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July 01, 2018

अपराध में कुछ नए रंग ---------mangopeople




                                                         

                                                       आज का माहौल कुछ ऐसा है कि देश में होने वाली लगभग हर घटना का रुख एक ही तरफ मुड़ जाता है और बाकि के जरुरी सवाल कही पीछे छूट जाते है | किसी अपराध और अपराधी के लिए इससे अच्छा माहौल क्या होगा जब उसके अपराध को भी धर्म के रंग में रंग कर लोग अपनी सुविधानुसार और राजनैतिक विचारो के अनुसार प्रतिक्रियाए दे या उसका विरोध करे  | नतीजा ऐसे ज्यादातर अपराधों में धर्म और राजनीति का खतरनाक कॉकटेल अपराधी  के बचाव में भी लोगों को खड़ा कर देता है या कुछ लोग अगर मगर का पेंच इसमें लगा देते है | इस खतरनाक मिश्रण ने तो लोगों का  भरोसा भी कानून और पुलिस पर ख़त्म सा कर दिया है | यही कारण है की आज भीड़ द्वारा लोगो को मारे जाने की घटनाए दिन पर दिन बढ़ रही है | लोगो की प्रतिक्रियाए इतनी ज्यादा उग्र है कि वो बड़ी आसानी से किसी भी अफवाह झूठ पर विश्वास कर  अजनबी को संदेह की नजर से देखने लगे है और खुद कानून को हाथ में ले सजा देना शुरू कर दिया है |

                                                      किसी भी अपराध के असली कारणों को जब नहीं देखा जाता उसकी रोकथाम नहीं की जाती |  जब तक सुरक्षा के लिए जिम्मेदार लोगों और लापरवाही दिखाने वाले लोगों को दंडित नहीं किया जाता |  किसी भी तरह के अपराध को रोकना क्या कम करना भी असंभव है | हाल में भी मंदसौर में एक मासूम बच्ची के साथ जिस तरह बर्बर तरीके से रेप किया गया और उसकी हत्या करने की कोशिश की गई | उसके अपराधी को फांसी की सजा मिलना तो तय है | लेकिन ये भी जरुरी है कि लापरवाही बरतने वाले स्कूल के खिलाफ भी कार्यवाही की जाए और पुलिस के खिलाफ भी जाँच बिठाई जाए की ऐसे मामलों में  रिपोर्ट लिखे जाने के पुलिस कार्यवाही में कितनी  तत्परता दिखाती है  |  जिस तरह अपराधी तीसरे ही दिन सीसीटीवी कैमरे में कैद होने के कारण पकड़ा गया उससे लगता है कि यदि पुलिस उसी शाम से तेजी दिखती और इलाके  कैमरों की जाँच शुरू कर अपराधी को पकड़ने का प्रयास करती  तो शायद इतनी बर्बर घटना को होने से रोका जा सकता था | कार्यवाही उस स्कूल के खिलाफ भी होना चाहिए जिसने इतनी छोटी बच्ची को स्कूल से अकेले घर जाने दिया | जबकि रोज उसके पिता उसे लेने आते थे तो ये साफ तौर पर स्कूल की जिम्मेदारी थी कि जब तक उसके घर से कोई आ नहीं जाता बच्ची स्कूल से बाहर न जाए | ये जरुरी है कि ऐसी घटनाओं में ऐसे लापरवाह लोगों की भी जिम्मेदारी  तय की जाए और उन्हें उसकी सजा भी दी जाये | जिससे अन्य लोग भी सबक सीखे और ऐसी गलतियों से बचा जा सके  |

                                                  अक्सर ऐसे हर मामलों के बाद कड़े कानूनों और फांसी की सजा की मांग सभी करते है लेकिन कोई भी इसके पीछे के सामाजिक सोच को बदलने का कोई प्रयास नहीं करता है | आज भी खुलेआम महिलाओं को सोशल मिडिया में रेप की घमकी या उसे अश्लील मैसेज भेजे जाते है और कोई भी ऐसे लोगों का विरोध नहीं करता उनका बहिष्कार नहीं करता | सभी वही अगर मगर , महिलाओं को दोष देने और राजनैतिक सोच के हिसाब से प्रतिक्रिया देने का काम करते है | इससे ऐसी मानसिकता वाले लोगो को अपराध करने का बढ़ावा ही मिलता है | उन्हें लगता समाज में फिर हमारे लिए लोग खड़े हो जायेंगे और दोष महिला को दे दिया जायेगा  या मुद्दे को एक अलग रंग | जब  अपराध और अपराधी का विरोध में कुछ दूसरे रंग डाल दिए जाते है तो अपराध कम नहीं होते , उन्हें बढ़ावा मिलता है |


                       



October 17, 2012

जेम्स बॉन्ड अभिनेत्रिया भी भई नारीवादी --------mangopeople





एक खबर पढ़ी की जेम्स बांड फिल्मो में काम करने वाली अभिनेत्रियों को " बॉन्ड गर्ल" कहा जाता है किन्तु 23 वे बॉन्ड फिल्म में काम कर रही हॉलीवुड अभिनेत्रीया  बेनेरिस  मार्लो  और निओमी  हैरिस को इस नाम से परहेज है उनका मानना है उन्हें "बॉड गर्ल"  नहीं "वुमन"  कहा जाये । असल में  इन फिल्मो में काम कर रही अभिनेत्रियो को केवल एक  सेक्स बम की तरह पेश किया जाता है जबकि ऐसा नहीं है , महिला किरदार भी बॉड की तरह ही चालक समझदार और कई मौको पर एक्शन भी करती है और बॉड की जान तक बचाती है , उसके मुकाबले जिस्म दिखाने के दृश्य तो काफी कम होते है किन्तु उन्हें अपना खुबसूरत बदन दिखने वाली किशोरी की तरह सेक्स बम ही बना कर प्रचारिक किया जाता है जो गलत है  । इसी बात का विरोध किया जा रहा है और ये विरोध भी कोई पहला नहीं है जहा बॉड फिल्म में नायिका बनने के लिए होड़ मची रहती है वही कुछ अभिनेत्रियों ने इस किरदार को करने से ही मना भी किया है .क्योंकि उनका मानना है की जेम्स बॉड को महिलाओं के जज्बातों की क़द्र नहीं हैं वह अपने काम निकालने के लिए उन्हें मोहरा बनाता हैं और फिर उनसे किनारा कर लेता हैं यहाँ तक की वह अलग अलग देशों में जाता है और अपने अहम् की संतुष्टी के लिए कई महिलाओं के साथ बेड साझा करता हैं.( राजन जी के ब्लॉग से ) । अमेरिका जैसे देशो में भी महिला अभिनेत्रिया अपने सही स्थान की मांग कर रही है ।  भारत के लिए भी ये नया नहीं है अभी हांल में भी विद्या बालन की फिल्म डर्टी पिक्चर ने खूब पैसा कमाया तो पत्रकार उनसे पुछने लगे की क्या अब उन्हें पैसा कमाने वाले खान अभिनेताओ की तरह विद्या खान कहा जाये तो उन्होंने तुरंत जवाब दिया की क्यों विद्या खान क्यों किया जाये शाहरुख , आमिर और सलमान बालन क्यों न कर दिया जाये ( नीजि रूप से भी मुझे उनका ये जवाब बहुत ही पसंद आया ) । लिजिये अब तो अभिनेत्रिया भी नारीवादी बन गई वो भी किस देश की जहा पर ज़माने से महिलाओ के बराबरी की बात की जा रही है किन्तु विरले ही कोई पुरुष उनके किये को सम्मान की दृष्टि से देखता हो और बराबरी का बात करता हो । ऐसा नहीं है की कुछ उदाहरन है ही नहीं , आप को याद होगा एक अमेरिकी टीवी सीरियल " फ्रेंड्स " आता था पूरी दुनिया में काफी प्रसिद्द था उसमे 6 दोस्तों की कहानी थी जिसमे 3 महिला और 3 पुरुष थे जब वो धारावाहिक काफी प्रसिद्द हो गया तो महिला कलाकारों ने मांग की की उन्हें भी उतना ही पैसा दिया जाये जितना की पुरुष कलाकारों को दिया जाता है क्योकि उस धारावाहिक की सफलता में उनका बराबर का हाथ है , उनके उस कदम पर धारावाहिक के तीनो पुरुष कलाकार अपना अहम् सामने रखने  की जगह उनके साथ खड़े हो गए और बराबर पैसे देने की मांग करते हुए काम करने से इंकार कर दिया , नतीजा उन दिन से सभी को एक सामान पैसे दिए जाने लगे ( मतलब की महिलाओ के पैसे बढा  दिए गए पुरुषो के कम नहीं किये गए )। अन्तराष्ट्रीय महिला टेनिस खिलाडी भी महिला और पुरुषो को पुरुस्कारों  में मिलने वाले पैसो में बराबरी की बात करती रही है , उनकी बात को ये कह कर ख़ारिज कर दिया जाता रहा है की पुरुष 5 सेट मैच खेलते है और महिलाए 3 सेट ( ये भी कोई तर्क हुआ ) महिला खिलाडियों का   कहना है की लोग अच्छा खेल देखेने आते है न की यहाँ समय बिताने क्या पुरुषो के जो मैच तीन  सेट में ही ख़त्म हो जाते है तो उन्हें कम पैसे दिए जायेंगे । किन्तु बराबरी की ये सभी मांगों को नारीवादी सोच कह कर ख़ारिज किया जाता रहा है ।
    
                     समझ नहीं आता की नारी जब भी अपनी ,अपने अधिकारों ,बराबरी की बात करती  है तो उसे नारीवादी कह कर ख़ारिज क्यों कर दिया जाता है , किसी पुरुष की बातो को तो पुरुषवादी कह कर नहीं ख़ारिज किया जाता है यहाँ तक की कोई पुरुष नारी के बारे में लिखे तो उसे भी नारीवादी कह कर ख़ारिज नहीं किया जाता है बल्कि उसे तब संवेदनशील कह कर प्रसंसा की जाती है । कुछ दिन पहले देवेन्द्र जी के ब्लॉग पर मुक्ति जी के फेसबुक पर विवाह को लेकर एक टिप्पणी पढ़ी  " कल एक ब्लोगर और फेसबुकिया मित्र ने मुझे ये सलाह दी की मै शादी कर लू , तो मेरा आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित हो जायेगा :) इस प्रकार का विवाह एक समझौता ही होगा , तब से मै स्त्रियों द्वारा  " सुरक्षा " के लिए  चुकाये जाने वाले कीमत के विषय में विचार विमर्श कर रही हूँ और पुरुषो के पास ऐसा कोई विकल्प न होने के मजबूरी के विषय में भी :) इससे पहले मुक्ति जी के मित्र की बात का ही जवाब दे दूँ , जिस समाज में हम रहते है वहां आज भी स्त्रिया खुद से विवाह नहीं करती है बल्कि उनका विवाह किया जाता है पिता, भाई आदि आदि के द्वारा और कब करना है किससे करना है कैसे करना है आदि आदि का निर्णय भी वही करते है तो सलाह किस पिता भाई को ऐसी देने चाहिए की ,  पिता जी भाई जी अपने बहन बेटी का झट से विवाह कर दे ताकि उसकी सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा का "बोझ" ( यदि वो ऐसा समझते  हो तो ) आप पर से उतर जाये , अब वो भाई और पिता उन्हें कैसे जवाब देते है ये तो इस बात पर निर्भर होगा की वो अपनी बेटी या बहन का विवाह क्या सोच कर करते है ( क्या आप को इसमे खाप पंचायत वाली सोच नहीं दिख रही है की बेटियों का बलत्कार हो रहा है तो उनका विवाह 15 साल में ही कर दो ताकि आप से उसकी सुरक्षा का झंझट छूटे और बला किसी और पर जाये )  स्त्री तो यहाँ कोई मुद्दा ही नहीं है क्योकि यदि मात्र सामजिक और आर्थिक सुरक्षा के लिए विवाह किये जाते है तो वो सब कुछ तो स्त्री को बिना कुछ भी किये अपने पिता के घर में मिल ही रही है उसके लिए उसे विवाह की क्या जरुरत है सोचना तो उस पिता को है की क्या वो अपनी जन्म दी हुई बेटी को आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा नहीं दे सकता है उनका लालन पालना जीवन भर नहीं कर सकता है , और यदि  ये सलाह किसी स्त्री को दी जा है की वो शादी कर ले , मतलब की वो अपने विवाह के लिए फैसले लेने के लिए स्वतंत्र है , तो ये बात भी ध्यान में रखनी चाहिए की हमारे समाज में जो स्त्री अपने विवाह के फैसले लेने के लिए स्वतंत्र  है उसे किसी और से सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा की जरुरत नहीं है ।

                                    
                                                              दुनिया में सत्ता पाने उसे बनाये रखने का सबसे कारगर तरीका है डर पैदा करना , धर्म राजनीति से लेकर पुरुष भी स्त्री पर अपनी  सत्ता,  डर दिखा कर ही काबिज रखता है , जैसे की विवाह को सुरक्षा का नाम दे कर उसके अन्दर स्त्री पर सत्ता सिन रहना , अब जब की स्त्री को ये बात  समझ में आ रही है कि  एक तो विवाह मात्र सुरक्षा नहीं है दुसरे ये की अब कम से कम हम अपनी सामजिक और आर्थिक सुरक्षा के लिए किसी और पर निर्भर नहीं है , वैसे ये बात भी सोचने की है की जिस विवाह को स्त्री के लिए हर तरीके से सुरक्षा बताया गया वहां  वो सारी सुरक्षा उसे मिलती हो ऐसा भी नहीं है , घरेलु हिंसा के सामने आते मामले बता रहे है की वो शारीरिक प्रताड़ना से अपने ही घर और घरवालो से सुरक्षित नहीं है , यहाँ तक की महिलाए अपने ही घर में बलात्कार से भी सुरक्षित नहीं है , निम्न वर्ग, खेती बड़ी वाले गांवो, मुंबई जैसे शहरों में बड़ी संख्या में महिलाए आर्थिक रूप से घर में बराबर का सहयोग कर रही है तभी घर चल रहा है , फिर किस बात की सुरक्षा ये विवाह उन्हें प्रदान कर रहा है , फिर वो क्यों उस विवाह को अपनाये जो उन्हें मात्र गुलाम बनाने और अपनी जरूरतों को पूरा करने की सोच के साथ पुरुष करता है ( यहाँ मै सभी पुरुषो की बात नहीं कर रही हूँ पर जिनके विचार ऐसे है उनके लिए , किन्तु अफसोस की ज्यादातर के ऐसी ही है,  चाहे जानकर या चाहे अनजाने में  ) । अब जब नारी विवाह के "अर्थो" को बदलने की बात कर रही है तो कुछ पुरुषो के द्वारा एक नया डर  पैदा किया जा रहा है , लो जी नारी विवाह नहीं करेगी तो बच्चे कैसे होंगे  समाज कैसे चलेगा , दुनिया नष्ट हो जाएगी , समाज में आराजकता फ़ैल जाएगी ( एक स्त्री के लिए समाज हमेसा से  अराजक ही रहा है है गोवाहाटी कांड से लेकर हजारो उदाहरण पड़े है  )परिवार का नमो निशान मिट जायेगा और न जाने क्या क्या बकवास । कितनी अजीब बात है की स्त्री सिर्फ ये कह रही है की आज विवाह के मायने बदलने चाहिए , विवाह एक तरफ़ा समझौतों पर नहीं हो , बल्कि दो लोगो के आपसी समझ पर होनी चाहिए , विवाह में जब दो पक्ष होते है और कोई एक पक्ष के बिना विवाह नहीं हो सकता है तो फिर दोनों का स्थान भी बराबर होना चाहिए , एक विवाह में जितना महत्व पुरुष के शरीर की जरूरतों को दिया जाता है उतना ही महत्व स्त्री के मन भावनाओ को भी दिया जाना चाहिए , साथ ही माँ कब बनना है और कितने बच्चो की माँ बनना है इसका निर्णय भी वो खुद करेगी , अपवाद स्वरुप ही कोई महिला ये कहती हो की उसे कभी भी माँ नहीं बनना  है , साफ है की वो बस इतना चाहती है की उसे अब विवाह के लिए पति परमेश्वर की नहीं "जीवन साथी" की जरुरत है ( वैसे उम्मीद है की लोग "जीवन साथी" का मतलब तो समझते होंगे ) । किन्तु शोर मचाया जा रहा है की लो ये नारीवादिया दुनिया ख़त्म करने पर तुली हुई है  महिलाए विवाह की नहीं करना चाहती है और न ही बच्चे को जन्म देना चाहती है , हा ये ठीक है की आज विवाह न करने वाली लड़कियों की संख्या बढ़ रही है क्योकि समस्या वही है की विवाह करने के लिए पति तो हजार मिल रहे है किन्तु कोई जीवन साथी नहीं मिल रहा है यदि वो विवाह नहीं कर रही है तो उसका सबसे बड़ा करना है की विवाह करने के लिए उन्हें कोई साथी ही नहीं मिल रहा है । अब जबकि वो आर्थिक और सामाजिक रूप से किसी और पर निर्भर नहीं है तो  वो पारम्परिक विवाह के उस रूप से बाहर आ चुकी है और विवाह के नए मयानो के साथ विवाह करना चाह  रही है किन्तु जिस रफ़्तार से स्त्री बदल रही है उस रफ़्तार से पुरुष नहीं बदल रहे है , ये बिलकुल ठीक बात है की आज विवाह के पारम्परिक सोच से पुरुष भी बाहर आ रहा है और वो भी मात्र  पत्नी की जगह हर कदम पर उसके साथ देने वाली जीवन संगनी की चाह रखता है ( कई बार उन्हें भी अपने लिए साथी खोजने में परेशानी होती है किन्तु शायद वो अपनी जरूरतों के आगे झुक जाते है और हार मान कर अंत में जो मिल जाये उसी से विवाह कर लेते है शायद कुछ महिलाए ये समझौते नहीं कर रही है इसलिए वो या तो देर से विवाह करती है या न करने का ही निर्णय ले लेती है , वैसे अपवाद हर जगह होते है  ) कुछ स्त्रियों के विवाह न करने से दुनिया नहीं ख़त्म होने वाली है और न ही समाज में आराजकता आने वाली है यदि आराजकता आज समाज में है और कभी ये बढ़ी तो उसका  कारण  पुरुष का चारित्रिक पतन होगा कोई स्त्री का विवाह न करना नहीं होगा।

                                                                                  दुख इस बात पर नहीं होता है की कुछ सिरफिरे दिमाग अपने चात्रित्रो के कारण  बेमतलब की चिल्ल पो करते है और चीजो को गलत ढंग से पेश कर लोगो को मुर्ख बनाने या डराने का काम कर रहे है , दुःख  इस बात का होता है की कुछ समझदार बिना बात को समझे उनकी बातो का समर्थन करने लगते है । विवाह एक बहुत ही नीजि सोच है हर व्यक्ति का अपना विचार होता है हर व्यक्ति के विवाह करने और न करने के अपने कारण  हो सकते है हमें उसमे हस्तक्षेप करने की या ये कहने की कोई आवश्यकता नहीं है की उनके लिए क्या सही या गलत है , कल को यदि वो जबरजस्ती विवाह कर लेते है और बाद में परिणाम तलाक होता है तो दो जिन्दगिया बर्बाद होती है उसका जिम्मेदार कौन होगा , क्या समाज इस बात से अच्छा बना रहेगा जिसमे ढेर सारे बेमेल, बे-मन से बने विवाह हो और वो सारा जीवन कुढ़ते हुए लड़ते हुए घुट घुट कर बिताये , क्या ऐसे विवाह वाले समाज बहुत अच्छे होंगे , एक बार कल्पना कीजिये की इस समाज में जन्म लेने वाले बच्चे कैसे होंगे , उन पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा । इसलिए जरुरी ये है की समय के साथ बदला जाये आज की जरूरतों को समझा जाये बदल रहे समाज के साथ लोग भी बदले और ये बात समझ ले की नारी भी बदल रही है बदल गई है और उसी के हिसाब से उसके आस पास की चीजो को भी बदलना होगा , और पुरुष को तो सबसे ज्यादा । ये बदलाव बहुत कठिन नहीं है बस आप स्त्री की जगह ये सोचिये की मेरी छोटी बहन या बेटी का मामला है देखिये ये  बदलवा आप में खुद ब खुद आ जायेगा , और बदलाव आ भी रहा है देखा है न जाने कितने ही पिताओ को जो अपनी बेटी के लिए समाज से पंगे लेते है , मुंह उठाये किसी से भी बेटी का विवाह नहीं कर देते है , कितने ही लड़को को इंकार कर देते है , सीना फुला कर बताते है की उनकी बेटी कितनी पढ़ी लिखी है और उसका वेतन कितना है , आज पिता बताते है की उन्हें कैसे वर की तलास है अपनी बेटी के लिए , बस ऐसे पिताओ  की संख्या कम है । किन्तु जैसे ही ये पुरुष पिता से पति के रूप में आता है इसकी भाषा बोली और सोच दोनों ही बदल जाती है इसलिए अब जरुरी है की पिता के बाद भावी पतियों की सोच में भी बदलाव आये नहीं तो वो सदा भावी पति ही बन कर रह जायेंगे ,क्योकि स्त्री को अपनी जरूरतों और भावनाओ को दबाना आता है वो उन्हें दबा कर विवाह न करने का तो निर्णय आसानी से ले लेगी और उसे निभा भी लेगी किन्तु किसी पुरुष के लिए ये करना मुश्किल होगा इसलिए नारी को ये बताने के बजाये की वो क्या करे और न करे अपने आप को बदलिए अपनी सोच को बदलिए , वरना हर स्त्री समाज की और लोगो की परवाह करना बिलकुल भी बंद कर देगी क्योकि अब घरो में बेटिया नहीं राजकुमारिया जन्म लेती है और याद रखिये की  राजकुमारिया कपडे नहीं धोती :)।



चलते चलते  

                    एक हमारा देश है जहा महिलाओ से जुड़ा शायद ही कोई मुद्दा कभी भी चुनावी मुद्दा बनता हो और एक अमेरिका है , राष्ट्रपति का चुनाव दुबारा लड़ने जा रहे ओबामा ने अपने प्रतिद्वंदी से बहस करते हुए बताया की  उन्होंने महिलाओ और पुरुषो को सामान वेतन दिलाये है , जरा देखिये और सुनिए की ये मुद्दा वहां का चुनावी मुद्दा भी है और खुद ओबामा भी इस बात का जिक्र कर रहे है । असल में वहा पर महिलाए वोट करती है मतलब अपनी सोच समझ के हिसाब से,  इसलिए वो भी वोटर है , जबकि भारत में महिलाए वोट देती है किन्तु वोटर नहीं है मतलब की ज्यादातर महिलाए अपने घर के पुरुष सदस्यों के कहने पर ही वोट दे देती है या उनकी बाते ही सुन कर उसी से प्रभावित हो कर वोट दे दिया , राजनीति में वो रूचि नहीं लेती है और अपना दिमाग नहीं लगाती है ज्यादा से ज्यादा सिलेंडर महंगाई को ले कर हाय तौबा मचा दिया बस , तो जरा अपनी वोट की शक्ति पहचानिए और वोटर बनिये।


March 05, 2012

टिपण्णी जो पोस्ट ही बन गई - - - - -- mangopeople

                  

    लो जी लिखने बैठी थी तो टिपण्णी लेकिन इतनी लम्बी हो गई की एक पोस्ट ही बन जाये फिर मेरी बनिया बुद्धि ने कहा की इतनी मेहनत से टिपण्णी लिखी है बस एक ही व्यक्ति क्यों पढ़े अपनी पोस्ट बना कर डाल देती हूँ आम के आप गुठलियों के दाम मेरी पोस्ट पर पाठको की आवाजाही भी हो जाएगी थोड़ी टी आर पी भी मिल जाएगी  ।
                   टिपण्णी नारी  ब्लॉग  के  इस  पोस्ट  पर  दी  है  पूरा माजरा जानने के लिए तो उस पोस्ट पर ही जाना होगा क्योकि नारी ब्लॉग के कुछ कापी कर नहीं सकते :)




                
              जीतनी बनिया बुद्धि है उसी हिसाब से आप के सवालो का जवाब देने का प्रयास कर रही हूँ शायद मेरा जवाब आप की उच्च श्रेणी की बुद्धि के समझ में आ जाये ।
        मै भी नहीं मानती की ताजमहल से ले कर पिरामिड तक किसी का भी अस्तित्व नहीं है , क्योकि उन सब को मैंने निजी रूप से नहीं देखा है किसी और ने देखा है तो मुझे क्या जब मैंने नहीं देखा तो मेरे लिए दुनिया में उनका कोई भी अस्तित्व नहीं है कोई और कुछ भी बकता रहे मुझे क्या,  इस हिसाब से आप की बात सही है की आप ने टी वी पर नहीं दिखा तो उस घटना का कोई अस्तित्व नहीं है  :)
                                                             क्या निचली कोर्ट के फैसले किसी घटना को सही ये गलत साबित करने के लिए काफी है तो फिर तो रुचिका से ले कर जेसिका और मट्टू तक के केस में निचली अदालतों ने अपराधियों को बाइज्जत बरी कर दिया था तो क्या माना जाये वो सब निर्दोष थे और बाद में जो उपरी अदालतों ने फैसलों को पलटा वो सब चालबाजिया थी झूठ के बल पर केस जीते गएऔर इस तरह के हजारो केस होते है ।
                                 आप ने दहेज़ के बिना विवाह किया बहुत ही अच्छा काम किया सभी युवाओ को आप से प्रेरणा लेनी चाहिए किन्तु क्या आप के मना करने के बाद भी आप के ससुराल वालो ने आप को जबरजस्ती दहेज़ दे दिया था । निश्चित रूप से उन्होंने आप को उपहार के रूप में सामान लेने की पेशकश की होगी और आप के मना करने पर नहीं दिया होगा या आप ने दृढ़ता से मना कर दिया होगा । क्या आप को लगता है की लडके वाले दहेज़ न मागे और लड़की वाला जबरजस्ती लोगो को दहेज़ देता है ।
                         रही बात पैसे वाला लड़का खोजने की तो हर व्यक्ति अपनी लड़की के वर के  लिए दो चीजे ध्यान में रख कर चलता है एक तो दोनों परिवारों की सामजिक हैसियत एक बराबर हो और ये केवल बनिया परिवारों में ही नहीं होता है बल्कि समाज के हर तबके में यही रिवाज है की सम्बन्ध हमेसा अपने बराबर वालो से ही बनाया जाता है ( विवाह तो बहुत बड़ी चीज है कई जगह तो मित्रता का सम्बन्ध और परिचय तक बराबर वालो या खुद से बड़े सामाजिक हैसियत वालो से ही बनाया जाता है ) ये समाजका एक रूप है आप ख़राब कहे या अच्चा पर समाज में यही प्रचलित है । विवाह के लिए दूसरी बात होती है वर की योग्यता जिसे देखा कर कई बार लोग लडके से जुडी दूसरी बातो को अनदेखा कर देते है ।
                                                            आप की इस बात से कोई भी सहमत नहीं होगा की यदि कोई गरीब  लड़का दहेज़ न ले रहा हो तो किसी को भी अपनी लड़की का विवाह उससे कर देना चाहिए,  क्यों कर देना चाहिए किस आधार पर , बस इसलिए की वो दहेज़ नहीं ले रहा है विवाह का ये आधार नहीं होता है सबसे बड़ा आधार होता है की लड़का मानसिक , शारीरिक और आर्थिक रूप से विवाह से जुडी  जिम्मेदारियों को निभा सके । हर व्यक्ति देखेगा की दहेज़ तो नहीं ले रहा है कितु वह लड़की से विवाह करने के कितने योग्य है तीनो ही रूप में यदि योग्य हुआ तो कोई भी इंकार नहीं करता है जैसे की आप के ससुराल वालो ने अपनी लड़की से आप का विवाह किया । हम सभी तो सब्जी लेने भी जाते है तो सस्ता की जगह अच्छी सब्जी को महत्व देते है भले वो महँगी मिले तो फिर कोई भी अपनी लड़की के विवाह के लिए दहेज़ नहीं लेना कैसे आधार बना सकता है ।
                                                     रही बात पैसे वालो के घर शादी करने की या लड़की वालो के पैसे के बल पर लड़का खोजने की तो ये बात तो केवल पैसे वालो के घर होता है जरा माध्यम वर्ग और गरीब तबके की और देखिये जिसके घरो की लड़कियों के जन्म के साथ ही उसके दहेज़ की चिंता सर पर आ जाती है जन्म के साथ पैसा जुटा रहा पिता ये विवाह के समय देखता है की सालो से जुटाया पैसा भी विवाह के समय लड़को वालो की मांग के आगे कम पड़ रहा है चप्पले घिस जाती है उसकी एक लड़की के विवाह में फिर उनकी सोचिये जिनकी कई लड़किया होती है माध्यम वर्ग तो फिर भी मरते जीते कर लेता है गरीब तबके की हालत तो और बुरी है योग्य से अयोग्य लड़का भी भारी दहेज़ मांगता है उनके हैसियत के हिसाब से । माध्यम और गरीब घरो में तो घरो में महंगे सामान ही लडके के विवाह में मांगने के लिए छोड़ दिया जाता है । कोई भी माध्यम या गरीब वर्ग की लड़की का पिता आप को नहीं मिलेगा जो योग्य वर होने के बाद भी दहेज़ न लेने वाले लड़को को इंकार कर दे ।
                 अब आते है दहेज़ केस को साबित करने की तो कोई भी लड़की वाला ये सोच कर विवाह नहीं करता है की कल को उसकी लड़की को सताया जायेगा और दहेज़ माँगा जायेगा और मै इन पर केस करूँगा तो मुझे अभी से दहेज़ देने के सरे साबुत जुटा लेना चाहिए हा एक लिस्ट होती है सादे कागज पर उसे भी ज्यादा दिन संभाल कर नहीं रखा जाता है और न ही क़ानूनी रूप से उसका ज्यादा महत्व नहीं होता है । रही बात दहेज़ के पैसो को चेक या ड्राफ़ के रूप में देने की तो मै बस इतना ही कहूँगी हा हा हा हा हा हा हा इस बात पर मै बस हंस सकती हूँ :) ।
                  अब निशा के केस पर आते है वो ये केस किस आधार पर हारी मुझे नहीं पता है  मै कानून की जानकर नहीं हूँ किन्तु जब ये केस हुआ था तो तभी जानकारों ने बताया था की ये केस साबित करना बहुत ही मुश्किल होगा क्योकि भारतीय कानून के मुताबिक दहेज़ केस विवाह के बाद ही बन सकता है विवाह के पूर्व नहीं, जबकि निशा ने कहा है की मनीष के साथ  विवाह नहीं हुआ है और कुछ दिन बाद ही उसने दूसरा विवाह कर लिया था,  यदि अब वो कहती है की विवाह हुआ था तो उसकी दूसरी शादी गलत और अपराध साबित हो जायेगा और विवाह नहीं कहने पर मजबूत केस नहीं बनेगा । इसके साथ ही ये भी कहना चाहूंगी की कानून का दुरुपयोग आम लोग नहीं कानून के जानकर, क़ानूनी सलाह देने वाले और केस को अदालत में लड़ने वाले कर्त६ए है आप आदमी नहीं जनता की उसे इंसाफ के लिए किस धरा के तहत केस करना चाहिए वो तो कोई जानकारी ही बताता है हा एक दो केस जरुर हो सकते है जहा जबरजस्ती वकील को अपने बताये केस पर लड़ने को कहा जाता है ।
                          ९०% वाली बात मैंने इसलिए कही क्योकि जब आप कही पर कोई आंकड़े देते है तो आप को उसका स्रोत भी बताना चाहिए वरना "ज्यादातर" या " बहुत सारे " जैसे शब्दों का प्रयोग करना चाहिए । आप किस आधार पर कह रहे है की ९०% केस झूठे होते है ।
                                                              लड़कियों को विवाह ही नहीं करनी चाहिए ये क्या बात हुए ज्यादातर  नेता चोर है इसलिए वोट देने मत जाओ , ज्यादातर पुलिस वाले भ्रष्ट है तो कोई शिकायत पुलिस वाले के पास मत ले जाओ आदि आदि क्या समाज में इस तरह से रहा जाता है ऐसा नहीं होता है । लड़कियों के विवाह नहीं करना इस समस्या का समाधान नहीं है और ना ही उनके कमाने से ये समस्या जाएगी क्योकि दहेज़ कमाने वाली लड़कियों से भी माँगा जाता है ये बात आप टिपण्णी में दूसरो ने भी कही है ।
   " अमीर लडके से शादी करके लड़की मौज कर सके "
                निहायत ही घटिया और बकवास बात लिखी है आप ने ये "मौज" करना क्या होता है । लड़की वाले मोटी रकम दे कर अमीर लडके से अपनी लड़की की शादी करते है ये आप को ख़राब लगता है किन्तु अमीर हो कर भी  पैसा ले कर किसी से भी  शादी कर लेने वाला लड़का आप को अच्छा लगता है मुझे तो लगता है की ऐसे केस में यदि कोई घटिया है तो लड़का ही ज्यादा घटिया है , क्योकि लड़की का पिता तो जो कर रहा है वो अपनी बेटी के अच्छे और आर्थिक रूप से अच्छे भविष्य के लिए ऐसा कर रहा है ।
                                  और मैंने अपने बनिया और बनिया बिरादरी की बात इसलिए की क्योकि मै केवल अपने आस पास, अपने आँखों देखी  और करीब हुए घटनाओ के बारे में ही बताना चाह रही थी ना की समाज में बस प्रचलित किसी बात का दोहराने का प्रयास कर रही थी ताकि लोगो को लगे की मै सच बात कर रही हूँ ना की बस यु ही कोई आंकड़े फेक रही हूँ । हा पर जिस तरह आप ने उस पर अपने पैजामे से निकल कर  टिपण्णी की है उसके आप की सोच समझ और बुद्धि किस बिरादरी की है ये जरुर पता चला गया । आप की बिरादरी तो मुझे नहीं पता क्योकि बनिया कभी किसी की बिरादरी नहीं देखता है उसे तो बस अपना लाभ देखना है सामने कोई भी बिरादरी का जाति का व्यक्ति हो हा  आप की उच्च कोटी की बुद्धि से ही मुझे पता चला की अपना लाभ देखना तो केवल हम बनियों को ही आती है बाकि दुनिया तो संत होता है । :))))
                 

चलते चलते  
                        जब मुझे और मेरी बनिया बुद्धि और सोच का वाह वाही की गई तो सोचा जवाब में मै भी सामने वाले की बिरादरी की वाह वाही जरा अपने ढंग से कर दूँ  क्या है की दूसरो की जाति बिरादरी और आर्थिक स्थिति पर उंगली उठा कर कुछ कहने और सामने वाले को निचा दिखने में जितना आन्नद "मजा"  "मौज" आता है उसकी तो बात ही कुछ और होती है दिमाग में दो चार उनके नाम से झलक रहे जाति से दो चार वाह वाही सोच भी ली पर फिर मेरी बनिया सोच ने मुझसे कहा की उन्होंने मेरी बिरादरी के बारे में कुछ कहा फिर मै उनके बारे में कहूँगी फिर वो पलट के मेरे बारे में कहेंगे और मै उनके फिर ये सिलसिला लम्बा हो जायेगा और जब उसे जोड़ा घटाया तो पता चला की सौदा फायदे का नहीं घाटे का है समय अपने पास है नहीं बिटिया रानी ने महीनो पहले ही अपनी छुट्टियों के लिए मुझे बुक कर लिया था इसमे फंस गई तो उधर से नुकशान हो जायेगा तो ये सौदेबाजी यही छोड़ दी । क्योकि जिस काम में बनिए का फायदा ना हो वो नहीं करता है बाकि लोगो की तरह थोड़े ही की किसी को कुछ कहने के लिए,  अपने बुरे अनुभवों की खुन्नस निकालने के लिए , अपने संबंधियों को ब्लॉग पर सारे आप बेइज्जती करने के लिए अपना कीमती समय और दिमाग लगाये । कहते है की जहा फायदा ना हो वह तो गली देना क्या  थूकना भी नहीं चाहिए  :)))))