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November 18, 2019

रियलटी शो की में कुछ भी रियल नहीं ------mangopeople

                          मुझे हमेशा से पता था कि  टीवी पर आने वाले सभी रियलटी शो फर्जी होते हैं , चाहे वो डांस का हो या गाने का | उसमें सब कुछ  वैसा नहीं होता जैसा दिखाया जाता हैं | ना तो एक टेक में पूरा डांस होता हैं और ना ही गाने वाले सीधे वहां पर गा रहे होते हैं और ना ही जो आवाज हम सुन रहें हैं उनकी , वो असल में बिना किसी बदलाव के उनकी हैं |
                         
                         कल स्टार प्लस पर सबसे ज्यादा रेटिंग वाला डांस शो डांस प्लस देख रही थी | लड़कियों का एक समूह भरतनाट्यम करने के लिए आया जो एक आधुनिक फ़िल्मी गाने पर भरतनाट्यम कर रहा था | डांस करते समय उनमे से एक लड़की की करधनी ढीली हो कर लटकने लगी ,  क्लोजअप शॉट में साफ दिख रहा था | लेकिन जब तुरंत ही लॉन्ग शॉट ( दूर से)   दिखा तो उसकी करधनी एकदम सही थी | फिर तुरंत एक क्लोज शॉट हुआ और करधनी फिर से ढीली थी और फिर वही निरंतर चल रहे डांस में फिर लॉन्ग शॉट में वो करधनी ठीक हो जाती | तीसरी बार जब शॉट क्लोज हुआ तो हद ही हो गई उसके कमर में करधनी थी ही नहीं और फिर लॉन्ग शॉट में करधनी आ गई | डांस ख़त्म हुआ जज के सामने कमेंट लेते समय फिर से करधनी उसके कमर में एकदम सही से था |
                         
                        लगभग सभी डांस शो में अच्छे डांसरों के डांस को कई बार करवा के कई तरह  से शूट  किया जाता हैं और उस शूटिंग में से सबसे अच्छे शॉट को मिला कर उसे टीवी पर दिखाया जाता हैं | जो हम टीवी पर देखते हैं वो कई बार किये डांस से लिया गया सबसे अच्छा शॉट भर होता हैं | आज उसी शो में डांस करते समय एक लडके के गिर जाने को लेकर खूब नौटंकी दिखाई गई कि उसे फिर मौका दिया जाए या नहीं डांस करने का |

                       इसी तरह गाने के रियलटी शो में भी तकनीक की मदद से आवाज की कमियों को ठीक करके उन्हें दर्शको को सुनाया जाता हैं तो कई बार उन्हें पहले ही रिकॉर्डिंग स्टूडियों में रिकार्ड करने के बाद स्टेज कर बस मुंह चलाते शूट कर दर्शकों को दिखा दिया जाता हैं |

                      उसी तरह बड़े एवार्ड फंक्शन में जो कलाकार डांस करते हैं उन्हें एक दिन पहले ही या उसी दिन सुबह  उसी स्टेज पर शूट कर लिया जाता हैं टीवी पर दिखाने के लिए | फिर समारोह वाले दिन भी शूट कर दोनों को मिला कर टीवी के दर्शकों को दिखाया जाता हैं |

                     अगली बार किसी रियलटी शो के किसी कलाकार को देखते समय वाह वाह करते समय ध्यान रखियेगा कि जो जज लोग इस कलाकार की इतनी तारीफ कर  रहें हैं वो शो ख़त्म होने के बाद उन्हें काम क्यों नहीं देते हैं |


October 04, 2011

उपवास -२ ( खबरों की बाढ़ , उससे होते फायदे नुकसान और फ़िल्टर करने की आवश्यकता ) - - - - - - - -mangopeople

                                                                                 समय बदला और हमारे सामने आया टीवी और इसने हमें दिखाना शुरू किया दुनिया की हलचल,  वो भी घर बैठे और अब ये हालत है की केवल अपनों की ही क्यों आज तो हम देश दुनिया की खबर जानने के लिए भी हमेशा उत्सुक रहते है और इसके लिए सबसे अच्छा माध्यम बना टीवी | आज के समय में शायद ही कोई घर होगा जहा टीवी की पहुँच नहीं होगी जो हमें दुनिया के लगभग हर खबर से जोड़े रखता है किंतु जब टीवी नहीं था तब लोग कैसे खबरों से जुड़े रहते थे शायद तब उतनी दूर तक की खबरों में लोगो की उतनी दिलचस्पी नहीं होती होगी जितनी अब है | आज जितनी ख़बरे लोगो को मिलती है लोगो में उतनी ज्यादा उत्सुकता बढ़ती जाती है और जब नहीं मिलती थी तो बस क़िस्से कहानियाँ होती थी और लोग उसे ही सच मानते थे | कोई व्यापारी या कोई विदेश घूम कर आया जो कह देता वही सच हो जाता | वैसे तो हमारे देश में एक समय तो समुद्र पार जाना ही पाप माना जाता था तो फिर वहा की खबरों में लोगो की कितनी रूचि होगी ये समझा जा सकता है | एक समय बाद अखबार तो आ गया था किंतु लम्बे समय तक उसमे भी राजनीतिक ख़बरे और स्थानीय अपराध की ख़बरे ही ज्यादा होती थी देश के हर कोने की खबर उसमे भी कम से कम तुरंत तो नहीं ही होती थी फिर दूसरे देश की खबरों की तो बात ही क्या,  कोई बहुत बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम हो जाये तब ही शायद अखबारों में छपता होगा | वैसे तब भी सभी के घरों में अखबार नहीं आता था और बहुत सारे लोग तो पान,चाय  की दुकान पर अखबार पढ़ने ही जाते थे ( और कुछ तो इसके लिए भी पड़ोसियों के घर जाते थे ) यही कारण था की पान और चाय की दुकानों पर काफी राजनीतिक बहस बाजिया और चिन्तन होता था और कई बार लोग उन्ही के आधार पर किसी राजनीतिक दल और घटनाक्रम के प्रति अपनी राय भी बनाते थे,  राजनीतिक सामाजिक विचारको, चिंतको का अड्डा होता था चाय पान की ये दुकानें  | धीरे धीरे अखबारों के पन्ने बढ़ते रहे और खबरे भी किन्तु तब भी उसने लोगो के बिच खबरों की वो भूख नहीं पैदा की जो अब है |  उसके बाद दूर दर्शन का जमाना आया कहने के लिए वो था तो वीडियो दिखाने के लिए,  पर समाचारों में वहा प्रधानमंत्री और सरकारी कार्यक्रमों के अलावा शायद ही कोई अन्य वीडियो दिखाया जाता हो, यानि समाचार दिखाया नहीं सुनाया जाता था  और समाचार भी दिखाने का एक निश्चित समय होता था,  आज की तरह नहीं की अपनी सुविधानुसार जब समय मिला तब टीवी खोला और समाचार देख लिया | तब उन समाचारों में ज्यादा रूचि  पुरुषों की ही होती थी (वैसे अक्सर वो महिलाओ के रसोई में होने का समय होता था | ) हा उससे एक फायदा तो था वो ये की भारत की एक बड़ी निरक्षर जनता भी समाचारों को बिना किसी परेशानी और किसी और के सहयोग से जान सकती थी किंतु वो भी सरकारी भोपू  से ज्यादा कभी कुछ नहीं बन सका आज भी उसका वही हाल है |

                                        उसके बाद आया निजी समाचार चैनलों का जमाना और तब तक तो दुनिया से हमारी दूरी लगभग ख़त्म जैसी हो गई,  अब ख़बरे सिर्फ देश नहीं देश के बाहर दुनिया हर कोने  की जानकारी हम तक आने लगी  थी और हम उसे ग्रहण करने के लिए भी तैयार थे हमारी जिज्ञासा और रूचि भी थी उन्हें जानने में  और ये इच्छा केवल युवाओं में ही नहीं है | मुझे याद है मदर टेरेसा की पहली पुण्यतिथि थी तो मेरी दादी ने कहा की एक हफ्ते बाद प्रिंसेस डायना की भी पुण्यतिथि आयेगी मुझे आश्चर्य हुआ की मेरी दादी न केवल दोनों लोगो को जान रही है बल्कि एक साल पहले हुए उनकी मृत्यु भी उन्हें याद है , अभी मार्च में कजन की शादी में गई थी हम सभी बारात में मस्त थे और ताऊ चाचा लोगो में किसी और ही बात पर चर्चा चल रही थी तो पता चला की जापान में भूकंप और सुनामी आ गया जैसे जैसे लोग देर से आ रहे थे वो भी चर्चा में शामिल होते जा रहे थे और नई खबरों को उसमे जोड़ते जा रहे थे जो वो टीवी पर देख कर आ रहे थे |  मतलब ये की न केवल अब सभी तरह के लोग हर तरह की खबरों से जुड़ना चाह रहे है बल्कि उसको याद भी रखते है और अपडेट भी करते रहते है | लोग ओबामा में रूचि तो लेते है साथ की क्लिंटन की प्रेम कहानियो की भी खबर में भी रूचि लेते है , क्रिकेट के देश में टाइगर वुड्स को जानने वाले भी कम नहीं है और उनके निजी जीवन को रस ले कर जानने वालो की भी कमी नहीं है | हर तरह की जानकारियों की बाढ़ आ रही है |  कोई केवल अपनी पसंद की खबरों को देखता है तो कोई हर खबर पर नजर रखता है तो कोई बस सरसरी नजर से ही देख लेता है पर हा देखते सभी है | वजह भी है समय के साथ सब बदल गया , पहले कहा जाता था जिस गांव जाना नहीं उसका रास्ता क्या पूछना अब तो न केवल हर गांव का रास्ता जानने की इच्छा सभी में होती है बल्कि लोग उससे जुड़ी हर खबर तक पहुँचना चाहते है विश्वास न हो तो बताइये कितने लोग रालेगण सिद्धि को लोक पाल आन्दोलन के पहले जानते थे |
                                                   
                                         ये ख़बरे बस मनोरंजन, ज्ञान और जानकारी भर नहीं है,  कई बार तुरंत मिल रही ख़बरे आप को सावधान भी करती है मुझे याद है कुछ साल पहले जब मुंबई में २६ जुलाई को बाढ़ आई थो तो पति और समर ट्रेनिग के लिए दो महीने के लिए आया छोटा भाई दोनों ही आफिस में फंस गए थे तो मैंने उन्हें टीवी पर देख कर बताया की पूरे शहर का कितना बुरा हाल है और वो लोग आफिस में ही रहे बाहर निकालने का प्रयास न करे वो लोग वही ज्यादा सुरक्षित है  उसी तरह ज्यादातर ब्लास्ट की खबरे टीवी पर देख तुरंत पतिदेव को सावधान करती हूँ  की आते जाते समय संभल कर रहे भले देर से घर आये और कई बार कही दूर घट रही खबर हमारे अगले कदम के लिए हमें सावधान करती है  जैसे अभी हाल में ही सिक्किम में आये भूकंप ने मौका दे दिया ये जानने का की पतिदेव को भूकंप के समय क्या करना चाहिए इस बारे में कोई जानकारी नहीं है, उन्हें अच्छे से समझाया की क्या क्या उपाय तुरंत करके हम बचने का प्रयास कर सकते है ( बचे न बचे बाद की बात है बचने का प्रयास कैसे किया जाये ये तो पता ही होना चाहिए )  और दो रातों तक तो मैं खुद रात के कपड़े न पहन कर पूरे कपड़े पहन और सिरहाने एक शॉल रख सोती थी ( ऐसी आपदाओं में व्यक्ति यदि बच जाये तो उसके तन के कपड़े ही उसके पास बचते है और शॉल बेटी के लिए था कही आपदा के बाद मौसम ठंडा हो गया तो )  पहले दिन तो पति देव मेरे डरने पर हँसने लगे जब अगले ही दिन उन्हें पता चला की सिक्किम से चला भूकम्प  महाराष्ट्र में भी आ गया तब जा कर मेरे डर को सही समझा | ( सच कहूं तो बच्चे के जीवन में आते ही आप कही ज्यादा सतर्क और हर चीज के प्रति आप  जरुरत के ज्यादा सावधान हो जाते है सारी तैयारी इसी डर का नतीजा थी शुक्र है तैयारी को आजमाने की जरुरत अभी तक नहीं पड़ी उम्मीद है की आगे भी न पड़े | )
                                              
                                                       अब तो ये हाल है की खबरों और खबर पहुँचने वाले चैनलों का स्थान लोकतंत्र में चौथे खम्भे से आगे बढ़ता जा रहा है | अन्ना आन्दोलन उसका प्रत्यक्ष उदाहरन है , फिर जेसिका केस हो या रुचिका केस कितने ही मामलों में मिडिया ने लोकतंत्र के दूसरे खम्बो के सही काम न करने पर उन्हें अपना काम सही से करने के लिए मजबूर किया है |  वो चाहे तो मिल कर आप के प्रति हवा बना दे और चाहे तो आप को उठा कर मिट्टी में मिला दे | इसके अपने फायदे भी है और नुकसान भी क्योंकि आज भी लोगो में खबरों को फ़िल्टर करने की आदत नहीं है लोग खबरों को जस का तस स्वीकार कर रहे है बिना अपना दिमाग लगाये और जिसके कारण कई बार इसके नुकसान भी सामने आये है | इसलिए जरूरी ये भी है की जहा इतनी तेजी से ख़बरे आ रही है और हम उसे ग्रहण कर रहे है तो खबरों को जाँचना परखना भी हमें शुरू कर देना चाहिए | प्रायोजित ख़बरे ,  निजी दुश्मनी के कारण ख़बरे ,  सरकार के दबाव में दिखाई जा रही ख़बरे , चैनल की अपनी निजी विचारधारा की ख़बरे , और किसी एक राजनीतिक व्यक्ति या उससे जुड़े लोगो द्वारा चलाये जा रहे चैनल की ख़बरे सब तरह की ख़बरे घूम रही है हम सभी को उनमें से हर खबर को फ़िल्टर करके ही अपने दिमाग में संग्रहित करना चाहिए न की जस की तस नहीं तो होगा ये की ये ख़बरे जी का जंजाल बन जाएगी और हमें फायदा पहुचने की जगह हमें नुकसान पहुँचाने लगेगी |
                   

                                                                 पर टीवी के आने के बाद भी ख़बरे एक तरफ़ा ही थी,  यानि हम उन्हें सुन तो रहे थे पर उस पर कोई अपनी प्रतिक्रिया नहीं दे पा रहे थे दुनिया भर के लोगो के बारे में   जान तो रहे थे किंतु उनसे सीधे जुड़ नहीं रहे थे और तब आया इंटरनेट का जमाना जिसमे सब कुछ दो तरफ़ा कर दिया |
         क्रमशः