Showing posts with label विज्ञापन. Show all posts
Showing posts with label विज्ञापन. Show all posts

August 02, 2022

पुरुष अपनी समानता के लिए विरोध क्यों नहीं करता |

कार 24 का एक विज्ञापन आता था जिसमे एक लड़की दूसरी लड़की से कहती हैं कि हम दूल्हे खोजने की एक एप्प कार 24 की तरह बनायेंगे | दस दिन में दूल्हा पसंद नहीं आया तो वापस , यही होगा असली स्वयंवर | ये कह लड़कियां जोर से हँसने लगती हैं | 


अब सिर्फ कल्पना कीजिये कि इस विज्ञापन में पात्रों का लिंग परिवर्तन कर देतें तो कितना बवाल हो जाता | दो लडके बात करते की पसंद ना आये तो दस दिन में दुल्हन वापस फिर ठहाका लगाते  | बाप रे , नारीवादियों से लेकर महिला आयोग और पूरा सोशल मिडिया जंग का मैदान बना देता | महिलाओं का अपमान बता कहता पहली नजर में ही विज्ञापन पसंद नहीं आया इसे तो तुरंत ही वापस लो | 


लेकिन अब कहीं से कोई भी आवाज विरोध में नहीं उठ रही हैं  | किसी को विज्ञापन में पुरुषो का अपमान नहीं दिख रहा | नारीवादी , फेमनिष्ठ  तो आपकी समानता के लिए विरोध तो करने से रही | उनके लिए समानता क्या हैं हाल में छोकरी और आम की टोकरी में ही सामने आ गया | कुछ ने कहा छोकरी क्यों हैं छोकरा क्यों नहीं डाला, कवि की नियत ख़राब हैं | मतलब छः साल एक लड़का आते ही बाल मजदूरी और यौन शोषण का मामला ख़त्म हो जाता |ये दोनों बातें लडको से नहीं जुड़ती , उनके हिसाब से | 


वामपंथी भी आप के  लिए आवाज नहीं उठाएंगे जब तक आप मुस्लिम , दलित , गरीब, सत्ताविरोधी  या वामपंथी ना हो | अगर आप ये योग्यता रखते हैं तो वो आपके गलत करने में भी आपके पक्ष में खड़े रहेंगे | लेकिन स्वर्ण , हिन्दू , अमीर आदि का अपमान अपमान नहीं कहलाता , उनके अनुसार | दलितवादी कहेंगे इतने सालों स्त्री का अपमान किया हैं तो अब उसका हक़ बनता हैं कि वो हर पल आपका अपमान करे| बल्कि अपना सारा जीवन उसे खुद की उन्नति में लगाने की जगह आपके अपमान में समय व्यर्थ करना चाहिए | 

मतलब कोई भी पंथ या वाद आपके लिए आवाज नहीं उठाने वाला हैं |लेकिन सवाल से हैं कि आम पुरुष इसके खिलाफ क्यों नहीं बोल रहा हैं | इसके दो तीन कारण मुझे लग रहें हैं आप बताइये कौन सा सही हैं --


1 - पुरुषों का सेंस ऑफ ह्यूमर बहुत अच्छा हैं | 

2 - असल में ये  अवसर , सुनहरा मौका  हैं | इससे बढियाँ क्या होगा कि दस दिन एक लड़की से साथ गुजारने के बाद आपको आजाद कर दिया जायेगा किसी और लड़की के आजमाने के लिए | मतलब  हर दस दिन बाद नयी गर्लफ्रेंड |  वल्लाह अच्छे दिन कहते हैं इसको तो | 

3 - आपदा में अवसर | भाई दूल्हे को दस दिन आजमाया जायेगा तो दूल्हे को भी तो मौका मिलेगा दस दिन दुल्हन को आजमाने का | खुद को पसंद आयी तो उसके सामने अच्छे बने रहों ताकि वो भी पसंद कर ले | दुल्हन पसंद नही आयी तो अपना रावणी  रूप दिखा दो वो खुद ही छोड़ देगी | अरेंज और लव मैरिज में ये फायदे कहाँ मिलने वाले | 

4 -समाज की वास्तविकता और अपनी ताकत की पहचान | हँस लो लड़कियों जितना इस तरह का मजाक बना कर हँसना हैं | समाज की वास्तविकता तो ये हैं कि तुम्हे वर के चुनाव का अधिकार ही नहीं हैं , अपवाद छोड़ दे तो | किसे चुनना हैं और किसे रिजेक्ट करना हैं ये हम तय करते हैं तुम नहीं | इसलिए तुम्हारे ख्याली पुलाव से हमें कोई आपत्ति नहीं हैं | 

इसमें से आपको कौन से कारण लगते हैं बताइये | इसके आलावा भी कोई और कारण हैं तो अपनी तरफ से  जोड़ते जाइये । 

April 23, 2022

विज्ञापन , पैसा और नैतिक जिम्मेदारी



अक्षय कुमार की खूब  ट्रोलिंग हुयी  उनके गुटका का विज्ञापन करने पर | ये ट्रोलिंग होनी भी चाहिए थी क्योकि जो व्यक्ति अपने नीजि जीवन में सेहत और खानपान को लेकर बड़ी बड़ी बात करता हो अगर वो पैसे के लिए तंबाकू बेचने  वाली कंपनी का दिखावटी इलायची का विज्ञापन करे तो वो इसी के लायक हैं | 


अगले ही दिन उन्हें इस विज्ञापन के लिए माफ़ी मांगनी पड़ी और खुद को विज्ञापन से अलग होने की घोषणा भी करनी पड़ी | उनके लिए तालियां बजाने से पहले रुकिये जरा पेंच समझिये विज्ञापन से अलग होने के बाद भी विज्ञापन बंद नहीं होगा क्योकि उन्होंने विज्ञापन के पैसे नहीं लौटाये हैं | उन पैसो को वो दान करेंगे और विज्ञापन अपने क्रांट्रेक्ट की समय तक दिखता रहेगा | 


इसके पहले अमिताभ बच्चन की भी खूब ट्रोलिंग हुयी थी गुटका कंपनी का विज्ञापन करने पर | पहले उन्होंने सफाई दिया लेकिन बाद में उस विज्ञापन से ना केवल खुद को अलग किया बल्कि पैसे भी लौटा कर तुरंत विज्ञापन को बंद करवाया | अमिताभ शराब का विज्ञापन भी नहीं करते हैं क्योकि शराबी जैसी फिल्मे उन्होंने भले की हो पर वो शराब नहीं पीते | लिवर में लगा चोट और फिर हिप्पेटाइटस से संक्रमित ब्लड चढाने से उनका लिवर बहुत ख़राब हैं | 


बहुत से खिलाडी जैसे सचिन विराट आदि भी शराब का विज्ञापन नहीं करते |  कुछ सेलेब्रेटी हमेशा से इन चीजों का ध्यान रखते हैं कि समाज को वो कैसा सन्देश दे रहें हैं | अभी खबर आयी हैं कि अल्लू अर्जुन को भी गुटके के विज्ञापन का प्रस्ताव था लेकिन उन्होंने तुरंत ही मना कर दिया | 


लॉकडाउन के बाद शाहरुख ने भी गुटके का विज्ञापन किया था और उनकी भी खूब ट्रोलिंग हुयी थी लेकिन उन्हें कभी कोई फर्क नहीं पड़ा | जबकि शाहरुख ने एक बार खुद से ये कहा था कि वो कभी गुटके का विज्ञापन नहीं करेंगे | इसलिए नहीं कि वो सेहत के लिए खराब चीज हैं  बल्कि इसलिए क्योकि डाउन मार्केट की चीज हैं | ऐसे चीज का विज्ञापन करके वो खुद को छोटा गिरा हुआ नहीं बनायेंगे | 


लेकिन लॉकडाउन की बेरोजगारी , लगातार फेल हो रही फिल्मे , पैसे की भूख ने उनसे ये करवा दिया | वैसे पैसा कमाने की उनकी भूख ने एक और परंपरा की शुरुआत की थी बरसो पहले जिसको आज सभी हिंदी फिल्म स्टार फॉलो करने लगे हैं | वो हैं लोगों की शादियों में नाचना | 


पहले हिंदी फिल्मो के कलाकार विदेशो में बड़े बड़े टूर पर  जाते थे | ताकि विदेशो में बैठे भारतीय और बाकि फैन उनको सामने से देख मिल सके और हिंदी फिल्म उद्योग का प्रचार भी हो जाये , पैसे कमान के साथ | लेकिन लोगों के शादियों में नाचना बहुत ही बेकार का पैसे की हवस जैसा था |  


वैसे कुछ लोग कलाकारों के विज्ञापन करने को भी पसंद नहीं करते तो कुछ कलाकार भी विज्ञापन करना पसंद नहीं करते थे | सनी दयोल ने एक बार कहा था कि वो कभी विज्ञापन नहीं करेंगे क्योकि वो अभिनेता हैं और विज्ञापन करना  बार में डांस करने , या कैबरे या तवायफ होना हैं जैसा कुछ कहा था | लेकिन सालो बाद वो भी बनियान मसाले बेचते दिख गये | 


कुछ पुराने या फ्लॉप हो चुके फ़िल्मी कलाकार जैसे जैकी और गोविंदा तो ताबीज , मंतर जंतर तक बेचने लगे थे पैसे के लिए | वो तो शुक्र हैं कि ऐसे विज्ञापनों पर कोर्ट ने रोक लगा दी | 


ब्लॉग के समय हम बहुत ही महिलाओं ने एक विज्ञापन के लिए किसी फ़िल्मी हस्ती को ट्रोल करने का  खूब विरोध किया और फ़िल्मी हस्ती के साथ खड़े हो गए थे | पुराने ब्लॉग साथी और एक राष्ट्रवादी न्यूज चैनल से उस समय जुड़े एक जने ने प्रियंका चोपड़ा का विरोध किया इस बात के लिए कि वो शराब बनाने वाली एक कंपनी के फैशन टूर का विज्ञापन कर रही हैं | 


महिला हो कर शराब बनाने वाली कंपनी से क्यों जुड़ी , खुद शराब पीती होंगी आदि इत्यादि उनके लिए कहा गया | हम महिलाएं जिन्हे तब नारीवादी कहा जाता था इसका विरोध किये कि उनका विरोध क्यों हो रहा हैं जब पुरुष अभिनेता  का  इस बात पर विरोध नहीं होता | और ये क्या बात हुयी कि किसी महिला को शराब पीने ना पीने के लिए नैतिकता की  दुहाई दी जा रही हैं | 


जब किसी पुरुष अभिनेता  को ऐसे नैतिकता का दुहाई नहीं दी जाती तो महिला अभिनेत्री को क्यों दी जा रही हैं | अगर यह  गलत हैं तो दोनों के लिए गलत हैं विरोध सबका होना चाहिए केवल महिला होने के कारण किसी एक का नहीं  | 


तब आज वाला सोशल मिडिया नहीं था वरना वो भी ये कहते अपना बचाव करते कि ये तो कोई बात नहीं हैं , ये  व्हाटबॉटिज़्म हैं , हमारी मर्जी हम जिस पर चाहे बोले जिस पर चाहे चुप रहें | आज वालों को बोल कर देखिये भाई अमिताभ अक्षय पर तो खूब बोले शाहरुख पर क्यों चुप रहे या शाहरुख पर बोले बाकि पर चुप क्यों रहें तो व्हाटबॉटिज़्म का राग अलापते भाग जायेगा |  


लेकिन कम से कम अभिताभ अक्षय जैसे ट्रोल होने पर लोगों की बात को कुछ तो मान दिया विज्ञापन से खुद को अलग तो किया | लेकिन शाहरुख ने तो इसका सोचा भी नहीं | वैसे भी वो गैर क़ानूनी होने के  बाद भी सार्वजनिक जगहों पर आराम से सुट्टे मारते दिखते हैं और युवाओं में उन्हें रोल मॉडल के रूप में  देखने के कारण उनकी पहले भी इस बात के लिए आलोचना भी हो चुकी हैं लेकिन उन्हें कभी कोई फर्क नहीं पड़ा | 


#सिने_मा

December 20, 2016

फेयरनेस क्रीम एक नस्लवादी सोच -------mangopeople


                                                     कुछ साल पहले एक सेल्स गर्ल आई मैम हमारी कंपनी का फेयरनेश क्रीम ले लीजिये उसका कोई मुकाबला नहीं है , मैंने कहा मैं फेयरनेस क्रीम नहीं लगाती । अपनी आंखे बड़ी बड़ी कर बोली क्या आप फेयरनेस क्रीम नहीं लगाती , ठीक है पहले कौन सी लगाती थी । मैंने जवाब दिया मैंने कभी फेयरनेस क्रीम नहीं लगाई है , अब धुप से बचने के लिए आप की कंपनी का क्रीम लगाती हूँ लेकिन फायदा कोई नहीं है । फिर उसने ज्ञान दिया की मुझे तो फेयरनेस क्रीम लगनी चाहिए । हम चार भाई बहन चार अलग अलग रंग के है , पूरा खानदान ही करीब मिली जिला प्रजाति का है , इसलिए घर में कभी काला गोरा रंग मुद्दा ही नहीं रहा और न कभी हमें गोरे होने की क्रीम लगाने के लिए कहा गया । विवाह मे ये समस्या बनी किन्तु अंत में विवाह के लिए आप का व्यवहार , स्वभाव ही महत्वपूर्ण होता है । बाद में सांवली दीदी और खुद मेरा विवाह भी गोरे, दूध से गोर ( शब्द जो समाज प्रयोग करता है ) लोगो से हुआ , साफ है उनके लिए भी रंग कोई मुद्दा नहीं था । जबकि मेरे गोरे भाई बहन के जीवन साथी सांवले आये ।

                                                  एक न्यूज चैनल बता रहा है कि उसने एक साल से गोरे होने की क्रीम का विज्ञापन नहीं दिखाया है , उसके अनुसार गोरे होने की क्रीम एक तरह की नस्लवादी सोच है । उसका कहना बिलकुल सही है की आज की तारीख में जिस तरह से इन क्रीम को बेचने के लिए आक्रमक प्रचार किया जाता है उससे ये एक बड़ी समस्या जैसी बन गई है । आप गोरे नहीं है तो जीवन में आप का कुछ हो ही नहीं सकता । पहले इसे केवल विवाह में समस्या के तौर पर देखा जाता था किन्तु अब तो साफ प्रचारित किया जाता है कि जीवन के किसी भी क्षेत्र में आप सफल ही नहीं हो सकते यदि आप गोरे नहीं है । लडकिया क्या लड़को में भी ये हीन भावना और तेजी से भरी जा रही है । उनके लिए अलग से गोर होने के लिए क्रीम लाया गया है । खूब अच्छे से समझाया जाता है कि लड़कियों की क्रीम आप पर नहीं चलेगी और बिना गोरे हुए आप भी कुछ नहीं कर सकते । आप के तो जीवन लक्ष्य ही है कि दो चार लडकिया आप के आगे पीछे चिपक कर खड़ी रहे और रंग गोरा न हुआ तो आप ये लक्ष्य नहीं पा सकते ।
                                              ऐसा नहीं है कि हमारे समाज में रंग को लेकर कोई भेद ही नहीं था , था और बहुत गहराई से था , इसे तो वर्ण व्यवस्था तक से जोड़ दिया गया था । लेकिन तब लड़कियों के रंग को ही देखा जाता और विवाह ही एक मुद्दा होता था और उसके लिए घरेलु उबटन आदि का प्रयोग किया जाता था । किन्तु उसका स्तर ये नहीं था कि हर किसी को बस गोरी बहु ही चाहिए या समाज में हर जगह बस गोर लोग ही चाहिए । किन्तु आज बच्चे होते ही उसके रंग को लेकर चर्चा होने लगती है , ये बात लोग अक्सर नहीं समझते की रंग तो ज्यादातर परिवार के सदस्यो के रंग जैसा ही होगा । लोग तुरंत गोर होने के उपाय बताने लगते है , यहाँ तक की बच्चे के जन्म के पहले बच्चे गोर हो उसके लिए भी उपाय बताये जाते है  गर्भवती स्त्रियों को करना चाहिए । आजकल कंपनियों ने इसे महामारी की तरह बना दिया है । गोरी बहु चाहिए से मामला कर्मचारी खासकर यदि वो फ्रंट डेस्क के लिए हो तो गोरा ही होना चाहिए तक पहुँच गया है । इस कारण लडके और लडकिया में सवाले होने पर आत्मविवास कम हो जाता है और शुरू हो जाते है इन कंपनियों का बैंक बैलेंस बढ़ाने । जबकि वास्तव में किसी क्रीम से गोरा होना संभव नहीं है । आप धुप से बचने के उपाय कर सकते है किन्तु अपनी त्वचा के वास्तविक रंग को क्रीम से गोरा नहीं कर सकते है ।

                                               कई बार इस पर चर्चा समाज में हो चुकी है इसे ख़राब भी माना गया किन्तु शायद हमारे अपने अंदर ही ये कमी है की इसको एक मुहीम जैसा नहीं बना सके की बाजार अपने रुख को बदल सके , जबकि कई मुद्दों पर बाजार ने अपने आप को बदला है । शायद समाज भी उसी नस्लवादी सोच का बना गया है जिसका फायदा बाजार उठा रहा है । एक बार नादित दास को इस मुहीम से जोड़ा गया और जो तस्वीर उनकी ली गई उसमे भी उन्हें उनके वास्तविक रंग से ज्यादा साफ दिखाया गया । अब आप सोच सकते है कि समाज की समझ क्या है । टीवी पर कितने ही धारावाहिक आये जो इस सवाल रंग की समस्या को लेकर शुरू हुए किन्तु दो तीन साल बाद ही जब अभिनेत्री की पुरानी तस्वीर से जब धारावाहिक शुरू हुआ था से मिलाया गया तो पता चला की अभिनेत्री को भी मेकअप लगा कर दो साल में धीरे धीरे पहले से और साफ रंग का बना दिया गया ।
                                             ये सोच बचपन से समाज , परिवार द्वरा बच्चो में भर दी जाती है । मेरी बेटी जब कुछ तीन साल की हुई तो मुझे पता चला की इतने समय में ही सभी ने उसके साफ रंग को लेकर इतनी तारीफ की , इतनी बाते उसके सामने की कि उसे लगने लगा काला या सांवला रंग होना एक बुराई है और इस बात को उसके छोटे से दिमाग से निकालने में मुझे काफी मेहनत करनी पड़ी । अब अंदाज लगा सकते है कि समाज से इस सोच को बाहर निकालने में कितनी मेहनत करनी पड़ेगी , पर शुरुआत तो करनी ही होगी । ऐसे उत्पाद के विज्ञापन को नहीं दिखाने के लिए चैनल को बधाई दिया जाना चाहिए सराहना चाहिए और दुसरो को भी ऐसा कुछ करने के लिए दबाव डालना चाहिए ।

     फेयरनेस क्रीम एक नस्लवादी सोच 

September 26, 2012

ये किस पेड़ के पैसे से हो रहा छवि निर्माण --------------mangopeople



आज कल बड़े जोर शोर से सभी टीवी चैनलों पर भारत का निर्माण हो रहा है और इस निर्माण पर करोड़ो  रूपये खर्च कर रही है वो सरकार जो कहती है की उसके पास जनता को सब्सिडी देने के लिए पैसे नहीं है , अब कोई पुछे  की सरकार की छवि निर्माण के लिए किस पेड़ से पैसे आ रहे है ( उस पेड़ का नाम है आम जानता की जेब ), शायद राजनीति में सबक लेने की परम्परा नहीं है यदि होती तो मौजूदा सरकार पूर्व में इण्डिया शाइनिंग का हाल देख कर ये कदम नहीं उठाती | बचपन में नागरिक शास्त्र की किताब में पढ़ा था की किसी देश की सरकार का काम बस लोगों से टैक्स वसूलना और खर्च करना नहीं होता है उसका काम ये भी है की अपने देश में रह रहे गरीब ,असहाय लोगों को हर संभव मदद भी करना और उनके लिए जीवन की प्राथमिक जरूरतों को पुरा करना  , सब्सिडी उसी के तहत आती है ताकि गरीब लोगों तक भी उन सुविधाओ को पहुँचाया जा सके जो उनके बस में नहीं है , सरकार ये काम देश से आंकड़े जुटा कर करती है  किन्तु जब सरकार के आकडे ही सही नहीं है तो वो ठीक से योजनाए कैसे बनाएगी ,  ३२ रु रोज कमाने  वाले को गरीब ना मानने वाली सरकार भला गरीबो के लिए क्या करेगी | विश्व बैंक का दबाव है की सब्सिडी ख़त्म की जाये किन्तु समस्या सब्सिडी नहीं है समस्या ये है की सही लोगों को सब्सिडी नहीं मिल रही है | महंगाई को सबसे ज्यादा बढ़ाने का काम करता है डीजल की बढ़ती कीमते क्योकि डीजल की कीमत बढने के साथ ही सभी सामानों की माल ढुलाई का खर्च बढ़ता है और एक ही बार में सभी चीजो के दाम बढ़ जाते है |  प्रयास तो ये करना चाहिए था की डीजल की खपत कम किया जाये उसे केवल कुछ जरुरी कामो के लिए प्रयोग किया जाये ना की महँगी बड़ी गाडियों के लिए या बिजली के उत्पादन आदि के लिए , होना तो ये चाहिए था की बाजार में सभी डीजल गाडियों और एक के बाद एक आ रही बड़ी महँगी डीजल गाडियों पर बड़ा टैक्स लगाना जाये  ,( कुछ आर्थिक सलाहकारों ने यही राय दी थी किन्तु सरकार ने उसे माना नहीं क्यों वही बेहतर बता सकती है  )  इससे सरकार की आमदनी भी बढ़ती और लोग डीजल गाड़िया लेने से परहेज करते उसकी खपत कम होती और सरकार पर सब्सिडी का बोझ कम होता , इसी तरह डीजल के अन्य गैर जरुरी प्रयोगों को रोक कर सब्सिडी के बोझ को कम किया जा सकता था,  किन्तु सरकार ने बड़ी कार कंपनियों को नाराज करने के और महँगी गाड़िया खरीदने वालो पर टैक्स का बोझ डालने के बजाये एक आसान रास्ता अपनाया की डीजल की ही कीमत बढ़ा दिया जाये और पूरे देश को हर रूप में इसका बोझ सहने के लिए मजबूर किया जाये |
                                                   
                                                  यही काम उसने गैस पर दी जा रही सब्सिडी पर भी किया , कहने को वो सब्सिडी दे रही है किन्तु जिसे मिलना चाहिए उसे मिल ही नहीं रहा है | साल में  मुझे ६ सिलेंडरो की जरुरत होती है जो मौजूदा नियम के अनुसार मुझे सब्सिडी वाली मिल जाएगी किन्तु बेचारी मेरी गरीब काम वाली बाई जिसे साल में ९ से १२ सिलेंडर की जरुरत है उसे पूरी सब्सिडी नहीं मिल रही है , हाल में ही आर टी आई के जरिये पता चला की एक बड़े उधोगपति , सांसद जिन्हें कोल ब्लोक भी मिला था उन्हें साल में करीब ७०० से ऊपर सब्सिडी वाले सिलेंडर मिल रहे थे , इसे देख कर आप समझ सकते है की योजनाओ में कितनी गड़बड़ी है सब्सिडी असल में मिलना किसे चाहिए था और मिल किसे रही है, क्या कोई उद्योगपति सांसद या जिनकी आय साल में १० लाख रूपये से ऊपर है  इस लायक होता है की उसे एक भी सब्सिडी वाला सिलेन्डर मिले  , लेकिन  जो नियम अभी सरकार ने बनाया है इससे भी उन्हें ६ सब्सिडी वाले सिलेंडर तो मिलेंगे ही,  इस नियम से सिलेंडरो की कालाबाजारी ही ज्यादा होगी , साथ ही ये नियम कम से कम भारत जैसे देश में जहा संयुक्त परिवार की परम्परा है वहा के लिए तो बिल्कुल भी उपयुक्त नहीं है जहा माता पिता बच्चो के साथ ही रहते है , कुछ समय पहले पढ़ा था की अब से एक पते पर बस एक ही गैस कनेक्शन मिलेगा ये बड़े शहरों में एकल परिवारों के लिए तो ठीक है किन्तु छोटे शहरो और गांवो में जहा संयुक्त परिवार है या एक ही घर में कई भाई रहते है वहा  के लिए ये नियम कैसे ठीक होगा  |  समझ नहीं आता की सरकार में बैठे लोग जो नियम कानून बनाते है उन्हें भारतीय परिवेश रहन सहन की कोई भी जानकारी है भी या नहीं | एक टीवी चैनल पर सुना की सरकार कहती है की देश में २८ % लोग ही एल पी जी का प्रयोग करते है और जिसमे से आधे से ज्यादा  शहरी लोग है यदि ये खबर सही है तो आप अंदाजा लगा सकते है की सरकार के पास कितने गलत आंकड़े है और गलत आंकड़ो के साथ वो गलत नियम ही बनाएगी |
            
                                                                   नीति नियम बनाने वाले क्या, सरकार की प्राथमिकता तय करने वाले भी भारत के बारे में और उसकी प्राथमिकता के बारे में कितना जानते है उस पर भी शक होता है,  एक तरफ देश में एक के बाद एक राज्य में कुपोषण की खबरे हमें शर्मसार कर रही थी वही यु एन के रिपोर्ट ने तो हमें पाकिस्तान और अफ़्रीकी देशों से भी गया गुजरा बता दिया कुपोषण के मामले में , जहा सरकार की प्राथमिकता भूख कुपोषण से मर रहे लोगों तक भोजन पहुँचाने की होनी चाहिए थी वहा सरकार किराना में एफ डी आई  लाने के लिए अपनी  सरकार ही दांव पर लगाने के लिए तैयार थी |  सरकार के चिंता का विषय गरीब भूखे लोग नहीं बल्कि वो है जिन्हें कभी अपने खाने पीने की चिंता करने की जरुरत ही नहीं होती है और सरकार उनकी चिंता में मरी जा रही है ( असल में तो उन लोगों की भी चिंता नहीं है असल चिंता तो अमेरिकी कंपनिया उनके हित और अमेरिका में होने जा रहे राष्ट्रपति चुनाव है )   | वो सरकार जो खुद कई बार अपने किसानो को उनकी फसलो का ज्यादा दाम देने के बजाये विदेशो से सडा गला अनाज कई गुना महंगे दामो पर खरीद कर लाती है वो उम्मीद कर रही है की कोई विदेश कंपनी उनके किसानो को उचित दाम दे कर रातो रात अमीर बना देगी , मतलब गरीबी हटाओ का उनका नारा कोई विदेशी कंपनी पुरा करेगी , और वो अपना मुनाफा छोड़ कर ऐसा क्यों करेगी इसका जवाब तो सरकार ही दे सकती है | यदि किसानो के भले का तर्क देने वाले भारत के किसानी  का हाल देखते तो ऐसा नहीं कहते , शायद उन्हें पता नहीं है की गरीब वो किसान नहीं है जिनके पास सैकड़ो एकड़ जमीने होती है या जो आधुनिक खेती करते है जिनकी संख्या काफी कम है गरीब वो किसान है जिनके बस दो चार बीघा जमीन है और पैदावार बहुत कम जिनकी संख्या देश में लाखो है , पता नहीं ये वालमार्ट वाले कैसे एक एक छोटे किसान के पास सीधे जा कर उनसे माल खरीदेंगे जो आज तक हमारे भारतीय व्यापारी नहीं कर पाये वो भी सीधे खरीद कर ज्यादा माल कमा सकते थे | ये भी समझ नहीं आता की यदि रिटेल में एफ डी आई इतना ही भारतीय उपभोक्ता के लिए फायदे मंद है और वो महंगाई को जमीन पर ला देगी ( ये काम भी हमारी सरकार नहीं कर पाई वो तो बस तारीख पर तारीख देती रही और महंगाई बढ़ती रही उसके लिए भी आउट सोर्सिंग की जा रही है की २०१४ चुनावों  तक सस्ते माल बेच दो उसके बाद जो चाहे करते रहना कौन पूछने वाला है यहाँ ) तो फिर १० लाख लोगों वाले शहर तक की इसे क्यों सिमित किया जा रहा है इसे पूरे भारत में लागु करना चाहिए था,  केवल बड़े शहर ही क्यों सस्ते समान का लाभ ले , छोटे शहरो गांवो के लोगों को भी इसका फायदा मिलना चाहिए , साथ में जितना माल बेचेंगे उतना हमारे किसान खुशहाल होंगे ( जो वालमार्ट खुद अमेरिका में भी चीनी सस्ते समान बेचता है वो हमारे यहाँ हमारे लोगों से समान ले कर बेचेगा,  ३०% समान भारत से खरीदने की सर्त का क्या हाल होता है वो किस रूप में प्रयोग होता है वो भी दिख जायेगा ) |
                     
                                                                    जो सरकार लोकपाल, महिला आरक्षण  जैसे अनेको बिल को आम सहमती के नाम पर लटकाए रहती है वो इन मुद्दों पर आम सहमती बनाने की जरुरत नहीं समझती है बल्कि अपनी सरकार तक को दांव पर लगा देती है और रातो रात काम होता है नोटिफिकेशन जारी हो जाता है | यदि  सरकार देश से महंगाई , भ्रष्टाचार , कुपोषण आदि समस्याओ को ख़त्म करने की  इतनी इच्छा शक्ति दिखाती तो देश कहा से कहा पहुंचा गया होता | करीब १०-१२ साल पहले एक खबर पढ़ी थी की अमेरिका के एक कस्बे में वालमार्ट अपना स्टोर खोलना चाह रहा था, तो वहा के प्रशासन ने पहले लोगों से राय जानने के लिए इस मुद्दे पर वोटिंग कराई और ९०% लोगों ने स्टोर खोलने का विरोध किया और कहा की वो यहाँ के छोटे स्टोर चला रहे लोगों के हितो को अनदेखा नहीं कर सकते है , क्या भारत में कभी ऐसा हो सकता है , शायद कभी नहीं यहाँ तो हम एक बार वोट देने के बाद अपने हाथ और जबान कटवा लेते है ५ साल के लिए |

 प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को उनके  जन्मदिन पर ढेरो बधाई और अपने जन्मदिन के पहले ही वोट के बदले हम जैसो को रिटर्न गिफ्ट में इतना कुछ देने के लिए  धन्यवाद !



चलते चलते

               इधर सरकार ने सब्सिडी वाले गैस सिलेंडरो की संख्या कम की उधर बाजार में अचानक से राजमा , मटर, बैगन , गोभी की मांग आसमान छूने लगा , असल में लोगो ने महंगे सिलेंडरो को देखते हुए तय किया की वो बाकि के गैस का उत्पादन खुद कर लेंगे !

January 13, 2012

ये विज्ञापन जरुर देखिये ,यदि आप के भी राज्य में कोई चुनाव हो रहे है - - - - - mangopeople
















                                                              यदि आप के भी राज्य में कोई चुनाव हो रहे है तो ये विज्ञापन जरुर देखिये और जानिए अपने क्षेत्र से लड़ रहे चुनावी उम्मीदवारों  के बारे में और सोच समझ कर वोट करे | विज्ञापन जरुर देखे और सुविधा का प्रयोग  करे |