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May 31, 2022

रुदालियाँ

एक बार एक पति ने अपनी पत्नी से पूछा कि मैं मर जाओ तो क्या तुम बहुत रोओगी |  पत्नी बोली मैं तो रोने के लिए रुदाली बुला कर साथ में रोऊंगी |  पति ने परीक्षा लेने के लिए मरने का नाटक किया पत्नी ने अपने कहे के अनुसार रुदाली बुला ली | रुदाली से मोलभाव के बाद चार मक्के की रोटी और दो रुपये पर बात  तय हुयी | 


रुदाली रोते हुए बोली बहन तब से तवे पर रोटी चढ़ा दे बाद में इंतज़ार ना करना पड़े | पत्नी रोते बोली मैं कही भागे ना जा रही पहले अपना काम ठीक कर फिर रोटी बनाउंगी | रुदाली रोते बोली बहन भूख लगी हैं रोटी तवे पर चढ़ा देगी तो चार रोटियां बनते बनते मेरा काम ख़त्म हो जायेगा | 


पत्नी रोते रोते रोटियां तवे पर डाल महंगाई का रोना रोने लगी कि उसके  दो रुपये जा रहे  हैं | रुदाली रोने लगी ये तो तवे पर रोटी रख चली आयी मेरी रोटियां जल रही हैं | मरने का नाटक करता पति सोच रहा हैं दोनों अपने अपने लिए रो रही हैं मेरे लिए यहाँ कौन रो रहा हैं | 


इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि आजादी के बाद अभी तक इरादतन स्वतंत्रता संग्राम के बहुत से सिपाहियों शहीदों को इरादतन याद नहीं किया गया ,उन्हें भुला दिया गया , नयी पीढ़ी को उनके बारे में जानने नहीं दिया गया | ये काम किया गया  ताकि स्वतंत्रता संग्राम में कुछ  ख़ास लोगों , परिवारों की भूमिका को  चढ़ा कर दिखाया जाए और उन्हें ही एक मात्र और असली हीरो बता उसका राजनैतिक फायदा उठाया जा सके | 


सालों बाद अब सत्ता में दूसरी विचारधारा  का मजबूत आगमन हुआ और फिर उन्होंने इरादतन उन भूले बिसरे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों और शहीदों को याद करना , चर्चा के केंद्र में लाना शुरू किया ताकि पहले से फोकस में रहे लोगो को नीचा दिखा सके उन्हें कमतर बता कर राजनैतिक फायदा उठा सके | 


बीते सुभाषचंद्र की  जयंती पर एक विचारधारा ने सुभाषचंद्र बोस को याद किया कि वो देश के पहले प्रधानमंत्री थे ताकि पहले प्रधानमंत्री के रूप  में नेहरू को कमतर किया जा सके | दूसरे ने ये बताते याद किया कि बोस ने तुम्हारी विचारधारा वालो को गालियां दी थी उनसे नफ़रत करते थे  उन पर बैन की मांग की थी | 


लगभग हर स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को याद करते हुए इसी क्रम को दोहराया जाता हैं | 


बेचारे बोस बाबू या अन्य कोई भी स्वतंत्रत सेनानी आज जहाँ होंगे वहां सोच रहें होंगे कि क्या  देश के स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में हमारी  बस ये भूमिका थी |  अपने पुरे जीवन सबसे महत्वपूर्ण काम बस ये किया था , क्या मेरे देश की जनता मुझे बस इस भूमिका के लिए याद रखना चाहती हैं |  मेरी शहादत का बदला ऐसे चुकाया जायेगा मुझे याद करने के नाम पर एक दूसरे को नीचा दिखाने का काम किया जायेगा | 


अरे रुदालियों तुम सब अपने अपने लिए रो रहें हो हमें  कौन याद कर रहा हैं | यही सब करना हैं तो इससे अच्छा हमें  मत ही याद रखो , ये सब करने से हमें  भुला देना बेहतर हैं | 

May 22, 2022

गोडसे दिवस

हम  छोटे से बड़े हो गए और सिर्फ इतना समझा पढ़ा और जाना था कि गाँधी को किसी गोडसे नाम के सिरफिरे हत्यारे ने गोली मार दी थी | उससे ज्यादा ना कभी बताया पढ़ाया गया और ना किसी की भी इच्छा हुयी जानने की कि  हत्यारा गोडसे क्या था क्या सोचता था | 


कहते हैं हमारी संस्कृति में अपराधी का नाम लिखने की मनाही थी | तर्क ये था कि जब अपराधी के बारे में उसके जीवन , सोच विचार आदि के बारे में ज्यादा लिखा बोला जाता हैं तो उसके जैसे विचार वालो उभर  कर सामने आते हैं | उसके समर्थक उसके अपराध को दूसरे तरीको से पेश करते है और जनता के बीच सहनभूति पाने के लिए उसके अपराध  को न्याय की तरह पेश करने का प्रयास करते हैं |   दुनियां में हर ख़राब से ख़राब विचार के भी समर्थक मिल जायेंगे | 


सालो तक इसलिए गोडसे एक मामूली अपराधी बन कर ही देश  में रहा  | लेकिन सत्ता , शक्ति और गद्दी से तथाकथित  सांप्रदायिक ताकतों को दूर रखने के नाम पर गोडसे का नाम बार बार आरएसएस से जोड़ गया ताकि  उससे जुडी बीजेपी को  गाँधी की हत्या के लिए कटघरे में खड़ा किया जा सके | अपने राजनैतिक स्वार्थो को पूरा करने के लिए खूब गाँधी और उनके हत्यारे गोडसे के नाम का प्रयोग हुआ | 


इस चक्कर में बार बार इतनी बार उसका नाम लिया गया उसके हिंदूवादी  विचारों पर इतना बोला बतियाया गया  |  उसके सोच , विचारो आदि पर इतनी बहस हुयी   कि गोडसे मामूली सिरफिरे हत्यारे से एक पढ़ा लिखा समझदार , सिद्धांतवादी  और विचार रखने वाला विद्वान बनने लगा  |  वो मामूली हत्यारे से एक वैचारिक विरोधी , अपराधी बन गया | 


अब आप भले  उसके विचार और सोच को ख़राब , सांप्रदायिक अगैरा वगैरा  कहते रहें | लेकिन उसके  जैसी सोच वालो को उभरने का उसके बारे में बात करने का और अपने  जैसे लोगों के बीच उसे हीरो बना के प्रस्तुत करने का मौका देने का पुनीत काम तो आज विपक्ष में बैठे लोगों और गाँधी के विचारो से दूर दूर तक रिश्ता ना रखने वाले  सिर्फ गाँधी का नाम रटने वालों ने ही किया | 


आप छः सात सालों से  देखिये सोशल मिडिया पर चाहे  गाँधी का जन्मदिवस हो या  उनकी पुण्यतिथि खुद को गाँधी के समर्थक कहने वाले भी गाँधी के बारे में कम गोडसे के बारे में ज्यादा लिखते बोलते हैं ताकि उसके नाम पर सत्ताधारी पार्टी  को गरिया सके   |  ये दो दिन ऐसा लगता हैं जैसे गाँधी नहीं गोडसे दिवस हो (गोडसे समर्थको की इसमें गिनती  मत कीजिये )  |  क्या वास्तव में ये दो दिन सिर्फ और सिर्फ गाँधी को याद नहीं किया जा सकता क्या अपने राजनैतिक स्वार्थ  को किनारे नहीं किया जा सकता हैं  | 


इन दो दिन को छोड़ दीजिए आप सिर्फ ये देखिये कि इन कुछ सालों में गोडसे के नाम और विरोध पर कितना कुछ उसके बारे में लिखा गया और अपनी किताबे बेच अपना नाम बनाया गया |  आप ये भी देखेंगे ऐसा करने वाले ज़्यदातर को गाँधी के विचार , सोच छू के भी नहीं निकलते  हैं |   


अगर कभी गाँधी को पढ़ा समझा हैं तो एक बार सोच कर देखिये कि अपराध से घृणा करो अपराधी से नहीं  कहने वाले गाँधी क्या कभी अपने प्रति किये हुए अपराध पर अपराधी के बारे में इतनी बाते करते  जितना आज उनके समर्थक कहे जाने वाले करते हैं   |  क्या वो भी गोडसे से इतनी ही नफरत घृणा करते | उसे भूल जाते ताकि सारी दुनियां उसे भूल जाए उसका नामोनिशां ना बचे |  


चाहे  आरएसएस हो बीजेपी हो या कोई भी हिंदूवादी पार्टी गोडसे से अपने रिश्ते ना होने की बात करती हैं या गाँधी को नमन करती हैं तो वास्तव में इसे गाँधी के विचारो और गाँधी की  जीत उनकी सफलता के रूप में पेश करने की जरुरत हैं | कि देखिये एक हत्यारा जिस विचारधारा के नाम पर गाँधी की हत्या कर देता हैं आज उसी विचारधारा ,  संगठन के लोग उसे अपना मानने से इंकार करते हैं गाँधी को समर्थन देते  हैं उन्हे सम्मान देने योग्य समझते  हैं | ये हैं गाँधी की ताकत ,  प्रभाव,  असर  लोगो पर देश पर  |  


अफसोस हैं लेकिन  गाँधी को मारने वाले गोडसे को गाँधी के तथाकथित गाँधी समर्थको  ने ही पुनर्जीवित करने का काम   किया हैं |

February 09, 2018

अपराधियों का विचारधाराकरण -------mangopeople





               
                                                   विचारधारा के इस कथित झगड़े में फायदा सरकार और विपक्ष के आलावा आजकल अपराधियों को भी हो रहा है | कोई नीजि दुश्मनी हो, खुन्नस हो ,चर्चा में आना हो , अपनी राजनीति चमकानी हो या कोई नीजि पूर्वाग्रह हो | अपराधी आराम से अपने अपराध को विचारधारा का चोला पहना अपराध कर लेता है और एक तबका खड़ा हो जाता है उसके बचाव में | कोई उसके कृत्य को सिर्फ अपराध मानता ही नहीं , सभी उसको एक वाद से जोड़ देते है और उसके तहत ही उसके अपराध पर चर्चा करते है | जो अपराध राज्य सरकारों के लिए कानून व्यवस्था का मसला बनना चाहिए था  वो विचारधारा के नाम पर हुए झगड़े बन ,  सरकारों को भी फायदा देते है | सरकार भी ऐसे आरोपों और चर्चा को बढ़ावा देती है ताकि वो जिम्मेदारी से बच सके |  कोई उससे ये न पूछे की राज्य की सुरक्षा व्यवस्था कानून की जिम्मेदारी उसकी है और ये चूक कैसे हुई | तब तो सरकारों के लिए और आसान हो जाता है जब किसी अपराध को विपक्ष की सोच से जोड़ दिया जाता है | फिर तो उसके लिए सुनहरा मौका होता है कि  वो उसे और जोरदार ढंग से प्रचारित करे जिसके किसी की भी उंगली उसके शासन की तरफ न उठे |  इसमें विपक्ष भी बराबरी का योगदान देता है , वो भी उसे अपराध न मान कानून व्यवस्था का मसला  नहीं उठाती | वह भी समयानुसार सिर्फ विचारधारा का नाम ही दे अपने लिए वोट का इंतजाम  करती है | विचारधारा उसकी सोच से मिलती हो तो अपराध का बचाव नहीं तो सरकार की सोच पर हल्ला |
                                       

                                                                                                   मामला अख़लाक़ का हो या अंकित का असल में तो इन्हे मात्र एक अपराध की नजर से देख राज्य सरकारों पर सवाल करना चाहिए कि राज्य में कानून का कितना राज है और अपराधियों पर कितना अंकुश | सवाल पुलिस विभाग से पूछा जाना चाहिए कि वो क्या कर रही है | ये मसले यदि अपराध की नजर से देखे जाते और सही सवाल समाज और विपक्ष की तरफ से उठाये जाते तो कोई भी तबका अपराधियों के साथ खड़ा न होता और न ही उसके बचाव में कुछ कह पाता | उसकी जाँच भी बिना किसी दबाव के सही तरीके से होती और सही अपराधी भी पकड़े जाते | ये विचारधारा का ही झगड़ा है कि कई बार अपराध कोई और कर जाता है और विचारधारा का नाम दे उसका रुख कही और मोड़ दिया जाता है जिससे जाँच करने वाली  एजेंसिया भी दबाव में आ कर या दबाव में गलत दिशा में अपराधियों को खोजने लगती है और असल हत्यारा आराम से बाहर घूम रहा होता है | एक आरटीआई कार्यकर्ता की हत्या के मामले में ये दिख भी चुका है कि लोगो ने उनकी हत्या को इतना ज्यादा एक सोच से जोड़ दिया की पुलिस को उनके करीबी हत्यारो को भी पकड़ने में समय लग गया | ये आज की तथकथित विचारधारा ही है कि समाज एक अपराधी के साथ खड़ा हो जाता है या अपराध को लेकर अगर मगर करता है और इस स्थिति के लिए समाज के दोनों ही तबके बराबर के जिम्मेदार है |



                           

                                           

November 01, 2017

शुद्ध राजनीति है विचारधारा का नाम न दे -----mangopeople


                                                                       बात कुछ साल पहले की है जब श्रीलंका और भारत के बीच एक समुंद्री संरचना को तोड़ने को लेकर खूब बवाल हुआ था | उस समय की सरकार उस संरचना को तोडना चाहती थी क्योकि वो संमुद्री आवागमन में एक बड़ी बाधा थी जहाजों को घूम कर आना जाना होता था | उसे तोड़ने से रास्ता छोटा होता और सरकार को बहुत आर्थिक फायदा होना था | तब की विपक्ष ने कहा कि वो एक धार्मिक संरचना है और राम से जुडी है उसे नहीं तोड़ने दिया जायेगा | मामला अदालत तक गया और सरकार ने राम के अस्तित्व पर ही सवाल खड़ा कर दिया | आम लोग भी दो भागो में बट गए , प्रगतिशील लोग सरकार के साथ खड़े हो गये और राम भक्त विपक्ष के साथ | बड़ी आसानी से सरकार और विपक्ष ने अपने वोट के लालच में एक बड़े पर्यावरण से जुड़े मुद्दे से लोगो का ध्यान पूरी तरह हटा कर उसे केवल धार्मिक मुद्दा बना दिया |
       
                                                                      पर्यावरण के नजर से वो कोई आम संरचना नहीं थी असल में वो लाखो सालो में बनी मूंगे की चट्टानें थी जो एक तरह से समुंद्र के अंदर का जंगल था और जलीय जीवन उस पर वैसे ही निर्भर थे जैसे कि हमारे दूसरे जंगल में जानवरो का जीवन उस पर निर्भर है | एक तरह से उन्हें तोड़ना एक पुरे जंगल को काटने जैसा था , जो उस स्थान के जलीय जीवन को पूरी तरह नष्ट कर देता | सरकार इस बात से अच्छे से जानती थी इसलिए उसने विपक्ष के भावनात्मक और धार्मिक मुद्दों को इतना उछाला की पर्यापरण का मुद्दा कभी सामने आ ही नहीं पाया | नतीजा जो प्रगतिशील समाज पर्यावरण आदि मुद्दों को लेकर बड़ा सजग दिखता है वो भी उस तरफ ध्यान न दे कर सरकार के साथ खड़ा था | दूसरी तरफ विपक्ष भी इन मुद्दों से अनिभिज्ञ नहीं था किन्तु उसने भी इन मुद्दों को नहीं उठाया | जबकि इस मुद्दे को उठा कर वो उस संरचना को बड़े आसानी से तोड़ने से बचा सकती थी और जागरूक लोगो को भी अपनी तरफ कर सकती थी किन्तु उसने ऐसा नहीं किया | क्योकि हमारे देश में पर्यावरण जैसे मुद्दे वोट नहीं दिलाते है जबकि धार्मिक भावनात्मक मुद्दे वोट दिलाते है जो राजनैतिक रूप से आप को मजबूत करते है |
                                                                    इसलिए विचारधारा के नाम पर आम लोगो को बहस करते और लड़ते देख लगता है कि कैसे सरकार और विपक्ष मुख्य मुद्दों से ध्यान हटा कर लोगो को विचारधारा के नाम पर मुर्ख बना लेती है |