बुद्धिजीवि लोग ये सोचने की जहमत नहीं उठाते होंगे,  उनके हिसाब से जबानी मांफी मांग लेना और उसे माफ़ कर देना ही बड़ी बात है और सभी बड़े होने की होड़ में शामिल हो जाते है | 
                                                                    

                                                                                    ये मुद्दा जितना छोटा आप सोच रहे है उतना है नहीं , क्योकि जो समाज की सोच और रवैया होता है वही सोच उसके कानून में भी झलकता है | सब ने खबर पढ़ी होगी की राष्ट्रपति ने ( तकनीकि रूप शायद इसके पीछे केंद्रीय गृह मंत्रालय है )  एक दो नहीं कुल ३५ फांसी की सजा पाये अपराधियों की सजा को मांफ करके आजीवन कारावास में बदल दिया | ये पढ़ कर घोर निराश हुई कि इन माफ़ी पाने वालो में वो अपराधी भी शामिल है जिसने एक छोटी सी मासूम बच्ची के साथ बलात्कार  कर उसकी हत्या कर दी थी और सामूहिक हत्याकांड को अंजाम देने वाले भी माफ़ी पा गये है यहाँ तक की ५ साल पहले ही अपनी प्राकृतिक मौत पा चूका अपराधी भी माफ़ी पा गया ( ये एक चुक हो सकती है ) | सोचिये उन परिवारों का जो सालो तक हमारी पेचीदा और लम्बे समय तक चलने वाली क़ानूनी लड़ाई को लड़ने के बाद अपने अपराधी को सजा दिला पाये थे अब वो कैसा महसूस कर रहे होंगे ,निश्चित रूप से खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे होंगे | उन्होंने अपराधी को सजा दिलाने के लिए तन मन और धन तीनो तरीके से बहुत कुछ सहा होगा तब कही जा कर उस अपराधी को सजा मिली होंगी किन्तु सरकार ने एक झटके में उन सभी के सारे संघर्ष पर पानी फेर दिया |  सरकारों को इस तरह के निर्णय लेने में जरा भी हिचक नहीं होती होगी क्योकि समाज का रवैया ये है की जब अपराधी अपने अपराध का प्रायश्चित करे उसकी माफ़ी मांगे तो उसे माफ़ कर देना चाहिए ( अब वो सारे लोग जो यहाँ वहा सामाजिक अपराधियों को अपनी तरफ से फटाफट माफ़ कर देते है इस पर सोचे की उन्होंने सही किया या गलत ) क्योकि माफ़ी मांगने वाला बड़ा होता है , महान होता है , उसे प्रायश्चित का सुधरने का मौका मिलना चाहिए आदि आदि आदि के ढेर सारे प्रवचन | सरकारों को पता है की समाज में उसके इन फैसलों से कोई फर्क नहीं पड़ेगा कोई भी इनका विरोध नहीं करेगा, तो वो अपने सोच के हिसाब से जो चाहे निर्णय ले ले | अपनी सोच के हिसाब से इस  लिए कह रही हूँ क्योकि कानून के हिसाब से तो जो सजा उसे मिलनी चाहिए थी वो तो पहले ही उसे देश के सबसे बड़े न्यायाधीस ने दे दिया है ,  निश्चित रूप से सरकार का फैसला कानून की नजर से तो नहीं ही होता होगा ( जहा तक मेरी जानकारी है इसमे भी कोई क़ानूनी पक्ष है तो जानकर बताये  ) | सरकारे अपनी सोच के हिसाब से फैसले लेती होंगी और सरकार में बैठे लोग इस समाज से ही तो जाते है उनका फैसला भी समाज की सोच को ही दिखायेगा | यदि कोई समाज अपराध और अपराधियों के प्रति एक कड़ा रुख अपनाता है तो कभी भी सरकारे समाज की सोच के खिलाफ खासकर इस तरह के मामलों में नहीं जा सकती है | मै तो नीजि रूप से इस बात के भी खिलाफ हूँ की जब देश के सबसे बड़ी अदालत ने किसी व्यक्ति को उसके अपराध की देश के कानून के मुताबिक सजा दे दी है तो उसे कोई और माफ़ी दे , खासकर कानून से इतर जा कर, ( पता नहीं राष्ट्रपति से माफ़ी की अपील का कानून बना  ही क्यों है,  क्या उन्हें लगता है की इतना कानून का जानकर न्यायाधीश भी गलती कर सकता है या  अपराधियों को भी मानवीयता से देखना चाहिए , कम से कम फाँसी की सजा पाया अपराधी तो इस लायक नहीं ही होता है की उसके प्रति कोई मानवीयता दिखाई जाये |)   नतीजा क्या होगा की अब इस आधार पर उन सभी अपराधियों की हिम्मत बढ़ेगी जो इस तरह का अपराध कर चुके है और उनकी भी जो इस तरह के अपराध करने के बाद फायदे में रहेंगे ( अपने देश में संपत्ति, जाति, धर्म और यहाँ तक की इज्जत के नाम पर पूरे परिवार या कहे सामूहिक हत्याओ का इतिहास भी है और भविष्य में कई सम्भावनाये भी और महिलाओ के प्रति किये जा रहे अपराध की तो कोई गिनती है नहीं है  ) उनका तो मन इस तरह के माफियो से और भी बढेगा |  पर समाज और सरकारे इन बातो की परवाह नहीं करती है और न ही उन्हें उन मांफियो के परिणामो और पीडितो के दर्द से मतलब होता है वो अपनी मर्जी और अपने बेमतलब के तर्क से काम करती है |
                                                                               अब सवाल ये है की क्या समाज में सामाजिक,  व्यक्तिगत अपराध करने वालो को माफ़ ही नहीं किया जाये तो जवाब सीधा सा है की ये तो व्यक्ति की माफ़ी मांगने के तरीके से ही पता चला जाता है की उसकी असल मंसा क्या है खाकर सामाजिक अपराध करने वाले | जैसे उदहारण देती हूँ  जब अपराध किसी व्यक्ति के प्रति किया गया है नाम ले कर तब माफ़ी मंगाते समय व्यक्ति का नाम न ले कर केवल समाज से माफ़ी मांगी जाये तो शक होता है कि निश्चित रूप से अपराधी मांफी की जगह केवल समाज में अपना सम्मान पाने की इच्छा रखता है उसको कोई माफ़ी नहीं चाहिए और न ही वो अपने अपराध के प्रति जरा भी शर्मिंदा है और न उसे इस बात की जरा भी फ़िक्र है की उसके किये से उस व्यक्ति को कितनी पीड़ा पहुंची है | अपराधी सीधे समाज में उन लोगो से मांफी मांगता है जो उसे माफ़ कर देंगे, बड़ी आसानी से और उनकी माफ़ी पा कर अपराधी संतुष्ट भी हो जाये उसे जरा भी इस बात कि परवाह न हो कि उसे उन लोगो ने माफ़ किया की नहीं जिसके प्रति उसने अपराध किया है,जिन लोगो को उसने पीड़ा पहुंचाई है | तो ऐसे अपराधी मांफी के लायक नहीं होते है और उन्हें क्षमा कर हर तरह के सामाजिक अपराधो को बढ़ावा ही मिलता है समाज सुधरता नहीं है |
                                             

June 15, 2012

क्या गरीब आदमी को उसके किये अपराध की सजा नहीं मिलनी चाहिए - - - - -mangopeople


                   विषय को समझने के लिए पहले अपने साथ हुए किस्से को बताती हूं | दो दिन पहले एक टैक्सी ( २०- २२ साल पुरानी फियट उन्हें पता होता है कि उनकी गाड़ी का तो कुछ ख़राब होगा नहीं बाकि साथ चलने वालो को अपनी गाड़ी की फिक्र है तो वो अपनी गाड़ी बजाये वो तो जैसे चाहेगा वैसे अपनी गाड़ी कही भी घुसायेगा )  वाले ने मेरी गाड़ी में बगल से टक्कर मारते हुए मेरी गाड़ी का बम्पर तोड़ते हुए आगे निकल गया चुकि सड़क पर भयंकर ट्रैफिक था और गाड़िया बस रेंगे भर रही थी इसलिए वो भाग नहीं सका , मैंने कुछ आगे जा कर ही उसे पकड़ लिया | उस समय यदि वो अपनी गलती मान लेता तो शायद मै उसे जाने देती किन्तु वो गलती मानने के बजाये कहने लग की आप की भी गलती है मैंने उसे जब उसकी गलती बताई तो कहने लग चलिये थाने चलिये | थाने चलने की बात वो ऐसे कर रहा था जैसे की गलती मेरी थी और वो मुझे धमकी दे रहा था | उसे अच्छे से अंदाजा था की एक तो मै महिला हूं उस पर से मेरे साथ गाड़ी में सो रही बच्ची भी थी , ये मेरा एरिया तो होगा नहीं और मै कहा उसे ले कर थाने जाउंगी | पर उसका अंदाजा गलत था वो मेरा ही घर का एरिया था और चार इमारतों के बाद मेरा घर था |  उसके इस अंदाज पर मेरा गुस्सा और बढ़ा गया मैंने तुरंत पतिदेव को घर से बुला लिया वो दो मिनट में वहा हाजिर हो गये और हमने पुलिस स्टेशन जा कर उसके खिलाफ रिपोर्ट लिखवाई ( वैसे उसका ये अंदाजा सही था कि मुझे सच में ही अपने ही क्षेत्र के पुलिस स्टेशन का पता नहीं पता था पति तो उसके साथ चले गये पर मुझे दो लोगों से पुलिस स्टेशन का पता पूछना पड़ा जो बस मेरे घर से कुछ ही दूरी पर था ) | जब मैंने उसकी टैक्सी को रोका तो अच्छा खासा मजमा भी जुट गया था और कई आवाजे यही आ रही थी कि " मारो साले को ये सब ऐसे ही होते है कही भी टैक्सी घुसा देते है , तो एक बूढी सी महिला ने मुझसे कहा की अरे अरे इसे मारो मत बेचारा गरीब है जाने दो मैंने उन्हें कहा की अभी तक तो मैंने इसे कोई गाली भी नहीं दी है मै मार कहा रही हूं ये गरीब है तो ठीक है पर जो मेरी कार को बनवाने में हजारो का खर्च आयेगा उसे कौन देगा ( बिमा तो गाड़ी का होता है और उसे क्लेम करने के लिए और टूटे सामानों का कुछ प्रतिशत हमें ही देना होता है साथ ही क्लेम करते ही अगले साल बिमा पर मिलने वाली छुट भी हाथ से चली जाती है तो बिमा के बाद भी अपना खर्च हजारो में पहुँच ही जाता है )
                   ये मेरा किस्सा है अब जरा कल रेखा जी की लिखी इस पोस्ट को पढ़िये जिसमे वो बता रही है की किस तरह जब डाकिये ने उन्हें टेलीग्राम नहीं दिया पैसा ना देने पर और उन्होंने उसकी शिकायत कर दी जब विभागीय कार्यवाही की बारी आई तो उन्होंने उस पर दया करके उसे पहचानने से इनकार कर दिया ताकि उसकी नौकरी बच जाये किन्तु जब उन्हें दूसरे मोहल्ले में वही डाकिया मिला तो वो सुधरने के बजाये उनसे बदल लेने लग उन्हें कभी उनके पत्र नहीं दिया यहाँ तक की उनके पिता की मृत्यु पर भाई द्वारा भेजा टेलीग्राम तक नहीं दिया जिसकी वजह से वो अपने पिता के अंतिम दर्शन भी नहीं कर पाई |

                                                       हमारी भारतीय संस्कृति में गरीबो के प्रति दया दिखाने और लोगों को माफ़ कर देने को बहुत अच्छा माना जाता है किन्तु अक्सर देखा गया है की गलती के लिए दया दिखाने और माफ़ी देने से ज्यादातर लोग सुधरते नहीं है बल्कि वो उसे बहुत हल्के में लेते है और बार बार उसी गलती को दोहराते रहते है कई बार तो वो उसके लिए बदला भी लेते है जैसा की रेखा जी के केस में हुआ  | जब कभी कोई गरीब हमारा कोई नुकशान कर देता है तो लोग बार बार ये कहते है की अरे बेचारा गरीब है जाने दो वो क्या कर सकता है वो तो तुम्हारे नुकशान की भरपाई भी नहीं कर सकता है तो क्या फायदा जाने दो और हम सभी दया दिखा कर उन्हें छोड़ देते है, नतीजा ये होता है की वो उसे अपने लिए इसे अपने सुधरने के लिए अच्छा मौका मानने की जगह , अच्छी किस्मत की बच गया मान कर सुधरने के बजाये उस  पर ध्यान नहीं देते है और वैसे ही बने रहते है | किसी को भी सजा देने का अर्थ केवल पीडिता को न्याय देना ही नहीं होता है बल्कि गलती करने वाले को सबक भी सीखना होता है ताकि आगे से वो उस गलती को ना दोहराये और सजा भी इस तरह की कि उसे एक सबक मिले, पर वास्तव में होता क्या है शायद ही कोई भी छोटी मोटी टक्कर के लिए टैक्सी  वालो को लेकर थाने जाता हो ज्यादातर तो उसे वही दो चार हाथ मार कर जाने देते है क्योकि उन्हें भी पता है की टैक्सी वाले से उसे शायद ही कुछ मिले उलटे पुलिस के चक्कर में अपना खुद का दिमाग और समय ख़राब होगा |  इस केस में भी उसने मेरे पति को कहा की साहब मारना है तो मार लो अब थाने क्या चलते हो,  तो पति ने कहा  तुम्हे ही शौक था थाने जाने का ना पीछे जो आ रही है वो तुमको किसी भी हाल में छोड़ने वाली नहीं है | हमारे साथ ये तीसरा केस था इसके पहले भी दो बार पति ने वही बेचारा गरीब है क्या देगा जाने दो कह कर छोड़ दिया था | जिसमे एक बार तो एक बाईक वाले ने पीछे से आ कर सिग्नल पर खड़ी हमारी गाड़ी को जोरदार टक्कर दे मारी थी आफिस की जल्दी में पतिदेव ने उस समय बस उसका मोबाईल लिया और उसे बाद में काल करने को कह  चले आये थे मैंने जब मोबाइल देखा तो सर पिट लिया उसकी कीमत तो कोई हमें सौ रु भी ना देता वो क्या कॉल करेगा  खर्चा हमारे सर पर था | किन्तु उस मोबाइल को भी वो अपनी गरीबी का रोना रो कर बाद में मेरे पतिदेव से ले कर चला गया कहा बाइक उसकी नहीं मालिक की है और वो अभी अभी मुंबई आया है | उस समय भी मैंने पति से कहा था की तुम्हे कम से कम उसका मोबाइल नहीं लौटना था उसे एक सबक तो मिलता इस तरह तो वो कभी भी नहीं सुधरेगा  | यही कारण था की इस बार मैंने तय कर लिया था की इस तरह की कोई भी वारदात होती है तो मै उसे पुलिस तक जरुर ले कर जाउंगी और उस पर बाद में कोई कार्यवाही हो या ना हो ,कम से कम उन सब में ये डर तो बैठे की हो सकता है की सामने वाला मुझे बस मार कर ना छोड़े और सच में मेरे खिलाफ रिपोर्ट लिखवा दे और मुझे पुलिस के चक्कर में पड़ना पड़े इसलिए आगे से सावधानी से गाड़ी चलाऊ | ये हमारी अ- व्यवस्था का ही नतीजा है की यहाँ पीड़ित ही पुलिस से ज्यादा डरता है अपराध करने वाले की जगह , अपराधी ताव में कहता है की चलो चलो ले चलो थाने जैसे वो हमें डरा रहा हो कि तुम में ही हिम्मत नहीं है पुलिस तक जाने की,  वो अपराधी पीड़ित को ही पुलिस का डर दिखाता है जैसा मेरे साथ हुआ बार बार टैक्सीवाला ही मुझे घमकी देने के अंदाज में पुलिस स्टेशन चलने को कहा रहा था वो भी तब जबकि गलती उसकी थी |
                                                         
              ज्यादातर  हमें कहा जाता है की छोटी छोटी बातो को ज्यादा महत्व नहीं देना चाहिए या उसे बड़ा नहीं बनना चाहिए उसे भूल जाने में ही ठीक है , किन्तु ये रवैया सही नहीं है , जब हम दूसरो की छोटी छोटी गलतियों को भूलते है तो अक्सर हम बड़ी गलतियों को करने की या उसी गलती को बार बार करने की सामने वाले को प्रेरणा देते है | फिर ये बात तो मेरे समझ के बिल्कुल बाहर है की क्या किसी को उसके गरीब होने के कारण उसके किये गए अपराध के लिए कोई भी छुट दे देनी चाहिए | क्या अमीर या गरीब के किये गए अपराधो में फर्क हो जाता है किसी अमीर को माफ़ी देने की बात उसे छोड़ देने की बात तो कभी नहीं की जाती है ऐसा क्यों है | क्या गरीब होना आप के अपराध के प्रभावों को कम कर देता है बिल्कुल भी नहीं अपराध कोई भी करे उससे प्रभावित होने वाले पर इस बात से कोई भी फर्क नहीं पड़ता है तो फिर सजा में उसे छुट देने या उस पर दया दिखाने का भाव क्यों जगाया जाता है |  कई बार ये भी देखा है की जब कोई चोर या हत्यारा अपनी गरीबी का  दुख भरी कहानी सुना देता है अपनी कोई मजबूरी बता देता है तो लोगों के मन में तुरंत ही उसके प्रति दया भाव जाग जाती है और कहने लगते है की बेचारे ने मजबूरी में ये किया सजा देते समय उसकी मजबूरी को भी ध्यान में रख कर उसे छुट दी जानी चाहिए ( कानून की नजर में भले सब एक हो मै यहाँ आम लोगों के भावना की बात कर रही हूं ) क्या यही भाव हम किसी अमीर के लिए ला सकते है | याद कीजिये सत्यम के मालिक राजू ( यदि मेरी यादास्त सही है तो यही नाम था फ़िलहाल यही उदाहरन याद आ रहा है ) वो भी बोले की मैंने जो किया वो कंपनी और उसे से जुड़े हर व्यक्ति के भले के लिए किया और मेरे किये से शायद ही किसी को कोई नुकशान हुआ हो हा फायदा जरुर मेरे कर्मचारियों का हुआ है तो क्या उसके द्वारा किये गये अपराध पर भी हम वही दया के भाव मन में ला पाएंगे,  नहीं , शायद ही किसी के मन में दया आये हा गुस्सा जरुर बढ़ जाता है और हम और कड़ी सजा की बात करते है | हद तो तब हो जाती है की जब हम अमीर के जायज बातो पर भी अपराधियों सा व्यवहार करने लगाते है है और गरीब के अपराध को अपराध तक मानने से इंकार कर देते है |  मुकेश अम्बानी अपने पैसे से अपना शानदार अपनी हैसियत के हिसाबा से रहने लायक घर बनवाते है तो हजारो लोगो को बुरा लगता है , किन्तु उससे भी ज्यादा कीमती और हजारो गुना बड़ी सरकारी और निजी जमीनों पर लोग अवैध झोपड़े कब्ज़ा कर बना कर रहते है उसके प्रति हम सब दया का भाव अपनाने लगाते है  ऐसा क्यों है की किसी अमीर के किये छोटी सी छोटी गलती पर भी हम कड़ा रुख अपनाने की बात करते है पर गरीब की बात आते ही हम में दया आ जाती है | ना भूलिए की अमीरों को अपराध करने की आदत नहीं होती है वो भी बस उसी अपने फायदे के लालचा में अपराध करते है जिस लालचा में कोई अन्य गरीब करता है जब अपराध करने का कारण एक है तो समाज का रवैया अपराधियों के प्रति अलग अलग क्यों होता है | क्या ऐसा कर के हम कही ना कही अपराध को ही बढ़ावा नहीं दे रहे है क्या हमें छोटे अपराधो और बड़े अपराधो को दो दृष्टि से देखना चाहिए ( लो जी इतनी बार "क्या क्या " लिखने के बाद सतीश पंचम जी की क्यावाद पोस्ट की याद आ गई ) |
                                                                 मै ऐसा नहीं मानती हूँ की हमें अपराध के पीछे जो मजबूरी है उस पर ध्यान ही नहीं देना चाहिए किन्तु एक आम सी गलतियों और अपराधो पर जिसके पीछे कोई मजबूरी नहीं बल्कि लापरवाही या लालच हो उसे तो कतई माफ़ नहीं किया जाना चाहिए चाहे वो कोई गरीबा करे या अमीर | गरीबी कभी भी किसी अपराधी या गलती करने वाले को मिलने वाली सजा में छुट का कारण नहीं हो सकती है | जब तक हम अपराधी के गरीब होने के कारण उसकी गलती को नजर अंदाज करने की आदत और गलत करने वालो को सजा देना की शुरुआत नहीं करेंगे ये समाज और व्यवस्था दुरुस्त नहीं होगी |
                                                कई बार सुना है की क्षमा और माफ़ी देने से इन्सान का कद बढ़ जाता है पर मै कभी भी इस को सही नहीं मानती हूँ नीजि जीवन में भी मै ये मानती हूँ की पहली गलती को माफ़ कर हम हमेसा दूसरी गलती हो बढ़ावा देते है मेरी छोटी बेटी ही क्यों ना हो किन्तु कोई ना कोई साकेंतिक ही सही सजा उसकी गलती पर जरुर देती हूँ जो उसे सबक जैसा लगे | अपनी गलती मान ले तो छोटी सजा या पहले ही मुझे आ कर बता दे तो सख्त लहजे में आगे ऐसा ना करने की चेतावनी ही उसके लिए काफी है | वो अभी भले ही इस बात को ना समझे पर बड़ी होने के साथ ही वो उसे समझाने लगेगी | वैसे मै उसे सजा क्या देती हूँ :) आज पूरे दिन तुम्हारा चैनल नहीं लगेगा बड़ी गलती पर दो चार दिन तक तुम अपना चैनल नहीं देख सकोगी क्या करे उसके लिए तो यही सजा है सो व्यक्ति को सजा वही दी जानी चाहिए जिसे वो सजा माने |


चलते चलते
               कुछ चीजो को लेकर समाज और लोग हमें पहले से इतना डरा देता है की हम डर की बात ना होने के बाद भी डरने लगते है | कुछ साल पहले मेरा मोबाईल घूम गया था , नये सिम कार्ड के लिए हमें पुलिस स्टेशन में जा कर कुछ एन ओ सी जैसा लेना पड़ता है पतिदेव को पुलिस स्टेशन भेजते मुझे डर लगा रहा था क्या करे पुलिस स्टेशन की छवि ही ऐसी बना दी गई थी | किन्तु इस बार ना जाने क्यों एक बार भी मुझे इस बात का डर नहीं लगा की मै महिला हो कर पुलिस स्टेशन जा रही हूँ वहा का माहौल भी फ़िल्मी पुलिस स्टेशनों से अलग एक आफिस की तरह का था जहा एक कमरे में चार आलग अलग काउंटर जैसा था बस सब खाकी यूनिफार्म में थे पहले पुलिस ने मेरी बात ध्यान से सुना फिर कहा बस १० मिनट लगेंगे आप के कागजो से नंबर नोट करना है फिर आ पा जा सकती है दूसरे ने मेरी रिपोर्ट लिखी यहाँ तक की उसे निर्देश दिया गया की हमारे साथ छोटी बच्ची है जल्दी किया जाये और जब मै हड़बड़ी में अपनी कर का नंबर ठीक से बता नहीं पाई ( डर नहीं लगा थोड़ी हडबडाहट थी क्योकि घटना का ठीक से ब्यौरा देना था जो उसकी मराठी और मेरी हिंदी से गड़बड़ हो जा रही थी ) तो उसने आर सी बुक से देख खुद ही नोट कर लिया , सब ने ठीक से अच्छे से बात सुनी और अच्छे से बात की भी |  नहीं नहीं कोई जल्द बाजी ना कीजिये  आप लोग पुलिस स्टेशन के बारे में अपने कोई राय बनाने में क्योकि अभी घटना के बस दो दिन ही हुए है अभी आगे क्या होगा मुझे भी नहीं पता है मै तो वापस नहीं जाने वाली हूँ पर उधर से क्या होगा पता नहीं क्या पता फिर से एक पोस्ट लिखू की ये मैंने क्यों गलती कर दी पुलिस स्टेशन जा कर :( और हा मेरे साथ अच्छा व्यवहार कर रहे पुलिस वालो का रुख जरा टैक्सी वाले के प्रति देखिये "क्यों तेरा बैच  कहा है ' " साहब जेब में है " थोडा तेज आवाज में  " तुझे बैच जेब में रखने के लिए मिलता है क्या,  बाहर निकाल टांगने नहीं आता है क्या " मेरी दया कुछ जागने लगी थी | रिपोर्ट लिखवाने से पहले पति से कहा की जरा उससे पूछो नुकशान की भरपाई कर दे तो क्या रिपोर्ट लिखवाऊ जाने दो और पतिदेव ने क्या कहा वही  " अरे वो इतना गरीब है वो क्या देगा तुम देख लो क्या करना है " |  ऊफ ऊफ ऊफ हम सब ऐसे ही है पर हमें बदलना होगा रिपोर्ट तो मैंने लिखवा ही दी दिल पर बस छोटा सा कंकण रखना पड़ा |