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May 08, 2018

कैसे गढ़ते थे ऐसे मजबूत नारी पात्र गुरुदेव - - - - - mangopeople



           कुछ साल पहले अनुराग और तानी बासु ने रवीन्द्रनाथ टैगोर की कहानियों को टीवी पर दिखाया ( इतना अच्छा बनाया था की उसकी तारीफ में अलग से दो चार पोस्ट लिखी जा सकती है ) |  कुछ कड़िया सशक्त नारी पत्रों पर था | ऐसे ही  एक कहानी में जमींदार पति पत्नी है , तभी शहर में एक नाटक कंपनी आती है पति उसमे पैसे लगाते है और नाटक देखते देखते नाटक की नायिका से प्रेम करने लगते है | पत्नी को शक होता है वो पति की खोज खबर के  लिए चुपके से नाटक देखने  जाने लगती है , लेकिन जल्द ही वो पति पर नजर रखना छोड़ नाटक में खोने लगती है और खुद को नायिका की जगह रखने लगती है | इधर पति और नाटक की नायिका का प्रेम बढ़ता जाता है और अब वो ठीक से काम नहीं कर पाती , इसके लिए नाटक के निर्देशक से डांट भी खाती है और गुस्से में पति नायिका को अपने साथ अपनी दूसरी हवेली में ला कर रहने लगता है | जल्द ही वो अपनी पत्नी को भूल जाता है और वो  दोनों पति पत्नी के तरह रहने लगते है |  नायिका पत्नी सा ही व्यवहार करने लगती है , अकेले रहते रहते परेशान हो जाती है और अब वो नाटक में वापस काम करना चाहती है तो पति उसका असली पति बन काम करने से रोक देता है | पैसे ख़त्म होने लगते है और फिर पति को अपनी पत्नी की याद  आती है | अपने पुराने शहर पहुंचते है और देखते है कि  पत्नी उसी नाटक कंपनी की नायिका बन गई है और लोगो की खूब सराहना पा रही है | उसके बॉडीगार्ड पति को उससे मिलने तक नहीं देते |
                                  कुछ समय पहले तमिल साहित्य  महान काव्यग्रंथ शिलापदिकारम के बारे में पढ़ा , जो हजारो साल पहले लिखी गई थी | कहानी सेम पति और पतिव्रता पत्नी नाटक की नायिका और पति  का उससे प्रेम उसका साथ रहना पत्नी  को भूल जाना नायिका की माँ का लालची होना और पति द्वारा अपना सारा पैसा उस पर लुटा देना | एक गलतफहमी में पड़ वापस पत्नी के पास आना और पत्नी का उसे स्वीकार कर लेना | पैसे के लिए मदुरै जाना वहां उस पर रानी की पायल चुराने का आरोप लगना और हड़बड़ी में उसकी मौत | पत्नी का वहा कर अपने पति  निर्दोष साबित करना और उसके श्राप से पुरे मदुरै का जल कर भस्म हो जाना | लगा जैसे इसी कहानी का आधुनिक वर्जन गुरुदेव ने लिखा हो | अब ये कहने की जरुरत है कि  दोनों में से कौन वर्जन एक स्त्री के रूप में मुझे पसंद होगा | धारावाहिक के कितने की एपिसोड देख लगा उस जमाने में रविंद्रनाथ ने इतने मजबूत नारी चरित्र कैसे गढ़े होंगे | उनके जन्मदिन पर उनको मेरा प्रणाम |





     











                 












                                                                            

October 17, 2012

जेम्स बॉन्ड अभिनेत्रिया भी भई नारीवादी --------mangopeople





एक खबर पढ़ी की जेम्स बांड फिल्मो में काम करने वाली अभिनेत्रियों को " बॉन्ड गर्ल" कहा जाता है किन्तु 23 वे बॉन्ड फिल्म में काम कर रही हॉलीवुड अभिनेत्रीया  बेनेरिस  मार्लो  और निओमी  हैरिस को इस नाम से परहेज है उनका मानना है उन्हें "बॉड गर्ल"  नहीं "वुमन"  कहा जाये । असल में  इन फिल्मो में काम कर रही अभिनेत्रियो को केवल एक  सेक्स बम की तरह पेश किया जाता है जबकि ऐसा नहीं है , महिला किरदार भी बॉड की तरह ही चालक समझदार और कई मौको पर एक्शन भी करती है और बॉड की जान तक बचाती है , उसके मुकाबले जिस्म दिखाने के दृश्य तो काफी कम होते है किन्तु उन्हें अपना खुबसूरत बदन दिखने वाली किशोरी की तरह सेक्स बम ही बना कर प्रचारिक किया जाता है जो गलत है  । इसी बात का विरोध किया जा रहा है और ये विरोध भी कोई पहला नहीं है जहा बॉड फिल्म में नायिका बनने के लिए होड़ मची रहती है वही कुछ अभिनेत्रियों ने इस किरदार को करने से ही मना भी किया है .क्योंकि उनका मानना है की जेम्स बॉड को महिलाओं के जज्बातों की क़द्र नहीं हैं वह अपने काम निकालने के लिए उन्हें मोहरा बनाता हैं और फिर उनसे किनारा कर लेता हैं यहाँ तक की वह अलग अलग देशों में जाता है और अपने अहम् की संतुष्टी के लिए कई महिलाओं के साथ बेड साझा करता हैं.( राजन जी के ब्लॉग से ) । अमेरिका जैसे देशो में भी महिला अभिनेत्रिया अपने सही स्थान की मांग कर रही है ।  भारत के लिए भी ये नया नहीं है अभी हांल में भी विद्या बालन की फिल्म डर्टी पिक्चर ने खूब पैसा कमाया तो पत्रकार उनसे पुछने लगे की क्या अब उन्हें पैसा कमाने वाले खान अभिनेताओ की तरह विद्या खान कहा जाये तो उन्होंने तुरंत जवाब दिया की क्यों विद्या खान क्यों किया जाये शाहरुख , आमिर और सलमान बालन क्यों न कर दिया जाये ( नीजि रूप से भी मुझे उनका ये जवाब बहुत ही पसंद आया ) । लिजिये अब तो अभिनेत्रिया भी नारीवादी बन गई वो भी किस देश की जहा पर ज़माने से महिलाओ के बराबरी की बात की जा रही है किन्तु विरले ही कोई पुरुष उनके किये को सम्मान की दृष्टि से देखता हो और बराबरी का बात करता हो । ऐसा नहीं है की कुछ उदाहरन है ही नहीं , आप को याद होगा एक अमेरिकी टीवी सीरियल " फ्रेंड्स " आता था पूरी दुनिया में काफी प्रसिद्द था उसमे 6 दोस्तों की कहानी थी जिसमे 3 महिला और 3 पुरुष थे जब वो धारावाहिक काफी प्रसिद्द हो गया तो महिला कलाकारों ने मांग की की उन्हें भी उतना ही पैसा दिया जाये जितना की पुरुष कलाकारों को दिया जाता है क्योकि उस धारावाहिक की सफलता में उनका बराबर का हाथ है , उनके उस कदम पर धारावाहिक के तीनो पुरुष कलाकार अपना अहम् सामने रखने  की जगह उनके साथ खड़े हो गए और बराबर पैसे देने की मांग करते हुए काम करने से इंकार कर दिया , नतीजा उन दिन से सभी को एक सामान पैसे दिए जाने लगे ( मतलब की महिलाओ के पैसे बढा  दिए गए पुरुषो के कम नहीं किये गए )। अन्तराष्ट्रीय महिला टेनिस खिलाडी भी महिला और पुरुषो को पुरुस्कारों  में मिलने वाले पैसो में बराबरी की बात करती रही है , उनकी बात को ये कह कर ख़ारिज कर दिया जाता रहा है की पुरुष 5 सेट मैच खेलते है और महिलाए 3 सेट ( ये भी कोई तर्क हुआ ) महिला खिलाडियों का   कहना है की लोग अच्छा खेल देखेने आते है न की यहाँ समय बिताने क्या पुरुषो के जो मैच तीन  सेट में ही ख़त्म हो जाते है तो उन्हें कम पैसे दिए जायेंगे । किन्तु बराबरी की ये सभी मांगों को नारीवादी सोच कह कर ख़ारिज किया जाता रहा है ।
    
                     समझ नहीं आता की नारी जब भी अपनी ,अपने अधिकारों ,बराबरी की बात करती  है तो उसे नारीवादी कह कर ख़ारिज क्यों कर दिया जाता है , किसी पुरुष की बातो को तो पुरुषवादी कह कर नहीं ख़ारिज किया जाता है यहाँ तक की कोई पुरुष नारी के बारे में लिखे तो उसे भी नारीवादी कह कर ख़ारिज नहीं किया जाता है बल्कि उसे तब संवेदनशील कह कर प्रसंसा की जाती है । कुछ दिन पहले देवेन्द्र जी के ब्लॉग पर मुक्ति जी के फेसबुक पर विवाह को लेकर एक टिप्पणी पढ़ी  " कल एक ब्लोगर और फेसबुकिया मित्र ने मुझे ये सलाह दी की मै शादी कर लू , तो मेरा आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित हो जायेगा :) इस प्रकार का विवाह एक समझौता ही होगा , तब से मै स्त्रियों द्वारा  " सुरक्षा " के लिए  चुकाये जाने वाले कीमत के विषय में विचार विमर्श कर रही हूँ और पुरुषो के पास ऐसा कोई विकल्प न होने के मजबूरी के विषय में भी :) इससे पहले मुक्ति जी के मित्र की बात का ही जवाब दे दूँ , जिस समाज में हम रहते है वहां आज भी स्त्रिया खुद से विवाह नहीं करती है बल्कि उनका विवाह किया जाता है पिता, भाई आदि आदि के द्वारा और कब करना है किससे करना है कैसे करना है आदि आदि का निर्णय भी वही करते है तो सलाह किस पिता भाई को ऐसी देने चाहिए की ,  पिता जी भाई जी अपने बहन बेटी का झट से विवाह कर दे ताकि उसकी सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा का "बोझ" ( यदि वो ऐसा समझते  हो तो ) आप पर से उतर जाये , अब वो भाई और पिता उन्हें कैसे जवाब देते है ये तो इस बात पर निर्भर होगा की वो अपनी बेटी या बहन का विवाह क्या सोच कर करते है ( क्या आप को इसमे खाप पंचायत वाली सोच नहीं दिख रही है की बेटियों का बलत्कार हो रहा है तो उनका विवाह 15 साल में ही कर दो ताकि आप से उसकी सुरक्षा का झंझट छूटे और बला किसी और पर जाये )  स्त्री तो यहाँ कोई मुद्दा ही नहीं है क्योकि यदि मात्र सामजिक और आर्थिक सुरक्षा के लिए विवाह किये जाते है तो वो सब कुछ तो स्त्री को बिना कुछ भी किये अपने पिता के घर में मिल ही रही है उसके लिए उसे विवाह की क्या जरुरत है सोचना तो उस पिता को है की क्या वो अपनी जन्म दी हुई बेटी को आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा नहीं दे सकता है उनका लालन पालना जीवन भर नहीं कर सकता है , और यदि  ये सलाह किसी स्त्री को दी जा है की वो शादी कर ले , मतलब की वो अपने विवाह के लिए फैसले लेने के लिए स्वतंत्र है , तो ये बात भी ध्यान में रखनी चाहिए की हमारे समाज में जो स्त्री अपने विवाह के फैसले लेने के लिए स्वतंत्र  है उसे किसी और से सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा की जरुरत नहीं है ।

                                    
                                                              दुनिया में सत्ता पाने उसे बनाये रखने का सबसे कारगर तरीका है डर पैदा करना , धर्म राजनीति से लेकर पुरुष भी स्त्री पर अपनी  सत्ता,  डर दिखा कर ही काबिज रखता है , जैसे की विवाह को सुरक्षा का नाम दे कर उसके अन्दर स्त्री पर सत्ता सिन रहना , अब जब की स्त्री को ये बात  समझ में आ रही है कि  एक तो विवाह मात्र सुरक्षा नहीं है दुसरे ये की अब कम से कम हम अपनी सामजिक और आर्थिक सुरक्षा के लिए किसी और पर निर्भर नहीं है , वैसे ये बात भी सोचने की है की जिस विवाह को स्त्री के लिए हर तरीके से सुरक्षा बताया गया वहां  वो सारी सुरक्षा उसे मिलती हो ऐसा भी नहीं है , घरेलु हिंसा के सामने आते मामले बता रहे है की वो शारीरिक प्रताड़ना से अपने ही घर और घरवालो से सुरक्षित नहीं है , यहाँ तक की महिलाए अपने ही घर में बलात्कार से भी सुरक्षित नहीं है , निम्न वर्ग, खेती बड़ी वाले गांवो, मुंबई जैसे शहरों में बड़ी संख्या में महिलाए आर्थिक रूप से घर में बराबर का सहयोग कर रही है तभी घर चल रहा है , फिर किस बात की सुरक्षा ये विवाह उन्हें प्रदान कर रहा है , फिर वो क्यों उस विवाह को अपनाये जो उन्हें मात्र गुलाम बनाने और अपनी जरूरतों को पूरा करने की सोच के साथ पुरुष करता है ( यहाँ मै सभी पुरुषो की बात नहीं कर रही हूँ पर जिनके विचार ऐसे है उनके लिए , किन्तु अफसोस की ज्यादातर के ऐसी ही है,  चाहे जानकर या चाहे अनजाने में  ) । अब जब नारी विवाह के "अर्थो" को बदलने की बात कर रही है तो कुछ पुरुषो के द्वारा एक नया डर  पैदा किया जा रहा है , लो जी नारी विवाह नहीं करेगी तो बच्चे कैसे होंगे  समाज कैसे चलेगा , दुनिया नष्ट हो जाएगी , समाज में आराजकता फ़ैल जाएगी ( एक स्त्री के लिए समाज हमेसा से  अराजक ही रहा है है गोवाहाटी कांड से लेकर हजारो उदाहरण पड़े है  )परिवार का नमो निशान मिट जायेगा और न जाने क्या क्या बकवास । कितनी अजीब बात है की स्त्री सिर्फ ये कह रही है की आज विवाह के मायने बदलने चाहिए , विवाह एक तरफ़ा समझौतों पर नहीं हो , बल्कि दो लोगो के आपसी समझ पर होनी चाहिए , विवाह में जब दो पक्ष होते है और कोई एक पक्ष के बिना विवाह नहीं हो सकता है तो फिर दोनों का स्थान भी बराबर होना चाहिए , एक विवाह में जितना महत्व पुरुष के शरीर की जरूरतों को दिया जाता है उतना ही महत्व स्त्री के मन भावनाओ को भी दिया जाना चाहिए , साथ ही माँ कब बनना है और कितने बच्चो की माँ बनना है इसका निर्णय भी वो खुद करेगी , अपवाद स्वरुप ही कोई महिला ये कहती हो की उसे कभी भी माँ नहीं बनना  है , साफ है की वो बस इतना चाहती है की उसे अब विवाह के लिए पति परमेश्वर की नहीं "जीवन साथी" की जरुरत है ( वैसे उम्मीद है की लोग "जीवन साथी" का मतलब तो समझते होंगे ) । किन्तु शोर मचाया जा रहा है की लो ये नारीवादिया दुनिया ख़त्म करने पर तुली हुई है  महिलाए विवाह की नहीं करना चाहती है और न ही बच्चे को जन्म देना चाहती है , हा ये ठीक है की आज विवाह न करने वाली लड़कियों की संख्या बढ़ रही है क्योकि समस्या वही है की विवाह करने के लिए पति तो हजार मिल रहे है किन्तु कोई जीवन साथी नहीं मिल रहा है यदि वो विवाह नहीं कर रही है तो उसका सबसे बड़ा करना है की विवाह करने के लिए उन्हें कोई साथी ही नहीं मिल रहा है । अब जबकि वो आर्थिक और सामाजिक रूप से किसी और पर निर्भर नहीं है तो  वो पारम्परिक विवाह के उस रूप से बाहर आ चुकी है और विवाह के नए मयानो के साथ विवाह करना चाह  रही है किन्तु जिस रफ़्तार से स्त्री बदल रही है उस रफ़्तार से पुरुष नहीं बदल रहे है , ये बिलकुल ठीक बात है की आज विवाह के पारम्परिक सोच से पुरुष भी बाहर आ रहा है और वो भी मात्र  पत्नी की जगह हर कदम पर उसके साथ देने वाली जीवन संगनी की चाह रखता है ( कई बार उन्हें भी अपने लिए साथी खोजने में परेशानी होती है किन्तु शायद वो अपनी जरूरतों के आगे झुक जाते है और हार मान कर अंत में जो मिल जाये उसी से विवाह कर लेते है शायद कुछ महिलाए ये समझौते नहीं कर रही है इसलिए वो या तो देर से विवाह करती है या न करने का ही निर्णय ले लेती है , वैसे अपवाद हर जगह होते है  ) कुछ स्त्रियों के विवाह न करने से दुनिया नहीं ख़त्म होने वाली है और न ही समाज में आराजकता आने वाली है यदि आराजकता आज समाज में है और कभी ये बढ़ी तो उसका  कारण  पुरुष का चारित्रिक पतन होगा कोई स्त्री का विवाह न करना नहीं होगा।

                                                                                  दुख इस बात पर नहीं होता है की कुछ सिरफिरे दिमाग अपने चात्रित्रो के कारण  बेमतलब की चिल्ल पो करते है और चीजो को गलत ढंग से पेश कर लोगो को मुर्ख बनाने या डराने का काम कर रहे है , दुःख  इस बात का होता है की कुछ समझदार बिना बात को समझे उनकी बातो का समर्थन करने लगते है । विवाह एक बहुत ही नीजि सोच है हर व्यक्ति का अपना विचार होता है हर व्यक्ति के विवाह करने और न करने के अपने कारण  हो सकते है हमें उसमे हस्तक्षेप करने की या ये कहने की कोई आवश्यकता नहीं है की उनके लिए क्या सही या गलत है , कल को यदि वो जबरजस्ती विवाह कर लेते है और बाद में परिणाम तलाक होता है तो दो जिन्दगिया बर्बाद होती है उसका जिम्मेदार कौन होगा , क्या समाज इस बात से अच्छा बना रहेगा जिसमे ढेर सारे बेमेल, बे-मन से बने विवाह हो और वो सारा जीवन कुढ़ते हुए लड़ते हुए घुट घुट कर बिताये , क्या ऐसे विवाह वाले समाज बहुत अच्छे होंगे , एक बार कल्पना कीजिये की इस समाज में जन्म लेने वाले बच्चे कैसे होंगे , उन पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा । इसलिए जरुरी ये है की समय के साथ बदला जाये आज की जरूरतों को समझा जाये बदल रहे समाज के साथ लोग भी बदले और ये बात समझ ले की नारी भी बदल रही है बदल गई है और उसी के हिसाब से उसके आस पास की चीजो को भी बदलना होगा , और पुरुष को तो सबसे ज्यादा । ये बदलाव बहुत कठिन नहीं है बस आप स्त्री की जगह ये सोचिये की मेरी छोटी बहन या बेटी का मामला है देखिये ये  बदलवा आप में खुद ब खुद आ जायेगा , और बदलाव आ भी रहा है देखा है न जाने कितने ही पिताओ को जो अपनी बेटी के लिए समाज से पंगे लेते है , मुंह उठाये किसी से भी बेटी का विवाह नहीं कर देते है , कितने ही लड़को को इंकार कर देते है , सीना फुला कर बताते है की उनकी बेटी कितनी पढ़ी लिखी है और उसका वेतन कितना है , आज पिता बताते है की उन्हें कैसे वर की तलास है अपनी बेटी के लिए , बस ऐसे पिताओ  की संख्या कम है । किन्तु जैसे ही ये पुरुष पिता से पति के रूप में आता है इसकी भाषा बोली और सोच दोनों ही बदल जाती है इसलिए अब जरुरी है की पिता के बाद भावी पतियों की सोच में भी बदलाव आये नहीं तो वो सदा भावी पति ही बन कर रह जायेंगे ,क्योकि स्त्री को अपनी जरूरतों और भावनाओ को दबाना आता है वो उन्हें दबा कर विवाह न करने का तो निर्णय आसानी से ले लेगी और उसे निभा भी लेगी किन्तु किसी पुरुष के लिए ये करना मुश्किल होगा इसलिए नारी को ये बताने के बजाये की वो क्या करे और न करे अपने आप को बदलिए अपनी सोच को बदलिए , वरना हर स्त्री समाज की और लोगो की परवाह करना बिलकुल भी बंद कर देगी क्योकि अब घरो में बेटिया नहीं राजकुमारिया जन्म लेती है और याद रखिये की  राजकुमारिया कपडे नहीं धोती :)।



चलते चलते  

                    एक हमारा देश है जहा महिलाओ से जुड़ा शायद ही कोई मुद्दा कभी भी चुनावी मुद्दा बनता हो और एक अमेरिका है , राष्ट्रपति का चुनाव दुबारा लड़ने जा रहे ओबामा ने अपने प्रतिद्वंदी से बहस करते हुए बताया की  उन्होंने महिलाओ और पुरुषो को सामान वेतन दिलाये है , जरा देखिये और सुनिए की ये मुद्दा वहां का चुनावी मुद्दा भी है और खुद ओबामा भी इस बात का जिक्र कर रहे है । असल में वहा पर महिलाए वोट करती है मतलब अपनी सोच समझ के हिसाब से,  इसलिए वो भी वोटर है , जबकि भारत में महिलाए वोट देती है किन्तु वोटर नहीं है मतलब की ज्यादातर महिलाए अपने घर के पुरुष सदस्यों के कहने पर ही वोट दे देती है या उनकी बाते ही सुन कर उसी से प्रभावित हो कर वोट दे दिया , राजनीति में वो रूचि नहीं लेती है और अपना दिमाग नहीं लगाती है ज्यादा से ज्यादा सिलेंडर महंगाई को ले कर हाय तौबा मचा दिया बस , तो जरा अपनी वोट की शक्ति पहचानिए और वोटर बनिये।


October 09, 2012

स्पष्टीकरण ----------mangopeople



                                              मै भी हूं मैंगो पीपल लेकिन मै बनाना रिपब्लिक में नहीं रहती हूं , या मै अपने देश को बनाना रिपब्लिक नहीं मानती हूं , या मै अपने देश को बनाना रिपब्लिक नहीं बनाना चाहती हूं , या मैंने देश को बनाना रिपब्लिक नहीं बनाया है | सोचा स्पष्टीकरण दे दू इसके पहले की लोग आ कर मुझसे पूछे की आप भी सोनियागांधी के दामाद और प्रियंका गाँधी के पति राबर्ट वाड्रा , अब सवाल ना उठाइये की इतना लंबा परिचय क्यों, तो ये परिचय देना पड़ता है क्योकि इसके बिना उनका अपना कोई अस्तित्व नहीं है,  ये परिचय है तो डी एल एफ से वो बड़ा करीबी वाला रिश्ते है , साथ में कर रहे व्यापार में इतना विश्वास है की जो कंपनी खुद ब्याज के साथ उठाए कर्ज के बोझ तले दबी है वाड्रा को बिना ब्याज के करोडो का लोन दे देती है, इसी के बल पर डी एल एफ को मन चाही जमीने मिल जाती है , ये  परिचय है तो वो विभिन्न सरकारी विभागों को जैसा चाहे वैसा अपने व्यपार का लेख जोखा  बना कर दे दे वो ठीक बन जाता है , उनकी जाँच नहीं होती है , कोई पूछता नहीं की बिना एक भी कर्मचारी की कंपनी बिना किसी लेन देने के बिना किसी व्यापार के कैसे कई सौ करोड़ की कंपनी में बदल जाती है ,कोई पूछ ताछ नहीं होती है , ये परिचय है तभी आज विभिन्न राजनैतिक दल उन पर आरोप लगा रहे है उन से जवाब मांग रहे है,  ये परिचय है तभी १२१ साल ??? पुरानी कांग्रेस पार्टी का चपरासी से लेकर मंत्री संत्री नेता परेता तक उन्हें बचाने पर लगी है जिसके वो प्राथमिक सदस्य भी नहीं है , साफ है की कालिदास ? ने भले कहा है की नाम में कुछ नहीं रखा है किन्तु नाम के आगे पीछे लेगे परिचय में बहुत कुछ रखा है | तो अब इस परिचय गाथा के आगे मूल बात पर आते है की इसके पहले की कोई मुझसे पूछे आप भी उनकी तरह मैंगो पीपल है तो जरा बताइये की तीन साल में ५० लाख कुछ सौ करोड़ मै कैसे बदला जाता है , कैसे इतने बड़े बिल्डर से इतने कम दाम में मकान , प्लाट आदि ख़रीदा जाता है , कैसे किसी से भी बिना ब्याज के लोन लिया जाता है , तो आप को बता सभी को बता दूँ  की मुझे इस बारे में कुछ नहीं पता है,  अरे पता होता तो कब का खुद ही घर मकान दुकान गहना गुत्ता बेच बांच कर हम भी लाखो को अरबो में बदल चुके होते ( हा यदि रातो रात हम पेट्रोल पर 3 रु का फ़ायदा पा  रही सरकार के पेट्रोल की कीमतों में  71( मुंबई में ) पैसे की भारी भरकम राहत से करोडपति बन जाये तो मेरी गलती नहीं है )  | एक बात याद रखिये की मैंगो कई तरह का होता है एक होता है , एक होता है देशी मांगो पिलपिला सा जिसे काट कर , गुलगुला कर निचोड़ कर बेदर्दी से खा लिया जाता है सड़क पर ढ़ेले पर उलट कर २० रु किलो बेच दिया जाता है वो वाले मैंगो पीपल है आप और हम और दूसरा होता है  खास मैंगो यदि उसे बिदेश से मंगाया जाये या किसी बिदेश और भारतीय खास मैंगो से मिला कर उगाया जाये तो वो और भी खास हो जाता है  जो बड़े बड़े सुपर स्टोर में झाड पोछ कर सजा कर रखा जाता है और बिकता है १००० से १५०० रु दर्जन जिसे हम और आप बस देख कर आँख ही सेक सकते है उसे पाने का सपना देख सकते है , उसे पा नहीं सकते है | जरा  नींद से जागिये और अपने देशी पिलपिले मैंगो के अवतार को स्वीकार कीजिये और हा ये भी मत सोचिये की देश यदि बनाना रिपब्लिक बन गया है या बन जाये तो आप को बनाना सस्ते में मिलेंगे जी नहीं ऐसा भी नहीं होने वाला है , हा एक मायने में अपना देश तो बनाना रिपब्लिक बन ही गया है की यहाँ सरकार में बैठे लोगों , उससे जुड़े लोग , उसको फायदा पहुँचाने वाले लोगों के लिए कोई नियम कानून आदि आदि नहीं होता है इसलिए यदि श्री श्री १०४ राबर्ट वाड्रा अपने देश को बनाना रिपब्लिक बोलते है तो सही ही कह रहे है इसमे मजाक वाली का बात है |
                                                  दिमाग पर जोर डालू तो कुछ ६-७ साल पुरानी बात है नोयडा के एक बड़ी कंपनी के बड़े आफिसर का छोटे बच्चे का अपहरण हो गया था फिरौती ५ करोड़ मांगी गई थी सपा के अमर सिंह रात दिन वहा जा कर बैठे थे उनकी सरकार थी बड़ा हो हंगामा हुआ था पिता हाथ जोड़ जोड़ कर मिडिया के सामने रो रहा था की आप लोग खबर ना दिखाए मेरे बेटे की जान को खतरा हो सकता है बच्चा कुछ दिन बाद सही सलामत आ गया खबर उडी की रकम दे कर बच्चा वापस आया और अमर सिंह ने कहा की रकम दी गई थी किन्तु बच्चे के साथ वो भी बरामद हो गई , लो जी जैसे ही ये खबर आयकर विभाग को मिली विभाग ने उस पिता को नोटिस भेज दिया की आप के पास ये रकम कहा से आई पूरी जानकारी दे और बाद में इनके घर रेड भी पड़ी , इधर अमिताभ का रिश्ता गाँधी परिवार से टुटा और उधर उनको आयकर विभाग की नोटिस मिलने की झड़ी लग गई , यहाँ तक की अस्पताल में भर्ती थे वहा भी नोटिस भेज दिया गया और कितन किस्से कहानी सुनाये आप सभी समझदार है |

                                                                            २



 हरियाणा में महीने भर के अंदर महिलाओ के साथ बलात्कार होने का रिकार्ड बनने जा रहा है ( केवल पुलिस में  दर्ज होने वाले ) परेशान हो कर खाप पंचायतो ने इसका तोड़ निकाल दिया कहा है की हम सरकार के पास प्रस्ताव भेजेंगे की अब लड़कियों का विवाह १५ साल में कर देने की आज्ञा दे | विवाह एक बहुत बड़ी सुरक्षा कवच होती है लड़कियों की सुरक्षा के लिए एक बार विवाह हो जाये तो कोई भी उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता है | इस तरह की घटनाए आज जन्म ली बच्चियों के साथ और छोटे बच्चो के साथ भी हो रही है तो क्या कल विवाह की आयु और कम किये जाने की वकालत की जाएगी । हमें तो ये  उपाय समझ नहीं आ रहा है  बढ़े बूढ़े जो कह रहे है वो ठीक ही कह रहे होंगे , हम लोगों को आदत है बुजुर्गो का अनादर करने की , उनकी बात नहीं सुनने की  |

March 05, 2012

टिपण्णी जो पोस्ट ही बन गई - - - - -- mangopeople

                  

    लो जी लिखने बैठी थी तो टिपण्णी लेकिन इतनी लम्बी हो गई की एक पोस्ट ही बन जाये फिर मेरी बनिया बुद्धि ने कहा की इतनी मेहनत से टिपण्णी लिखी है बस एक ही व्यक्ति क्यों पढ़े अपनी पोस्ट बना कर डाल देती हूँ आम के आप गुठलियों के दाम मेरी पोस्ट पर पाठको की आवाजाही भी हो जाएगी थोड़ी टी आर पी भी मिल जाएगी  ।
                   टिपण्णी नारी  ब्लॉग  के  इस  पोस्ट  पर  दी  है  पूरा माजरा जानने के लिए तो उस पोस्ट पर ही जाना होगा क्योकि नारी ब्लॉग के कुछ कापी कर नहीं सकते :)




                
              जीतनी बनिया बुद्धि है उसी हिसाब से आप के सवालो का जवाब देने का प्रयास कर रही हूँ शायद मेरा जवाब आप की उच्च श्रेणी की बुद्धि के समझ में आ जाये ।
        मै भी नहीं मानती की ताजमहल से ले कर पिरामिड तक किसी का भी अस्तित्व नहीं है , क्योकि उन सब को मैंने निजी रूप से नहीं देखा है किसी और ने देखा है तो मुझे क्या जब मैंने नहीं देखा तो मेरे लिए दुनिया में उनका कोई भी अस्तित्व नहीं है कोई और कुछ भी बकता रहे मुझे क्या,  इस हिसाब से आप की बात सही है की आप ने टी वी पर नहीं दिखा तो उस घटना का कोई अस्तित्व नहीं है  :)
                                                             क्या निचली कोर्ट के फैसले किसी घटना को सही ये गलत साबित करने के लिए काफी है तो फिर तो रुचिका से ले कर जेसिका और मट्टू तक के केस में निचली अदालतों ने अपराधियों को बाइज्जत बरी कर दिया था तो क्या माना जाये वो सब निर्दोष थे और बाद में जो उपरी अदालतों ने फैसलों को पलटा वो सब चालबाजिया थी झूठ के बल पर केस जीते गएऔर इस तरह के हजारो केस होते है ।
                                 आप ने दहेज़ के बिना विवाह किया बहुत ही अच्छा काम किया सभी युवाओ को आप से प्रेरणा लेनी चाहिए किन्तु क्या आप के मना करने के बाद भी आप के ससुराल वालो ने आप को जबरजस्ती दहेज़ दे दिया था । निश्चित रूप से उन्होंने आप को उपहार के रूप में सामान लेने की पेशकश की होगी और आप के मना करने पर नहीं दिया होगा या आप ने दृढ़ता से मना कर दिया होगा । क्या आप को लगता है की लडके वाले दहेज़ न मागे और लड़की वाला जबरजस्ती लोगो को दहेज़ देता है ।
                         रही बात पैसे वाला लड़का खोजने की तो हर व्यक्ति अपनी लड़की के वर के  लिए दो चीजे ध्यान में रख कर चलता है एक तो दोनों परिवारों की सामजिक हैसियत एक बराबर हो और ये केवल बनिया परिवारों में ही नहीं होता है बल्कि समाज के हर तबके में यही रिवाज है की सम्बन्ध हमेसा अपने बराबर वालो से ही बनाया जाता है ( विवाह तो बहुत बड़ी चीज है कई जगह तो मित्रता का सम्बन्ध और परिचय तक बराबर वालो या खुद से बड़े सामाजिक हैसियत वालो से ही बनाया जाता है ) ये समाजका एक रूप है आप ख़राब कहे या अच्चा पर समाज में यही प्रचलित है । विवाह के लिए दूसरी बात होती है वर की योग्यता जिसे देखा कर कई बार लोग लडके से जुडी दूसरी बातो को अनदेखा कर देते है ।
                                                            आप की इस बात से कोई भी सहमत नहीं होगा की यदि कोई गरीब  लड़का दहेज़ न ले रहा हो तो किसी को भी अपनी लड़की का विवाह उससे कर देना चाहिए,  क्यों कर देना चाहिए किस आधार पर , बस इसलिए की वो दहेज़ नहीं ले रहा है विवाह का ये आधार नहीं होता है सबसे बड़ा आधार होता है की लड़का मानसिक , शारीरिक और आर्थिक रूप से विवाह से जुडी  जिम्मेदारियों को निभा सके । हर व्यक्ति देखेगा की दहेज़ तो नहीं ले रहा है कितु वह लड़की से विवाह करने के कितने योग्य है तीनो ही रूप में यदि योग्य हुआ तो कोई भी इंकार नहीं करता है जैसे की आप के ससुराल वालो ने अपनी लड़की से आप का विवाह किया । हम सभी तो सब्जी लेने भी जाते है तो सस्ता की जगह अच्छी सब्जी को महत्व देते है भले वो महँगी मिले तो फिर कोई भी अपनी लड़की के विवाह के लिए दहेज़ नहीं लेना कैसे आधार बना सकता है ।
                                                     रही बात पैसे वालो के घर शादी करने की या लड़की वालो के पैसे के बल पर लड़का खोजने की तो ये बात तो केवल पैसे वालो के घर होता है जरा माध्यम वर्ग और गरीब तबके की और देखिये जिसके घरो की लड़कियों के जन्म के साथ ही उसके दहेज़ की चिंता सर पर आ जाती है जन्म के साथ पैसा जुटा रहा पिता ये विवाह के समय देखता है की सालो से जुटाया पैसा भी विवाह के समय लड़को वालो की मांग के आगे कम पड़ रहा है चप्पले घिस जाती है उसकी एक लड़की के विवाह में फिर उनकी सोचिये जिनकी कई लड़किया होती है माध्यम वर्ग तो फिर भी मरते जीते कर लेता है गरीब तबके की हालत तो और बुरी है योग्य से अयोग्य लड़का भी भारी दहेज़ मांगता है उनके हैसियत के हिसाब से । माध्यम और गरीब घरो में तो घरो में महंगे सामान ही लडके के विवाह में मांगने के लिए छोड़ दिया जाता है । कोई भी माध्यम या गरीब वर्ग की लड़की का पिता आप को नहीं मिलेगा जो योग्य वर होने के बाद भी दहेज़ न लेने वाले लड़को को इंकार कर दे ।
                 अब आते है दहेज़ केस को साबित करने की तो कोई भी लड़की वाला ये सोच कर विवाह नहीं करता है की कल को उसकी लड़की को सताया जायेगा और दहेज़ माँगा जायेगा और मै इन पर केस करूँगा तो मुझे अभी से दहेज़ देने के सरे साबुत जुटा लेना चाहिए हा एक लिस्ट होती है सादे कागज पर उसे भी ज्यादा दिन संभाल कर नहीं रखा जाता है और न ही क़ानूनी रूप से उसका ज्यादा महत्व नहीं होता है । रही बात दहेज़ के पैसो को चेक या ड्राफ़ के रूप में देने की तो मै बस इतना ही कहूँगी हा हा हा हा हा हा हा इस बात पर मै बस हंस सकती हूँ :) ।
                  अब निशा के केस पर आते है वो ये केस किस आधार पर हारी मुझे नहीं पता है  मै कानून की जानकर नहीं हूँ किन्तु जब ये केस हुआ था तो तभी जानकारों ने बताया था की ये केस साबित करना बहुत ही मुश्किल होगा क्योकि भारतीय कानून के मुताबिक दहेज़ केस विवाह के बाद ही बन सकता है विवाह के पूर्व नहीं, जबकि निशा ने कहा है की मनीष के साथ  विवाह नहीं हुआ है और कुछ दिन बाद ही उसने दूसरा विवाह कर लिया था,  यदि अब वो कहती है की विवाह हुआ था तो उसकी दूसरी शादी गलत और अपराध साबित हो जायेगा और विवाह नहीं कहने पर मजबूत केस नहीं बनेगा । इसके साथ ही ये भी कहना चाहूंगी की कानून का दुरुपयोग आम लोग नहीं कानून के जानकर, क़ानूनी सलाह देने वाले और केस को अदालत में लड़ने वाले कर्त६ए है आप आदमी नहीं जनता की उसे इंसाफ के लिए किस धरा के तहत केस करना चाहिए वो तो कोई जानकारी ही बताता है हा एक दो केस जरुर हो सकते है जहा जबरजस्ती वकील को अपने बताये केस पर लड़ने को कहा जाता है ।
                          ९०% वाली बात मैंने इसलिए कही क्योकि जब आप कही पर कोई आंकड़े देते है तो आप को उसका स्रोत भी बताना चाहिए वरना "ज्यादातर" या " बहुत सारे " जैसे शब्दों का प्रयोग करना चाहिए । आप किस आधार पर कह रहे है की ९०% केस झूठे होते है ।
                                                              लड़कियों को विवाह ही नहीं करनी चाहिए ये क्या बात हुए ज्यादातर  नेता चोर है इसलिए वोट देने मत जाओ , ज्यादातर पुलिस वाले भ्रष्ट है तो कोई शिकायत पुलिस वाले के पास मत ले जाओ आदि आदि क्या समाज में इस तरह से रहा जाता है ऐसा नहीं होता है । लड़कियों के विवाह नहीं करना इस समस्या का समाधान नहीं है और ना ही उनके कमाने से ये समस्या जाएगी क्योकि दहेज़ कमाने वाली लड़कियों से भी माँगा जाता है ये बात आप टिपण्णी में दूसरो ने भी कही है ।
   " अमीर लडके से शादी करके लड़की मौज कर सके "
                निहायत ही घटिया और बकवास बात लिखी है आप ने ये "मौज" करना क्या होता है । लड़की वाले मोटी रकम दे कर अमीर लडके से अपनी लड़की की शादी करते है ये आप को ख़राब लगता है किन्तु अमीर हो कर भी  पैसा ले कर किसी से भी  शादी कर लेने वाला लड़का आप को अच्छा लगता है मुझे तो लगता है की ऐसे केस में यदि कोई घटिया है तो लड़का ही ज्यादा घटिया है , क्योकि लड़की का पिता तो जो कर रहा है वो अपनी बेटी के अच्छे और आर्थिक रूप से अच्छे भविष्य के लिए ऐसा कर रहा है ।
                                  और मैंने अपने बनिया और बनिया बिरादरी की बात इसलिए की क्योकि मै केवल अपने आस पास, अपने आँखों देखी  और करीब हुए घटनाओ के बारे में ही बताना चाह रही थी ना की समाज में बस प्रचलित किसी बात का दोहराने का प्रयास कर रही थी ताकि लोगो को लगे की मै सच बात कर रही हूँ ना की बस यु ही कोई आंकड़े फेक रही हूँ । हा पर जिस तरह आप ने उस पर अपने पैजामे से निकल कर  टिपण्णी की है उसके आप की सोच समझ और बुद्धि किस बिरादरी की है ये जरुर पता चला गया । आप की बिरादरी तो मुझे नहीं पता क्योकि बनिया कभी किसी की बिरादरी नहीं देखता है उसे तो बस अपना लाभ देखना है सामने कोई भी बिरादरी का जाति का व्यक्ति हो हा  आप की उच्च कोटी की बुद्धि से ही मुझे पता चला की अपना लाभ देखना तो केवल हम बनियों को ही आती है बाकि दुनिया तो संत होता है । :))))
                 

चलते चलते  
                        जब मुझे और मेरी बनिया बुद्धि और सोच का वाह वाही की गई तो सोचा जवाब में मै भी सामने वाले की बिरादरी की वाह वाही जरा अपने ढंग से कर दूँ  क्या है की दूसरो की जाति बिरादरी और आर्थिक स्थिति पर उंगली उठा कर कुछ कहने और सामने वाले को निचा दिखने में जितना आन्नद "मजा"  "मौज" आता है उसकी तो बात ही कुछ और होती है दिमाग में दो चार उनके नाम से झलक रहे जाति से दो चार वाह वाही सोच भी ली पर फिर मेरी बनिया सोच ने मुझसे कहा की उन्होंने मेरी बिरादरी के बारे में कुछ कहा फिर मै उनके बारे में कहूँगी फिर वो पलट के मेरे बारे में कहेंगे और मै उनके फिर ये सिलसिला लम्बा हो जायेगा और जब उसे जोड़ा घटाया तो पता चला की सौदा फायदे का नहीं घाटे का है समय अपने पास है नहीं बिटिया रानी ने महीनो पहले ही अपनी छुट्टियों के लिए मुझे बुक कर लिया था इसमे फंस गई तो उधर से नुकशान हो जायेगा तो ये सौदेबाजी यही छोड़ दी । क्योकि जिस काम में बनिए का फायदा ना हो वो नहीं करता है बाकि लोगो की तरह थोड़े ही की किसी को कुछ कहने के लिए,  अपने बुरे अनुभवों की खुन्नस निकालने के लिए , अपने संबंधियों को ब्लॉग पर सारे आप बेइज्जती करने के लिए अपना कीमती समय और दिमाग लगाये । कहते है की जहा फायदा ना हो वह तो गली देना क्या  थूकना भी नहीं चाहिए  :)))))
 

October 18, 2011

औरत है न इसलिए ज्यादा चिल्लाती है - - - - - mangopeople



"औरत है न इसलिए ज्यादा चिल्लाती है "
निश्चित रूप से ये सुनने के बाद मेरे अंदर की औरत या कह लीजिये नारीवाद को जागना ही था | मैंने भी जवाब दिया की "औरत यू ही नहीं चिल्लाती है ज़रुर कोई तकलीफ़ होगी तभी चिल्ला रही है , क्या भूखी है "
"नहीं मैडम खाना तो खा चुकी है"
"तो ज़रुर उसके बच्चे से अलग किया होगा"
" तो क्या करे ,सारे दिन  बच्चे के पास ही बैठी रहेगी तो फिर आप लोगो को घूमने कौन ले जायेगा |
देखा मैंने कहा न ज़रुर कोई तकलीफ़ होगी तभी वो चिल्ला रही है उसके बच्चे से उसे अलग करोगे तो क्या वो चिल्लाएगी नहीं |
अभी हाल में ही राजस्थान गई थी तो वहा जा कर ऊंट की सवारी तो करनी ही थी ,  मेरे बैठने के बाद जब पति देव अपने ऊंट पे बैठने लगे तो वो जोर जोर से चिल्लाने लगी और दोनों ऊँटो के मालिक हाथों से उसका मुंह बंद करने लगे जब मैंने कहा की ये क्यों चिल्ला रही है तो उसके जवाब में बड़े बे फिकरी से और हंसते उसने हमें बताया की वो औरत है इसलिए ज्यादा चिल्लाती है ( वो हमें बताना चाह रहा था की ये मादा ऊंट है ) गलती उसकी नहीं है असल में हजारों वर्षो से महिलाओ के लिए ऐसे ही सोच समाज द्वारा बना दी गई है की महिलाएँ बस बिना कारण बोलती और चिल्लाती है उनकी बातों को ज्यादा सुनने या महत्व देने की जरुरत नहीं है और ये महत्वहिन होना उनकी बातों से चला तो उनके अस्तित्व तक आ गया , अब उनके होने को ही महत्वहीन बना दिया गया है | यही कारण था की जब मैंने ऊंट के मालिक से सवाल किया की भाई तुम्हारे गांव में कल और आज दो दिन में मैंने लड़के ही लड़के देखे है लड़की तो मुझे बस एक ही दिखी तो जवाब में उसने कहा की होती तो है पर लड़कियाँ न कमजोर होती है बचतीं कहा है गांव है यहाँ कौन डाक्टर मिलेगा तो मर जाती है |
"मर जाती है या मार दिया जाता है | '
" अरे नहीं अब पहले जैसा नहीं है अब तो बहुत कम लोग ही मारते है | "
मेरे सवाल पर उसके द्वारा बड़े आराम से सहज स्वीकृति मेरे लिए आश्चर्य जनक था मुझे विश्वास नहीं हो रहा था की वो इस बात को इतनी आसानी से स्वीकार कर लेगा,  उसे तो जरा भी झिझक नहीं हुई ये मान लेने में की आज भी लोग बेटी को जन्म लेने के बाद मार देते है | थोड़े देर बाद फिर पूछा की
" तुम्हारे यहाँ तो सरकार बेटी होने पर पैसे देती है |"
" जब बच्चे अस्पताल में होंगे तब ना यहाँ तो सब बच्चे घर में ही होते है |"
" तो क्या यहाँ सरकारी अस्पताल नहीं है क्या "
" है तो लेकिन वहा डाक्टर कहा होते है सुबह कुछ घंटे के लिए आते है फिर चले जाते है "
" यदि किसी की ज्यादा तबियत ख़राब हो गई तो "
'तो फिर गाड़ी करके शहर ले जाते है "
 " तब तो वहा तो १४०० रु मिलते होंगे ना बेटी होने के फिर क्यों मार देते हो "
वो थोड़ी देर चुप रहा फिर कहा " १४०० रु में क्या होता है इतने में क्या बेटी पल जायेगी लालन पालन दहेज़ सब १४०० रु में होता है क्या '
जी तो किया की पूंछू की बेटे कैसे पलते है क्या उन्हें पालने में पैसे खर्च नहीं होते है क्या उनके विवाह में पैसे खर्च नहीं होते पर जाने दिया जानती थी की उसके पास मेरे बातों का कोई सही जवाब नहीं होगा फिर उसने तो ये परंपरा बनाई नहीं है वो तो बस बिना दिमाग लगाये उसे आगे बढ़ रहा होगा | जब हम घूमने के बाद ऊंट से उतारे तो बच्चों के झुंड ने फिर हमारे करीब आ कर खड़े हो गए और लड़कों का झुंड लड़की से कुछ खुसुर फुसुर करने लग तभी लड़की आगे बढ़ी और हमारी बिटिया रानी से पूछी " वॉट इस योर नेम " उसे बिना झिझक आगे बढ़ अंग्रेजी में सवाल करता देख बिटिया से पहले मैंने उससे पूछा स्कूल जाती हो तो उसने ना में सर हिला दिया तो वो सारे लड़के जाते है क्या तो उसने धीरे से कहा हा | समझ गई की बिना स्कुल के ही वो वहा आने वाले पर्यटकों से सुन सुन कर सिख गई होगी इन प्रतिभाओ को दुसरे कब समझेंगे पता नहीं |
                           आप पढ़ने वालो सोच रहे होंगे कि बेचारा सही कह रह है बेटियों के दहेज़ को लेकर माँ बाप में चिंता तो होती ही है यही कारण है की बेटिया मार दी जाती है गरीब लोग और क्या कर सकते है फिर अनपढ़ भी था इसलिए सब बोल गया तो जरा रुकिए ये लेख अभी ख़त्म नहीं हुआ है | अब राजस्थान गये है तो बिना बड़े बड़े महलों किला राजा महाराजो की बातों के बिना पूरी थोड़े ही होती है | ऐसे ही एक महल घुमाते हुए गाइड हमें दिखाने लगा की देखिये ये सोने चाँदी के बने पालने इनमें हमारे राजकुमार सोते खेलते थे हर राजकुमार के लिए एक अलग शानदार पालना होता था बाकी के लिए साधारण होते थे |  मैंने कहा की बाकी के कौन ? वही जो रानियों से अलावा होते थे उसने जवाब दिया | तो ये सारे पालने रानियों से हुए राजकुमार राजकुमारियो के लिए थे मैंने पूछा | नहीं नहीं ये बस राजकुमारों के लिए थे राजकुमारिया तो साधारण लकड़ी के बने पालनो में रहती थी | मन ही मन सोचा की  वाह जी वाह क्या बात है राजकुमारियो की स्थिति राजाओ के नाजायज आलौदो के बराबर थी बहुत खूब यहाँ कौन सी गरीबी का वास है यहाँ किस लालने पालने की कमी है फिर भी अपनी ही बेटी और बेटों के साथ इतना भेद,  नाजायज औलदो की तरह ही बेटी के अस्तित्व को ही स्वीकार नहीं क्या जा रहा है | मैंने फिर उससे पूछ तो फिर कितनी बेटी थी राजा को जरा जवाब सुनिए अरे बेटिया बचतीं ही कहा थी | इस बार ये सुन कर ज्यादा आश्चर्य नहीं हुआ इस बारे में भी सुन चुकी थी की कई बार राजाओ के घर भी बेटिया मार दी जाती थी ताकि विवाह के समय दूसरों के सामने सर ना झुकाना पड़े,  राजशी परिवार से थे किसी के सामने सर नहीं झुका सकते थे और जो नहीं मारते थे वो बेटियों के प्रयोग वस्तु की तरह राज्य की सुरक्षा,  सम्बन्ध बनाने के नाम पर एक दूसरे को विवाह के नाम पर दे देते थे | फिर उससे भी मैंने आज के हालत पर सवाल किया " तो आज कल भी बेटिया ऐसे ही नहीं बचतीं है ना यहाँ, या आज भी बेटिया मार देते है "
 " नहीं ये सब अब यहाँ कहा होता है अब लोग ऐसा नहीं करते है " उसने तुरंत जवाब दिया |
"  पर लड़कियों की संख्या तो राजस्थान में बहुत ही कम है " जानती थी ये इतनी जल्दी स्वीकार नहीं करेगा पर उसने भी स्वीकार करने में जरा भी देरी नहीं की दूसरे सवाल के बाद ही मान गया |
" शहरों में एक आध लोग करते होगें हा गांवो में होता है ये सब शहरों में नहीं | "
 अब बोलिए गाइड अनपढ़ गावर नहीं था और ना ही मैं किसी गरीब के घर में खड़ी थी फिर भी बेटियों को लेकर वही सोच | ये सोच बस बेटियों को ही लेकर नहीं था ये सोच पूरी महिलाओ के लिए था | राजा का रंग महल दिखाते हुए गाइड सीना फूला कर बताता है की फला राजा की ३६ रानिया थी राजा को सभी को खुश करने के लिए अफ़ीम खानी पड़ती थी | 
"तो राजा फिर इतनी शादियाँ करता ही क्यों था " जवाब मालूम था फिर भी पूछ लिया |
" उस समय राजा शादी तो राज्य के लिए करता था राज्य को सुरक्षित बनाने के लिए | पर आज कौन करता है आज तो एक अकेली ही १३६ के बराबर होती है | "
मैंने जवाब दिया की " ज़रुरी भी है यही एक अकेली १३६ के बराबर ना हो तो आज भी लोग ३६ शादियाँ ना करने लगे और ये बताओ की फिर रानियों के अलावा भी उसके दूसरे बच्चे क्यों होते थे , उसकी क्या जरुरत थी राजा को | वो ना करता तो शायद अफ़ीम कम खानी पड़ती और ज्यादा ध्यान राज काज पर देते और ना इतने पैसे इन रंग महलों पर बहाते और ना देश में बाहरी आक्रमण से ये हालत होती | " मालूम था की इस बात का कोई जवाब उसके पास नहीं होगा एक गाइड ही था कोई इतिहास कार नहीं | वो बस मुस्करा कर इतना ही कह पाया की राजा लोगो को सब करना पड़ता था |
                                                           असल में समाज के लिए महिलाओ को अस्तित्व उपभोग की वस्तु से ज्यादा की नहीं थी |  बेटियों को मार देना और राजाओ के ढेर सारी पत्नियों के बाद भी अन्य स्त्रियों से रिश्ता रखना  उनकी सोच को दर्शाता है और अपनी रानियों को सौ पर्दे में रखना की बाहरी पुरुष उसकी एक झलक भी ना देख पाए ,हा शायद डरते हो की मेरी तरह ही ये भी महिलाओ को बस भोग की वस्तु समझता है और इसकी गंदी नजर कही मेरी महिलाओ पर ना पड जाये | उफ़ इतना पर्दा की महारानियो को बाहर देखने के लिए ढंग की खिड़किया तक नसीब नहीं थी जालीदार झरोखे होते थे जिसमे से रानिया बाहर देखती थी ( विश्वास कीजिये उसमे से ढंग से बाहर का कुछ भी नहीं दिखता था ) ताकि कोई बाहर का उन्हें ना देख ले महल के बाहर तो छोडिये महल के अंदर भी पर्दा था | देख लगा की क्या इस जीवन को देख कर कोई भी कहेगा की वो किसी महारानी का जीवन जीना चाहती है,  तौबा कोई भी नहीं जीना चाहेगा इस जीवन को |
                                                      रानी पद्मावती के "जौहर" करते हुए की पेंटिंग दिखाते हुए गाइड उनके शौर्य उनके हिम्मत और सुंदरता की गाथा गा रहा था उसे देख कर लगा की काश ये हिम्मत किसी और रूप में दिखाई गई होती काश की समाज का रूप कुछ और होता काश की महिलाएँ दुश्मन से अपनी रक्षा के लिए "जौहर प्रथा " की जगह कोई और जौहर दिखाती, काश की आत्महत्या करने की जगह वीरो की तरह पुरुषों के साथ तलवार ले युद्ध के मैदान में निकल जाती,  मरना तो यहाँ भी था और वहा भी | कम से कम मरने से पहले अपने राज्य और उसकी प्रजा के लिए कुछ कर जाती, कुछ दुश्मनों की गर्दन ही उड़ा देती क्या पता हार को ही बचा लेती | कुछ नहीं तो कम से कम महलों में घुसे दुश्मनों के ही सर तलवारों से उड़ा कर लड़ते हुए वीरगति को पा जाती , तो शायद "खूब लड़ी मर्दानी वो तो-----  " जैसी कोई कविता कही पहले कवी चन्द्र वरदाई द्वारा लिख दिया गया होता | शायद हमारे समाज का रूप और देश का इतिहास भूगोल ही कुछ और होता | काश की समाज में महिलाओ को उपभोग का सामान ना समझा जाता काश की महिलाओ को अपनी रक्षा के लिए जौहर प्रथा को ना अपनाना पड़ता | इस प्रथा के बारे में सोचती हूँ तो लगता है जैसे महिलाएँ उपभोग की वस्तु भर थी और उनका उपभोग बस उसका मालिक ही कर सकता था कोई दुश्मन उसका उपभोग ना कर सके इसलिए उन नारी रूपी वस्तुओ में एक खुद को नष्ट करने वाला एक बटन ( जैसे की फिल्मों में कोई  वैज्ञानिक अपनी खतरनाक अड्डे या मशीनों में लगा देता है ताकि उसे कुछ हो जाने पर किसी और के हाथ वो ना लगे और नष्ट हो जाये )  जौहर प्रथा के रूप में लगा दिया गया था की मालिक के कुछ होते ही वस्तु अपने आप नष्ट हो जाये |
                                                            ये प्रथाए ख़त्म नहीं हुई है चाहे जौहर प्रथा हो या पर्दा प्रथा आज भी जारी है भले किसी और रूप में ,  बलात्कार होने पर शर्म से लड़की ने आत्महत्या कर ली , छेड़ छाड़ से परेशान लड़की ने आत्महत्या कर ली , गरीब माँ बाप की बेटियों ने दहेज़ के कारण विवाह ना होने पर एक साथ आत्महत्या कर ली , दहेज़ के कारण ससुराल वालो ने जला दिया या खुद ही अत्याचारों से तंग आ कर आत्महत्या कर ली ताकि माँ बाप की इज़्ज़त बची रहे आदि आदि कितनी ख़बरे हम पढ़ते है ये क्या आप लोगो को आज भी जौहर प्रथा के होने का एहसास नहीं कराती है | क्या आज भी हम नहीं चाहते की लड़कियाँ अपने साथ रेप ना होने दे भले उनकी जान चली जाये,  कितनी वीरता से बताते है की लड़की ने जान दे दी पर अपनी इज़्ज़त (क्योंकि किसी ने उसके शरीर को ज़बरदस्ती छू दिया तो अब वो इज़्ज़त के लायक नहीं होती है ) नहीं जाने दी | हम आज भी चाहते है की लड़कियाँ जौहर कर ले और सीना फुला कर कहते है की जी हम तो उस देश के रहने वाले है जहा नारी अपनी इज़्ज़त बचाने के लिए अपनी जान भी दे देती है | मतलब की उस महान देश के वासी है जहा पीड़ित , जिस पर अपराध हुआ है वही मौत को गले लगा लेता है और अपराध करने वाला बाइज्जत घूमता है | सोचती हूँ ना जाने कितने बेटों ने अपनी और अपने माँ बाप की इज़्ज़त उतारी होगी अपने महान कामों से,  कभी किसी माँ बाप या समाज ने सोचा है की इस बलात्कारी , रिश्वतखोर , चोर, डाकू बेटे को अपनी जान दे देनी चाहिए अपनी इज़्ज़त के लिए या सुना हो किसी बेटे ने अपनी या घर की इज़्ज़त के लिए जान दे दी हो | नहीं जी बेटों तो इज़्ज़त के नाम पर जान लेने के लिए होते है जान देने का काम हमने तो बेटियों पर रख छोड़ा है बिलकुल वैसे ही जैसे हमने समाज के दूसरे काम नर और नारी में बाँट रखा है | पर्दे का भी नया रूप है आज लड़कियों के लिए पढाओ उतना ही जितना की विवाह के लिए ज़रुरी है , नौकरी मत करने दो ,शालीनता ,संस्कृति सलीके से कपड़ों के नाम पर सौ पाबंदियाँ लगा दो , जितना हो सके उसे घर में बंद करके रखो और अपनी इज़्ज़त और संबंधों के लिए उनको कही भी खूंटे से बाध दो विवाह के नाम पर और कहो की जब तक जीवित है यही बंधी रहे | कुछ भी तो नहीं बदला है बस किसी अन्य रूप में समाज में आज भी मौजूद है ये प्रथाये |
                                                       
                                                                                                 हमारी बिटिया तो वहा गई थी ख़ुशी ख़ुशी प्रिंसेस को देखने और उनके महलों को देखने बचपन से कहानियाँ सुनते आ रही थी,  मैं यही बोल कर उन्हें ले गई थी पर बेचारी को ज्यादातर जगहों पर तो ना तो प्रिंसेस दिखी और ना ही उनसे जुड़े सामान ही, ज्यादातर जगह  उनका नामो निशान भी नहीं दिखा | यहाँ आ कर मुझ पर गुस्सा किया और झूठ बोलने का आरोप लगा दिया अब क्या बताऊ की कैसे और क्यों हमारी राजकुमारिया ग़ायब होती जा रही है |
 
               स्पष्टीकरण -- -- उम्मीद है राजस्थान  के लोग इस लेख को अपने राज्य की,  की  जा रही बुराई के तौर पर नहीं देखेंगे ये बात पूरे देश के लिए कही गई है | ये संयोग है की मैं राजस्थान गई और वहा ये बाते आई ये विचार आया इसलिए इसे यहाँ लिख रही हूँ | शायद हरियाणा जाती तो ये सवाल पूछने पर कोई ताऊ लठ्ठा ले मेरे पीछे पड़ जाता या पंजाब में ये सवाल करने पर मुझे माँ बहन की गलियों से नवाज दिया जाता या फिर दिल्ली में सरकारी बाबू लड़कियों की इस हालत को मानने से ही इंकार कर देता और मुझसे कहता की आँकड़े दिखाइये |



April 06, 2011

आज मेरे ब्लॉग पर बस ये लिंक है - - - - - - mangopeople

आज मेरे ब्लॉग पर बस ये लिंक है यदि आप की इच्छा हो तो यहाँ जा कर मेरे विचार पढ़ ले यदि इच्छा  हो तो वही टिपण्णी भी दे दे नहीं देना है तो भी कोई बात नहीं नहीं आप समय निकल कर पढ़ ले मेरे लिए यही बहुत है | यहाँ टिपण्णी न दे यहाँ के टिपण्णी विकल्प को बंद समझे | 
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