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August 22, 2019

बाटला हाउस -------mangopeople




                            

                                बात इस सरकार से पहले के सरकार के जमाने कि हैं | देश की राजधानी में कुछ बड़े पुलिस  अधिकारियों की एक आतंकवाद के खिलाफ खास एसआईटी बनाई गई थी | यह एसआईटी देश और दिल्ली में हुए कई बड़े आतंकवादी घटनाओं की जाँच कर रही थी | कुछ केस में   बड़े सबूत हाथ भी आये थे और कुछ को सुलझाने  करीब  थे | यह समूह एक तरह से ख़ुफ़िया तरीके से ही काम ज्यादा कर रहा था , इसकी कोई सार्वजनिक घोषणा नहीं हुई थी  | 

                                  लेकिन एक दिन अचानक इस एसआईटी के एक बड़े अधिकारी की  संदिग्ध रूप से सड़क दुर्घटना में मौत हो जाती हैं | उसके कुछ ही दिन बाद दो और अधिकारी यहाँ से  तबादला ना केवल दूसरे विभाग में करवा लेते   हैं बल्कि कुछ समय बाद दिल्ली छोड़ अपने राज्यों में ट्रांसफर भी ले लेते हैं | 

                                   मामला यही नहीं रुकता हैं फिर इसके एक और बड़े अधिकारी की  गोली मार कर हत्या एक मामूली सा दो कौड़ी का प्रॉपर्टी डीलर अपने ऑफिस में कर देता है और फिर पुलिए में सरेंडर भी कर देता हैं | 
                                   मालूम हैं  इस एसआईटी के सबसे आखरी अधिकारी के साथ क्या हुआ | उसकी की  संदिग्ध मौत हो जाती हैं एक एनकाउंटर में | क्योकि उस एनकाउंटर में वो बहुत मामूली से सिपाहियों के साथ गया था , जबकि वो  आतंकवादियों के खिलाफ था | पुलिस की तरफ से सिर्फ उसी की मौत होती हैं , तब जब  वो खुद अपने पैरों पर चल कर  अस्पताल जाता हैं लेकिन वहां उसकी मौत हो जाती हैं |           
जानते हैं उस ख्यात कुख्यात  एनकाउंटर का नाम क्या था " बाटला हाउस" |     

February 19, 2019

ये कभी ख़त्म ना होने वाली लड़ाई है ----------- mangopeople


                               हम चाहे ४० के बदले चार सौ  पाकिस्तानी आतंकवादी मार दे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला | केवल कश्मीर में हाल के सालो में आतंकवादियों के मारे जाने का आंकड़ा लगभग पांच सौ से ऊपर है | सर्जिकल स्ट्राइक और सीमा पर घुसपैठ के समय जो मारे गए वो  अलग से है | जो देश अपने लोगों के जान की कोई कीमत ही नहीं समझता हो | जो उनके लिए मात्र उनकी महत्वाकांक्षाओं को  पूरी करने का एक मामूली मोहरा है भला उस देश के आतंकवादियों को खाली मार कर हम उसे कैसे रोक सकते है |
सौ पचास युद्ध भी इसको ख़त्म नहीं कर सकती | हम पहले ही दो सीधा युद्ध और एक कारगिल जीत चुके हैं |  बुरी तरह हारे हैं फिर भी बाज नहीं आतें | क्यों , क्योकि भारत में आतंकवाद फैलाना और भारत से दुश्मनी बनाये रखना पाकिस्तानी सेना के वजूद के लिए जरुरी है |

                                सोचिये यदि पाकिस्तान और भारत मित्र हो जाये और कोई बड़ी लड़ाई ना हो तो पाकिस्तान को उसकी सेना और उस पर भारी भरकम रकम खर्च करने की क्या जरुरत होगी | पाकिस्तान बनने के साथ ही पाकिस्तानी सेना को इस बात का अहसास था इसलिए वो इस दुश्मनी को बनाये रखने के लिए और समय के साथ बढ़ाने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ती |इधर लोकतान्त्रिक सरकार शांति की वार्ता के लिए आगे बढ़ी और उधर पाकिस्तानी सेना ये वार्ता ख़त्म करने के इंतजाम में लग जाती है | उसके रहमोकरम पर चलने वाली नागरिक सरकार अपनी सत्ता बचाये या भारत से बात करे | उनको भी सत्ता में बने रहना है अपना पेट पालना है , इसलिए वो इसी में भलाई समझती है सेना को उसका हिस्से की बोटी दो और सत्ता बचा कर रखो |
                                  पाकिस्तानी सेना के लिए उनके नागरिक की कीमत कितनी है बताने की जरुरत नहीं है | देश के लोग भूखे मर जाए लेकिन , बचे पैसो से वो हथियार ख़रीदेगा खाना नहीं | इसलिए नागरिको पर किसी तरह का प्रतिबन्ध लगा उन्हें परेशान कर भी हम ये बंद नहीं करवा सकतें |
हमारे लिए एक तरफ कुवां एक तरफ खाई है , हम वार्ता करे ना करे , व्यापार करे छोड़ दे , कोई संबंध रहने दे या सब ख़त्म कर दे , उधर से यह परोक्ष युद्द हमेशा जारी रहेगा | यदि पाकिस्तान में लोंगो को भारत का डर ना दिखाया जाए तो पाकिस्तानी जनता ही सेना को दफा करे , इसलिए वो भारत के खिलाफ कुछ ना कुछ करते रहते है और भारत की प्रतिक्रिया को भारत से युद्ध दुश्मनी के रूप में प्रस्तुत करते हैं |

पाकिस्तानी सेना का लगातार भारत में आतंकवादी गतिविधिंयों को बढ़ावा देना एक अलग ख़ास बिमारी  है जिसका ईलाज भी अलग तरीके से करना होगा | पारंपरिक ईलाज से ये समस्या जड़ से ख़त्म नहीं होने वाली है |












May 03, 2011

अश्वाथामा मारा गया - - - - - - mangopeople

                                          अश्वाथामा मारा गया 
                                                               किन्तु हाथी

  जी हा सभी जानते है की आतंकवादी रूपी अश्वाथामा अजर अमर है वो कभी मर नहीं सकता है दुनिया में वो किसी न किसी रूप में मौजूद रहेगा | लादेन रूपी जो अश्वाथामा मारा गया है वो तो इस आतंकवाद के युद्ध में सिर्फ एक हाथी था जिसके मरने से इस युद्ध पर कुछ खास असर नहीं होने वाला है कम से कम हम भारतीयों के आतंकवाद के युद्ध के लिए तो ये ज्यादा महत्व नहीं रखता है | इसलिए जरुरी है की इस हाथी के मरने के शोर  में असली आतंकवाद रूपी अश्वाथामा को नहीं भूलना चाहिए, जैसे पांडव उसे भूल कर युद्ध को समाप्त समझ बैठे थे और उसके बाद उस अश्वथामा ने युद्ध नीति और धर्म के खिलाफ जा कर द्रौपती के पांच पुत्रो की हत्या कर दी थी और उत्तरा के गर्भ में पल रहे पांडव वंश की आखरी निशानी को भी समाप्त कर पांडव वंश को समाप्त करने का प्रयास किया था  |  आतंकवादी भी किसी धर्म या नीति को नहीं मानते है उनके लिए सब कुछ जायज है यदि उन्हें अपनी महत्वाकांक्षाओ को पूरा करने के लिए इस पुरे मानव वंश को भी नष्ट करना पड़े परमाणु युद्ध द्वारा तो वो उससे भी पीछे नहीं हटेंगे | इसलिए अब जरुरत इस बात की है की अपना ध्यान और इस युद्ध पर लगाया जाये ताकि बदले की कार्यवाही से बचा जा सके |
                                                       खुद अमेरिका के लिए भी ये हाथी ही होगा क्योकि पिछले दस सालो में नहीं लगता है की लादेन आतंकवाद को बढ़ाने में और अलकायदा के संचालन में उतना सक्रिय रहा होगा जितना की ९/११ के पहले था , असल में तो अल कायदा की कमान काफी पहले ही कई दुसरे आतंकवादियों के हाथ में चली गई थी और लादेन के मरने से उनके मनोबल तो गिर सकता है किन्तु जमीनी रूप से ज्यादा फर्क उन्हें नहीं पड़ेगा | इसलिए ये जरुरी है कि अमेरिका इसे आतंकवाद के खिलाफ लड़ी जा रही लड़ाई का एक पड़ाव भर माने उससे ज्यादा कुछ नहीं | वैसे तो हम सभी जानते है की दुनिया को आतंकवाद से मुक्ति दिलाने के नाम पर आमेरिका अपनी निजी लड़ाई लड़ रहा है और उस नाम पर वो तेल का खेल भी खेल रहा है किन्तु हमें ये तो फायदा हुआ ही है की इन दस सालो में अलकायदा अमेरिका से ही लड़ने में व्यस्त था जिससे उसका ध्यान भारत और कश्मीर में हो रहे आतंकवाद से थोडा हटा था और कश्मीर में कुछ दुसरे पाकिस्तान परस्त गुट ही सक्रीय थे | यदि अलकायदा अमेरिका से उलझा नहीं होता तो शायद वो अपना सारा धन बल हथियार की ताकत भारत के लिखाफ लड़ने में लगा सकता था | साथ ही अमेरिका के पाकिस्तान में मौजूदगी के कारण वो अब जान चूका है की पाकिस्तान किस तरह भारत में आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है खुद लादेन तक को अपने यहाँ पनाह दे रखा था वो इस बात को भले सार्वजनिक रूप से न माने क्योकि ये उसकी मजबूरी है वो उस पाकिस्तान के खिलाफ अभी कुछ नहीं कह और कर सकता जिसके बल पर वो अफगानिस्तान में टिका है और उसे पैसे दे कर उसके सैनिको से अपना युद्ध लड़वा रहा है किन्तु अब वो पाकिस्तान की वास्तविकता से अच्छे से परिचित है जो हमारे काम तब आएगा जब अमेरिका अफगानिस्तान से अपनी गर्दन बचा कर बाहर निकल जायेगा | तब तक तो हमें इस तमाशे को देखना ही पड़ेगा | 
                                                   मुझे नहीं लगता है की प्रत्यक्ष रूप से अमेरिका हमारी आतंकवाद से लड़ने में कोई मदद करेगा ये काम तो हमें ही करना होगा | अपने आतंकवाद की लड़ाई हमें ही लड़नी होगी क्योकि एक तो हमारे दुश्मन अलग अलग है वही हमारी और हमारे दुश्मनों की स्थिति दुनिया में अलग अलग है हम उस तरह से अपना युद्ध नहीं लड़ा सकते है जैसे की अमेरिका लड़ रहा है जहा अमेरिका आक्रमण नीति अपना रहा है क्योकि उसकी लड़ाई अविकसित सैन्य शक्ति में कमजोर देशो से है वही हम गुरिल्ला युद्ध जैसी स्थिति में फंसे है जहा हम पर छुप कर पीछे से वार किया जा रहा है हमारे दुश्मन सामने नहीं दिख रहा है | हम भले जानते हो की इसके पीछे कौन है किन्तु उसके खिलाफ हम सीधी लड़ाई नहीं लड़ सकते है वो अन्य देशो से कही ज्यादा सैन्य शक्ति में ताकतवर है और उसे दुनिया के दुसरे ताकतवर देशो और हमारे दुसरे दुश्मनों का साथ भी मिला है साथ ही हम अमेरिका जैसे आर्थिक और सैनिक ताकत भी नहीं रखते है | इसलिए हमें ये युद्ध रक्षात्मक रूप में लड़नी होगी मतलब हमें खुद की इन हमलो के प्रति सुरक्षित बनाना होगा इन हमलो को होने से पहले रोकना होगा अपनी सुरक्षा व्यवस्था और तगड़ी करनी होगी | जो हम अभी तक नहीं कर पाए है सबूत के तौर पर मुंबई हमला करने के लिए आतंकवादी बड़े आराम से समुंद्री रास्ते हमारे देश में घुस गए | जब हमारी सीमाओ का ये हाल है तो हम कैसे इस युद्ध को जितने का सोच सकते है या अमेरिका जैसे किसी सफलता की उम्मीद कर सकते है | 
                         अमेरिका ने तो दस सालो में दुसरे देश में घुस कर अपने दुश्मन को मार दिया और हम तो किसी आतंकवादी हमले का मुक़दमा ही तेरह सालो तक चलाते रहते है वो भी निचली आदालत में जैसे १९९३ के मुंबई हमलो का मुक़दमा | दुसरे मुकदमे का फैसला आ जाये तो उसे सजा देने में इतनी देर करते है जैसे अफजल गुरु और हद तो तब है जब बाहर से आ कर सरेआम लोगो को मारने वालो को जिसकी फोटो हर किसी ने देखी सब करते हुए उसके खिलाफ भी मुक़दमा दो साल तक चलता जा रहा है जैसे कसाब का मुक़दमा अभी भी अदालत में ही है | अब ये देखने के बाद क्या हम कह सकते है की हमें भी अमेरिका की तरह दुसरे देश में घुस कर अपने दुश्मनों को पकड़ लेना चाहिए या उन्हें मार देने चाहिए | जब हम अपने देश के अन्दर उनके खिलाफ कुछ नहीं कर पा रहे है तो किसी दुसरे देश में घुस कर उन्हें क्या खाक पकड़ेंगे |
                                कल टीवी पर देखा दुनिया के साथ ही भारत में भी इस बात की खुशिया मनाई जा रही है की लादेन मारा गया | लगा जैसे लोग खुद को धोखा देने का प्रयास कर रहे है की हम अपने देश के दुश्मनों का तो कुछ नहीं कर सकते अपने लिए हम इस तरह कोई ख़ुशी नहीं मना सकते तो कम से कम दूसरो के दुश्मनों को या अपने दूर के दुश्मन के मरने की ही ख़ुशी मना लेनी चाहिए | अब आम आदमी और कर भी क्या सकता है जिस देश की राजनीतिक इच्छा शक्ति इतनी कमजोर हो जिस देश के नेता मंत्री हर बात में वोट की राजनीति करते हो खबरों में बने रहने के लिए कुछ भी बकते हो उस देश की जनता कर क्या सकती है | दिग्विजय सिंह की बयान रूपी बेफकुफियो की लिस्ट काफी लम्बी है कल उन्होंने उस में एक और जोड़ ली ये कह कर की " कोई कितना बड़ा आतंकवादी क्यों न हो उसके मरने के बाद उसके अंतिम संस्कार में उसके धार्मिक रीति रिवाजो को पूरा किया जाना चाहिए |" ये हमारे देश के नेता है ये इनकी सोच है इस पुरे प्रकरण में इन्हें अपने मतलब की जो सबसे सही बात दिखी वो ये था की एक खूंखार आतंकवादी का धर्म और उसका रीति रिवाज | वास्तव में कहू तो दिग्विजय सिंह की ये बेफकुफिया बर्दास्त के बाहर होती जा रही है |