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June 15, 2022

कोरोना वैक्सीन और भ्रष्टाचार


कोरोना काल  मे कोरोना वैक्सीन के साथ इतना बड़ा भ्रष्टाचार हो रहा था  कि विश्वास करना मुश्किल हो गया  |  सरकारी के साथ ही  नीजि अस्पतालों और ऑफिसेस में होने वाले वैक्सीनेशन सेंटर पर भी ये बड़ी  मात्रा में हो रहा था  | 


जब वैक्सीन का पहला डोज लिया था तो उस समय ध्यान नहीं दिया और पूछा भी नहीं लेकिन  दूसरा डोज लेने के बाद नर्स से इस बारे में  पूछा तो वो अजीब सी नज़रों से मुझे देखने लगी | 


 मैंने कहाँ मैंने बिना रोये वैक्सीन लगवा  हैं तो मेरा चॉकलेट कहाँ हैं |  नर्स ने ना  कोई जवाब दिया और ना चॉकलेट ही दिया | बचपन से देख रही हूँ , अपने नहीं बिटिया के बचपन से , कि वैक्सीन लगवाने के पहले डॉक्टर बोलती हैं रोना मत , अगर रोये नहीं तो चॉकलेट मिलेगी | जबकि उसके रोने के बाद भी चॉकलेट या कोई  गिफ्ट जैसे महकने वाला इरेजर , स्टाइल्स पैंसिल अगैरा वगैरा मिल ही जाती थी उसे | 


यहाँ तो हम जरा भी नहीं रोये और चॉकलेट पर भी  मान जाने वाले थे लेकिन कुछ मिला नहीं   मतलब नथिंग |  कौन खा  गया हमारे हिस्से की चॉकलेट , नेशन वांट टू नो |  ना माया मिली ना राम , ना खुदा ही मिला ना विसाले ए  सनम वाली हालत हो गयी अपनी | रोये भी नहीं और चॉकलेट भी  ना मिली इससे अच्छा तो भुक्का फाड़ के रो ही लेते | दो चार दस तो जरूर वैक्सीन सेंटर से भाग जाते कसम से  अगर रोना शुरू करती वैक्सीन लगते  | 


इस भ्रष्टाचार  से इतने तंग आये की जब सरकार  ने कहा तीसरा बूस्टर  डोज लगवा लिजिए  तो हमने कहा जब चॉकलेट  मिलनी नही तो काहे लगवाये , सो जाने  ही दिया । 

#फ्लैशबैक 




July 05, 2013

हमारे पैसे फिर भ्रष्टाचार के भेट चढ़ेंगे --------------- mangopeople



खाद्य सुरक्षा बिल को लेकर दुनिया जहान के आरोप प्रत्यारोप राजनितिक दलों द्वारा एक दुसरे पर लगाया जा रहा है  ,
 अभी तक सो रहे थे क्या ९ साल क्या किया ।
चुनावों के समय इसकी याद क्यों आई ।
ये खाद्य सुरक्षा बिल नहीं वोट सुरक्षा बिल है
ये गेम चेंजर योजना का एक और गेम है ।
इस गेम के बल पर हम २०१४ क्या १९ का भी चुनाव जित जायेंगे ।
अध्यादेश क्यों लाया जा रहा है ।
संसद में बहस क्यों नहीं हो रही है ।
विरोधी संसद चलने नहीं दे रहे है ।
आदि आदि न जाने कितने ही आरोपों को आप सुना चुके होंगे , यहाँ मै राजनितिक दलों  के आरोपों की नहीं बल्कि आप आदमी की बात करने वाली हूँ   । इसमे कोई दो राय नहीं है की जब देश में लोग भूख से मर रहे हो बच्चे कुपोषित हो तो ये सरकारों की जिम्मेदारी बनती है की वो इसे रोके और कम से कम लोगो को भूख से मरने जैसी हालातो को बदले । जब देश में अनाजो का इतना भण्डार है की वो खुले में पड़े सड रहे है तो उन्हें गरीबो को दे देने में कोई बुराई नहीं है और ये एक अच्छी योजना है । एक अच्छी योजना होने के बाद भी मै इस बिल का विरोध करती हूँ और मुझे इसका विरोध करने का हक़ भी है , क्योकि इस योजना को लागु करने के लिए सरकार ने कोई भी अन्य आय के साधनों को ईजाद नहीं किया है , न तो यहाँ कोयला खदानों , और न ही २ जी ३ जी स्पैक्ट्रम को बेच कर मिले पैसे से और न ही विदेशो और देश से मिले काले धन से और न ही अपने नीजि खर्चो में कटौती करके  इस योजना को चलाने वाली है , ये योजना उन्ही पैसो से चलेगी जो हम और आप टैक्स के रूप में सरकार को देते है ताकि वो हमें सुविधा दे सके , जो हमें मिलती नहीं है । इस लिहाज से जब कोई योजना हमारे दिए पैसो से चल रही है , तो हम देखे की उस योजना का क्रियान्वयन ठीक से हो और योजना अपने काम में सफल हो  ।
     
                                                       पीछे मुड़ कर देखे तो हमारे देश में भुखमरी और कुपोषण होना ही नहीं चाहिए था , सरकार मनरेगा योजना ( वो भी हमारे ही पैसो से चलता है ) के तहत गरीबो को साल में सौ दिन रोजगार की गारंटी देती है उसके बाद भी गरीब भूख से मर रहे है क्यों , बच्चो को स्कुलो में एक समय का मुफ्त खाना मिलता है मिड डे मिल के तहत , उसके बाद भी बच्चे कुपोषित है क्यों , आगनवाड़ी के तहत गर्भवती महिलाओ को भी खाने के लिए पैसे मिलते है फिर भी कुपोषित बच्चो का जन्म और कुपोषित माँ है और जच्चे और बच्चो की मौत का आकडा कम नहीं हो रहा है क्यों , साफ है की योजनाओ को ठीक से लागु नहीं किया जा रहा है , सारा पैसा भ्रष्टाचार की भेट चढ़ रहा है  । इस बात को खुद नेता मंत्री भी जानते है और मानते है,  राजीव ने भी कहा की १ रु निचे आते आते १५ पैसा बन जाता है और दो दशक के बाद उनका बेटा कहता है की १ रु निचे आते आते १० पैसा बन जाता है , दो दशको में ५ पैसा और भ्रष्टाचार की भेट चढ़ गया , समस्या को माना तो गया किन्तु उसे ठीक करने का,  व्यवस्था को सुधारने का कोई भी काम नहीं किया गया ।  यहा कांग्रेस हाय हाय का नारा लगाने की जरुरत नहीं है पिछले दो दशको में देश में हर पार्टी ने राज किया है किसे ने भी इस काम को नहीं किया है,  सभी के राज में एक एक पैसे का भ्रष्टाचार बढ़ा ही है और इसे बढाने में सभी ने बराबर का योगदान दिया है इसलिए यहाँ मै "सरकारे या सरकारों " लिखे रही हूँ और दोष किसी एक का नहीं पूरी राजनीतिक व्यवस्था का है ।
     
                                                  दूसरी समस्या है राशन के वितरण की , सरकारी राशन वितरण की जो व्यवस्था हमारे पास पहले से है वो दुनिया के सबसे बेकार और भ्रष्ट व्यवस्था में से एक है जो पहले की योजनाओ को ही ठीक से नहीं चला रहा है ।  सरकारी राशन की दुकानों पर आने वाला ज्यादातर राशन खुले बाजार में बेच दिया जाता है , आम गरीब लोगो तक उसकी पहुँच नहीं हो पाती है,  तो भूख से मर रहे लोगो तक उसकी पहुँच कैसे होगी  । नहीं मै  आप के मोहल्ले के राशन क दूकान की बात नहीं कर रही हूँ , वहा कोई भुखमरी का शिकार नहीं हो रहा है , मै उन सुदूर गांवो आदिवासी इलाको की बात कर रही हूँ जहा सरकारी राशन की दूकान वाला माई बाप जैसे व्यवहार करता है , छोटे शहरों में तो फिर भी लोग लड़ झगड़ कर दबाव बना कर अपनी जरुरत का राशन सस्ते में सरकारी राशन की दुकानो से ले लेते है , किन्तु ये सब कुछ छोटे छोटे गांवो में आदिवासी इलाको में नहीं हो पाता है , वो पूरी तरह से उस व्यक्ति के दया पर निर्भर होते है जिसके हाथ में अनाज वितरण का काम होता है  । बिना पुरानी सड़ चुकी व्यवस्था को ठीक किये आप भूखो तक खाना कैसे पहुंचा पाएंगे ।
          
                                                                    तीसरा मुद्दा है की लोगो का चयन कैसे होगा , ये कैसे तय होगा की किन लोगो को इसके तहत अनाज दिया जाये , जिस आधार कार्ड की बात आप कर रहे है , उस तक भिखारियों , सड़क पर रहने वाले , खानाबदोशो , अनाथ बेघरो , और दूर बिहड़ो में बसे गांवो और जंगलो में रह रहे आदिवासियों की पहुँच नहीं है , उन्हें तो ये भी पता नहीं होता की सरकारों की कोई ऐसी योजनाए है , वो उसका फायदा उठा सकते है , आधार कार्ड जैसी भी की चीज है ,  ये बनता कहा है और इसके लिए जरुरी कागजात कहा से लाये । सड़क पर भीख मांगने वाले और घूम घूम कर बंजारों की तरह रहने वाले कहा से कैसे और किस आधार पर अपना आधार कार्ड बनवायेगा । यहाँ भी भ्रष्टाचार व्याप्त है , बी पी एल कार्ड हो या मनरेगा का जॉब कार्ड हो इस तरह के सभी कार्ड धड़ल्ले से गलत लोगो के बनाये जाते है , या जिनके पास अधिकार होता है वो खुद झूठे कार्ड बनवा कर उसके फायदे खुद लेता है  । यही कारण है की सही लोगो तक सरकारी मदद नहीं पहुंच पाती है और हर रोज एक नए योजना का निर्माण किरना पड़ता है किन्तु हालत नहीं बदलते है ।
               
                                                           २००९ से सरकार इस पर काम कर रही है बात कर रही है किन्तु आभी तक कुछ जरुरी मुद्दों पर उसने ध्यान ही नहीं दिया जो इस योजना को ठीक से और चलाते रहने के लिए जरुरी था , सबसे पहले की इस योजना को चलाने के लिए पैसे कहा से आयेंगे अभी तो पैसे आवंटित कर दिए गए किन्तु ये कब तक चलेंगे उसके बाद इस योजना के लिए कोई आय का साधन निर्धारित नहीं किया गया है , नतीजा कुछ साल बाद पता चले की बढ़ता बजट घाटा , सरकारी खर्चो में कटौती , सब्सिडी में कटौती आदि आदि के नाम पर सबसे पहले इस तरह को योजनाओ को ही बंद कर दिया जाये , अनाज आज भी गोदामों के न होने के कारण खुले में सड़ रहा है , उस आनाज को बचाने के लिए कोई व्यवस्था नहीं की , इस तरह की योजनाओ को चलाने के लिए आनाज का उत्पादन भी बढ़ना चाहिए उसके लिए भी कोई व्यवस्था नहीं है , फिर वही होगा की विदेशो से महंगे दामो में सड़े  हुए अनाज दुनिया में ब्लैकलिस्टेड हो चुके कंपनियों से मंगा कर एक और घोटालो की योजना है , ये सब नहीं किया क्यों की पहले ही मन बना लिया है की ये सब चुनावों तक रहेगा फिर इस व्यवस्था को भी कैश पैसे देने में बदल दिया जाएगा , ये लो कैश पैसा अब इससे खाना खाओ या दारू में उडाओ हमें क्या , पैसा कैश लो और वोट हमें दो , और यही कारण है की संसद का सत्र सामने होने के बाद भी अध्यादेश लाया जा रहा है ताकि इस योजना को बाद में कैश के रूप में बदलने के प्रावधानों को संसद में बदला  न जा सके । भला हो कुछ टीवी कार्यक्रमों का जिससे हम आम लोगो को पता चलता है की हो क्या रहा है , कल बताया गया की यदि इस बिल को संसद में रख कर बहस कराया गया तो इस बिल में संसोधन की मांग हो सकती है और सरकार को मजबूरी में उसमे संसोधन करना पड़  सकता है ताकि बिल पास हो सके किन्तु यदि वो अध्यादेश लाती है और उसके बाद संसद में इस पर बहस करा कर पास करती है तब इस बिल में कोई भी संसोधन नहीं हो सकता है उसे वैसे ही पास करना होगा , और सरकार नहीं चाहती है की बाद में इस योजना को अनाज के बदले कैश देने की बात को बदला जाये, क्योकि उसे भूखो को खाना देने में कोई रूचि नहीं है वो बस किसी भी तरह इसे लागु कर वोट बैंक अपनी तरफ करना चाहती है ।  सरकारों का मतलब वोट तक है,  होना भी चाहिए वो सारे काम ही वोट के लिए करते है , राजनितिक दल है तो राजनीति ही करंगे इसमे कोई बुराई नहीं है  किन्तु जिन पैसो से आज अनाज खरीद कर गरीबो को दिया जाएगा ओर भविष्य में जो पैसे कैश दिए जायेंगे , वो हमारी मेहनत के होंगे हमारे दिए टैक्स के पैसे के होंगे इसलिए माननीय नेतागढ़ आप लोगो की इस योजना को ठीक से लागू करने की इच्छाशक्ति न होने के कारण मै इस योजना का विरोध करती हूँ और साफ मना करती हूँ की मेरे पैसो को एक और भ्रष्टाचार की भेट न चढ़ाये , जिस दिन लोगो को भूख से न मरने देने की इच्छाशक्ति आ जाएगी और सच में जमीनी रूप से योजना को ठीक से लागू करनी की सोच आ जाएगी उस दिन के लिए हमारे पैसे आप के पास सुरक्षित पड़े रहे तो ही अच्छा  ।

चलते चलते             
                                      क्या सरकारे, क्या नेता क्या आम लोग जब पैसो की बात आती है तो सभी एक हो कर उसे लुटने में लग जाते है , गरीबो के लिए मदद के नाम पर आम लोगो ने भी धंधा चला रखा है की अब तो एक पैसा भी दान देने की इच्छा नहीं होती है । केदारनाथ त्रासदी के बाद साधुओ ने मंदिर लुटा , आम खच्चर वालो और स्थानीय लोगो ने यात्रियों को लुटा,  वहा व्यवस्था करने के नाम पर सरकारी अधिकारी पहले ही सरकारी खजाना लुट चुके थे , त्रासदी के बाद नेता ने प्रचार लुटा , फिर राहत के नाम पर सरकारी खजानों की लुट शुरू हुई और आगे और होती रहेगी ,  किन्तु इसमे भी आम लोग पीछे नहीं रहे , अभी फेसबुक पर कुछ लोग सामने आये है जिन्होंने बाकायदा एयरफोर्स का लोगो लगा कर आम लोगो से दान देने की गुजारिश कर दी बाकायदा एकाउंट नंबर भी दिये गए , सेना की शिकायत पर उस पेज को बंद कर दिया गया जल्द वो पकडे भी जायेंगे , एक बेटा पकड़ा गया जिसके पिता ७ साल से गायब दे और उसने कहा की हाल में केदारनाथ से गायब हुए ,  , इतने दिनों बाद इलाहबाद में एक एक कर गंगा से  १५ लोगो के शव मिलने की खबर आ रही है जिसके लिए दावा किया जा रहा है की वो केदारनाथ से बह कर आये है , अभी और न जाने कितने जिन्दा लोगो और कितने पहले से मरे लोगो के केदारनाथ से गायब होने की खबरे आएँगी , और कुछ "बदनशीब" बैठ कर घरो में मातम मना रहे है की उन्होंने भी अपने माता पिता को चार धाम की यात्रा पर केदारनाथ ...............










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पहले ही .क्यों नहीं भेज दिया । 




October 12, 2012

सर नोचने के लिए अपने हाथ कम पड़े तो मदद लीजिये ------------mangopeople




1-करीब दशक भर पहले महाराष्ट्र सरकार ने मुंबई में एक बड़े बिल्डर समूह को जो महंगे बड़े आलिशान फ़्लैट बनाने के लिए जाना जाता है, उसे मुंबई के बाहर एक बेसकिमती जमीन दे दी ताकि गरीब और माध्यम वर्ग के लिए छोटे और उनके बजट में आने वाले फ़्लैट बनाये ( वो भी तब जबकि महाराष्ट्र में भी डी डी  ए  की तरह म्हाडा नाम का सरकारी विभाग है जो खुद भी लोगो के लिए सस्ते घर बनाता है ) नतीजा बिल्डर ने उस जमीन पर बड़े बड़े आलिशान फ़्लैट बना दिया ( ये भी आश्चर्य की बात है की नक्शा  पास हुआ एक पूरा टावर खड़ा हो गया और सरकार को कुछ भी पता नहीं चला ) खबर लगी हो हल्ला हुआ और सम्बंधित विभागों की तरफ से बिल्डर समूह पर पर हजारो करोड़ ( शायद 2 हजार करोड़ ) का जुर्माना  लगा दिया गया , किन्तु जल्द ही महाराष्ट्र के "पावरफुल" नेता की कृपा से ये हजार से सौ करोड़ ( 2 सौ करोड़ ) में बदल गया । मामला आज भी आदालत में है । बिल्डर और नेताओ का शानदार मजबूत गठजोड़ देखिये , कहा कहा से पकड़ियेगा जहा एक रास्ते बंद कीजिये दुसरे खोल देंगे ।

   2-   नोयडा मे गरीब किसानो की जमीन का अधिग्रहण करके उसे अमीरों को फार्म हॉउस के लिए दे दिया गया और नीलामी में कहा गया की वो किसान भी जिनसे सरकार ने 25 पैसे में इस जमीन को ख़रीदा था वो भी अपनी ही जमीन को अब सरकार से 1 रु में खरीद सकते है और वापस से खेती माफ़ कीजियेगा अंग्रेजी में फार्मिंग कर सकते है ।  सरकार और बाबु की शानदार नीतियों का,  सोच का और गरीब किसान की हालत का नजारा देखिये , जनता के लिए बनी सरकार के जमीन के दलाल बन जाने का नजारा देखिये ।


3- मुंबई में सैनिको की विधवाओ के लिए ईमारत बनने वाली थी 7 मंजिला,  जिस विभाग के पास वो क्लियरेंस के लिए जाती उसी विभाग के बाबु और मंत्री को एक फ़्लैट उपहार में मिला जाती और धीरे धीरे ईमारत की ऊंचाई आसमान छूने लगी सैनिक और उनकी विधवाए कही पीछे ही छुट गए , सामने की सड़क की चौड़ाई कम कर दी गई, बगल में बस डिपो की जमीन  भी इसमें मिला दी गई ताकि और ज्यादा बड़ी ईमारत बने और उनके विभागों के बड़े बाबु, मंत्री को भी घर दे दिए गए । हो हल्ला हुआ जाँच शुरू हुई तो अंत में बात ये आ गई की न तो जमीन सैनिको की थी न ईमारत सैनिको की विधवाओ के लिए बन रहे थे तो काहे का घोटाला । किस्सा सुना है , एक रेगिस्तान  में आदमी तंबू लगा कर सोया था रात को ऊंट ने कहा थोड़ी जगह दे दो उसने दे दी सुबह उठा तो देखा की वो तंबू से बाहर है और ऊंट तंबू में बैठा है ।

4-  किसानो से खेती लायक उपजाऊ जमीने ली जाती है क्योकि घरो की कमी है और लोगो के लिए घर बनाना है किन्तु वहा बनते है अमीरों के लिए फार्मूला वन रेस का ट्रैक , गोल्फ कोर्स  ( निजी रूप से इस दोनों के बनाने से मुझे कोई आपत्ति नहीं है किन्तु वो खेती की जमीन सस्ते में गरीब किसानो से लेकर न बने जाये करोडो कमाते है तो खुद बाजार भाव पर जमीने ख़रीदे और उस पर बनाये ) और बड़ी बड़ी शानदार हर आलिशान सुविधाओ से युक्त इमारते, जो बस अमीरों की पहुँच में होती है, गरीब तो छोडिये माध्यम उच्च वर्ग के बस की बात भी नहीं होती है , बना दी जाती है और सरकारे कहती है की सब कानून के अंतर्गत हुआ है सब जनहित है । इस जन को भी देखिये और  जनहित का नजारा भी देखिये ।

5-कोर्ट ने कहा की देश की प्राकृतिक और खनिज सम्पदा को यदि सरकार चाहे तो देश हित में किसी भी नीजि  पार्टी को दे सकती है ।( पूर्व कानून मंत्री ने  जेटली  जी ने कहा की जज दो तरह के होते है एक वो जो कानून को जानते है और एक वो जो कानून मंत्री को जानते है, मैंने कुछ नहीं कहा ) वो सरकार जो जमीन अधिग्रहण बिल को सालो से अपने अंटी में दबा के बैठी है ( शायद इंतजार कर रही है की जब सभी जमीनों का अधिग्रहण हो जायेगा तब ये बिल लायेंगे ) क्योकि वो अभी तक इस बात को भी परिभाषित नहीं कर पाई है की बिल में जनहित की परिभाषा क्या रखे,  क्या ऐसी सरकारे भरोसे के लायक है । मोटरसाइकिल पर बैठ का युवराज जब भट्टा पर्सौला गए जल्द कानून का निर्माण करने का आश्वासन दे कर हीरो बन गए पर ये हिरोगिरी अपने सरकार से क्यों नहीं दिखा पा रहे है ।


6-अस्पताल के लिए ली गई जमीन पर एक दसक तक अस्पताल नहीं बनता है किन्तु सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ता है,  फिर अस्पताल नहीं बना तो वो जमीन बिल्डर को दे देती है क्योकि उसे अधिकार है की वो जमीन का प्रयोग , बदल सकती है । बड़े अस्पतालों , स्कुलो कालेजो को कौड़ियो के दाम में  जमीने दे दी जाती है इस शर्त के साथ की वह गरीबो का इलाज और पढाई मुफ्त में होगी किन्तु वहा गरीबो के लिए कुछ नहीं होता और सरकारों को कई फर्क नहीं पड़ता है । क्या ऐसी सरकारों से हम उम्मीद करे की वो जनहित के बारे में सोचेंगी या इस बात को आगे भी लागु करवाएंगी की उनकी नीतियों से गरीबो का हित होता रहे । सरकारों का काम केवल नीतिया बना देना नहीं होता है उन्हें ठीक से लागु करवाना भी उन्ही का काम है ।

7-जरा सरकारी मुआवजे का भी हाल देखिये , किसानो को उनकी फसल बर्बाद होने पर 10 रु से लेकर 50 रु तक का मुआवजे का चेक दिया गया बेचारो को बैंक तक पहुँचने में ही 20 रु खर्च हो गए ( भुनाना जरुरी था क्योकि नहीं भुनाया तो अगली बार मुआवजा नहीं मिलेगा ) , टिहरी गांव जब डूबा तो लोगो को जमीन दी गई और मकान बनाने के लिए इतने कम रुपये ( 20 से 25 हजार रुपये दिए गए थे शायद ) दिए गए की उससे तो दो कमरों का ढ़ांचा भी खड़ा न होता , इंदिरा विकाश योजना में आज भी लगभग 20 हजार रुपये दिए जाते है लोन में घर बनाने के लिए (सरकारे खुद इतने में घर बना के दिखा दे )  । जमीन अधिग्रहण के लगभग हर केस में चाहे वो सेज, बांध , इमारते , सड़क आदि आदि किसी के नाम पर भी लिए गए, जमीने कौड़ियो के दाम में ख़रीदे गए और वह रहने खेती करने वालो को फिर से ठीक से बसाया नहीं गया स्थापित नहीं किया गया । गरीब के दो कौड़ी की औकत देखिये ।


8-करीब 50 हजार भूमिहीन मजदूरों ने मोर्चा निकला दिया और अंत में सरकार ने एक बार फिर उन्हें बेफकुफ़ बनाने हुए कहा की उनकी बाते मान ली गई है और लोगो को उनकी जरूरतों के हिसाब से घर खेती के लिए जमीने दी जाएँगी । क्या कहे एक तरह तो सरकारे किसानो से जमीने ले कर उन्हें भूमिहीन बना रही है दूसरी तरह वो भूमिहीन किसानो मजदूरो को जमीन देने का वादा  कर रहे है । संभव ये भी है की कल को  जंगल की जमीनों को इन्हें दे दिया जाये क्योकि गरीबो के नाम पर पर्यावरण मंत्रालय भी ज्यादा कुछ रोक नहीं पायेगा और मंजूरी आसानी से मिल जाएगी उसके बाद यही मजदुर जब उस जमीन को अपनी मेहनत से काम खेती के लायक बना देंगे तो उनका भी ऐसी ही अधिग्रहण कर लिया जायेगा,  बिलकुल वैसे ही जैसे राजनीति में पहुँच रखने वाला कोई किसी बिल्डर से लोन ले कर जमीन अपने नाम पर ले फिर उस जमीन का प्रयोग सरकार द्वारा बदलवाये जैसे खेती की या अस्पताल की जमीन पर ईमारत बनाने की इजाजत क्योकि बिल्डर के मुकाबले वो ये काम आसानी से और कम समय में करा सकता है और फिर उस जमीन को उसी बिल्डर को ऊँचे दाम पर बेच दे जिससे उसने लोन ले कर जमीन खरीदी थी । सत्ता में बैठी और उनके करीबी लोगो का तिकड़मी दिमाग देखिये ।


9-जो लोग ये सोच रहे है की ये एक दलीय कार्यक्रम है वो जान ले की ये घपले घोटाले भी अन्य  सभी घपले घोटाले की तरह ही सर्वदलीय है , इसमे सभी दल की सरकारे और लोग मिले हुए  है , और सभी इन कंपनियों से बराबर का रिश्ता रखती है और फायदा लेती है । जैसे अब खबर आ रही है की डी एल ऍफ़ को गुजरात में भी जमीने दी गई है बिना किसी नीलामी के,  वहां वही कांग्रेस हल्ला मचा रही है जो कहती है की हरियाणा में कुछ भी गलत नहीं हुआ  और ये रिश्ता भी आज का नहीं है जैसे डी  एल ऍफ़ का रिश्ता राजीव से बहुत ही घनिष्ठ रहा है और इस घनिष्ठता ने ही उसे इतना आगे बढाया था । रिश्तो के इस मजबूत और लम्बी जोड़ को देखिये ।


10-कल टीवी पर एक और खिजाने वाले केस के बारे में सुना की कर्नाटक टूरिज्म विभाग ने अपनी जरूरतों के लिए जमीन अधिग्रहित की जमीन लेने के बाद कहती है की उसके पास मुआवजे के लिए पैसे नहीं है ( लो कल्लो बात अंटी  में नहीं कौड़ी अम्मा भुनाने दौड़ी ) बाद में उसने कहा की एक दूसरी प्राइवेट पार्टी  है जो पैसे देने के लिए तैयार है बस एक छोटी सी शर्त है वो ये की ये सारी जमीने उसे देनी  होंगी हा हा हा हा हा हा हा हा सुकर  है की मामला कोर्ट में गया और कोर्ट ने विभाग की  अच्छी खबर ली और किसानो को न्याय दिया ।  टीवी पर ये सुन कर मैंने कहा की बिटिया रानी मेरे दो हाथ मेरा सर नोचने के लिए कम पड़  रहे है दो अपने भी लगाना , आप के अपने हाथ भी अपने सर नोचने के लिए कम पड़े तो मित्रो से मदद लीजिये और हमारी तरह ही कुछ न कर पाने की खीज में अपने खिजाने वाले किस्सों की एक पोस्ट बना दीजिये । 



चलते चलते 
       
              कहा जा रहा था की वालमार्ट आएगा तो भारत में रोजगार मिलेगा , अच्छा वेतन मिलेगा , काम   की सही सुविधा जनक जगह मिलेगी आदि आदि , अब सुना है की अमेरिका में वालमार्ट के कर्मचारी कम वेतन , काम के ज्यादा घंटे , सुविधाओ की कमी आदि आदि को लेकर हड़ताल पर चले गए है ।










October 13, 2011

विरोध के दो तरीके , हमला , और राजनीतिक चालबाजिया - - - - - -mangopeople



                                                             कल एन डी टीवी पर विनोद दुआ प्रशांत भूषण पर हुए हमले की निंदा करते हुए कह रहे हे की विरोध के ये तरीके गलत है आप दूसरों को विचार भिन्नता के कारण पीट नहीं सकते है विरोध के तरीकों का विरोध करते हुए उन्होंने अन्ना और बाबा राम देव की भूख हड़तालो को भी विरोध करने के तरीकों को गलत बताया और कहा की सरकारों पर भीड़ का दबाव डाल कर आप काम नहीं करा सकते है इस तरह से आप दूसरों से अपनी बात नहीं मनवा सकते है | 
                                                       
                                                                 प्रशांत भूषण क्या किसी पर भी वैचारिक भिन्नता के कारण इस तरह हमला करना गलत है |  दूसरे क्या किसी के किसी बयान से आहत हो कर उस पर हमला कर देना उसे सरे आम पीट देना और किसी कानून की मांग के लिए , भ्रष्टाचार के ख़ात्मे और भ्रष्ट व्यवस्था को बदलने के लिए आम जनता द्वारा किसी तरह का आन्दोलन करना या सत्याग्रह करना , सरकार पर दबाव डालने को हम क्या एक श्रेणी का विरोध कह सकते है | मुझे उनकी कोई भी बात समझ नहीं आई जनता के किसी शांतिपूर्ण आन्दोलन को विरोध का गलत तरीका बताना समझ से परे है | क्या ये बुद्धिजीवी टाईप के लोग बताएँगे की यदि जनता को किसी बात का विरोध करना हो तो उसे कौन से तरीके से करना चाहिए | हड़ताल , तोड़ फोड़ सड़क जाम जैसे तरीके गलत है हम सभी उसका विरोध करते है इससे सरकार के साथ आम आदमी को भी परेशानी होती है किंतु यदि किसी स्थान पर लोग शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे है सत्याग्रह कर रहे है तो उसमे क्या बुराई है, क्या जनता वोट दे कर सरकारें बदलने के अलावा कुछ भी नहीं कर सकती है,  वो भी करने के लिए उसे पञ्च साल का इतंजार करना होगा,  क्या तब तक उस सरकारों की हर ज़्यादती सहते रहना चाहिए और हाथ पर हाथ धरे चुपचाप बैठ कर अव्यवस्था को खुद को लुटता हुआ देखते रहना चाहिए | और तब क्या करना चाहिए जब सरकार बनाने वाली हर राजनीतिक पार्टी ही एक जैसी हो और सामान रूप से काम करती हो | तब तो जरुरत व्यवस्था परिवर्तन की ही आ जाती है और इसके लिए एक शांतिपूर्ण सत्याग्रह से अच्छा कौन सा तरीका हो सकता है | क्या उसे हम एक चर्चा के लिए भूखे असभ्य लोगो के हिंसक मार पीट के  तरीके से जोड़ सकते है बिल्कुल भी नहीं |  दुआ जी ये कहने का प्रयास कर रहे थे की जिस तरह अन्ना की टीम ने विरोध के गलत तरीक़े को अपनाया सरकार को ब्लैकमेल किया उस पर दबाव बना कर अपनी बात ज़बरदस्ती मनवाने का काम किया अब वही उनके साथ भी हो रहा है | उनसे भी दूसरे लोग ज़बरदस्ती अपनी बात मनवाने अपनी बात कहलवाने के लिए एक गलत तरीके का प्रयोग कर रहे है  जैसे के साथ तैसा हो रहा है | ऐसी बुद्धिजीवियों की सोच पर तरस ही खाया जा सकता है |
                                                         
                                                                  जहा तक बात प्रशांत भूषण के कश्मीर पर दिए बयान और उन पर हुए हमले की बात है तो ये राज तो अभी काफी अंदर है की पूरा मामला क्या है और शायद ही कभी बाहर आये | क्योंकि कहा नहीं जा सकता है की ये बस एक आम सी बात है या बिल्कुल सोच समझ कर की गई चालबाजी है ताकि अन्ना और उनकी टीम के मुद्दों से ध्यान हटा कर किसी और मुद्दे की तरफ लोगो का ध्यान खीचा जाये भ्रष्टाचार की जगह अन्य मुद्दों पर जनता को बहस करने के लिए मजबूर किया जाये  | ये बात किसी से ज्यादा छुपी नहीं है की प्रशांत भूषण की राय कश्मीर को ले कर क्या है वो अरूंधती के वकील भी है | ऐसे समय पर जब वो अन्ना टीम के बड़े सदस्यों में से एक है उनसे अन्ना के मुद्दे पर सवाल न करके कश्मीर के मसले पर सवाल किया गया क्या ये महज संयोग है ? ये सवाल उनसे ही क्यों किया गया अरविन्द , किरण आदि से ये सवाल क्यों नहीं किये गए ? प्रशांत ने कभी भी कश्मीर को पाकिस्तान को देने की बात नहीं कही किंतु हमलावर बार बार टीवी चैनलों से कह रहा था की उन्होंने कश्मीर पाकिस्तान को देने की बात की इसलिए उन पर हमला किया गया और वो अन्ना टीम के सदस्य है इसलिए ये बयान अन्ना का भी माना जाये या अन्ना से भी कश्मीर पर उनकी राय ली जाये | अन्ना को और उनकी टीम को जानबूझ कर कश्मीर से जोड़ा जा रहा है जिसका कोई मतलब ही नहीं है | 
             
                                                                         अन्ना टीम के कांग्रेस के विरोध में खड़े होने से पूरी कांग्रेस तिलमिलाई हुई है और उसे इसके पीछे आर आर एस , बीजेपी और कांग्रेस विरोधियों की चाल लग रही है और अन्ना टीम के साथ सबसे ज्यादा युवा शक्ति जुड़ीं है और ये सभी कश्मीर को लेकर बड़े संवेदनशील है और युवाओं को कश्मीर का नाम ले कर राष्ट्रवाद के नाम पर बड़ी आसानी से अन्ना टीम के खिलाफ भड़काया जा सकता है उनसे अलग किया जा सकता है | सरकार इस समय बुरी तरीके से भ्रष्टाचार के मुद्दे से घिरी हुई है एक तरफ अन्ना टीम है तो दूसरी तरफ अब तक सोई पड़ी हासिये पर जा चुकी विपक्ष है जो नींद से जाग गई है और मौके का फायदा उठाने के लिए अपने भाग्य से छिका टूटने का इंतजार कर रही है और हर तरफ से परेशान सरकार के लिए लोगो का ध्यान हटाने के लिए इससे अच्छा क्या मुद्दा होगा |
                                                                   इसलिए सभी से निवेदन है की दिखावे पर न जाये अपनी अक्ल लगाये बेकार के मुद्दों पर न उलझ जाये और न ही किसी के खिलाफ कुछ भी कहना शुरू कर दे अन्ना टीम का विरोध करने से पहले ये समझ ले की प्रशांत ने कल एक बात और कही थी की ये सिर्फ और सिर्फ उनका विचार है न की अन्ना टीम का और अन्ना टीम कश्मीर के लिए नहीं भ्रष्टाचार के लिए लड़ रही है और हमें उसी पर ध्यान केन्द्रित करना है |
                                         
                    जम्मू-कश्मीर को बल के ज़रिए देश में रखना हमारे लिए घातक होगा...देश की सारी जनता के लिए घातक होगा...सिर्फ वहां की जनता के लिए नहीं पूरे देश की जनता के हित में नहीं होगा...मेरी राय ये है कि हालात वहां नार्मलाइज़ करने चाहिए...आर्मी को वहां से हटा लेना चाहिए...आर्म्ड फोर्सेज़ स्पेशल पावर एक्ट को खत्म करना चाहिए...और कोशिश ये करनी चाहिए कि वहां की जनता हमारे साथ आए...अगर उसके बाद भी वो हमारे साथ नहीं है...अगर वहां की जनता फिर भी यही कहती है कि वो अलग होना चाहते हैं...मेरी राय ये है कि वहां जनमत संग्रह करा के उन्हें अलग होने देना चाहिए... खुशदीप  जी  के  ब्लॉग  से  लिया  बयान
                                   
                                                      प्रशांत भूषण का वो बयान जो उन्होंने वराणसी में दिया इसे हम इस तरीके से भी देख सकते है--- इस बयान में कभी भी कश्मीर को पाकिस्तान को देने की बात नहीं कही गई है   हा उन्हें आजाद करने की बात कही गई है किन्तु उसके पहले ताकत की जगह प्यार से उनके दिलो को जितने का प्रयास करने के लिए कहा गया उसके बाद भी यदि कश्मीरी अलग होना चाहे तो उन्हें अलग कर देने को कहा गया है वो भी इसलिए क्योकि ये कश्मीर के लिए ही नहीं पूरे देश के लिए घातक होता जा रहा है , वो भी तब जब जनमत संग्रह में बहुमत अलग होने का राय दे | और इस विषय में मेरी राय की हमें जनमत संग्रह की जरुरत ही नहीं है हमें आम लोगो के दिल जीत लेने तक काम करते ही जाना है कूटनीति से राजनीति करने वालो को हरा देना है उसके बाद किसी जनमत संग्रह की या उसे अलग करने की कोई बात ही नहीं बचेगी |


August 17, 2011

भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान में मेरा छोटा योगदान और आप ने कितना दिया - - - - - - - mangopeople

                                                     धार्मिक बातो और कहानियो में मेरी ज्यादा रूचि कभी नहीं रही है किन्तु किसी अच्छे काम में एक छोटा से छोटा योगदान का महत्व समझाती दो कहानिया सुन रखी है एक वो जिसमे एक छोटी सी गिलहरी कैसे राम सेतु बनाते समय उसके पत्थरो पर लगे रेत को अपने बदन में लपेट कर उसे साफ कर रही थी दूसरी कहानी जो इस्लाम धर्म से है जिसमे बताया गया की जब  धर्म युद्ध में आग लगी थी तो एक छोटी चिड़िया अपने चोंच में पानी भर कर वहा डाल उसे बुझाने का प्रयास कर रही थी किसी ने पूछ की क्या तुम्हारे इतने कम पानी से इतनी बड़ी आग बुझ जाएगी तो चिड़िया ने कहा हा पता है की नहीं बुझेगी पर कल को जब इतिहास लिख जायेगा तो लोगों को मेरे इस छोटे योगदान से पता होगा की मै किस तरफ थी  ( कहानी ठीक से याद नहीं है कुछ ऐसा ही ही ) | मतलब ये की आप का योगदान कितना छोटा है ये बात महत्व नहीं रखती है बस आप का कोई ना कोई योगदान होना चाहिए किसी ऐसे अच्छे काम में जिसका आप समर्थन करते है |
                                                         तो भ्रष्टाचार की इस लड़ाई में मैंने भी अपना छोटा सा योगदान दे दिया मेरे पास बस तीन घंटे थे जब तक बेटी स्कुल में थी तो वही तीन घंटे मैंने सड़क पर आ कर इस मुहीम में अपना समर्थन दे दिया |  मै एक आम सी गृहणी हूं और आम आदमी की तरह डरपोक भी हूं कल जब मै भी घर से भ्रष्टाचार की मुहीम में शामिल होने के लिए अकेले निकली तो थोडा अजीब भी लग रहा था और कुछ होने का डर भी किन्तु वहा जाने के बाद कुछ भी ना अजीब लगा ना डर वहा मेरी जैसी कई महिलाए थी जो अकेले ही वहा आई थी और मेरी तरह ही आम गृहणी थी | तो मेरा योगदान तो कल हो गया और आज और आने वाले कल भी होगा भले तीन घंटो का ही आप कितना समय दे रहे है इस भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए |




  ये है मेघा पाटेकर इनके झोपड़पट्टी के लिए चलाये जा रहे अभियान की कई बातो से मै सहमत नहीं हूं और इनका विरोध करती हूं पर कल इनके साथ थी क्योकि कल हम वहा सिर्फ भ्रष्टाचार के खिलाफ थे
                    



       ये भी मेरी तरह आम गृहणिया है जो अपने घरो में बच्चो को छोड़ कर आई थी तो कुछ कालेज में पढ़  रहे अपने बच्चो के साथ आई थी    
 
 
                                              

August 15, 2011

यदि आप को लगता है की आप आजाद है तो आप को आजादी के पर्व की शुभकामनाये- - - - - - - - -mangopeople

देश की आजादी के लिए कितनो ने अपने जीवन का बलिदान दिया हम इसकी सही गिनती नहीं कर सकते है उन्होंने बलिदान दिया ताकि देश आजाद हो सके देश की आने वाली पीढ़ी एक आजाद और बेहतर जीवन जी सके | हम में से ज्यादातर लोग उस स्वतंत्रता संग्राम में अपना कोई भी योगदान नहीं दे सके क्योकि हम तब वहा नहीं थे पर हमने उनके बलिदानों से मिली आजादी का खूब उपभोग किया और उसके उपभोग में इतने खो गये की कब हम भ्रष्टाचार के गुलाम हो गये हमें पता ही नहीं चला |  ६० साल से ऊपर हो गये हमें गुलाम होते अब समय आ गया है की हम फिर से एक नई आजादी की लड़ाई शुरू करे इस भ्रष्टाचार के खिलाफ , अभी और इसी समय क्योकि अब हम पहले से ज्यादा जागरुक है अब हमें दो सौ सालो तक सहने का इंतजार नहीं करना है और अभी उठ खड़ा होना है, ताकि हमारे बच्चे और उनका भविष्य बेहतर हो | आज हमारे  पास मौका है देश में चल रहे एक दूसरे स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने का, स्वतंत्रता भ्रष्टाचार से, फिर क्यों हम इस मौके को हाथ से जाने दे | बाहर आइये और साबित कीजिये की आप है और जिन्दा है और आप भी देश के लिए कुछ कर सकते है | कुछ कीजिये, किसी के समर्थन में नहीं बल्कि भ्रष्टाचार के खिलाफ, सरकारों तक बात पहुचाइए की अब आप से ये सब बर्दास्त नहीं होगा अब आप भ्रष्टाचार का साथ नहीं दे सकते है | ये लोकतंत्र के खिलाफ नहीं है ये संसद के खिलाफ भी नहीं है ये किसी एक राजनितिक दल के खिलाफ भी नहीं है ये बस और बस भ्रष्टाचार के खिलाफ है चाहे वो कोई भी कर रहा हो चाहे वो सरकार करे, नेता करे, मंत्री करे, नौकरशाह करे, आम जनता करे कोई भी करे सन्देश दीजिये अपने विरोध से की अब हम इसे नहीं सहेंगे और हम बदलाव के लिए तैयार है आज और अभी, अब हम हर पांच साल का इंतजार नहीं करेंगे अब हम खुद को पांच साल तक लुटता देख चुप नहीं रहेंगे कि आप को पांच साल बाद बताएँगे, हम अभी ही इसका विरोध करते है और सभी को चेतावनी देते है की अभी तक जो किया सो किया हम चुप रह आप को बढ़ावा देते रहे पर अब नहीं अब हमने अपनी भूल सुधार ली है अब हम इन चीजो को नहीं सहेंगे |
                 विरोध कीजिये कही भी जहा आप है अपने हाऊसिंग सोसायटी में अपने आफिस में अपने मोहल्लो में आप का जे पी पार्क , जंतर मंतर ,या आजाद पार्क जाने की जरुरत नहीं है आप इसका विरोध कही से भी कीजिये जहा आप है , इमारतों  में भ्रष्टाचार के खिलाफ तख्ती टांग दीजिये सोसायटी के कम्पौंड में भ्रष्टाचार के खिलाफ मोर्चा निकालिए , सरकार तक अपना विरोध पहुंचिए, लोगों को खुद से जोडीये, जो नहीं जानते है उन्हें बताइये मिल का इसका विरोध कीजिये, पर कीजिये | अपने आफिस में या ईमारत के परिसर में मोहल्ले में मार्च निकलने या भ्रष्टाचार के विरोध के लिए तख्ती टांगने के लिए आप को पुलिस या प्रशासन से इजाजत की जरुरत नहीं है , पुलिस आप के घरो में घुस कर डंडे नहीं बरसायेगी ना सरकारे हर व्यक्ति के खिलाफ जाँच बैठाएगी , किन्तु  आप के  छोटे से प्रतीकात्मक विरोध का भी उस पर कुछ ना कुछ असर तो जरुर होगा  इसलिए मौन को डर को ख़त्म कीजिये और मुँह खोलिए विरोध कीजिये बताइये की आप कितने परेशान हो चुके है इस भ्रष्टाचार से और आप पूरी व्यवस्था की चुस्त दुरुस्त करने के लिए व्यवस्था में बदलाव के लिए तैयार है |  
                                 आप को किसी व्यक्ति विशेष का समर्थन नहीं करना है आप को भ्रष्टाचार का विरोध करना है उस तरीके से जो आप चाहे आप को अँधेरा नहीं करना है तो मत कीजिये आप आप मोमबत्तिया जला कर रोशनी करके विरोध कीजिये,  आप मत नाम लीजिये व्यक्ति विशेष का आप कहिये की आप बस भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रहे है किसी व्यक्ति या समूह के लिए नहीं | ये किसी और की नहीं हमारी और आप की लड़ाई है ये हमारे और हमारे बच्चो के लिए लड़ी जा रही लड़ाई है सभी को आगे आ कर अपना योगदान किसी ना किसी रूप में करना चाहिए नहीं करेंगे  तो भविष्य में इस लड़ाई में हारने और जितने दोनों ही स्थिति में आप बाद में सिवाय पछताने के कुछ भी नहीं कर पाएंगे |
                                                                                             आज एक आम आदमी एक आम नागरिक के पास मौका है देश के लिए कुछ करने का जहा फायदा घूम कर उसे ही होना है , तो भूल कर भी इस मौके को ना गवाइए और कुछ करीये | ताकि साठ साल बाद हमारे आने वाली पीढ़ी को इस तरह को कोई लड़ाई नहीं लड़नी पड़े आज से ६० साल बाद आज के दिन वो बड़े फक्र से एक विकसित देश के नागरिक के नाते ऐसे ही किसी आधुनिक तकनीक पर अपनी आजादी का असली जश्न मनाये और केवल शब्दों के लिए नहीं माने और गर्व करे की वो भारतीय है |
                       

यदि आप को लगता है की आप आजाद है तो आप को आजादी के पर्व की     शुभकामनाये  |

August 08, 2011

क्या डरपोक भारतीय मध्यम वर्ग अब अन्ना के साथ आयेगा ? - - - - -mangopeople

                         
                                                         
                                                      16 अगस्त से एक बार फिर अन्ना हजारे लोकपाल बिल को लेकर अनशन पर जाने वाले है किन्तु आज परिस्थितिया वैसी नहीं है जैसी की उनके पहले अनशन के समय थी | तब उन्हें और उनकी टीम को बिल्कुल भी ये अंदाजा नहीं था की उनके आन्दोलन को जनता और मीडिया में इस स्तर तक समर्थन मिलेगा | उन्हें मिला समर्थन उनकी उम्मीदों से परे था और सरकार के भी, इसलिए सरकार भी जल्द ही दबाव में आ गई और फौरी तौर पर इस आन्दोलन से निपटने के लिए बिल बनाने  की कमेटी में सिविल सोसायटी के लोगो को शामिल कर लिया किन्तु उसका अंत कैसा होगा ये सरकार को मालूम था, और अंत में हुआ भी वही सरकार ने लोकपाल बिल को जोकपाल बना कर संसद में रख दिया अब अन्ना हजारे और उनकी टीम इसे उनके और जनता के साथ धोखा बता कर एक बार फिर से इस पर आन्दोलन शुरू करना  चाह रही है और 16 अगस्त से अन्ना हजारे ने फिर से अनशन पर जाने की घोषणा कर दी है |
                      किन्तु अब सवाल ये है कि क्या इस बार भी उन्हें जनता खास कर पढ़े लिखे सुविधाभोगी माध्यम वर्ग से वही समर्थन मिलेगा जो उन्हें पिछली बार मिला था | सवाल उठना लाजमी है क्योकि इस बार जनता से उम्मीदे ज्यादा है और आज की परिस्थिति पहले से काफी अलग है | पिछली बार जनता ने जोश में और बिना किसी परिणाम को सोचे सड़को पर उतर कर एस एम एस कैपेनो सोसल साईटों आदि से इस आन्दोलन को खूब समर्थन दिया था किन्तु इस बार इस माध्यम वर्ग को पता है की सरकार किसी आन्दोलन को कुचलने के लिए क्या कर सकती है और किस हद तक जा सकती है | बाबा रामदेव के आन्दोलन का सरकार ने क्या हाल किया और आज भी बाबा रामदेव और उनके सहयोगियों का क्या हाल कर रही है  उसी से पता चलता है की सरकारे कैसे काम करती है | अब इन सब को देखते हुए लगता है की क्या इस बार पढ़ा लिखा तबका और युवा इस अन्दोलन से उसी तरह जुड़ेगा जैसे इसके पहले जुड़ा था |
                          ९० के दशक में इस माध्यम वर्ग ने अपने सपूतो को इसी तरह के एक आन्दोलन में जलते हुए और मरते हुए देखा था तभी से इनकी रुहे भी किसी आन्दोलन के नाम पर कांप जाती है | सड़क पर किये जा रहे आन्दोलन से कम से कम आम आदमी तो दूर ही रहता था | एक दशक बाद जा कर उसे होश आया की ये भ्रष्टाचार तो हमारे सर के ऊपर तक चला गया है यदि अब इसके खिलाफ नहीं बोले तो ये हम को ही ले डूबेगा | अन्ना की टीम ने लोगो को अपनी बात कहने अपना आक्रोश सामने लाने का मंच दे दिया और लोगो ने उसका उपयोग भी किया किन्तु सभी ये सब करते रहे क्योकि उन्हें सरकार की तरफ से कोई भय नहीं था क्योकि तब तक सरकार ने इस तरह के आन्दोलन को कुचलने का कोई काम नहीं किया था | सिविल सोसायटी को लोकपाल बिल बनाने की कमिटी में शामिल करने को ही सभी ने अपनी जीत मान ली और आन्दोलन को यही सम्पन्न भी मान लिया | किन्तु जब यही लोगों ने टीवी पर बाबा रामदेव के आन्दोलन का हाल देखा सरकारी ज्यादती देखी तो उनके होश उड़ गये , तब इन्हें समझ आया की सरकार किसी आन्दोलन को कुचलने के लिए किसी हद तक जा सकती है और क्या क्या कर सकती है उसके लिए आम आदमी और उसके मुद्दे उसके सवाल कोई मायने नहीं रखेते है | जब सरकारे अपने पर आती है तो इसी तरह सत्ता की ताकत का दुरुपयोग करती है | अब अन्ना हजारे फिर से आन्दोलन करने जा रहे है और इस बार सरकार ने पहले ही दर्शा दिया है की उसे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है सरकार से बाहर सरकारी टट्टू लोगों को डराने के लिए ये भी बता रहे है की हर आन्दोलन का वही हाल होगा जो रामदेव के आन्दोलन का हुआ | अब माध्यम वर्ग को पता है की इस बार पहले वाली बात नहीं है इस बार यदि बाहर निकले तो पुलिसिया ज्यादती का शिकार भी होना होगा और डंडे खाने की नौबत भी आ सकती है |
                                 ऐसा नहीं है की सरकार ने बस युही रामदेव के आन्दोलन को इस तरह कुचल दिया वो चाहती तो बड़े आराम से अन्ना हजारे की तरह बाबा को भी योग शिविर के आड़ में अनशन करने की इजाजत नहीं देती लोगों को वहा आने से ही रोकती और इस आन्दोलन को होने ही नहीं देती | किन्तु उसने ये सब होने दिया क्योकि उसकी मंसा तो एक तीर से दो निशाने लगाने की थी उसने सभी टीवी कैमरो  मीडिया के सामने उन लोगों पर लाठी चार्ज किया लोगों का मारा कम उन्हें घसीटा ज्यादा उसका उद्देश्य लोगों को वहा से भगाने से पहले अच्छे से उनकी इज्जत कैमरों के सामने उतारने की थी | सरकार को अच्छे से पता था की ये सब मीडिया रिकार्ड कर रही है और उसे देश के लाखो लोग टीवी पर देखेंगे और वो चाहती भी यही थी की लोग देखे ओर समझ जाये की सरकार क्या क्या कर सकती है | वो आन्दोलन तो सफलता पूर्वक कुचल दिया गया पर वहा जो किया गया उसका दूसरा निशाना था उन चीजो के देख रहा माध्यम वर्ग जो हमेसा ही अपनी इज्जत को लेकर बड़ा सतर्क रहता है जो आन्दोलन तो कर सकता है पर लाठी नहीं खा सकता सड़क पर घसीटा जाना या पुलिस द्वारा गलिया देना उसे बर्दास्त नहीं होगा वो कभी नहीं बर्दास्त करेगा की उसके घर के युवा या महिलाए या वो खुद इस तरह के आन्दोलन में जाये जहा पर ये सब होने की संभावना है |
                                               सरकार का तीर निशाने पर लगा पहले से ही डरपोक रहा माध्यम वर्ग और भी डर गया और पुरा माध्यम वर्ग सहमा डरा हुआ इधर उधर मुँह छुपा रहा है बहाने तलाश रहा है  अन्ना की टीम से ही सवाल पूछ रहा है की आप इससे ज्यादा और क्या चाहते है, सरकार ने तो काफी कुछ दे दिया, आप लोकपाल के नाम पर एक और सत्ता खड़ी कर रहे है ,आप इतना ईमानदार व्यक्ति लोकपाल के लिए कहा से लायेंगे , आप संसद का अपमान कर रहे है, ये लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है, आप सरकार गिराने का प्रयास कर रहे है, आप देश को अस्थिर कर रहे है ,आप खुद को संसद से सर्वोच्च क्यों मान रहे है, देश में संसद ही सर्वोच्च है उसकी बात हम सभी को मान लेनी चाहिए आदि आदि आदि  |   सिविल सोसायटी वालो पर भी सवाल खड़े किया जाना लगा और रामदेव के आन्दोलन  को तो सरकार ने पहले ही सांप्रदायिक घोषित कर उसकी हवा निकाल दी थी |  सरकार ने बड़ी चालाकी से अपने एक कांटे से दूसरे कांटे को निकालने का काम किया | 
                                                                                    बेचारा माध्यम वर्ग भी क्या करे वो शुरू से ही डरपोक रहा है उसे खुद के कामने खाने और इज्जत की दुहाई दे कर चुप रहने और दूसरो को भी चुप रहने की सलाह देने की आदत है और सरकार ने भी उसकी इसी आदत का खूब फायदा उठाया और उसकी दुखती रग पर हाथ रख दिया | अब वो  खुद को दिलासा भी दे रहा है की उसने तो आन्दोलन को सफल बना दिया था और सरकार से अपनी बात भी मनवा ली थी अब वहा गए लोग अपनी बात नहीं मनवा सके तो हम क्या कर सकते है | इस बात को अन्ना हजारे की टीम भी अच्छे से समझ रही है इसलिए पहले कोर्ट में एक याचिका भी दायर की गई की उसके आन्दोलन में सरकार वो सब ना कर सके जो रामदेव के आन्दोलन में किया ताकि लोगो में कुछ विश्वास पैदा हो लोगो का डर कम हो साथ ही अब जगह जगह जा कर लोगो को फिर से जोड़ने का प्रयास भी किया जा रहा है जो पहले इस तरह नहीं किया गया था | पर दूसरी तरफ सरकार और उनकी टीम भी लोगो को डराने के लिए उन्हें हतोस्साहित करने के लिए रोज नये नये बयान जारी कर रही है कभी ये कहती है की उनके आन्दोलन का भी वही हाल होगा जो रामदेव का हुआ, कभी कहती है की करते रहे आन्दोलन हमें कोई चिंता नहीं है, तो कभी कानून व्यवस्था प्रशासन का नाम लेकर जंतर मंतर पर अनशन की इजाजत ही नहीं दे रही है | किन्तु अन्ना की टीम भी लगी है सरकार से दो दो हाथ करने के लिए |
                                 कोई भी क्रांति बड़ा बदलाव या सरकार से उसकी मर्जी के खिलाफ उससे कोई काम करवाना आसान नहीं होता है और ये काम दो या चार दिन में संभव नहीं है इसके लिए पूरे समाज को उठ कर आगे आना होता है और एक लंबी लड़ाई लड़नी पड़ती है  और कई बार सरकारी ज्यादती का शिकार भी होना पड़ता है | जब कोई समाज इन सब के लिए तैयार होगा तभी वो किसी बदलाव को क्रांति को ला सकता है , नहीं तो छोटे छोटे आन्दोलन विरोधो को सरकारे कभी तव्वजो नहीं देती है और नहीं किसी खास व्यक्ति समूह की सुनती है ,अन्ना तो गाँधीवादी भर है आज के समय में स्वयम गाँधी जी भी आ कर अकेले सरकार से कुछ कहते तो वो उन्हें भी बरगलाने के सिवा कुछ नहीं करती | अब तो १६ अगस्त के बाद ही पता चलेगा की परम्परागत भारतीय माध्यम वर्ग किसी बदलाव को लाने को तैयार है की नहीं , उसमे क्रांति लाने की ताकत है की नहीं , उसने अपने डरपोक प्रकृति को छोड़ा है की नहीं |
                                 

July 12, 2011

कल से देश में भ्रष्टाचार घोटाले बंद राम राज का आगमन हो गया - - - - - - -mangopeople

कल से देश से भ्रष्टाचार मिट जायेगा अब कल से देश में कोई नया घोटाला नहीं होगा अब कल से महंगाई कम होने लगेगी कल से देश का आम आदमी ज्यादा सुरक्षित होगा अब कल से कोई नई रेल दुर्घटना नहीं होगी, हर मुसाफिर एक साफ सुथरी सुरक्षित रेल यात्रा करेगा | क्योकि इन सारे  सवालो को दर किनारा कर या ये कहे की जनता द्वारा सरकार से पूछे जा रहे इन सारे सवालो के जवाब में हमारे "ईमानदार" प्रधानमंत्री ने अपने कुनबे का या मंत्री मंडल का या घोटालेबाजो का जो आप चाहे कह ले उसका विस्तार कर लिया है | लीजिये जी हो गया मंत्री मंडल का विस्तार अब देश में राम राज होगा | जनवरी में भी हमारे "ईमानदार" साहब ने अपने कुनबे का इसी तरह विस्तार किया था या ये कहिये की अपने कुनबे के लोगों को तास के पत्तो की तरह फेट दिया था लेकिन उससे क्या बदला कुछ भी नहीं आम आदमी का जीवन तो आज भी वैसे का ही वैसा ही है मंहगाई वैसे की वैसे ही है | लेकिन सरकार को शायद जनता के सवालो का कोई जवाब ना सुझा तो उन्होंने भी हवा में उछाल दिया मंत्री मंडल के विस्तार की खबर और इस खबर को पकड़ लिया हमारे खबरनवीसो ने  जिस भी चैनल को देखीये सभी के सभी लगे थे हफ्ते भर से ये बताने में की मंत्री मंडल के फेरबदल में कौन कौन नया मंत्री बनेगा किसका कद बढेगा, किसका विभाग बदलेगा और किसका मंत्री मंडल से छुट्टी होना तय है | सभी के अपने अपने सूत्र है सभी के सूत्र कोई ना कोई दावा कर रहे थे और सभी लगे है मंत्री मंडल के विस्तार होने के पहले ही सारी जानकारी जनता को दे देने में | पर सवाल ये है की क्या जनता ये जानने के लिए उत्सुक थी कि मंत्री मंडल के विस्तार में क्या होने वाला है, कोई पूछे इन खबर देने वालो से की कुछ दिन पहले या कुछ घंटो पहले इस बात को जान लेने से क्या फर्क पड़ेगा की कौन मंत्री बनने वाला है और कौन नहीं क्योकि जब मंत्री शपथ लेंगे तो अपने आप ही सारी बाते साफ पता चल जायेगी, पहले से जानने में जनता का तो कोई भला होने वाला नहीं है और यदि जनता बाद में भी जान जाये तो भी उसका कोई भला नहीं होने वाला है | मंत्रियो के विभागों में फेरबदल हो या किसी को निकाला जाये या किसी को रखा जाये जनता को किसी भी बात से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है जनता पहले भी त्रस्त थी और कैबिनेट विस्तार के बाद भी वैसे ही त्रस्त रहेगी | मंत्री मंडल में चाहे कोई भी नया मंत्री आ जाये महंगाई नहीं घटने वाली है घोटाले नहीं रुकने वाले है, भ्रष्टाचार कम नहीं होने वाला है सब कुछ वैसा ही रहेगा जैसा पहले था | रेल मंत्री कोई भी हो रेल दुर्घटनाओ में कोई कमी नहीं आने वाली है और ना ही रेल प्रशाशन द्वारा हर दुर्घटना के बाद उसके कारणों के ले कर वही लिपा पोती करना बदलने वाला है | ना तो कोई मंत्री देश की सेवा या जनता की सेवा के लिए बनता है और ना ही किसी मंत्री मंडल में फेर बदल जनता के लिए या उसकी परेशानियों को दूर करने के लिए होता है | पूरी कवायद सरकार का,  सरकार के लिए, सरकार द्वारा किया जाता है | मतलब की मंत्री मंडल में नये चेहरों को लाना कुछ पुराने को इधर उधर करना और कुछ की छुट्टी करना सरकार अपने मतलब के लिए करती है, कही किसी को संतुष्ट करना है, कही सरकार की बिगड़ी छवि को ठीक करना है, कही किसी का कद उसके चमचागिरी से बढ़ना है, तो किसी के उग आये ज्यादा परो को काटना है | जो भी होगा वो सरकार केवल और केवल अपने लिए करती है आम आदमी के बारे में ना तो सोचा जाता है ना उसकी कोई सुध ली जाती है, यदि उसके बारे में कुछ सोचा जाता है तो ये कि कैसे सरकार की आम आदमी के सामने हो रही बदनामी कम हो जाये, या फिर काम हो या ना हो पर आम आदमी को लगना चाहिए की काम हो रहा है सरकार को उसकी चिंता है तभी तो देखो कैसे सरकार ने जनता के भलाई के लिए तुरंत कुछ मंत्रियो को हटाया बढाया है नये लोगो को लाया है जो जनता की अच्छी सेवा करेंगे | पर असल में होगा क्या की अब नये मंत्री नये घोटाले करेंगे नये तरीके के भ्रष्टाचार होंगे अब मंहगाई बढ़ने के शायद कुछ नये कारण गिनाये जायेंगे या एक और नई तारीख दे दी जाएगी महंगाई कम होने के, अब नये लोग कुछ तो नया करेंगे ही बाकि जनता के लिए तो बस नेताओ मंत्रियो के नाम बदलने के अलावा और कुछ भी नहीं बदलने वाला है | पर हा इन सभी बातो के बीच कम से कम जनता का ध्यान कुछ सरकार विरोधी मुद्दों से तो हट ही जाता है और इसे हटाने में सबसे बड़ा साथ देता है मीडिया | मंत्री मंडल में होने वाले फेरबदल या विस्तार को इस तरह बड़ी खबर बना कर पेश करने लगा था जैसे की बस इसके बाद तो देश में क्रांति ही आ जाएगी सब कुछ सुधर जायेगा देश से भ्रष्टाचार कम हो जायेगा घोटाले बंद हो जायेंगे महंगाई रुक जाएगी सभी देशवासी नेताओ की तरह ही सुरक्षित जिंदगी जियेंगे, अब तो देश में सब कुछ अच्छा हो जायेगा | ये भी कम नहीं था जो अब नेताओ के संतुष्ट असंतुष्ट इस्तीफे की नौटंकी को बड़ी खबर बना कर पेश किया जा रहा है | पर जनता भी अब पहले की तरह ना तो भोली रही और ना ही बेफकुफ़ जो वो इन तिकड़मो को समझ ना सके सरकार की इन चालबाजियो को समझ नहीं सके | जनता ना तो भ्रष्टाचार के मुद्दे को भूलेगी ना महंगाई के मुद्दे को भूलेगी और ये बात सरकार के साथ मीडिया भी समझ ले तो उसके लिए ज्यादा अच्छा होगा |

June 17, 2011

अभी हम सभी ने एक हिंदूवादी बाबा को निपटाया है अब भ्रष्ट अन्ना हजारे की बारी है - - - - - - - mangopeople



                                                               लीजिये अन्ना हजारे ने फिर अनशन की धमकी दे कर अपनी राजनीतिक नौटंकी शुरू कर दी | अभी हम सभी ने एक भ्रष्ट, राजनीतिक महत्वाकांक्षा रखने वाले गेरुवा वस्त्रधारी हिंदूवादी बाबा को निपटाया है अब भ्रष्ट अन्ना हजारे की बारी है | आप सभी को आश्चर्य क्यों हो रहा है ,क्या आप को नहीं पता की अन्ना हजारे भी भ्रष्टाचार में लिप्त पाए गये थे,  बाकायदा उसकी जाँच हुई थी और वो दोषी भी पाये गए थे, वो अलग बात है अपनी ऊँची पहुँच और नाम के चलते वो बच गए | कुछ साल पहले उन्होंने महाराष्ट्र के दो भ्रष्ट कांग्रेसी मंत्रियो के खिलाफ अनशन किया था वहा की सरकार को मजबूर हो कर मंत्रियो को हटाना पड़ा हटाये गए माननीय मंत्री जी ने अन्ना पर अपने ट्रस्ट के पैसे का दुरुपयोग करने का आरोप लगाया बाकायदा माननीय पूर्व मंत्री जी के आरोप पर एक जाँच बैठाई गई और पता चला अन्ना के जन्मदिवस पर ट्रस्ट के दो लाख रुपये खर्च किये गए | ये भ्रष्टाचार नहीं है तो क्या है क्या लोगो ने ट्रस्ट को पैसे अन्ना के जन्मदिवस के लिए दिया था नहीं, उन्होंने जनता के सेवा के लिए मिले पैसे को अपने निजी कार्यो के लिए खर्चा किया था ( अब उन्होंने किया या उनके लोगो ने किया बात तो एक ही है ना, उन्होंने मना तो नहीं किया तो वो भी इस भ्रष्टाचार में उतने ही दोषी है जितने की कोई अन्य  ) | भ्रष्टाचार तो भ्रष्टाचार होता है चाहे वो हजारो करोड़ का हो या कुछ हजार का ही एक भ्रष्टाचारी को कोई हक़ नहीं बनता की वो किसी दुसरे भ्रष्टाचारी पर किसी तरह का आरोप लगाये उस पर उंगली उठाये या उसे भ्रष्ट तक कहे | जो खुद ये काम कर चूका है हम सभी महान ईमानदार आम जनता उस व्यक्ति का कैसे साथ दे सकते है | इसलिए जरुरी है की हम जैसे उच्च कोटि के ईमानदार आम जनता का नेता बिल्कुल उच्च कोटि का ईमानदार हो | क्योकि गाँधी जी ने कहा था की एक सच्ची और अच्छी चीज को पाने के लिए प्रयोग किये जा रहे साधन भी पवित्र होने चाहिए | क्या आप सभी को गाँधी जी की ये बात याद नहीं है, क्यों नहीं याद है, जब गाँधी जी याद है तो उनके विचार क्यों नहीं याद है शायद इसलिए याद नहीं है की हम सभी भेड़ चाल वाले भारतीय व्यक्ति पूजा में विश्वास करते है हम व्यक्ति का समर्थन करते है व्यक्ति का विरोध करते है, उसने क्या कहा उसके क्या विचार है उससे हमें मतलब नहीं है हम तो उसे सुनने की भी जरुरत नहीं समझते है, तो याद क्या खाक रखेंगे तभी तो गाँधी जी याद है किन्तु उन्होंने कहा क्या था गाँधी जी के विचार क्या थे गांधीवाद क्या था  ये हम सब भूल चुके है | हमें बाबा याद है हमें अन्ना याद है किन्तु वो दोनों कह क्या रहे है वो हममे से किसी को भी याद नहीं है व्यक्ति के आगे मुद्दे गुम हो गये | कोई बाबा का विरोध कर रहा है तो कोई उसका समर्थन कर रहा है हर जगह बस बाबा ही छाये हुए है पर उनके उठाये मुद्दे गुम हो गये है | 
                                   अब अँधा क्या चाहे दो आँखे और सरकार क्या चाहे भ्रष्टाचार के मुद्दे हवा हो जाये और लीजिये जी वो हवा हो गये | अब सरकार से कोई नहीं पूछ रहा है कि आप ने तो बाबा की सारी मांगे मान ली थी तो जरा बतायेंगे की उस पर कमेटिया बनाने के अलावा क्या जमीनी काम चल रहा है क्या बतायेंगे की कमेटिया कब तक अपना काम कर लेंगी, कब तक सरकार को अपनी रिपोर्ट दे देंगी, क्या उनका कोई समय सीमा तय किया है | चलिए वो जाने दीजिये विदेश से जो धन आएगा वो तो आएगा पर देश के अन्दर ही जो कला धन छुपा है उसका क्या हुआ उसको बाहर लाने के लिया आप क्या कर रहे है | सालो पहले आप लोगो ने खूब स्कीम लाई थी इतने प्रतिशत सरकार को दो और अपना सारा कला सफ़ेद में बदला लो | बहुतो ने अपना काला सफ़ेद किया था तब से तो आप को पता होगा ही की किस किस के पास कितना काला है उसके बाद आप लोगो ने उस पर रोक लगाने के लिए क्या कार्यवाही की है | चलिए वो भी छोडिये  कोर्ट ने आप की गर्दन पकड़ कर जब झकझोरा तब जा कर आप ने हसन अली को गिरफ्तार किया अब वो कई राज आप को बता चूका है की उसके पास किस किस का पैसा था सुना था की उसमे दो पूर्व कांग्रेसी मुख्यमन्त्रियो और वर्तमान केन्द्रीय मंत्रियो का पैसा था उनके खिलाफ आप क्या कर रहे है ये सवाल तो आम जनता क्या देश की अदालत भी आप से पूछ पूछ कर परेशान हो चुकी है आप क्या कर रहे है | २ जी में जो सरकारी पैसा डूब गया उसको फिर से पाने के लिए क्या कर रहे है उन कंपनियों पर क्या कार्यवाही कर रहे है जो असल में मंत्रियो द्वारा फर्जी बना कर सारा खेल खेला गया , उन बड़ी कंपनियों पर क्या कार्यवाही कर रहे है जो इन सरे खेल में शामिल थी | इस केस में जो की आप ने एक और विरोधी सांसद के और कोर्ट के दखल के बाद मज़बूरी में कार्यवाही के आलावा दुसरे लोगो के नाम आ रहे है उनके खिलाफ आप क्या करने वाले है आदि आदि आदि सवाल तो कई है  किन्तु आज कोई भी ये सवाल सरकार से नहीं पूछ रहा है क्योकि सरकार ने ऐसे हवा चलाई की ये सारे सवाल हवा में गुम हो गये |
                                                सरकार ने पहले हम सभी को बाबा के कपडे का रंग दिखाया ( वैसे समझ नहीं आता की जब एक दो नहीं तीन तीन केन्द्रीय मंत्री हवाई अड्डे पर बाबा की अगवानी में लगे थे तब क्या उन्हें बाबा के कपड़ो का रंग नहीं दिखाई दे रहा था ) अब वो बता रही है की आन्ना के सफ़ेद कपड़ो के नीचे भी वही गेरुआ कपडे है जिससे हम सभी को डरना चाहिए क्योकि गेरुआ रंग आम जनता के लिए भारत की राजनीति के लिए बड़ा खतरनाक है | पहले उसने बाबा के कपड़ो का रंग दिखा कर उनके मुद्दे को हवा में गुम कर दिया अब वही चाल वो आन्ना के साथ भी चल रही है | और हम व्यक्ति पूजक आम जनता हम तो व्यक्ति के पीछे भागते है हमें तो मुद्दों से कभी ना मतलब था और ना रहेगा हम सदा से व्यक्ति पूजक रहे है और रहेंगे जब तक हमें व्यक्ति अच्छा लगेगा हम उसकी हर बात को कान बंद कर हा में हा मिलाते रहेंगे जिस दिन व्यक्ति हमें ख़राब लगने लगेगा उस दिन हम उसकी अच्छी से अच्छी बात को भी नकारते चलेंगे और इस बात को सरकारे भी खूब जानती है | तभी तो देखिये सरकार के मुंह से जब भी निकालता है तो बाबा या अन्ना ही निकालता है उन्होंने जो सवाल उठाये थे उस बारे में सरकार की मुंह कभी नहीं खुलता है | फिर उसे दिग्गी राजा ने थोड़े काटा है की वो अपने मन से ही इन विषयों पर कुछ बोले जब आम जनता , महान भारितीय बुद्धिजीवी वर्ग और हमारा तथाकथित लोकतंत्र का चौथा खम्बा मिडिया और अपने आप को जबरजस्ती लोकतंत्र का पांचवा खंबा ?? बनाने का प्रयास करने वाला स्वघोषित विद्वान ?? ब्लोगर इस बारे में कुछ नहीं कह रहे है कोई सवाल नहीं कर रहे है तो उसे क्या पड़ी है कुछ भी कहने की | सभी यहाँ अपने निजी विचारो, संकुचित सोच को पोषित करने उसे बढ़ाने सभी से उसे मनवाने और सबसे सही और सभी का भला सोचने वाला साबित करने में लगे है ( मै भी इनमे शामिल हूँ मै कोई दुसरे ग्रह से थोड़े आई हूँ ) | असल में सभी अपने राजनीतिक सोच की खाल से बाहर आने को तैयार नहीं है सभी का अपना ही विचार उत्तम लग रहा है | किसी को तो ये सारा आन्दोलन ही लोकतंत्र पर हमला लग रहा है तो किसी को कांग्रेस विरोधियो बजापा की राजनीतिक साजिस लग रहा है | सही भी है ६० साल से ऊपर चिर निद्रा में सोये हुए हम आम जनता ये कैसे बर्दास्त करे की कोई बेवजह हमारे नीद में खलल डाले हम अपने घरो में सोफे पे पसर कर भ्रष्टाचार पर बकर बकर तो कर सकते है पर जब सड़क पर आ कर कुछ करना हो तो हम हर आन्दोलन में दुनिया जहान के मीन मेख निकाल कर बड़े आराम से इससे बचना चाहते है, हम क्रांति तो चाहते है बदलाव तो चाहते है पर वो सब बस हमारे आराम से बैठे बैठे बकर बकर बकने से आ जाये तो क्या बात है | हा जब बदलाव आ जाये और उसका क्रेडिट लेना होगा तो हम सब माला पहनने के लिए जमीन तक अपना सर और कमर झुकाने के लिए तैयार मिलेंगे | तो चलिए हमारी बकर बकर ख़त्म हुई कुछ आप के मन में हो तो यहाँ बक कर मन हल्का कर लीजिये मेरी तरह , बाकि हम इससे ज्यादा ना तो कर सकते है और ना ही करना चाहते है |