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July 29, 2022

दुःख पीड़ा और बुद्ध

बचपन में बुद्ध को पढ़ते लगा , ये क्या तुक हुआ कि बच्चे को दुःख और पीड़ा से दूर रखो  ताकि भविष्य में वो संत ना बन जाए | अंत में वो बड़े होने पर सब  देख ही लिए और बड़े होने और ज्यादा  विचारणीय बुद्धि होने के कारण उस पर इतना विचार किये कि सब त्याग ही दिया | बचपन  से देखते रहते तो हमारी तरह सहज रहते इन सबसे | उनके परिवार ने गलत डिसीजन लिया  था | 


सालों बाद ये विचार बदल गया जब अपनी तीन साल की बिटिया का जन्मदिन एक अनाथाश्रम में मानने गए | आगे की पंक्ति में वहां सारे मेंटली चैलेन्ज बच्चे बैठे थे जिनमे से सभी के चेहरे और उनकी भाव भंगिमा बाकी बच्चो से अलग थी | एक बच्ची को तो   जन्म से सिर्फ एक आँख थी | बिटिया उन्हें ही ध्यान से देखती रहीं और घर आते पूछने लगी वो बच्चे ऐसे क्यों थे | 


उस दिन लगा बुद्ध का परिवार सही था हम अपने बच्चो को दुनिया का दुःख -दर्द , बीमारी , पीड़ा , समस्या बता कर दुखी नहीं करना चाहते | वो अभी उन सबसे दूर रहें तो बेहतर |  बस उस दिन तय हुआ अब हर जन्मदिन पर उनके पापा वहां जा कर फल बिस्किट पैसे दे कर आ जायेंगे  बिटिया नहीं जाएँगी |  


समय फिर बदला एक दिन बिटिया की एक पुरानी छोटी हो चुकी और उनकी फेवरेट फ्रॉक कामवाली को उनके सामने देने लगी | चार साल की बिटिया वो समझ नहीं पायी और उसके सामने ही अपनी फ्रॉक पकड़ रोने लगी कि मेरी हैं उन्हें क्यों दे रही  हो | उस समय किसी तरह उसे चुप करा दिया बाद में उन्हें समझाया कि जो हमारे प्रयोग की चीज नहीं हैं उन्हें उन लोगों  दे देना चाहिए जिनको उसकी जरुरत हैं लेकिन उनके पास नहीं हैं  | ना चाहते हुए भी गरीबी आभाव के बारे में बताना पड़ा |   हमारी  बात इतना ज्यादा समझ गयी कि एक दिन बोल पड़ी मेरा टूथब्रश फेको  मत उसे किसी को दे दो | फिर  एक और लेक्चर उस दिन देना पड़ा उन्हें  | 


छः साल की हुयी तो एक दिन स्कूल से आ कर बोली मेरी पुरानी कहानियों की किताब दे दो हमें डोनेट करना हैं | स्कूल में बड़े अच्छे से केयरिंग और शेयरिंग को समझाया गया था उन्हें , वो आ कर हमें समझाने लगी |  उसके बाद कैंसर पेशेंट के लिए कार्ड बनाना , चिल्ड्रन डे और दिवाली पर बनाये गए क्राफ्ट , सजावटी कंदील आदि भी कही जरुरतमंदो को स्कूल से भेजा गया और बच्चो को प्रोत्साहित किया गया | 

 छठी और सातवीं की उम्र तक बहुत कुछ समझ और सीख गयी थी | इस बीच वो किस्सा भी हुआ जो लिख चुकीं हूँ  जिसमे वो भूखे बच्चे को देख अपने खाना छोड़ने की आदत छोड़ी | 


आठवे जन्मदिन पर तय हुआ वो फिर से अपने जन्मदिन पर आश्रम जायेगी | इस बार हम एक बालिका आश्रम गए जहाँ बस लड़कियां रहती थी | जन्मदिन मना कर बाहर आये तो बोली ये लड़कियां हॉस्टल ( ये अंदाजा उन्होंने खुद लगा लिया ) में क्यों हैं अब तो गर्मी की छुट्टियां हैं अपने घर क्यों नहीं गयी | हमने सहज ही कह दिया इनके माँ बाप नहीं हैं ये यही रहती हैं इनका कोई दूसरा घर नहीं हैं | 

पूरी बात कहते कहते अपनी गलती समझ आ गयी थी वो अभी तक गरीबी समझती थी लेकिन अनाथ होना नहीं | ये बात उनका दिल तोड़ने वाली थी कि दुनियां में कुछ बच्चे ऐसे भी हैं जिनके माँ बाप और घर नहीं होते | वो आँखों में ढेर सारे आसूँ लिए हमारे सामने खड़ी थी | उस समय तो मैंने उन्हें बहला दिया कि लोग इन्हे गोद ले लेते हैं एक दिन इन्हे माँ बाप और घर मिल जाता हैं |  

घर आ कर इस बार विस्तार से एक दिन  बात किया  कि हम दुनियां में हो रही बहुत सारी चीजे को नहीं रोक सकते ये वो होती ही रहेंगी  | हम जो कर सकते हैं वो ये कि अपनी तरफ से जो हो सके उनकी मदद करें | लेकिन हम मदद भी सबकी नहीं कर सकते | इसलिए ये सब बहुत ख़राब हैं का अफसोस करने की जगह अपने हिस्से   का सहयोग करते रहन चाहिए | 


 जल्द ही बिटिया सबसे सहज हो गयी | उसके बाद भी बहुत सारी सच्चाइयां सामने आयी और उनके सवाल भी हुए लेकिन वो दुःख जताने की जगह इन्हे दूर कैसे करे हम क्या कर सकते हैं जैसा था | उस दिन बिटिया को नहीं सीख हमें मिली कि दुनियां की सच्चाइयों से हम कब तक बच्चो को बचायेंगे हमें उन सच्चाइयों को दिखाने समझाने का नजरियां बदलना चाहिए | 

उस दिन तय हुआ कि बुद्ध का परिवार गलत था | उन्हें दुःख पीड़ा बीमारी से दूर रखने जगह अगर उन्हें दूर करने में  अपने हिस्से का सहयोग कैसे करे का सीख देता तो वो अपनी शक्ति और  धन का त्याग करने की जगह उसका उपयोग लोगों की मदद में करते |  हां बस हम सब तब बुद्ध को वैसे याद नहीं करते जैसे आज करते हैं , शायद उन्हें जानते भी नहीं | 

October 11, 2011

जाने वाला चला गया , पीछे छोड़ गये का दुःख - - - - -mangopeople


                                                         दो साल पहले की ही बात है शायद २००९ की जब अखबार में एक खबर पढ़ी थी की चित्रा सिंह के पहले पति से हुई बेटी  ने आत्महत्या कर ली, पढ़ कर चित्रा सिंह के लिए बहुत दुःख हुआ ,  अपनी संतान खोने का ये दूसरा दुःख था उनके लिए | इसके पहले वो अपने बेटे को एक सड़क दुर्घटना में खो चुकी थी और वो दुःख इतना बड़ा था उनके लिए की उन्होंने गाना गाना ही छोड़ दिया | उसके बाद एक और संतान की फिर से आकाल मृत्यु एक माँ के लिए असहनीय जैसा होगा | इस बात से फर्क नहीं पड़ता की बच्चों की आयु क्या थी माँ के लिए उसके बच्चे बस बच्चे होते है |  पति देव से उनके दुख की चर्चा करते हुए कहा था की ये दुख उनके लिए बर्दाश्त करना  बड़ा मुश्किल होगा अब तो उनकी दोनों ही संताने चली गई , अब एक ही सहारा है उनके पास जीने के लिए जगजीत सिंह और अब जो दुःख जगजीत सिंह के इस तरह अचानक चले जाने से उन्हें हो रहा होगा हम उसका अंदाजा लगा सकते है |
                                                                       कुछ समय पहले लता जी के जन्मदिन पर उनका एक साक्षात्कार देखा जिसमे वो बता रही थी की संगीत के लिए अपने जुनून के कारण कभी उन्हें अपने अविवाहित होने को "मिस" नहीं किया | कहते है संगीत आप को कई दुखों परेशानियों और तनाव से बाहर निकालने का काम करता है किंतु चित्रा सिंह ने तो उससे ही परहेज का लिया था | मुझे लगता है की यदि वो गाना गा रही होती संगीत से जुड़ीं होती तो निश्चित रूप से वो उन्हें उनके दुख से बाहर निकालने का काम करता उन्हें जीने का हौसला देता किंतु उन्होंने उससे ही मुंह मोड़ लिया | देखा है मैंने कई बार महिलाओ को किसी क़रीबी अपने के जाने के बाद सारे सुख आनंद को त्याग करते और अपने दुखों को पालते हुए उन्हें अपने सिने से लगा हर समय जिंदा रखे हुए | मेरी परिचित थी उनका जवान विवाहित बेटे की दुर्घटना में मौत हो गई इधर बहु ने अपने सारे श्रृंगार त्यागा उधर उन्होंने भी सब त्याग दिया बस एक सिंदूर ही धारण करती थी | सब उनकी वाह वाह करते थे पर मुझे वो अच्छा नहीं लगता था लगा की जैसे वो अपने दुख को हर समय जिंदा और अपने सामने रखना चाहती है न केवल अपना बल्कि अपनी बहु और उसकी एक मात्र बेटी के भी दुखों को | क्या अच्छा ये नहीं होता की वो अपना क्या अपनी बहु का भी श्रृंगार त्यागने न देती बस सिंदूर और बिझिया जैसे विवाहित होने की निशानियो को ही छोड़ देती ,  उसे भी जीने का हौसला देती और अपने भी एकलौते पुत्र के मौत को भुलाने का प्रयास करती और पोती को भी एक खुश हाल जीवन देती | आखिर क्यों महिलाएँ अपने दुखों को संजो कर रखती है,  क्यों नहीं उसे छोड़ देती है |
 चित्रा सिंह ने भी  वही किया, किसी कलाकार के लिए उसका कला ही उसको सबसे ज्यादा आनंद देता है जो उसे दुनिया के तकलीफों परेशानियों से उबरता है उनसे दूर करता है और उन्होंने उससे ही छोड़ दिया | कभी सोचती हुं की जगजीत सिंह ने उनसे फिर से गाने को नहीं कहा होगा, शायद कहा होगा हो सकता है कई बार मनाया भी होगा,  पता नहीं वो मना नहीं पाए या वो मानना ही नहीं चाहती थी | पुरुष के साथ मजबूरी है कई बार अर्थोपार्जन की तो कई बार दुनियादारी की की वो दुःख को कुछ समय जीता है फिर उसके आगे निकल जाता है या उसे हर समय याद नहीं रखता दिल के कोने में छुपा कर रखता है | एक जगह चित्रा सिंह का साक्षात्कार पढ़ा जहा उन्होंने कहा की जगजीत सिंह का दुख भले न दिखता हो पर वो भी काफी दुखी थे बेटे के जाने से और कई बार रात में उठ कर रियाज़ करने लगते थे | वही संगीत उनका जुनून जिसने उनका साथ दिया उस दुःख तकलीफ़ से बाहर आने में उससे लड़ने में पर चित्र सिंह वो नहीं कर पाई या नहीं करना चाहा |
                                                 जिस दिन सुना की जगजीत सिंह ब्रेन हैमरेज के कारण अस्पताल में वेंटिलेटर पर है , ( ब्रेन हैमरेज और वेंटिलेटर इन दो शब्दों से अच्छे से परिचित हूँ दो अपनों को खोया है इन शब्दों के साथ )  समझ गई की अब वो वापस घर नहीं आयेंगे | उसी समय ज्यादा दुख चित्रा सिंह के लिए हो रहा था | दो दिन पहले ही अपनी एक रिश्ते की मौसी के दुखद मृत्यु की खबर मिली थी | पता चला की तीन महीने पहले ही मौसा जी की कैंसर से मृत्यु हो गई थी तब से ही बिलकुल मानसिक संतुलन खो बैठी थी खुद का कोई होश ही नहीं था अपनी आवश्यक जरूरते भी वो खुद से नहीं कर पा रही थी | कारण था मौसा जी से उनका बेहद लगाव क्योंकि दोनों लोगो को कोई संतान नहीं थी और जीवन में लगभग ५० वर्ष दोनों ने बस एक दूसरे के सहारे एक दूसरे के साथ जी कर ही बिताये थे | भाई के बच्चे को अपने बच्चे की तरह पाला किंतु बड़ा होते ही वो उन्हें छोड़ लड़ झगड़ अपने माँ बाप के पास चला गया | आ कर किसी ख़ुशी का चला जाना दुख को कई गुना बढ़ा देता है इस दुख ने दोनों को और भी करीब ला दिया था ,  दोनों में से किसी एक का जाना वही हाल करता जो अंत में मौसी का हुआ , वो तीन महीने भी उस दुःख को बर्दाश्त नहीं कर पाई | अपने आप को संभालने के लिए किसी को उन्होंने मौक ही नहीं दिया समय ही नहीं दिया |

                                                जाने वाला तो चला गया खुद को सभी तकलीफों तनावों से आज़ाद कर गया , किंतु  जिसे पीछे छोड़ गया है उसके दुख को सहने के लिए जो पहले ही जीवन से निराश हो चला हो उसके बारे में सोच एक चिंता सी होने लगती है | बार बार मन में ख्याल आ रहा है की क्या हालत होगी उनकी क्योंकि जगजीत सिंह की मृत्यु भी आकाल मृत्यु है , जिसके बारे में किसी ने सोचा भी नहीं था उनके लिए एक बड़ा झटका है | बस उम्मीद करती हूँ  की आज जो भी उनके आस पास होगा उन्हें अच्छे से हौसला दे रहा होगा इस दुख से उन्हें उबरने में मदद कर रहा होगा उन्हें अच्छे से संभाल रहा होगा |