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May 19, 2022

राज-नीति

बनारस में हमारे मोहल्ले के सभासद गिरीश अंकल हमारे पडोसी ही थे | बीजेपी के थे और हमारी याद से वही सालो साल से जीत रहें थे | एक बार सीट महिला आरक्षित हो गयी तो उनकी पत्नी खड़ी हो गयी वो भी जीत गयी  | ऊपरी तौर पर पूरा  मोहल्ला उन्हें ही वोट करता था | चुनावों के समय बाकि मोहल्ले में भले प्रचार करते लेकिन अपने मोहल्ले में शायद ही कभी चुनाव प्रचार करते थे  | बस वोटिंग के दिन आते सबके घर इतना  कहने की वोट देने चले जाना | कभी ये नहीं कहा हमें वोट करना | 


लेकिन एक साल मेरे घर के सामने छोटी सी  स्टेशनरी की दूकान  और सामने की गली में अपने ही घर में  आठवीं तक का एक छोटा सा स्कूल   चलाने वाले पासवान भाई बंधुओ ने अपने हफ्तों चले बीएसपी के प्रचार से उनका विश्वास हिला दिया | 


वो समय बैनर झंडी झंडा और लाउडस्पीकर वाला था | दिनभर दूकान से रिकॉर्ड किया प्रचार इतनी जोर का बजता कि सबके कान पक गए | पहले दो तीन दिन सभी ने दबी जुबान मजाक उड़ाया कि इससे कुछ बदलने वाला नहीं तीन दिन में पैसा ख़त्म प्रचार बंद | लेकिन प्रचार बंद नहीं हुआ और बीजेपी समर्थक लोगों टेंशन में आने लगे | 


हफ्ते भर बाद ही गिरीश अंकल भी प्रचार के लिए निकल पड़े | उस साल उन्होंने भी प्रचार  के लिए  भागा  दौड़ी की और जब रिजल्ट आया तो सब आश्चर्य में पड़ गये |  क्योंकि उन्हें उस साल रिकॉर्ड वोट मिले लेकिन जिस बीएसपी के प्रचार से वो डरे उसे  कोई खास वोट नहीं मिले थे | 


होता ये हैं कि कई बार विरोधियों का अति सक्रिय होना प्रचार करना समर्थको को अपने आप जागृत कर देता हैं | किसी और के आने के डर से सुस्त पडा समर्थक घर से निकल निकल भारी वोट करता हैं | 


 यूपी में आखिरी के तीन चरणों के चुनाव बाकी थे तभी पूरा देश और दुनिया रूस और यूक्रेन के युद्ध में फंस गया  हर तरफ से सिर्फ युद्ध की बातें हो रही थी यूपी चुनाव सब लोग लगभग भूल गए थे |  एक बारगी बीजेपी समर्थक भी लगभग निष्क्रिय हो गए थे | 

उसके बाद यह सारी खबरें एक के बाद  एक मीडिया में बीजेपी द्वारा प्लॉट की गई | जो बीजेपी पहले से ही अपने समर्थकों को सपा के फिर से सत्ता में आने का डर दिखा रही थी | यह सारी खबरें उसके समर्थकों को सक्रिय करने के लिए काफी थी | 


मजेदार बात यह थी कि यह खबरें बीजेपी के  समर्थकों में प्रचार के लिए प्लॉट की गई थी और इसको फैलाने वायरल करने का काम सपा समर्थकों ने किया  | सपा समर्थक यह समझ ही नहीं पाए कि 3 चरणों के चुनाव होने के पहले ही  कोई नौकरशाह  क्या कोई चुनाव का जानकार भी यह नहीं बता सकता की  चुनाव कौन जीतेगा | 


फिर किसी नौकरशाह की यह हिम्मत कैसे हो सकती है की मौजूदा सरकार के रहते और केंद्र में बीजेपी सरकार के होते वह चुनाव रिजल्ट के पहले ही विरोधी पक्ष के साथ खड़ा हो जाए | आखरी चरण के चुनाव होने तक जब तक सपा समर्थकों को यह बात समझ आती  प्लॉट की गई खबरें अपना काम कर चुकी थी  | बीजेपी अपने विरोधियों को अपना प्रचार सामग्री आसानी से बना लेती हैं  | 

May 17, 2022

राज-नीति के षड़यन्त्रकारी पासे

 

शकुनि मामा चौपड़ के खेल में बहुत बड़े महारथी नहीं थे जो भी कमाल था वो उनके दोनों  पासों में होता था | इसलिए अपनी राजनैतिक मंसा के खेल में दुसरो को उकसा कर खेलने के लिए मजबूर करने के बाद उनका दूसरा काम होता था किसी तरह खेल में अपने पासे को फिट करना | 


प्रतिद्वंदी जानते थे कि बिन अपने पासे के शकुनि मामा कुछ नहीं है इसलिए वो दूसरे पासे से खेलने की बात करते लेकिन मामा खेल शुरू होने से बहुत पहले ही इस बात की व्यवस्था कर लेते कि कैसे खेल में अपने पासे को खींच कर लाना हैं | मजेदार बात ये हैं कि जो प्रतिद्वंदी उन पासों को दूर रखना चाहते थे  वो महज मामा के खेल में उनके मोहरों की तरह व्यवहार कर वही करते थे  जो शकुनि मामा चाहते थे  | 


धर्म और राष्ट्रवाद बीजेपी के दो जादुई पासे हैं जिनके बिना उसका कोई अस्तित्व इस चुनावी राजनीति में  नहीं हैं | जब बाकी लोग चुनावों का सोच भी नहीं रहें होते हैं वो यहाँ वहां दर्जनों संभावनाएं बना कर रखती हैं कि  कैसे चुनावों के बीच  में घर्म और राष्ट्रवाद को खींच लाना हैं | 


लोग अंदाजा भी नहीं लगा सकते कि  चुनावों भले ही कही पर हो लेकिन  जीत के लिए पासे कश्मीर से कन्याकुमारी और कर्नाटक तक भी फिट किये जा सकते हैं |  अंधा क्या चाहे दो आँखे , चुनावों में अपने मतलब के मुद्दे उछालने के लिए एक घाघ राजनेता क्या चाहे एक अति प्रतिक्रियावादी प्रतिद्वंदी या मोहरे की तरह हरकत करने वाली जनता जो उसके उछाले मुद्दे को झट लपक ले और शुरू हो जाए | बाकी काम तो बिना  वेतन उसके लिए काम करने वाले समर्थक कर ही देंगे | 


 ताली एक हाथ से नहीं बजती और ना कोई राजनीतिक दल केवल अपने समर्थकों के बलबुते किसी मुद्दे को केंद्र में ला सकता है | उसे चाहिए एक विरोध करने वाला  , ऐसा विरोध करने वाला जो हर बात में बिना सोचे समझे उसका विरोध करे  | 

चुनावों में जब धर्म का मुद्दा   जातिवादी , दलितवादी , विकास के मुद्दे में कहीं दब जाए तो  अचानक से उसे बदल दिया जाता हैं  |  वोटिंग होने होने से पहले  बहस का मुद्दा बदल जाता  हैं  |   



इसके पहले अमर जवान ज्योति और बोस को लेकर राष्ट्रवाद का मुद्दा भी केंद्र में खींचा गया था | प्रतिक्रियावादियों ने कभी नहीं सोचा कि वार मेमोरियल बने कई साल हो गए तभी अमर जवान ज्योति  को वहां शिफ्ट क्यों नहीं किया गया |  अब ये सब क्यों किया जा रहा हैं | बोस की मूर्ति लगाने का निर्णय इतना पहले ही क्यों नहीं  लिया गया कि उनके जन्मदिवस  तक लगाने के लिए मूर्ति तैयार रहें होलोग्राम ना लगाना पड़े | 


कहीं पढ़ा सूना कि एक राजा को लंबे समय तक स्थापित रहने के लिए एक दुश्मन की जरुरत होती हैं | आज की राजनीति में भी बिना अंध विरोधियों के बीजेपी सत्ता पर कब्ज़ा ही नहीं कर सकती | अंध विरोधी अंध समर्थको को सक्रीय करने का काम करते रहते हैं पूरे पांच साल | 

May 31, 2019

विकल्प हीनता का गणित -------mangopeople


                                                आज आप से ताकतवर गणित का एक खेल खेलते हैं और उसकी ताकत को बताते हैं | जिसका उपयोग हम अपने नीजि जीवन में अपनी इच्छाएं पूरी करने के लिए भी कर सकते हैं |  मुश्किल नहीं हैं सभी खेल सकते हैं | बस ईमानदारी से जल्दी जल्दी खेलियेगा |
                                                 एक से नौ के बीच का कोई नंबर सोच लीजिये अब उसे नौ से गुणा कर दीजिये | अगर जवाब दो डिजिट में हैं तो उन दो नंबरों को  जोड़ दीजिये और अगर सिंगल डिजिट में हैं तो उसे वैसे ही जाने दीजिये | अब उस नंबर से पांच घटा दीजिये | अब जो  नंबर बचा हैं उसे अंग्रेजी के अक्षर में बदल दीजिये जैसे 1 - A  , २ - B , 3- C , 4 - D , 5 - E आगे जो भी नंबर हो | अब आप के नंबर पर जो अक्षर आया हैं उससे दुनिया के किसी देश का नाम सोचिये | सोच लिया अब उस देश के नाम के आखिरी अक्षर से एक जानवर का नाम सोचिये | याद रखियेगा जानवर का नाम सोचना हैं पक्षी या जलीय जीव का नहीं | अब उस जानवर के नाम के आखिर अक्षर से एक रंग का नाम सोचिये |  सोच लिया ठीक हैं अब हम आप का मन पढ़ लेते हैं और बताते हैं आप का जवाब डेनमार्क , कंगारू और ऑरेंज हैं |  क्यों यही हैं ना !

                                              असल में मैंने आप को विकल्प हीन बना कर जानबूझ कर उसी जवाब के लिए मजबूर किया जो मैं पाना चाहती थी   |  एक से नौ तक की कोई भी नंबर लेकर उसे नौ से गुणा करने के बाद उन नंबरों को जोड़ेंगे तो जवाब नौ ही आएगा | उसमे से पांच घटाने पर जवाब चार होगा सभी लोगो का , चाहे उन्होंने कोई भी नंबर सोचा हो | अब चार नंबर से आप अंग्रेजी के D अक्षर पर पहुंचते हैं | खूब याद कीजिये D अक्षर से आप को एक ही देश का नाम याद आयेगा वो हैं डेनमार्क ( denmark )  | क्योकि D अक्षर से बहुत ही कम देशो के नाम हैं , गूगल कीजियेगा तो शायद दो और देशो के नाम मिल जायेंगे जिनके बारे में आप ने कभी सुना नहीं होगा  | अब डेनमार्क का आखिरी अक्षर हैं K , इस अक्षर से किसी जानवर का पहला नाम ज्यादातर की जुबान पर कंगारू ही आयेगा और कंगारू( kangaroo ) के आखरी अक्षर O से सबसे पहला रंग  ऑरेंज (orange) ही याद आयेगा | असल में आप के पास जवाब सोचने के लिए ज्यादा विकल्प ही नहीं थे और आप ने वही सोचा जो मैं चाहती थी |
                                                 मतलब साफ़ हैं यदि पति बाहर जा कर पनीर लाने को तैयार नहीं हैं और थकान का बहाना मार रहा हैं तो साफ पूछिये , पनीर ला रहे हो या लौकी पका दूँ | फिर देखिये कैसे घर में आप के पसंद की पनीर की सब्जी बनती है | पत्नी आप के मित्र के घर जाने के लिए तैयार नहीं होगी आप को पता है ,  लेकिन आप को जाना हैं ,आसान हैं | सुना आज मेरी बुआ ने और मित्र दोनों ने खाने पर बुलाया है तुम्ही बताओ किसके घर चले , जवाब होगा आप के मित्र के घर | हो गई ना आप के मन की |
                                                  ये विकल्प हीनता या खराब विकल्प का गणित बहुत की ताकतवर हैं | इतना ताकतवर की दुनियां के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देशो  में से एक में दो दो बार किसी की सरकार भी बनवा सकती हैं | इसको हलके में ना लीजेगा इसका उपयोग कर सकते हैं घर में ऑफिस में स्कूल आदि आदि जगहों पर अपने मन की करवाने में |

नोट - हमें पता हैं हमारे मित्र लिस्ट में ढेर सयाने लोग भी हैं जो कहेंगे कि हमने तो कंगारू ना सोचा था हमने तो कोअला बेयर ( koala bear) सोचा था और रंग Ogre , Olive ऑलिव सोचा था | तो बताने की जरुरत ना हैं हमें बता हैं कांग्रेस को ५२ सीटे किनके वोट से मिली हैं |

January 29, 2019

देश निर्माण और राजनैतिक परम्पराएं -------------- mangopeople


                 
         
                                                  देश सिर्फ संविधान से सही नहीं चलता , उसे सही तरीके से चलाने में उससे ज्यादा योगदान होता है राजनैतिक जीवन में परम्पराओं का जो देश की आजादी के साथ ही शुरू हुई |  कांग्रेस और नेहरू की नापसंदगी का सबसे बड़ा कारण था कि उन्होंने देश की आजादी के बाद ही राजनीति में गलत परंपराओं की शुरुआत की | नेहरू ने कभी नहीं कहा कि जब मेरी साथियों को मुझसे ज्यादा किसी और पर भरोषा है देश के नेतृत्व के लिए तो मुझे ये पद नहीं चाहिए | मैं एक सहयोगी की भूमिका में भी देश की सेवा कर सकता  हुँ | देश में पार्टी सुप्रीमो की परंपरा और पार्टी के अंदर लोकतंत्र की उपेक्षा की शुरुआत वही से हो गई | भाई भतीजावाद , अपने लोगों को संरक्षण देना , भ्रष्टाचार को नजरअंदाज करना , गलत फैसलों के लिए जिम्मेदारियां तय नहीं करना , भारतीय राजनीती में वीआईपी संस्कृति  जैसे अनेको परम्पराओं की शुरुआत उन्होंने की | जिसका पालन संविधान से भी ज्यादा हमारे राजनेता आज भी कर रहें है | देश के विकास के लिए क्या किया के प्रवचन की आवश्यकता नहीं है | वह कर उन्होंने अहसान नहीं किया था उनका चुनाव ही ये करने के लिए हुआ था किन्तु जब एक देश का निर्माण हो रहा था तो नैतिकता , लोकतान्त्रिक व्यवस्था , देशसेवा , भेदभाव रहित , और जिम्मेदारी की जो अटल व्यवस्था उन्हें स्थापित करनी चाहिए थी वो उन्होंने नहीं की , जिसका नतीजा हम आज भी भुगत रहें है |
                 
                                                                  ऐसी ही एक कामचोरी की ख़राब परंपरा की शुरुआत कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्ष के कई पार्टियों ने शुरू किया जार्ज फर्नाडिस के रक्षा मंत्री रहते | उस समय ताबूत घोटाले में रक्षा मंत्री नाम लिया जा रहा था बजाये रक्षा मंत्री से सवाल जवाब के उस मुद्दे पर बहस के कांग्रेस ने उनके बहिष्कार के नाम पर संसद से बाहर जाने,  हो हल्ला कर संसद में काम ना होने की परंपरा की शुरआत की | संसद  बहिष्कार के लिए नहीं, सवाल किये जाने के लिए बनी थी वहां पर काम के लिए सांसदों को चुना जाता है | लेकिन उसके बाद संसद में काम ना करके भी काम करने का पूरा भुगतान लेने की एक घटिया चलन उसने शुरू किया जो आज भी बिना किसी भेदभाव के देश की  हर पार्टी द्वारा अपनाया गया है |



              

December 22, 2018

राजनैतिक कबीलो के बीच हम एलियन दर्शक -------- mangopeople




                                                  आज के समय में लोगों की राजनैतिक विचारधारा उनके सामान्य बुद्धि पर इतनी हावी है कि वो ये बात मान और समझ ही नहीं पातें कि इस दुनियां में ऐसे लोग भी होंतें हैं  जो बिना  किसी राजनैतिक विचारधारा से जुड़े भी जीवित रह सकते है | लोग  मात्र एक वोटर भी हो सकतें  है | उनके लिए ये एलियन प्रजाति है जिस पर विश्वास नहीं किया जा सकता लेकिन उनके होने का भ्रम भी बना रहता  | उसके होने का भ्रम ही है कि सभी अपने राजनैतिक विचारधारा  को विभिन्न सोशल मिडिया के माध्यमों में जोरशोर से प्रसारित प्रचारिक कर उन्हें खुद में शामिल करने की गलतफहमी पाले लेंतें हैं |
                                                 किसी दल के समर्थक अब उसके कार्यकर्ता की तरह व्यवहार करतें है | समय पड़ने पर पार्टी के प्रवक्ता बन पार्टी के उन कामो के समर्थन पर भी  प्रवचन देने लगते है जिन्हे वो स्वयं भी समर्थन नहीं करते और कभी दूसरे दलों के लोगो का विरोध करने के आदत पर बेमतलब की बात पर भी विरोध करने लगते हैं | फेक और गलत खबरों का विरोध करने वाले भी गलत तथ्यों का सहारा लेने लगते है विरोध करने के लिए |
                                               आज का शोसल मिडिया राजनैतिक सर्कस बनता जा रहा है , जहाँ समर्थको की भूमिका जोकरों जैसी बनती जा रही है और हर जोकर को दूसरा समर्थक ही जोकर दिखता है | वो स्वयं को आईने में देखता ही नहीं कि वो  खुद कौन सी भूमिका यहाँ निभा रहा है | हम जैसे दर्शक बाहर बैठ इनकी हरकतें देख  ये सोच हँसते हैं कि आज के आधुनिक समय में भी इन्हे लगता है कि ये ऐसी बचकानी हरकत कर अपने लिए तालिया बटोर सकतें हैं |
                                             जादू के  खेल का समर्थक जादूगर के जादू को ऐसे आँखे फाड़ देखता है जैसे उसने सच में कोई जादू कर दिया हो | वो ये मानने को तैयार ही नहीं होता कि हाथ की सफाई , ट्रिक्स भी कोई चीज होती है | वो जादूगर के जादू को सच मान उसके आगे नतमस्तक हुआ जाता है और उसकी हाथ की सफाई पर ताली बजाने वालो की गिनती अपने जैसो में करने लगता है |  वही जानवरों का खेल देखने आये वयक्ति को जादू का खेल दो कौड़ी का लगता है | वो तो हंटर बजा कर शेर को दो पैरों पर खड़े कर देने के ट्रेनर की काबलियत पर ही लहालोट हुआ जाता है | उसके लिए सबसे काबिलियत भरा महानतम कार्य यही है | जनता शेर देख खुश हो रहीं और वो हंटर वाले के गुणगान में व्यस्त |
                                            माहौल ये है जैसे हम कबीलों के बीच रह रहें हैं | एक दूसरे को देखना तक बर्दास्त नहीं कर सकता | आप ने निष्पक्षता से किसी एक की आलोचना की नहीं कि आप दूसरे कबीले के घोषित कर दिए जायेंगे | नहीं तो आप को प्रवचन दे अपने कबीले की महानता की गिनती करा आप को अपने कबीले में शामिल करने के प्रयास होंगे | हम एलियनों को दोनों तरफ से लोग आ कर बता जातें है कि कैसे लोंगो से मित्रता करनी चाहिए और किसे बाहर निकाल दिया जाना चाहिए | आप ने इन कबीलों की पोस्ट पर कमेंट किया नहीं कि पोस्ट के समर्थन और विरोध का रुख देख आप की कुंडली यहाँ बांच दी जाएगी कि आप किस प्रकार के व्यक्ति हैं |









November 01, 2017

शुद्ध राजनीति है विचारधारा का नाम न दे -----mangopeople


                                                                       बात कुछ साल पहले की है जब श्रीलंका और भारत के बीच एक समुंद्री संरचना को तोड़ने को लेकर खूब बवाल हुआ था | उस समय की सरकार उस संरचना को तोडना चाहती थी क्योकि वो संमुद्री आवागमन में एक बड़ी बाधा थी जहाजों को घूम कर आना जाना होता था | उसे तोड़ने से रास्ता छोटा होता और सरकार को बहुत आर्थिक फायदा होना था | तब की विपक्ष ने कहा कि वो एक धार्मिक संरचना है और राम से जुडी है उसे नहीं तोड़ने दिया जायेगा | मामला अदालत तक गया और सरकार ने राम के अस्तित्व पर ही सवाल खड़ा कर दिया | आम लोग भी दो भागो में बट गए , प्रगतिशील लोग सरकार के साथ खड़े हो गये और राम भक्त विपक्ष के साथ | बड़ी आसानी से सरकार और विपक्ष ने अपने वोट के लालच में एक बड़े पर्यावरण से जुड़े मुद्दे से लोगो का ध्यान पूरी तरह हटा कर उसे केवल धार्मिक मुद्दा बना दिया |
       
                                                                      पर्यावरण के नजर से वो कोई आम संरचना नहीं थी असल में वो लाखो सालो में बनी मूंगे की चट्टानें थी जो एक तरह से समुंद्र के अंदर का जंगल था और जलीय जीवन उस पर वैसे ही निर्भर थे जैसे कि हमारे दूसरे जंगल में जानवरो का जीवन उस पर निर्भर है | एक तरह से उन्हें तोड़ना एक पुरे जंगल को काटने जैसा था , जो उस स्थान के जलीय जीवन को पूरी तरह नष्ट कर देता | सरकार इस बात से अच्छे से जानती थी इसलिए उसने विपक्ष के भावनात्मक और धार्मिक मुद्दों को इतना उछाला की पर्यापरण का मुद्दा कभी सामने आ ही नहीं पाया | नतीजा जो प्रगतिशील समाज पर्यावरण आदि मुद्दों को लेकर बड़ा सजग दिखता है वो भी उस तरफ ध्यान न दे कर सरकार के साथ खड़ा था | दूसरी तरफ विपक्ष भी इन मुद्दों से अनिभिज्ञ नहीं था किन्तु उसने भी इन मुद्दों को नहीं उठाया | जबकि इस मुद्दे को उठा कर वो उस संरचना को बड़े आसानी से तोड़ने से बचा सकती थी और जागरूक लोगो को भी अपनी तरफ कर सकती थी किन्तु उसने ऐसा नहीं किया | क्योकि हमारे देश में पर्यावरण जैसे मुद्दे वोट नहीं दिलाते है जबकि धार्मिक भावनात्मक मुद्दे वोट दिलाते है जो राजनैतिक रूप से आप को मजबूत करते है |
                                                                    इसलिए विचारधारा के नाम पर आम लोगो को बहस करते और लड़ते देख लगता है कि कैसे सरकार और विपक्ष मुख्य मुद्दों से ध्यान हटा कर लोगो को विचारधारा के नाम पर मुर्ख बना लेती है |

September 25, 2017

सुनो लड़कियों अब सुधर जाओ ------------ mangopeople





           सुनो लड़कियों अब सुधर जाओ और अपनी सुरक्षा के लिए दुसरो का मुंह तकना बंद कर दो | जिस पितृसत्तात्मक सोच ने लडको को तुम्हे छेड़ने परेशान करने की हिम्मत और सोच दी है उसी सोच से तुम अपनी सुरक्षा की गुहार कैसे लगा सकती हो | तुम्हे क्या लगता है वहां तुम्हारी आवाज सुनी जायेगी | ये गुहारे तुम पर पलट का ग़ाज बन गिरेगी | हॉस्टल से निकलना बंद करावा दिया जायेगा , स्कूल नौकरी छुड़वा कर घर बिठा दिया जायेगा , या आगे पीछे पूंछ की तरह बाप भाई लगा दिए जायेंगे जिससे तुम्ह जल्द ही उनके लिए बोझ की तरह हो जाओगी  | तुम्हारी ही आजादी को कैद में बदल दिया जायेगा | तुम्हे ही लक्ष्मण रेखाओ की याद दिलाई जायेगी और ये सब तुम्हारी सुरक्षा के नाम पर किया जायेगा | फिर महसूस करना पीड़ित हो कर अपराधी सी सजा को |

                  बंद कर दो दुसरो के भरोसे रहना , क्यों रहना चाहती हो अपनी सुरक्षा के लिए दुसरो के भरोसे पर | जब अपना शहर गांव छोड़ दूर स्कूलों में पढ़ने जा रही हो , नौकरी के लिए देश विदेश तक अकेले जा रही हो | लम्बे संधर्ष के बाद इतना आत्मविश्वास जमा किया है कि अपने घर परिवार  से दूर अकेले रह सकती हो तो अपनी सुरक्षा के लिए किसी और की और क्यों देख रही हो | देने वाले ने तुम्हे भी वही दो हाथ पैर और दिमाग दिया है जो तुम्हे छेड़ने परेशान करने वाले के पास है तो उन्हें इतना मजबूत क्यों नहीं बनाती कि अपनी रक्षा खुद कर सको | जब पढाई और नौकरी के लिए इतना आत्मविश्वास पैदा किया है तो अपनी रक्षा के लिए क्यों नहीं करती | जब हर काम के लिए  स्वालंबी बनी हो तो अपनी रक्षा के लिए क्यों किसी पर निर्भर होना चाहती हो | तुम्हारा खुद को कमजोर और उन्हें मजबूत समझना ही उन्हें मजबूत और इतना हिम्मती बनाता है कि वो तुम्हे परेशान कर सके तुम्हारे आगे बढ़ने के रास्ते में एक पत्थर बने | अपने आगे बढ़ने के रास्ते में पड़े इन पत्थरो को खुद उठाओ और किनारे फेक दो | जब तमाम तरह की नौकरियों के लिए तमाम तरीके का प्रशिक्षण ले सकती हो तो अपनी सुरक्षा के लिए शारीरिक प्रशिक्षण भी ले सकती हो | अनेको गैजेट अपने लिए खरीद सकती हो तो अपने बचाव के लिए हथियार भी ले सकती हो | जब झुण्ड में आ कर इन सब का विरोध कर सकती हो धरना देने की हिम्मत कर सकती हो तो ऐसे झुण्ड में आये लफंगो को झुण्ड बना कर सबक खुद सबक भी सीखा सकती हो |
                         आज के समय में तुम्हारे विरोध प्रदर्शनों का केवल राजनैतिक स्तेमाल ही होगा | तुम्हारे मुद्दे कही पीछे छूट जायेंगे बाकी सरकार और विपक्ष अपनी राजनीति चमकायेंगे | सब के सब वही पुरुषवादी सोच के है जिसके खिलाफ तुम लड़ रही हो | ये कभी तुम्हारी बात नहीं समझेंगे आज जो तुम्हारे साथ है वो कल गद्दी पर बैठते ही तुम्हारे खिलाफ होगा और जो आज तुम्हारे खिलाफ है वो गद्दी जाते ही तुम्हे पुचकारने आ जायेंगे | समाज प्रशासन और राजनीति इन में सो कोई भी तुम्हारी मदद नहीं कर सकता इन समस्याओ के लिए क्योकि ये समस्याए उन्ही की पैदा की गई है , वो तुम्हारी रक्षा उससे क्या करेंगी , वो तुम्हे ही सुरक्षा के नाम पर कैद कर जायेंगी | कुछ किया भी तो वो ज्यादा प्रभावी नहीं होगा , एक सड़क पर पुलिस बैठेगी तो गली नुक्कड़ पर छेड़ी जाओगी , हिम्मत करके हर छेड़ने वाले को सबक खुद सिखाओगी तो हर लफंगे में डर बैठेगा | अपनी रक्षा करने का आत्मविवास और हिम्मत आएगी तो एक सड़क एक गली नहीं हर जगह सुरक्षित रहोगी  और हमेसा रहोगी |







January 10, 2017

रोओ रुदालियों अपना अपना रोना रोओ -----mangopeople




                                                    बहुत समय पहले की बात है एक बार एक पति ने अपने मरने का नाटक किया ताकि देख सके रुदाली बुला कर रोने का दावा करने वाली पत्नी कितना रोती है । पत्नी ने पति के मरते ही रुदाली बुला ली तय हुआ दो मक्के की रोटी और दो रुपये पर रुदाली रोयेगी । रुदाली ने सर्त रखी कि चूल्हे पर मक्के की रोटी लगा दी जाये उसके पकने तक रो लेगी । पत्नी ने रोटी लगा दी और दोनों ने रोना शुरू कर दिया पत्नी ने रोना शुरू किया कि हाय रुदाली उसके दो समय की रोटी ले जा रही है , एक तो कमाने वाला पति मर गया उस पर से दो रूपये और गये । रुदाली ने रोना शुरू कि हाय रोटियां तो ये देख नहीं रही कही जल गई तो खाने लायक भी न रहेगी पैसे देने से पहले इतना रो रही है पता नहीं पैसे मुझे देगी भी नहीं । कुछ देर दोनों अपना रोना रोती रही मरने का नाटक कर रहा पति झुंझुला कर उठ बैठा , बोला मरा तो मैं हूँ और मेरे लिए कोई रो ही नहीं रहा है , दोनों के दोनों अपने लिए रो रहे है ।

                       कल एक सैनिक ने सीमा पर अपने खाने पिने के ख़राब हालातो के बारे में एक वीडियो पोस्ट की।  मंशा हालात सुधारने की रही होगी , सरकार तक वहां हो रही धांधलियों की खबर देने की रही होगी । किन्तु यहाँ मोदी भक्त और मोदी विरोधी रुदालियाँ अपना रोना ले कर बैठ गई । एक सीमा पर सैनिको को ख़राब खाने की सप्लाई के लिए सीधा प्रधानमंत्री और सरकार को ही दोषी बना रहा है दूसरा पिछले ७० सालो का हिसाब दे सैनिक के अगले पिछले का पोस्मार्टम कर रहे है । उन दोनों को सैनिक उसके बुरे हालातो , उसकी समस्या से अब कोई मतलब ही नहीं है । एक मोदी और सरकार को जिम्मेदार बता कर उसे गालियां दे रहा है और दूसरा बेमतलब के तर्क दे कर उन्हें बचा रहा है । सैनिको की समस्याओ पर चर्चा कौन करेगा , उनके लिए बेहतर हालातो के बारे में कौन आवाज उठाएगा , फिलहाल कोई नहीं , क्योकि सोशल मिडिया की सभी रुटे सीधे जा कर राजनीति के चौराहे पर मिलती है , और हर समस्या को बस एक ही नजर और सोच से देखा जाता है , इसलिए सभी लाईने उसी में व्यस्त है ।


                             ये कोई पहली बार नहीं है , सूना है कि युद्ध के दौरान सैनिको की बंदूके जाम हो गई थी , सूना है की एक रक्षा मंत्री को अफसरों को धमकी देनी पड़ी थी कि यदि सैनिको के लिए बर्फ पर चलने वाली गाड़ियों की फाईल तुरंत पास नहीं किया गया तो उन अफसरों को सियाचिन के सीमा पर भेज दिया जायेगा , सूना है सैनिको के लिए जो ताबूत ख़रीदा गया उसमे भी घोटाले हुए , सूना है मैडल लेने के लिए कुछ बड़े अफसरों ने फर्जी बहादुरी दिखाई , सुना है हथियारों की और सैनिको के लिए लिए जा रहे साजो सामानों पर सेना के अंदर भी कमीशन लिया जाता है , सुना है की तलाशी के नाम पर लोगो को लुटा भी गया है , सूना है सैनिको की विधवाओ के लिए बनी इमारतों में से सैनिको को ही बेदखल कर दिया गया । सुना है सैनिको के मदद के लिए बने एक फंड में  पैसे न के बराबर आये , सोशल मिडिया में जवानों की विरता की कसमे खाने वाले और जवानों के नाम पर सरकारो को कोसने वाले किसी ने भी पैसा वहा नहीं भेजा ।   बहुत कुछ सुना है , पर चर्चा नहीं होती क्योकि इस समय देश में दो ही पंथ और पंथी है , पागलपंथी और घटियापंथी । रोओ रुदालियों अपना अपना रोना रोओ ।












December 31, 2016

राजनीति के घोड़े की अढाई चाल -------mangopeople



                                                     राजनीति में किसी भी चीज और फैसलो पर न तो ज्यादा आश्चर्य करना चाहिए और न ही ये सोचना चाहिए की जो हो रहा है वही सत्य है | कई बार उसके मायने बहुत अलग अलग और कई सारे होते है और निशाने पर कोई और होता है | जिन्हें लगता है कि यूपी चुनाव का तिराहा ( सपा बसपा ,बीजेपी ) अब चौराहा बनाने वाला है ( २-सपा ) तो उन्हें अभी इंतजार करना चाहिए , चुनाव के आधिकारिक धोषणा तक | ये कमाल की बात नहीं है की आज से मात्र ५ साल पहले तक हम जिस सपा को उसकी जातिवादी , अल्पसंख्यक तुष्टिकरण , और बाहुबलियों गुंडों का पार्टी के रूप में जानते थे अचानक से वो पार्टी आज विकासवादी नजर आ रही है | ये विकास आदि पिछले ५ सालो तक इस तरह उभर के सामने नहीं आ रहा था जैसा की अब दिखाया जा रहा है , अब से पहले तक उसकी वही पुरानी छवि ही थी | यही करना है कि विकास के नाम पर केंद्र कि सत्ता पाने वाली बीजेपी भी यहाँ ध्रुवीकरण कि राजनीती कर रही थी |

                                                  किन्तु अचानक से अंसारी बंधुओ और अतीक अहमद जैसो का विरोध कर अखिलेश ने बीजेपी को सकते में ला दिया और विरोध भी इतना प्रबल की परिवार में ही दंगल की स्थिति हो गई | अब बीजेपी के ध्रुवीकरण की राजनीति का क्या होगा , जो अंसारी , अतीक अहमद के धर्म और उनके आपराधिक कार्यो को जोड़ सपा के मुस्लिम तुष्टिकरण से अपनी राजनीति चला रहे थे | अखिलेश ने एक झटके में इन दोनों का विरोध कर एक ही बार में उसकी राजनीति की हवा निकाल दी | सन्देश साफ दिया की पिता की तरह उनके लिए धर्म मायने नहीं रखता है , गलत आदमी गलत ही रहेगा चाहे वो किसी भी धर्म का हो वो उन्हें स्वीकार नहीं है |

                                                उसके बाद अखिलेश को विकास पुरुष के रूप में प्रोजेक्ट करना शुरू कर दिया गया | छवि को पूरी तरह से बदल दिया गया , धर्म , जाति, की राजनीति करने वाली पार्टी अब विकासवाद की और बढ़ रही है | एक दिन में विकास के लिए सैकड़ो उद्घाटनों और फीता कटाई का काम शुरू हो गया , जो परियोजनाए आधी अधूरी भी पूरी हुई थी उनका भी उद्घाटन कर प्रदेश को समर्पित कर दिया गया | ये जवाब था उस राजनीति का जो केंद्र में सत्ता पाने के लिए बीजेपी न की थी | जब ढाई साल पहले लोग २००२ को याद कर उनके खिलाफ प्रयोग कर रहे थे तब वह भारत के उज्जवल भविष्य का विजन लोगो के सामने रखा रहे थे , नजीता सभी को पता है | आज अखिलेश ने वो विकाश पुरुष का दांव भी चल दिया , जो असल में मोदी यहाँ चलने वाले थे | बुआ से उनकी अदावत बस भाषणों तक सिमित थी , वो दिखा रहे थे की उनकी लड़ाई बसपा से है किन्तु मात देने का काम वो बीजेपी को कर रहे थे , जो उनके लिए उनका मुख्य प्रतिद्वंदी है |

                                               अब दुनिया के सामने दो विकल्प है पुरानी राजनितिक दांव चलने वाले मुलायम और आधुनिक विकास की बात करने वाले पुत्र अखिलेश | लोग अब इन दोनों में से एक का चुनाव कर रहे है , बसपा और बीजेपी तो गायब ही हो गई , कांग्रेस तो पहले ही उनके पाले में जाने के लिए लालायित है | उसको भी घुटनो पर आने तक इंतजार में रखा जायेगा | अब बीजेपी के पास न विकास का मुद्दा बचा है न ध्रुवीकरण का उस पर से कोई ऐसा स्थानीय चमत्कारिक नेता भी नहीं है जिसे वो मुख्यमंत्री के रूप में घोषित कर सके , जैसा की केंद्र में उन्होंने मोदी को किया था | जबकि अब सपा के पास अखिलेश का नाम और चेहरा है मुख्यमंत्री पड़ के लिए ,जो न केवल काम कर रहे है बल्कि पुराने पड़ चुके राजनितिक दावो से भी खुद को अलग कर चुके है | उनके किया काम भी लोगो के सामने है बिलकुल वैसे ही जैसे मोदी गुजरात में किये अपने कामो को दिखा कर केंद्र में सता पा गए |

                                            सपा का एक बहुत ही अच्छा दांव जिसने न केवल सारा ध्यान लोगो और मिडिया का अपने ऊपर केंद्रीत कर लिया बल्कि अपनी छवि भी बदल दी | अब वो अखिलेश जो पहले ही राहुल , तेजप्रताप , तेजस्वी के आगे ज्यादा काबिल नजर आ रहे थे वो अब और योग्य उम्मीदवार लगने लगे | इस दांव पर वाह वाह किया जा सकता है और अब सवाल बीजेपी और मोदी से अब आप का जवाब और चाल क्या होगी |



December 27, 2013

चाय से ज्यादा केतली गर्म - - - - - -mangopeople




                                                                                बिटिया को जब भी दूध का ग्लास पकड़ाती हूँ तो , वो चीखती है की ग्लास इतना गर्म है की पकड़ा नहीं जा रहा है , दूध कितना गर्म होगा मै  उसे कैसे पी सकती हूँ और मै  उन्हें हर बार समझाती हूँ कि ग्लास के गर्म होने से दुध के गर्म होने का अंदाजा उसे नहीं लगाना चाहिए दूध गर्म नहीं है उससे ज्यादा ग्लास गर्म है :) । यही हाल हमारी राजनीतिक पार्टियो के समर्थको का है , नेता जितना नहीं बोलते है उससे कही ज्यादा उनके समर्थक बोल पड़ते है । इधर "आप" विधायक बिन्नी केजरीवाल के घर से मीटिंग छोड़ कर बाहर आये उधर समर्थक चिल्लाना शुरू कर दिए की कल पोल खोलने वाली पार्टी कि ही पोल उनके माननीय नेता जी खोलेंगे , दूसरे दिन मामला सुलटने के बाद बेचारे नेता जी को अपने ही समर्थको की बातो का जवाब नहीं देते बन पड रहा था , केजरीवाल ने अभी शपथ भी नहीं लिया किन्तु उनके समर्थक राम राज्य लाने के सपने दिखाने लगे है , चार राज्यो के  बुरी गत करने के बाद कांग्रेस और जीत की रथ पर सवार बीजेपी भी अपनी हार जीत  को भूल आगे की राजनीति में लग गई , नए समीकरण तलाशने लग गई किन्तु समर्थक आज भी वही अटके पड़े है और सोशल मिडिया में पानी पी पी कर " आप " को गालिया दे रहे है उसे घेरने का प्रयास कर रहे है । इधर राहुल उनसे कुछ सीखने की बात करते है , अपने नेताओ को "आप" की तरह जनता से जुड़ने की नसीहत देते है ,कांग्रेस उसे समर्थन दे रही है तो उधर कुछ उसके ही खिलाफ मोर्चे ले कर निकल रहे है और गिन गिन कर उनके वादे याद  दिला उन्हें पूरा होने के लिए असम्भव बता रहे है । सही भी है जब ६६ सालो में हम नहीं कर पाये तो ये क्या करेंगे, किन्तु वो नहीं कर पाएंगे उस बात पर भी पूरा विश्वास नहीं है , डर में है कि सच में पञ्च साल में पूरा न कर दे इसलिए पञ्च साल का भी समय देने को तैयार नहीं है कहते है की सब ६ महीने में ही कर के दिखा दीजिये नहीं तो आप फेल है। बीजेपी के शीर्ष नेता कब के विवादित मुद्दो को ठन्डे बक्से में डाल कर भूल गई है किन्तु समर्थको को उसका भान भी नहीं है , मोदी कहते है देवालय से पहले शौचालय , सही बात है देवालय जैसे मुद्दो से कही ज्यादा जरुरी हर घर तक विकास शिक्षा और प्राथमिक जरुरतो को पूरा करना है , नेता जानते है कि दिल्ली की कुर्सी का रास्ता विकास की रोड से जाता है सभी को ले कर चलने से मंजिल मिलती है ,न की किसी एक समुदाय को लेकर बोलने से ,आखिर वो इतने शीर्ष पर अपनी उसी काबलियत और बुद्धि से पहुंचे है  कि  कब क्या बोलना है और कब किन मुद्दो को गायब कर देना है ,  वो तो जम्मू भी जाते है तो कश्मीरी पंडितो पर एक लाईन भी नहीं बोलते है किन्तु समर्थक ये सब समझते ही नहीं है और ऐसी ऐसी बाते बाहर बोलते है उनसे उम्मीद करते है कि बेचारे नेता की छवि लाख चाहने प्रयास करने के बाद भी नहीं बदल पाती है । नेता वही सही और सफल है जो समय के साथ बदले और जनता के इच्छानुसार मुद्दे उठाये, कहते है की काठ की हांड़ी बार बार नहीं चढ़ती है , मझा नेता बार बार एक ही संवेदनशील और भावनात्मक मुद्दो को नहीं उठाता है ।  अब देखिये जिस मनरेगा ने गरीबो की भलाई वाली स्कीम ने यु पी ए को दूसरी बार चुनाव जिताया , वही दूसरी गरीबो की स्कीम भोजन का अधिकार और कैश ट्रांसफर उसे चार राज्यो में जीत क्या सम्मान जनक सीट भी नहीं दिला सकी , उसका भ्रष्टाचार सब स्कीम पर भारी पड़ा। बीजेपी भी जानती है की उसकी हिंदूवादी छवि न कभी उसे सरकार दिला पाई है और न आगे दिला पायेगी , वो उसे सीटे तो दिला सकती है किन्तु सत्ता नहीं , सही समय पर उसने अडवाणी को किनारे किया और वाजपेयी को आगे , मोदी ने सही समय पर सिखा और अपनी छवि विकास पुरुष की बना ली । किन्तु समर्थक राजनीति की इन हकीकतो को समझते नहीं है और उसी पुराणी छवि को पकड़ कर अपने ही नेता को मुसीबतो में डालते रहते है ।

                                               सोसल मिडिया हो या अन्य जगह दिल्ली और " आप " को लेकर ऐसी ऐसी राजनीतिक चालो का वर्णन है कि समझ नहीं आ रहा है की शिकारी कौन है और शिकार कौन , लगा बीजेपी सरकार बनाएगी किन्तु उसने " आप" की नैतिकता वाली चाल चल दी और गेंद " आप" के पाले में इस उम्मीद में डाल दी कि वो तो सरकार बनाएंगे नहीं ६ महीने विधान सभा स्थगित हो जायेगी फिर लोकसभा चुनावो के बाद कांग्रेसियो की अंतरात्मा जगा कर सरकार बना ली जायेगी  , लगे हाथ कांग्रेस ने भी समर्थन इस उम्मीद में दे दिया कि वो तो लेंगी ही नहीं हम दोनों चचेरे भाई उसे भगोड़ा घोषित कर देंगे और मामला फिलहाल लोकसभा चुनावो तक टाल देंगे और सरकार न बनाने पर "आप " वालो की जम कर खबर लेंगे ताकि वो लोकसभा चुनावो में ज्यादा कुछ न कर पाये , किन्तु हाय रे हाय जो " आप " वाले एक समय फसंते दिख रहे थे उन्होंने ने तो फिर से वोटिंग करा कर सरकार बनाने की ठान ली और अपने वादो को पूरा करने की भी , लो जी अब तो कांग्रेस और बीजेपी दोंनो की ही चाल उलटी पड़ती दिखने लगी , नतीजा दोनों की ही तल्खी और बढ़ गई " आप " के प्रति , बीजेपी के तो मुंह से निवाला चला गया , और अब कांग्रेस को डर है कि पिछले १५ सालो में जो खाया है दिल्ली में वो कही बाहर न आ जाये , जो थोड़ा बाहर आया है उससे तो ये हाल है जब और आयेगा तो आगे क्या होगा । अब दोनों उम्मीद लगाये बैठे है कि उनका तारण हार दिल्ली की बाबू ब्रिगेट करेगी , एक भी फाईल आगे नहीं बढ़ने देगी एक भी काम नहीं होने देगी , किन्तु उनकी इस उम्मीद पर भी तुषारपात होता दिख रहा है , अब खबर या अफवाहे जो भी आ रही है कि बाबू ब्रिगेट तो खुद ही अपनी जान बचाने में लगी है , कोई फाईले फड़वा रहा है तो कोई ट्रांसफर ले रहा है तो कोई आफिस में ताले लगा कर काम कर रहा है । एक हंसी मुझे तब आई थी जब टीवी चैनलो में मैंने अपने जीवन में पहली बार ( शायद दुसरो ने भी ) कांग्रेस और बीजेपी को गलबहिये करते एक दूसरे की पीठ थपथपाते और एक दूसरे की हा में हां मिलाते देखा लोकपाल के मुद्दे पर वो भी खुलम खुल्ला , चोरी छुपे तो दोनों ये करती ही आई थी , दूसरी हंसी अब आ रही है इस बाबू ब्रिगेट का हाल देख कर , मुझे कमल हासन की फ़िल्म इन्डियन याद आ रही है जिसमे वृद्ध स्वतंत्रता सेनानी बने थे और रिश्वतखोरो को सजा देते है उनका डर सब में इतना हो जाता है कि उनके जाने के बाद भी दूसरे लोग उनके जैसी बेल्ट पहन कर ही लोगो को डरा देते है ।


                                                                समझ नहीं आता की अरविन्द से लोगो को इतना डर और चिढ क्यों है क्यों उनकी पार्टी बनाने से दोनों बड़ी पार्टिया इतनी खीजे हुई है , शरद पवार , राजठाकरे , देवगौड़ा , जगन मोहन , येदुरप्पा , कल्याण सिंह , उमा भारती जैसे न जाने कितने लोगो ने पार्टी तोड़ कर या नई राजनीतिक दलो को खड़ा किया , सभी ने किसी न किसी का वोट काटा और राजनीति में अपने लिए जगह बनाई या हार कर ख़त्म हो गए , उनके लिए ये तल्खी कभी भी इन दो बड़ी पार्टियो ने नहीं दिखाई जो वो आज "आप " के लिए दिखा रही है । शायद ये पहला मौका है जब उन्हें लग रहा है कि " आप " राजनीति में उनके बनाये नियमो के तहत नहीं काम कर रही है , लोकतंत्र का जो रूप उन्होंने आज तक जनता में फैला दिया था  जिसमे से लोक ही गायब है " आप " फिर से उस लोकतंत्र में लोक को सामिल करके उनका खेल बिगाड़ रही है , वो राजनीति करने के तरीके को बदल रही है , वो आम लोगो में अपने अधिकारो के प्रति जागने की जो भावना बैठा रही है वो आगे उन्हें परेशान करने वाले है , वो उनमे से ही एक नहीं है , जो सत्ता पैसे ताकत के लिए हर तरीके से समझौते कर लेती है , ये जिद्दी लोगो का वो गुट है जो सच में कुछ बदलने का ठान के आई है । इतना विश्वास तो खुद मुझे भी नहीं है "आप " पार्टी पर ,मै  मानती हूँ कि अरविन्द और उनके आस पास के कुछ लोग बदलाव के मकसद से काम कर रहे है जिसमे सत्ता का लालच नहीं है , क्योकि वो खुद एक बड़ा पद जो काफी ताकतवर होता है को छोड़ कर आये है और जमीनी रूप से काफी काम किया है कित्नु जिस बदलाव की वो बात कर रहे है वो ये काम अकेले नहीं कर सकते है , समग्र विकाश के लिए और ऐसे लोग की फौज वो कहा से लायेंगे , उनकी पार्टी में लगभग सभी नए है जिनमे से कई तो सता की ताकत को कभी महसूस ही नहीं किया है , वो उसे त्यागते हुए कैसे अपनाएंगे । इसके लिए तो भारतीयो का डी एन ए ही बदलना पडेगा जो भ्रटाचार का नमक खा खा कर उसका आदि हो गया है :)) ।

                                            राजनीति के इस बिसात में राजनीतिज्ञो और बाबू के बाद नंबर आएगा आम लोगो का जो कटिया डाल कर बिजली लेते है , मीटर में गड़बड़ी करके बिल कम करते है , ट्रैफिक रूल नहीं मानते है ,  जो पुरे कागजात न होने के बाद भी चाहते है कि कुछ ले दे कर उनका काम हो जाये , जो सरकारी दफ्तरों की लम्बी लाइनो से बचने के लिए दलालो का सहारा लेते है , जो घर बैठे ही ड्राइविंग लाइसेंस ले लेना चाहते है , जो अपने घरो में अवैध निर्माण करते है , पानी का गलत कनेक्शन लेते है आदि आदि क्या वो आम आदमी सुधरने के लिए तैयार है , कही ऐसा न हो जो आम आदमी वोट दे कर अरविन्द को उस गद्दी पर बैठाया है वही उनकी कड़ाई से उब कर खुद ही उन्हें गद्दी से उतार दे या ये हो सकता है कि आम आदमी ने पिछले ६६ वर्षो से जो गलती की है , उसे फिर से न दोहराए , इन दलो को फिर से अपने मुद्दो से भागने न दे,  जो सुधर गए है उन्हें बिगड़ने न दे , अपने नेताओ पर नजर रखे , अपने अधिकारो के प्रति सजग रहे , सिर्फ वोट डी कर पञ्च साल के लिए अपने हाथ न कटा ले , अपने नेताओ से सवाल करता रहे और लोकतंत्र से फिर से लोक को गायब होने का मौका न दे । तो लोगो से निवेदन है कि अपना दिल और दिमाग खुला रखे राजनीति को राजनीति की तरह ही ले सही को सही ओए गलत को गलत कहे ।


चलते चलते

               कुछ्महिनो पहले एक ब्लॉग पर पढा की सभी न्यूज चैनल हिन्दू विरोधी है और बीजेपी की खबर नहीं दिखाते है , मैंने भी अपनी गन्दी आदत के अनुसार वहा टिप्पणी दे दिया की भाई कोई भी तीज त्यौहार हो या ग्रह नक्षत्र की गड़बड़ी हिंदी न्यूज चैनलो तो इन्ही खबरो से भरेपड़े है , १५ अगस्त को जब आँख खुली और टीवी खोला तो एक बार तो मै कन्फ्यूज ही हूँ गई लगा की मै  कोमा से बाहर आई हूँ , मोदी जी प्रधानमत्री बन गए है और भाषण दे रहे है हर न्यूज चैनल पर  भाषण सीधा आ रहा था , वो कही रैली करे और उसका सीधा प्रसारण ये चैनल न करे से तो सम्भव ही नहीं है और कितना प्रसारण चाहते है । भाई साहब नाराज हो गए कह दिया कि मुझे हिन्दू धर्म छोड़ देना चाहिए हिन्दू होने के लायक नहीं हूँ , और तो और मै  देश द्रोही हूँ गद्दार हूँ , तब से दुखी थी की कोई मोदी समर्थक मिल जाये और मुझे राष्ट्रभक्ति का सटिफिकेट दे दे नहीं तो कम से कम हिन्दू होने का तो देदे मै  दोनों से निकल बाहर हो गई हूँ किन्तु वो मिल नहीं रहा था , कारण आज पता चला कि मै तो कामरेड हूँ ;-) अपने लिए ये सम्बोधन सुन कर अच्छा लगा गर्व सा हुआ बिटिया कई बार पूछ चुकी है कि मै बड़ी हो कर क्या बनूँगी क्या बताऊ उन्हें कि कुछ नहीं बनी बस उसकी मम्मी भर हूँ , अब कह सकती हूँ कि मै कामरेड बन गई :) वैसे हद है यार दुनिया की खबर लेने के चक्कर में मुझे ये भी नहीं पता चला की मै  कब से नारीवादी के साथ कामरेड भी बन गई । ब्लॉग जगत में आ कर बहुत सारे तत्व ज्ञान अपने बारे में पता चल रहा है , पता नहीं अब तक कैसे जी रही थी । निवेदन है की बताये की ये कामरेड किस धर्म जाति और देश का निवासी होता है , अपने बारे में इतनी तो  जानकारी हो :))))


नोट :-चलते चलते की बात अपने ऊपर यु ही किये गए टिप्पणी को हँसने हँसाने के लिए मजाक में लिखी गई है उसे कटाक्ष का गम्भीरता से न ले , ऐसा मेरी सहज बुद्धि कहती है ;-)

                                       





November 18, 2013

खेल, सचिन , राजनीति और भारतरत्न - - - - -mangopeople

 


कुछ खबरे

१- सचिन को राज्य सभा के लिए चुना गया ।
२- "सचिन मौजूदा ५ राज्यो के चुनावो में , कांग्रेस के लिए चुनाव प्रचार करेंगे " - कांग्रेस के कई बड़े नेता ।
३- सचिन का किसी भी चुनाव प्रचार में आने से इंकार ।
४- राजीव शुक्ला ने कहा की सोनिया जी ने सचिन को राज्यसभा के लिए चुना ।
५- २६ जनवरी २०१४ को सचिन को भारतरत्न देने की  सम्भावना ।
६- रिटायमेंट के साथ ही सचिन को भारत रत्न दिए जाने की घोषणा ।

इस खबरो से आप को अंदाजा लग ही गया होगा की मामला क्या है

नहीं समझ आया दो और खबर

७ - लता जी ने मोदी की  तारीफ की
८- कांग्रेसी नेता ने लता जी से भारत रत्न वापस करने के लिए कहा  ।

इन खबरो के बाद कांग्रेस हाय हाय के नारे लगाने वालो के लिए भी दो खबर

९- अमर्त्य सेन ने मोदी को अयोग्य कहा
१० - बी जे पी नेता ने अमर्त्य सेन से भारतरत्न वापस लेने की बात कही ।


                                            लो जी भारत रत्न भारत सरकार की  नहीं कांग्रेस और बी जे पी की निजी बपौती है , जिसे वो देना चाहे दे और लेने वाला उनका गढ़ गुलाम हुआ जो आगे से उनकी स्तुति वंदना के सिवा और कुछ नहीं बोल सकता है , उनके खिलाफ और उनके विरोधी के पक्ष में तो बिलकुल भी नहीं । जीतनी जल्दबाजी सचिन को भारत रत्न देने की कि गई उससे तो साफ लगता है की २०१४ के चुनावो से पहली ये दे कर सचिन से उसकी कीमत मांगी जायेगी और क्या , ये बताने की जरुरत नहीं है । बिना सचिन से पूछे उनकी इजाजत लिए जिस तरह कांग्रेसी नेता कैमरो पर सचिन के अपने पक्ष में चुनाव प्रचार करने की बात कह रहे थे उससे साफ था कि , सचिन को राज्य सभा का सदस्य बना कर उन पर जैसे अहसान किया गया था और अब उसकी कीमत मांगी गई थी । जैसे सचिन ने कांग्रेस के राज्य सभा की सदस्य बनने की बात मान कर कांग्रेस की सदस्यता स्वीकार कर ली हो , जब बात नहीं बनी तो कीमत और बढ़ा दी गई , और  उसके पहले बताया गया सार्वजनिक रूप से कि कैसे राज्यसभा के लिए सोनिया जी ने सचिन का नाम सुझा कर उन पर एहसान किया , जैसे वो तो इस काबिल नहीं थे  । मुझे तो नहीं लगता की सचिन के पुरे कैरियर में कही भी राज्यसभा की  सदस्यता या भारतरत्न के बिना अधूरे थे , ये दो चीज उनके जीवन में नहीं होते तो भी उनके जीवन ,मान सम्मान , उपलब्धियों में , उनके चाहने वालो के प्यार में और उनके खले के मुरीद लोगो को एक रत्ती का भी कोई फर्क पड़ता,  । यदि भारत रत्न दिए जाने के नियमो में बदलाव किया किया गया तो ये उन पर एहसान नहीं था,  ये तो उनका खेल था , उनकी खेल की दुनिया में उपलब्धि थी जिसने ऐसा करने के लिए सरकार को मजबूर किया ।  वैसे दावे से तो ये नहीं कह सकती क्या पता यु पी  ए ने काफी पहले ही इस राजनीतिक लाभ को समझा हो और उसके तहत ही ये बदलाव किये गए हो ताकि चुनावी मौसम में कुछ फायदा इस से उठाया जा सके या सचिन को अपने पाले में लाया जा सके या कम से कम लता  जी की तरह विपक्ष की बढ़ाई  करने से तो रोक ही लिया जाये :)) । जब खेलो को भी भारत रत्न के पैमाने में शामिल करने की बात हुई तब से ही ये मुद्दा छाया था की पहले किस खिलाडी को भारत रत्न दिया जाये क्रिकेट के मौजूदा महान खिलाडी सचिन को या  फिर हाकी के जादूगर ध्यान चंद को  अंत में सब इस बात पर सहमत हुए कि जब दिया जाये तो दोनों को एक साथ ही दे दिया जाये बात बराबर की विवाद ख़त्म , किन्तु अब जब नाम सामने आये तो वहा ध्यानचंद का नाम ही नहीं था , कारण क्या ध्यान चंद को पुरुस्कार देने से कोई फायदा था , कोई चुनावी माइलेज मिल रहा था , क्या वो चुनावो में कांग्रेस के पक्ष में चुनाव प्रचार कर सकते थे , जवाब नहीं नहीं नहीं तो फिर काहे का पुरस्कार  ।  हम सभी जानते है की सरकारी पुरस्कारो और पदो  का वितरण कैसे और क्यों होता है और उसका पैमाना क्या होता है , भारत रत्न भी उससे अछूता नहीं है , इसमे भी राजनीतिक माइलेज के लिए खास लोगो को देने का आरोप लगता रहा है , और इसमे कोई भी राजनीतिक दल पीछे नहीं है , अब बी जे पी भी कांग्रेस की बुराई करते हुए खुद कांग्रेसगिरी पर उतर आई और कहा दिया कि जब हमारी सरकार आएगी तो अटल जी को सम्मान दिया जायेगा । जैसे भारतरत्न पुरस्कार न हुआ अंधे के हाथ लगी रेवड़ी हो गई ।


                             मामला केवल उस राजनीति तक नहीं सिमित है , उस राजनीति में जहा मामला सचिन को अपने लपेटे में ले लेने का , उन्हें पदो पर बिठा देने का , अपने पाले में ले लेने का है वही ,खेल की  राजनीति , खेल में हो रही राजनीति , खेल में हो रही पदो की राजनीति , खिलाड़ियो के चुनावो की  राजनीति आदि आदि से उन्हें दूर रखने का भी है । सोचिये कल्पना कीजिये जरा,  सचिन बी सी सी आई में आ जाये तो , राम राम राम श्रीनिवासन का क्या होगा,  पवार साहब का क्या होगा , खेल , खिलाडी से हो रही राजनीति का क्या होगा , खिलाड़ियो के चुनाव का क्या होगा , बी सी सी आई में आ रहे अरबो रुपये का क्या होगा , आई पी एल के नाम पर बी सी सी आई में बैठे लोग जो अरबो कमा रहे है पीछे से उसका क्या होगा , और टीमो के मालिक सट्टा लगा कर , खिलाड़ियो को भरमा कर जो कमा रहे है उसका क्या होगा । दृश्य बड़ा भयानक है , उससे तो अच्छा है कि सचिन को सीढी  से ऊपर चढ़ा दो और फिर नीचे से सीढ़ी हटा दो , भाई अब तुम बहुत ऊपर चले गए है ये छोट मोटे काम हम छोटे मोटे लोगो पर छोड़ दो । जैसे राजीनीति में किसी नेता को सक्रिय राजनीति से भगाने के लिए राज्यपाल और राष्ट्रपति का ऊँचा पद दे दिया जाता है । खेल का भला होगा , किन्तु आज खेल और खिलाड़ियो के ठेकेदारो का क्या होगा उनकी तो दूकान बंद हो जायेगी , जो आज तक कहते रहे की भारतीय टीम भारत के लिए नहीं बी सी सी आई के लिए खेलती है , वो भारत की  नहीं बी सी सी आई की टीम है , जिन्होंने बी सी सी आई को हर पारदर्शिता से दूर रखा , उसके हर काम को गोपनीय बना दिया । , क्या होगा यदि सचिन वहा चले जाये ।

                                                  पर ऐसा कुछ नहीं होगा और होना भी नहीं चाहिए मै  कभी नहीं चाहूंगी की  सचिन आपनी सकरात्मक ऊर्जा इस गन्दी , घटिया गिरी हुई राजनीति में व्यर्थ करे ,जहा उन्हें कभी कुछ करने ही न दिया जाये और वो सारा समय व्यवस्था में फैली गन्दगी को ही साफ करने में बिता दे , एक ऐसी गन्दगी का ढेर जो उनके कद से भी बड़ा है जो उन्हें भी डूबा देगा जिसका कोई छोर नहीं है ,  अच्छा हो वो पहले के जैसे ही इन सब से दूर रहे , और अपनी ऊर्जा अपने ही जैसे महान खिलाड़ियो के निर्माण में लगाये , जो न केवल खेल में बल्कि व्यक्तित्व में भी उनकी उपलब्धियों और महानता को छुए और अपने खेल से लोगो को इतना मजबूर कर दे कि कोई उनके साथ कोई राजनीति , क्षेत्रवाद या भेदभाव न कर सके । किन्तु इस राजनीति से दूर रहना भी उनके लिए बहुत आसान नहीं होगा , सोचिये की सुप्रीमो के फरमान को अनसुना करने का क्या अंजाम होगा , अमिताभ से लेकर खेमका तक सैकड़ो उदाहरण पड़े है जब आप सरकारो की  बात नहीं मानते है  या उनके विरुद्ध जाते है , या दूसरे पीला में जाते है, तो आप के साथ क्या क्या हो सकता है , सारी  महानता उपलब्धिया धरी कि धरी रहा जाती है , वैसे भी हैम अपने महान लोगो को लाइम लाइट से जाते ही भुला देने में माहिर है ।

                                     सचिन ने अपने जीवन में कई मुश्किल दौर देखे है और उससे बहादुरी से बाहर भी आये है बिना अपनी गरिमा को गिराए , अब सचिन के लिए अपने जीवन का एक सबसे मुश्किल दौर देखना है और हम देखेंगे की सचिन उसे कितनी बहादुरी नम्रता और अपनी गरिमा को कायम रखते हुए सुलझाते है । और नेताओ से अपील की कृपया करके अपने फायदे के लिए देश के बड़े सम्मानो , पुरस्कारो और महान हस्तियों को इस्तेमाल न करे आप की तो कोई गरिमा नहीं है कम से कम उसकी गरिमा का तो ख्याल रखे ।


चलते चलते 

                     जब कालेज में थी तो मित्र ने कहा कि सचिन पर कुछ लिखो मैंने जवाब दिया मै कभी भी सचिन पर कुछ भी नहीं लिखूंगी , कारण ये कि एक तो उन पर बहुत कुछ लिखा गया है अब कुछ बाकि नहीं है लिखने के लिए , दूसरे जिस जगह वो है उसके लायक मेरे पास शब्द नहीं है , तीसरे कुछ चीजे बस महसूस करने के लिए होती है थोड़ी निजी टाइप भावना, सब कुछ शब्दो में लिख पाना और लिखा देना जरुरी नहीं है । पता न था की  एक दिन सचिन और राजनीति के कॉकटेल पर लिखूंगी , उफ़ ये राजनीति क्या न करवा दे । 

मुझे बड़ी खीज होती थी हमेसा जब लोग सचिन से हर बार सेंचुरी की उम्मीद करते थे ,उससे कम की तो बात ही नहीं होती थी , आखरी पारी में भी वही उम्मीद , लोग हद कर देते है । उनकी बिदाई वाले दिन फेसबुक पर लिखा कि  "  चलो सचिन आज से आप आजाद है १२१ करोड़ उम्मीदो से , उम्मीद है आप अब हजारो सचिन का निर्माण करेंगे देश के लिए "  लो फिर से सचिन से एक और उम्मीद :))) सच में हम सब कितने एक जैसे है । 














July 08, 2013

अब तो भगवान से भी नहीं होगा जी - - - - - - - -mangopeople




                                                                    अभी तक लगता था की ये देश भगवान भरोसे चलता था किन्तु उत्तराखंड त्रासदी के बाद लगने लगा की अब तो भगवन ने भी शायद अपने हाथ खड़े कर दिए है, भाई इतनी नालायकी तो हम से भी न झेली जाएगी , ठीक है सब मेरे भरोसे छोड़ दिया है, लेकिन मेरा हाल भी बुरा कर रखा है तुम लोगो ने , मै दुनिया के शोर शराबा मोह माया त्याग हिमालय में शन्ति के लिए आ बैठा था कभी कदार कुछ भक्त आते दर्शन पाते तृप्त हो चले जाते , लेकिन तुम लोगो ने तो मुझे भी अपनी कमाई का जरिया बना लिया , तीर्थ तो कब का पीछे छुटा मेरे हिमालय, मंदिर को भी पर्यटन की जगह बना डाला , कहा एक समय तीर्थ उनके लिए था जो सांसारिक जीवन में अपनी सारी जिम्मेदारिय निभा चुके है , जिनके पास करने के लिए कुछ नहीं है अब संसार में , तो वो शांति से मेरे ध्यान मान कर सकते है बिना पीछे किसी चिंता के मेरे दर्शन को आते लेकिन यहाँ तो बच्चे से लेकर जवान तक सभी चले आ रहे है , तो अब बस भक्त गण लीजिये अपनी जिम्मेदारी और भरोसा अब ये मेरे बस का नहीं । 

                                               बोध गया के हुए बम ब्लास्ट के बाद तो ये बात और भी सच लग रहा है कि  अब भगवान भी इस देश को नहीं कर सकता है ।  निकम्मेपन और नालायकी में हम से पीछे अब कोई न होगा । अभी तक नाटक होता था की जी कोई ख़ुफ़िया जानकारी नहीं है इसलिए कब कहा बम फट जाये कहना मुश्किल होता है , लो जी अब तो हर त्रासदी की पहले से खबर भी मिलने लगी यहाँ तक की भारी बारिस की खबरे भी पूर्व में दे दी जाती है , लेकिन ये हमारी सरकारों के कान है इसे बस राजनीति की आवाज ही सुनती और सुहाती है कुछ और न सुनाई देता है न दिखाई देता है , इस बार तो हद ही हो गई आतंकवादीयो के घुसने से लेकर  उनके नाम स्केच के साथ ब्लास्ट की जगह की जानकारी भी पहले से ही दे दी गई थी उसके बाद भी वही का वही हाल ,  यहाँ तक की पहले पकडे गए आतंकवादियों के बताये दो स्थानों में से एक हैदराबाद में पहले ही ब्लास्ट हो चुका है उसके बाद भी दूसरी जगह की सुरक्षा व्यवस्था पर कोई ध्यान नहीं दिया गया , अब और क्या चाहते है सूचना के नाम पर , क्या उन्हें आतंकवादी ला कर दिया जाये कि लो भाई  ये आतंकवादी है इसे पकड़ लो । कल टीवी पर खबर देख रही थी लिखा आ रहा था की सूत्रों के मुताबित आतंकवादियों ने हताशा में ये बम ब्लस्ट किये ????? कौन सी हताशा भाई जरा समझाइयेगा  , ये की इतनी सूचना के बाद भी भारतीय सुरक्षाकर्मी हमें पकड़ नहीं पाते है किसी ब्लास्ट को रोक नहीं पाते है , हर बार लोग मारे जाते है लेकिन इस भारतीय सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ता है, किस बात की हताशा है इन आतंकवादियों को कि  उनके सभी योजनाए बड़े आराम से पूरी हो जा रही है उन्हें "शहीद" होने का मौका नहीं मिल रहा है , हद है खबर देने वाले एक बार भी सोचते है की वो क्या लिख रहे है या पैसा मिला या सनसनी फ़ैलाने के लिए जो ठीक लगा बस खबर चला दी । 

                                  उस पर से ये अक्ल के अंधे ख़ुफ़िया विभाग वालो को भी दिमाग नहीं है की खबर निकाली कहा से जाये , देखिये दिग्विजय सिंह बता रहे है की ब्लास्ट का कनेक्शन कहा से है , उनके पास ऐसी ऐसी खबरे होती है की मुझे लगता है की उनका अपना ख़ुफ़िया विभाग देश के ख़ुफ़िया विभाग से ज्यादा मजबूत और तेज है,  कई बार तो कुछ  होने के पहले ही उसके होने की जानकारी मिल जाती है । मुझे तो लगता है की अगली बार एन आई ए को बम स्थल पर जाँच करने की जगह इंतज़ार करना चाहिए की राजा साहब क्या क्लू देने वाले है , या उन्हें ही जा कर उनसे पूछ लेना चाहिए की आप के पास इस बम विस्फोट से जुडी कौन कौन सी जानकारी है , ताकि सही लोगो को पकड़ा जाये , ऐसा न हो की देश की चार एजेंसिया चार तरह के लोगो को पकडे और बाद में इस बात का झगडा हो की किसी की सूचना सही थी किसके पकडे गए लोग असली वाले आतंकवादी है , हरा आतंकवाद या भगवा आतंकावाद , या लाल आतंकवाद , रंग रंगीले देश का आतंकवाद भी बड़ा रंगीला है ।
                    

                                    अब आप को क्या लग रहा है की मामला यहाँ पर ही शांत हो जायेगा , याद रखिये हर नहले के बाद एक दहला भी आता है है , इंतजार कीजिये दूसरी तरफ से भी खबर आ रही होगी बिलकुल गुप्त खबर की वर्मा में बौद्धों ने मुस्लिमो पर जो अत्याचार किया है उसके बदले के लिए भारत में बौद्धों के ऊपर और उनके धर्म स्थल को निशाना बनाया गया है , अब ये न कहियेगा की कहा वर्मा और कहा भारत , याद नहीं है तो फिर से याद कर लीजिये की मुंबई में म्यांमार से कुछ तथा कथित दंगो में हजारो मुस्लिमो के बौद्धों के द्वारा मारे जाने की फोटो आने के बाद यहाँ मुंबई में कितना बवाल मचा था कितना दंगा हुआ था । यही तो समस्या है की लोगो की यादास्त बड़ी कमजोर है इसलिए महान समझदार लोगो को आगे आ कर बताना पड़ता है लोगो को याद करना पड़ता है  । जब दिग्विजय सिंह एक दिन पहले मोदी के बयान से बम को जोड़ सकते है तो दुसरे भी  इसका कनेक्शन अपने मतलब की चीज से जोड़ दे तो कौन सा आश्चर्य की बात है और हा एक तीसरी कटेगरी भी है जो फिर से विदेशी हाथ , पकिस्तानी हाथ पैर आदि आदि का जानकारी देगा ।


                                          तो इंतज़ार कीजिये की देश की एजेंसिया जो सांप जाने के बाद लकीर पीटने की आदि हो चुकी है किसकी सूचना को ज्यादा पुख्ता मान कर किस तरह के ( रंग )  लोगो को पकड़ती है और सजा , नहीं नहीं सजा की बात न ही की जाये तो अच्छा है क्योकि वो भी यहाँ भगवान भरोसे ही होता है सारी दुनिया के सामने आतंकवादी हरकत करने वाले और फांसी की सजा की घोषणा होने के बाद भी उसे मारने के लिए भी भगवान को ऊपर दे डेंगू की बीमारी भेजनी पड़ती है , और निचे वालो को गुप्त फांसी का नाटक करके अपनी फंसी जान बचानी पड़ती है ।
                                         

                                              बिच में मरने कटने के लिए हम लल्लू , वैसाख नन्दक लोग है , जिनके जान माल की कोई कीमत नहीं है,  हम जब तक जिन्दा है तो वोट है नहीं तो मरने पर मुआवजा बन जाते है ,( हमारे टैक्स में दिए पैसे हमें ही दे कर मुआवजा कहते है )  हम आम जनता नेताओ के लिए जीता जागता चलता फिरता ए टी एम मशीने है , जो समय समय पर कभी वोट देता है कभी भ्रष्टाचार कर पैसा कमाने का मौका । तो चलती फिरती ए टी एम मशीने कोई मरा नहीं अभी तक इस नए नवेले बम विस्फोट में इसी बात की ख़ुशी मनाइये , अभी तक है जिन्दा है तो शुक्र मनाइये , फालतू के काम की जगह जरुरी काम निपटाइये  ,क्योकि अब भगवान् उसे पूरी करने का मौका आगे आप को दे न दे , इसलिए कप्यूटर पर समय बर्बाद न करके परिवार के साथ कुछ समय बिताइये ।




चलते चलते 

                      एक राजा साहब शिकार करते हुए जंगल में खो गए साथ में उनकी कानी उंगली भी चाकू से कट कर अलग हो गई ,साथ में मंत्री था , बोल जो होता है अच्छे के लिए होता है राजा को गुस्सा आया उसने मंत्री को सूखे कुए में धकेल दिया आगे बढ़ा तभी जंगलियो ने उसे पकड़ कर उसकी बलि देनी चाही लेकिन उसकी कटी  उनगलि देख छोड़ दिया की वो पूरा नहीं है , राजा भाग कर वापस आया मंत्री को कुए से निकला मंत्री ने कहा  देखा मैंने सही कहा था कि जो होता है अच्छे के लिए होता है  आप की उंगली कट कर अच्छा हुआ नहीं तो वो आप की बलि  दे देते , मुझे क़ुए  में ढकेल अच्छा किया नहीं तो आप की जगह मेरी बलि दे देते , अच्छा हुआ जंगल में खो गए तो पता चला की हमारे राज्य में ऐसे अशिक्षित लोग भी जिन्हें शिक्षा की जरुरत है , इसलिए जो होता है अच्छे के लिए होता है  । तो दिल बहलाने के लिए उसे बेफकुफ़ बनाने के लिए दुनिया  ये कहानी अच्छी है , चुपचाप आँखे बंद कर बस यही दोहराइए की जो होता है अच्छे के लिए होता है , ऑल  इज वेल,  ऑल इज  वेल :)


अपडेट - -- --- अपने रंग रंगीले देश की बात करते हुई इतने रंग के आतंकवाद की बात की एक रंग भूल गई थी  वो है नीला रंग ।  बम ब्लास्ट हुआ दूर वहा बिहार में वहा पर आर जे डी , बी जे पी  ने बेमतलब का बंद बुलाया तो भी बात समझ आती है वहा की विपक्षी पार्टी है ये उनका हक़ काम अधिकार है की ऐसे बेमतलब के काम करे किन्तु यहाँ मुंबई में बंद  हद हो गई,  आर पी आई नाम की एक दलित पार्टी जिसके मुखिया अठावले है जिन्होंने मांग की है की उन्हें महाराष्ट्र का उप मुख्यमंत्री बनाया जाय उनके सिट की संख्या शायद दहाई आकडा भी नहीं छूती है , अब आप समझ लीजिये , पहले कांग्रेस के साथ है अब शिवसेना गठबंधन में है उनके कार्यकर्ता मुंबई में दुकाने बंद करा रहे है नील रंग का झंडा लिए आम्बेडकर के नाम के खाने वालो को अब बुद्ध और बौद्ध धर्म में भी अपनी रोटी राजनीति दिख रही है , वैसे मुझे जानकारी नहीं है की बौद्ध धर्म कब से दलितों के साथ जुड़ गया केवल इसलिए की एक बड़ी संख्या में दलितों ने बौद्ध धर्म अपनाया है , लीजिये एक और कोण , ये हमला दलितों पर है  ।






June 25, 2013

राजनीति चालू आहे - - - - - - mangopeople


अपडेट - आज की राजनीति  और हालात  पर बनाया गया एक सही कार्टून 




                                           ये सवाल करना की उत्तराखंड त्रासदी पर किसने पहले राजनीति शुरू की बिलकुल वैसा है है जैसा की ये पूछना की दुनिया में पहले मुर्गी आई या अंडा , शुरू जिसने भी की किन्तु उसे आगे बढ़ाने का काम दोनों ही मुख्य राष्ट्रीय राजनीतिक दल मिल कर कर रहे है , और जोरो शोरो से कर रहे है  । जवाबी हमलो की तरह बचाव कार्य किये जा रहे है और दान के बछिए के भी दांत गिने जा रहे है , मनमोहन सोनिया ने हवाई दौरा कर जनता पर उपकार किया , प्रधानमंत्री ने ये घोषणा करने से पहले की कितने हेलीकाफ्टर , डाक्टर प्रशासन के लोग बचाव कार्य में लगाये गए है ये घोषणा पहले की की उत्तराखंड के कितने हजार करोड़ की सहायता इस त्रासदी के लिए दी गई है , तो क्या अब इन पैसे से हेलीकाफ्टर ख़रीदे जायेंगे और फिर उनसे बचाव कार्य किया जाएगा , हजार करोड़ की घोषणा करना उस समय कितना जरुरी था , वो समय बचे हुई लोगो को बचाने का , घायलों को चिकित्सीय मदद का था न की पुनर्निर्माण का जहा हजारो करोड़ की जरुरत थी , जब लोग ही नहीं बचेंगे तो पुननिर्माण किसके लिए। अब ये सब देख कर बीजेपी के भावी कैसे पीछे रहते मोदी जी भी हवाई सैर कर आये , लेकिन कुछ अलग तो करना था न , खबर आई की हजारो गुजरातियों को जेम्स बांड की तरह बचा कर ले गए उसके लिए पूरा लावा लश्कर ले कर आये थे , सोच में  पड गई की कैसे बचाया होगा हजारो गुजरातियों को , चापर को निचे उतारा होगा और लोगो से पूछा होगा भाई गुजराती हो आओ चापर में बैठ जाओ जो नहीं है वो दूर रहे क्योकि फिलहाल तो हम गुजराती वोटो की कीमत ही अदा कर रहे है जिस दिन गुजरात के बाहर के लोग हमें वोट दे कर भावी से वर्तमान बना देंगे उस दिन उन की सुध ली जाएगी फिलहाल तो मै गुजरात का गुजरातियो के द्वारा गुजरातियों के लिए बना मुख्यमन्त्री हूँ सो सेवा वही तक  । अफसोस वो भूल गए की लोग पहले सेवा देखते है बाद में मेवा देते है , मोदी जी आँखों का विजन बढाइये , ममता जी जैसी हरकत न कीजिये की देश की रेल मंत्री हो कर बंगाल की रेल मंत्री सा व्यवहार करती  । भावी को वर्तमान बनाना है तो ये गुजरात गुजराती की रट छोडिये , क्षेत्रीयता से बाहर आइये अब तो आप को बीजेपी ने केन्द्रीय  राजनीति में घोषित पद दे दिया है , अब भी काहे क्षेत्रीय सोच , वो लावा लश्कर दूसरो  के लिए भी प्रयोग करना था , उस पर से भद्द पिटी की विकास और समृद्धि का गान करने वाले ने केवल २ करोड़ की मदद दी उससे कही ज्यादा तो गरीब यु पी  ने दी २५ करोड़ , तब जा कर होश आया देश की चिंता हुआ और ३ करोड़ दान में दिए और अपने हेलीकाफ्टर से बाकियों की भी मदद की पेशकस की , लीजिये अब उधर से जवाबी राजनीति शुरू हो गई की अब बिना राज्य सरकार की इजाजत कोई भी मदद नहीं करेगा , सब एक ही झंडे के निचे से गुजरेंगे , लगता है ये किस्सा लम्बे समय तक चलता रहेगा हर नहले पर एक दहला पडेगा   ।
                                                                                 
                                          अब हमारे देश में ऐसा तो हो नहीं सकता जब केन्द्रीय राजनितिक दल किसी मुद्दे पर राजनीति  कर रहे हो और कुछ दुसरे पीछे रह जाये अब ये सब देख कर भावी मुख्यमंत्रियों की दूसरी कतार में बैठे क्षेत्रीय क्षत्रप  कैसे पीछे रहते उन्होंने भी अपना पूरा सहयोग देना शुरू कर दिया । सबसे पहले आगे आये है आन्ध्र प्रदेश से चंद्रबाबू नायडू , आरोप लगाया है की तेलगू भाषी तीर्थ यात्रियों के साथ भेद भाव हो रहा है उन्हें बचाया नहीं जा रहा है, उन्हें खाने पीने  के लिए नहीं दिया जा रहा है ( टीवी पर उनके तेलगू बयान को हिंदी में लिखे गए अनुवाद के अनुसार )   । उनसे कुछ सवाल उत्तराखंड में जो बचाव कार्य चल रहा है वो सेना कर रही है , वहा प्रशासन सरकार नाम की कोई चीज मौजूद ही नहीं है ,( जितने बच के लोग आये है सभी ने एक शुर में यही बात कही ) पुलिस तो तब सामने आई जब खबर आई की मंदिर के खजाने के साथ ही बैंक के करोडो रुपये को लुट लिया गया है साथ ही यात्रियों को भी लुटा जा रहा है , तब आचानक से वहा स्थानीय पुलिस प्रकट होने लगी , और लोगो की तलासिया शुरू हो गई , अपने फिक्स पुलिसिया काम में लग गई , बाकि तो आप ज्यादा समझदार है हम क्या कहे ,  तो क्या नायडू जी ये आरोप सेना पर लगा रहे है की वो लोगो को बचाने में भेदभाव कर रही है बचाने से पहले लोगो के क्षेत्र के बारे में पता कर रही है , मुझे लगता है की बोलने से पहले लोगो को एक बार अपने कहे पर विचार कर लेना चाहिए  । ये सुनने के बाद तो ये लग रहा है की यदि कुछ समय बाद ये खबर आये की फला नेता ने आरोप लगाया है की केवल ऊँची जातियों को ही बचाया जा रहा है दलितों पिछडो को नहीं तो भारतीय राजनीति के रूप को देख कर हम में से किसी को भी इन आरोपों पर आश्चर्य नहीं होगा । शुक्र है यहाँ धर्म की बात बिच में नहीं आएगी , और न अल्पसंख्यक आयोग और उनके हितैशी  बिच में आयेंगे , और न साम्प्रदायिकता , हिन्दुवाद जैसी बात आयेगी ,  ऐसे मै सोच रही था पर ऐसा हुआ नहीं आँखे खोलने का काम किया सोसल नेटवर्किंग साईट ने , नेता तो नेता जनता कैसे पीछे रहे , जस राजा तस प्रजा , वो बाते लिख कर और लिंक दे कर उन्हें बढ़ावा नहीं देना चाहती , जिसमे दावा किया गया की हिन्दू तीर्थ स्थलों को जानबूझ  कर नुकशान पहुँचाने के लिए कुछ काम किये गए  । हद है कभी कभी लगता है की लोग कुछ ज्यादा ही दिमाग लगाते है , किन्तु वहा जहा उसकी जरुरत नहीं है ।
                                                         
                                                     कुछ बचे है जिनके पास करने और कहने के लिए कुछ है ही नहीं , और न ही राजनीति  में कुछ ज्यादा बचा है उनके लिए  वो बस यही कह कह कर कि लोगो को लाशो पर राजनीति नहीं करनी चाहिए फुटेज खा रहे है । उत्तराखंड के मुख्यमंत्री और सेना वी आई पी  को वहा आने से मना कर रहे है लेकिन राजनीति  में अपने नंबर बढाने के चक्कर में हर नेता वहा अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे है , जो बेचारे राज्यों के मुख्यमंत्री पहले इसकी जरुरत नहीं समझ रहे थे वो अब एक दुसरे की होड़ में पाला छूने उत्तराखंड जा रहे है और वहा के लिए मुसीबत ही ज्यादा बन रहे है , अच्छा तो ये होता की वो विमान बस आदि भेज कर सेना द्वारा सुरक्षित निकाल कर लाये गए लोगो को उनके घरो तक पहुँचाने का काम करते क्योकि यात्रियों के लिए भी ये काम भी मुश्किल हो रहा है जिनके पास केवल तन के कपडे बचे है वो अपने घरो तक कैसे पहुंचे ये भी कम मुसीबत की बात नहीं है, उनके लिए  ।


चलते चलते 
                  इस पूरी त्रासदी में कितने लोगो की मौत हुई और कितना नुकशान हुआ इस बात का सही सही आंकलन करना असम्भव है और इसके सही आकडे कभी भी सामने नहीं आ पाएंगे , कितनी को मौत नदी के तेज धारा में बह कर हो गई होगी और कितने हजारो फिट खाइयो में गिर कर गुम हो गए होंगे कितने तो उस मलबे ने निचे जिन्दा ही दफ़न हो गए होंगे , न जाने कितनो की लाशे बरामद होंगी और कितने बस लापता की लिस्ट में ही रह जायेंगे , अब समस्या उनके लिए शुरू होगी , जिनके अपने लापता की लिस्ट में होंगे , हमारी लालफीता शाही और व्यवस्था की मार उन पर पड़ेगी , सरकारी मुआवजा मिलने में जो परेशानी होगी तो होगी ही साथ में उन्हें बीमे की रकम जिस पर उनका सीधे हक़ बनता है,  मिलने में भी काफी परेशानी आने वाली है , सबसे पहले तो यही साबित करना होगा की वो केदारनाथ गए भी थे की नहीं जो इन हालातो में एक मुश्किल काम होगा तब जबकि वो जगह ही बर्बाद हो चूका हो जहा होने को साबित करना है , फिर ये साबित करना होगा की वहां उनकी मौत हो गई है , हालत ये है की लोगो को अपनो की लाश वहा खुद छोड़ कर आना पड़ा , उनकी मौत साबित करना तो और मुश्किल होगा जिनकी लाश भी न मिले , जिनके बारे में खुद घरवालो को ही न पता हो , सोच कर अफसोस होता है की उन घरो का क्या होगा जहा घर के कामने वाले एक मात्र सदस्य की मौत हो गई है और मुसीबत के समय के लिए परिवार के लिए कराया गया बीमें की रकम भी नहीं मिले  । दो  ऐसा ही किस्सा मुंबई में आये बाढ़ के समय सुनने को मिला जिसमे लाश नहीं मिल पाने के कारण उसकी मौत को माना ही नहीं गया और कहा गया की सात साल के बाद ही  सरकारी कानून के हिसाब से उसकी मौत की पुष्टि की जाएगी तब तक न तो उन्हें सरकारी मुआवजा मिलेगा न बीमे की रकम ( वो बेचारे माध्यम गरीब तबके से थे सो कोई अच्छा वकील भी न कर सके जो उन्हें कोई मदद दे पाता  ) । यदि पैसे के हिसाब को छोड़ भी दीजिये तो एक भावनात्मक स्थिति कैसी होगी क्या कोई माँ या पत्नी अपनों के लापता होने पर ये मान लेगी की उसके अपनो की मौत हो गई है शायद वो बाकि जिवन इस इंतज़ार में गुजार दे की हो सकता हो की उनकी जान बच गई हो हो सकता है की वो अभी घायल हो और यहाँ आने की स्थिति में न हो, हो सकता है की एक दिन वो लौट आये , उफ़ ये इंतज़ार उस मौत से बत्तर होगी उनके लिए जब उनकी एक आँखे सदा दरवाजे पर होगी ।




अब आप कहेंगे की राजनीति की इतने बाते हो गई और मैंने एक बार भी राहुल गाँधी का नाम तो लिया ही नहीं , राजनीति  कोई ऐसा विषय नहीं है जिसके कोई लिखित सिद्धांत होते हो जिसे पढ़ कर कोई राजनीति  सिख ले , ये बस देखो और सीखो के एक मात्र सिद्धांत पर चलती है , राहुल को भारतीय राजनीति में आये एक दसक से भी ऊपर का समय हो गया है और उन्हें अब तक इतनी राजनीति तो आ ही जानी चाहिए की कब क्या करना, कहना है  और कब सवालो से बड़ी आसानी से बच जाना है किन्तु आज भी उन्हें अपने माँ और कांग्रेसियों के सलाह की जरुरत पड़ती है , उन्हें आगे बढ़ने के लिए कांग्रेस के लोगो को मंच तैयार करना पड़ता है समारोह करना पड़ता है मिडिया के सामने लाना पड़ता है , और मिडिया में खुद ये बयान देना पड़ता है की " हम सभी ये काम राहुल की प्रेरणा से सोनिया जी के नेतृत्व में कर रहे है" भारतीय राजनीति को देखने वाला कोई भी बता सकता है मुझ जैसी आम सी गृहणी भी कि राहुल को ऐसे समय में अपना विदेशी दौरा बिच में छोड़ कर भारत में उपस्थित होना चाहिए था भले वो देहरादून जाते या नहीं , मिडिया में दो लाइन का बयान देना चाहिए था की हम त्रासदी में फंसे लोगो के साथ है उनकी हर सम्भव मदद कर रहे है , ऐसे समय में तो आप बड़ी आसानी से मिडिया के बाकि सवालो को ये कह कर बच सकते है कि   " ये समय राजनीतिक सवालो का  और राजनीति करने का नहीं है " ।