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November 19, 2019

शहरों में जंगल के वासी ------mangopeople



                                      हाथियों के लिए ये जगह स्वर्ग की तरह हैं | ये सर्कस नहीं हैं जहाँ सारे दिन उनसे  मेहनत करवाई जाए , छोटे से पिंजरे में रखा जाए और ठीक से खाना भी ना दिया जाए | इतने खुले में रहतें हैं , बस इतनी सी दुरी में यात्रियों को घूमाते हैं फिर सारा दिन आराम और भरपूर खाना | वो बहुत आराम से यहाँ रहते हैं |
                                     हमारे आगे हाथी की सवारी करने के लिए खड़े लोगों को कर्मचारी समझा रहा था | हम और भाई दोनों इस पर मुस्करा पड़े और बोले हाथियों के पैरो में पड़ी लोहे की जंजीर बता रही हैं कि ये स्वर्ग हैं | मेरी बारी आतें ही मैंने पूछा , कितने हाथी हैं यहाँ , ज्यादातर तो हथिनी दिख रहीं हैं | तो बोल पड़ा एक भी हाथी नहीं हैं सब हथिनियाँ ही हैं | हाथी को संभालना एक मुश्किल काम हैं और वो सुरक्षित भी नहीं होते | केरल एक पारंपरिक लोगों की जगह हैं इसलिए मैंने पूरा संभलते हुए पूछा  यहाँ एक भी बच्चे नहीं दिख रहें हैं तो क्या आप इन सबकी शादी  नहीं करातें | मेरी इस बात पर वो केवल मुस्करा दिया | लेकिन हम यहीं नहीं रुकने वाले थे हमने जारी रखा , ये तो गलत बात हैं और बिलकुल भी प्राकृतिक नहीं हैं | हर मादा जीव  को जन्म देने और माँ बनने का अधिकार हैं आप इन सभी को इससे दूर रख रहें हैं |
उसके पास जवाब नहीं था वो बस मुस्कराता रहा | मुझे पूरा विश्वास हैं कि  उसे स्वर्ग और नर्क का अंतर तब भी नहीं समझ आया होगा और ना मेरी कही बात का मतलब | 
                                 अगले दिन जब हथिनियों को नहलाने के लिए  दुबारा गए तो उसके महावत से भी मैंने ये शिकायत की जवाब उसके पास भी नहीं था | अब लग रहा हैं , मुझे ये बात वहां की विजिटर डायरी में लिख देना चाहिए था शायद मैनेजमेंट को कुछ समझ आती , खैर |

                                मनुष्य पशुओं को कब से पालतू बना रहा हैं पता नहीं और किन पशु पक्षियों को पालतू बनाना चाहिए और किनको नहीं इस पर बड़ा कन्फ्यूजन हैं | मेनका गाँधी ने कहा खरगोश पालतू नहीं हैं उन्हें ना पाले , हमने पाला था , तोते , कुत्ता , बंदर , सब पाले थे | अब तो लोगों को शेर बाघ तक पालते देखतीं हूँ और उन खूंखार जानवरों का अपने मालिकों के प्रति अपार प्रेम भी देखा हैं | ऐसी पंक्षी भी देखें हैं जो पिंजरे में रहते ही नहीं आराम से पूरा घर घूमते हैं और उड़ कर नहीं जाते | जानवर कोई भी हो पालने वाले और पलने वाले  का आपसी  प्रेम देख ये कहना मुश्किल हो जाता हैं कई बात कि उस पर अत्याचार हो रहा हैं |

                           अगले दिन जब सुबह सुबह उस जगह गए तो सभी महावत अपने अपने हथिनियों को खूब मेहनत से रगड़ रगड़ नहला रहें थे और पाइपों से पानी डाल उनको  मन भर तर कर रहें थे ,  कुछ खाना खिलाने में व्यस्त थे |  कुछ हथिनियां झूम रहीं थी , एक को ऊपर निचे  झूमता देख मैंने बिटिया से कहा जैसे ये कर रहीं हैं वैसा ही करो बिटिया ने किया लेकिन जैसे ही बिटिया ने अपने झूमने का तरीका बदल  दाएं बाएं झूमना शुरू किया  अचानक से हथिनी ने मेरी बिटिया का नक़ल करना शुरू कर दिया और उसकी तरह ही झूमने लग |  जाते समय  बच्चे जब उन्हें बाय बाय कहने लगे तो वो भी अपना सूंड हिला प्रतिक्रिया दे रहीं थी |  मुन्नार में रास्ते से गुजरते जंगली हाथी परिवार से भी मुलाकात हुई खाने पीने में व्यस्त थे , उन्हें दूर से ही निहारते रहें  |



November 07, 2019

घुमक्कड़ी और भोजन -------mangopeople



                                         ये बात तो हमेशा से पता थी कि  हम जैसे चाइनीज खाने वाले अगर चीन जा कर चाइनीज खाना खाये तो हमारे गले भी ना उतरेगा वो खाना | भारतीय चाइनीज खाना भारतीय स्वाद के अनुसार ढाल दिया गया हैं | उसी तरह ये भी पता था कि  कभी दक्षिण भारत जा कर इडली डोसा सांभर आदि खाया तो उसका स्वाद शायद ना भाये जैसा अपने यहाँ अच्छा लगता हैं | हमने दक्षिण भारतीय खाने को उत्तर भारतीय स्वाद में बदल रखा हैं |
                                         लेकिन शुक्र हैं जिस पहले होटल में कोच्चि से मुन्नार जाते रास्ते में केले के पत्ते पर केरला का भोजन सद्या खाया उसमे बहुत स्वाद था और सभी को पसंद भी आया | अनानास से बनी एक सब्जी खूब पसंद आई | चटनी में स्वाद था और गुड़ नारियल से बना खीर भी स्वादिष्ट था | लेकिन शंका थी कि ये होटल ख़ास टूरिस्टों के लिए था इसलिए इसके भोजन में उत्तर भारतीय स्वाद की मिलावट जरूर की गई होगी | शंका जल्द ही सही भी हो गई जब थेकड़ी , पेरियार में खाने बैठे और उसने पूछा केरल चावल या  प्लेन तो केरल के खाने के  अति उत्साह में बिना देखे कह दिया केरल का चावल दीजिये | लाई  जैसे मोटे मोटे और कुछ कुछ लालिमा लिए चावल को खाना  सच में आसान नहीं था | फिर उनकी सब्जियों और सांबर का स्वाद भी पसंद नहीं आया |
                                         नाश्ते में रोज ही इडली उत्पम ढोसा और कोई  उत्तर भारतीय खाने के विकल्प में से दक्षिण भारतीय ही खा रहें थे लेकिन पहला वाला छोड़ कर  कहीं का भी सांभर और रसम पसंद नहीं आया चाहे वो अच्छा होटल हो या सड़क पर कोई रेस्टुरेंट | हां ये था कि इडली उत्तपम आदि हमारे यहाँ के मुकाबले ज्यादा सॉफ्ट और स्वादिष्ट थे | होटल में नाश्ते में रोज वो केले से बना अलग अलग तरीके का मीठा पकवान रख रहा था | पहले दिन कैरेमल और मेवे के साथ रोस्टेड केले से बना कुछ मीठा रखा था ( नाम भूल गई ) वो बहुत पसंद आया लेकिन बाकी के दो दिन जो मीठा रखा गया उसमे  मजा ना आया | लाल वाले केले में लगा हमारी पसंद का स्वाद नहीं हैं | लेकिन नारियल को मिला कर बनाया पैन केक बहुत पसंद आया | उसमे सूखे नारियल और मेवें का स्टफिंग भी किया गया था | मीठे में तो बस हाथ लगा कुछ पसंद आया कुछ नहीं |
                                        कोवलम के समुन्द्र के किनारे में खोजते खोजते एक शाकाहारी रेस्टुरेंट में पुट्टु  मिला  पहले लगा कहीं सादा सा चावल और सांभर जैसा ना लगे , लेकिन चावल से बना भोजन ,  चावल का स्वाद नहीं दे रहा था बल्कि अपने आप में एक अच्छी अलग सी डिश लग रही थी | अप्पम बहुत खोजा नहीं मिला सब बोलते रहें कि दो दिन उसकी तैयारी में लगते हैं अभी नहीं मिलेगा | डोसा हर जगह उपलब्ध था और उसे जम कर खाया भी गया | बहुत कुछ खाया बहुत कुछ छूट भी गया , अभी तो बहुत सारी  जगह बची हैं अगली बार कसर पूरी कर ली जाएगी |
                                         बाकि मासांहारी में तो बीफ ,  डक , खरगोश जैसो के बारे में पहली बार अपने जीवन में , मेनू में पढ़ा | मुंबई में से मांशाहारी खाना परोसने वाले रेस्टुरेंट में चले जाते हैं कभी कभी और शाकाहारी खाते हैं | विश्वास रहता हैं कि कोई मिलावट नहीं होगी लेकिन पता नहीं क्यों वहां पर भरोसा ना हो रहा था | मुंबई की तरह जैन और मारवाड़ी लोग तो ना रहते थे ना वहां | लेकिन मेरी उम्मीदों से परे  वहां ढेर सारे मारवाड़ी , शुद्ध शाकाहारी भोजनालय मिल गए | कोवलम के उस समुन्द्र के किनारे भी जहाँ फिरंगी भरे पड़े थे और हर होटल के बाहर मछलियां सजा कर रखी गई थी , अपनी पसंद का चुन लीजिये वही पका कर खिलाएंगे |
                                     



पहले मुंबई का भी सांभर पसंद नहीं आता था लगता जो बात बनारस में हैं वो और कहाँ मिलेगी | अब सत्रह सालों में धीरे धीरे ये पसंद आने लगा हैं | कुछ चीजे खाते खाते ही पसंद आती हैं |