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August 11, 2022

पाकेटमनी ,बचत खर्च

तीन साल पहले जब बिटिया सातवीं में गयीं तो पॉकेट मनी की मांग रख दी , मांग तुरंत ही मान ली गयी क्योकि हम लोगो को भी सातवीं में ही मिलना शुरू हुआ था | हमने पूछा कितना चाहिए तो बोलती हैं डॉली दीदी ( उनसे बस दो साल बड़ी सहेली ) को सौ रूपये हफ्ते का मिलता  हैं , मैं उससे छोटी हूँ तो मुझे पचास रूपये हफ्ते का दे दो | इतना कम पैसा सुन मुझे हँसी आ गयी फिर हमने कहा चलो बढियाँ हैं पैसे को लेकर ज्यादा लालची नहीं हैं | अभी शुरुआत हैं पहले देखती हूँ कि क्या कैसे और किस चीज   पर पैसे खर्च कर रही हैं फिर बढ़ा दूंगी या जरुरत पर दे दूंगी | 


इस हिदायत के साथ पैसे दिया गया कि  उनके पैसे खर्च पर नजर होगी तो सोच समझ कर खर्च करें | जल्द ही पता चल गया कि वो भी बिलकुल हमारी तरह ही फिजूल खर्च नहीं करतीं , खाने पीने पर खर्च भी करतीं तो मुझसे पूछने/बताने  का भी काम करती |  

 फिर आया फ्रेंडशिप डे ,  दोस्तों ने प्लान बनाया  स्टारबग चलते हैं |  हमें बताने लगी  जगह बहुत महँगी हैं मम्मी एक कॉफी भी तीन सौ की मिलती हैं इतने पैसे कॉफी पर कौन खर्च करेगा मैंने मना  कर दिया , बोला  कहीं और चलो | हमारी तो आँखे ही भर आयी ये सुन्दर वचन उनके मुख से  सुन कर , हमने मन ही मन उनकी बल्लैया ली |  अंत में एक मॉल के मैक्डी में गयी , जेब खर्च के बस सौ रुपये बचे थे हमने अपनी तरफ से और पैसे दे दिए उन्हें | जिंदगी में पहली बार दोस्तों के साथ अकेले ( मैं उसी मॉल में ऊपर शॉपिंग कर रही थी ) मस्ती करके आयी | 

आते ही बोलती हैं अगले महीने पैसे मत देना,  तुमने अभी एक्स्ट्रा जो दिए हैं उसे काट लो | सुन कर अच्छा लगा पैसे के हिसाब किताब में बिलकुल  क्लियर हैं | फिर लगा बढियाँ मौका हैं उन्हें जीवन में आगे के लिए पैसे को मैनेज करना सिखाने का | हमने कहा ये सही तरीका नहीं हैं कि किसी एक महीने में ज्यादा पैसे खर्च कर लो और अगली बार बिलकुल खाली हाथ रहों | 

ऐसा करती हूँ हर हफ्ते सिर्फ दस रूपये कम देतीं हूँ कुछ पैसे तुम्हे मिलेंगे भी और जो एक्स्ट्रा पैसे लिए हैं वो बराबर भी हो जायेंगे | उस दिन उन्हें लोन , जरुरत , ईएमआई और आगे के लिए बचत आदि सबका ज्ञान दे दिया |  अगले हफ्ते पूरे  पैसे दे दिए ये बोल कर कि पहली बार हैं तो छोडो जाने दो आगे से ध्यान रखना | सोचा देखतीं हूँ कि ये पैसे आगे की प्लानिंग करके बचाती हैं या मम्मी  से हर जरुरत पर लोन/एडवांस  लेने  का सोचती हैं | 


लेकिन बढियाँ प्लानिंग इन्होने कि जिस महीने मित्रो का जन्मदिन होता तो तोहफ़ों के लिए पहले ही पैसे बचा लेती | हमने भी शुक्र मनाया कि चलों पैसे के मामले में मम्मी जैसी हैं खर्च और बचत दोनों का बराबर संतुलन रख रही हैं , फिजूल खर्च नहीं हैं एक दिन मैं कंजूस बना ही दूंगी  | 

फिर हमारे जीवन में भी वो महान दिन आ ही गया , जो हर माँ बाप के जीवन  में एक दिन आता ही  हैं जब बच्चे कमाने लगते हैं उनके हाथ में चार पैसे आतें हैं | एक दिन  उन्होंने कहा तुम ये चीज नहीं दिलाओगी तो मत दिलाओ मेरे पास अपने पैसे हैं मैं खुद खरीद लुंगी | समझ आया पैसा बड़ो बड़ो का नहीं छोटो छोटो का भी दिमाग ख़राब कर सकता हैं | फिर भी कहा ठीक हैं ये भी ,  अपने पैसो पर अपना अधिकार ऐसे ही जताना चाहिए लड़कियों को वरना कितने ही घरों में देखा हैं लड़कियां कमाती तो हैं लेकिन उनके ही पैसों पर उनका उस तरह अधिकार नहीं होता जैसे किसी लडके का | 

#मम्मीगिरि 

July 27, 2022

हम छोटी लकीरो वाले अब बड़े लकीर है

कई बार आप को बच्चो की नजर में अच्छे माता पिता बनने के लिए कुछ नहीं करना पड़ता , बस आप के आस पास की छोटी लकीरे अपने आप ही आप की छोटी लकीर को भी बड़ा बना देती हैं | बिटिया ने बताया उसकी एक सहेली व्रत नहीं रखना चाहती लेकिन उसके घर वाले जबरजस्ती उससे व्रत करवाते हैं | नतीजा उसे जब बहुत भूख लगती हैं तो वो छूप कर कुछ खा लेती हैं | वो जैन हैं और उनके व्रत में कुछ नहीं खाया जाता गर्म पानी के सिवा |



कुछ साल पहले मेरे भी होश उड़ गए थे जब मैंने सुना उनकी एक दूसरी आठ साल की सहेली लगातार आठ दिन का व्रत किया | मतलब एक बूंद खाना नहीं बस गर्म पानी और उस व्रत में भी वो शुरू के दो दिन स्कूल आयी थी | वो वाली मित्र पूजा पाठ करती हैं तो वो अब भी अपनी इच्छा से व्रत करती हैं तो उसमे बिटिया को समस्या नहीं हैं |


एक दिन बिटिया की ये बताते आँखे भर आयी थी कि पीरियड में उनकी कई सहेलियों के साथ अछूतो जैसा व्यवहार उनके घरवाले करते हैं | ये विश्वास करना मुश्किल था लेकिन मुंबई जैसी जगहों में पढे लिखे घरवाले पीरियड में बच्ची को एक गद्दा चादर और एक थाली कटोरी दे कर कमरे के एक कोने की जमीन पर सिमित कर देतें हैं | घर का कोई भी सदस्य उन्हें छूता नहीं हैं और उनकी थाली में खाना भी दूर से गिराया जाता हैं भिखारियों की तरह |


एक बार उनकी एक सहेली जिसे क्लोरीन से एलर्जी हैं उसे टॉयलेट क्लीनर से इंफेक्शन हो गया उसके जांघों में छाले पड़ गए और चुकी उसे उस समय पीरियड था इसलिए किसी ने उसकी देखभाल नहीं की । वो दो दिन तक दर्द से रोती रही | तब उसके संयुक्त परिवार में उसकी मम्मी नहीं थी वो गांव गयी थी | एक दूसरी सहेली तो परिवार और दोस्तों साथ शहर से बाहर घूमने गयी थी | वहां जब उसे अचानक पीरियड़ आ गए तो सब उसे उस अनजान बंगलो में अकेले छोड़ कर घूमने चले गए और ऐसा दो दिन हुआ |


बिटिया बता रही थी कि उनकी एक और सहेली के चचेरे भाई बहन को खाना बनाना सिखाया जा रहा हैं | बहन को इसलिए ताकि शादी के बाद काम आये और भाई को इस लिए क्योकि वो विदेश पढने जा रहा हैं तो उसे वहां काम आये | बहन की भी इच्छा बाहर पढने की हैं लेकिन ग्रेजुएशन के बाद उसके लिए लड़का देखा जा रहा हैं | बिटिया की सहेली अभी से दुखी हैं कि भविष्य में उसके साथ भी ये होगा |


उनकी एक सहेली मैक्डी में खाना नहीं खा सकती क्योकि मैक्डी में चर्बी से खाना तला जाता हैं वाली खबर पर अब भी उसकी मम्मी भरोसा करती हैं | जबकि दूसरे फास्टफूड ब्रांड में खाना खा सकती हैं क्योकि उसकी ऐसी कोई खबर बाहर नहीं आयी हैं | किसी को आलू चिप्स की मनाही हैं तो किसी को कुरकुरे की, बच्चे सब चोरी छुए खाते हैं | और ना जाने कितनी ही छोटी लकीरे और उनके किस्से हैं हमारे आस पास जिन्हे सुना सुना हमारी बिटिया कहती हैं थैंक गॉड कि तुम लोग मेरे मम्मी पापा हो | ये हाल मुंबई की बच्चियों के हैं कुछ ख़ास विषयों पर ,किसी छोटे शहर गांव में क्या कहूं |

July 25, 2022

इस ईमानदारी का क्या करू अचार डालू

                                          बात कोरोना काल के समय की हैं जब बच्चो के ऑनलाइन क्लास के साथ टेस्ट और परीक्षाएं भी ऑनलाइन हो रही थी | हर बार परीक्षाओ और टेस्ट लेने तरीका बदल जाता था | बिटिया के यूनिट टेस्ट हो रहें थे  | क्लास ख़त्म होने के बाद टेस्ट के लिए  पेपर आ जाते थे  व्हाट्सप्प पर |  फिर जब बच्चो का मन करे जैसा मन करे उसका जवाब लिखे | शाम छः बजे टीचर उसके जवाब भी  भेज देती हैं बच्चे उन्ही जवाबो से अपने जवाब मिला कर खुद को ही नंबर दे कर वो पेज टीचर को एप्प पर भेज देतें थे  | वास्तव में ये पढाई से ज्यादा बच्चो  की ईमानदारी का टेस्ट था  और इसमें कौन पास हुआ और कौन फेल ये बच्चे के सिवा और कोई नहीं जानता | सोचिये ऐसे परीक्षा में कितने बच्चे ईमानदारी से जवाब लिखते होंगे | 

                                           पिछले साल टीचर एप्प पर चार सवाल भेजती और कुछ समय देती उनके जवाब लिखने के लिए  फिर दूसरे सवाल भेजती | बच्चो को तुरंत की जवाबो का पेज टीचर को भेजना पड़ता फिर वो उन्हें चेक कर नंबर देती थी | हम  इस पर ज्यादा कुछ कह नहीं सकते स्कूल को क्योकि पिछले दो सालो से तो ज्यादातर महाराष्ट्र बोर्ड के स्कूलों में टेस्ट परीक्षाएं कुछ भी नहीं लिए गए | सभी बच्चो को ऐसे ही आगे की कक्षा में प्रमोट कर दिया गया | ये स्कूल कहेंगे शुक्र मनाइये कि हम किसी भी तरह की परीक्षा ले तो रहें हैं | 


                                         कोई और समय होता तो बिटिया को कहती जितना आता हैं उतना लिख दो ईमानदारी से नौवीं के नंबरों की क्या परवाह करना | लेकिन 2020 में जिस तरह से दसवीं और बारहवीं के बच्चो को उनके पिछले परीक्षाओ और उसके नम्बरो के आधार पर पास किया गया हैं उसे देखते हुए ये नंबर ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाते हैं | अब तो हर यूनिट टेस्ट बोर्ड के बराबर लग रहा हैं |  तब लगता था कि  क्या पता 2023 तक भी स्कूल खुलेंगे या नहीं और तब भी बोर्ड होगा की नहीं | 


                                         बात केवल बोर्ड की परीक्षाओं तक होता तो भी उसे नजरअंदाज किया जा सकता था लेकिन मुंबई में दसवीं तक ही स्कूल होते हैं उसके बाद कॉलेज में एडमिशन लेना होता हैं  जो की मैरिट पर होता हैं अर्थात दसवीं के रिजल्ट के आधार पर , कोई प्रवेश परीक्षा नहीं | अब अंदाजा लगाइये दसवीं का रिजल्ट और उसके नंबर कितना महत्व रखने लगते हैं |  बच्चो का भविष्य आगे बेहतर कॉलेज सब इस पर निर्भर हो जाता हैं | जो  अच्छे कॉलेज के सीट अभी तक 90 -85 % तक जाते हैं वो शायद 95 -96 % प्रतिशत पर ही तब भरने लगे क्योकि कोरोना मैय्या की कृपा से और थोड़ी बेईमानी से प्राप्त ढेरों नंबर पाए कम योग्य बच्चो  की संख्या बहुत ज्यादा होगी | फिर हमारी बिटिया के ईमानदारी से  85 से 90 % पाए नंबर किसी काम के ना हो |  


                                     धर्म संकट हैं बड़ा खुद के लिए  और डर भी कि कहीं ईमानदार बच्चे भी दबाव में ईमानदारी का रास्ता छोड़ ना दे |  खुद के मेहनत पर चाहे जैसे भी नंबर आये एक बार सब बच्चे  स्वीकार कर लेते हैं लेकिन खुद से कम बुद्धि वाले और कम पढ़ने वाले बच्चो को जब खुद से ज्यादा  नंबर आये तो ये बर्दास्त करना मुश्किल होता हैं बच्चो के लिए  शायद किसी के  लिए भी | 

July 22, 2022

पापा की परी

बिटिया चार पांच  साल की रही होंगी स्कूल से मिला  होमवर्क करने के लिए कहा तो नाराज हो गयी , उन्हें खेलने जाना था | गुस्से में कहतीं हैं मुझे कितना कम समय खेलने का मिलता हैं और तुम लोग कितनी ज्यादा देर खेलते हो | मैं स्कूल चली जाती हूँ तो तुम दोनों ( मम्मी पापा ) आराम से आपस में खेलते हो | मैं स्कूल से आती तो मेरे साथ खेलने की जगह मुझे फिर से पढ़ने के लिए बोलते हो | 

उस दिन बिटिया को पता चला कि जब वो स्कूल से आती हैं तो पापा अपने दोस्तों के साथ बाहर खेलने नहीं गए होते हैं | वो भी उनकी तरह स्कूल जाते हैं और उनको बिटिया से ज्यादा होमवर्क मिलता हैं जो उन्हें लैपटॉप पर करना पड़ता हैं | उनको मैम  नहीं सर पढ़ाते हैं जो बहुत स्ट्रीक हैं | 

एक दिन अपने पापा को ज्यादा देर काम करते देख बोली ,  पापा मम्मी को बोलो वो तुम्हे दूसरे स्कूल में डाल दे इस स्कूल में तुम्हे बहुत ज्यादा होमवर्क मिल रहा हैं | इस तरह तो तुम्हे कभी खेलने का टाइ ही नहीं मिलेगा | 

July 15, 2022

मुंबई की बारिश

बिटिया पहली  या दूसरी क्लास  मे रही होंगी जब एक दिन स्कूटी से  उन्हे स्कूल  से लेकर  घर वापस आ रही थी  । उनके याद मे पहली बार  मुंबई  मे इतनी बारिश  हुई  थी कि सड़को पर पानी जमा हो गया था । 

बारिश  बंद हो चुकि थी लेकिन  कही कही पानी जमा था । स्कूटी से चलते हुए उन्हे  जमा पानी देख मजा आ रहा था । एक जगह इतना पानी जमा था कि हम दोनो माँ बेटी अपने पैर ऊपर कर लिए  । स्कुटी पर पैर  रखने वाली जगह पानी आ गया था । बिटिया का एक्साइटमेंट और  बढ़ गया । 

आगे जा कर थोड़ा पानी कम हुआ  तभी सामने से एक बाइक पानी उड़ाते गयी , उनको और मजा आया । बोली मम्मी  तुम भी तेज स्कूटी चला कर पानी उड़ाओ बहुत  मजा आयेगा । 


हम मना कर दिये की अगल बगल जाते लोगो पर पानी जायेगा ये अच्छी बात  नही है । थोड़ा आगे जाते ही सड़क पर कोई  नही था । बोली अब करो करो अब कोई  नही है । हमने कहा चलो कोई  हर्ज़ नही है । 

स्कूटी तेज किया दोनी तरफ पानी उड़ने लगा और वो खिलखिला खिलखिला हँसते बोलती जा रही थी और  तेज और तेज। बस कुछ  ही आगे बढ़े  होंगे कि सामने से तेज रफ्तार  कार आती दिखी । भविष्य  हमे साफ दिख गया । भागने छुपने के लिए  ना हमारे पास  जगह थी और  ना समय ।

 कार हमारे बगल से गुजरी ढ़ेर सारा पानी उड़ाते और  हम दोनो को भिंगो आगे चली गयी । बिटिया तो रेनकोट पहनी थी बस नीचे भींगी लेकिन  हम पूरे।  ये देख बोलती है कार वाले को ध्यान  से गाड़ी  चलानी चाहिए  था ना । फिर  हम बोले उसमे भी कोई  बच्चा  रहा होगा तुम्हारी तरह , जिसे उड़ते हुए  पानी का मजा लेना होगा  । 

#मुंबईकीबारिश 

July 14, 2022

बिटियानामा

जब नौवीं में थी  बिटिया तो  हिन्दी अटक कर  पढ़ती थी | स्कूल में बाकायदा टीचर खड़ा कर पढवाती थी तो कुछ ठीक था लेकिन पिछले दो साल से तो स्कूल ही बंद थे  नतीजा हिंदी रीडिंग स्कूल में बिलकुल  बंद हो गया  | 

हम घर में  पढाते समय पढ़ने को बोलते तो बड़े आराम से गलत सलत लापरवाही से पढ़ देतीं की मम्मी सही कर ही देगी | स्कूल तो हैं नहीं कि गलत पढने पर क्लास में सब हँसने लगे और बेइज्जती हो जाये | 


जब परीक्षाएँ शुरू हुयी तो मैंने कहाँ सब पहले ही पढ़ा चुकें हैं , तुम्हे सब मामूल ही हैं ,  बस पाठ एक बार फिर से पढ़ लो खुद से तो रिवीजन हो जायेगा सब कुछ  | तो कहती हैं मैं पढुंगी तो बहुत टाइम लग जायेगा सब पढने में ,  प्लिस  तुम पढ़ कर सुना  दो तो जल्दी काम हो जायेगा | 


हमने डांट लगायी कि हम ये नहीं करने वाले हैं | खुद से पढों तो शब्दों को ध्यान से देख पाओगी और उसे ठीक से लिखना भी सीखोगी | थोड़ी देर बहसबाजी और मेरे इंकार के बाद चली गयी अपने कमरे में | कुछ देर बाद जब मैं  कमरे में गयी तो देखा गूगल उनके लिए पाठ पढ़ रहा हैं | पाठ की फोटो चींख  गूगल से पढवा कर सुन रहीं थी 🤦‍♀️



July 10, 2022

बिटियानामा - जीतने का दबाव

 बिटिया करीब साढ़े  तीन साल  की थी जब नर्सरी स्कूल  का स्पोर्ट्स  डे आया । उस समय सभी बच्चे को    खेल मे भाग लेना अनिवार्य  था । एक दिन घर आ कर बतायी कि आज रेस की प्रैक्टिस  थी और  वो सभी बच्चो से बहुत  ही आगे थी । 

कहती है मम्मी  मै तो बड़े  आराम से जीत गयी देखना स्पोर्ट्स  डे पर गोल्ड  मैडल लाउंगी । फिर  बड़े अफसोस से मुंह  लटकाते बोलती है पिछली बार  मै मैडल नही जीत पायी थी ना लेकिन  इस बार  पक्का मैडल जीतने वाली हूँ  । इस बार  मै सबसे तेज दौड़ने  वाली हूँ  । 

ये सुन हम एक बार  तो शाॅक हो गये । हुआ  ये कि जब ये प्ले स्कूल  मे थी तो वहां भी स्पोर्ट्स डे हुआ  ।  उस समय ये बस ढाई साल की थी । टीचर हम लोगो को बुला कर बोली ये बच्चो के बीच प्रतियोगिता नही है , कोई  मैडल नही दिया जायेगा । इसलिए  आपलोग इसे गम्भीरता से ना ले ये बस बच्चो  के मजे के लिए  है । 

हम लोग भी इससे सहमत  थे कि अभी बच्चो को इन सब से बचाना चाहिए।  स्पोर्ट्स  डे आया सारे इवेंट  होने लगे फिर  हमारी बिटिया का भी नंबर  आया । रेस मे वो दौड़ने की बस एक्टिंग  कर रही थी दौड़ नही रही थी । 

बिटिया हमेशा से फिजिकली बाकी बच्चो  से ज्यादा एक्टिव  थी और दौड़त   भी बहुत  तेज थी । वहां उन्हे इतना धीरे दौड़त  देख हम दोनो को भी आश्चर्य  हुआ  । बिटिया चौथे नंबर  पर आयी । हम लोगो ने उस समय अफसोस  नही किया बस ताली बजाया । 


लेकिन  कुछ  ही देर के बाद  जोर  का अफसोस  होने लगा क्योंकि  बच्चो को पोडियम पर चढ़ा कर  मैडल दिया जाने लगा । ऐसा लगने लगा जैसे हमारे साथ  धोखा हुआ  हो । बाकि बच्चो को देख हमे पता था कि हमारी बिटिया इससे कही ज्यादा तेज दौड़ती है । अगर अपने हिसाब  से दौड़ती तो पहला स्थान  पा मैडल लाती । 


मैदान  से बिटिया जब हम लोगो के पास  आयी तो हम लोग पुछने लगे कि तुम इतना धीरे क्यो दौड़ी तो बोलती है टीचर ने कहा था कि तेज नही दौड़न  है स्लो  दौड़ो वरना तुम गिर  जाओगी और  तुम्हे चोट लग जायेगी । हमने पुछा सबस  कहा तो कहती है जो बच्चे फ़र्स्ट  आये है उन्हे छोड़ सबसे कहा । 

फिर  हम सबने ध्यान  दिया तीन हिट हुए थे और  तीनो मे वो बच्चे ही जीते थे जो स्कूल  संचालन  करने वाली के फ्रेंड  के बच्चे  थे । हम सबको इस पर बड़ा गुस्सा आया की कुछ खास बच्चो को जीता कर मैडल देने के लिए  इतना झूठ और  फरेब किया गया । 


वो मामूली प्ले स्कूल  नही था ब्राड और  नामी था । उसकी स्कूल  फीस बाकी स्कूल  से डबल थी । वहां इतने छोटे बच्चो के साथ  ये सब हो रहा था । खैर हमने बस एक बार  और वो भी उस दिन ही बिटिया से कहा अरे तुम्हे तेज दौड़न  चाहिए  था तुम्हे मैडल मिलता । 

उस दिन के बाद  घर मे और बिटिया से  इस बारे मे कभी  कोई  बात  नही हुयी । हा हम बाकि मम्मीयो  ने आपस मे जरुर इस पर खूब  बात की  बाद  मे । 

लेकिन  हमारी बिटिया ये सब एक साल  बाद  तक याद रखी और मैडल जीतने का खुद से तय भी कर लिया । ये सब ढाई  और तीन साल  के उम्र  की बात  है । 


हम उस दिन आश्चर्य  मे थे कि आजकल  के बच्चे  इन सब को लेकर  कितने गम्भीर  है । हम लोगो को तो ये बाते याद भी ना रहती और  ना जीतने मैडल के लिए  गम्भीर  होते । ये तो अभी से  खुद  से अपने आप पर कितना प्रेशर  ले रहे है । 


आज दसवीं मे है और  कई  बार  हमे उन्हे प्रेशर  ना लेने के लिए  समझाना पड़ता है । इनकी सहेलियां क्लास  , स्कूल  टाॅपर है वो इनसे भी आगे है । सबकी मम्मीयां मिलती है तो इसी बात  पर चिंतित  होती है ये बच्चे कितना प्रेशर  ले रहे है तनाव  मे है जबकि  हमारी तरफ से बच्चे फ्री  है ।

लोग कहते है माँ बाप  बच्चो  पर नंबरो के लिए दबाव  बनाते है लेकिन  एक सच ये भी हो कि आजकल  बड़ी संख्या मे बच्चे खुद  भी अपने पर दबाव  लेते है।  उन्हे   खुद  को साबित  करना है   टीचर  के सामने माँ बाप  परिवार  सबके सामने ।

May 29, 2022

हर मर्ज की दवा मम्मी

"  मम्मी बायो की बुक कहाँ हैं " 

"  वही  होगी जहाँ तुम रखी हो " 

" मेरे अलमारी में नहीं मिल रही " 

" मैं जरुरी काम कर रही हूँ | ठीक से देखो वही होगी " 

" बोल रही हूँ  ना  नहीं मिल रही हैं ज़रा सा आ कर देख नहीं सकती क्या " 

"  मैं आयी और  बुक वहीँ मिली मुझे ,  तो सोचके रखना फिर तुम "  

"  पापा तुम ही  थोड़ी हेल्प करो , एक बार देख लो ना कहीं हैं क्या "  

अंततः बाप बेटी दोनों को बुक वहां नहीं मिली और अपना जरुरी काम छोड़ मुझे उठना पड़ा और बुक एकदम सामने वही पर  मिल गयी | 

" पापा मुझे पता ही था कि मम्मी आयेगी और बुक उसे ही मिलेगी  " 

" बाबू तुमको पता था कि मम्मी को ही बुक मिलेगी तो बीच में मुझे  बुला कर क्यों फंसा दिया | अब लो तुम्हारे साथ मुझे भी सुनना पडेगा | बैकग्राउंड में मम्मी चालू थी 

" दोनों के दोनों अंधे हो | क्या मजाल की एक काम तुम लोग ठीक से कर लो | दो मिनट भी शांति से बैठने नहीं दे  सकते दोनों | तुम दोनों सुबह आंख खोलते ही हो ये टास्क  लेकर कि आज कैसे मुझे परेशान किया जाए | कैसे मुझे  शांति से कुछ करने ना दिया जाए ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला -----


May 21, 2022

बिटियानामा

बिटिया हिंदी की एक कहानी पढ़ते जब चौरासी लाख योनि पढ़ी तो उसका मतलब पूछने लगी | हमने तमाम जीव  जंतु कीड़े मकोड़े की प्रजाति का नाम लेते ,  बात का मतलब बताते एक छोटा सा  लेक्चर भी  साथ दिया कि मनुष्य के रूप मे जन्म लेना कितना महान हैं | 


तो कहती हैं मच्छर होने में क्या  बुराई हैं  | मस्त छोटी  सी जिंदगी लोगों का खून पीते बिता दो इससे आरामदायक और बिना टेंसन का जीवन क्या होगा | हमने कहा एक झटके में किसी ने ताली बजा का मार भी देना हैं |  


तो कहती हैं अरे मैं तो लोगों को गालो पर सीधा बैठूंगी और उन्हें जानबूझ कर काटूंगी जैसे ही वो मारने चलेंगे मैं उड़ जाउंगी | सब अपने गालों पर खुद ही थप्पड़ मारेंगे तो  कितना मजा आयेगा | मैं  तो रोज शाम को अपने दोस्तों  के साथ ऐसे मजे के लिए मनुष्यों के पास जाउंगी | 

May 12, 2022

पापा की परी

बिटिया जब ढाई तीन साल की हुयी तो बर्थडे पार्टी का मतलब समझने लगी थी | अपना बर्थडे और सहेलियों के बर्थडे में जा कर उनके दिमाग में पार्टी का एक दृश्य फिक्स हो  गया |  


फिर आया इनके पापा का बर्थडे , आदत के अनुसार पतिदेव  सुबह  से मुझसे  कहने लगे कहाँ दे रही  हो  मेरे बर्थडे की पार्टी  | बिटिया बड़ी खुश की आज पापा का बर्थडे भी हैं और शाम को पार्टी भी हैं | 


शाम को हम सब बाहर खाना खाने जाने के लिए तैयार होने लगे तो ये  एक्साइटेड हो गयी कि बाहर पार्टी हैं तो बहुत ही बढियाँ होगी | हम लोग अपने वही पेट जगह पर खाने पहुँच गए  तो बिटिया थोड़े आश्चर्य में बाहर ही बोल पड़ी यहाँ पार्टी कैसे होगी ये तो रेस्टोरेंट हैं | 


अंदर जा कर कह रही हैं बाकी मेहमान कहा हैं , पार्टी कहाँ हैं | हमलोगों के ये कहने पर की यही पार्टी हैं तो वो  नाराज हो गयी की  तुम लोग तो सुबह से कह रहें थे पार्टी हैं ये तो हम लोग बस बाहर खाना खाने आये हैं | ये कोई पार्टी नहीं हैं , तीन लोगों की कहीं पार्टी होती हैं |  


उसके बाद अगले कई साल तक  वो पापा के बर्थडे पर  सरप्राइज पार्टी देती रही  | गुब्बारे से सजाने से लेकर पंखे पर फूल रखना , कार्ड बनाना , गिफ्ट लाना अलाना ढेकाना सब कुछ | साथ में ताने भी कि तुम लोगों को पार्टी करना नहीं आता , पार्टी ऐसे करते हैं | 


कई सालों तक मम्मी को सरप्राइज पार्टी नहीं दे पायी  तो अफसोस करती थी क्योकि मम्मी तो हर समय घर में ही उनके साथ रहती थी | 


वैसे वो आज भी कहती रहती  हैं कि तुम दोनों की लाइफ कितनी बोरिंग हैं मैंने उसे अच्छा बनाया हैं | मैं ना   होती तो तुम लोगो का क्या होता | ये तो वैसे सही ही बात हैं 


#पापाकीपरी