June 15, 2012

क्या गरीब आदमी को उसके किये अपराध की सजा नहीं मिलनी चाहिए - - - - -mangopeople


                   विषय को समझने के लिए पहले अपने साथ हुए किस्से को बताती हूं | दो दिन पहले एक टैक्सी ( २०- २२ साल पुरानी फियट उन्हें पता होता है कि उनकी गाड़ी का तो कुछ ख़राब होगा नहीं बाकि साथ चलने वालो को अपनी गाड़ी की फिक्र है तो वो अपनी गाड़ी बजाये वो तो जैसे चाहेगा वैसे अपनी गाड़ी कही भी घुसायेगा )  वाले ने मेरी गाड़ी में बगल से टक्कर मारते हुए मेरी गाड़ी का बम्पर तोड़ते हुए आगे निकल गया चुकि सड़क पर भयंकर ट्रैफिक था और गाड़िया बस रेंगे भर रही थी इसलिए वो भाग नहीं सका , मैंने कुछ आगे जा कर ही उसे पकड़ लिया | उस समय यदि वो अपनी गलती मान लेता तो शायद मै उसे जाने देती किन्तु वो गलती मानने के बजाये कहने लग की आप की भी गलती है मैंने उसे जब उसकी गलती बताई तो कहने लग चलिये थाने चलिये | थाने चलने की बात वो ऐसे कर रहा था जैसे की गलती मेरी थी और वो मुझे धमकी दे रहा था | उसे अच्छे से अंदाजा था की एक तो मै महिला हूं उस पर से मेरे साथ गाड़ी में सो रही बच्ची भी थी , ये मेरा एरिया तो होगा नहीं और मै कहा उसे ले कर थाने जाउंगी | पर उसका अंदाजा गलत था वो मेरा ही घर का एरिया था और चार इमारतों के बाद मेरा घर था |  उसके इस अंदाज पर मेरा गुस्सा और बढ़ा गया मैंने तुरंत पतिदेव को घर से बुला लिया वो दो मिनट में वहा हाजिर हो गये और हमने पुलिस स्टेशन जा कर उसके खिलाफ रिपोर्ट लिखवाई ( वैसे उसका ये अंदाजा सही था कि मुझे सच में ही अपने ही क्षेत्र के पुलिस स्टेशन का पता नहीं पता था पति तो उसके साथ चले गये पर मुझे दो लोगों से पुलिस स्टेशन का पता पूछना पड़ा जो बस मेरे घर से कुछ ही दूरी पर था ) | जब मैंने उसकी टैक्सी को रोका तो अच्छा खासा मजमा भी जुट गया था और कई आवाजे यही आ रही थी कि " मारो साले को ये सब ऐसे ही होते है कही भी टैक्सी घुसा देते है , तो एक बूढी सी महिला ने मुझसे कहा की अरे अरे इसे मारो मत बेचारा गरीब है जाने दो मैंने उन्हें कहा की अभी तक तो मैंने इसे कोई गाली भी नहीं दी है मै मार कहा रही हूं ये गरीब है तो ठीक है पर जो मेरी कार को बनवाने में हजारो का खर्च आयेगा उसे कौन देगा ( बिमा तो गाड़ी का होता है और उसे क्लेम करने के लिए और टूटे सामानों का कुछ प्रतिशत हमें ही देना होता है साथ ही क्लेम करते ही अगले साल बिमा पर मिलने वाली छुट भी हाथ से चली जाती है तो बिमा के बाद भी अपना खर्च हजारो में पहुँच ही जाता है )
                   ये मेरा किस्सा है अब जरा कल रेखा जी की लिखी इस पोस्ट को पढ़िये जिसमे वो बता रही है की किस तरह जब डाकिये ने उन्हें टेलीग्राम नहीं दिया पैसा ना देने पर और उन्होंने उसकी शिकायत कर दी जब विभागीय कार्यवाही की बारी आई तो उन्होंने उस पर दया करके उसे पहचानने से इनकार कर दिया ताकि उसकी नौकरी बच जाये किन्तु जब उन्हें दूसरे मोहल्ले में वही डाकिया मिला तो वो सुधरने के बजाये उनसे बदल लेने लग उन्हें कभी उनके पत्र नहीं दिया यहाँ तक की उनके पिता की मृत्यु पर भाई द्वारा भेजा टेलीग्राम तक नहीं दिया जिसकी वजह से वो अपने पिता के अंतिम दर्शन भी नहीं कर पाई |

                                                       हमारी भारतीय संस्कृति में गरीबो के प्रति दया दिखाने और लोगों को माफ़ कर देने को बहुत अच्छा माना जाता है किन्तु अक्सर देखा गया है की गलती के लिए दया दिखाने और माफ़ी देने से ज्यादातर लोग सुधरते नहीं है बल्कि वो उसे बहुत हल्के में लेते है और बार बार उसी गलती को दोहराते रहते है कई बार तो वो उसके लिए बदला भी लेते है जैसा की रेखा जी के केस में हुआ  | जब कभी कोई गरीब हमारा कोई नुकशान कर देता है तो लोग बार बार ये कहते है की अरे बेचारा गरीब है जाने दो वो क्या कर सकता है वो तो तुम्हारे नुकशान की भरपाई भी नहीं कर सकता है तो क्या फायदा जाने दो और हम सभी दया दिखा कर उन्हें छोड़ देते है, नतीजा ये होता है की वो उसे अपने लिए इसे अपने सुधरने के लिए अच्छा मौका मानने की जगह , अच्छी किस्मत की बच गया मान कर सुधरने के बजाये उस  पर ध्यान नहीं देते है और वैसे ही बने रहते है | किसी को भी सजा देने का अर्थ केवल पीडिता को न्याय देना ही नहीं होता है बल्कि गलती करने वाले को सबक भी सीखना होता है ताकि आगे से वो उस गलती को ना दोहराये और सजा भी इस तरह की कि उसे एक सबक मिले, पर वास्तव में होता क्या है शायद ही कोई भी छोटी मोटी टक्कर के लिए टैक्सी  वालो को लेकर थाने जाता हो ज्यादातर तो उसे वही दो चार हाथ मार कर जाने देते है क्योकि उन्हें भी पता है की टैक्सी वाले से उसे शायद ही कुछ मिले उलटे पुलिस के चक्कर में अपना खुद का दिमाग और समय ख़राब होगा |  इस केस में भी उसने मेरे पति को कहा की साहब मारना है तो मार लो अब थाने क्या चलते हो,  तो पति ने कहा  तुम्हे ही शौक था थाने जाने का ना पीछे जो आ रही है वो तुमको किसी भी हाल में छोड़ने वाली नहीं है | हमारे साथ ये तीसरा केस था इसके पहले भी दो बार पति ने वही बेचारा गरीब है क्या देगा जाने दो कह कर छोड़ दिया था | जिसमे एक बार तो एक बाईक वाले ने पीछे से आ कर सिग्नल पर खड़ी हमारी गाड़ी को जोरदार टक्कर दे मारी थी आफिस की जल्दी में पतिदेव ने उस समय बस उसका मोबाईल लिया और उसे बाद में काल करने को कह  चले आये थे मैंने जब मोबाइल देखा तो सर पिट लिया उसकी कीमत तो कोई हमें सौ रु भी ना देता वो क्या कॉल करेगा  खर्चा हमारे सर पर था | किन्तु उस मोबाइल को भी वो अपनी गरीबी का रोना रो कर बाद में मेरे पतिदेव से ले कर चला गया कहा बाइक उसकी नहीं मालिक की है और वो अभी अभी मुंबई आया है | उस समय भी मैंने पति से कहा था की तुम्हे कम से कम उसका मोबाइल नहीं लौटना था उसे एक सबक तो मिलता इस तरह तो वो कभी भी नहीं सुधरेगा  | यही कारण था की इस बार मैंने तय कर लिया था की इस तरह की कोई भी वारदात होती है तो मै उसे पुलिस तक जरुर ले कर जाउंगी और उस पर बाद में कोई कार्यवाही हो या ना हो ,कम से कम उन सब में ये डर तो बैठे की हो सकता है की सामने वाला मुझे बस मार कर ना छोड़े और सच में मेरे खिलाफ रिपोर्ट लिखवा दे और मुझे पुलिस के चक्कर में पड़ना पड़े इसलिए आगे से सावधानी से गाड़ी चलाऊ | ये हमारी अ- व्यवस्था का ही नतीजा है की यहाँ पीड़ित ही पुलिस से ज्यादा डरता है अपराध करने वाले की जगह , अपराधी ताव में कहता है की चलो चलो ले चलो थाने जैसे वो हमें डरा रहा हो कि तुम में ही हिम्मत नहीं है पुलिस तक जाने की,  वो अपराधी पीड़ित को ही पुलिस का डर दिखाता है जैसा मेरे साथ हुआ बार बार टैक्सीवाला ही मुझे घमकी देने के अंदाज में पुलिस स्टेशन चलने को कहा रहा था वो भी तब जबकि गलती उसकी थी |
                                                         
              ज्यादातर  हमें कहा जाता है की छोटी छोटी बातो को ज्यादा महत्व नहीं देना चाहिए या उसे बड़ा नहीं बनना चाहिए उसे भूल जाने में ही ठीक है , किन्तु ये रवैया सही नहीं है , जब हम दूसरो की छोटी छोटी गलतियों को भूलते है तो अक्सर हम बड़ी गलतियों को करने की या उसी गलती को बार बार करने की सामने वाले को प्रेरणा देते है | फिर ये बात तो मेरे समझ के बिल्कुल बाहर है की क्या किसी को उसके गरीब होने के कारण उसके किये गए अपराध के लिए कोई भी छुट दे देनी चाहिए | क्या अमीर या गरीब के किये गए अपराधो में फर्क हो जाता है किसी अमीर को माफ़ी देने की बात उसे छोड़ देने की बात तो कभी नहीं की जाती है ऐसा क्यों है | क्या गरीब होना आप के अपराध के प्रभावों को कम कर देता है बिल्कुल भी नहीं अपराध कोई भी करे उससे प्रभावित होने वाले पर इस बात से कोई भी फर्क नहीं पड़ता है तो फिर सजा में उसे छुट देने या उस पर दया दिखाने का भाव क्यों जगाया जाता है |  कई बार ये भी देखा है की जब कोई चोर या हत्यारा अपनी गरीबी का  दुख भरी कहानी सुना देता है अपनी कोई मजबूरी बता देता है तो लोगों के मन में तुरंत ही उसके प्रति दया भाव जाग जाती है और कहने लगते है की बेचारे ने मजबूरी में ये किया सजा देते समय उसकी मजबूरी को भी ध्यान में रख कर उसे छुट दी जानी चाहिए ( कानून की नजर में भले सब एक हो मै यहाँ आम लोगों के भावना की बात कर रही हूं ) क्या यही भाव हम किसी अमीर के लिए ला सकते है | याद कीजिये सत्यम के मालिक राजू ( यदि मेरी यादास्त सही है तो यही नाम था फ़िलहाल यही उदाहरन याद आ रहा है ) वो भी बोले की मैंने जो किया वो कंपनी और उसे से जुड़े हर व्यक्ति के भले के लिए किया और मेरे किये से शायद ही किसी को कोई नुकशान हुआ हो हा फायदा जरुर मेरे कर्मचारियों का हुआ है तो क्या उसके द्वारा किये गये अपराध पर भी हम वही दया के भाव मन में ला पाएंगे,  नहीं , शायद ही किसी के मन में दया आये हा गुस्सा जरुर बढ़ जाता है और हम और कड़ी सजा की बात करते है | हद तो तब हो जाती है की जब हम अमीर के जायज बातो पर भी अपराधियों सा व्यवहार करने लगाते है है और गरीब के अपराध को अपराध तक मानने से इंकार कर देते है |  मुकेश अम्बानी अपने पैसे से अपना शानदार अपनी हैसियत के हिसाबा से रहने लायक घर बनवाते है तो हजारो लोगो को बुरा लगता है , किन्तु उससे भी ज्यादा कीमती और हजारो गुना बड़ी सरकारी और निजी जमीनों पर लोग अवैध झोपड़े कब्ज़ा कर बना कर रहते है उसके प्रति हम सब दया का भाव अपनाने लगाते है  ऐसा क्यों है की किसी अमीर के किये छोटी सी छोटी गलती पर भी हम कड़ा रुख अपनाने की बात करते है पर गरीब की बात आते ही हम में दया आ जाती है | ना भूलिए की अमीरों को अपराध करने की आदत नहीं होती है वो भी बस उसी अपने फायदे के लालचा में अपराध करते है जिस लालचा में कोई अन्य गरीब करता है जब अपराध करने का कारण एक है तो समाज का रवैया अपराधियों के प्रति अलग अलग क्यों होता है | क्या ऐसा कर के हम कही ना कही अपराध को ही बढ़ावा नहीं दे रहे है क्या हमें छोटे अपराधो और बड़े अपराधो को दो दृष्टि से देखना चाहिए ( लो जी इतनी बार "क्या क्या " लिखने के बाद सतीश पंचम जी की क्यावाद पोस्ट की याद आ गई ) |
                                                                 मै ऐसा नहीं मानती हूँ की हमें अपराध के पीछे जो मजबूरी है उस पर ध्यान ही नहीं देना चाहिए किन्तु एक आम सी गलतियों और अपराधो पर जिसके पीछे कोई मजबूरी नहीं बल्कि लापरवाही या लालच हो उसे तो कतई माफ़ नहीं किया जाना चाहिए चाहे वो कोई गरीबा करे या अमीर | गरीबी कभी भी किसी अपराधी या गलती करने वाले को मिलने वाली सजा में छुट का कारण नहीं हो सकती है | जब तक हम अपराधी के गरीब होने के कारण उसकी गलती को नजर अंदाज करने की आदत और गलत करने वालो को सजा देना की शुरुआत नहीं करेंगे ये समाज और व्यवस्था दुरुस्त नहीं होगी |
                                                कई बार सुना है की क्षमा और माफ़ी देने से इन्सान का कद बढ़ जाता है पर मै कभी भी इस को सही नहीं मानती हूँ नीजि जीवन में भी मै ये मानती हूँ की पहली गलती को माफ़ कर हम हमेसा दूसरी गलती हो बढ़ावा देते है मेरी छोटी बेटी ही क्यों ना हो किन्तु कोई ना कोई साकेंतिक ही सही सजा उसकी गलती पर जरुर देती हूँ जो उसे सबक जैसा लगे | अपनी गलती मान ले तो छोटी सजा या पहले ही मुझे आ कर बता दे तो सख्त लहजे में आगे ऐसा ना करने की चेतावनी ही उसके लिए काफी है | वो अभी भले ही इस बात को ना समझे पर बड़ी होने के साथ ही वो उसे समझाने लगेगी | वैसे मै उसे सजा क्या देती हूँ :) आज पूरे दिन तुम्हारा चैनल नहीं लगेगा बड़ी गलती पर दो चार दिन तक तुम अपना चैनल नहीं देख सकोगी क्या करे उसके लिए तो यही सजा है सो व्यक्ति को सजा वही दी जानी चाहिए जिसे वो सजा माने |


चलते चलते
               कुछ चीजो को लेकर समाज और लोग हमें पहले से इतना डरा देता है की हम डर की बात ना होने के बाद भी डरने लगते है | कुछ साल पहले मेरा मोबाईल घूम गया था , नये सिम कार्ड के लिए हमें पुलिस स्टेशन में जा कर कुछ एन ओ सी जैसा लेना पड़ता है पतिदेव को पुलिस स्टेशन भेजते मुझे डर लगा रहा था क्या करे पुलिस स्टेशन की छवि ही ऐसी बना दी गई थी | किन्तु इस बार ना जाने क्यों एक बार भी मुझे इस बात का डर नहीं लगा की मै महिला हो कर पुलिस स्टेशन जा रही हूँ वहा का माहौल भी फ़िल्मी पुलिस स्टेशनों से अलग एक आफिस की तरह का था जहा एक कमरे में चार आलग अलग काउंटर जैसा था बस सब खाकी यूनिफार्म में थे पहले पुलिस ने मेरी बात ध्यान से सुना फिर कहा बस १० मिनट लगेंगे आप के कागजो से नंबर नोट करना है फिर आ पा जा सकती है दूसरे ने मेरी रिपोर्ट लिखी यहाँ तक की उसे निर्देश दिया गया की हमारे साथ छोटी बच्ची है जल्दी किया जाये और जब मै हड़बड़ी में अपनी कर का नंबर ठीक से बता नहीं पाई ( डर नहीं लगा थोड़ी हडबडाहट थी क्योकि घटना का ठीक से ब्यौरा देना था जो उसकी मराठी और मेरी हिंदी से गड़बड़ हो जा रही थी ) तो उसने आर सी बुक से देख खुद ही नोट कर लिया , सब ने ठीक से अच्छे से बात सुनी और अच्छे से बात की भी |  नहीं नहीं कोई जल्द बाजी ना कीजिये  आप लोग पुलिस स्टेशन के बारे में अपने कोई राय बनाने में क्योकि अभी घटना के बस दो दिन ही हुए है अभी आगे क्या होगा मुझे भी नहीं पता है मै तो वापस नहीं जाने वाली हूँ पर उधर से क्या होगा पता नहीं क्या पता फिर से एक पोस्ट लिखू की ये मैंने क्यों गलती कर दी पुलिस स्टेशन जा कर :( और हा मेरे साथ अच्छा व्यवहार कर रहे पुलिस वालो का रुख जरा टैक्सी वाले के प्रति देखिये "क्यों तेरा बैच  कहा है ' " साहब जेब में है " थोडा तेज आवाज में  " तुझे बैच जेब में रखने के लिए मिलता है क्या,  बाहर निकाल टांगने नहीं आता है क्या " मेरी दया कुछ जागने लगी थी | रिपोर्ट लिखवाने से पहले पति से कहा की जरा उससे पूछो नुकशान की भरपाई कर दे तो क्या रिपोर्ट लिखवाऊ जाने दो और पतिदेव ने क्या कहा वही  " अरे वो इतना गरीब है वो क्या देगा तुम देख लो क्या करना है " |  ऊफ ऊफ ऊफ हम सब ऐसे ही है पर हमें बदलना होगा रिपोर्ट तो मैंने लिखवा ही दी दिल पर बस छोटा सा कंकण रखना पड़ा |

March 05, 2012

टिपण्णी जो पोस्ट ही बन गई - - - - -- mangopeople

                  

    लो जी लिखने बैठी थी तो टिपण्णी लेकिन इतनी लम्बी हो गई की एक पोस्ट ही बन जाये फिर मेरी बनिया बुद्धि ने कहा की इतनी मेहनत से टिपण्णी लिखी है बस एक ही व्यक्ति क्यों पढ़े अपनी पोस्ट बना कर डाल देती हूँ आम के आप गुठलियों के दाम मेरी पोस्ट पर पाठको की आवाजाही भी हो जाएगी थोड़ी टी आर पी भी मिल जाएगी  ।
                   टिपण्णी नारी  ब्लॉग  के  इस  पोस्ट  पर  दी  है  पूरा माजरा जानने के लिए तो उस पोस्ट पर ही जाना होगा क्योकि नारी ब्लॉग के कुछ कापी कर नहीं सकते :)




                
              जीतनी बनिया बुद्धि है उसी हिसाब से आप के सवालो का जवाब देने का प्रयास कर रही हूँ शायद मेरा जवाब आप की उच्च श्रेणी की बुद्धि के समझ में आ जाये ।
        मै भी नहीं मानती की ताजमहल से ले कर पिरामिड तक किसी का भी अस्तित्व नहीं है , क्योकि उन सब को मैंने निजी रूप से नहीं देखा है किसी और ने देखा है तो मुझे क्या जब मैंने नहीं देखा तो मेरे लिए दुनिया में उनका कोई भी अस्तित्व नहीं है कोई और कुछ भी बकता रहे मुझे क्या,  इस हिसाब से आप की बात सही है की आप ने टी वी पर नहीं दिखा तो उस घटना का कोई अस्तित्व नहीं है  :)
                                                             क्या निचली कोर्ट के फैसले किसी घटना को सही ये गलत साबित करने के लिए काफी है तो फिर तो रुचिका से ले कर जेसिका और मट्टू तक के केस में निचली अदालतों ने अपराधियों को बाइज्जत बरी कर दिया था तो क्या माना जाये वो सब निर्दोष थे और बाद में जो उपरी अदालतों ने फैसलों को पलटा वो सब चालबाजिया थी झूठ के बल पर केस जीते गएऔर इस तरह के हजारो केस होते है ।
                                 आप ने दहेज़ के बिना विवाह किया बहुत ही अच्छा काम किया सभी युवाओ को आप से प्रेरणा लेनी चाहिए किन्तु क्या आप के मना करने के बाद भी आप के ससुराल वालो ने आप को जबरजस्ती दहेज़ दे दिया था । निश्चित रूप से उन्होंने आप को उपहार के रूप में सामान लेने की पेशकश की होगी और आप के मना करने पर नहीं दिया होगा या आप ने दृढ़ता से मना कर दिया होगा । क्या आप को लगता है की लडके वाले दहेज़ न मागे और लड़की वाला जबरजस्ती लोगो को दहेज़ देता है ।
                         रही बात पैसे वाला लड़का खोजने की तो हर व्यक्ति अपनी लड़की के वर के  लिए दो चीजे ध्यान में रख कर चलता है एक तो दोनों परिवारों की सामजिक हैसियत एक बराबर हो और ये केवल बनिया परिवारों में ही नहीं होता है बल्कि समाज के हर तबके में यही रिवाज है की सम्बन्ध हमेसा अपने बराबर वालो से ही बनाया जाता है ( विवाह तो बहुत बड़ी चीज है कई जगह तो मित्रता का सम्बन्ध और परिचय तक बराबर वालो या खुद से बड़े सामाजिक हैसियत वालो से ही बनाया जाता है ) ये समाजका एक रूप है आप ख़राब कहे या अच्चा पर समाज में यही प्रचलित है । विवाह के लिए दूसरी बात होती है वर की योग्यता जिसे देखा कर कई बार लोग लडके से जुडी दूसरी बातो को अनदेखा कर देते है ।
                                                            आप की इस बात से कोई भी सहमत नहीं होगा की यदि कोई गरीब  लड़का दहेज़ न ले रहा हो तो किसी को भी अपनी लड़की का विवाह उससे कर देना चाहिए,  क्यों कर देना चाहिए किस आधार पर , बस इसलिए की वो दहेज़ नहीं ले रहा है विवाह का ये आधार नहीं होता है सबसे बड़ा आधार होता है की लड़का मानसिक , शारीरिक और आर्थिक रूप से विवाह से जुडी  जिम्मेदारियों को निभा सके । हर व्यक्ति देखेगा की दहेज़ तो नहीं ले रहा है कितु वह लड़की से विवाह करने के कितने योग्य है तीनो ही रूप में यदि योग्य हुआ तो कोई भी इंकार नहीं करता है जैसे की आप के ससुराल वालो ने अपनी लड़की से आप का विवाह किया । हम सभी तो सब्जी लेने भी जाते है तो सस्ता की जगह अच्छी सब्जी को महत्व देते है भले वो महँगी मिले तो फिर कोई भी अपनी लड़की के विवाह के लिए दहेज़ नहीं लेना कैसे आधार बना सकता है ।
                                                     रही बात पैसे वालो के घर शादी करने की या लड़की वालो के पैसे के बल पर लड़का खोजने की तो ये बात तो केवल पैसे वालो के घर होता है जरा माध्यम वर्ग और गरीब तबके की और देखिये जिसके घरो की लड़कियों के जन्म के साथ ही उसके दहेज़ की चिंता सर पर आ जाती है जन्म के साथ पैसा जुटा रहा पिता ये विवाह के समय देखता है की सालो से जुटाया पैसा भी विवाह के समय लड़को वालो की मांग के आगे कम पड़ रहा है चप्पले घिस जाती है उसकी एक लड़की के विवाह में फिर उनकी सोचिये जिनकी कई लड़किया होती है माध्यम वर्ग तो फिर भी मरते जीते कर लेता है गरीब तबके की हालत तो और बुरी है योग्य से अयोग्य लड़का भी भारी दहेज़ मांगता है उनके हैसियत के हिसाब से । माध्यम और गरीब घरो में तो घरो में महंगे सामान ही लडके के विवाह में मांगने के लिए छोड़ दिया जाता है । कोई भी माध्यम या गरीब वर्ग की लड़की का पिता आप को नहीं मिलेगा जो योग्य वर होने के बाद भी दहेज़ न लेने वाले लड़को को इंकार कर दे ।
                 अब आते है दहेज़ केस को साबित करने की तो कोई भी लड़की वाला ये सोच कर विवाह नहीं करता है की कल को उसकी लड़की को सताया जायेगा और दहेज़ माँगा जायेगा और मै इन पर केस करूँगा तो मुझे अभी से दहेज़ देने के सरे साबुत जुटा लेना चाहिए हा एक लिस्ट होती है सादे कागज पर उसे भी ज्यादा दिन संभाल कर नहीं रखा जाता है और न ही क़ानूनी रूप से उसका ज्यादा महत्व नहीं होता है । रही बात दहेज़ के पैसो को चेक या ड्राफ़ के रूप में देने की तो मै बस इतना ही कहूँगी हा हा हा हा हा हा हा इस बात पर मै बस हंस सकती हूँ :) ।
                  अब निशा के केस पर आते है वो ये केस किस आधार पर हारी मुझे नहीं पता है  मै कानून की जानकर नहीं हूँ किन्तु जब ये केस हुआ था तो तभी जानकारों ने बताया था की ये केस साबित करना बहुत ही मुश्किल होगा क्योकि भारतीय कानून के मुताबिक दहेज़ केस विवाह के बाद ही बन सकता है विवाह के पूर्व नहीं, जबकि निशा ने कहा है की मनीष के साथ  विवाह नहीं हुआ है और कुछ दिन बाद ही उसने दूसरा विवाह कर लिया था,  यदि अब वो कहती है की विवाह हुआ था तो उसकी दूसरी शादी गलत और अपराध साबित हो जायेगा और विवाह नहीं कहने पर मजबूत केस नहीं बनेगा । इसके साथ ही ये भी कहना चाहूंगी की कानून का दुरुपयोग आम लोग नहीं कानून के जानकर, क़ानूनी सलाह देने वाले और केस को अदालत में लड़ने वाले कर्त६ए है आप आदमी नहीं जनता की उसे इंसाफ के लिए किस धरा के तहत केस करना चाहिए वो तो कोई जानकारी ही बताता है हा एक दो केस जरुर हो सकते है जहा जबरजस्ती वकील को अपने बताये केस पर लड़ने को कहा जाता है ।
                          ९०% वाली बात मैंने इसलिए कही क्योकि जब आप कही पर कोई आंकड़े देते है तो आप को उसका स्रोत भी बताना चाहिए वरना "ज्यादातर" या " बहुत सारे " जैसे शब्दों का प्रयोग करना चाहिए । आप किस आधार पर कह रहे है की ९०% केस झूठे होते है ।
                                                              लड़कियों को विवाह ही नहीं करनी चाहिए ये क्या बात हुए ज्यादातर  नेता चोर है इसलिए वोट देने मत जाओ , ज्यादातर पुलिस वाले भ्रष्ट है तो कोई शिकायत पुलिस वाले के पास मत ले जाओ आदि आदि क्या समाज में इस तरह से रहा जाता है ऐसा नहीं होता है । लड़कियों के विवाह नहीं करना इस समस्या का समाधान नहीं है और ना ही उनके कमाने से ये समस्या जाएगी क्योकि दहेज़ कमाने वाली लड़कियों से भी माँगा जाता है ये बात आप टिपण्णी में दूसरो ने भी कही है ।
   " अमीर लडके से शादी करके लड़की मौज कर सके "
                निहायत ही घटिया और बकवास बात लिखी है आप ने ये "मौज" करना क्या होता है । लड़की वाले मोटी रकम दे कर अमीर लडके से अपनी लड़की की शादी करते है ये आप को ख़राब लगता है किन्तु अमीर हो कर भी  पैसा ले कर किसी से भी  शादी कर लेने वाला लड़का आप को अच्छा लगता है मुझे तो लगता है की ऐसे केस में यदि कोई घटिया है तो लड़का ही ज्यादा घटिया है , क्योकि लड़की का पिता तो जो कर रहा है वो अपनी बेटी के अच्छे और आर्थिक रूप से अच्छे भविष्य के लिए ऐसा कर रहा है ।
                                  और मैंने अपने बनिया और बनिया बिरादरी की बात इसलिए की क्योकि मै केवल अपने आस पास, अपने आँखों देखी  और करीब हुए घटनाओ के बारे में ही बताना चाह रही थी ना की समाज में बस प्रचलित किसी बात का दोहराने का प्रयास कर रही थी ताकि लोगो को लगे की मै सच बात कर रही हूँ ना की बस यु ही कोई आंकड़े फेक रही हूँ । हा पर जिस तरह आप ने उस पर अपने पैजामे से निकल कर  टिपण्णी की है उसके आप की सोच समझ और बुद्धि किस बिरादरी की है ये जरुर पता चला गया । आप की बिरादरी तो मुझे नहीं पता क्योकि बनिया कभी किसी की बिरादरी नहीं देखता है उसे तो बस अपना लाभ देखना है सामने कोई भी बिरादरी का जाति का व्यक्ति हो हा  आप की उच्च कोटी की बुद्धि से ही मुझे पता चला की अपना लाभ देखना तो केवल हम बनियों को ही आती है बाकि दुनिया तो संत होता है । :))))
                 

चलते चलते  
                        जब मुझे और मेरी बनिया बुद्धि और सोच का वाह वाही की गई तो सोचा जवाब में मै भी सामने वाले की बिरादरी की वाह वाही जरा अपने ढंग से कर दूँ  क्या है की दूसरो की जाति बिरादरी और आर्थिक स्थिति पर उंगली उठा कर कुछ कहने और सामने वाले को निचा दिखने में जितना आन्नद "मजा"  "मौज" आता है उसकी तो बात ही कुछ और होती है दिमाग में दो चार उनके नाम से झलक रहे जाति से दो चार वाह वाही सोच भी ली पर फिर मेरी बनिया सोच ने मुझसे कहा की उन्होंने मेरी बिरादरी के बारे में कुछ कहा फिर मै उनके बारे में कहूँगी फिर वो पलट के मेरे बारे में कहेंगे और मै उनके फिर ये सिलसिला लम्बा हो जायेगा और जब उसे जोड़ा घटाया तो पता चला की सौदा फायदे का नहीं घाटे का है समय अपने पास है नहीं बिटिया रानी ने महीनो पहले ही अपनी छुट्टियों के लिए मुझे बुक कर लिया था इसमे फंस गई तो उधर से नुकशान हो जायेगा तो ये सौदेबाजी यही छोड़ दी । क्योकि जिस काम में बनिए का फायदा ना हो वो नहीं करता है बाकि लोगो की तरह थोड़े ही की किसी को कुछ कहने के लिए,  अपने बुरे अनुभवों की खुन्नस निकालने के लिए , अपने संबंधियों को ब्लॉग पर सारे आप बेइज्जती करने के लिए अपना कीमती समय और दिमाग लगाये । कहते है की जहा फायदा ना हो वह तो गली देना क्या  थूकना भी नहीं चाहिए  :)))))
 

January 13, 2012

ये विज्ञापन जरुर देखिये ,यदि आप के भी राज्य में कोई चुनाव हो रहे है - - - - - mangopeople
















                                                              यदि आप के भी राज्य में कोई चुनाव हो रहे है तो ये विज्ञापन जरुर देखिये और जानिए अपने क्षेत्र से लड़ रहे चुनावी उम्मीदवारों  के बारे में और सोच समझ कर वोट करे | विज्ञापन जरुर देखे और सुविधा का प्रयोग  करे |

 

January 04, 2012

इसे पढ़ने के बाद पता चलेगा की राष्ट्रीय प्रतिको के बारे में आप की जानकारी कितनी कम है - - - -mangopeople

लिस्ट के ऊपर क्लिक कर बड़ा कर ले फिर पढ़े  |
अब तो आप समझ गए होंगे की आप की जानकारी राष्ट्रीय  प्रतिको के प्रति कितनी कम है !
दिल पे ना ले महज हास्य और व्यग्य के लिए है ;) 
फेस बुक से प्राप्त ----

December 02, 2011

सरकारी ऑनर किलिंग - - - - - - mangopeople


                                                                           

                                                         सरकार के लिए किराने में विदेशी निवेश अब साख का सवाल है कहती है की अब कदम वापस नहीं ले सकते है हमारी इज्जत का सवाल है भले लोग कितना भी विरोध करे संसद ठप रहती है तो रहे उसे क्या | सरकार का व्यवहार बिलकुल परिवार में उस बाप की तरह है जो बेटी यानि की आम जनता को अपने इज्जत के नाम पर मारने पर तुली है | सरकार को जनता रूपी बेटी का पिता होना चाहिए  किन्तु वो बाप सा व्यवहार कर रही है | बाप और पिता शब्दों का अंतर तो समझते होंगे ही ना , पिता शब्द आते ही दिमाग में परिवार चलाने वाला परिवार की ख़ुशी का ध्यान रखने वाला उसकी जरूरतों के लिए कुछ भी कर गुजरने वाले का ध्यान आता है और बाप शब्द आते है दिमाग में अपनी बपौती ज़माने वाला हर समय अपनी ही चलाने वाला , सिर्फ परिवार पर बाप होने की धौस ज़माने वाले की छवि बनती है जो अधिकार तो सब रखता है और परिवार के प्रति अपना कोई कर्तव्य नहीं समझता है | बस सरकार भी जनता के पिता के बजाये उसकी बाप बन गई है जिसके लिए परिवार उसके हित से बड़ा उसकी इज्जत हो गई है और जनता यहाँ बेटी की तरह अपने खुशियों जरूरतों के लिए उसका मुंह ताक रही है | अब जब बाप जी ने कह दिया है की ये उसकी साख का सवाल है तो बेटी के हित की कुर्बानी तो होगी ही | इसे क्या कहेंगे खालिस सरकारी ऑनर किलिंग बाप के इज्जत के नाम पर बेटी के हत्या |
                               पर यहाँ भी सारी इज्जत बस बेटी का मामला होने पर ही ख़राब होता है जब मामला बेटो यानि सरकारी कर्मचारी या बड़े उद्योगपतियों का हो तो ये बाप को अपने कदम वापस खीचने में कोई गुरेज नहीं होता है , प्रधानमंत्री ने अन्ना को लिखित में आश्वाशन दिया था की उनके मुख्य तीन मांगे मान ली गई है यहाँ तक की संसद में भी सभी सांसदों ने हामी भर दी थी, हद तो तब हो गई जब स्थाई समिति ने भी इन मांगो को मान लिया था लेकिन दुसरे ही दिन पुत्र प्रेम जाग गया और फिर कदम वापस ले लिए गए क्योकि उसके कदमो से बेटो को परेशानी जो होती, फिर इन बाप लोगो को इज्जत का ख्याल नहीं आया की जो जबान दी है तो उसे कैसे वापस ले , पर कहते है न  बेटो के लिए सब कुछ, उनके तो सात खून भी माफ़ पर जब बात बेटी की हो तो एक कदम भी पीछे नहीं होगा | सोचती हूँ की इस विषय में अब उन लोगो का क्या मत होगा जो कुछ दिन पहले तक देश में संसद को ही सर्वोच्च मान रहे थे उनके अनुसार परिवार में माँ बाप ही सब कुछ है बच्चो की कोई कीमत नहीं है बच्चे होते ही इसलिए है की वो माँ बाप बना सके इसलिए घर में चलेगी तो माँ बाप यानि सत्ता पक्ष और विपक्ष को मिला कर संसद की | तो अब बताइए की जब ये हमारे माँ बाप ही अपनी बातो से पलट जाये बच्चो को सरेआम आश्वासन  दे कर बदल जाये तो उनका क्या करे क्या अब भी संसद को ही सर्वोच्च मानाने की दलील को वो सही बताएँगे | आम लोग,  देश हित  उसकी जान की कीमत तथाकथित बाप की इज्जत के सामने कुछ भी नहीं है | तो भाई इस देश की परम्परा रही है की बेटियों ने हमेशा अपने हित को बाप के इज्जत के नाम पर मार दिया है तो आम लोग भी तैयार रहे बलिदान के लिए |
                   तर्क तो कई दिए जा रहे है कहते है की दलाल दलाली खा खा कर,  सामान कई हाथो में जा जा कर महंगाई बढ़ा रहा है और सरकार को बदनाम कर रहा है | किसान से ६ रु का प्याज खरीदते है उसमे ट्रांसपोर्ट , दलाली,  व्यापारी ,मजदूरी, थोक, फुटकर सब मिला कर उपभोक्ता के पास २० रु में पहुंचता है , विदेशी आयेंगे तो ऐसा नहीं होगा वो सीधे किसानो से खरीद कर आप को देंगे बीच का सब खर्चा ख़त्म उस पर से कोल्ड स्टोरेज बनायेंगे सामान ख़राब नहीं होगा | सोचती हूँ क्या इन विदेशियों के पास कोनो जादू की छड़ी है क्या जो फसल खेत से उड़ा कर सीधे हमारे घर पहुंचा देगा और ट्रांसपोर्ट का खर्च बच जायेगा, कोल्ड स्टोरेज का खर्चा , बड़े बड़े मॉल खोलेगा जगह का खर्चा उसमे लगे ए सी का खर्चा कर्मचारी का खर्चा , सब राज्यों में लगा टैक्स और टीवी से लेकर अखबार तक में अपने बड़े बड़े विज्ञापन का खर्चा खुद उठाएगा , और अपना मुनाफा छोड़  हमको सस्ता सामान देगा | किसानो को भी फायदा होगा कंपनी साहब के लोग आयेंगे हरपत्तू, खरपत्तो , भोला,  माधव सभी के झोपड़ो में खुद जायेंगे और सबकी कुछ कुछ बीघे में उगी फसल खरीदेंगे कोई दलाल बीच में न होगा | क्या वाकई ऐसा होगा ,  काहे की कई बार पतिदेव से सुन चुकी हूँ की आफिस की स्टेशनरी से लेकर कोई भी सामान की खरीद में इ काम में लगा आफिसर हमेशा पहले अपना कमीशन तय करता है फिर सामान खरीदता है कंपनी के लिए , हा दलाली बंद हो जाएगी कमीशन शुरू होगा बिलकुल अंग्रेजी काम | सच्चो में इ में तो किसान और हम उपभोक्ता का बड़ा फायदा है ,  लगता है कोनो चैरिटेबल संस्था है इ वालमार्ट और का का , शायद सरकार महंगाई खुद से कम नहीं कर पा रही है तो इ संस्था को बुला रही है की लो भैया अब तुम ही यहाँ की महंगाई दूर करो हमरे बस की बात तो ना है ये |
                                                                 दसक पहले भी जब भारत के बड़े उद्योगिक घरानों को किराना कारोबार में लाया गया तब भी यही दलील दी गई थी की उपभोक्ता और किसान दोनों को फायदा होगा उपभोक्ता को कितना फायदा है सब जानते है जब इन शानदार मॉल में सामानों पर १० से ५० पैसे की भारी छुट दी जाती है और एक समय में एक के बजाये जबरजस्ती दो सामान बेच दिया जाता है एक लो दूसरे पर छुट पाओ सामान घर लाने पर पता चलता है की १०० की जगह २०० का दो सामान लाये और कुछ छुट मिली ५ रुपये का इतनी छुट तो थोक बाजार में हमेशा ही मिल जाती है कई सामानों पर और आज भी कोई भी कंपनी सीधे किसानो से शायद ही कुछ खरीदती हो | सस्ता सामान कैसे दे वो उनके भी तो हजार खर्चे है वो अपने जेब से थोड़े ही भरेंगे वो भी खरीदारों के ही जेब से जायेगा | पर यहाँ तो अब भी उपभोक्ता को सब्ज बाग दिखाया जा रहा है सस्ता सामान का महंगाई कम होने का | मंत्री जी कहते है की जब देशी लोगो को छुट दिया गया था तब भी हो हल्ला मचा था बाद में सब ठीक हो गया कोनो फर्क पड़ा किराना दुकान चलाने वालो को | मंत्री जी सही ही कह रहे है मंत्री जो है इन मॉल में जाने वाले तो शायद आसमान से टपके है उसके पहले तो वो किसी किराना दुकान पर जाते ही नहीं थे इसलिए छोटे दुकानदारो के ग्राहकी पर तो कोनो फर्क पड़ा ही नहीं आगे भी नहीं पड़ेगा बेकार में लोग हो हल्ला मचा रहे है | जैसे की कोनो शराबी ख़राब लड़का से बिया करने पर बिटिया पहले खूब चिल्लाती है बाद में "भयल बिया मोर करबो का"  की तर्ज पर मार खा कर रो कर गा कर निभाती ही है,  बाप के इज्जत का सवाल है तो एक बार आने दीजिये विदेशी दुकानदारो को उसके बाद किसान जनता सब झेलबे करेगी जाएगी कहा कोनो और ठोर ठिकाना तो है नहीं उनका,  दोनों जगह पराई ही होती है | तो हम आम लोग जब अपने ही देश की सरकार के लिए पराये हो गए है तो इ विदेशी हमको क्या अपना समझेंगे दोनों मिल कर खून चूसेंगे |
                                                  

November 24, 2011

नशा शराब में होता तो नाचती बोतल - - - - - - mangopeople

                                                                नशा शराब में होता तो नाचती बोतल क्या खूब लिखा है लिखने वाले ने पता नहीं लिखने वाला शराब और नशा  से कितना परिचित था पर जिसने भी लिखा है शराब पीने वालो को उसकी वकालत करने के लिए एक अच्छी लाइन दे  दी थी | शराबियो ( भाई शराब पीने वालो को शराबी ही कहेंगे न कितनी मात्रा में पीता है इस बात से क्या फर्क पड़ता है यदि आप के पास कोई और शब्द हो तो बताइए ) और उनसे सहानुभूति रखने वालो में हड़कंप मचा है सब अन्ना के शराबियो को पीट कर शराब छुड़ाने वाले बयान डरे है और उन्हें खुद के पीटे जाने का डर सता रहा है | सभी लगे है अपने अपने स्तर पर इस बात का विरोध करने में , कल को देश के युवराज के इस बयान पर की ,  मायावती सरकार किसानो की जमीने सस्ते में खरीद कर बिल्डरों को दे देती है और किसानो को दिए पैसे को वापस हड़पने के लिए उन किसानो के गांव में शराब का ठेका खोल देती है , पर जोरदार ताली बजाने वाले आज दुखी है परेशान है की हमारे युवराज के उठाये मुद्दों को कोई और हड़प रहा है और गरीबो के बीच से शराब हटाने की बात कहा रहा है न केवल कह रहा है बल्कि शराबियो के पीट पीट कर सुधार देने का दावा भी कर रहा है | लो जी हमारे मुद्दे कोई कैसे हड़प सकता है ये काम तो बस हमारा है हमने जनलोकपाल बिल का मुद्दा लोकपाल को एक अलग संवैधानिक  दर्जा देने की बात कर हड़पने और गड़पने का प्रयास किया असफल हो गया कोई बात नहीं पर ये हडपने का काम बस हमारा है हमें ही शोभा देता है |
                                       शराब और नशा  प्रेमी दुखी है अब क्या अन्ना हमारी पिटाई करके हमसे शराब छुड़वा देंगे क्या कही ऐसा न हो की अन्ना के भ्रष्टाचार के मुद्दे पर परिवार को होश और जोश में ला दिया था कही वो भी शराब का विरोध न करने लगे और शुरुआत घर से विरोध करने का न करने लगे | बड़ी मुश्किल से बीबी बच्चो को समझा कर रखा है की एक पैग शराब तो डाक्टर भी लेने को कहता है ( कम्बखत आज तक ऐसा कहने वाला डाक्टर मुझे मिला नहीं आप के पास उसका पता हो तो बताइयेगा )  शराब  तो  हम  बेचारे   ??? कभी खुशी, कभी गम, कभी थकान उतारने, कभी बोरियत मिटाने और कभी कुछ भी खास न होने की वजह से इस का सहारा लेते हैं." ( चुराई गई लाइन है काहे की हमें शराब पीने के कारणों का नहीं पता था :)) )  इसमे कोई बुराई नहीं है | बुराई तो तब है जब पत्निया, बेटिया और बहुए इन कारणों को बता कर एक पैग मारने की जिद करने लगे | शराब पीने का अच्छा और महान काम बस पुरुषो के लिए ही अच्छा है जब ये काम नारी करे तो वो बुराई और गलत बन जाता है | पीना तो छोडिये कोई महिला सेलेब्रेटी शराब बनाने वाली कंपनी के किसी भी उत्पाद का विज्ञापन भी करे तो वो गलत है पर हम अपने पीने पिलाने का हर जगह प्रचार प्रसार करते रहे तो वो सही है | वैसे महिलाओ का पीना भी सभी के लिए गलत नहीं है बस वो पुरुषो के कहने पर उनकी इच्छा पर उनकी इजाजत पर हो , वो खुद किसी की मर्जी इच्छा इजाजत की जरुरत समझते हो या नहीं किन्तु महिलाओ को इसकी जरुरत पड़ेगी | कभी समाज, सामाजिक स्तर, सामाजिक मेल मिलाप के नाम पर तो कभी बस कोई और नहीं मिला तो पति का साथ देने के नाम पर ही पत्निया शुरुआत कर सकती है या उन्हें इजाजत मिलती है या कभी कभी उन्हें मजबूर किया जाता है | किन्तु यही दृश्य उलटा हो पति न पिये और पत्नी की इच्छा हो तो वो नहीं कर सकती क्योकि शराब एक गन्दी चीज है ये स्वास्थ के लिए अच्छी नहीं है क्योकि महिलाए कोमल नाजुक होती है उन्हें माँ बनना है ( एक रिसर्च के अनुसार अल्कोहल पुरुषो के पिता बनने के सामर्थ को बहुत नुकशान पहुंचा रहा है , अब इसका लिंक न मगियेगा मेरे पास नहीं है खोजना है खुद खोज लीजिये  मानना है मानिये नहीं तो मत मानिये ) ब्ला ब्ला ब्ला | बहुत पहले टीवी पर एक रिपोर्ट देखी थी गांव के एक मजदूर पति पत्नी से बात की जा रही थी , पति से पूछा गया की भाई तुम शराब क्यों पीते हो मजदूरी करते हो सारे पैसे शराब में क्यों उड़ा देते हो तो उसका जवाब था की दिनभर मजदूरी करने के बाद शरीर इतना दुखता है की उसे भुलाने के लिए पीना पड़ता है , बगल में लगभग ५० साल की उसकी पत्नी ने तपाक से कहा की मजदूरी तो मै भी करती हूँ रोज तुम्हारे साथ , घर का काम और इतने साल बच्चो की भी देखभाल की है मैंने तो अपनी थकान मिटाने के लिए कभी शराब नहीं पी रिपोर्टर ने कहा जवाब दीजिये पति मुस्करा का रह गया | वैसे किसी के पास इसका जवाब हो और जवाब देने की हिम्मत हो ईमानदारी से तो हमें जरुर बताइयेगा जानने की इच्छा है :) |
                                                             सब कहेंगे की भाई ये तो गलत है गरीब को शराब का नशा नहीं करना चाहिए उसके पास पैसा नहीं है उसे अपने पैसे शराब में नहीं उड़ाना चाहिए | मतलब शराब में तो अब भी कोई खराबी नहीं है असल बुराई तो पैसा न होना है  जो पैसा हो तो जीतनी चाहो उतनी पीओ और पीने के बाद पत्नियों, माँ , बच्चे भाई बहन पडोसी , मित्र सभी को पीटो झगडा करो गरीब हो तो नाली में गिरो अमीर हो तो गाड़ी रास्ते में चल रहे,  फुटपाथ पर सोये लोगो पर चढ़ा दो  सब करो तुमको पूरी छुट है किन्तु शराबी को पीटने की बात मत करो ये तानाशाही है,  तुगलकी फरमान है,  तालिबानी ????( कल ही एक धर्म के भाई साहब इस शब्द पर आपत्ति कर रहे थे कहते है की हमारे धर्म में तो शराब हराम है कोई नहीं पीता है तो इस मामले में ये शब्द नकारात्मक रूप से क्यों प्रयोग किया जा रहा है बात तो सही लगाती है जी  ) सोच है हम सभी को इसका विरोध करना चाहिए |
                           शराब का नशा एक और जगह गलत हो जाता है वो तब जब ये हमारे बच्चे करे युवा करे तब ये गलत है गलत संस्कार है | युवाओ के ये नहीं करना चाहिए आज के युवाओ को शराब का लत पड़ गई है वो शराबी हो गए है वो बिगड़ गए है, युवा भटक गए है उन पर पश्चिमी संस्कृति का असर हो गया है उनमे बड़ो का लिहाज नहीं रहा है वो माँ बाप के पैसे उड़ा रहे है लेक्चर लेक्चर लेक्चर लेक्चर !!!! एक बात आज तक समझ नहीं आई जब थोड़ी मात्रा में शराब बुरी नहीं है , ये जोश को और बढ़ा देती है ये आन्नद देती है ये बुराई नहीं है तो पीने वाले परिवार के साथ मिल बैठ कर क्यों नहीं पीते कोई भी आन्नद सिर्फ खुद लेना और परिवार को उससे दूर रखना ये तो गलत बात है,  ठीक है भाई शारीरक रूप से आप सभी अलग है तो आप पटियाला पीजिये बीबी बच्चो को एक छोटा पैग बना कर दीजिये क्या बुराई है जितने ये आप के स्वस्थ पर असर करेगी उतना ही आप के बीबी बच्चो पर | कहते है जिस काम को पूरा परिवार मिल बैठ कर करे उसमे आन्नद दुगना हो जाता है पता नहीं क्यों लोग इस आन्नद को बढ़ाने से परहेज करते है कुछ लोग ये करते है और जीवन को भरपूर जीते है पर कुछ मिडिल क्लास भारतीय कभी भी अपनी वो मानसिकता नहीं छोड़ते है पता नहीं क्यों और पत्नी बच्चो को मना करते है | हम सभी समझदार है किसी को भी हमें ये बताने की जरुरत नहीं है कि एक स्वतंत्र देश में हमें शराब पीनी चाहिए की नहीं, ये हमारी मर्जी है हमें जो ठीक लगेगा हम करेंगे | हा ये अलग बात है की ये स्वतत्र  देश , समझदारी आदि आदि बाते बस पुरुषो , पढेलिखे , पैसे वाले , उम्र में बड़े लोगो पर ही लागु होती है महिलाए , युवा और गरीब इन सब में नहीं आते है न वो स्वतंत्र है न समझदार और ना ही अपनी मर्जी से कुछ भी करने का हक़ रखते है  |
                        कभी कभी लगता है  सरकार महँगी अंग्रेजी बेचे तो समझ आता है भाई पैसे वाले ही उसे लेते है लेकिन सरकार सस्ती देशी क्यों बेचती है उसे कौन खरीदेगा,  गरीब न और गरीब कहा से लायेगा पैसा , वही घर चलाने के पैसे से शराब पियेगा और बीबी बच्चे भूखे मरेंगे | पर सरकार ये काम भी गरीबो  के हित में ही करती है यदि सरकार गरीबो का ध्यान न रखे और उन्हें अच्छी सस्ती देशी शराब न मुहैया कराये तो बेचारे ?? नकली शराब जहरीले शराब अवैध शराब पी पी के मर जायेंगे और सरकार उन्हें मारती नहीं है उन्हें तो सस्ती अच्छी देशी शराब दे कर बचाती है |  सरकार नकली जहरीली शराब को बनाने और बिकने से नहीं रोक सकती है थोडा मुश्किल काम है और सरकारे इस तरह के मुश्किल काम नहीं करती है और फिर उनसे सरकार के राजस्व का भी घाटा होता है बस स्थानीय पुलिस अबकारी अधिकारी और नेता को ही हफ्ता या फायदा मिलता है उस पर से गैरकानूनी जबकि सरकारी ठेका वही काम और फायदा क़ानूनी तौर पर कराती है ,  बोलिए है ना बिलकुल सालिड सही तर्क |
                                                                    इस मामले में बेचारे शराबी से ज्यादा तो नेता , टीवी चैनल  और पत्रकार दुखी है | बेचारे मनीष तिवारी :) ( अब बेचारा न कहे तो क्या कहे सार्वजनिक के साथ ही लिखित में आन्ना से माफ़ी मागनी पड़ी थी पार्टी के कारण ) शराब प्रेमियों के गम से गमजदा हो कर कह रहे है की भाई शराबियो को पीटने की बात होगी  तो आधे केरल, तीन-चौथाई आंध्र प्रदेश और अस्सी फ़ीसदी पंजाब को कोड़े (???? अन्ना का डंडा नेताओ के कान तक पहुंचते पहुंचते कोड़ा बन गया )  लगाने होंगे... | बताइए ये सब तो नेताओ के वोटर है हर पञ्च साल बाद इनमे से लगभग आधे शराब की एक बोतले के बदले में हमें पूरा देश सौप देते है,  यदि इनसे यही छुट गई और ये होश में आगये तो हमारा क्या होगा , हमारी शराब खोरी के लिए पैसा कहा से आयेगा शराब से सरकारी खजाने में आ रहे पैसे का क्या होगा | पत्रकार और चैनल वाले तो ऊपर से दुखी दिख रहे है भाई ये तो गलत है आप शराब पर कैसे पाबन्दी लगा सकते है हम में से ज्यादातर को मुफ्त की शराब पीने कि आदत है लोगो ने देना बंद कर दिया गलत मान कर तो हमारा क्या होगा | अन्ना ने तीस साल पहले  अपने गांव का किस्सा बताया है इसका अभी से विरोध करो क्या पता यहाँ जनलोकपाल बिल पास और  वहा फिर अन्ना की हर सामजिक बदलाव को लागु करवाने की हवा चल गई तो , तो फिर हम क्या करेंगे और वो सब छोडो सबसे बड़ी बात ये है की हमारे चैनल को  सरकार ने इतने करोड़ का विज्ञापन दिया है यदि अन्ना टीम का विरोध करती खबर बहस लगातार नहीं दिखाया तो कही वो सारे महंगे विज्ञापन हमसे छीन ना जाये भाई कुछ चैनलों के कर्ता धर्ता के दूसरे कई बिजनेस है उन पर असर ना डाले सरकार या कुछ के ऊपर सी बी आई जाँच चल रही है जो सरकार की चमचागिरी करने से बंद डब्बे में पड़ी है कही वो ना खुल जाये सरकारों का क्या भरोसा वो कुछ भी कर सकती है | टी आर पी के लालच में खूब अन्ना टीम को फुटेज दी है अब मौका है की जरा हिसाब बराबर किया जाये और टी आर पी तो इसमे भी अच्छी मिल रही है |  फिर ये जरुरी तो नहीं आदमी पर हमेशा पत्रिकारिता की हावी रहे आखित पत्रकार भी तो इन्सान ही है न कभी कभी पत्रिकारिता पर निजी विचार भी तो हावी हो सकते है और बेचारा कब तक सीधे खड़ा रहे कभी कभी तो एक तरफ झुक कर टेक तो लगाना ही पड़ता है |
                             
                      कही पर ये टिपण्णी की थी यहाँ भी दे रही हूँ |
                       इस महान ??? काम शुरुआत एन डी टीवी ने किया और अब इसमे सभी विद्वान् लोग शामिल हो गए है जान कर अच्छा लगा :) चैनल खुद ही लिए अन्ना के साक्षत्कार को तोड़ मरोड़ कर टीवी पर बहस का मुद्दा बना दिया | अन्ना ये बात देश भर के शराबियो के लिए नहीं कह रह थे वो साक्षात्कार में तीस साल पहले अपने गांव में किये गए सुधारो की बात कर रहे थे और उसी क्रम में बता रहे थे की उन्होंने शराब को अपने गांव से कैसे दूर किया | जिसमे कहा गया की गांव से शराब हटाने के बाद भी जब कोई बाहर से पी कर आता था तो पहले उसे तीन बार समझाया जाता था फिर मंदिर में ले जा कर भगवन की कसम खिलाई जाती थी और उसके बाद भी वो न माने तो मंदिर के सममाने वाले खम्बे से बांध कर पिटा जाता था बिलकुल उसी तरह जैसे एक माँ अपने बच्चे की गलती पर उसे मारती है सुधारने के लिए | ( एन डी टीवी के उस बहस में शाहनवाज हुसैन ने भी इस तरफ ध्यान दिलाया था की अन्ना अपने गांव की बात कर रहे है पूरे देश की नहीं ) और ये सब तब किया जाता था जब शराबी के घरवाले आ कर शिकायत करते थे | ये बात उन्होंने पहली बार नहीं कही है इसके पहले वो ये बात कई बार अपने कई साक्षात्कारो में कह चुके है | अब आप बातो को तोड़ मरोड़ कर सभी से ये कहे की आन्ना ने ये बात सभी शराबियो के लिए कही है तो निश्चित रूप से सभी इसका विरोध ही करेंगे | भूषण , किरण , अरिविंद के बाद उन्ही का नंबर था बदनाम करने के लिए कुछ नहीं मिला तो बातो को तोड़ मरोड़ कर पेश कर दिया | उन्होंने शराब का विरोध किया था और क्यों इसके पहले वो कई बार कह चुके है |

१ क्योकि गरीब अपने पैसे शराब में उड़ा देते थे

२ शराब के साथ ही कई और सामाजिक बुराइया गांव में आ गई थी जिन्हें दूर करने के लिए सबसे पहले शराब को दूर करना जरुरी था |

३ शराब बनाने वालो को भी उनका काम छोड़ने के बाद उन्हें नए काम करने के लिए सहायता भी की |

४ शराब से सबसे ज्यादा महिलाए परेशान थी और उन्होंने महाराष्ट्र में ये कानून बनवाया की यदि किसी गांव की अधिकांश महिलाए ये मांग करे की उनके गांव में शराब का ठेका न हो तो वहा से सरकारी शराब के ठेके को हटाना होगा |

                                           उन्होंने ये बात बस अपने गांव में किये काम के लिहाज से कही थी पूरे देश के सम्बन्ध में नहीं और किसी गांव में किये जा रहे सुधारो के लिए किये गए काम और देश के लिए कहे जा रही बात के फर्क को आप तो समझाते होंगे बस ऐसे ही तिल का ताड़ बन जाता है | मिडिया से तो कोई उम्मीद नहीं बची थी अब तो ब्लॉग जगत से भी कोई उम्मीद नहीं दिखती है लोग बिना पूरी बात जाने फटाफट अपनी प्रतिक्रिया देने लगते है | 
              बिलकुल सही कहा मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए बात केवल उनके मुद्दे तक ही रखना चाहिए, क्यों बार बार मुद्दों से अलग चीजो की बात की जाती है | क्या अन्ना ने कभी कहा है की वो शराब छोड़वाने के लिए पूरे देश के शराबियो के पिट पिट कर उनकी शराब छोड़वाने का काम करने वाले है यदि उन्होंने ऐसा कहा होता तो आप जरुर उन पर चर्चा करते किन्तु यहाँ उन्होंने ऐसा कुछ कहा भी नहीं है तो इस बात पर चर्चा क्यों वो भी बात को तोड़ मरोड़ कर किया जा रहा है | वो अपने गांव का तीस साल पुराना किस्सा बता रहे है वो भी सवाल पूछे जाने पर और उसे गलत तरीके से रख कर मुद्दों को बदलने का प्रयास किया जा रहा है क्यों | एक गांव में दो या चार लोगो को पीटने की घटना की तुलना आप पूरे देश में सत्ता के नशे में चूर हो कर किये गए कामो से कैसे कर सकते है | आप ने यदि वो साक्षात्कार ठीक से देखा हो तो अन्ना ने ये भी कहा है की हिंसा का सहारा नहीं लेना चाहिए ये गलत था सामजिक और क़ानूनी रूप दोनों से ही किन्तु ये करना पड़ा बिलकुल वैसे ही जैसे एक माँ अपने बच्चो को सुधारने के लिए करती है वो खुद अपने पहले के किये काम को गलत बता रहे है क्या संजय में इतनी हिम्मत थी , आज संजय जिन्दा होते तो जो कांग्रेसी उसे गलत बताते है उनमे भी उसे गलत कहने ही हिम्मत नहीं होती | कई नवो की सवारी अन्ना नहीं कर रहे है वो और उनकी टीम तो लगातार ये कह रही है की आज के समय में बात भ्रष्टाचार और लोकपाल के बारीकियो पर होना चाहिए पर सभी लगे है एक दुसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाने में बेमतल के दुसरे मुद्दे उठाने में | 
                    

                                                          
           
 

October 24, 2011

हिंदी ब्लॉग जगत घुटन भरे जीवन से बाहर निकालने के लिए धन्यवाद - - - - mangopeople


                                                                          कहते है की दुनिया में सबसे ज्यादा अंदर से दुखी सबसे बड़ा हंसोडा होता है बाहर से वो भले हँसता मुस्कराता दिखता है पर अंदर बहुत दुःख घुटन भरा होता है और जब वो घुटन अपनों को द्वारा हो तो कष्ट कुछ और भी बढ़ जाता है | कुछ ऐसा ही था मेरे भी साथ,  आज भले ही हर बात पर एक मज़ाक करती टिप्पणी और उसके साथ इस्माइली लगा देती हूँ किंतु ब्लॉग में आने के पहले ऐसा नहीं था | जीवन में वो कुछ भी नहीं था जो मैंने जीवन से चाह था,  जिस तरह के परिवार से मैं आई थी,  ससुराल पति उससे कही ज्यादा विपरीत थे,  ऐसा नहीं था की विवाह के पहले कुछ मालूम ही नहीं था,  ससुराल के परिवार के बारे में जानकर कुछ तो अंदाजा था और ये समझौता तो अपनी ख़ुशी से मैंने ही किया था |  किंतु कहते है ना की समझौता तो समझौता ही होता है अपनी ख़ुशी से किया जाये या मज़बूरी में वो मन में कही ना कही सालता ज़रुर है | जीवन के सात कीमती साल मैंने बस कस्मसाते हुए गुजार दिए | आज व्यंग्य करती मज़ाक करती अंशुमाला को देख कर आप में से शायद ही किसी को कभी इस बात का अंदाजा हुआ हो की मैं अंदर से कितनी दुखी और परेशान थी |
                                     इन सब की शुरुआत तो विवाह के छ सात दिन बाद ही हो गया था जब पति देव की असलियत मेरे सामने आ गई ( वो अलग बात है की सदा उनकी बुराईयो को छुपा उनकी अच्छाई ही सब जगह कही है ) हमारी छोटी सी बहस को मैंने जब झगड़े का रूप दे दिया पर पति देव तो बस चार बार मुझे जवाब देने के बाद एक दम से- - - -- --  - - ---- - - -- - -- - - - - - चुप ही हो गए और मेरी बात मान कर कहा की अब इसे यही खत्म करो, उनका ये व्यवहार  मेरे लिए ये किसी आघात से कम नहीं था,  मैंने कहा की क्या बस इतना ही क्या आप को झगड़ा करना नहीं आता तो उन्होंने साफ मना कर दिया नहीं मुझे नहीं आता | आप तो अंदाजा भी नहीं लगा सकते की उस समय मुझ पर क्या गुज़री , विवाह के पहले ही पता था की मेरी सास नहीं है दिल को मना लिया की चलो झगड़ा करने और मोहल्ले भर में किसी और की बुराई बढ़िया लुंगी , ननदे जिठानी मुझसे दूर रहती थी तो क्या जब फोन पर बाते होंगी या कभी मिले तो उन्हें ताने मार लिया करुँगी कभी व्यंग्य बाण चला लिया करुँगीरोज न सही कभी कभी ही सही,  पर पति तो पास होगा झगड़ा तो हर दूसरे दिन कर खाना पचा लिया करुँगी , पर मेरी फूटी किस्मत की पति देव को झगड़ा ही नहीं करने आता था , हद तो तब हो गई जब मेरे सटायर , व्यंग्य तक पर प्यार से मुस्करा देते थे, हाय ! तब पता चला की इन्हें तो ये भी समझ नहीं आता है,  मुझे ही ये बताना पड़ता है की अजी मैंने आप पर ताना कसा है सटायर मारा है,  तो कहने लगे अच्छा मुझे तो पता ही नहीं चला | बोलो अब ऐसे लोगो के साथ जीना भी कोई जीना है बंधुओं | ये सब यही ख़त्म नहीं हुआ दर्द तब और बढ़ गया जब इमारत की सभी महिलाओ ने अपनी सास ननद निंदा समूह से मुझे दो महीने में ही बाहर निकाल दिया कहने लगी की ये नहीं चलेगा की हमारे ससुराल वालो की बुराई खूब रस ले ले कर सुनो और अपनी कुछ भी न कहो | जीवन बिना झगड़े , बिना किसी का मज़ाक, व्यंग्य किये , बिना सटायर,  बातों को उलटा बोले चल सकता है | अरे इन सब के बिना भी जीना कोई जीना था और वो भी मेरे जैसी लड़की ( अरे तब मैं तो लड़की ही थी ना,  वैसे भी आप क्या जाने इस उम्र में खुद के लिए लड़की लिखा जाना कितना सुहाता है )  के लिए जो उस परिवार से आई थी जहा बिना किसी भेद भाव , रंग रूप जाति पाति धर्म रिश्ता देखे सभी का एक सुर में मज़ाक उड़ाया जाता है सभी मिल कर किसी किसी की टाँग खीचते है | बचपन से ये देखती आई थी,  ये सब तो मेरे खून में था सोचा था बड़ी हो विवाह होगा तो अपने घर के ये महान काम को और आगे ले जाउंगी दूर दूर तक फैलाऊँगी , किंतु सब ख़त्म हो गया | 
                     पर कहते है ना भगवान के घर देर और अंधेर दोनों ही है, मेरी जोड़ी ऐसे व्यक्ति के साथ बना कर अंधेर करने वाले भगवान ने भी देर से ही सही मुझे इस घुटन से आज़ादी दिला दी और एक दिन मेरा परिचय हिंदी ब्लॉग जगत से करा दी | लगा जैसे कोई अपना सा मिल गया,  यही है वो जिसको मुझे वर्षो से इंतजार था |   हर तरफ लोगो के भड़ास बिखरे पड़े थे , मेरी तरह ही घुटे हुए लोगो की घुटन खुल कर बाहर आ रही थी , हर तरफ झगड़े विवाद चल रहा था | लगा जैसे मेरा ही परिवार, मेरा ही शहर यहाँ हो, वही खुद को सभी से समझदार समझना , वही सारी बुद्धि का ठेका खुद लेकर बैठे होने का दावा करना , वही दूसरों पर व्यंग्य कसना , वही किसी की टाँग खिचाई करना,  वही मिल कर किसी एक का मज़ाक उड़ाना ,नहा धो कर किसी के पीछे पड़ जाना , वही बस अपनी ही हर बात पर अड़े रहना , वही हर बात पर बहस करना , वही ताने कसना और ये कहना की हम महिलाओ की बड़ी इज़्ज़त करते है बस वो महिलाएँ मेरे घर की हो बाकी बाहर की महिलाओ को हम महिलाओ की गिनती में नहीं रखते है यदि वो हमारे खिलाफ या कहे की वो बोलने की भी हिम्मत करेंगी तो उनकी तो हम बीप बीप बीप ( श्री श्री अमिताभ बच्चन के मुख कमलो से लिए गए शब्द जहा आप अपने स्तर और स्वभाव जानकारी के अनुसार अपनी पसंद की गाली जोड़ कर पढ़ सकते है ) कर देंगे | धनभाग हमारे की हम हिंदी ब्लॉग जगत से जुड़े यहाँ आकर जिन जिन गलियों को हमने लिपि बध रूप में पढ़ा और अपने गालियों का ज्ञान बढाया वो कही और संभव नहीं था | क्या है की बचपन तो बनारस में गुजरा जहा परिवार में तो कोई गाली नहीं देता था किंतु आस पास सभी के मुख मंडल से प्रेम पूर्वक जो गाली रूपी पुष्प गिरते थे वो ठीक से समझ नहीं आते थे एक तो बिलकुल ठेठ भाषा की समस्या आती दूसरे उच्च स्वर में शुरू हुई गाली पता नहीं क्यों बाद में निम्न स्वर में आ जाती थी, जिससे गाली आधी की समझ आती थी यही कारण  था की हमारा गाली ज्ञान उतना अच्छा नहीं था | किंतु भला हो हमारे ब्लॉग जगत का जहा बाक़ायदा हर शब्दों का अच्छे से पढ़ने का मौका मिला बल्कि कई नई गलियों का भी ज्ञान हुआ धन्यवाद ब्लॉग जगत |  उसके बाद जो कलम ( असल में तो उंगलिया चली कहते तो कलम ही है ना ) चली की पूछो ही मत | कभी प्रवचन तो कभी जहर बुझे व्यंग्य के तीर , तो कभी लंबी लंबी हाकना पोस्ट तो पोस्ट टिप्पणियों की लम्बाई भी लंबी , तो कभी तीखे सटायर , तो कभी किसी की हर बात की ही आलोचना करते रहना हा कहे तब भी ना कहे तब भी ,  और लोगो को टिप्पणी देने का ऐसा चस्का लगा की पोस्ट भी लिखने की सुध नहीं रहती कभी कभी | ज्यादातर लोग तो मुझे टिप्पणीकार के रूप में ही जानते होंगे बजाये एक ब्लॉगर के | टिप्पणियों का अपना मजा है जा कर किसी के अच्छे खासे लेख का बेडा गर्क कर दो,  मेरे आने के पहले जिस पोस्ट में सब आप से सहमत है लिख कर जा चुके हो वह टिप्पणी में ऐसी बात लिख मारो की सब लेखक को छोड़ मुझे से ही सहमत हो कर चले जाये और लेखक जल भुन जाये  , या लेख का दिशा ही बदल दो कोई नई बात लिख कर की लोग पोस्ट के बजाये टिप्पणी पर ही वाह वाह कर बैठे , या पोस्ट पर ऐसा विवाद खड़ा कर दो टिप्पणी दे कर  की लेखक भी बार बार सोचे की आखिर विवाद हुआ क्यों था ,  जहा दिखे की पोस्ट लिखने वाला खुद को ज्यादा विद्वान समझ रहा है वहा पर कई पोस्ट पर विपरीत बाते लिख अपनी विद्वानिता झाड़ देती हूँ की बेचारे ब्लॉगर को अंत में मुझे विद्वान मान अपना पिंड छोड़ने के लिए कहना पड़ जाये और जहा पर ब्लॉगर की बड़ी बड़ी उच्च कोटि की हिंदी समझ ना आये तो टिप्पणी भी ऐसे कर दे की जब बात में मई खुद ही पढ़ो तो खुद ही समझ ना आये की आखिर इसका मतलब क्या है |   मतलब ये की जीवन में जो करने की इच्छा थी सब यहाँ पूरा होने लगा |
                                                  यहाँ आ कर मेरे मन को जो सुख चैन मिला वो सात सालों की घुटन को कुछ ही समय में भुला दिया | अब बुराई करने के लिए किसी सास की जरुरत नहीं इतने ब्लॉगर और उनकी करनी( पोस्ट ) है की आप बुराई करते करते थक जाये, पर ना तो  ब्लॉगर खत्म होंगे ना बुराई करने के लिए पोस्टे,  खुद का विषय सोचने की जरुरत ही नहीं है बस दूसरे की पोस्टो की बुराई लेकर बैठ जाइये देखिये कैसा पाठक खींचा चला आता है आप के पास निंदा रस का रस और बढ़ाने ले लिए , ताने कसने व्यंग्य बाण चलाने के लिए ननद , जिठानी की या नीचा दिखने के लिए किसी गरीब रिश्तेदार की जरुरत नहीं है लोगो के पोस्टो का विषय ही काफी है किसी का भी मज़ाक उड़ाने के लिए और नीचा दिखने के लिए हिंदी का ज्ञान ही काफी है |  वर्तनी से लेकर भाषा अलंकार समास आदि आदि जो मिले उसी की धज्जी उड़ा दे अच्छी खासी पोस्ट को हिंदी का निम्न स्तर की लेख बता दे और आगे बढे और ब्लॉगर को हिंदी ब्लॉग जगत का कलंक भी बताने से ना चुके  ,  और जलने के लिए किसी पड़ोसी की जरुरत नहीं है, हाय उसके ब्लॉग पर मेरे ब्लॉग से ज्यादा टिप्पणियाँ कैसे आती है , फलाने ब्लॉगर तो बस उन्ही को टिप्पणी करते है हमें नहीं , अजी वो महिला है ना इसलिए , अरे नहीं ये तो टिप्पणीकार ही फ़र्ज़ी है आदि इत्यादि |
                                                                        हिंदी ब्लॉग जगत को देख कर लगा की जैसे ये बस मेरे जैसो के  लिए ही तो बना है जो जीवन में सपने तो कई देखते है पर करते कुछ नहीं है , बाते बड़ी बड़ी और काम एक भी नहीं,  जो ज़मीन पर कुछ करने के बजाये बस लोगो के सामने लंबी लंबी फेंकने में उस्ताद होते है | काहे की जो काम करता है वो तो मैदान में जा कर लड़ा रहा होता है अपना सपना पूरा कर रहा होता है ना,  उसके पास दूसरों को सुनाने के लिए ना इतना कुछ होता है और ना ही इतना समय होता है बकबकाने के लिए |तो भाइयों और बहनों , जैसे की हर धार्मिक कथा के अंत में कहा जाता है,  की जैसे ब्लॉग मैया हमारा दुख दूर की हमें घुटन से आज़ादी दिलाई वैसे ही ब्लॉग मैया सभी का बेडा पार करे सभी को सुख चैन दे और सारा धन धान्य हमरे घरे भेज दे |
                                          ये सब आज क्यों ? 
 क्या आज मेरे ब्लॉग का साल पूरा हुआ है ?  अरे नहीं जी वो तो कब का हो गया , 
तो क्या सौ वी दोसौवी पोस्ट है ? लंबी लंबी उबाऊ टिप्पणी लिखने से फ़ुरसत मिले तब तो सौ पोस्ट लिखे |
 क्या ब्लॉग छोड़ कर जा रही है, और टंकी पर चढने वाली है ? अरे मालूम है की कोई टंकी से उतारने ना आएगा उलटा टंकी के नीचे लगा सीढ़ी भी हटा देंगे की कही उससे उतर कर वापस ब्लॉग जगत में ना आ जाये |
      तो फिर ??
               जी आज मेरा हैप्पी वाला बड्डे  है ,  सोचा पिछली बार आप लोगो से तोहफे की मांग की थी पर किसी ने ( राजेश जी की एक कविता को छोड़ ) कुछ नहीं दिया था ,एक सौ एक रुपये की तरह एक टिपण्णी थमा कर     १००० रुपये वाली प्लेट का खाना  खा के चल दिए थे !!  हूं  :)))  | किंतु उसके बाद एक साल में लगा की लोगो ने कितना कुछ दिया है मुझे  हिंदी ब्लॉग जगत का प्लेटफॉर्म दिया बकबकाने के लिए  , टिपियाने और अपनी भड़ास निकालने के लिए कितनी पोस्टे दी , मेरी पोस्टो पर आ कर मेरी हर उल जलूल लेखनी की वाह वाही की क्या ये किसी तोहफे से कम है तो सोचा इस  जन्मदिन पर आप सब के दिए तोहफे के लिए आप सभी का धन्यवाद कर दू
      तो हिंदी ब्लॉग जगत मुझे मेरे घुटन भरे जीवन से बाहर निकालने के लिए धन्यवाद !!!!!!
 

         अब मेरे जन्मदिन पर आये है तो केक का हक़ तो बनता है आप लोगो का |
                 


                                              


        
                                                                     

October 18, 2011

औरत है न इसलिए ज्यादा चिल्लाती है - - - - - mangopeople



"औरत है न इसलिए ज्यादा चिल्लाती है "
निश्चित रूप से ये सुनने के बाद मेरे अंदर की औरत या कह लीजिये नारीवाद को जागना ही था | मैंने भी जवाब दिया की "औरत यू ही नहीं चिल्लाती है ज़रुर कोई तकलीफ़ होगी तभी चिल्ला रही है , क्या भूखी है "
"नहीं मैडम खाना तो खा चुकी है"
"तो ज़रुर उसके बच्चे से अलग किया होगा"
" तो क्या करे ,सारे दिन  बच्चे के पास ही बैठी रहेगी तो फिर आप लोगो को घूमने कौन ले जायेगा |
देखा मैंने कहा न ज़रुर कोई तकलीफ़ होगी तभी वो चिल्ला रही है उसके बच्चे से उसे अलग करोगे तो क्या वो चिल्लाएगी नहीं |
अभी हाल में ही राजस्थान गई थी तो वहा जा कर ऊंट की सवारी तो करनी ही थी ,  मेरे बैठने के बाद जब पति देव अपने ऊंट पे बैठने लगे तो वो जोर जोर से चिल्लाने लगी और दोनों ऊँटो के मालिक हाथों से उसका मुंह बंद करने लगे जब मैंने कहा की ये क्यों चिल्ला रही है तो उसके जवाब में बड़े बे फिकरी से और हंसते उसने हमें बताया की वो औरत है इसलिए ज्यादा चिल्लाती है ( वो हमें बताना चाह रहा था की ये मादा ऊंट है ) गलती उसकी नहीं है असल में हजारों वर्षो से महिलाओ के लिए ऐसे ही सोच समाज द्वारा बना दी गई है की महिलाएँ बस बिना कारण बोलती और चिल्लाती है उनकी बातों को ज्यादा सुनने या महत्व देने की जरुरत नहीं है और ये महत्वहिन होना उनकी बातों से चला तो उनके अस्तित्व तक आ गया , अब उनके होने को ही महत्वहीन बना दिया गया है | यही कारण था की जब मैंने ऊंट के मालिक से सवाल किया की भाई तुम्हारे गांव में कल और आज दो दिन में मैंने लड़के ही लड़के देखे है लड़की तो मुझे बस एक ही दिखी तो जवाब में उसने कहा की होती तो है पर लड़कियाँ न कमजोर होती है बचतीं कहा है गांव है यहाँ कौन डाक्टर मिलेगा तो मर जाती है |
"मर जाती है या मार दिया जाता है | '
" अरे नहीं अब पहले जैसा नहीं है अब तो बहुत कम लोग ही मारते है | "
मेरे सवाल पर उसके द्वारा बड़े आराम से सहज स्वीकृति मेरे लिए आश्चर्य जनक था मुझे विश्वास नहीं हो रहा था की वो इस बात को इतनी आसानी से स्वीकार कर लेगा,  उसे तो जरा भी झिझक नहीं हुई ये मान लेने में की आज भी लोग बेटी को जन्म लेने के बाद मार देते है | थोड़े देर बाद फिर पूछा की
" तुम्हारे यहाँ तो सरकार बेटी होने पर पैसे देती है |"
" जब बच्चे अस्पताल में होंगे तब ना यहाँ तो सब बच्चे घर में ही होते है |"
" तो क्या यहाँ सरकारी अस्पताल नहीं है क्या "
" है तो लेकिन वहा डाक्टर कहा होते है सुबह कुछ घंटे के लिए आते है फिर चले जाते है "
" यदि किसी की ज्यादा तबियत ख़राब हो गई तो "
'तो फिर गाड़ी करके शहर ले जाते है "
 " तब तो वहा तो १४०० रु मिलते होंगे ना बेटी होने के फिर क्यों मार देते हो "
वो थोड़ी देर चुप रहा फिर कहा " १४०० रु में क्या होता है इतने में क्या बेटी पल जायेगी लालन पालन दहेज़ सब १४०० रु में होता है क्या '
जी तो किया की पूंछू की बेटे कैसे पलते है क्या उन्हें पालने में पैसे खर्च नहीं होते है क्या उनके विवाह में पैसे खर्च नहीं होते पर जाने दिया जानती थी की उसके पास मेरे बातों का कोई सही जवाब नहीं होगा फिर उसने तो ये परंपरा बनाई नहीं है वो तो बस बिना दिमाग लगाये उसे आगे बढ़ रहा होगा | जब हम घूमने के बाद ऊंट से उतारे तो बच्चों के झुंड ने फिर हमारे करीब आ कर खड़े हो गए और लड़कों का झुंड लड़की से कुछ खुसुर फुसुर करने लग तभी लड़की आगे बढ़ी और हमारी बिटिया रानी से पूछी " वॉट इस योर नेम " उसे बिना झिझक आगे बढ़ अंग्रेजी में सवाल करता देख बिटिया से पहले मैंने उससे पूछा स्कूल जाती हो तो उसने ना में सर हिला दिया तो वो सारे लड़के जाते है क्या तो उसने धीरे से कहा हा | समझ गई की बिना स्कुल के ही वो वहा आने वाले पर्यटकों से सुन सुन कर सिख गई होगी इन प्रतिभाओ को दुसरे कब समझेंगे पता नहीं |
                           आप पढ़ने वालो सोच रहे होंगे कि बेचारा सही कह रह है बेटियों के दहेज़ को लेकर माँ बाप में चिंता तो होती ही है यही कारण है की बेटिया मार दी जाती है गरीब लोग और क्या कर सकते है फिर अनपढ़ भी था इसलिए सब बोल गया तो जरा रुकिए ये लेख अभी ख़त्म नहीं हुआ है | अब राजस्थान गये है तो बिना बड़े बड़े महलों किला राजा महाराजो की बातों के बिना पूरी थोड़े ही होती है | ऐसे ही एक महल घुमाते हुए गाइड हमें दिखाने लगा की देखिये ये सोने चाँदी के बने पालने इनमें हमारे राजकुमार सोते खेलते थे हर राजकुमार के लिए एक अलग शानदार पालना होता था बाकी के लिए साधारण होते थे |  मैंने कहा की बाकी के कौन ? वही जो रानियों से अलावा होते थे उसने जवाब दिया | तो ये सारे पालने रानियों से हुए राजकुमार राजकुमारियो के लिए थे मैंने पूछा | नहीं नहीं ये बस राजकुमारों के लिए थे राजकुमारिया तो साधारण लकड़ी के बने पालनो में रहती थी | मन ही मन सोचा की  वाह जी वाह क्या बात है राजकुमारियो की स्थिति राजाओ के नाजायज आलौदो के बराबर थी बहुत खूब यहाँ कौन सी गरीबी का वास है यहाँ किस लालने पालने की कमी है फिर भी अपनी ही बेटी और बेटों के साथ इतना भेद,  नाजायज औलदो की तरह ही बेटी के अस्तित्व को ही स्वीकार नहीं क्या जा रहा है | मैंने फिर उससे पूछ तो फिर कितनी बेटी थी राजा को जरा जवाब सुनिए अरे बेटिया बचतीं ही कहा थी | इस बार ये सुन कर ज्यादा आश्चर्य नहीं हुआ इस बारे में भी सुन चुकी थी की कई बार राजाओ के घर भी बेटिया मार दी जाती थी ताकि विवाह के समय दूसरों के सामने सर ना झुकाना पड़े,  राजशी परिवार से थे किसी के सामने सर नहीं झुका सकते थे और जो नहीं मारते थे वो बेटियों के प्रयोग वस्तु की तरह राज्य की सुरक्षा,  सम्बन्ध बनाने के नाम पर एक दूसरे को विवाह के नाम पर दे देते थे | फिर उससे भी मैंने आज के हालत पर सवाल किया " तो आज कल भी बेटिया ऐसे ही नहीं बचतीं है ना यहाँ, या आज भी बेटिया मार देते है "
 " नहीं ये सब अब यहाँ कहा होता है अब लोग ऐसा नहीं करते है " उसने तुरंत जवाब दिया |
"  पर लड़कियों की संख्या तो राजस्थान में बहुत ही कम है " जानती थी ये इतनी जल्दी स्वीकार नहीं करेगा पर उसने भी स्वीकार करने में जरा भी देरी नहीं की दूसरे सवाल के बाद ही मान गया |
" शहरों में एक आध लोग करते होगें हा गांवो में होता है ये सब शहरों में नहीं | "
 अब बोलिए गाइड अनपढ़ गावर नहीं था और ना ही मैं किसी गरीब के घर में खड़ी थी फिर भी बेटियों को लेकर वही सोच | ये सोच बस बेटियों को ही लेकर नहीं था ये सोच पूरी महिलाओ के लिए था | राजा का रंग महल दिखाते हुए गाइड सीना फूला कर बताता है की फला राजा की ३६ रानिया थी राजा को सभी को खुश करने के लिए अफ़ीम खानी पड़ती थी | 
"तो राजा फिर इतनी शादियाँ करता ही क्यों था " जवाब मालूम था फिर भी पूछ लिया |
" उस समय राजा शादी तो राज्य के लिए करता था राज्य को सुरक्षित बनाने के लिए | पर आज कौन करता है आज तो एक अकेली ही १३६ के बराबर होती है | "
मैंने जवाब दिया की " ज़रुरी भी है यही एक अकेली १३६ के बराबर ना हो तो आज भी लोग ३६ शादियाँ ना करने लगे और ये बताओ की फिर रानियों के अलावा भी उसके दूसरे बच्चे क्यों होते थे , उसकी क्या जरुरत थी राजा को | वो ना करता तो शायद अफ़ीम कम खानी पड़ती और ज्यादा ध्यान राज काज पर देते और ना इतने पैसे इन रंग महलों पर बहाते और ना देश में बाहरी आक्रमण से ये हालत होती | " मालूम था की इस बात का कोई जवाब उसके पास नहीं होगा एक गाइड ही था कोई इतिहास कार नहीं | वो बस मुस्करा कर इतना ही कह पाया की राजा लोगो को सब करना पड़ता था |
                                                           असल में समाज के लिए महिलाओ को अस्तित्व उपभोग की वस्तु से ज्यादा की नहीं थी |  बेटियों को मार देना और राजाओ के ढेर सारी पत्नियों के बाद भी अन्य स्त्रियों से रिश्ता रखना  उनकी सोच को दर्शाता है और अपनी रानियों को सौ पर्दे में रखना की बाहरी पुरुष उसकी एक झलक भी ना देख पाए ,हा शायद डरते हो की मेरी तरह ही ये भी महिलाओ को बस भोग की वस्तु समझता है और इसकी गंदी नजर कही मेरी महिलाओ पर ना पड जाये | उफ़ इतना पर्दा की महारानियो को बाहर देखने के लिए ढंग की खिड़किया तक नसीब नहीं थी जालीदार झरोखे होते थे जिसमे से रानिया बाहर देखती थी ( विश्वास कीजिये उसमे से ढंग से बाहर का कुछ भी नहीं दिखता था ) ताकि कोई बाहर का उन्हें ना देख ले महल के बाहर तो छोडिये महल के अंदर भी पर्दा था | देख लगा की क्या इस जीवन को देख कर कोई भी कहेगा की वो किसी महारानी का जीवन जीना चाहती है,  तौबा कोई भी नहीं जीना चाहेगा इस जीवन को |
                                                      रानी पद्मावती के "जौहर" करते हुए की पेंटिंग दिखाते हुए गाइड उनके शौर्य उनके हिम्मत और सुंदरता की गाथा गा रहा था उसे देख कर लगा की काश ये हिम्मत किसी और रूप में दिखाई गई होती काश की समाज का रूप कुछ और होता काश की महिलाएँ दुश्मन से अपनी रक्षा के लिए "जौहर प्रथा " की जगह कोई और जौहर दिखाती, काश की आत्महत्या करने की जगह वीरो की तरह पुरुषों के साथ तलवार ले युद्ध के मैदान में निकल जाती,  मरना तो यहाँ भी था और वहा भी | कम से कम मरने से पहले अपने राज्य और उसकी प्रजा के लिए कुछ कर जाती, कुछ दुश्मनों की गर्दन ही उड़ा देती क्या पता हार को ही बचा लेती | कुछ नहीं तो कम से कम महलों में घुसे दुश्मनों के ही सर तलवारों से उड़ा कर लड़ते हुए वीरगति को पा जाती , तो शायद "खूब लड़ी मर्दानी वो तो-----  " जैसी कोई कविता कही पहले कवी चन्द्र वरदाई द्वारा लिख दिया गया होता | शायद हमारे समाज का रूप और देश का इतिहास भूगोल ही कुछ और होता | काश की समाज में महिलाओ को उपभोग का सामान ना समझा जाता काश की महिलाओ को अपनी रक्षा के लिए जौहर प्रथा को ना अपनाना पड़ता | इस प्रथा के बारे में सोचती हूँ तो लगता है जैसे महिलाएँ उपभोग की वस्तु भर थी और उनका उपभोग बस उसका मालिक ही कर सकता था कोई दुश्मन उसका उपभोग ना कर सके इसलिए उन नारी रूपी वस्तुओ में एक खुद को नष्ट करने वाला एक बटन ( जैसे की फिल्मों में कोई  वैज्ञानिक अपनी खतरनाक अड्डे या मशीनों में लगा देता है ताकि उसे कुछ हो जाने पर किसी और के हाथ वो ना लगे और नष्ट हो जाये )  जौहर प्रथा के रूप में लगा दिया गया था की मालिक के कुछ होते ही वस्तु अपने आप नष्ट हो जाये |
                                                            ये प्रथाए ख़त्म नहीं हुई है चाहे जौहर प्रथा हो या पर्दा प्रथा आज भी जारी है भले किसी और रूप में ,  बलात्कार होने पर शर्म से लड़की ने आत्महत्या कर ली , छेड़ छाड़ से परेशान लड़की ने आत्महत्या कर ली , गरीब माँ बाप की बेटियों ने दहेज़ के कारण विवाह ना होने पर एक साथ आत्महत्या कर ली , दहेज़ के कारण ससुराल वालो ने जला दिया या खुद ही अत्याचारों से तंग आ कर आत्महत्या कर ली ताकि माँ बाप की इज़्ज़त बची रहे आदि आदि कितनी ख़बरे हम पढ़ते है ये क्या आप लोगो को आज भी जौहर प्रथा के होने का एहसास नहीं कराती है | क्या आज भी हम नहीं चाहते की लड़कियाँ अपने साथ रेप ना होने दे भले उनकी जान चली जाये,  कितनी वीरता से बताते है की लड़की ने जान दे दी पर अपनी इज़्ज़त (क्योंकि किसी ने उसके शरीर को ज़बरदस्ती छू दिया तो अब वो इज़्ज़त के लायक नहीं होती है ) नहीं जाने दी | हम आज भी चाहते है की लड़कियाँ जौहर कर ले और सीना फुला कर कहते है की जी हम तो उस देश के रहने वाले है जहा नारी अपनी इज़्ज़त बचाने के लिए अपनी जान भी दे देती है | मतलब की उस महान देश के वासी है जहा पीड़ित , जिस पर अपराध हुआ है वही मौत को गले लगा लेता है और अपराध करने वाला बाइज्जत घूमता है | सोचती हूँ ना जाने कितने बेटों ने अपनी और अपने माँ बाप की इज़्ज़त उतारी होगी अपने महान कामों से,  कभी किसी माँ बाप या समाज ने सोचा है की इस बलात्कारी , रिश्वतखोर , चोर, डाकू बेटे को अपनी जान दे देनी चाहिए अपनी इज़्ज़त के लिए या सुना हो किसी बेटे ने अपनी या घर की इज़्ज़त के लिए जान दे दी हो | नहीं जी बेटों तो इज़्ज़त के नाम पर जान लेने के लिए होते है जान देने का काम हमने तो बेटियों पर रख छोड़ा है बिलकुल वैसे ही जैसे हमने समाज के दूसरे काम नर और नारी में बाँट रखा है | पर्दे का भी नया रूप है आज लड़कियों के लिए पढाओ उतना ही जितना की विवाह के लिए ज़रुरी है , नौकरी मत करने दो ,शालीनता ,संस्कृति सलीके से कपड़ों के नाम पर सौ पाबंदियाँ लगा दो , जितना हो सके उसे घर में बंद करके रखो और अपनी इज़्ज़त और संबंधों के लिए उनको कही भी खूंटे से बाध दो विवाह के नाम पर और कहो की जब तक जीवित है यही बंधी रहे | कुछ भी तो नहीं बदला है बस किसी अन्य रूप में समाज में आज भी मौजूद है ये प्रथाये |
                                                       
                                                                                                 हमारी बिटिया तो वहा गई थी ख़ुशी ख़ुशी प्रिंसेस को देखने और उनके महलों को देखने बचपन से कहानियाँ सुनते आ रही थी,  मैं यही बोल कर उन्हें ले गई थी पर बेचारी को ज्यादातर जगहों पर तो ना तो प्रिंसेस दिखी और ना ही उनसे जुड़े सामान ही, ज्यादातर जगह  उनका नामो निशान भी नहीं दिखा | यहाँ आ कर मुझ पर गुस्सा किया और झूठ बोलने का आरोप लगा दिया अब क्या बताऊ की कैसे और क्यों हमारी राजकुमारिया ग़ायब होती जा रही है |
 
               स्पष्टीकरण -- -- उम्मीद है राजस्थान  के लोग इस लेख को अपने राज्य की,  की  जा रही बुराई के तौर पर नहीं देखेंगे ये बात पूरे देश के लिए कही गई है | ये संयोग है की मैं राजस्थान गई और वहा ये बाते आई ये विचार आया इसलिए इसे यहाँ लिख रही हूँ | शायद हरियाणा जाती तो ये सवाल पूछने पर कोई ताऊ लठ्ठा ले मेरे पीछे पड़ जाता या पंजाब में ये सवाल करने पर मुझे माँ बहन की गलियों से नवाज दिया जाता या फिर दिल्ली में सरकारी बाबू लड़कियों की इस हालत को मानने से ही इंकार कर देता और मुझसे कहता की आँकड़े दिखाइये |



October 15, 2011

भारतीय क्रिकेट टीम का माइंड सेट कुछ तस्वीरों की जुबानी - - - - - -mangopeople

Ganguly: Do or die. 

Sehwag: Do before you die.

Dravid: Do until they die.

Tendulkar: Do that will never die.

Laxman: Do when everyone else dies.

Dhoni: Do everything before luck dies.


Sreesanth: Die but never do...!!!

Bajji : Slap till they die

Zahir : Die when doing    

                                  Yuvraj: Do, die, reborn, do, die, reborn (repeat)....
Yuvraj: Do,

die,

reborn  

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