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June 20, 2011

काश होती मै लता मंगेशकर - - - - - mangopeople



                                                                       अचानक से कुछ महीनो से अपने लता मंगेशकर न होने क अफसोस हो रहा है, काश की मै भी लता जी जैसी कोई बड़ी सेलिब्रेटी होती, नहीं नहीं अचानक से मुझे गाने का शौक नहीं हुआ है असल में मै सोच रही थी की 
यदि होती मै लता मंगेशकर तो मै भी अपने घर की तरफ आने वाले हवा, पानी, धुप को रोकने वाली सारी बाधाओ  को अपनी ऊँची पहुँच और रुतबे का प्रयोग कर रोक लेती किन्तु मै ऐसा कुछ नहीं कर पा रही हूँ | लता जी ने तो एक बार धमकी दी की यदि उनके घर के आगे फ्लाई ओवर बना तो वो मुंबई ही छोड़ कर चली जायेंगी राज्य के मुख्यमंत्री तक से इस विषय में मिल आई और उनके सम्मान और सेहत को ध्यान में रखते हुए उस प्रोजेक्ट को रोक दिया गया | किन्तु मै आम आदमी हूँ मेरे और मेरे परिवार के सेहत की चिंता किसी नेता की किसी भी लिस्ट में नहीं आता है मरता है तो मरे हमें क्या ,जीता है तो हमें वोट दे नहीं तो जा कर कही मरे, बिगड़ती है उसकी सेहत तो बिगड़े हमें क्या |
                                      एक तो पहले से ही मै कंक्रीट के जंगल मुंबई में रहती हूँ जहा हरियाली कम और सीमेंट के बड़े बड़े पेड़ चारो तरफ उगते जा रहे है जो खुद एक दुसरे का भी और कुछ छोटे पौधा का भी हवा पानी धुप रोक रहे है उस पर से विकास के नाम पर चल रहे नए प्रोजेक्ट ने तो हमारा साँस लेना भी मुहाल कर रखा है | पिछले एक दो सालो से अचानक लगने लगा की जैसे गर्मी कुछ ज्यादा ही पड़ रही है अब हवा चलना बंद हो गया है, पश्चिम की तरफ हमारे बेडरूम की खिड़की से अब वैसी हवा नहीं आती जैसी की कुछ समय पहले तक आती थी | राज कुछ महीनो पहले पता चला जब एक दिन सुबह सुबह वो खिड़की खोली और सूरज की तेज रोशनी से आँखे चौंधिया गई | लगा ये भगवान क्या दुनिया ख़त्म होने का समय आ गया है सूरज पश्चिम से क्यों उग आया है | असल में सड़क के उस पार और ठीक हमारी खिड़की के सामने जो टावर खड़ा हो रहा था उस पर बड़े बड़े कांच लगा दिए गए थे जिससे सूरज की रोशनी टकरा कर सीधे हमारी खिड़की के अन्दर आ रहा था और तब पता चला की वही टावर हमारे घर आ रहे हवा को भी रोक रहा था | सड़क के उस पार एक पुरानी बंद पड़ी मिल थी और उसके बाद रेलवे ट्रैक था जिसके कारण दूर दूर तक खुली जगह थी जो बिना किसी बाधा के हमारे घर तक समन्दर से आने वाली हवा लाती थी साथ ही डूबते सूरज का सुन्दर नजारा भी दिखाता था जो उस टावर के खड़े होने के बाद बंद हो गई | वो टावर हमारे इलाके की शान बनता जा रहा है इस प्रचार के साथ की वो दक्षिण मुंबई का सबसे ऊँचा व्यवसायिक ईमारत  है और कोई हम लोगो से पूछे की वो इलाके का शान कैसे पुरे इलाके की हवा को रोका रहा है | मामला यही ख़त्म नहीं होता है मेरे लिविंग रूम की बड़ी खिड़की दक्षिण दिशा में खुलती है वहा पर मैंने ३० -३५ गमले लगा रखे है (पहले गार्डेन में गमले होते थे, मुंबई में तो गमलो में ही गार्डेन है ) वहा पर पौधो को तो अच्छी धुप लगती ही है साथ ही वो रास्ता है मेरे घर में धुप आने का ,किन्तु अब कुछ महीनो बाद उस धुप पर भी रोक लगने वाली है क्योकि हमारे घर के सामने से मोनो रेल का ट्रैक बनने जा रहा है जो हमरी मंजिल से ऊपर बनेगा | हम जो पहले ही दूसरी मंजिल पर रहते है सामने से गुजर रहे फ्लाई ओवर से त्रस्त थे ( शुक्र था की वो मुख्य रास्ता न हो कर बस दो मुख्य सड़को को जोड़ने वाला छोटा रास्ता ही था जहा सुबह शाम ही भीड़ होती थी ) अब हमारे सर पर से मोनो रेल गुजरने वाली है वो लगभग तीसरी मजिल तक बनेगा | मोनो रेल दिल्ली की मैट्रो की तरह ही ब्रिज बना कर उस पर चलाया जायेगा | ये प्रोजेक्ट हमसे हमारी धुप ही नहीं छिनेगा बल्कि बरसात में मिलने वाला नजारा और मेरे पौधो को मिलने वाला बरसाती पानी भी रोकेगा जो बरसात के दिनों में उन्हें मिलता है |
                                                             किसानी के जमीन की और किसानो की , कटते जंगल की वहा रहते आदिवासियों की ,  पर्यावरण को हो रहे नुकशान की सभी को चिंता है आन्दोलन हो रहे है किसानो के हक़ में उद्योगपतियों को भगाया जा रहा है आदिवासियों के लिए आन्दोलन हो रहे है जंगल बचाने के लिए आन्दोलन हो रहे है | पर हम शहरो में रहने वाले मध्यमवर्ग के हवा पानी धुप को जो रोका जा रहा है उसकी सेहत के साथ जो खिलवाड़ हो रहा है उसकी चिंता किसी को नहीं है न केंद्र सरकारों को न राज्य सरकारों को ( कम्बखत दोनों जगह तो एक ही सरकार है तो किसको हमारी चिंता होगी, उड़ीसा ,पश्चिम बंगाल, यु पी की तरह अलग अलग सरकारे होती तो बात कुछ बन सकती थी )  न यहाँ के समाज सेवको को ( मेधा पाटेकर तो उड़ीसा जा रही है कभी हम लोगो का दर्द भी देख लेती ) अब हमारे लिए कौन आन्दोलन करेगा क्योकि हम लता मंगेशकर तो है नहीं जो अकेले कुछ कहे ( मिल कर भी कहे तो कौन सुनने वाला है ) और कोई सुन ले या यहाँ से जाने की धमकी दे तो कई सुन लेगा ( ये तो गलती से भी नहीं कह सकती, यहाँ तो पहले से ही एक नहीं दो पार्टिया हमें भागने में लगी है कह दिया तो जरुर घर तक आ जाएँगी हमारी मदद के लिए सामान बंधवा कर स्टेशन तक छोड़ने के लिए ) | फिर आन्दोलन करे भी तो क्या करे हमारे पास जमीन तो है नहीं जिसके जाने का नाम ले कर लड़े,  हम तो हवा में लटक रहे है न जमीन अपनी है न तो छत अकेले हमारी है और लड़े तो हवा पानी धुप के लिए कितने लोग साथ देंगे और हमारी सुनेगा कौन | हा ये हो सकता है की साथ देने कोई नहीं आये किन्तु आवाजाही की परेशानी झेल रहा एक बड़ा वर्ग हमारा विरोध करने जरुर चला आये |
  मोनो रेल के लिए हमारे घर के सामने खड़े तीन बड़े बड़े पेड़ काट दिए गये जो हमारे घर आने वाली हवा का दूसरा स्रोत था और हमारे घर के आगे से जब वो आगे दो किलीमीटर तक बढ़ता है तो पुरे रास्ते में जो पहले पूरी तरह से पेड़ो से भरा था और पुरे रास्ते को बारह महीने पड़ने वाली मुम्बईया गर्मी से राहत देता था को जड़ से काट दिया गया | फर्क कल नहीं आज से ही पता चल रहा है दिन पर दिन असनीय गर्मी बढ़ती जा रही है अब उस रास्ते पर चलना उतना आराम दायक सकून भरा नहीं रहा , जबकि पहले ऐसा नहीं था पेड़ो से भरा वो रास्ता न केवल सूरज की गर्मी जमीन पर कम कर देता था साथ ही अच्छी हवा भी देता था , जो अब हमें नहीं मिल रहा है उस पर से बीच में ब्रिज बनने रास्ते के सकरे होने के कारण होने वाला ट्रैफिक जाम हमारे लिए बोनस है | जो गाडियों के प्रेट्रोल की खपत और बढ़ा रहा है साथ ही और ज्यादा  धुँआ और ज्यादा शोर की जगह भी बनता जा रहा है | सिर्फ एक दो सालो में ये पूरा क्षेत्र विकास के नाम पर पर्यावरण पुरे वातावरण की बलि चढ़ा चूका है और लोग खुश है की विकास हो रहा है |
                                                                            किन्तु सभी को इससे परेशानी नहीं है कुछ लोगो का नजरिया हमसे बिलकुल अलग है वो हमें मोनो रेल बनने और पुरे क्षेत्र में खड़े हो रहे बड़े बड़े कंक्रीट के जंगलो के लिए बधाई देते है की आप का एरिया तो काफी विकास कर रहा है मोनो रेल के आने से तो आप के घर की कीमत तो और भी बढ़ जायेगी ( जो पहले से ही आसमान पर है ) | आप को कही भी आने जाने के लिए और भी आराम हो जायेगा मुंबई को जोड़ने वाली तीनो लाइने आप के घर के दरवाजे पर होगी ( जिसका प्रयोग हम कभी कादर ही करते है शायद इसीलिए हमारा नजरिया दूसरो से अलग है ) | जबकि हमें अब लगने लगा है जैसे कुछ ही दिनों बाद हमें लगेगा की हम किसी स्लम में रह रहे है सामने ओवर ब्रिज ऊपर मोनो रेल आस पास तीन रेलवे स्टेशन , फिर शोर, भीड़, धुल, गर्मी, तो बोनस में हमें और मिलने ही वाले है |
                                         ये सब हमारे ही क्षेत्र में नहीं हो रहा है ये तो पुरे मुंबई का हाल है | कहने के लिए तो संजय गाँधी नेशनल पार्क मुंबई का सबसे बड़ा हरित क्षेत्र है किन्तु अब ये धीरे धीरे सिकुड़ता जा रहा है लोग नेशनल पार्क को काट काट कर घर बनाते जा रहे है और कुछ तो उनके अन्दर ही पूरी बस्ती बना कर रह रहे है | अब सुना है की सी लिंक परियोजना बंद कर दी जायेगी क्योकि ये महंगा पड रहा है अब उसकी जगह समुन्द्र के किनारों को पाट कर समुन्द्र के किनारे किनारे एक सड़क का निर्माण किया जायेगा | जबकि कई बार समुन्द्र को इस तरह पाटने को लेकर विरोध किया जा चूका है और इससे होने वाले नुकशान को भी बताया जा चूका है पर सुनने वाला कोई नहीं है, तब भी नहीं जब ये मुंबई कुछ साल पहले २६ जुलाई को आई बाढ़ की भयानकता को झेल चूका है जिसके लिए एक बड़ी वजह यहाँ पर बह रही मीठी नदी को पाट कर बिलकुल गायब कर देना भी था ( तभी से मीठी नदी भी गंगा बन चुकी है उसकी सफाई और रख रखाव के नाम पर करोडो हजम हो चुके है पर नदी अब भी वैसी की वैसी ही है जैसे की गंगा के गन्दगी कभी साफ नहीं हुई करोडो रुपये जरुर सरकारी तिजोरी से साफ हो गये ) |
                              ऐसा नहीं है की विकास बिना पर्यावरण को नुकशान पहुचाये हो ही नहीं सकता है किन्तु उसके लिए शायद ज्यादा दिमाग और पैसे खर्च करने पड़े जिसका काफी टोटा है हमारे देश में | नीति निर्माता हर प्रोजेक्ट वर्तमान देख कर बना रहे है भविष्य के बारे में कोई कुछ भी सोचने के लिए तैयार नहीं है और न ही इस अंधाधुंध होने वाले विकास के नाम के बर्बादी के बारे में | सभी हर मुश्किल का फौरी इलाज कर रहे है और इस इलाज से होने वाले साइड इफेक्ट के बारे में कोई भी सोचने के लिए तैयार नहीं है सभी का रवैया वही है तब की तब देख ली जाएगी या तब फिर उसके लिए भी कोई फौरी नीति बना ली जायेगी | इन सब से सबसे ज्यादा नुकशान किसे होगा शायद हमारे बच्चो को जो अभी अपने शारीरिक मानसिक विकास के दौर से गुजर रहे है पता नहीं उन पर क्या असर हो रहा है | बड़ो में दिन पर दिन बढ़ता चिडचिडापन गुस्सा तो हमें दिख रहा है पर बच्चो पर क्या असर हो रहा है हमें नहीं पता क्या पता जब तक हमें पता चले तब तक सब कुछ हमारे हाथ से जा चूका हो और हम सिवाय पछताने के उस समय कुछ न कर पाये |
      
 चलते चलते 
             पेड़ लगाओ पेड़ लगाओ का नारा दिया जा रहा है | करोडो रुपये का हर साल वृक्षा रोपण होता है लोगो से अपील की जाती है की तोहफे में पेड़ दे अपने आस पास पेड़ लगाये पर समझ नहीं आता की पेड़ लगाये कहा पर घर की छत पर या बीच रास्ते पर शहरों में पेड़ लागने के लिए भी जगह कहा है | मुंबई में तो कुत्ता भी अपनी पूंछ दाये बाये नहीं ऊपर निचे हिलाता है |