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July 21, 2022

हर सरकार से सही सवाल करते रहिये

 गडकरी ने बयान दिया कि अगले पांच साल मे पेट्रोल  देश मे बैन हो जायेगा  इस बयान से हम मे से ज्यादातर ये अंदाजा लगा लेते है कि वो इलेक्ट्रिक वाहनो के आने को बात कर रहे है । चुकी वो एक नेता और मंत्री है तो पांच साल जैसे जुमले कहना उनकी प्रोफेशनल मजबूरी है । हमे पता है कि आगे बीस साल भी पेट्रोल बंद होने को संभावना नही है । 

लेकिन किसी बड़े पत्रकार की इस फोटो पर कुछ ऐसी टिप्पणी हो कि हमे पंख लग जायेगे हम उड़ कर जाने लगेगे , तो आश्चर्य होता है । क्या पत्रकार को ये समझ नही आ रहा है कि वो इलेक्ट्रिक वाहन की बात कर रहे है । नतिजा सैकड़ो लोग बस इस पर गड़करी और  सरकार का मजाक उड़ाने के चक्कर मे जरूरी सवाल पुछना , उठाना पीछे छोड़ देते है । 

सवाल  होना चाहिए  था कि जिस तरह एक के बाद  एक इलेक्ट्रिक  वाहनो मे आग लगने की घटना हो रही है क्या वो सुरक्षित है । क्या ऐसी दुर्घटनाएं और इतनी ज्यादा किमत उसे आम आदमी की इतनी पसंद  बना पायेगा कि पेट्रोल बंद हो जाये । 

एक अखबार  की कटिंग देखी जिसमे इंदौर नगर निगम इन वाहनो के चार्जिंग पर टैक्स  लगाने की बात  कर रही थी तो क्या पुरे देश मे ऐसा हुआ तो ये वाहन महंगे नही पड़गे।  इसके अलावा सर्विस सेंटर की संख्या, लंबी दूरी की यात्रा मे चार्जिंग पांइट की व्यवस्था , लोकल मैकेनिक को ट्रेनिंग की व्यवस्था ताकि मरम्मत  के लिए ग्राहक कंपनियो की बंधक ना बने आदि इत्यादि अनेक सवालो को चुटकुलेबाजी और  सिर्फ सरकार की आलोचना के नाम पर भुला  दिया गया । 

कई बार जरूरी सवाल उठने पर उसे दबा भी दिया जाता है फिजूल के सवालो के आगे । जैसे  अशोक स्तंभ के अनावरण और पूजा पर पहले तो सही सवाल उठे कि संसद भवन से जुड़े किसी मामले मे नेतृत्व सभा अध्यक्ष को करना चाहिए ना कि परधानमंत्री को । संसद सरकार की नही सांसदो की होती है इसलिए इसमे विपक्षी दलो को आमंत्रित करना चाहिए था । 

सरकार या बीजेपी जो करती आ रही है उसे देखते पूजा पर आपत्ति और सेक्यूलर देश वाली बात उनके पिच पर खेलने जैसा था । उन्होंने ये सब किया ही इसलिए था कि देश फिर से उन्ही मुद्दो मे उलझे जो उनके वोटबैंक को जागृत रखे । वरना नीव पूजा के बाद  सीधा गृह प्रवेश  की पूजा होती है ,  तल्ला बनने पर  , हर सजावट की पूजा का कोई प्रावधान हमे तो याद नही आ रहा । 


वैसे उनकी तैयारी भी उसी पर थी । टीवी चैनलो पर उनके प्रवक्ता सबसे पहले इसी मुद्दे पर कुद रहे थे ,पूजा जरूरी है  हमारे देश की सभ्यता संस्कृति और ब्ला ब्ला । 

लेकिन दोपहर बाद जिस सवाल पर लोगो ने अपना समय और उर्जा दी वो था शेर का मुंह,  उसके एक्सप्रेशन । सच मे , वाकई ये इस मामले मे सबसे जरूरी सवाल था । संसद की सर्वोच्चता, सरकार  का उस पर हावी होने का प्रयास आदि सब बेकार  के सवाल हो गये ।

मोदी के आठ साल के कार्यकाले मे हजारो मुद्द है जब जरूरी सवाल पीछे छोड़ दिये गये और बेकार, फिजूल के सवाल पर बहस किया गया । बार बार हर बार सरकार उनके पिच और मुद्दो पर लोग उलझे रहे और उनकी मंसा पूरी करते रहे । 

इसलिए अगली बार अपना दिमाग  लगाये गम्भीर ,तकनीकि, जरूरी सवाल उठाये । सही व्यक्ति के सामने उठाये । सरकार किसी भी दल की हो और कहीं की भी हो सबसे सवाल करे तब उसका कोई  मतलब है । वरना चिल्लाते रहिये कि सवाल  किजिए उसका होगा कुछ नही । 

July 20, 2022

सही सवाल किजिए और सही व्यक्ति से किजिए

 जमाने पहले इंदिरा गाँधी बनारस गयी थी । उस दौरे मे उन्होने स्थानीय पत्रकारो से बातचीत की या प्रेस कांप्रेंस जैसा कुछ कर रही थी । इतने मे एक स्थानी नया नवेला पत्रकार उनसे पुछता है कि ये गौदोलिया चौराहे पर कुड़ा घर बना है इसके लिए  आप क्या करने वाली है । इंदिरा गाँधी और  दिल्ली  से उनके साथ आये नेता अगल बगल झांकने लगे । मतलब ये क्या मामला है भाई , जो देश की प्रधानमंत्री से इस पर सवाल  किया जा रहा है । स्थानीय  कुड़ाघर हटाने के लिए किससे सवाल करना चाहिए, ये उस नवेले पत्रकार  को नही पता था । 

ये खबर संभव है कि गुगल  करने पर आप लोगो को ना मिले , पुरानी है और मामूली है । एक दूसरी खबर बताती हूँ जो बस नौ दस साल पुरानी है और जिसकी खबर विडिओ भी आप को मिल जायेगा । 


तब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण थे । उन्होंने जनता से मिलने का एक कार्यक्रम मुंबई  मे रखा । नही नही ये यूपी बिहार या बाकी जगहों की तरह जनता दरबार  जैसा नही था , जहां बेचारी सी निरीह जनता अपने जन सेवको के सामने रोते गिड़गिड़ाते अपनी व्यथा कहती है । और राजा साहब बिना ध्यान  से सुने उसके हाथ से अप्लिकेशन ले कर अपने पीए की तरफ बढ़ा कर अपने कर्तव्यो की इतिश्री कर लेते है । 

बकायदा दक्षिण मुंबई के सबसे पाॅस इलाके के एसी  ऑडिटोरियम मे कार्यक्रम रखा गया । वहा पहुँचने वाला तबका पढ़ा लिखा और पैसे से भरपूर लोग थे । सबको बारी बारी सवालो के लिए माइक दिया जा रहा था और मुख्यमंत्री जवाब दे रहे थे । अब जरा सुनिये की लोग सवाल क्या कर रहे थे , हमारे इलाके मे मच्छरों का प्रकोप बढ़ रहा है आप क्या कर रहे है , कुड़ा , सफाई,  ट्रैफिक,  सड़क पर गटर के ऊपर नीचे ढक्कनो से समस्या है आदि इत्यादि । 


बेचारे मुख्यमंत्री यही जवाब देते रहे कि ये नगरपालिका यानी बीएमसी का अधिकार क्षेत्र  है मेरा नही आप वहां शिकायत किजिए । वो कांग्रेस से थे बीएमसी मे सालो साल से  विपक्षी शिवसेना का कब्जा था । इसलिए वो आश्वासन भी नही दे सकते थे । 

लोग कहते है इतिहास  पढ़िये , सरकारो से सवाल किजिए  । हम कहते है गड़े मुर्दो के बारे मे पढ़ने से कुछ नही होगा नागरिक  शास्त्र  पढ़ना और  ठीक से पढ़ना अनिवार्य किजिए  । इससे जनता कम से  कम सही सवाल  करना और सही व्यक्ति से सवाल करना सीखेगी । अगर जनता का सवाल  ही गलत है या जवाब  गलत व्यक्ति से मांगेगा तो उसे कुछ हासिल नही होगा । तो गुगल किजिए और देखिए की किस सरकार  का क्या काम है किसका अधिकार क्षेत्र क्या है । तब समझ पायेगे कि कौन से सवाल  मेयर , नगरपालिका से करने है कौन  से मुख्यमंत्री , राज्य सरकार से और कौन से प्रधानमंत्री , केंद्र  सरकार  से । 

वैसे बता दूं सरकारे बहुत  चालाक होती है । जैसे मुंबई मे जनता से बातचीत  मे  सवालो के लिए  उस वर्ग  को चुनती है जो राज्य  सरकार के अधिकार क्षेत्र मे आने वाले शिक्षा और स्वास्थ्य का प्रयोग  ही नही करती और दक्षिण  मुंबई  मे सड़क, बिजली ,पानी की समस्या वैसे भी नही होती । 

तो अपने खुद का दिमाग  प्रयोग  करना शुरू किजिए, सही सवाल  करना शुरू किजिए, और  सही व्यक्ति से करना शुरू किजिए। आजकल के पत्रकार और सोशल मिडिया वाले सेलीब्रेटी , क्रान्तिकारी  चुटकुलो और विरोध  के नाम पर सही सवालो को खा जा रहे है । इसका उदाहरण कल दूँगी विस्तार से | 

June 19, 2022

भेड़ बकरियों से हम सब


लॉकडाउन के बाद जब शराब की दुकाने खुलने की घोषणा हुयी तो एक शराबी ,  पत्रकारों से दुःखी   हो कर कहता हैं कि नौ बजे दूकान खुलने वाली हैं पौने नौ बज गए पुलिस प्रशासन कोई अभी तक इस शराब के दुकान के पास व्यवस्था बनाने लाइन लगवाने नहीं आया |  सरकार नकारा हैं उसे हमारी कोई चिंता नहीं हैं | 


और बहुत सारे इंटरव्यू आम लोगों के देखे जो कहते हैं कि हम मास्क नहीं पहनेंगे , हम दूसरे लोगों से शारीरिक दुरी भी नहीं रखेंगे , हम लॉकडाउन का पालन भी नहीं करेंगे | ये काम तो सरकार का हैं  कि वो देखे कि कोरोना बिमारी ना फैले और  उचित इलाज मिले | 


एक  अच्छे नागरिक बन लाइन लगा सामान लेने ,  मामूली से नियम जो हमारी सुरक्षा के लिए बने  हैं उनका पालन करने की सोच भी हम नहीं रखते और चाहते हैं कि ये सारे काम भी सरकार हमें डंडा मार कर करवाए | हम भेड़ बकरियों सा व्यवहार करते हैं और चाहते हैं की सरकारे हमें हांक कर सब काम करवाए फिर कहते हैं कि सरकार जनता को कुछ  समझती ही नहीं | 


लोगों को अपनी जान की परवाह नहीं होती और उम्मीद करती हैं कि सरकारे उनकी जान की परवाह करे | 2020 मे  अक्टूबर-नवंबर त्यौहारों और शादी के सीजन  में लोगों ने  बिमारी से बेपरवाह हो कर खूब नियमो की  धज्जियाँ उड़ाई |  बाजारों , शादियों , पंचायत चुनावों , राज्य के चुनावी रैलियों , कुंभ और धार्मिक आयोजन आदि में लापरवाह हो कर भीड़ जमा की | 


मास्क पहने और हाथ धोने जैसे मामूली  नियमो को भी अनदेखा  किया  | दूसरी लहर  की चेतावनी को अफवाह बताया , दूसरे देशो से फिर से बीमारी  फैलने की आ रही की खबरों को नजर अंदाज किया नतीजा 2021 अप्रैल मई तक सबने देखा | 

काश बाजार , घूमने फिरने , शादियों में , धार्मिक आयोजन , चुनावी रैलियों और भीड़ भरी आदि जगहों पर मजे के लिए जाने से पहले ,  दूसरी  लहर की चेतावनी को नजरअंदाज करने से पहले बस  एक बार सबने 2020 अप्रैल मई वाले पोस्ट,  स्टेटस को  सोशल मिडिया  पर खंगाला होता तो 2021 वाले दूसरी भयंकर लहर के खौफनाक हालातो मौतो से बच सकते थे। 

इस कोरोना से भविष्य  के लिए  कुछ सीखा समझा तो ठीक नहीं तो भेड़ बकरियों को  वैसे भी फर्क नहीं पड़ता | 

#फ्लैशबैक 



 






October 12, 2012

सर नोचने के लिए अपने हाथ कम पड़े तो मदद लीजिये ------------mangopeople




1-करीब दशक भर पहले महाराष्ट्र सरकार ने मुंबई में एक बड़े बिल्डर समूह को जो महंगे बड़े आलिशान फ़्लैट बनाने के लिए जाना जाता है, उसे मुंबई के बाहर एक बेसकिमती जमीन दे दी ताकि गरीब और माध्यम वर्ग के लिए छोटे और उनके बजट में आने वाले फ़्लैट बनाये ( वो भी तब जबकि महाराष्ट्र में भी डी डी  ए  की तरह म्हाडा नाम का सरकारी विभाग है जो खुद भी लोगो के लिए सस्ते घर बनाता है ) नतीजा बिल्डर ने उस जमीन पर बड़े बड़े आलिशान फ़्लैट बना दिया ( ये भी आश्चर्य की बात है की नक्शा  पास हुआ एक पूरा टावर खड़ा हो गया और सरकार को कुछ भी पता नहीं चला ) खबर लगी हो हल्ला हुआ और सम्बंधित विभागों की तरफ से बिल्डर समूह पर पर हजारो करोड़ ( शायद 2 हजार करोड़ ) का जुर्माना  लगा दिया गया , किन्तु जल्द ही महाराष्ट्र के "पावरफुल" नेता की कृपा से ये हजार से सौ करोड़ ( 2 सौ करोड़ ) में बदल गया । मामला आज भी आदालत में है । बिल्डर और नेताओ का शानदार मजबूत गठजोड़ देखिये , कहा कहा से पकड़ियेगा जहा एक रास्ते बंद कीजिये दुसरे खोल देंगे ।

   2-   नोयडा मे गरीब किसानो की जमीन का अधिग्रहण करके उसे अमीरों को फार्म हॉउस के लिए दे दिया गया और नीलामी में कहा गया की वो किसान भी जिनसे सरकार ने 25 पैसे में इस जमीन को ख़रीदा था वो भी अपनी ही जमीन को अब सरकार से 1 रु में खरीद सकते है और वापस से खेती माफ़ कीजियेगा अंग्रेजी में फार्मिंग कर सकते है ।  सरकार और बाबु की शानदार नीतियों का,  सोच का और गरीब किसान की हालत का नजारा देखिये , जनता के लिए बनी सरकार के जमीन के दलाल बन जाने का नजारा देखिये ।


3- मुंबई में सैनिको की विधवाओ के लिए ईमारत बनने वाली थी 7 मंजिला,  जिस विभाग के पास वो क्लियरेंस के लिए जाती उसी विभाग के बाबु और मंत्री को एक फ़्लैट उपहार में मिला जाती और धीरे धीरे ईमारत की ऊंचाई आसमान छूने लगी सैनिक और उनकी विधवाए कही पीछे ही छुट गए , सामने की सड़क की चौड़ाई कम कर दी गई, बगल में बस डिपो की जमीन  भी इसमें मिला दी गई ताकि और ज्यादा बड़ी ईमारत बने और उनके विभागों के बड़े बाबु, मंत्री को भी घर दे दिए गए । हो हल्ला हुआ जाँच शुरू हुई तो अंत में बात ये आ गई की न तो जमीन सैनिको की थी न ईमारत सैनिको की विधवाओ के लिए बन रहे थे तो काहे का घोटाला । किस्सा सुना है , एक रेगिस्तान  में आदमी तंबू लगा कर सोया था रात को ऊंट ने कहा थोड़ी जगह दे दो उसने दे दी सुबह उठा तो देखा की वो तंबू से बाहर है और ऊंट तंबू में बैठा है ।

4-  किसानो से खेती लायक उपजाऊ जमीने ली जाती है क्योकि घरो की कमी है और लोगो के लिए घर बनाना है किन्तु वहा बनते है अमीरों के लिए फार्मूला वन रेस का ट्रैक , गोल्फ कोर्स  ( निजी रूप से इस दोनों के बनाने से मुझे कोई आपत्ति नहीं है किन्तु वो खेती की जमीन सस्ते में गरीब किसानो से लेकर न बने जाये करोडो कमाते है तो खुद बाजार भाव पर जमीने ख़रीदे और उस पर बनाये ) और बड़ी बड़ी शानदार हर आलिशान सुविधाओ से युक्त इमारते, जो बस अमीरों की पहुँच में होती है, गरीब तो छोडिये माध्यम उच्च वर्ग के बस की बात भी नहीं होती है , बना दी जाती है और सरकारे कहती है की सब कानून के अंतर्गत हुआ है सब जनहित है । इस जन को भी देखिये और  जनहित का नजारा भी देखिये ।

5-कोर्ट ने कहा की देश की प्राकृतिक और खनिज सम्पदा को यदि सरकार चाहे तो देश हित में किसी भी नीजि  पार्टी को दे सकती है ।( पूर्व कानून मंत्री ने  जेटली  जी ने कहा की जज दो तरह के होते है एक वो जो कानून को जानते है और एक वो जो कानून मंत्री को जानते है, मैंने कुछ नहीं कहा ) वो सरकार जो जमीन अधिग्रहण बिल को सालो से अपने अंटी में दबा के बैठी है ( शायद इंतजार कर रही है की जब सभी जमीनों का अधिग्रहण हो जायेगा तब ये बिल लायेंगे ) क्योकि वो अभी तक इस बात को भी परिभाषित नहीं कर पाई है की बिल में जनहित की परिभाषा क्या रखे,  क्या ऐसी सरकारे भरोसे के लायक है । मोटरसाइकिल पर बैठ का युवराज जब भट्टा पर्सौला गए जल्द कानून का निर्माण करने का आश्वासन दे कर हीरो बन गए पर ये हिरोगिरी अपने सरकार से क्यों नहीं दिखा पा रहे है ।


6-अस्पताल के लिए ली गई जमीन पर एक दसक तक अस्पताल नहीं बनता है किन्तु सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ता है,  फिर अस्पताल नहीं बना तो वो जमीन बिल्डर को दे देती है क्योकि उसे अधिकार है की वो जमीन का प्रयोग , बदल सकती है । बड़े अस्पतालों , स्कुलो कालेजो को कौड़ियो के दाम में  जमीने दे दी जाती है इस शर्त के साथ की वह गरीबो का इलाज और पढाई मुफ्त में होगी किन्तु वहा गरीबो के लिए कुछ नहीं होता और सरकारों को कई फर्क नहीं पड़ता है । क्या ऐसी सरकारों से हम उम्मीद करे की वो जनहित के बारे में सोचेंगी या इस बात को आगे भी लागु करवाएंगी की उनकी नीतियों से गरीबो का हित होता रहे । सरकारों का काम केवल नीतिया बना देना नहीं होता है उन्हें ठीक से लागु करवाना भी उन्ही का काम है ।

7-जरा सरकारी मुआवजे का भी हाल देखिये , किसानो को उनकी फसल बर्बाद होने पर 10 रु से लेकर 50 रु तक का मुआवजे का चेक दिया गया बेचारो को बैंक तक पहुँचने में ही 20 रु खर्च हो गए ( भुनाना जरुरी था क्योकि नहीं भुनाया तो अगली बार मुआवजा नहीं मिलेगा ) , टिहरी गांव जब डूबा तो लोगो को जमीन दी गई और मकान बनाने के लिए इतने कम रुपये ( 20 से 25 हजार रुपये दिए गए थे शायद ) दिए गए की उससे तो दो कमरों का ढ़ांचा भी खड़ा न होता , इंदिरा विकाश योजना में आज भी लगभग 20 हजार रुपये दिए जाते है लोन में घर बनाने के लिए (सरकारे खुद इतने में घर बना के दिखा दे )  । जमीन अधिग्रहण के लगभग हर केस में चाहे वो सेज, बांध , इमारते , सड़क आदि आदि किसी के नाम पर भी लिए गए, जमीने कौड़ियो के दाम में ख़रीदे गए और वह रहने खेती करने वालो को फिर से ठीक से बसाया नहीं गया स्थापित नहीं किया गया । गरीब के दो कौड़ी की औकत देखिये ।


8-करीब 50 हजार भूमिहीन मजदूरों ने मोर्चा निकला दिया और अंत में सरकार ने एक बार फिर उन्हें बेफकुफ़ बनाने हुए कहा की उनकी बाते मान ली गई है और लोगो को उनकी जरूरतों के हिसाब से घर खेती के लिए जमीने दी जाएँगी । क्या कहे एक तरह तो सरकारे किसानो से जमीने ले कर उन्हें भूमिहीन बना रही है दूसरी तरह वो भूमिहीन किसानो मजदूरो को जमीन देने का वादा  कर रहे है । संभव ये भी है की कल को  जंगल की जमीनों को इन्हें दे दिया जाये क्योकि गरीबो के नाम पर पर्यावरण मंत्रालय भी ज्यादा कुछ रोक नहीं पायेगा और मंजूरी आसानी से मिल जाएगी उसके बाद यही मजदुर जब उस जमीन को अपनी मेहनत से काम खेती के लायक बना देंगे तो उनका भी ऐसी ही अधिग्रहण कर लिया जायेगा,  बिलकुल वैसे ही जैसे राजनीति में पहुँच रखने वाला कोई किसी बिल्डर से लोन ले कर जमीन अपने नाम पर ले फिर उस जमीन का प्रयोग सरकार द्वारा बदलवाये जैसे खेती की या अस्पताल की जमीन पर ईमारत बनाने की इजाजत क्योकि बिल्डर के मुकाबले वो ये काम आसानी से और कम समय में करा सकता है और फिर उस जमीन को उसी बिल्डर को ऊँचे दाम पर बेच दे जिससे उसने लोन ले कर जमीन खरीदी थी । सत्ता में बैठी और उनके करीबी लोगो का तिकड़मी दिमाग देखिये ।


9-जो लोग ये सोच रहे है की ये एक दलीय कार्यक्रम है वो जान ले की ये घपले घोटाले भी अन्य  सभी घपले घोटाले की तरह ही सर्वदलीय है , इसमे सभी दल की सरकारे और लोग मिले हुए  है , और सभी इन कंपनियों से बराबर का रिश्ता रखती है और फायदा लेती है । जैसे अब खबर आ रही है की डी एल ऍफ़ को गुजरात में भी जमीने दी गई है बिना किसी नीलामी के,  वहां वही कांग्रेस हल्ला मचा रही है जो कहती है की हरियाणा में कुछ भी गलत नहीं हुआ  और ये रिश्ता भी आज का नहीं है जैसे डी  एल ऍफ़ का रिश्ता राजीव से बहुत ही घनिष्ठ रहा है और इस घनिष्ठता ने ही उसे इतना आगे बढाया था । रिश्तो के इस मजबूत और लम्बी जोड़ को देखिये ।


10-कल टीवी पर एक और खिजाने वाले केस के बारे में सुना की कर्नाटक टूरिज्म विभाग ने अपनी जरूरतों के लिए जमीन अधिग्रहित की जमीन लेने के बाद कहती है की उसके पास मुआवजे के लिए पैसे नहीं है ( लो कल्लो बात अंटी  में नहीं कौड़ी अम्मा भुनाने दौड़ी ) बाद में उसने कहा की एक दूसरी प्राइवेट पार्टी  है जो पैसे देने के लिए तैयार है बस एक छोटी सी शर्त है वो ये की ये सारी जमीने उसे देनी  होंगी हा हा हा हा हा हा हा हा सुकर  है की मामला कोर्ट में गया और कोर्ट ने विभाग की  अच्छी खबर ली और किसानो को न्याय दिया ।  टीवी पर ये सुन कर मैंने कहा की बिटिया रानी मेरे दो हाथ मेरा सर नोचने के लिए कम पड़  रहे है दो अपने भी लगाना , आप के अपने हाथ भी अपने सर नोचने के लिए कम पड़े तो मित्रो से मदद लीजिये और हमारी तरह ही कुछ न कर पाने की खीज में अपने खिजाने वाले किस्सों की एक पोस्ट बना दीजिये । 



चलते चलते 
       
              कहा जा रहा था की वालमार्ट आएगा तो भारत में रोजगार मिलेगा , अच्छा वेतन मिलेगा , काम   की सही सुविधा जनक जगह मिलेगी आदि आदि , अब सुना है की अमेरिका में वालमार्ट के कर्मचारी कम वेतन , काम के ज्यादा घंटे , सुविधाओ की कमी आदि आदि को लेकर हड़ताल पर चले गए है ।










September 26, 2012

ये किस पेड़ के पैसे से हो रहा छवि निर्माण --------------mangopeople



आज कल बड़े जोर शोर से सभी टीवी चैनलों पर भारत का निर्माण हो रहा है और इस निर्माण पर करोड़ो  रूपये खर्च कर रही है वो सरकार जो कहती है की उसके पास जनता को सब्सिडी देने के लिए पैसे नहीं है , अब कोई पुछे  की सरकार की छवि निर्माण के लिए किस पेड़ से पैसे आ रहे है ( उस पेड़ का नाम है आम जानता की जेब ), शायद राजनीति में सबक लेने की परम्परा नहीं है यदि होती तो मौजूदा सरकार पूर्व में इण्डिया शाइनिंग का हाल देख कर ये कदम नहीं उठाती | बचपन में नागरिक शास्त्र की किताब में पढ़ा था की किसी देश की सरकार का काम बस लोगों से टैक्स वसूलना और खर्च करना नहीं होता है उसका काम ये भी है की अपने देश में रह रहे गरीब ,असहाय लोगों को हर संभव मदद भी करना और उनके लिए जीवन की प्राथमिक जरूरतों को पुरा करना  , सब्सिडी उसी के तहत आती है ताकि गरीब लोगों तक भी उन सुविधाओ को पहुँचाया जा सके जो उनके बस में नहीं है , सरकार ये काम देश से आंकड़े जुटा कर करती है  किन्तु जब सरकार के आकडे ही सही नहीं है तो वो ठीक से योजनाए कैसे बनाएगी ,  ३२ रु रोज कमाने  वाले को गरीब ना मानने वाली सरकार भला गरीबो के लिए क्या करेगी | विश्व बैंक का दबाव है की सब्सिडी ख़त्म की जाये किन्तु समस्या सब्सिडी नहीं है समस्या ये है की सही लोगों को सब्सिडी नहीं मिल रही है | महंगाई को सबसे ज्यादा बढ़ाने का काम करता है डीजल की बढ़ती कीमते क्योकि डीजल की कीमत बढने के साथ ही सभी सामानों की माल ढुलाई का खर्च बढ़ता है और एक ही बार में सभी चीजो के दाम बढ़ जाते है |  प्रयास तो ये करना चाहिए था की डीजल की खपत कम किया जाये उसे केवल कुछ जरुरी कामो के लिए प्रयोग किया जाये ना की महँगी बड़ी गाडियों के लिए या बिजली के उत्पादन आदि के लिए , होना तो ये चाहिए था की बाजार में सभी डीजल गाडियों और एक के बाद एक आ रही बड़ी महँगी डीजल गाडियों पर बड़ा टैक्स लगाना जाये  ,( कुछ आर्थिक सलाहकारों ने यही राय दी थी किन्तु सरकार ने उसे माना नहीं क्यों वही बेहतर बता सकती है  )  इससे सरकार की आमदनी भी बढ़ती और लोग डीजल गाड़िया लेने से परहेज करते उसकी खपत कम होती और सरकार पर सब्सिडी का बोझ कम होता , इसी तरह डीजल के अन्य गैर जरुरी प्रयोगों को रोक कर सब्सिडी के बोझ को कम किया जा सकता था,  किन्तु सरकार ने बड़ी कार कंपनियों को नाराज करने के और महँगी गाड़िया खरीदने वालो पर टैक्स का बोझ डालने के बजाये एक आसान रास्ता अपनाया की डीजल की ही कीमत बढ़ा दिया जाये और पूरे देश को हर रूप में इसका बोझ सहने के लिए मजबूर किया जाये |
                                                   
                                                  यही काम उसने गैस पर दी जा रही सब्सिडी पर भी किया , कहने को वो सब्सिडी दे रही है किन्तु जिसे मिलना चाहिए उसे मिल ही नहीं रहा है | साल में  मुझे ६ सिलेंडरो की जरुरत होती है जो मौजूदा नियम के अनुसार मुझे सब्सिडी वाली मिल जाएगी किन्तु बेचारी मेरी गरीब काम वाली बाई जिसे साल में ९ से १२ सिलेंडर की जरुरत है उसे पूरी सब्सिडी नहीं मिल रही है , हाल में ही आर टी आई के जरिये पता चला की एक बड़े उधोगपति , सांसद जिन्हें कोल ब्लोक भी मिला था उन्हें साल में करीब ७०० से ऊपर सब्सिडी वाले सिलेंडर मिल रहे थे , इसे देख कर आप समझ सकते है की योजनाओ में कितनी गड़बड़ी है सब्सिडी असल में मिलना किसे चाहिए था और मिल किसे रही है, क्या कोई उद्योगपति सांसद या जिनकी आय साल में १० लाख रूपये से ऊपर है  इस लायक होता है की उसे एक भी सब्सिडी वाला सिलेन्डर मिले  , लेकिन  जो नियम अभी सरकार ने बनाया है इससे भी उन्हें ६ सब्सिडी वाले सिलेंडर तो मिलेंगे ही,  इस नियम से सिलेंडरो की कालाबाजारी ही ज्यादा होगी , साथ ही ये नियम कम से कम भारत जैसे देश में जहा संयुक्त परिवार की परम्परा है वहा के लिए तो बिल्कुल भी उपयुक्त नहीं है जहा माता पिता बच्चो के साथ ही रहते है , कुछ समय पहले पढ़ा था की अब से एक पते पर बस एक ही गैस कनेक्शन मिलेगा ये बड़े शहरों में एकल परिवारों के लिए तो ठीक है किन्तु छोटे शहरो और गांवो में जहा संयुक्त परिवार है या एक ही घर में कई भाई रहते है वहा  के लिए ये नियम कैसे ठीक होगा  |  समझ नहीं आता की सरकार में बैठे लोग जो नियम कानून बनाते है उन्हें भारतीय परिवेश रहन सहन की कोई भी जानकारी है भी या नहीं | एक टीवी चैनल पर सुना की सरकार कहती है की देश में २८ % लोग ही एल पी जी का प्रयोग करते है और जिसमे से आधे से ज्यादा  शहरी लोग है यदि ये खबर सही है तो आप अंदाजा लगा सकते है की सरकार के पास कितने गलत आंकड़े है और गलत आंकड़ो के साथ वो गलत नियम ही बनाएगी |
            
                                                                   नीति नियम बनाने वाले क्या, सरकार की प्राथमिकता तय करने वाले भी भारत के बारे में और उसकी प्राथमिकता के बारे में कितना जानते है उस पर भी शक होता है,  एक तरफ देश में एक के बाद एक राज्य में कुपोषण की खबरे हमें शर्मसार कर रही थी वही यु एन के रिपोर्ट ने तो हमें पाकिस्तान और अफ़्रीकी देशों से भी गया गुजरा बता दिया कुपोषण के मामले में , जहा सरकार की प्राथमिकता भूख कुपोषण से मर रहे लोगों तक भोजन पहुँचाने की होनी चाहिए थी वहा सरकार किराना में एफ डी आई  लाने के लिए अपनी  सरकार ही दांव पर लगाने के लिए तैयार थी |  सरकार के चिंता का विषय गरीब भूखे लोग नहीं बल्कि वो है जिन्हें कभी अपने खाने पीने की चिंता करने की जरुरत ही नहीं होती है और सरकार उनकी चिंता में मरी जा रही है ( असल में तो उन लोगों की भी चिंता नहीं है असल चिंता तो अमेरिकी कंपनिया उनके हित और अमेरिका में होने जा रहे राष्ट्रपति चुनाव है )   | वो सरकार जो खुद कई बार अपने किसानो को उनकी फसलो का ज्यादा दाम देने के बजाये विदेशो से सडा गला अनाज कई गुना महंगे दामो पर खरीद कर लाती है वो उम्मीद कर रही है की कोई विदेश कंपनी उनके किसानो को उचित दाम दे कर रातो रात अमीर बना देगी , मतलब गरीबी हटाओ का उनका नारा कोई विदेशी कंपनी पुरा करेगी , और वो अपना मुनाफा छोड़ कर ऐसा क्यों करेगी इसका जवाब तो सरकार ही दे सकती है | यदि किसानो के भले का तर्क देने वाले भारत के किसानी  का हाल देखते तो ऐसा नहीं कहते , शायद उन्हें पता नहीं है की गरीब वो किसान नहीं है जिनके पास सैकड़ो एकड़ जमीने होती है या जो आधुनिक खेती करते है जिनकी संख्या काफी कम है गरीब वो किसान है जिनके बस दो चार बीघा जमीन है और पैदावार बहुत कम जिनकी संख्या देश में लाखो है , पता नहीं ये वालमार्ट वाले कैसे एक एक छोटे किसान के पास सीधे जा कर उनसे माल खरीदेंगे जो आज तक हमारे भारतीय व्यापारी नहीं कर पाये वो भी सीधे खरीद कर ज्यादा माल कमा सकते थे | ये भी समझ नहीं आता की यदि रिटेल में एफ डी आई इतना ही भारतीय उपभोक्ता के लिए फायदे मंद है और वो महंगाई को जमीन पर ला देगी ( ये काम भी हमारी सरकार नहीं कर पाई वो तो बस तारीख पर तारीख देती रही और महंगाई बढ़ती रही उसके लिए भी आउट सोर्सिंग की जा रही है की २०१४ चुनावों  तक सस्ते माल बेच दो उसके बाद जो चाहे करते रहना कौन पूछने वाला है यहाँ ) तो फिर १० लाख लोगों वाले शहर तक की इसे क्यों सिमित किया जा रहा है इसे पूरे भारत में लागु करना चाहिए था,  केवल बड़े शहर ही क्यों सस्ते समान का लाभ ले , छोटे शहरो गांवो के लोगों को भी इसका फायदा मिलना चाहिए , साथ में जितना माल बेचेंगे उतना हमारे किसान खुशहाल होंगे ( जो वालमार्ट खुद अमेरिका में भी चीनी सस्ते समान बेचता है वो हमारे यहाँ हमारे लोगों से समान ले कर बेचेगा,  ३०% समान भारत से खरीदने की सर्त का क्या हाल होता है वो किस रूप में प्रयोग होता है वो भी दिख जायेगा ) |
                     
                                                                    जो सरकार लोकपाल, महिला आरक्षण  जैसे अनेको बिल को आम सहमती के नाम पर लटकाए रहती है वो इन मुद्दों पर आम सहमती बनाने की जरुरत नहीं समझती है बल्कि अपनी सरकार तक को दांव पर लगा देती है और रातो रात काम होता है नोटिफिकेशन जारी हो जाता है | यदि  सरकार देश से महंगाई , भ्रष्टाचार , कुपोषण आदि समस्याओ को ख़त्म करने की  इतनी इच्छा शक्ति दिखाती तो देश कहा से कहा पहुंचा गया होता | करीब १०-१२ साल पहले एक खबर पढ़ी थी की अमेरिका के एक कस्बे में वालमार्ट अपना स्टोर खोलना चाह रहा था, तो वहा के प्रशासन ने पहले लोगों से राय जानने के लिए इस मुद्दे पर वोटिंग कराई और ९०% लोगों ने स्टोर खोलने का विरोध किया और कहा की वो यहाँ के छोटे स्टोर चला रहे लोगों के हितो को अनदेखा नहीं कर सकते है , क्या भारत में कभी ऐसा हो सकता है , शायद कभी नहीं यहाँ तो हम एक बार वोट देने के बाद अपने हाथ और जबान कटवा लेते है ५ साल के लिए |

 प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को उनके  जन्मदिन पर ढेरो बधाई और अपने जन्मदिन के पहले ही वोट के बदले हम जैसो को रिटर्न गिफ्ट में इतना कुछ देने के लिए  धन्यवाद !



चलते चलते

               इधर सरकार ने सब्सिडी वाले गैस सिलेंडरो की संख्या कम की उधर बाजार में अचानक से राजमा , मटर, बैगन , गोभी की मांग आसमान छूने लगा , असल में लोगो ने महंगे सिलेंडरो को देखते हुए तय किया की वो बाकि के गैस का उत्पादन खुद कर लेंगे !

August 28, 2012

आखिर प्रधानमंत्री ने जवाब दिया की इतना सन्नाटा क्यों है भाई ! - - - - - mangopeople


कई दसको  से पूछा जा रहा  इस सवाल का जवाब ठीक से नहीं मिल पाया था कि "इतना सन्नाटा क्यों है भाई ! अब इस सवाल का जवाब ठीक तरीके से और संतुष्टि के लायक दिया है प्रधान मंत्री ने कि
हजार जवाबो से बेहतर है मेरी ख़ामोशी,
न जाने कितने सवालो की आबरू रखी है |
सोचिये कि यही सब एक आम आदमी को कही और भी सुनने को मिल जाये तो क्या होगा
  , आम आदमी सुबह उठता है और देखता है फोन का नेटवर्क गायब है , ना फोन आ रहा है ना जा रहा है बस नम्बर डायल करते ही पैसा कट रहा है  , वो घबडा कर कस्टमर केयर को फोन करता है दना दन सवालो की झड़ी लगा देता है और उधर से मिलती है ख़ामोशी और वो कहता है इतना सन्नाटा क्यों है भाई , जवाब मिलता है की
हजार जवाबो से बेहतर है मेरी ख़ामोशी
न जाने कितने सवालो की आबरू रखी है |
"भाई इसका क्या मतलब है , मै आप का ग्राहक हूं आप मेरे प्रति जवाब देह है आप को जवाब देना होगा | "
" सर इसका मतलब है की हम यहाँ आप की सेवा के लिए नहीं पैसे कमाने के लिए बैठे है , आप जैसे टुच्ची ग्राहक कोई रिंग टोन नहीं लेते, कालर टियून नहीं लगाते, कोई गेम नहीं खेलते , नेट का प्रयोग नहीं करते है , बस खालिस फोन सुनना और घडी देख कर फोन करना , क्या आप जैसे ग्राहकों से हमारी हजारो करोड़ की कम्पनी चलेगी , दो चार रूपये कट क्या गये फ्री में मिल रही कस्टमर सेवा का नाजायज प्रयोग करने चले आये , दिन में दस बारह मिनट बात करेंगे और नेटवर्क हर दम फुल चाहिए, ये कंपनी आप जैसो को फोन सेवा देने के लिए नहीं खोली गई है और ना ही आप के दम पर चलती है , आप को ये भी बता दे की जल्द ही हमारी हर सेवा का दाम बढ़ने वाले है क्योकि कंपनी को बहुत घाटा हुआ है , पहले नेताओ को खिला पिला कर कम दाम में  3G में आप को बीजी रखा था लेकिन वो पैसा डूब गया अब फिर से कंपनी को बोली लगानी होगी , जो खिलाने पिलाने में कंपनी का पैसा डूब गया उसकी भरपाई कौन करेगा , तो तैयार रहिये  |
  आम आदमी परेशान ये क्या हो रहा है " अरे लगाता है गलत नंबर लगा दिया क्या  "
जवाब मिलता है नहीं सर,  मैंने तो पहले ही कहा था की मेरी ख़ामोशी बेहतर है आप के सवालो पर चुप रह कर मैंने सवालो के साथ आप की भी आबरू बचाई थी किन्तु आप समझे नहीं , तो भुगतिये |
बेचारा आम आदमी घबरा कर फोन रख देता है |
सोचता है नहा धो कर आफिस चला जाये लेकिन ये क्या नल में सन्नाटा छाया है पानी नहीं है , परेशान हो कर जल बोर्ड को फोन लगाता है " ये नलो में इतना सन्नाटा क्यों छाया है भाई"  , जवाब में उसे भी सन्नाटा और ख़ामोशी ही मिलती है | " कोई है कोई जवाब देगा मुझे " और जवाब मिलता है कि
हजार जवाबो से बेहतर है मेरी ख़ामोशी
न जाने कितने सवालो की आबरू रखी है |
वो परेशान ये क्या हो रहा है जिससे भी सवाल करो वो कोई जवाब ही नहीं देता है और ये शेर बक देता है किसी की कोई जवाब देहि है की नहीं | वो फिर से निवेदन करता है"  भाई साहब क्या बताएँगे की नलों में पानी क्यों नहीं आ रहा है और यदि आयेगा तो कब आयेगा |"
" तो आप को जवाब चाहिए तो सुनिये जनाब की सुबह ५ बजे १० मिनट के लिए पानी आया था आप ने नहीं भरा तो ये आप की गलती है | पानी का संकट चल रहा है बचा पानी वी आई पी इलाको के लिए है आप जैसे टुच्ची से आम लोगों के लिए नहीं | वो वी आई पी देश की धरोहर है उनके जाने से देश को काफी नुकशान होता है उनके ना नहाने से देश की इज्जत को कितना बट्टा लगेगा आप को पता है , उनके खाली स्वीमिंग पुल और सूखे बगीचे देश की नाक नीची कर देंगे और आप ठहरे आम आदमी यहाँ हम लोग आप की सेवा के लिए नहीं बल्कि इस लिए बैठे है की पानी को बड़े लोगों के इलाको में ठीक से बचा कर सप्लाई किया जा सके कुछ बचा गया तो आप लोगों को भी दे दिया जायेगा , और जरा अन्ना के इस सोच से बाहर आइये की आप मालिक है और हम सब आप के नौकर ...................|
इसके पहले की उधर से कुछ और कहा जाता उसने फोन रख दिया |
किसी तरह तैयार हुए तो देखा की रात की गई बिजली अभी तक नहीं आई है , गर्मी से बेहाल हो कर बाहर निकले तो पता चला की पूरी कालोनी में ही बिजली गायब है , तो टहलते हुए बगल के ही बिजली विभाग के आफिस चले गये  "भाई क्या इरादा है आज बिजली देनी है की नहीं "
" जी जब आना होगा तो आ जायेगी "
" ये क्या जवाब हुआ भला " लेकिन उधर से कोई जवाब नहीं मिला सन्नाटा पसरा रहा | "कम से कम इतना तो बता दीजिये की कोई बड़ी परेशान तो नहीं है " तो  फिर से वही शेर दुहराया गया
हजार जवाबो से बेहतर है मेरी ख़ामोशी
न जाने कितने सवालो की आबरू रखी है |
" हे प्रभु यहाँ भी जवाब के बदले ये शेर कोई जवाब नहीं मिलेगा क्या  "
" तो आप को जवाब चाहिए तो सुनिये की बिजली का उत्पादन बहुत कम है सो राज्य को बिजली बहुत कम मिल रही है जो मिल रही है वो मंत्री नेताओ और वी आई पी  इलाको के लिए है उस पर से आप के राज्य में चुनाव हो चुके है नये चुनाव होने में अभी तीन साल बाकि है जबकि दूसरे चार राज्यों में कुछ ही महीनो बाद चुनाव होने है , कुछ वो राज्य है जिनके सरकारों के सहारे केंद्र की सरकार टिकी है,  सरकार के हिसाब से वहा पर लोगो को आप से ज्यादा बिजली की जरुरत है उन्हें वोट देना है और आप पहले ही अपने वोट दे कर अपने हाथ कटा  चुके है आप के पास सरकार को बिजली के बदले देने के लिए कुछ भी नहीं बचा है इसलिए जरा ठंड रखिये और गर्मी के मजे चार महीने और लीजिये और आम आदमी है और आम आदमी ही बन कर रहिये काहे वी आई पी बनने की चेष्टा करते है और ऐसे मुँह उठाये चले आते है जैसे की हम आप की सेवा के लिए ही बैठे है | "
आम आदमी परेशान कुछ तो गड़बड़ है कुछ है जो उसे नहीं पता चल रहा है , सोचा बाहर निकले तो कुछ पता चले बाहर आ कर देखा तो विधायक जी अपने चेले चपाटो के साथ मोहल्ले के दौरे पर निकले है , पता चला की अभी अभी हत्या , अपहरण फिरौती के केस में बरी हुए है , असल में दो गवाह थे और दोनों ही गवाहों की एक मामूली सी सड़क दुर्घटना में मौत हो गई सो बच गये | आम आदमी को अच्छा मौका मिला वो फट विधायक से पास गया और फुल माला से लदे सभी को देख हाथ जोड़े उनका अभिवादन कर रहे विधायक जी रुक गये , उनके रुकते ही आम आदमी ने बिजली पानी सड़क सब चीजो का रोना शुरू कर दिया , लेकिन ये क्या विधायक जी कोई जवाब ही नहीं दे रहे है यहाँ भी सन्नाटा आम आदमी ने फिर निवेदन किया तो फिर से वही शेर हाजिर था |
हजार जवाबो से बेहतर है मेरी ख़ामोशी
न जाने कितने सवालो की आबरू रखी है |
ये सुनते ही आम आदमी का दिमाग सटक गया वो झल्लाया और  सीधे उनके सामने ही खड़ा हो गया " विधायक जी मैंने आप को वोट दिया है अब आप हमें जवाब दीजिये "
" अच्छा तो तुमको जवाब चाहिए तो सुनो आप की आधी अवैध कालोनी को मैंने बड़ी उम्मीद से क़ानूनी जामा पहनाया था की वोट की खेती होगी किन्तु आप लोगों में से आधो ने वोट नहीं डाला और बाकियों ने किसे दिया पता ही नहीं चला यदि इतनी मेहनत मैंने बगल के फलाने समुदाय वालो और जाति वालो की कालोनी को वैध करने में की होती वो पुरा वोट बैंक बना गया होता , आप कोई वोट बैंक है आप की औकात एक या दो वोट से ज्यादा की नहीं है और हम से जवाब मंगाते है , शुक्र मनाईये ही रहने को छत है ना तो वो भी नहीं होती जो मिल गया उसी का संतोष कीजिये ज्यादा की उम्मीद कर ज्यादा महत्वाकांक्षी ना बनिये , वैसे भी आज कल आम आदमी की कमाई ज्यादा हो गई है उसको पैसे की क्या कमी है पानी बाजार से खरीदिये और घरो में इनवर्टर लगाइये और हर बात में हमसे जवाब मांगना बंद कर दीजिये वोटर है और वही बन कर रहिये , वो आप लोग ही है जिनकी वजह से मेरे गरीब वोटरों को महंगाई का भर सहना पड़ रहा है आप ज्यादा कमा और खा रहे है जिससे खाने की कमी हो गई है और महंगाई बढ़ रही है   |
आम आदमी को लगा की विघायक जी ने तो आज नहाने की कसर सबके सामने पानी डाल कर पूरी कर दी , अब उसे सबके कहे जा रहे शेर सवाल जवाब , ख़ामोशी , आबरू का मतलब कुछ कुछ समझ आने लगा था |
घबराये और कुछ डरे हुए आम आदमी आफिस पहुंचता है वहा भी सन्नाटा छाया है , घुसते ही पता चलता है की इस साल भी  उसकी प्रमोशन नहीं हुई उलटे वेतन बढ़ोतरी भी उम्मीद के मुताबिक नहीं है | सारे मिल कर बात करते है और तय किया जाता है की चल कर बॉस से सीधी बात की जाये , साल भर इतनी मेहनत की गई है पसीने बहाए गये है उसका कुछ तो फल मिलना चाहिए ना और सभी का प्रतिनिधि बना कर उसेको ही बॉस के केबन में ढकेल दिया जाता है | पसीने से तर बतर वो सवाल करता है सर ये क्या इस बार भी प्रमोशन मेरे हिस्से नहीं आया उस पर से सारे टार्गेट पुरा करने के बाद भी वेतन में इतनी कम वृद्धि | जवाब के इंतजार में खड़ा उसको मिलती है ख़ामोशी , सर कुछ तो बोलिये |
हजार जवाबो से बेहतर है मेरी ख़ामोशी
न जाने कितने सवालो की आबरू रखी है , बॉस का जवाब |
अब वो सुबह से ये सुन सुन कर पक चूका है तय किया की इस बार तो जवाब ले कर ही रहूँगा , सर ऐसे नहीं चलेगा कुछ तो बताना होगा |
" तो सुनो की टार्गेट पुरा कराने के लिए दो चार अच्छी अच्छी बाते मोटिवेशन के लिए कहा दिया कि तुम लोग तो कंपनी के असली ताकत हो , कंपनी तुम लोगो से चलती है आदि आदि लगता है  तुम लोगो ने उसे कुछ ज्यादा ही गंभीरता से ले लिया  | तुमको क्या लगता है की ये कंपनी तुम्हारे बल पर तुम्हारे काम से चल रही है तो ये गलतफहमी दिमाग से निकाल दो , तुम्हारे जैसे हजारो अपनी प्रतिभा फईलो में लिए बाहर लाइन लगा कर खड़े है, तुमसे आधे में नौकरी पर आ जायेंगे और गधो की तरह बिना कुछ पूछे काम करेंगे , लाख करोड़ कंपनी में तुम बस चवन्नी भर हो जो चलना बंद भी हो जाये तो किसी को कोई फर्क भी नहीं पड़ेगा | कहते हो की मेहनत किया है उसका फल चाहिए तो जो हर महीने वेतन घर ले जाते हो वो क्या है, ये सरकारी आफिस नहीं है ,  यहाँ हराम की खाने आये हो क्या , जीतनी मेहनत की है उतना हर महीने तुमको मिल जाता है , अब क्या इस टुच्ची सी मेहनत के लिए कंपनी के शेयर तुम्हारे नाम लिखा दिया जाये , और चले आये नेता गिरी करने ज्यादा चू चपेड करोगे तो कंपनी ही यहाँ बंद कर कही और शिफ्ट कर दी जाएगी , फिर करते रहना ये यूनियन गिरी ,  जो मिल रहा है उससे भी हाथ धो दोगे |
केबन के साथ ही  उसके दिमाग में भी सन्नाटा छा जाता है और अपनी आबरू गवा के केबन से बाहर आ जाता है |
शाम थके हारे घर में आता है सर दर्द से फटा जा रहा है  , एक तरफ बैग फेका दूसरी तरफ जूता कपडे निकाल पर बिस्तर पर फेका और सोफे पर धस गए " एक कप चाय मिलेगी " कोई जवाब नहीं मिलता है और ना ही चाय " वो दुबारा आवाज लगाता है " ये घर कितना फैला रखा है ,  कब से एक कप चाय मांग रहा हूं कोई जवाब क्यों नहीं दे रही हो " एक बार फिर सन्नाटा ! तभी पत्नी जी अवतरित होती है उनकी बड़ी हो रही आखे देख कर ही इस सन्नाटे से वो डर जाता है दिल जोर जोर से धड़कने लगता है उसे सामने आ रह तूफान साफ दिख जाता है | " क्या कहा तुम्हे जवाब चाहिए " वो दोनों हाथ जोड़ कर घुटनों के बल पर जमीन में गिर जाता है और गिडगिडाने लगता है " नहीं नहीं मुझे कोई जवाब नहीं चाहिए , मैंने तो कोई सवाल किया ही नहीं फिर जवाब किस बात का , मेरे नादानी में किये गये सवालो को चूल्हे में डालो , मेरी बची खुची आबरू की रक्षा करो जो आज कई बार लुट चुकि है " |
" नहीं नहीं आज मै खामोश नहीं रहूंगी और सब जवाब दुँगी , मुझे समझ क्या रखा है तुम्हारे बाप की नौकरानी हूं , बैग यहाँ फेका जूते कपडे वहा फेके और मुझी से पूछते हो की घर क्यों फैला रखा है , मेरे लिए  कौन सा सोने का पालना डाल रखा है या नौकरों की फौज खड़ा कर रखा है, सारे दिन खटती रहती हूं तब भी ये तुम्हारा ये दो कमरों का महल ढंग का नहीं दिखता है , और आते ही लाट सहाबी झाड़ने लगते हो    टुच्ची से आप आदमी इतना कम कमाते हो की सारा जीवन एक एक पैसे की जुगत लगाते हिसाब किताब करते बीत रहा है , सारे अरमान मेरे एक एक कर दम तोड़ रहे है , और लाट साहब को चाय चाहिए , कभी पूछा है की दूध और चाय का भाव क्या चल रहा है गैस की कीमते कितनी बढ़ती जा रही है, बच्चो कि फ़ीस कैसे दे रही हूं महीने का राशन कैसे पुरा हो पा रहा है  | अरे सारी जिंदगी तुम्हारी और तुम्हारे बाप की आबरू ही बचाती रही खामोश रह कर कम बोल कर , उन्हें सादा ही गऊ कहा, हमेसा कहा की तुम्हारे गऊ जैसे पिता ने मेरे बाप से लाखो का दहेज़ लिया और शादी के पहले तुम्हारे बारे में इतनी ढींगे हांकी की मै विवाह के लिए राजी हो गई और बदले में तुम्हे और ये दो कमरों का महल हमारे लिए छोड़ गये ,  गऊ का मतलब जानते हो ग से गदहा और ऊ से उल्लू गधे और उल्लू के कम्बीनेशन को कहते है गऊ लेकिन साफ साफ कभी नहीं कहा ! अरे ये तो मेरे संस्कार थे की कभी तुम्हे सार्वजनिक रूप से अबे गधे नहीं कहा हमेसा उसे छोटा कर ए जी कह कर बुलाती रही |  टुच्ची से आम आदमी मुझसे सवाल करते हो , मुझे आँखे दिखाते हो धमकी देते हो , शोर शराबा करते हो , मुझसे जवाब चाहिए तुम्हे , तुम्हारा तो बोलना ही बंद कर देती हूं , देख रही हूं आज कल कभी चेहरा की किताब पर बोलते हो तो कभी चिडियों की तरह चहकते हो , जरुरत से ज्यादा बोल रहे हो , तुम्हारी तो मै बोलती ही बंद कर देती हूं  "|

                                                  बेचारा आम आदमी घर में जो बची खुची आबरू थी वो भी अब नहीं बची थी , " सरकार हाथ जोड़ता हूं अब कोई सवाल नहीं करूँगा अब मै समझा गया हूं की एक आम आदमी के लिए ख़ामोशी में ही उसकी इज्जत है उसे कभी किसी से सवाल नहीं करना चाहिए , देश में किसी की कोई जवाबदेही नहीं बनती है इस आम आदमी के प्रति और इस आम आदमी को कोई जवाब चाहिए भी नहीं ,क्योकि जवाब सुन कर भी वो कर कुछ नहीं सकता है बस उसे यही लगेगा की उसकी संपत्ति लुटा जा रहा है और उसे पता ही नहीं है और सही भी है पता चल भी गया तो वो कर ही क्या लेगा ,  अच्छा है की उसे पता ही ना चले की उसकी  इज्जत और जरुरत किसी को है ही नहीं , ख़ामोशी में ही वो अपनी गलत फहमी में जीता है , अपने आप को देश का नागरिक समझता है जबकि असल में तो वो मात्र एक वोट है जिसे हर ५ साल बाद कोई भी अपने तिकड़म से जोड़ घटाने से ले लेता है और उसे लूटने में लगा होता है | ५ साल तक ना वो कुछ बोल सकता है ना सवाल कर सकता है ,  अब अच्छे से समझा में आ गया की
हजार जवाबो से बेहतर है ये ख़ामोशी
इसी में देश और आम आदमी की आबरू रखी है |

आज चार दसक बाद  जवाब मिल गया कि  इतना सन्नाटा क्यों है भाई !


चलते चलते

 " ये कपडे प्रेस कर दो " आम आदमी आयरन करने का काम करने वाले से |
" साहब दो कपड़ो के २० रु लगेंगे " प्रेस करने का काम करने वाला |
" अरे कपडे प्रेस करने को कहा है धोने के लिए नहीं "
" साहब प्रेस का ही दाम बता रहा हूं "
" अरे इतना महंगा "
"साहब बिजली कितने महँगी हो गई है आप को पता है "
" लेकिन बिजली महँगी कैसे हो गई सरकार तो कोयला लगभग मुफ्त में दे रही है "
" ये तो सरकार से पूछिये हम को तो कुछ भी सस्ते में नहीं मिल रहा है उलटे साल दर  साल बिजली के दाम बढ़ते ही जा रहे है "
बेचारे परेशान सोचा आगे कोयले से आयरन करने का काम करता है उससे पूछता हूँ |
" साहब २० रुपये लगेंगे "
" अरे भैया कोयले से भी इतना महंगा "
" साहब हमें थोड़े कोयले की खदान मुफ्त में मिली है हमें तो बाजार भाव से ही खरीदना पड़ता है कोयला , उनके पास जाइये जिन्हें कम दाम में खदाने मिली है "




December 02, 2011

सरकारी ऑनर किलिंग - - - - - - mangopeople


                                                                           

                                                         सरकार के लिए किराने में विदेशी निवेश अब साख का सवाल है कहती है की अब कदम वापस नहीं ले सकते है हमारी इज्जत का सवाल है भले लोग कितना भी विरोध करे संसद ठप रहती है तो रहे उसे क्या | सरकार का व्यवहार बिलकुल परिवार में उस बाप की तरह है जो बेटी यानि की आम जनता को अपने इज्जत के नाम पर मारने पर तुली है | सरकार को जनता रूपी बेटी का पिता होना चाहिए  किन्तु वो बाप सा व्यवहार कर रही है | बाप और पिता शब्दों का अंतर तो समझते होंगे ही ना , पिता शब्द आते ही दिमाग में परिवार चलाने वाला परिवार की ख़ुशी का ध्यान रखने वाला उसकी जरूरतों के लिए कुछ भी कर गुजरने वाले का ध्यान आता है और बाप शब्द आते है दिमाग में अपनी बपौती ज़माने वाला हर समय अपनी ही चलाने वाला , सिर्फ परिवार पर बाप होने की धौस ज़माने वाले की छवि बनती है जो अधिकार तो सब रखता है और परिवार के प्रति अपना कोई कर्तव्य नहीं समझता है | बस सरकार भी जनता के पिता के बजाये उसकी बाप बन गई है जिसके लिए परिवार उसके हित से बड़ा उसकी इज्जत हो गई है और जनता यहाँ बेटी की तरह अपने खुशियों जरूरतों के लिए उसका मुंह ताक रही है | अब जब बाप जी ने कह दिया है की ये उसकी साख का सवाल है तो बेटी के हित की कुर्बानी तो होगी ही | इसे क्या कहेंगे खालिस सरकारी ऑनर किलिंग बाप के इज्जत के नाम पर बेटी के हत्या |
                               पर यहाँ भी सारी इज्जत बस बेटी का मामला होने पर ही ख़राब होता है जब मामला बेटो यानि सरकारी कर्मचारी या बड़े उद्योगपतियों का हो तो ये बाप को अपने कदम वापस खीचने में कोई गुरेज नहीं होता है , प्रधानमंत्री ने अन्ना को लिखित में आश्वाशन दिया था की उनके मुख्य तीन मांगे मान ली गई है यहाँ तक की संसद में भी सभी सांसदों ने हामी भर दी थी, हद तो तब हो गई जब स्थाई समिति ने भी इन मांगो को मान लिया था लेकिन दुसरे ही दिन पुत्र प्रेम जाग गया और फिर कदम वापस ले लिए गए क्योकि उसके कदमो से बेटो को परेशानी जो होती, फिर इन बाप लोगो को इज्जत का ख्याल नहीं आया की जो जबान दी है तो उसे कैसे वापस ले , पर कहते है न  बेटो के लिए सब कुछ, उनके तो सात खून भी माफ़ पर जब बात बेटी की हो तो एक कदम भी पीछे नहीं होगा | सोचती हूँ की इस विषय में अब उन लोगो का क्या मत होगा जो कुछ दिन पहले तक देश में संसद को ही सर्वोच्च मान रहे थे उनके अनुसार परिवार में माँ बाप ही सब कुछ है बच्चो की कोई कीमत नहीं है बच्चे होते ही इसलिए है की वो माँ बाप बना सके इसलिए घर में चलेगी तो माँ बाप यानि सत्ता पक्ष और विपक्ष को मिला कर संसद की | तो अब बताइए की जब ये हमारे माँ बाप ही अपनी बातो से पलट जाये बच्चो को सरेआम आश्वासन  दे कर बदल जाये तो उनका क्या करे क्या अब भी संसद को ही सर्वोच्च मानाने की दलील को वो सही बताएँगे | आम लोग,  देश हित  उसकी जान की कीमत तथाकथित बाप की इज्जत के सामने कुछ भी नहीं है | तो भाई इस देश की परम्परा रही है की बेटियों ने हमेशा अपने हित को बाप के इज्जत के नाम पर मार दिया है तो आम लोग भी तैयार रहे बलिदान के लिए |
                   तर्क तो कई दिए जा रहे है कहते है की दलाल दलाली खा खा कर,  सामान कई हाथो में जा जा कर महंगाई बढ़ा रहा है और सरकार को बदनाम कर रहा है | किसान से ६ रु का प्याज खरीदते है उसमे ट्रांसपोर्ट , दलाली,  व्यापारी ,मजदूरी, थोक, फुटकर सब मिला कर उपभोक्ता के पास २० रु में पहुंचता है , विदेशी आयेंगे तो ऐसा नहीं होगा वो सीधे किसानो से खरीद कर आप को देंगे बीच का सब खर्चा ख़त्म उस पर से कोल्ड स्टोरेज बनायेंगे सामान ख़राब नहीं होगा | सोचती हूँ क्या इन विदेशियों के पास कोनो जादू की छड़ी है क्या जो फसल खेत से उड़ा कर सीधे हमारे घर पहुंचा देगा और ट्रांसपोर्ट का खर्च बच जायेगा, कोल्ड स्टोरेज का खर्चा , बड़े बड़े मॉल खोलेगा जगह का खर्चा उसमे लगे ए सी का खर्चा कर्मचारी का खर्चा , सब राज्यों में लगा टैक्स और टीवी से लेकर अखबार तक में अपने बड़े बड़े विज्ञापन का खर्चा खुद उठाएगा , और अपना मुनाफा छोड़  हमको सस्ता सामान देगा | किसानो को भी फायदा होगा कंपनी साहब के लोग आयेंगे हरपत्तू, खरपत्तो , भोला,  माधव सभी के झोपड़ो में खुद जायेंगे और सबकी कुछ कुछ बीघे में उगी फसल खरीदेंगे कोई दलाल बीच में न होगा | क्या वाकई ऐसा होगा ,  काहे की कई बार पतिदेव से सुन चुकी हूँ की आफिस की स्टेशनरी से लेकर कोई भी सामान की खरीद में इ काम में लगा आफिसर हमेशा पहले अपना कमीशन तय करता है फिर सामान खरीदता है कंपनी के लिए , हा दलाली बंद हो जाएगी कमीशन शुरू होगा बिलकुल अंग्रेजी काम | सच्चो में इ में तो किसान और हम उपभोक्ता का बड़ा फायदा है ,  लगता है कोनो चैरिटेबल संस्था है इ वालमार्ट और का का , शायद सरकार महंगाई खुद से कम नहीं कर पा रही है तो इ संस्था को बुला रही है की लो भैया अब तुम ही यहाँ की महंगाई दूर करो हमरे बस की बात तो ना है ये |
                                                                 दसक पहले भी जब भारत के बड़े उद्योगिक घरानों को किराना कारोबार में लाया गया तब भी यही दलील दी गई थी की उपभोक्ता और किसान दोनों को फायदा होगा उपभोक्ता को कितना फायदा है सब जानते है जब इन शानदार मॉल में सामानों पर १० से ५० पैसे की भारी छुट दी जाती है और एक समय में एक के बजाये जबरजस्ती दो सामान बेच दिया जाता है एक लो दूसरे पर छुट पाओ सामान घर लाने पर पता चलता है की १०० की जगह २०० का दो सामान लाये और कुछ छुट मिली ५ रुपये का इतनी छुट तो थोक बाजार में हमेशा ही मिल जाती है कई सामानों पर और आज भी कोई भी कंपनी सीधे किसानो से शायद ही कुछ खरीदती हो | सस्ता सामान कैसे दे वो उनके भी तो हजार खर्चे है वो अपने जेब से थोड़े ही भरेंगे वो भी खरीदारों के ही जेब से जायेगा | पर यहाँ तो अब भी उपभोक्ता को सब्ज बाग दिखाया जा रहा है सस्ता सामान का महंगाई कम होने का | मंत्री जी कहते है की जब देशी लोगो को छुट दिया गया था तब भी हो हल्ला मचा था बाद में सब ठीक हो गया कोनो फर्क पड़ा किराना दुकान चलाने वालो को | मंत्री जी सही ही कह रहे है मंत्री जो है इन मॉल में जाने वाले तो शायद आसमान से टपके है उसके पहले तो वो किसी किराना दुकान पर जाते ही नहीं थे इसलिए छोटे दुकानदारो के ग्राहकी पर तो कोनो फर्क पड़ा ही नहीं आगे भी नहीं पड़ेगा बेकार में लोग हो हल्ला मचा रहे है | जैसे की कोनो शराबी ख़राब लड़का से बिया करने पर बिटिया पहले खूब चिल्लाती है बाद में "भयल बिया मोर करबो का"  की तर्ज पर मार खा कर रो कर गा कर निभाती ही है,  बाप के इज्जत का सवाल है तो एक बार आने दीजिये विदेशी दुकानदारो को उसके बाद किसान जनता सब झेलबे करेगी जाएगी कहा कोनो और ठोर ठिकाना तो है नहीं उनका,  दोनों जगह पराई ही होती है | तो हम आम लोग जब अपने ही देश की सरकार के लिए पराये हो गए है तो इ विदेशी हमको क्या अपना समझेंगे दोनों मिल कर खून चूसेंगे |