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August 10, 2022

कोर्ट से बरी होना निर्दोष होना नही होता

 अक्सर लोग कहते है कि भारत मे रेप के ज्यादातर मामले झूठे होते है क्योकि ऐसे ज्यादातर मामले कोर्ट मे साबित  नही हो पाते । कितना अजीब है कि जो बात कोर्ट मे साबित ना हो पाये उसे झूठा बता दिया जाता है । कोर्ट मे रेप के मामले को पुलिस और वकील को  साबित करना होता है वो यदि इरादतन या गैर इरादतन इसे सच ना साबित कर पाये तो पीड़ित झूठा हो जाता है । जबकि हमे मालूम है कि समाज , पुलिस आदि का कैसा दबाव पीडित पर होता है । अपराधी रसूखदार हो तो समझिये पीड़ित का कुछ  भी साबित  कर पाना अपने कानून के सामने असंभव हो जाता है । 

ऐसे ही तहलका के मालिक तरुण तेजपाल जब रेप के आरोप से बरी हुए  थे तो समाज से कोई पर प्रतिक्रिया नही आयी । मुझे लगा था  कोई बड़ा नहीं तो एक छोटा सा तहलका समाज में इस बात पर तो अवश्य होगा कि जो तरुण तेजपाल अपने ही ऑफिस के अंदुरुनी जाँच में रेप ( भारत के नए कानून के हिसाब से वो रेप था ) के अपराधी साबित हुए थे और उन्हें सजा भी सुनाई गयी थी |  वो भारतीय न्याय व्यवस्था से बाइज्जत बरी हो गए , लेकिन हर बात में शोर मचाने वाला सोशल मिडिया में कोई हलचल नहीं हुयी | 


कितने आश्चर्य की बात हैं ना कि अपराधी तेजपाल के मातहत काम करने वाली महिला ने ही जाँच किया था और अपराधी ने मेल पर अपना अपराध भी स्वीकार भी  किया था | अपराध साबित होने  उसे स्वीकार करने पर सजा के तौर पर  उन्हें छः महीने अपने ही मालिकाना हक वाले  ऑफिस से दूर रहना था | उस अपराध को हमारी पुलिस कोर्ट में साबित ही नहीं कर पायी | वो सबूतों के अभाव में संदेह का लाभ पाते हुए आरोपों से मुक्त नहीं हुए  बल्कि  इज्जत के साथ बरी हुए हैं | 


हमारे पुलिसियां जाँच और न्याय व्यवस्था का ये हाल तब हैं जब तेजपाल खुद स्वीकार कर रहें थे कि उन्हें परिस्थितियों को समझने में गलती हुयी अर्थात वो ये नहीं समझ पाए की लड़की तैयार नहीं हैं और अपने तरफ से आगे बढ़ गए | रेप,  यौन हिंसा दोनों का मामला था लेकिन पुलिस एक को भी साबित नहीं कर पायी | 


कविता कृष्णनन ने तब इस मामले पर कहा था | बिना शिकायतकर्ता की सहमति के, न्याय के नाम पर उसके ई-मेल्स छापना या होटल का सीसीटीवी फ़ुटेज दिखाना, उसकी मदद करना नहीं बल्कि उससे उसकी मर्ज़ी छीनना है.| जहाँ तक मुझे याद हैं लड़की ने कोई शिकायत पुलिस में की ही नहीं थी | ये मेल्स उसके ही साथियों ने बाहर ना लाया होता तो ये मामला कभी बाहर ही नहीं आता | इन मेल को स्वतः संज्ञान में लेकर गोवा पुलिस ने खुद मामला दर्ज किया था पहले | 


ये बयान उन घटनाओं का समर्थन करता हैं जिनमें पीड़ित को डरा धमाका कर चुप करा दिया जाता हैं या वो खुद समाज के डर से सामने नहीं आती हैं , या पंचायत में शिकायत करने पर अपराधी को बस चार जूते मारने की सजा दे दी जाती हैं  या बल्तकारी से ही पीड़ित की शादी कर दी जाती हैं | अब बोलिये इन सब मामलों में की भाई किसी की निजिता  उलंघन मत कीजिये , उसकी मर्जी नहीं हैं पुलिस में जाने की  तो आप काहे दरोगा बन रहें  | उसकी मर्जी हैं अपराधी से शादी करने की तो आप काहें रोक रहें हैं | इस मामले में भी साफ़ दिख रहा हैं लड़की न्याय तो चाहती हैं लेकिन तेजपाल के रसूख और उसके बल पर खुद के कैरियर और जीवन के ख़राब होने से बुरी तरह से डरी हुयी हैं |  


2013 में जब ये मामला सामने आया था तब कुछ लोगों ने कहा तेजपाल का कैरियर ख़त्म हो गया अब उन्हें वो इज्जत सम्मान नहीं मिलेगा | मैंने तभी कहा था ये सोचना मूर्खतापूर्ण बात हैं | जिस समाज और विचारधारा से वो आतें हैं उसमे बहुत सारे लोग फ्री सेक्स अर्थात जिसको जिससे जब मर्जी हो सेक्स करे नैतिकता का कोई मोल नहीं हैं की सोच रखते हैं   | उनके लिए वास्तव में ये सिर्फ तेजपाल का परिस्थितियों का एक गलत  आंकलन भर हैं | जैसे लडके ने लड़की को प्रपोज किया और लड़की ने  मना कर दिया , बस इतना ही | कुछ के लिए तो तेजपाल अनाड़ी होंगे जो लड़की को बाटली में उतारने से पहले ही उतावले हो गए | 


बाकी उसके नीचे वाला समाज जो उनकी ही विचारधारा का हैं वो घटना के समय ही बोल चुका हैं लड़की लिफ्ट में अकेले अपने बॉस के साथ गयी ही क्यों | सत्ता के खिलाफ लिखने पर यही होता हैं | लड़की तभी क्यों नहीं गयी पुलिस में अब क्यों बोल  रही हैं | लड़की बोल ही नहीं रही कुछ ये जबरन काजी बन रहें हैं | गोवा की बीजेपी सरकार फर्जी मामले में फंसा रही हैं क्योकि तेजपाल ने उनके खिलाफ स्टिंग किया था | 


तेजपाल  के पक्ष मे फैसला आने पर  उनके समर्थक  उनके समर्थन मे खड़े थे , ये सब कहते कि  अगर आप सत्ता के खिलाफ लिख रहें हैं तो तीन मिनट के लिए भी किसी महिला के साथ लिफ्ट  में अकेले मत जाइये | भाई बलात्कार तो नहीं था भले और कुछ भी था |  ये सब तब बोला जा रहा हैं जब  अपराधी पीड़ित और जाँच कर्ता के सारे मेल सार्वजनिक पटल पर थे | ना होता तो सोचिये पीड़ित को समाज कैसे अपराधी बना सूली पर लटका देता | 


उनके बरी होने के बाद भी हमारी फेमिनिस्ट कहाँ थी वो क्यों चुप थी | असल में वो ऐसे फालतू के मसले में कुछ बोलने की जगह  वो बहुत जरुरी काम मे लगी थी | वो कक्षा एक की किताब में छपी एक कविता में लैंगिग समानता खोज रही थी | देखिये आप समझिये , समाज हमारा चाहे जैसा भी हो , वहां पढ़ा लिखा डिग्रीधारी कैसा भी व्यवहार करे महिलाओ के साथ लेकिन जरुरी ये हैं कि हमारी किताबे आदर्शवादी हो | समाज में लैंगिग समानता हो या ना हो लेकिन किताबो में तो होना  ही चाहिए | 

September 23, 2019

स्कूलों में मिलती ये कैसी सीख -------mangopeople

                                       हम अपने बच्चों को अच्छे से अच्छे महंगे नीजि स्कूलों में भेजते हैं इस उम्मीद में कि वो वहां अच्छी पढाई के साथ कुछ अच्छे संस्कार , अच्छी बातें और पढाई से इतर एक अच्छे मनुष्य बनने की शिक्षा लेंगे | लेकिन वही महंगे पब्लिक स्कूल उन बच्चों को क्या सीखा सकता , उन्हें कितनी गलत बातें और झूठ सीखा सकता हैं हम अंदाजा भी नहीं लगा सकतें हैं |
                                       बहन के घर के बगल में एक पार्क हैं उजड़ा हुआ , अभी तक हरियाणा सरकार के विकास के मैप में वो पार्क  नहीं आया हैं , इसलिए खाली मैदान के रूप में पड़ा हुआ हैं |
पिछले शनिवार कुछ सरकारी स्कूल के बच्चे और टीचर वहां आ कर ढेर सारे पेड़ लगा गए | संभव हैं कि किसी सरकारी आदेश पर्यावरण संरक्षण आदि के तहत ऐसा किया गया हो |छठी या सातवीं के छोटे बच्चे अपने साथ ढेरो पेड़ लायें थे और तेज बारिश होने के बाद भी गीली मिटटी में गंदे होते हुए भी गड्ढे खोद कर अच्छे से पेड़ लगा दिया | दो दिन बाद और भी बच्चे आये और किसी दूसरे पार्क में भी पेड़ लगा गयें | साथ में पेड़ों को लगाते और उनके साथ फोटो भी खिंचवायें गयें बच्चों और टीचर के |
                                       दो तीन दिन बाद  अचानक से वहां दो बसों में भर कर  किसी दूसरे  सेक्टर के एक नामी और बड़े नीजि स्कूल के बच्चे फिर उसी पार्क में अपनी टीचर के साथ आयें और सरकारी स्कूल के बच्चों द्वारा लगाएं गयें पेड़ों के साथ फोटो खिंचवाने लगे | जब बहन ने पूछा ये क्या हो रहा हैं तो बताया गया हम सब पेड़ लगाने आयें हैं | बहन ने सवाल किया कि  पेड़  कहाँ लगाया तो उसने वहां पहले से ही लगे पेड़ की और इशारा कर दिया जिसके साथ उसकी फोटो उसकी टीचर ले रही थी | फिर बहन ने  टोका ये तो पेड़ पहले से ही लगा था जो सरकारी स्कूल के बच्चों ने लगाया था तो उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया और अपना फोटो लेना जारी रखा |
                                     घंटे भर तक बच्चे सरकारी स्कूल के बच्चों की मेहनत को अपनी मेहनत बताने के लिए सभी पेड़ों के साथ फोटो लेते रहें | हद तो तब हो गई जब उन टीचरों ने लोगों के घरों के आगे लगे पेड़ , पौधों के साथ भी फोटो लेना शुरू कर दिया | उसके लिए बाकायदा बच्चों को निर्देश दिए जा रहें थे कि जिनके आगे लोहे के जंगले लगे हैं उनके साथ फोटो ना ली जाए | इस तरह उन्हें अपने पकड़े जाने का डर रहा होगा |
                                    सोचिये स्कूल के टीचर , प्रिंसपल बच्चों का कितना कुछ  गलत सीखा रहें थे | झूठ बोलना , बेईमानी करना , दूसरों की मेहनत को अपना बताना , एक तरह से अपराध करना ना केवल सीखा रहें थे उनसे वो करवा भी रहें थे | संभव हैं इसके पीछे सरकारी पैसे की लूट भी हो | बहन ने बस फोटो नहीं लिया हैं उन लोगों का , लिया होता तो फोटो के साथ  शिक्षा विभाग और स्कूल की  को भी टैग करती इस अपराध के लिए | एक पेड़ लगाना किसी नीजि स्कूल के लिए क्या इतना मुश्किल था कि वो इतना निचे गिर कर बच्चों से ऐसे अपराध करवा रहें थे | ये तो हद के बहुत आगे का अपराध हैं |


June 08, 2019

क्या किसी को हालात बदलने हैं -------mangopeople

                                          रेप करने के बाद उसने उसके योनि में बारबार चाकू डाल कर फाड़ डाला और उसकी दोनों अतड़ियां तक खींच ली | फिर चाकू से  पेट फ़ाड़ उसकी दोनों किडनियां तक निकाल ली | पूरी पोस्ट मुझसे ना पढ़ी गई  , इतने विस्तार से पूरी घटना को जितना वीभत्स बना सकते हैं बना कर  वर्णन किया गया था जैसे सबकुछ उनके सामने हुआ हो | अपनी कल्पना से ऐसा वीभत्स वर्णन करने वाले सवाल करते हैं समाज में लोग इतने वीभत्स कैसे हो सकते हैं |
                                       एक पत्रकार  पोस्टमार्टम की रिपोर्ट ट्वीट कर देंती हैं | जिसमे लिखा था शरीर से कौन कौन से अंग गायब थे , जिसके आधार पर ही इस तरह के काल्पनिक वीभत्स वर्णन किया गया था | लेकिन पत्रकार ये तथ्य नहीं बताती कि शरीर सड़ चूका था और कुत्ते उसे नोच कर खा रहें थे | 
                                      कुछ अपनी विचारधारा के साथ सामने हैं | उन्हें अपराधी और इन्साफ में कम इस बात से कष्ट ज्यादा हैं कि कितने प्रगतिशील लोगों ने किसी और अपराध पर कुछ कहा था लेकिन अब चुप हैं | उनमे से कुछ को इसपे समस्या हैं कि तब जिन लोगों ने  कड़े शब्दों में विरोध किया था आज  उनके  शब्द उन्हें उतने कड़े नहीं लग रहें हैं  | विरोध के लिए दुसरो पर सलेक्टिव होने का आरोप लगाने वाले खुद सलेक्टिव हैं | तब वो चुप थे आज कोई और चुप हैं तो उन्हें परेशानी हैं | 
                                     कुछ को पीड़ित से कोई मतलब नहीं हैं उनके लिए अपराधी का धर्म बहुत हैं उसके पुरे धर्म को गाली देने के लिए , अपना एजेंडा प्रचारित करने के लिए | कुछ उससे भी महान हैं वो पीड़ित का सरनेम लिख इसमें जाति  का एंगल भी ले आतें हैं | दलित होती तो लोग कितना शोर करते ऊँची जाति से हैं तो लोग चुप हैं | कुछ अपनी  वही घिसी पीटी राग फिर से गाना शुरू कर दिए कि इसके लिए नग्नता जिम्मेदार हैं विकास जिम्मेदार हैं | 
                                    कुछ के लिए लगता हैं किसी बच्ची को मार देना एक बहुत ही मामूली अपराध हैं इसलिए अपराध को बड़ा बनाने के लिए उसके साथ रेप जुड़ना जरुरी है | रेप ना जुड़ा तो अपराध संवेदनशील सहानभूति के लायक नहीं लगेगा | किसी मासूम बच्ची को निर्मम तरीके से मामूली से पैसो के झगड़े के लिए मार देना , ये भी कोई इन्साफ मांगने आंदोलन करने और विरोध प्रदर्शन के लायक का अपराध हुआ | उसके साथ रेप, वीभत्स आदि आदि ना जुड़ा तो मामले में दम नहीं हैं |  भले पोस्टमार्टम में ये नहीं निकल पाया क्योकि शरीर में जाँच के लिए अंग ही पुरे नहीं थे ठीक हालत में नहीं थे  | पुलिस की जाँच के पहले हम बतायेंगे कि अपराध क्या और कैसे हुआ हैं |
कुछ कल तक महिलाओं लड़कियों  को लेकर बेतुके पोस्ट लिख अपनी भड़ास निकाल रहें थे आज वो वीर रस में समाज में महिलाओं की स्थिति पर पोस्ट लिख रहें हैं | 
                                   कुछ मजबूरी में देर से बोल रहें हैं कही उन्हें चुप रहने के लिए आरोपित ना कर दिया जाए | कुछ को इस बात की चिंता ज्यादा हैं कि मामले को सांप्रदायिक रंग क्यों दिया जा रहा हैं | इससे हमारी धर्मनिरपेक्ष समाज का माहौल ख़राब करने का प्रयास किया जा रहा हैं | 
कुछ को चिंता हैं इस विरोध के चक्कर में समाज हिंसक हो रहा हैं | लोगों का विरोध ही समाज का माहौल ख़राब कर  रहा हैं | 
                                   सबके अपना अपना एजेंडा हैं जिसके लिए सब काम कर रहें हैं | इन्साफ के लिए , समाज में , व्यवस्था में बदलाव  के लिए कोई कुछ भी अपनी तरफ से ना कर रहा हैं ना करना चाहता हैं और ना करेगा | 

July 01, 2018

अपराध में कुछ नए रंग ---------mangopeople




                                                         

                                                       आज का माहौल कुछ ऐसा है कि देश में होने वाली लगभग हर घटना का रुख एक ही तरफ मुड़ जाता है और बाकि के जरुरी सवाल कही पीछे छूट जाते है | किसी अपराध और अपराधी के लिए इससे अच्छा माहौल क्या होगा जब उसके अपराध को भी धर्म के रंग में रंग कर लोग अपनी सुविधानुसार और राजनैतिक विचारो के अनुसार प्रतिक्रियाए दे या उसका विरोध करे  | नतीजा ऐसे ज्यादातर अपराधों में धर्म और राजनीति का खतरनाक कॉकटेल अपराधी  के बचाव में भी लोगों को खड़ा कर देता है या कुछ लोग अगर मगर का पेंच इसमें लगा देते है | इस खतरनाक मिश्रण ने तो लोगों का  भरोसा भी कानून और पुलिस पर ख़त्म सा कर दिया है | यही कारण है की आज भीड़ द्वारा लोगो को मारे जाने की घटनाए दिन पर दिन बढ़ रही है | लोगो की प्रतिक्रियाए इतनी ज्यादा उग्र है कि वो बड़ी आसानी से किसी भी अफवाह झूठ पर विश्वास कर  अजनबी को संदेह की नजर से देखने लगे है और खुद कानून को हाथ में ले सजा देना शुरू कर दिया है |

                                                      किसी भी अपराध के असली कारणों को जब नहीं देखा जाता उसकी रोकथाम नहीं की जाती |  जब तक सुरक्षा के लिए जिम्मेदार लोगों और लापरवाही दिखाने वाले लोगों को दंडित नहीं किया जाता |  किसी भी तरह के अपराध को रोकना क्या कम करना भी असंभव है | हाल में भी मंदसौर में एक मासूम बच्ची के साथ जिस तरह बर्बर तरीके से रेप किया गया और उसकी हत्या करने की कोशिश की गई | उसके अपराधी को फांसी की सजा मिलना तो तय है | लेकिन ये भी जरुरी है कि लापरवाही बरतने वाले स्कूल के खिलाफ भी कार्यवाही की जाए और पुलिस के खिलाफ भी जाँच बिठाई जाए की ऐसे मामलों में  रिपोर्ट लिखे जाने के पुलिस कार्यवाही में कितनी  तत्परता दिखाती है  |  जिस तरह अपराधी तीसरे ही दिन सीसीटीवी कैमरे में कैद होने के कारण पकड़ा गया उससे लगता है कि यदि पुलिस उसी शाम से तेजी दिखती और इलाके  कैमरों की जाँच शुरू कर अपराधी को पकड़ने का प्रयास करती  तो शायद इतनी बर्बर घटना को होने से रोका जा सकता था | कार्यवाही उस स्कूल के खिलाफ भी होना चाहिए जिसने इतनी छोटी बच्ची को स्कूल से अकेले घर जाने दिया | जबकि रोज उसके पिता उसे लेने आते थे तो ये साफ तौर पर स्कूल की जिम्मेदारी थी कि जब तक उसके घर से कोई आ नहीं जाता बच्ची स्कूल से बाहर न जाए | ये जरुरी है कि ऐसी घटनाओं में ऐसे लापरवाह लोगों की भी जिम्मेदारी  तय की जाए और उन्हें उसकी सजा भी दी जाये | जिससे अन्य लोग भी सबक सीखे और ऐसी गलतियों से बचा जा सके  |

                                                  अक्सर ऐसे हर मामलों के बाद कड़े कानूनों और फांसी की सजा की मांग सभी करते है लेकिन कोई भी इसके पीछे के सामाजिक सोच को बदलने का कोई प्रयास नहीं करता है | आज भी खुलेआम महिलाओं को सोशल मिडिया में रेप की घमकी या उसे अश्लील मैसेज भेजे जाते है और कोई भी ऐसे लोगों का विरोध नहीं करता उनका बहिष्कार नहीं करता | सभी वही अगर मगर , महिलाओं को दोष देने और राजनैतिक सोच के हिसाब से प्रतिक्रिया देने का काम करते है | इससे ऐसी मानसिकता वाले लोगो को अपराध करने का बढ़ावा ही मिलता है | उन्हें लगता समाज में फिर हमारे लिए लोग खड़े हो जायेंगे और दोष महिला को दे दिया जायेगा  या मुद्दे को एक अलग रंग | जब  अपराध और अपराधी का विरोध में कुछ दूसरे रंग डाल दिए जाते है तो अपराध कम नहीं होते , उन्हें बढ़ावा मिलता है |


                       



June 15, 2012

क्या गरीब आदमी को उसके किये अपराध की सजा नहीं मिलनी चाहिए - - - - -mangopeople


                   विषय को समझने के लिए पहले अपने साथ हुए किस्से को बताती हूं | दो दिन पहले एक टैक्सी ( २०- २२ साल पुरानी फियट उन्हें पता होता है कि उनकी गाड़ी का तो कुछ ख़राब होगा नहीं बाकि साथ चलने वालो को अपनी गाड़ी की फिक्र है तो वो अपनी गाड़ी बजाये वो तो जैसे चाहेगा वैसे अपनी गाड़ी कही भी घुसायेगा )  वाले ने मेरी गाड़ी में बगल से टक्कर मारते हुए मेरी गाड़ी का बम्पर तोड़ते हुए आगे निकल गया चुकि सड़क पर भयंकर ट्रैफिक था और गाड़िया बस रेंगे भर रही थी इसलिए वो भाग नहीं सका , मैंने कुछ आगे जा कर ही उसे पकड़ लिया | उस समय यदि वो अपनी गलती मान लेता तो शायद मै उसे जाने देती किन्तु वो गलती मानने के बजाये कहने लग की आप की भी गलती है मैंने उसे जब उसकी गलती बताई तो कहने लग चलिये थाने चलिये | थाने चलने की बात वो ऐसे कर रहा था जैसे की गलती मेरी थी और वो मुझे धमकी दे रहा था | उसे अच्छे से अंदाजा था की एक तो मै महिला हूं उस पर से मेरे साथ गाड़ी में सो रही बच्ची भी थी , ये मेरा एरिया तो होगा नहीं और मै कहा उसे ले कर थाने जाउंगी | पर उसका अंदाजा गलत था वो मेरा ही घर का एरिया था और चार इमारतों के बाद मेरा घर था |  उसके इस अंदाज पर मेरा गुस्सा और बढ़ा गया मैंने तुरंत पतिदेव को घर से बुला लिया वो दो मिनट में वहा हाजिर हो गये और हमने पुलिस स्टेशन जा कर उसके खिलाफ रिपोर्ट लिखवाई ( वैसे उसका ये अंदाजा सही था कि मुझे सच में ही अपने ही क्षेत्र के पुलिस स्टेशन का पता नहीं पता था पति तो उसके साथ चले गये पर मुझे दो लोगों से पुलिस स्टेशन का पता पूछना पड़ा जो बस मेरे घर से कुछ ही दूरी पर था ) | जब मैंने उसकी टैक्सी को रोका तो अच्छा खासा मजमा भी जुट गया था और कई आवाजे यही आ रही थी कि " मारो साले को ये सब ऐसे ही होते है कही भी टैक्सी घुसा देते है , तो एक बूढी सी महिला ने मुझसे कहा की अरे अरे इसे मारो मत बेचारा गरीब है जाने दो मैंने उन्हें कहा की अभी तक तो मैंने इसे कोई गाली भी नहीं दी है मै मार कहा रही हूं ये गरीब है तो ठीक है पर जो मेरी कार को बनवाने में हजारो का खर्च आयेगा उसे कौन देगा ( बिमा तो गाड़ी का होता है और उसे क्लेम करने के लिए और टूटे सामानों का कुछ प्रतिशत हमें ही देना होता है साथ ही क्लेम करते ही अगले साल बिमा पर मिलने वाली छुट भी हाथ से चली जाती है तो बिमा के बाद भी अपना खर्च हजारो में पहुँच ही जाता है )
                   ये मेरा किस्सा है अब जरा कल रेखा जी की लिखी इस पोस्ट को पढ़िये जिसमे वो बता रही है की किस तरह जब डाकिये ने उन्हें टेलीग्राम नहीं दिया पैसा ना देने पर और उन्होंने उसकी शिकायत कर दी जब विभागीय कार्यवाही की बारी आई तो उन्होंने उस पर दया करके उसे पहचानने से इनकार कर दिया ताकि उसकी नौकरी बच जाये किन्तु जब उन्हें दूसरे मोहल्ले में वही डाकिया मिला तो वो सुधरने के बजाये उनसे बदल लेने लग उन्हें कभी उनके पत्र नहीं दिया यहाँ तक की उनके पिता की मृत्यु पर भाई द्वारा भेजा टेलीग्राम तक नहीं दिया जिसकी वजह से वो अपने पिता के अंतिम दर्शन भी नहीं कर पाई |

                                                       हमारी भारतीय संस्कृति में गरीबो के प्रति दया दिखाने और लोगों को माफ़ कर देने को बहुत अच्छा माना जाता है किन्तु अक्सर देखा गया है की गलती के लिए दया दिखाने और माफ़ी देने से ज्यादातर लोग सुधरते नहीं है बल्कि वो उसे बहुत हल्के में लेते है और बार बार उसी गलती को दोहराते रहते है कई बार तो वो उसके लिए बदला भी लेते है जैसा की रेखा जी के केस में हुआ  | जब कभी कोई गरीब हमारा कोई नुकशान कर देता है तो लोग बार बार ये कहते है की अरे बेचारा गरीब है जाने दो वो क्या कर सकता है वो तो तुम्हारे नुकशान की भरपाई भी नहीं कर सकता है तो क्या फायदा जाने दो और हम सभी दया दिखा कर उन्हें छोड़ देते है, नतीजा ये होता है की वो उसे अपने लिए इसे अपने सुधरने के लिए अच्छा मौका मानने की जगह , अच्छी किस्मत की बच गया मान कर सुधरने के बजाये उस  पर ध्यान नहीं देते है और वैसे ही बने रहते है | किसी को भी सजा देने का अर्थ केवल पीडिता को न्याय देना ही नहीं होता है बल्कि गलती करने वाले को सबक भी सीखना होता है ताकि आगे से वो उस गलती को ना दोहराये और सजा भी इस तरह की कि उसे एक सबक मिले, पर वास्तव में होता क्या है शायद ही कोई भी छोटी मोटी टक्कर के लिए टैक्सी  वालो को लेकर थाने जाता हो ज्यादातर तो उसे वही दो चार हाथ मार कर जाने देते है क्योकि उन्हें भी पता है की टैक्सी वाले से उसे शायद ही कुछ मिले उलटे पुलिस के चक्कर में अपना खुद का दिमाग और समय ख़राब होगा |  इस केस में भी उसने मेरे पति को कहा की साहब मारना है तो मार लो अब थाने क्या चलते हो,  तो पति ने कहा  तुम्हे ही शौक था थाने जाने का ना पीछे जो आ रही है वो तुमको किसी भी हाल में छोड़ने वाली नहीं है | हमारे साथ ये तीसरा केस था इसके पहले भी दो बार पति ने वही बेचारा गरीब है क्या देगा जाने दो कह कर छोड़ दिया था | जिसमे एक बार तो एक बाईक वाले ने पीछे से आ कर सिग्नल पर खड़ी हमारी गाड़ी को जोरदार टक्कर दे मारी थी आफिस की जल्दी में पतिदेव ने उस समय बस उसका मोबाईल लिया और उसे बाद में काल करने को कह  चले आये थे मैंने जब मोबाइल देखा तो सर पिट लिया उसकी कीमत तो कोई हमें सौ रु भी ना देता वो क्या कॉल करेगा  खर्चा हमारे सर पर था | किन्तु उस मोबाइल को भी वो अपनी गरीबी का रोना रो कर बाद में मेरे पतिदेव से ले कर चला गया कहा बाइक उसकी नहीं मालिक की है और वो अभी अभी मुंबई आया है | उस समय भी मैंने पति से कहा था की तुम्हे कम से कम उसका मोबाइल नहीं लौटना था उसे एक सबक तो मिलता इस तरह तो वो कभी भी नहीं सुधरेगा  | यही कारण था की इस बार मैंने तय कर लिया था की इस तरह की कोई भी वारदात होती है तो मै उसे पुलिस तक जरुर ले कर जाउंगी और उस पर बाद में कोई कार्यवाही हो या ना हो ,कम से कम उन सब में ये डर तो बैठे की हो सकता है की सामने वाला मुझे बस मार कर ना छोड़े और सच में मेरे खिलाफ रिपोर्ट लिखवा दे और मुझे पुलिस के चक्कर में पड़ना पड़े इसलिए आगे से सावधानी से गाड़ी चलाऊ | ये हमारी अ- व्यवस्था का ही नतीजा है की यहाँ पीड़ित ही पुलिस से ज्यादा डरता है अपराध करने वाले की जगह , अपराधी ताव में कहता है की चलो चलो ले चलो थाने जैसे वो हमें डरा रहा हो कि तुम में ही हिम्मत नहीं है पुलिस तक जाने की,  वो अपराधी पीड़ित को ही पुलिस का डर दिखाता है जैसा मेरे साथ हुआ बार बार टैक्सीवाला ही मुझे घमकी देने के अंदाज में पुलिस स्टेशन चलने को कहा रहा था वो भी तब जबकि गलती उसकी थी |
                                                         
              ज्यादातर  हमें कहा जाता है की छोटी छोटी बातो को ज्यादा महत्व नहीं देना चाहिए या उसे बड़ा नहीं बनना चाहिए उसे भूल जाने में ही ठीक है , किन्तु ये रवैया सही नहीं है , जब हम दूसरो की छोटी छोटी गलतियों को भूलते है तो अक्सर हम बड़ी गलतियों को करने की या उसी गलती को बार बार करने की सामने वाले को प्रेरणा देते है | फिर ये बात तो मेरे समझ के बिल्कुल बाहर है की क्या किसी को उसके गरीब होने के कारण उसके किये गए अपराध के लिए कोई भी छुट दे देनी चाहिए | क्या अमीर या गरीब के किये गए अपराधो में फर्क हो जाता है किसी अमीर को माफ़ी देने की बात उसे छोड़ देने की बात तो कभी नहीं की जाती है ऐसा क्यों है | क्या गरीब होना आप के अपराध के प्रभावों को कम कर देता है बिल्कुल भी नहीं अपराध कोई भी करे उससे प्रभावित होने वाले पर इस बात से कोई भी फर्क नहीं पड़ता है तो फिर सजा में उसे छुट देने या उस पर दया दिखाने का भाव क्यों जगाया जाता है |  कई बार ये भी देखा है की जब कोई चोर या हत्यारा अपनी गरीबी का  दुख भरी कहानी सुना देता है अपनी कोई मजबूरी बता देता है तो लोगों के मन में तुरंत ही उसके प्रति दया भाव जाग जाती है और कहने लगते है की बेचारे ने मजबूरी में ये किया सजा देते समय उसकी मजबूरी को भी ध्यान में रख कर उसे छुट दी जानी चाहिए ( कानून की नजर में भले सब एक हो मै यहाँ आम लोगों के भावना की बात कर रही हूं ) क्या यही भाव हम किसी अमीर के लिए ला सकते है | याद कीजिये सत्यम के मालिक राजू ( यदि मेरी यादास्त सही है तो यही नाम था फ़िलहाल यही उदाहरन याद आ रहा है ) वो भी बोले की मैंने जो किया वो कंपनी और उसे से जुड़े हर व्यक्ति के भले के लिए किया और मेरे किये से शायद ही किसी को कोई नुकशान हुआ हो हा फायदा जरुर मेरे कर्मचारियों का हुआ है तो क्या उसके द्वारा किये गये अपराध पर भी हम वही दया के भाव मन में ला पाएंगे,  नहीं , शायद ही किसी के मन में दया आये हा गुस्सा जरुर बढ़ जाता है और हम और कड़ी सजा की बात करते है | हद तो तब हो जाती है की जब हम अमीर के जायज बातो पर भी अपराधियों सा व्यवहार करने लगाते है है और गरीब के अपराध को अपराध तक मानने से इंकार कर देते है |  मुकेश अम्बानी अपने पैसे से अपना शानदार अपनी हैसियत के हिसाबा से रहने लायक घर बनवाते है तो हजारो लोगो को बुरा लगता है , किन्तु उससे भी ज्यादा कीमती और हजारो गुना बड़ी सरकारी और निजी जमीनों पर लोग अवैध झोपड़े कब्ज़ा कर बना कर रहते है उसके प्रति हम सब दया का भाव अपनाने लगाते है  ऐसा क्यों है की किसी अमीर के किये छोटी सी छोटी गलती पर भी हम कड़ा रुख अपनाने की बात करते है पर गरीब की बात आते ही हम में दया आ जाती है | ना भूलिए की अमीरों को अपराध करने की आदत नहीं होती है वो भी बस उसी अपने फायदे के लालचा में अपराध करते है जिस लालचा में कोई अन्य गरीब करता है जब अपराध करने का कारण एक है तो समाज का रवैया अपराधियों के प्रति अलग अलग क्यों होता है | क्या ऐसा कर के हम कही ना कही अपराध को ही बढ़ावा नहीं दे रहे है क्या हमें छोटे अपराधो और बड़े अपराधो को दो दृष्टि से देखना चाहिए ( लो जी इतनी बार "क्या क्या " लिखने के बाद सतीश पंचम जी की क्यावाद पोस्ट की याद आ गई ) |
                                                                 मै ऐसा नहीं मानती हूँ की हमें अपराध के पीछे जो मजबूरी है उस पर ध्यान ही नहीं देना चाहिए किन्तु एक आम सी गलतियों और अपराधो पर जिसके पीछे कोई मजबूरी नहीं बल्कि लापरवाही या लालच हो उसे तो कतई माफ़ नहीं किया जाना चाहिए चाहे वो कोई गरीबा करे या अमीर | गरीबी कभी भी किसी अपराधी या गलती करने वाले को मिलने वाली सजा में छुट का कारण नहीं हो सकती है | जब तक हम अपराधी के गरीब होने के कारण उसकी गलती को नजर अंदाज करने की आदत और गलत करने वालो को सजा देना की शुरुआत नहीं करेंगे ये समाज और व्यवस्था दुरुस्त नहीं होगी |
                                                कई बार सुना है की क्षमा और माफ़ी देने से इन्सान का कद बढ़ जाता है पर मै कभी भी इस को सही नहीं मानती हूँ नीजि जीवन में भी मै ये मानती हूँ की पहली गलती को माफ़ कर हम हमेसा दूसरी गलती हो बढ़ावा देते है मेरी छोटी बेटी ही क्यों ना हो किन्तु कोई ना कोई साकेंतिक ही सही सजा उसकी गलती पर जरुर देती हूँ जो उसे सबक जैसा लगे | अपनी गलती मान ले तो छोटी सजा या पहले ही मुझे आ कर बता दे तो सख्त लहजे में आगे ऐसा ना करने की चेतावनी ही उसके लिए काफी है | वो अभी भले ही इस बात को ना समझे पर बड़ी होने के साथ ही वो उसे समझाने लगेगी | वैसे मै उसे सजा क्या देती हूँ :) आज पूरे दिन तुम्हारा चैनल नहीं लगेगा बड़ी गलती पर दो चार दिन तक तुम अपना चैनल नहीं देख सकोगी क्या करे उसके लिए तो यही सजा है सो व्यक्ति को सजा वही दी जानी चाहिए जिसे वो सजा माने |


चलते चलते
               कुछ चीजो को लेकर समाज और लोग हमें पहले से इतना डरा देता है की हम डर की बात ना होने के बाद भी डरने लगते है | कुछ साल पहले मेरा मोबाईल घूम गया था , नये सिम कार्ड के लिए हमें पुलिस स्टेशन में जा कर कुछ एन ओ सी जैसा लेना पड़ता है पतिदेव को पुलिस स्टेशन भेजते मुझे डर लगा रहा था क्या करे पुलिस स्टेशन की छवि ही ऐसी बना दी गई थी | किन्तु इस बार ना जाने क्यों एक बार भी मुझे इस बात का डर नहीं लगा की मै महिला हो कर पुलिस स्टेशन जा रही हूँ वहा का माहौल भी फ़िल्मी पुलिस स्टेशनों से अलग एक आफिस की तरह का था जहा एक कमरे में चार आलग अलग काउंटर जैसा था बस सब खाकी यूनिफार्म में थे पहले पुलिस ने मेरी बात ध्यान से सुना फिर कहा बस १० मिनट लगेंगे आप के कागजो से नंबर नोट करना है फिर आ पा जा सकती है दूसरे ने मेरी रिपोर्ट लिखी यहाँ तक की उसे निर्देश दिया गया की हमारे साथ छोटी बच्ची है जल्दी किया जाये और जब मै हड़बड़ी में अपनी कर का नंबर ठीक से बता नहीं पाई ( डर नहीं लगा थोड़ी हडबडाहट थी क्योकि घटना का ठीक से ब्यौरा देना था जो उसकी मराठी और मेरी हिंदी से गड़बड़ हो जा रही थी ) तो उसने आर सी बुक से देख खुद ही नोट कर लिया , सब ने ठीक से अच्छे से बात सुनी और अच्छे से बात की भी |  नहीं नहीं कोई जल्द बाजी ना कीजिये  आप लोग पुलिस स्टेशन के बारे में अपने कोई राय बनाने में क्योकि अभी घटना के बस दो दिन ही हुए है अभी आगे क्या होगा मुझे भी नहीं पता है मै तो वापस नहीं जाने वाली हूँ पर उधर से क्या होगा पता नहीं क्या पता फिर से एक पोस्ट लिखू की ये मैंने क्यों गलती कर दी पुलिस स्टेशन जा कर :( और हा मेरे साथ अच्छा व्यवहार कर रहे पुलिस वालो का रुख जरा टैक्सी वाले के प्रति देखिये "क्यों तेरा बैच  कहा है ' " साहब जेब में है " थोडा तेज आवाज में  " तुझे बैच जेब में रखने के लिए मिलता है क्या,  बाहर निकाल टांगने नहीं आता है क्या " मेरी दया कुछ जागने लगी थी | रिपोर्ट लिखवाने से पहले पति से कहा की जरा उससे पूछो नुकशान की भरपाई कर दे तो क्या रिपोर्ट लिखवाऊ जाने दो और पतिदेव ने क्या कहा वही  " अरे वो इतना गरीब है वो क्या देगा तुम देख लो क्या करना है " |  ऊफ ऊफ ऊफ हम सब ऐसे ही है पर हमें बदलना होगा रिपोर्ट तो मैंने लिखवा ही दी दिल पर बस छोटा सा कंकण रखना पड़ा |