"औरत है न इसलिए ज्यादा चिल्लाती है "
निश्चित रूप से ये सुनने के बाद मेरे अंदर की औरत या कह
लीजिये नारीवाद को
जागना ही था | मैंने भी जवाब दिया की "औरत यू ही नहीं
चिल्लाती है ज़रुर कोई तकलीफ़ होगी तभी चिल्ला रही है , क्या
भूखी है "
"नहीं
मैडम खाना तो खा चुकी है"
"तो ज़रुर उसके बच्चे से अलग किया होगा"
" तो क्या करे ,सारे दिन बच्चे के पास ही बैठी रहेगी तो फिर आप लोगो को घूमने कौन ले जायेगा |
देखा मैंने कहा न ज़रुर कोई तकलीफ़ होगी तभी वो चिल्ला रही है उसके बच्चे से उसे अलग
करोगे तो क्या वो
चिल्लाएगी नहीं |
अभी हाल में ही राजस्थान गई थी तो
वहा जा कर
ऊंट की सवारी तो करनी ही थी , मेरे बैठने के बाद जब पति देव अपने
ऊंट पे बैठने लगे तो वो
जोर जोर से चिल्लाने लगी और दोनों
ऊँटो के मालिक हाथों से उसका मुंह बंद करने लगे जब मैंने कहा की ये क्यों चिल्ला रही है तो उसके जवाब में बड़े बे
फिकरी से और हंसते उसने हमें बताया की वो औरत है इसलिए ज्यादा चिल्लाती है ( वो हमें बताना चाह रहा था की ये
मादा ऊंट है )
गलती उसकी नहीं है असल में हजारों वर्षो से महिलाओ के लिए ऐसे ही सोच समाज द्वारा बना दी गई है की महिलाएँ बस बिना कारण
बोलती और
चिल्लाती है उनकी बातों को ज्यादा सुनने या महत्व देने की जरुरत नहीं है और ये
महत्वहिन होना उनकी बातों से चला तो उनके अस्तित्व तक आ गया , अब उनके होने को ही
महत्वहीन बना दिया गया है | यही कारण था की जब मैंने
ऊंट के मालिक से सवाल किया की भाई तुम्हारे गांव में कल और आज दो दिन में मैंने लड़के ही लड़के देखे है लड़की तो मुझे बस एक ही दिखी तो जवाब में उसने कहा की होती तो है पर लड़कियाँ न कमजोर होती है बचतीं कहा है गांव है यहाँ कौन डाक्टर मिलेगा तो मर जाती है |
"मर जाती है या मार दिया जाता है | '
" अरे नहीं अब पहले जैसा नहीं है अब तो बहुत कम लोग ही
मारते है | "
मेरे सवाल पर उसके द्वारा बड़े आराम से सहज स्वीकृति मेरे लिए आश्चर्य जनक था मुझे विश्वास नहीं हो रहा था की वो इस बात को इतनी आसानी से स्वीकार कर लेगा, उसे तो
जरा भी झिझक नहीं हुई ये मान लेने में की आज भी लोग बेटी को जन्म लेने के बाद मार देते है | थोड़े देर बाद फिर पूछा की
" तुम्हारे यहाँ तो सरकार बेटी होने पर पैसे देती है |"
" जब बच्चे अस्पताल में होंगे तब ना यहाँ तो सब बच्चे घर में ही होते है |"
" तो क्या यहाँ सरकारी अस्पताल नहीं है क्या "
" है तो लेकिन
वहा डाक्टर कहा होते है सुबह कुछ घंटे के लिए आते है फिर चले जाते है "
" यदि किसी की ज्यादा तबियत ख़राब हो गई तो "
'तो फिर गाड़ी करके शहर ले जाते है "
" तब तो
वहा तो १४००
रु मिलते होंगे ना बेटी होने के फिर क्यों मार देते हो "
वो थोड़ी देर चुप
रहा फिर कहा " १४००
रु में क्या होता है इतने में क्या बेटी पल
जायेगी लालन पालन दहेज़ सब १४००
रु में होता है क्या '
जी तो किया की
पूंछू की बेटे कैसे
पलते है क्या उन्हें
पालने में पैसे खर्च नहीं होते है क्या उनके विवाह में पैसे खर्च नहीं होते पर जाने दिया जानती थी की उसके पास मेरे बातों का कोई सही जवाब नहीं होगा फिर उसने तो ये परंपरा बनाई नहीं है वो तो बस बिना दिमाग
लगाये उसे आगे बढ़ रहा होगा | जब हम घूमने के बाद
ऊंट से उतारे तो बच्चों के झुंड ने फिर
हमारे करीब आ कर खड़े हो गए और लड़कों का झुंड लड़की से कुछ
खुसुर फुसुर करने लग तभी लड़की आगे बढ़ी और हमारी बिटिया रानी से पूछी " वॉट इस
योर नेम " उसे बिना झिझक आगे बढ़ अंग्रेजी में सवाल करता देख बिटिया से पहले मैंने उससे पूछा स्कूल जाती हो तो उसने ना में सर हिला दिया तो वो सारे लड़के जाते है क्या तो उसने धीरे से कहा
हा | समझ गई की बिना स्कुल के ही वो वहा आने वाले पर्यटकों से सुन सुन कर सिख गई होगी इन प्रतिभाओ को दुसरे कब समझेंगे पता नहीं |
आप पढ़ने वालो सोच रहे होंगे कि
बेचारा सही कह रह है
बेटियों के दहेज़ को लेकर माँ बाप में चिंता तो होती ही है यही कारण है की
बेटिया मार दी जाती है
गरीब लोग और क्या कर सकते है फिर अनपढ़ भी था इसलिए सब बोल गया तो
जरा रुकिए ये लेख अभी ख़त्म नहीं हुआ है | अब राजस्थान गये है तो बिना बड़े बड़े
महलों किला राजा
महाराजो की बातों के बिना पूरी थोड़े ही होती है | ऐसे ही एक महल
घुमाते हुए गाइड हमें दिखाने लगा की देखिये ये सोने चाँदी के बने
पालने इनमें हमारे राजकुमार
सोते खेलते थे हर राजकुमार के लिए एक अलग शानदार पालना होता था बाकी के लिए साधारण होते थे | मैंने कहा की बाकी के कौन ? वही जो
रानियों से अलावा होते थे उसने जवाब दिया | तो ये सारे
पालने रानियों से हुए राजकुमार
राजकुमारियो के लिए थे मैंने पूछा | नहीं नहीं ये बस
राजकुमारों के लिए थे
राजकुमारिया तो साधारण लकड़ी के बने
पालनो में रहती थी | मन ही मन सोचा की वाह जी वाह क्या बात है
राजकुमारियो की स्थिति
राजाओ के
नाजायज आलौदो के बराबर थी बहुत खूब यहाँ कौन सी गरीबी का वास है यहाँ किस
लालने पालने की कमी है फिर भी अपनी ही बेटी और बेटों के साथ इतना भेद,
नाजायज औलदो की तरह ही बेटी के अस्तित्व को ही स्वीकार नहीं क्या जा रहा है | मैंने फिर उससे पूछ तो फिर कितनी बेटी थी राजा को
जरा जवाब सुनिए
अरे बेटिया बचतीं ही कहा थी | इस बार ये सुन कर ज्यादा आश्चर्य नहीं हुआ इस बारे में भी सुन चुकी थी की कई बार
राजाओ के घर भी बेटिया मार दी जाती थी ताकि विवाह के समय दूसरों के सामने सर ना
झुकाना पड़े,
राजशी परिवार से थे किसी के सामने सर नहीं झुका सकते थे और जो नहीं
मारते थे वो
बेटियों के प्रयोग वस्तु की तरह राज्य की सुरक्षा,
सम्बन्ध बनाने के नाम पर एक दूसरे को विवाह के नाम पर दे देते थे | फिर उससे भी मैंने आज के हालत पर सवाल किया " तो आज कल भी
बेटिया ऐसे ही नहीं बचतीं है ना यहाँ, या आज भी
बेटिया मार देते है "
" नहीं ये सब अब यहाँ कहा होता है अब लोग ऐसा नहीं करते है " उसने तुरंत जवाब दिया |
" पर लड़कियों की संख्या तो राजस्थान में बहुत ही कम है " जानती थी ये इतनी जल्दी स्वीकार नहीं करेगा पर उसने भी स्वीकार करने में
जरा भी देरी नहीं की दूसरे सवाल के बाद ही मान गया |
" शहरों में एक
आध लोग करते होगें
हा गांवो में होता है ये सब शहरों में नहीं | "
अब
बोलिए गाइड
अनपढ़ गावर नहीं था और ना ही मैं किसी
गरीब के घर में खड़ी थी फिर भी
बेटियों को लेकर वही सोच | ये सोच बस
बेटियों को ही लेकर नहीं था ये सोच पूरी महिलाओ के लिए था |
राजा का रंग महल दिखाते हुए गाइड
सीना फूला कर बताता है की फला राजा की ३६
रानिया थी राजा को सभी को खुश करने के लिए अफ़ीम खानी पड़ती थी |
"तो राजा फिर इतनी शादियाँ करता ही क्यों था " जवाब मालूम था फिर भी पूछ लिया |
" उस समय राजा शादी तो राज्य के लिए करता था राज्य को सुरक्षित बनाने के लिए | पर आज कौन करता है आज तो एक अकेली ही १३६ के बराबर होती है | "
मैंने जवाब दिया की " ज़रुरी भी है यही एक अकेली १३६ के बराबर ना हो तो आज भी लोग ३६ शादियाँ ना करने लगे और ये
बताओ की फिर
रानियों के अलावा भी उसके दूसरे बच्चे क्यों होते थे , उसकी क्या जरुरत थी राजा को | वो ना करता तो शायद अफ़ीम कम खानी पड़ती और ज्यादा ध्यान राज काज पर देते और ना इतने पैसे इन रंग
महलों पर बहाते और ना देश में बाहरी आक्रमण से ये हालत होती | " मालूम था की इस बात का कोई जवाब उसके पास नहीं होगा एक गाइड ही था कोई इतिहास कार नहीं | वो बस मुस्करा कर इतना ही कह पाया की राजा लोगो को सब करना पड़ता था |
असल में समाज के लिए महिलाओ को अस्तित्व उपभोग की वस्तु से ज्यादा की नहीं थी |
बेटियों को मार देना और
राजाओ के ढेर सारी पत्नियों के बाद भी अन्य
स्त्रियों से रिश्ता रखना उनकी सोच को दर्शाता है और अपनी
रानियों को सौ पर्दे में रखना की बाहरी पुरुष उसकी एक झलक भी ना देख पाए ,
हा शायद डरते हो की मेरी तरह ही ये भी महिलाओ को बस
भोग की वस्तु समझता है और इसकी गंदी नजर कही मेरी महिलाओ पर ना पड
जाये | उफ़ इतना पर्दा की
महारानियो को बाहर देखने के लिए ढंग की
खिड़किया तक नसीब नहीं थी
जालीदार झरोखे होते थे जिसमे से
रानिया बाहर देखती थी ( विश्वास
कीजिये उसमे से ढंग से बाहर का कुछ भी नहीं दिखता था ) ताकि कोई बाहर का उन्हें ना देख ले महल के बाहर तो
छोडिये महल के अंदर भी पर्दा था | देख लगा की क्या इस जीवन को देख कर कोई भी कहेगा की वो किसी महारानी का जीवन जीना चाहती है,
तौबा कोई भी नहीं जीना चाहेगा इस जीवन को |
रानी
पद्मावती के "जौहर" करते हुए की पेंटिंग दिखाते हुए गाइड उनके
शौर्य उनके हिम्मत और सुंदरता की गाथा गा रहा था उसे देख कर लगा की काश ये हिम्मत किसी और रूप में दिखाई गई होती काश की समाज का रूप कुछ और होता काश की महिलाएँ दुश्मन से अपनी रक्षा के लिए "जौहर
प्रथा " की जगह कोई और जौहर दिखाती, काश की आत्महत्या करने की जगह
वीरो की तरह पुरुषों के साथ तलवार ले युद्ध के मैदान में निकल जाती, मरना तो यहाँ भी था और
वहा भी | कम से कम मरने से पहले अपने राज्य और उसकी
प्रजा के लिए कुछ कर जाती, कुछ दुश्मनों की
गर्दन ही उड़ा देती क्या पता हार को ही बचा लेती | कुछ नहीं तो कम से कम
महलों में
घुसे दुश्मनों के ही सर
तलवारों से उड़ा कर लड़ते हुए
वीरगति को पा जाती , तो शायद "खूब लड़ी
मर्दानी वो तो----- " जैसी कोई कविता कही पहले कवी चन्द्र
वरदाई द्वारा लिख दिया गया होता | शायद हमारे समाज का रूप और देश का इतिहास भूगोल ही कुछ और होता | काश की समाज में महिलाओ को उपभोग का सामान ना समझा जाता काश की महिलाओ को अपनी रक्षा के लिए जौहर
प्रथा को ना अपनाना पड़ता | इस प्रथा के बारे में सोचती हूँ तो लगता है जैसे महिलाएँ उपभोग की वस्तु भर थी और उनका उपभोग बस उसका मालिक ही कर सकता था कोई दुश्मन उसका उपभोग ना कर सके इसलिए उन नारी रूपी
वस्तुओ में एक खुद को नष्ट करने वाला एक बटन ( जैसे की फिल्मों में कोई वैज्ञानिक अपनी खतरनाक अड्डे या मशीनों में लगा देता है ताकि उसे कुछ हो जाने पर किसी और के हाथ वो ना लगे और नष्ट हो
जाये ) जौहर
प्रथा के रूप में
लगा दिया गया था की मालिक के कुछ होते ही वस्तु अपने आप नष्ट हो
जाये |
ये
प्रथाए ख़त्म नहीं हुई है चाहे जौहर
प्रथा हो या पर्दा
प्रथा आज भी जारी है भले किसी और रूप में , बलात्कार होने पर शर्म से लड़की ने आत्महत्या कर ली , छेड़ छाड़ से परेशान लड़की ने आत्महत्या कर ली ,
गरीब माँ बाप की
बेटियों ने दहेज़ के कारण विवाह ना होने पर एक साथ आत्महत्या कर ली , दहेज़ के कारण ससुराल वालो ने जला दिया या खुद ही
अत्याचारों से तंग आ कर आत्महत्या कर ली ताकि माँ बाप की इज़्ज़त बची रहे आदि आदि कितनी ख़बरे हम पढ़ते है ये क्या आप लोगो को आज भी जौहर
प्रथा के होने का एहसास नहीं कराती है | क्या आज भी हम नहीं चाहते की लड़कियाँ अपने साथ रेप ना होने दे भले उनकी जान चली
जाये, कितनी
वीरता से बताते है की लड़की ने जान दे दी पर अपनी इज़्ज़त (क्योंकि किसी ने उसके शरीर को ज़बरदस्ती
छू दिया तो अब वो इज़्ज़त के लायक नहीं होती है ) नहीं जाने दी | हम आज भी चाहते है की लड़कियाँ जौहर कर ले और
सीना फुला कर कहते है की जी हम तो उस देश के रहने वाले है
जहा नारी अपनी इज़्ज़त बचाने के लिए अपनी जान भी दे देती है | मतलब की उस महान देश के वासी है जहा पीड़ित , जिस पर अपराध हुआ है वही मौत को गले लगा लेता है और अपराध करने वाला बाइज्जत घूमता है | सोचती हूँ ना जाने कितने बेटों ने अपनी और अपने माँ बाप की इज़्ज़त उतारी होगी अपने महान कामों से, कभी किसी माँ बाप या समाज ने सोचा है की इस
बलात्कारी , रिश्वतखोर , चोर,
डाकू बेटे को अपनी जान दे देनी चाहिए अपनी इज़्ज़त के लिए या सुना हो किसी बेटे ने अपनी या घर की इज़्ज़त के लिए जान दे दी हो | नहीं जी बेटों तो इज़्ज़त के नाम पर जान लेने के लिए होते है जान देने का काम हमने तो
बेटियों पर रख छोड़ा है बिलकुल वैसे ही जैसे हमने समाज के दूसरे काम नर और नारी में बाँट रखा है | पर्दे का भी नया रूप है आज लड़कियों के लिए
पढाओ उतना ही जितना की विवाह के लिए ज़रुरी है , नौकरी मत करने दो ,
शालीनता ,संस्कृति सलीके से कपड़ों के नाम पर सौ पाबंदियाँ लगा दो , जितना हो सके उसे घर में बंद करके
रखो और अपनी इज़्ज़त और संबंधों के लिए उनको कही भी खूंटे से बाध दो विवाह के नाम पर और कहो की जब तक जीवित है यही बंधी रहे | कुछ भी तो नहीं बदला है बस किसी अन्य रूप में समाज में आज भी मौजूद है ये प्रथाये |
हमारी बिटिया तो
वहा गई थी ख़ुशी ख़ुशी
प्रिंसेस को देखने और उनके
महलों को देखने बचपन से कहानियाँ सुनते आ रही थी, मैं यही बोल कर उन्हें ले गई थी पर बेचारी को ज्यादातर जगहों पर तो ना तो
प्रिंसेस दिखी और ना ही उनसे जुड़े सामान ही, ज्यादातर जगह उनका नामो निशान भी नहीं दिखा | यहाँ आ कर मुझ पर गुस्सा किया और झूठ बोलने का आरोप लगा दिया अब क्या
बताऊ की कैसे और क्यों हमारी
राजकुमारिया ग़ायब होती जा रही है |
स्पष्टीकरण -- -- उम्मीद है
राजस्थान के लोग इस लेख को अपने राज्य की, की जा रही बुराई के तौर पर नहीं देखेंगे ये बात पूरे देश के लिए कही गई है | ये संयोग है की मैं राजस्थान गई और
वहा ये
बाते आई ये विचार आया इसलिए इसे यहाँ लिख रही हूँ | शायद हरियाणा जाती तो ये सवाल पूछने पर कोई
ताऊ लठ्ठा ले मेरे पीछे पड़ जाता या पंजाब में ये सवाल करने पर मुझे माँ बहन की गलियों से नवाज दिया जाता या फिर दिल्ली में सरकारी बाबू लड़कियों की इस हालत को मानने से ही इंकार कर देता और मुझसे कहता की आँकड़े
दिखाइये |