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June 06, 2022

शरीर अलग मर्ज अलग इलाज अलग

 कुछ साल पहले एक लेख पढ़ा था कि वैज्ञानिको की एक संस्था ने मांग की हैं कि अब मनुष्य के शरीर का सामान्य तापमान 98.6 से कम करके 97. 7-8  कर देना चाहिए | इसके पीछे उनका तर्क था कि अब दुनियाँ में वेक्सिनेशन , साफ सुथरा खाना पीना  , अच्छा पोषण आदि  इतना बढ़ गया कि अब शरीर को वायरस आदि से बचाने के लिए अपना सामान्य  तापमान पहले की तरह नहीं रखना पड़ता हैं उससे कम रखता हैं  | 


मैं तब ही उनकी बात से सहमत थी या ये कहिये कि बहुत पहले से ऐसे किसी रिसर्च के होने का इंतजार कर रही थी | आप अगर थर्मामीटर में अपना तापमान चेक करेंगे  तो बहुतों का सामान्य तापमान  98 से नीचे होगा | मेरा भी सामान्य तापमान हमेसा से  97. 7 के आस पास रहता हैं जबकि शरीर छूने पर वो बहुत गर्म होता हैं |  लेकिन समस्या ये नहीं है , समस्या ये हैं कि 98.6 का मतलब मेरे लिए हरारत जैसा होता हैं | एक सामान्य सोच लगाइये तो 98.6 का मतलब हुआ  मेरे सामान्य तापमान से लगभगएक डिग्री ज्यादा | 


सामान्य लोग 98.6 के ऊपर तापमान जाने पर तबियत ख़राब होना महसूस करने लगते हैं और 99 पर दवा ले लेते हैं | जबकि मुझे 98 से ऊपर पहुंचते ही तबियत के गड़बड़ होने का अहसास हो जाता हैं लेकिन चूँकि थर्मामीटर गवाही नहीं देता तो कोई मानता नहीं | 99 तक पहुंचने तक तो मेरी हालत ख़राब हो चुकी होती हैं और लोग कहते हैं बस जरा सी हरारत ही तो हैं | 


पहले मैं 99  दवा नहीं लेती थी लेकिन बिटिया के होने के बाद शरीर 98 के बाद ही  जवाब दे जाता था | थकान और बदन दर्द से कुछ करने की हिम्मत ना होती  और हम बिना बताये चुपचाप दवा ले लेते थे | अभी हाल में ही डॉक्टर हॉउस देख रही थी उसमे भी एक केस का जिक्र किया गया जिसम महिला का सामान्य तापमान 97 से भी  नीचे रहता था और 98.6  का मतलब  बुखार | 


सभी का शरीर अलग होता हैं और उसकी प्रतिक्रिया भी बाकियों से अलग होती हैं जबकि डॉक्टर कई बार वही भेड़चाल में सभी को एक जैसा ही इलाज देने लगते हैं | ये कोई पहला मामला नहीं हैं जब मेरा शरीर दूसरों मुकाबले  थोड़ा अलग निकला | गर्भावस्था के पहले तीन महीने डॉक्टरों के भरोसे के कारण  बहुत ही बुरे गुजरे | चक्कर उलटी को पहले तो वो सामान्य बताती रहीं | 


मेरे 70 - 100  के बीपी को भी सामान्य बताती रही कि भारत में तो महिलाओं का बीपी ऐसे में ऐसा ही होता हैं | जब तीसरे महीने में भी ये सब बंद नहीं हुआ और मैं बीपी को लेकर बहुत जोर देने लगी तो एक फिजिसियन से जाँच करवाई | उसने पैर हाथ गर्दन सभी जगह की नाड़ी चेक करके सामान्य घोषित किया फिर ब्लड में सॉल्ट लेवल आदि भी जाँच में सामान्य निकला | जब सब ने हाथ खड़े कर दिए तो मैंने अपनी मम्मी से बात की जिन्हे हमेसा से लो बीपी से ऐसे ही परेशान होते देखा था | फिर उनके बताये उपाय से मैं ठीक हुयी | 


January 31, 2018

हे बीपी तू लेखक है तू साहित्यकार है ------- mangopeople











                           

                            वैसे तो गिरे हुए लोगो से  ज्यादा वास्ता तो रखना  नहीं चाहिए, ऐसे लोगो से दुरी ही भली , लेकिन जब गिरी हुई हरकत करके गिरने वाला आप का बीपी हो तो मजबूरन न चाहते हुए भी उस गिरे हुए को उठाने के लिए खुद ही प्रयत्न करना पड़ता है | पहले उठाने के लिए तकनीकी मदद ली गई लेकिन कहते है गिर को उठाना इतना आसान नहीं होता डीप शिप , आराम वाराम , दवा और दवा ( दारू अभी बाकि है )  सब नाकाम | फिर दिमाग में आया मर्ज जेहनी लगता है , खून में उबाल की जरुरत है |  इसके पहले की घर वाला बंदा गिरे हुए बीपी को मेरे उमर से जोड़ हमें बुढ़ापे का ताना मारे , उस पर ही खूब चिल पो कर खून का उबाल दिखा दिया गया |  लेकिन गिरी हुई बीपी को कोई जोश न आया वो वही निचे धरातल में पड़ी रही |  उसने भी सोचा होगा अरे छोडो ये तो रोज का है कुछ और प्रयत्न करो | तुरंत ही सोशल मिडिया का रुख कर देश दुनिया की चिंता कर सरकार को कोस नया प्रयत्न किया वो भी बेकार गया , वो अब भी भाव खाये वही पड़ी रही | २६ जनवरी के देशभक्ति गीतों का भी उस पर कोई असर न हुआ , महिला जाबांजो की वही "पहली बार"  परेड में आना जैसे नारी सशक्तिकरण वाले जुमले भी काम न आये |  फिर उसे ही लानते दी कि ऐसी गिरी हुई हरकते कर तू असल में मेरी नजरो में गिर रही है , ज्यादा गिरी तो मै भी परवाह न करुँगी , पड़ी रहना जहां पड़ी है | लेकिन वो ढीढ की तरह वही पड़ी रही , आखिर बीपी भी तो मेरी थी , मेरी ही जैसी , फालतू की बातो पर ध्यान ही न देना |
                                             
                                                 हिंदूवादीयो के वॉल के चक्कर लगाये अपने अंदर के हिन्दू को जगाने के लिए , वामपंथियों के भी लगाये ताकि देश संविधान धर्मनिरपेक्षता आदि  के संकट में होने पर खून में उबाल आये |   लेकिन पता चला गया , उसी दिन पता चल गया अंदर खून नहीं पानी बह रहा है कोई उबाल न आया | फिर अचानक एक लेखक साहित्यकार टाइप  पर नखरे गई  देखा नाराज थे/थी  की सम्मान हुआ लेकिन ठीक से न हुआ | तब क्या था बिना मेन्टोस के दिमाग की बत्ती जली | क्यों न बीपी तुझमे लेखक होने के भ्रम पैदा किया जाए  , तुझे ऊपर लाने के लिये थोड़ा ईगो मालिस की जरुरत है , थोड़ी झूठी प्रसंसा की चाहत है , तू खुद दो चार लाइनों की तारीफों में उफान मारती ऊपर आजायेगी और स्वयं को महान घोषित कर देगी | तो हे बीपी तू महान है  तू महानतम है , तू गिरी हुई नहीं है असल में तू  अच्छे लेखक की तरह गहराई से चिंतन मनन कर रही है | लेकिन अब और चिंतन मनन मत कर इससे ज्यादा चिंतन मनन किया तो तेरा लिखा इन दो कौड़ी के पाठको को समझ न आयेगा | वो तेरे महान लेखन को समझ नहीं पायेंगे और अपनी नासमझी छुपाने के लिए , बहुत सुन्दर प्रस्तुति , वाह खूब लिखा , गहरी बात , निशब्द हु जैसा लिख निकल लेंगे | इसलिए तुझे इतना गहरा चिंतन करने की आवश्यकता नहीं है | अब उठ जाग और ऊपर आ देख तेरे लेखन के बगैर कैसे हर जगह सन्नाटा पसरा है , कही कोई क्रांति न  हो रही , देश रसातल में जा रहा , साहित्य ख़त्म हो रहा | ऐसा न हो तू बस गहराई में चिंतन करती रहा जाये और कोई और कुछ भी लिख पुरस्कार ले जाये और तू बस आज कल के पुरस्कारों में पारदर्शिता नहीं पर भाषण देती रह जाये | तो उठ जाग ऊपर आ , ये देश, समाज साहित्य सब तेरे भरोसे ही रुके पड़े है , अब नखरे न दिखा थोड़ी अपनी गति बढ़ा  |