July 30, 2012

नकारात्मक सोच क्या वास्तम में गलत है- - - - - mangopeople

                                         
                         जब मै गर्भवती थी तो आखरी समय में कुछ ऐसी परेशानिया हो गई की डाक्टर ने कहा की अब सर्जरी कर बच्चे को जन्म दे देना ही ठीक है, सो हम सब अस्पताल जाने के एक दिन पहले सारी तैयारिया करने लगे उसी क्रम में मै अपनी सबसे छोट बहन को कुछ दिशा निर्देश दे रही थी, ये दिशा निर्देश तब के लिए थे यदि मुझे कुछ हो जाये तो ( हमारे देश में हर साल लाखो महिलाओ की बच्चो को जन्म देते समय मौत हो जाती है और उसमे से कुछ अस्पतालों में मरती है, मै कोई अमृत का घड़ा पी कर थोड़ी आई थी )  मेरी बेटी को कैसे रखा जाये और  उसके साथ क्या क्या किया जाये आदि आदि, जी नहीं उस समय न तो मै रो रा रही थी और न ही दुखी थी , मै कहते खुश थी और वो सुनते दुखी नहीं थी , लेकिन जब अचानक से माता जी ने हमारी बाते सुनी तो हैरान हो गई बोली, हे  भगवान कल तुम्हारी डिलेवरी है और कैसी अशुभ अशुभ बाते बोल रही हो शुभ शुभ अच्छा अच्छा बोलो,  हम दोनों बहने हंसने लगे , मैंने कहा की ये कोई फ़िल्मी जीवन नहीं है जहा आप के पास  मरने से पहले अपनी बात बोलने का मौका मिले ,फ़िल्मी स्टाइल में डाक्टर आपरेशन थियेटर से बाहर निकले और कहे मुबारक हो बेटी हुई है,( मुझे हमेसा से पता था की मुझे बेटी ही होगी ) लेकिन माँ की हालत बहुत ख़राब है शायद वो चंद घंटो की मेहमान है अब तो दवा नहीं दुआ की जरुरत है, सब भाग कर रोते मेरे पास आये और मै अपनी बेटी को परिवार को सौपते बोलू की मेरी मेरी मेरी  ...............मेरी बेटी का ख्याल रखना और टे, राम नाम सत्य |   ये तो असली जीवन है क्या पता की मै जब आपरेशन थियेटर में जाऊ तो वापस ही नहीं लौटू तब ये सारी बाते कौन बताएगा और कौन बतायेगा की मेरी बेटी की देखभाल कैसे करनी है उसे कैसा बनाना है आदि इत्यादी असली जीवन में मौत आप को आप का आखरी डायलाग बोलने का मौका नहीं देती है यहाँ तो पता ही नहीं होता है की कौन सा डायलाग आप का आखरी होने वाला है |  कई लोगो के लिए ऐसी सोच एक नकरात्मक सोच लग सकती है और कहेंगे की ये एक निराशावादी विचार है, किन्तु हमारे घर के लिए इस तरह की बातो में कुछ भी नया नहीं है खासकर हम बहनों के लिए तो कभी भी नहीं,  हम कभी भी ऐसी बाते करते समय ये नहीं सोचते है की ये नकारात्मक बाते है हमें तो ये आगे के लिए ली गई सावधानिया और बुरे समय के लिए हर समय तैयार रहने जैसा लगता है |
             
                                                 कई जगह पढ़ती सुनती हूँ की हम सभी को हमेसा सकरात्मक बाते करनी चाहिए उससे जीवन में उत्साह आता है उर्जा मिलती है जबकि नकारात्मक बाते हम में निराशा भर देते है, हमें काम करने से रोकते है , न केवल खुद सकरात्मक बाते करनी चाहिए बल्कि ऐसे लोगो से भी दूर रहना चाहिए जो की हर समय नकारात्मक बाते करते है , नकारात्मक उर्जा कभी भी हमें अच्छा फल नहीं देगी | किन्तु मै इस बात से बहुत ज्यादा सहमत नहीं हूँ मुझे तो लगता है की हर समय सकारात्मकता की बात करने वाले भी नकारात्मकता को कुछ ज्यादा ही नकारात्मक ढंग से लेते है | यदि आप वास्तव में ये मानते है की सकारात्मक बाते करे वैसा ही सोचे तो मुझे लगता है की आप को इस तरह की बातो को भी एक सकरात्मक ढंग से लेना चाहिए | मेरा तो मानना है की सकरात्मक व्यक्ति वो है जो हर गलत से गलत और बुरी से बुरी बात में से भी कुछ अच्छा निकाल ले | एक किस्सा गाँधी जी का पढ़ा था ( कितना सच है पता नहीं किन्तु अच्छा है ) की गाँधी जी पानी के जहाज से कही जा रहे थे रास्ते में जब वो डेक पर खड़े थे तो किसी अंग्रेज ने एक पेज पर उनके बारे में बुरा बुरा लिख कर उन्हें भेज दिया उन्होंने उसे पढ़ा उसमे से पिन निकाल कर अलग रख और पेज को जेब में डाल दिया जब उनके सहयोगियों ने पूछा की उसे रखा क्यों है फेक क्यों नहीं दिया, तो उन्होंने कहा की दूसरी तरफ का पेज सादा है वो मेरे लिखने के काम में आयेगा और पिन तो बहुत ही काम की चीज है इस जहाज पर ये कहा मिलती | असल में तो ये आप के ऊपर है की आप चीजो को कैसे ले रहे है , कही गई बातो को कैसे समझ रहे है | अक्सर हम सभी ( मेरा परिवार ) जब भी कोई नया काम करने के लिए जाते है तो उसकी बुरईयो और बाद में आ सकने वाली परेशानियों के बारे में पहले विमर्श करते है , या  काम संफल नहीं हुआ तो उसके बाद क्या करना है ये भी सोच लेते है , लोग कहते है की जिस काम को पहले ही मान लिया की ये संफल नहीं होगा तो फिर वो कैसे सफल होगा और जब पहले के लिए ही आत्मविश्वास नहीं है तो दूसरा भी कैसे होगा , या तुम लोग बुराई तो पहले देखते हो इस तरह तो कोई भी काम नहीं कर सकती हो या कोई भी व्यक्ति तुमको पसंद ही नहीं आयेगा | पर हमारी नकरात्मक सोच बड़ी सकरात्मक होती है हमारा मानना है की अच्छा हुआ तो बहुत अच्छा है किन्तु बुरा हुआ तो हम पहले से उसके लिए तैयार है और बुरा होने पर रोने, घबराने और निराश होने में अपना समय नहीं व्यर्थ करेंगे क्योकि हमारे पास पहले से ही एक प्लान बी भी तैयार रहता है , या कभी हम किसी चीज की बुराई देखते है तो हम ये सोचते है की इसमे ये बुराईया  है तो इनसे बचा कैसे जाये , इनका समाधान कैसे करे या उसका सामना कैसे करे ( कुछ चीजो, समस्याओ और लोगो की सोच का कोई समाधान नहीं होता है तब उनका सामना करना पड़ता है ), इस तरह तो हम चीजो को एक तरह से बुराई मुक्त कर देते है या कम से कम हानिकारक बना देते है  | हम खुद तक ही नहीं रुकते है जब दूसरे भी हम से किसी बारे में राय मंगाते है तो ज्यादातर हम उस चीजो से जुडी गलतियों बुराइयों और समस्याओ की तरफ ही लोगो का ध्यान पहले दिलाते है , मेरा मानना है की उस चीज की अच्छाई तो सामने वाला पहले ही देख चूका है तभी वो काम करने जा रहा है तो जब वो हमारी राय मांग रहा है तो ये हमारी जिम्मेदारी है की उससे जुडी समस्याओ को भी वो पहले समझ ले ताकि बाद में उसका नुकशान न हो,  कभी कभी लोग इस बात को समझ लेते है किन्तु कभी कभी होता ये है की जब वो व्यक्ति हर हाल में वो काम करना चाहता है और हमसे बस हामी भरवाने आता है तो उसे हमारी बाते नकरात्मक लगने लगती है | मै सोचती हूँ की किसी चीज के साथ जुडी अच्छी चीजे तो हमारे पास आने के बाद हमें मिल ही जाएँगी उसको लेकर पहले से ही ज्यादा बाते करने की जरुरत ही क्या है जब पास होंगी तो उपयोग भी होता रहेगा किन्तु किसी नुकशान से बचने के उपाय तो पहले ही सोच लेने चाहिए क्योकि उसके सर पर आ जाने के बाद कई बार आप कुछ भी नहीं कर पाते है सिवाए पछताने के और ये सोचने के की पहले ही इस बारे में क्यों नहीं सोचा | जबकि हर समय सकारात्मक कहने सुनने और सोचने की बाते कभी कभी इन्सान को हर सिक्के का एक ही पहलू देखने के लिए मजबूर कर देती है,  वो पहलू जो बस  अच्छा अच्छा है और ये सोच हमें असावधान बनाती है,  बुरे वक्त और बुरी चीजो के लिए तैयार नहीं होने देती है एकतरह से ये हमें आधा अँधा बना देती है जो सिर्फ अच्छा अच्छा देखता है और समस्याओ बुराइयों को नहीं देख पाता  है और कभी कभी तो इन्सान में अति आत्मविश्वास भर देता है | नतीजा ये होता है की जब हर समय अच्छा अच्छा सोचने वाले के साथ बुरा होता है तो वह अन्य की तुलना में कुछ ज्यादा ही दुखी हो जाता है और मै सफल ही होंगा का आत्म विश्वास ( असल में तो अति आत्मविश्वास ) से भरे व्यक्ति को असफलता हाथ लगती है तो वो कही ज्यादा निराश हो जाता है कभी कभी इतना की फिर कभी कामयाबी की सोचे ही नहीं खड़ा हो ही नहीं पाये , क्योकि उसे तो लगता है की उसने तो बड़े सकारात्मक ढंग से हर अच्छी सोच और इरादे से काम किया कही कुछ गलत था ही नहीं फिर भी सफलता नहीं मिली तो वो दुबारा कैसे मिलेगी , जबकि हर काम में थोड़ी नकारात्मकता असफल होने का डर आप को फिर से अपनी गलतियों की सुधार कर खड़े होने फिर से सफलता के लिए संघर्ष करने की हिम्मत देता है ( अब ये भी जरुरी नहीं है कि सभी के साथ ऐसा हो ही ) , ये व्यक्ति की सोच पर निर्भर है नकारात्मकता और बुराई से भागना हर समय सही हो ये भी ठीक नहीं है |
                                   
                                                 लोग अपने घरो में महाभारत का पाठ नहीं करते है क्योकि कहा जाता है की महाभारत का पाठ करने से घर में महाभारत होती है ये एक नकरात्मक पाठ होगा , जबकि मुझे लगता है की महाभारत का तो पाठ होना चाहिए और अंत में इस बात की शिक्षा खुल कर देनी चाहिए की पैसा , पद , गद्दी और राज्य का लालच इतना ख़राब होता है की १०० पुत्रो वाला वंश भी ख़त्म हो जाता है और एक पूरे वंशावली का नाश होने से किसी तरह बची थी ( यदि कृष्ण ने अश्वाथामा  का चलाया तीर अपने ऊपर न लिया होता तो उत्तर के गर्भ में ही उसके बच्चे की मृत्यु हो जाती और पांडव वंश का भी नाश हो जाता ),यहाँ देखना ये है की हमें सिखाना क्या है , बुराई दिखा कर हमें लोगो को उससे सावधान करना है उससे जुडी परेशानिया और हानियों से लोगो को परिचित करना है और सकरात्मकता का इतना ऊँचा मानदंड नहीं खड़ा करना चाहिए रामायण और पुरुषोत्तम राम की तरह की लोगो को लगे की ये मानदंड तो इतना ऊँचा है की हम उसे कभी छू ही नहीं सकते है तो वैसा बनने का प्रयास ही बेकार है हम तो बुरे ही भले है | कहने का अर्थ, तात्पर्य , मतलब,  यानि की ये है की सकारात्मकता और नकारात्मकता अपने आप में कुछ नहीं होती है ये आप की सोच है उसे अपने पर लेने का तरीका है जो उससे आप को लाभ या हानि कराती है |


अपडेट  :- कभी कभी आप के बारे में नकरात्मक खबरे आप का कितना फायदा कर देती है इसी का उदाहरण देखा टीवी पर,  परसों तक जो टीवी चैनल चीख रहे थे की अन्ना का आन्दोलन फ्लाप हो गया , अन्ना का जादू ख़त्म हो गया , अब लोग अन्ना के साथ नहीं आयेंगे , अन्ना के आन्दोलन से भीड़ नदारत, वो सारे टीवी चैनल कल से अन्ना के आन्दोलन में भीड़ को दिखा रहे है | असल में उन नकरात्मक खबरों ने उन लोगों में जोश भर दिया जो अभी तक काम , आलस जैसे अनेको कारण से बाहर निकल कर इस आन्दोलन से नहीं जुड़ रहे थे वो बाहर आ गये ।  यदि उनके बारे में कोई भी खबर ही नहीं दिखाई जाती तो शायद लोगों में ऐसा जोश नहीं आता ,यहाँ पर अन्ना के अन्दोअलन से जुडी नकारात्मक खबरों ने उन्हें फायदा पहुंचा दिया ।




चलते चलते
               कहा जाता है की हर समय इन्सान को शुभ शुभ बोलना चाहिए क्योकि दिन भर में एक बार माँ सरस्वती हमारी जबान पर बैठती है औरउस समय जो कहा जाये वो सच हो जाता है और वो कब बैठेंगी ये कोई नहीं जानता इसलिए हर समय शुभ बोलना चाहिए | एक बार हमारी माता जी मेरी बहनों के साथ लक्ष्मी पूजा के लिए माला बना रही थी उसमे खासियत ये थी की वहा हर काम १६ बार करना होता है यानि माला में १६ गुड़हल के फुल होंगे साथ में १६ दुप और १६ चावल के दाने हर फुल के साथ बांधे जायेंगे , पूजा भी १६ दिन करने होते है दूसरा दिन आखरी था रात का समय था और अचानक से बिजली चली गई और काफी देर तक नहीं आई थी , ये मुश्किल काम कम रोशनी में संभव नहीं था , माता जी ने विनती की की ये लक्ष्मी मैया माला बनाने के लिए बिजली दे दो , लो जी मुंह से निकला था और बिजली आ गई , माला फटाफट बनना शुरू हो गई और जैसे ही माला पूरी हुई बिजली चली गई , ये देखते ही मेरी दोनों बहनों ने सर ठोक लिया और कहा की माता जी इतने दिन पूजा किया पाठ किया और बदले में माँगा भी तो क्या बस माला बनाने तक के लिए बिजली अरे कुछ बड़ा मांग लेना था न |

शिक्षा :-  इस कथा से हमें ये शिक्षा मिलती है की बस शुभ बोलने से ही काम नहीं चलेगा जब भी बोलो तो कुछ बड़ा बोलो कुछ बड़े की मांग करो क्या पता कब सरस्वती मैया जबान पर विराजमान हो जाये |

तो जल्द ही मुझे पुलित्जर उसके बाद बुकर उसके बाद आस्कर और उसके बाद नोबेल शांति पुरुस्कार मिले ! सरस्वती मैया क्या आप ने सुना !!!
 

July 17, 2012

क्या माँ दुर्गा और काली के रूप को आप हिंसक मानते है - - - - - - -mangopeople

                  इस पोस्ट को हिंसा को बढ़ावा देने के रूप में न देखे किन्तु जरुरत पड़ने पर अपनी रक्षा में किसी पर हमला करने को मै हिंसा नहीं मानती हूँ |
                                    कबीर दास अपने एक दोहे में कहते है की दुनिया की सोच बड़ी उलटी होती है जो घटनी है उसे बढ़नी कहती है और जो चलती है उसे गाड़ी | मै इससे बिलकुल सहमत हूँ इसलिए पिछली पोस्ट उलटी लिखी थी ताकि लोग सीधी बात को समझ सके किन्तु लोगो की सोच भी बड़ी अजीब होती है, वो मान कर चलते है की सोचेंगे समझेंगे तो हम वही जो हम चाहते है आप चाहे सीधा लिखे या उलटा , सो आज सीधी बात करते है | आज भी बात  गुवाहाटी कांड की करुँगी पिछली पोस्ट पर ही उसे जारी लिखा था जान रही थी की हम किसी भी प्रकार से इस तरह की घटनाओ का विरोध करे किन्तु समाज में एक जो पुरुवादी सोच  ( पुरुषवादी सोच जब लिख जाता है तो बात बस पुरुष की नहीं पूरे समाज की होती है जिसमे हर वर्ग और लिंग के लोग शामिल है )  है हम उसे नहीं बदल सकते है  इसलिए जरुरी है की हम लड़कियों की सुरक्षा के लिए उठाये जा रहे कदमो की भी बात करे | ( अब ठीक है ना संजय जी )  पहले उन कदमो की बात करते है जो आम तौर पर एक परम्परावादी समाज किसी लड़की की सुरक्षा के लिए चाहता है | रात में आप घर से बाहर न निकालिये , सुन शान इलाको में आप मत जाइये , ऐसी जगहों पर आप कभी भी अकेले न जाये भरोसेमंद पुरुष को साथ रखे , इस तरह के कपडे न पहने जो लड़को को भड़काऊ लगे उन्हें ऐसा करने के लिए प्रेरित करे , ( यदि मुझेसे कोई उपाय छुट गये हो तो याद दिला दे ) किन्तु ये उपाय भी कारगर नहीं है क्योकि  इस तरह की घटाने दिन के उजाले में भी होती है , लड़कियों को राह चलते रास्ते में गाड़ी में खीच लेना , या मुंबई में बिलकुल एक व्यस्त सड़क के बीच बने पुलिस केबिन में पुलिस वाले द्वारा बलत्कार जैसी घटनाओ के बारे में सभी ने सुना होगा | भीड़ भाड़ इलाको में तो और भी ज्यादा छेड़छाड़ की घटनाये होती है बसों में ट्रेनों में भीड़ भरे बाजार में  , पुरुषो को साथ रहने से कोई फायदा होगा कह नहीं सकते कुछ महीने पहले इस तरह की ही एक घटना में दो लडकिय अपने पुरुष मित्रो के साथ रात में घूम रही थी कुछ लोगो ने उन्हें छेड़ने लगे , उनके पुरुष मित्रो ने उसका विरोध किया तो वो और साथी ले आये और उन दोनों लड़को पर हमला कर दिया जिसमे से एक लडके की मौत हो गई और दूसरे की बड़ी मुश्किल से जान बची , इस तरह की घटनाये हर तरह की महिलाओ के साथ होता है चाहे उसने सलवार कमीज पहन रखी हो साड़ी पहनी हो या बुर्के में ही क्यों न हो सभी जगह होती है , कई बार हमें सुना है की गांवो में दबंगों ने महिला को निर्वस्त्र कर घुमाया , मुझे नहीं लगता है की उसने कोई भड़काऊ कपडे पहन रखे हो वहा भी वही महिला को अपमानित करने का सबसे आसान तरीका अपनाया जाता है उसे इस तरह सार्वजनिक जगहों पर निर्वस्त्र करना |  ये सभव नहीं है की लड़किया घर से बाहर निकले ही नहीं स्कुल कालेज बहुत सी जरुरी जगहों के लिए उन्हें हर हाल में घर से तो निकलना ही पड़ेगा | हा यदि आप इन कारणों से भी लड़की को घर से नहीं निकलना देना चाहते है तो उसके आगे मै कुछ नहीं कह सकती हूँ |  इसलिए जरुरी है की लड़कियों को इतना शारीरिक और मानसिक रूप से मजबूत बनाया जाये की वो किसी अन्य से मदद मांगने और ऐसा कर रहे दुष्टों से माँ बहन की दुहाई देने की जगह खुद ऐसी परिस्थितयो से निपट सके कुछ हद तक उसे रोक सके उसका सामना कर सके |
                                                                                                    शारीरिक रूपों से लड़कियों को मजबूत बनाने के साथ साथ जरुरी है की लड़कियों को मानसिक रूप से भी मजबूत बनाया जाये | हम जिस देश में रहते है वहा नारी के साथ एक पवित्रता वाला कांसेप्ट चलता है मतलब की आप का शारीर ही आप का सब कुछ है किसी ने गलत इरादे से आप पर हाथ भी रख दिया तो आप अपवित्र हो जाएँगी | अब आप कहेंगे की इसमे क्या गलत है क्या हम किसी को भी कही भी हाथ लगाने दे | जो लड़किया है नारी है वो इस बात को अच्छे से जानती है जो नहीं है उनके लिए बताते है पहली बात की लड़कियों को उनके शारीर को ले कर इतना संवेदनशील बना दिया जाता है और समाज में तुम्हारे साथ ये हो सकता है वो हो सकता हा जैसी चीजो से इतना डरा दिया जाता है की किसी ने जरा सा गलत हाथ लगाया नहीं या कुछ भद्दी टिपण्णी की नहीं कि उनकी हिम्मत जवाब दे जाती है ,शरीर डर से कापने लगता है दिमाग काम करना बंद कर देता है , मन में विरोध की जगह डर की भावना घर कर जाती है,  इसने मुझे गलत छू लिया या अब ये मेरे साथ और गलत कर देगा , अब मै घर वालो को क्या बताउंगी ,  इस मानसिक स्थिति में तो कोई भी इन्सान सामने वाले का मुकाबला नहीं कर सकता है फिर किसी लड़की से क्या उम्मीद करे जो शारीरिक रूप से ज्यादातर ऐसा करने वालो से कमजोर होती है | हालत ये है की पुरुष क्या किसी महिला का भी मुकाबला करने की हालत में कई बार लड़किया नहीं होती है | महीने भर पहले की बात है लोकल ट्रेन से जा रही थी भीड़ कम थी और मेरा स्टेशन आने वाला था मै दरवाजे पर ही खड़ी थी साथ में कोई १४-१५ साल की चार लड़किया भी खड़ी थी शायद टियुशन जा रही थी उनके कंधो पर बैग था,  दो मेरे आगे थी तभी पीछे से खड़ी एक लड़की ने शरारत में धीरे से मेरे बगल से हाथ डाला और आगे खड़ी लड़की के कंधे पर थपकी दे झट हाथ पीछे कर लिया आगे वाली लड़की मुड़ी और मुझे देखने लगी मैंने  कुछ नहीं कहा उसने कुछ सेकेण्ड के लिए मुझे देखा और मारे डर के मम्मी मम्मी करने लगी उसका चेहरा बिलकुल डर गया और वो कस कर अपने बगल में खड़ी सहेली से लिपट गई, मुझे देख कर आश्चर्य हुआ की वो किस बात से डर रही है | मैंने कहा तुम क्यों डर रही हो उसकी सहेली ने भी पूछ तो उसने मराठी में कहा की इन्होने मुझे कंधे पर थपकी दी पीछे खड़ी उसकी सहेलियों ने हंसते हुए कहा की अरे वो तो मैंने किया था , मैंने उससे कहा की इसमे डरने की क्या बात है यदि मैंने ही तुमको थपकी दी उसकी सहेलिय भी इस बात पर उसे चिढाने लगी इतने में मेरा स्टेशन आ गया और मै उतर गई | मुझे आश्चर्य हो रह था की एक लड़की किसी महिला के थपकी देने भर से इतना डर जा रही है यदि मेरी जगह कोई पुरुष होता तो इसकी क्या हालत होती | विश्वास कीजिये हमारे देश की ज्यादातर आम लड़किया इस तरह की ही डरपोक होती है , हम उन्हें डरपोक बना देते है वो कई बार सामान्य सी परिस्थिति का भी का सामना नहीं कर पाती है तो किसी मुश्लिक परिस्थिति का क्या करेंगी | लड़को से दूर रहो वो ऐसे होते है वो वैसे होते है वो कुछ भी करेंगे तो उनका तो कुछ नहीं बिगड़ेगा हा तुम्हारी बेइज्जती जरुर हो जाएगी जैसी बात उन्हें लड़को से हर समय डरने की प्रेरणा दे देते है | फिर जब कभी भी उनके सामने इस तरह की घटना होती है तो वो पहले ही मान लेती है की वो मुकाबला कर ही नहीं सकती है वो उसे रोक नहीं सकती है अब ये सामने वाले के ऊपर है की वो हमारे साथ क्या करेगा
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                                                                              दूसरी बात है घर की इज्जत वाली, गुवाहाटी कांड हो या इस तरह का कोई अन्य कांड में मैंने देखा की लड़की उन लड़को से मुकाबला करने की जगह बस अपना चेहरा कैमरे में दिखाए जाने से बचाती है ,  वही दुनिया ने चेहरा देख लिया की तुम्हरे साथ क्या हुआ है तो तुम्हारा क्या होगा तुम्हारे माँ बाप की इज्जत चली जाएगी इसलिए जरुरी है की अपना चेहरा न दिखाओ भले तुम्हारे साथ कुछ भी हो जाये अपनी पहचान छुपाओ न की उनसे कोई मुकाबला करो पहली प्राथमिकता तुम्हारी यही है | ये ठीक है की इस तरह किसी भीड़ से एक अकेली लड़की का मुकाबला करना बड़ा मुस्किल काम है किन्तु बिलकुल ही आत्म समर्पण कर देना भी ठीक नहीं है | हम सदा अपनी बेटियों को शांत शौम्या नजरे नीचे कर सह कर घर चले आने की शिक्षा देते है | हम कभी उन्हें ये नहीं कहते है की किसी भी संकट के समय में जरुरत पड़े तो अपनी रक्षा में हमला करने से मत चुको,  हम कभी भी उनमे ये विश्वास क्यों नहीं पैदा करते है की वो स्वयं भी किसी घटना से निपटने में सक्षम है कम से कम किसी अपने या मददगार के आने तक उस घटना का सामना कर सकती है उसे रोक सकती है उसका मुकाबला कर सकती है और ये सब करके वो कुछ भी गलत नहीं कर रही है और उनका परिवार उनके खुद की रक्षा के लिए उठाये गये किसी भी कदमे उनके साथ है | इसलिए जरुरी है की लड़कियों को ऐसी घटनाओ के बाद ये न बताये की देखो ऐसे कपडे पहनने से ऐसे रात में निकालने से या इस जगह जाने से तुम्हारे साथ ये हो सकता है , ये कह कर उन्हें डराए नहीं उन्हें डरपोक न बनाये बल्कि उनमे विश्वास पैदा करे उससे  ये कहे की ऐसी स्थिति आने पर कभी भी डरो मत मुकाबला करो , जरुरत पड़ने पर हमला करो , क्योकि इस भीड़ में ज्यादातर भीड़ बहादुर होते है जो भीड़ की शक्ल में तो बड़े बहादुर बनते है किन्तु अकेले में इनकी इतनी हिम्मत भी नहीं होती है की वो एक चूहे को भी मार सके,  ज्यादातर बन्दर घुड़की दने वाले होते है जो सामने वाले ही हिम्मत जांचते है यदि आप पीछे जाते  तो उनकी हिम्मत बढ़ती है और जब आप हिम्मत से आगे बढ़ते है तो वो पीछे हट जाते है | मानसिक रूप से मजबूर बने घबराए या हडबडाये नहीं हर किसी के पास मोबाईल होता है तुरंत पुलिस को या जो सबसे करीब है उसे कॉल करके बुलाये और जरुरत पड़े तो अपनी आत्म रक्षा में तुरंत हमला बोल दे ( जब आप के पास वहा से भाग जाने का विकल्प न हो तब , जब आप ऐसे लोगो से घिर जाये तब )   किसी पर भी जो भी आप के हाथ में आये उसी से ऐसे समय पर हमला कर दे  आप का पर्स,  पेन, बालो के काटे से लेकर सड़क पर पड़ा पत्थर भी आप का हथियार बन सकता है | जब मै छोटी थी तो मेरे चाचा हम लोगो से एक बात बोलते थे (सभी के लिए)  की जब कभी भी कई लोग तुम पर हमला करे तो सभी से मुकाबला करने की जगह थोडा ध्यान दो और उनमे से जो सबसे कमजोर या डरपोक दिखे बस उसे पकड़ो और बेतहाशा धोना शुरू कर दो,  यहाँ पर सभी आप की ताकत देखना चाहते है पर ये नहीं देखते है की ताकत किसके खिलाफ प्रयोग किया जा रहा है उस कमजोर को जब आप बिना दाये बाये देखे कही भी पिटते है तो वो आप से डरता है और उस समय आप ताकतवर दिखते हो और ऐसे भीड़ के साथ बहादुरी दिखाने वाले डर जाते है और फिर उन्हें समझ में आता है की उसके बाद उनका नंबर भी लग सकता है ( आप ने देखा होगा दो चार मजनू लड़कियों को छेड़ते है जैसे ही लड़की पलट कर किसी एक को पकड़ती है बाकि वहा से भाग जाने में ही अपनी भलाई समझते है तब तो और भी जब लड़किया भी झुण्ड में हो )
                          
                           यहाँ पर शारीरिक मजबूती के साथ ही मानसिक मजबूती काम आती है जब आप इस बात की परवाह न करे की आप को कौन कहा मार रहा है पिट रहा है या आप के किस अंग को छू रहा है तो आप उस स्थिति से मुकाबला करने के लिए ज्यादा तैयार होते है | किन्तु होता क्या है की लड़किया कुछ भी हो जाये मुकाबला करने की जगह अपने चहरे या नीजि अंगो को छुए जाने से बचाने में लगी होती है जबकि ऐसा करने वाला आप के साथ ये करने की जिद पर आ जाये तो आप उसे बहुत मुश्लिक से ही रोक पाएंगी और जब वो भीड़ की शक्ल में हो तो शायद ये आप के लिए नामुमकिन हो जाता है , अच्छा हो अपने दोनों हाथो का प्रयोग उस पर हमला करने उसे पीटने में लगाये क्योकि दोनो ही स्थिति में आप अपने आप को छुए जाने को रोक नहीं सकती है जब आप मुकाबला नहीं करेंगी तो ये सब आप के साथ तब तक होता रहेगा जब तक वो चाहेंगे या जब तक कोई अन्य आप को आ कर वहा न बचाए जबकि जब आप मुकाबला करेंगी तो आप जल्दी से उस बुरी स्थिति से बाहर आ सकती है  | मुकाबला करने के लिए जरुरी ये भी है की हम पहले से ही अपनी बेटियों को कोमलान्गनी बनाने के बजाये थोडा शारीरिक रूप से भी मजबूत बनाये उन्हें अपनी सुरक्षा के आत्म रक्षा ट्रेनिग भी दिलवा दे बिलकुल वैसे ही जैसे आज भी लाखो लोग अपने बेटियों के पढ़ाने लिखाने से  लेकर सिलाई कटाई के स्कुलो में भेज देते है ताकि बुरे समय में काम आये | तो फिर किसी ऐसी संकट में अपनी रक्षा करने की ट्रेनिग क्यों न उन्हें दी जाये वो उसका कितना प्रयोग करती है या नहीं ये तो बाद की बात है किन्तु ऐसी कोई भी प्रशिक्षण उनमे आत्म विश्वास तो पैदा कर ही देगा | ये कभी न सोचे की आप के साथ या आप के घर की महिलाओ के साथ ये नहीं हो सकता है इस तरह की घटाने या इससे मिलती जुलती घटाने कभी भी कही भी किसी के साथ भी हो सकता है इसलिए ऐसे प्रशिक्षण केवल बेटियों के लिए नहीं उनकी माँ को भी दिया जाना चाहिए ( जब मै १२ वि में थी तो मै ताई- क्वांडू सीखती थी हमारे साथ एक १२ साल की लड़की और उसकी माँ भी सीखने आती थी )  जरुरी नहीं है की ये छेड़ छड कर रहे व्यक्ति के ऊपर ही काम आये चेन, पर्स खीच कर भाग रहे उच्चके को या घर में घुसे लुटेरे से बचने के भी काम आ सकता है आप हर समय अपने घर की महिलाओ के साथ उनकी सुरक्षा के लिए मौजूद नहीं हो सकते है | ये जरुरी नहीं है की इतना कुछ सीखने के बाद भी आप सुरक्षित हो ही जाएँगी किन्तु जितने उपायों से हम अपनी रक्षा कर सकते है उतनी तो हमें सिख ही लेनी चाहिए संभव है की आप से साथ घटी हटाना में अपराधी के पास कोई खतरनाक हथियार हो और आप कुछ न कर सके | जब लोग हथिहर बंद हो कर हमला करे तो फिर मै यही कह सकती हूँ की तब तो प्रेरणा लेने के लिए हमारे पास दो महिलाए है हरियाणा की है जिन्हें आप सब ने आमिर के शो सत्यमे जयते में देखा होगा, तब तो यही कहूँगी की जब समाज के पुरुषो की हिम्मत इतनी बढ़ जाये तो हम सभी को भी एक आटोमेटिक ............ के लाइसेंस के लिए आवेदन कर देना चाहिए |
बहुत सारे उपाय है इन जैसी घटनाओ से खुद को बचाने के लिए सभी दे , देखिये रश्मि जी ने भी एक उपाय सहशिक्षा का दिया है पता नहीं लडके इससे कितने सुधरेंगे और लड़कियों को समझेंगे पर ये कह सकती हूँ की लड़किया कम से कम लड़को से डरना उन्हें खुद से ज्यादा ताकतवर या काबिल होने की गलतफहमी से जरुर बाहर आजायेगी और किस तरह के लड़को को किस तरह से हैंडल करना है ये तो सिख ही जाएँगी |

चलते चलते

 मै धार्मिक महिला नहीं हूँ इस कारण मै देवी देवताओ को उस रूप में नहीं देखती जीस रूप में कोई अन्य देखता है यही कारण है की मै देवी देवताओ को एक सामाजिक जरुरत के कारण समाज द्वारा बनया गया मानती हूँ | इसी के तहत मै ये भी सोचती हूँ की जब संसार में पहले से ही देवी लक्ष्मी , सरस्वती के रूप में नारी के शांत रूप और सती तथा पार्वती के रूप में शक्ति रूप मौजूद था तो क्या कारण था की देवी दुर्गा का निर्माण किया गया  | संभव है की समाज ने इस बात की जरुरत समझी हो की नारी को और भी शक्तिशाली और थोडा हिंसक रूप में दिखाया जाये जिससे ये बात स्थापित हो सके की समाज की रक्षा या खुद की रक्षा के लिए नारी को अपना शौम्य, शांता ,संस्कारी, अहिंसक रूप त्याग देने की जरुरत महसूस हो तो वो आसानी से ये कर सके और समाज उसे मान्यता दे सके साथ ही बुरे लोग नारी से भी डर सके | फिर ये भी लगता है की जब दुर्गा जी पहले से ही मौजूद थी तो उनसे भी वीभत्स और रक्त पीने वाली काली का निर्माण क्यों किया गया शायद इस रूप में ये दर्शाना था की दुष्टों को जड़ से ख़त्म किया जाये , इस बार तो उनका संहार हो ही किन्तु इस तरह हो की वो दुबारा जन्म ही न ले सके,  दुष्टों दानवों का सम्पूर्ण विनाश करने की शक्ति भी नारी को दी गई शायद कारण ये रहा हो की जन्म देने वाली ही उसे जड़ से ख़त्म कर सकती है , ऐसे दुष्टों का दुबारा जन्म वो ही रोक सकती है साथ की दुर्गा जी के साथ माँ, ममता और दया का जो एक अंश बचा था उसे काली के रूप में बिलकुल भी ख़त्म कर दिया जाये या बहुत कम कर दिया जाये | यही कारण है की कई बार संकट के समय दुष्ट लोगो से खुद को और अपने परिवार को बचाने के लिए नारी से दुर्गा या काली का रूप धारण करने का आवाह्न किया जाता है और इसे कही से भी गलत और हिंसक नहीं माना जाता है | मुझे नहीं लगता है की कोई भी व्यक्ति  दुर्गा या काली के रूप में दानवों दुष्टों के विनाश को और समाज दुनिया को बचाने के लिए किये गये संहार को हिंसक मानता होगा | अब ये समाज को तय करना है की क्या वो हर नारी को दुर्गा या उससे भी वीभत्स काली के रूप में बदलने के लिए मजबूर करे या नहीं | ये एक आम महिला की आम सी नीजि राय और सोच है आप इससे विपरीत विचार भी रख सकते है |

July 13, 2012

गुवाहाटी मामले में पहले लड़की की असलियत जानिए फिर लड़को को कुछ कहिये - - - - -mangopeople

                                                                                          

                                                    गुवाहाटी में एक लड़की के साथ  क्या क्या हुआ सब ने देखा मुझे उसका विवरण देने की आवश्यकता नहीं है | बहुत से लोग जुबानी खर्च में लगे है कह रहे है की ऐसा करने वालो को कड़ी सजा होनी चाहिए आदि आदि किन्तु बिना सच्चाई को जाने जिसके मुंह में जो आये जा रहा है वो बके जा रहा है  | कितने है जो असलियत को जानते है शायद ही कोई हो,  मेरी ही तरह कईयो के मन में ये विचार आ रहे होंगे किन्तु बेचारे लोगो के डर से नहीं कह पा रहे है (बस अभी के लिए जब तक उस लड़की के प्रति लोगो के बेमतलब की सहानभूति उफान पर है) जब ये उफान ख़त्म होगा तो मेरी तरह कई विद्वान् लोग ये सवाल कर रहे होंगे |
                                                                          सबसे पहले सवाल ये है कि ये बताइये आप सब ने वीडियो में देखा होगा की ये रात की घटना है सोचिये की इतनी रात को कोई भले घर की लड़की घर से बाहर निकलती है और निकली भी तो क्या घर से अकेली निकलती है या कभी भी किसी "बार"  के आस पास नजर आती है,  बिलकुल भी नहीं किसी भी भले घर की लड़की जो अभी मात्र ११वि में पढ़ रही है ( मिडिया रिपोर्ट के अनुसार ) इनमे से ऐसा कोई भी काम नहीं करती है | फिर आप लोगो ने उसके कपडे देखे,  उसने किस तरह "बदन दिखाऊ", " भड़काऊ "  आधुनिक कपडे पहन रखे थे जो सीधे सीधे लड़को को आमंत्रित करने के लिए काफी थे | अब आप सोचिये की इस तरह के आधुनिक कपडे पहने रात में अकेली कोई लड़की किस दारू बार के पास जाएगी तो उसके साथ ये नहीं होगा तो और क्या होगा,  वो लड़की इसी के लायक थी , संभव तो ये भी है की उसने ही लड़को को ये सब करने के लिए उकसाया होगा वरना लड़को को क्या पड़ी थी की उससे छेड़खानी या मारपीट करने की | वीडियो को ध्यान से सुनिए उसमे हमारी संस्कृति हमारी परंपरा की रक्षा करने वाले लोग है जो लड़की से पूछ रहे है की  तुने शराब पी है , बोल शराब पीयेगी , बार में जाएगी , मतलब साफ है की लड़की ने शराब पी रखी है ( जब वो लडके पूछ रहे है तो जरुर पी रखी होगी वो बेमतलब का ये बात तो पूछेंगे नहीं ) अब सोचिये की कोई  अच्छी सभ्य लड़की कभी भी शराब पीयेगी या किसी बार में जाएगी,   पर क्या है की आज कल की लड़कियों को बराबरी के नाम पर पुरुषो की तरह ही शराब पीने बार , पब में जाने की आदत लग गई है तो ऐसी परम्पराव के खिलाफ जाने वाली हमारी महान संस्कृति को बदनाम करने वाली लड़कियों के साथ ऐसा ही होना चाहिए ताकि उन्हें सबक मिले की उन्हें ऐसा करने का अधिकार नहीं है ये सब बस पुरुषो के करने का काम है वो इसे नहीं कर सकती है | याद होगा कुछ साल पहले दिल्ली में भी इसी तरह एक महिला को सरेआम खूब पिटा गया था उसके ही मोहल्ले वालो ने क्योकि उसने अपने मकान मालिक पर बलात्कार का आरोप लगाया था और बाद में एक दिन सभी समाज के ठेकेदारों ने  मिल कर उस महिला को भी अच्छे से सबक सिखाया था सब ने कहा की महिला ने शराब पी रखी थी और महिलाओ का शराब पीना जुर्म है तो इस जुर्म की सब ने मिला कर खूब सबक सिखाया,  | कुछ समय पहले हिन्दू धर्म के ठेकेदारों ने भी बंगलोर में भी इसी तरह पब  में गई लड़कियों को ऐसे ही सबक सिखाया था हम सब ने देखा था | इस तरह की हर घटना के बाद लोग जुबानी जमा खर्च शुरू कर देते है चिल्ल पो करते है और फिर शांत हो जाते है पर इन चिल्ला पो मचने वालो को हमरी परम्परा संस्कृति की जरा भी चिंता नहीं है | जब तक लड़किया ठीक से सबक न सिखा ले उनके साथ ऐसा ही किया जाता रहना चाहिए |
                                                 ये भी संभव है की वो लडके लड़की के लिए अनजान हो ही नहीं मतलब की अभी कुछ समय पहले की घटना है अपने मित्रो के साथ जन्मदिन की पार्टी में गई लड़की के साथ उसके दोस्तों ने ही उसे शराब पिला कर बलात्कार किया था बाद में हमारी महानी खोजी पुलिस ने पता लगाया था असल में वो लड़की एक वेश्या थी भला कोई सभ्य  घर की  लड़की लड़को के साथ अकेले जा कर पार्टी करती  है या शराब पीती है या  लड़को को मित्र बनाती  है , असल में लड़की  और लड़को के साथ पैसे के लिए झगडा हुआ था और कोई बात नहीं हुई थी और इस तरह के धंधा करने वालो के साथ भी कोई बलात्कार होता है | संभव है की इस मामले में भी लड़की ही चरित्रहिन हो और लड़को को फ़साने का प्रयास किया हो और कामयाब नहीं हो पाई या उसने पैसे की ज्यादा मांग की हो या लड़को पर  इल्जाम लगाने लगी हो और तब उसे मात्र सबक सिखाने के लिए लड़को ने उसे दो चार हाथ मार दिया हो जिसे बढ़ा चढ़ा कर दिखाया जा रह है | कुछ समय पहले एक टीवी चैनल पर पुलिस वालो ने देश में हो रही सारी बलात्कार और छेड़ छड की घटनाओ की असलियत सभी को बताई थी की कोई भी सभ्य महिला या लड़की कभी भी अपने साथ हुए बलात्कार या छेड़छाड़ की रिपोर्ट पुलिस स्टेशन में लिखवाने नहीं आती है अरे भाई वो तो अपने इज्जत को यु सरे आम क्यों ख़राब करेगी वो तो सब छुपा कर घर में बैठ जाती है , जो भी इस तरह की घटनाओ की रिपोर्ट लिखाने पुलिस स्टेशन में आती है वो सभी अच्छे और सभ्य घरो की नहीं होती है उन्हें रिपोर्ट लिखवाने से फायदा होता है तभी आती है , वो मर्दों को फंसा कर पैसा ऐठना चाहती है इसलिए ही पुलिस के पास आती है | सोचिये कितना बड़ा सच उजागर किया था पुलिस ने और लोग है की इस तरह की घटनाओ पर लगते है लड़की के प्रति सहानभूति जताने और पुरुषो को गाली देने | लोगो की आदत है की बिना सोचे वो भावनाओ में बहने लगते है और कुछ भी कहने लगते है | अब जैसे बागपत की पंचायत ने एक सही और महान फैसला लिया है की अब उस गांव से कोई भी ४० वर्ष तक की महिला बाजार नहीं जाएगी , मोबाईल नहीं रखेगी सोचिये की यदि ये फैसला पहले ही सारे देश में लागु हो जाती तो कितना अच्छा होता तब तो ये घटना होती ही नहीं महिलाए अपने अपने घरो में सुरक्षित होती | जिस तरह चोर डाकू से बचा कर आप अपनी संपत्ति तिजोरी में रखते है उसी तरह लड़किया भी घर के पुरुषो की इज्जत है उसे बचाने के लिए पुरुषो को अपने अपने घरो की महिलाओ को घरो में ताला बंद कर रखना चाहिए | कुछ लोग हर बात में पुरुषो को गाली देने लगते है उन्हें भला बुरा कहते है किन्तु वो ये नहीं समझ पाते है की किसी स्त्री के प्रति किसी पुरुष का आकर्षित होना प्राकृतिक क्रिया है बनाने वाले ने ही उनके अन्दर ऐसा कैमिकल लोचा किया है की वो महिला के प्रति आकर्षित होंगे ही उसमे उनका कोई भी दोष नहीं है,  यदि मौका हो ,उद्दीपन हो, भड़काऊ तत्व हो तो कई "सभ्य" के दिलों में धड़कता पुरुष जानवर पैजामे से बाहर आएगा ही 
इसलिए मै तो कहती हूँ की लड़कियों को घरो में नहीं बल्कि घर के एक कमरे में बंद रखना चाहिए ताकि उन पर उनके भाइयो पिता चाचा मामा फूफा किसी भी पुरुष की नजर ना पड़े क्योकि प्राकृतिक नियम के अनुसार स्त्री को देखते ही पुरुषो के मन में उनके शिकार की भावना जगा जाएगी क्योकि बाहर तो उन्हें देखने तक के लिए लड़किया नहीं मिलेगी और घर में रह रही लड़किया भी तो स्त्री लिंग ही है ना  इसलिए अच्छा है की उन्हें सभी पुरुषो से दूर कमरों में बंद रखा जाये |  किन्तु लोग समझते नहीं है और पंचायतो के फैसलों को  भी बुरा कहने लगते है अब क्या जवाब है उनके पास , क्या अब भी आप को लगता है की पंचायत ने कोई गलत फैसला किया है | लोग नाहक इमोशनल होते है असल में तो ये घटना इस लायक है ही नहीं की इस पर चर्चा भी की जाये किन्तु "चर्चाए" हो रही है क्योकि  इन सब के लिए  पुलिस व्यवस्था जलील पत्रकार जिम्मेदार हैं और इसे मिठाई बनाकर प्रस्तुत करने वाले लोग |
                                                                   
चलिए यदि आखिर में हम मान भी ले की ठीक है लड़को ने जवानी को जोश में भड़काने के करण कुछ मारपीट कर दिया या लड़की को छू दिया ( अब लड़की को इतना भी छुई मुई होने की क्या जरुरत है ) तो क्या उन्हें आप मार ही डालेंगे क्या, कुछ लोग बार बार कड़ी सजा की पैरवी करते है,  किन्तु ये सही नहीं है हिंसा कभी भी किसी भी मर्ज का इलाज नहीं होता है हिंसा गलत बात है हर किसी को सुधरने का एक मौका तो मिलना ही चाहिए,  ना की उनको सजा दे कर उनका जीवन बर्बाद करना चाहिए | इन सभी लड़को को सुधरने का मौका देते हुए हम सभी को इन्हें माफ़ कर देना चाहिए ये बच्चे है और इन्होने "मात्र " "छोटी " सी "मुर्खता" की है जिसकी सजा की कोई जरुरत नहीं है माफ़ी बड़ी जीज है ये जरुर इन की पहली गलती होगी सौवी भी हो तो क्या आखिर गलती तो इन्सान से ही होती है याद रखिये माफ़ी देने वाला बड़ा होता है और उस लड़की से भी उम्मीद करती हूँ की वो अपने साथ हुए "छोटी मोटी" घटना को भूल कर उसे माफ़ कर देगी |
                                      जारी ..................................................

                                                                                   कुछ समय पहले रचना जी ने बताया था कि  सटायर को ब्लैक ह्यूमर भी कहा जाता है । पर अपनी पोस्ट को ये नाम देते डर लगा कही कालापन मुझ पर अपने अपमान का मुक़दमा न कर दे और रही बात ह्यूमर की तो हा ये हो सकता है तभी तो वो लडके लड़की के साथ ऐसा करते हँस रहे थे | वो करते हँस रहे थे आप पढ़ कर हँस लीजिये हमें तो नहीं आई ............


July 04, 2012

पीड़ित कौन और मांफी देने वाला कौन - - - - mangopeople

                                                                   
                                                                मुद्दे को ठीक से समझने के लिए उसे एक कहानी किस्से की तरह सुनाती हूँ, मान लीजिये की एक गांव क़स्बा शहर जैसा कुछ है, जहा सब एक दूसरे को जानते है जैसे की अपना ब्लॉग जगत है, कुछ वैसा ही, वहा कई तरह के लोग है ,उनमे एक ऐसा भी व्यक्ति है जिसकी आदत है चर्चा में बने रहने के लिए कुछ भी करने की,  सब उसकी बाते करे उसे देखे उसके लिए वो कुछ भी करता है , तो कभी बस अपने  आन्नद के लिए,  महिलाए उसके निशाने पर ज्यादा रहती है महिलाए के लिए अपने घर की छत पर चढ़ कर अश्लील टिप्पणिया करना उसके सबसे प्रमुख आदतों में एक थी , ये सबसे आसान तरीका है चर्चा में आने के लिए और मजे लेने के लिए तैयार कुछ लोगो को अपने पास बुलाने के लिए | कुछ लोगो को गलतफहमी थी की वो बड़े आदमी है ( अभी हाल में ही ननद की बेटी की शादी थी, गाने वाले लडके की तरफ किसी ने इशारा कर कहा बहुत बड़ा सिंगर है,  मैंने कहा वो आर्केस्ट्रा वाला,  तो उन्होंने कहा की अरे नहीं भाई टीवी पर एक प्रतियोगिता में आया था बड़ा सिंगर है,  मैंने कहा काहे का बड़ा आज भी शादियों के आर्केस्ट्रा में गा बजा रह है, तो जबाब मिला आर्केस्ट्रा मत कहिये बैंड  है | मतलब टीवी पर आने के बाद आदमी बड़ा हो जाता है और आर्केस्ट्रा बैंड बन जाता है ) कुछ एक लोग बड़ा आदमी है के कारण उन्हें कुछ कहते नहीं थे कुछ अपने मतलब के लिए उन्हें समय समय पर उकसा कर मजे लिया करते थे ( कई बार लोग खुद कई गिरी हुई हरकते नहीं कर पाते है तो ऐसे लोगो को सहारा लेते है अपना दामन भी साफ और खुद की खुन्नस भी निकल गई ) सालो तक उनकी यही हरकते रही लोगो को व्यक्तिगत टिप्पणी  करना उल जुलूल हरकते करना आदि आदि | एक दिन उनको ये एहसास  हुआ की इन हरकतों के कारण वो बड़े आदमी बस माने जाते है कुछ लोगो के लिए,  किन्तु उन्हें वो सम्मान नहीं मिलता है कोई पुरुस्कार नहीं मिलता है उनकी हरकते बीच में आ जाती है , तो उन्होंने सोच लिया की अब से वो ये सारी हरकते बंद कर देंगे ताकि उन्हें वो सब मिल सके और उन्होंने अपने घर की छत पर चढ़ चिल्लाना शुरू किया की पिछले किये की माफ़ी मांगता हूँ आगे से ऐसी कोई हरकत नहीं करूँगा सब लोग मांफ कर दे | उनका ऐसा कहना था की अचानक से उस समाज  ,जगत के बहुत से  विद्वान् बुद्धिजीवी और आम लोग  निकल कर बाहर आ गये और लगे उन्हें माफ़ करने,  उनकी माफ़ी की सराहना करने और ये बताने की उन्होंने माफ़ी मांग कर कितना बड़ा काम किया है अब तो वो महान लोगो में शामिल हो गये सब ने मिल कर उन्हें माफ़ कर दिया | किन्तु वो बेचारे सब बिलकुल आश्चर्य में पड़ गये जिनको उन्होंने सारा जीवन व्यक्तिगत टिप्पणिया की उन्हें परेसान किया महिलाओ से अश्लील बाते की , वो सोच में पड़ गये की इस व्यक्ति ने अपराध तो हमारे खिलाफ किया है तो ये माफ़ी देने वाले ये कौन लोग है , माफ़ी मांगने वाले ने तो इनके खिलाफ कोई अपराध किया ही नहीं है तो ये माफ़ी क्यों दे रहे है और ये बात भी समझ नहीं आती है जब अपराध करने वाले ने कुछ व्यक्ति विशेष लोगो के खिलाफ परोक्ष और अपरोक्ष रूप से अपराध किया है तो उसे माफ़ी उनसे मांगनी चाहिए या पूरे उस समाज से | बेचारे इस सोच में अपने सर के बाल नोच रहे थे और सोच रहे थे की आज वही लोग उस अपराधी को माफ़ी दे रहे है जो कभी भी अपराध के होते समय उसका विरोध करने नहीं आये आज अचानक से एक अपराधी को माफ़ करने कैसे चले आये |
                                                           
                                                            
                                                                         अब मुद्दा क्या है,  नहीं वो व्यक्ति या उनका व्यवहार मुद्दा नहीं है ( ऐसे लोग तो ध्यान देने के लायक भी नहीं होते है ) मुद्दा है अपराध और अपराधी के प्रति समाज का व्यवहार | क्या अनेक अपराध करने के बाद व्यक्ति माफ़ी मांग ले तो उससे उसका अपराध कम हो जाता है या उस व्यक्ति की पीड़ा कम हो जाती है जो उसके अपराध से पीड़ित है , क्या ये समाज का सही न्याय है की उस अपराधी को माफ़ कर दे | मुझे तो ये बात भी हास्यापद लगती है की अपराध किसी के प्रति और माफ़ी किसी और से , जिसका पूरे मामले से सम्बन्ध ही नहीं है वो कौन होता है माफ़ करने वाला, न्याय देने वाला अधिकारी भी अपराधी का दोष सिद्ध होने पर अपराध और कानून के मुताबिक सजा देता है माफ़ी नहीं , माफ़ी यदि कोई दे सकता है मेरी नजर में तो वो बस और बस पीडित ही हो सकता है | किन्तु वहा ये भी देखा जाना चाहिए की अपराध की प्रकृति क्या है कही ऐसा तो नहीं की किया गया अपराध उस व्यक्ति विशेष के साथ ही पूरे समाज को भी प्रभावित कर रहा है क्योकि फिर ऐसी जगह पर पीड़ित भी माफ़ी देने के लायक नहीं होता है |  इस तरह अपराधी को माफ़ कर दिया जाये तो समाज में दूसरे भी ये सोच कर अपराध करने लगेगे, अपने स्वार्थो के कारण की ठीक है बाद में माफ़ी मांग लेंगे तो सब माफ़ कर देंगे अभी तो अपने स्वार्थो की पूर्ति कर लो,  जिसे जो कहना है जिसके साथ जो करना है कर लो , समाज में इस तरह का सन्देश जाना कभी भी ठीक नहीं है | सजा का कई मायने होते है पहला की अपराधी को उसके किये की सजा मिले , दूसरा पीड़ित को न्याय मिले और तीसरा  समाज में अन्य को भी ये चेतावनी मिले की कोई भी इस तरह की हरकत दुबारा न करे , किन्तु किसी को भी माफ़ी दे कर हम समाज में क्या संदेस दे रहे है खासकर उन लोगो को जो अपराधी प्रवित्ति के है जो बार बार कई तरह के सामाजिक अपराध करते रहते है |  इस तरह के लोगो का समाज के माफ़ कर देने वाले रेवैये से मन बढ़ता है | माफ़ी देने वाले क्या कभी एक बार भी ये सोचते है की वो किस अधिकार से किसी को मांफी दे रहे है, क्या कभी वो देखते है की जिस व्यक्ति को पीड़ा पहुंचाई गई उसका क्या कहना है जुर्म करने वाले के प्रति, उस पर क्या बीती होगी जब उसे भला बुरा या अश्लील बाते कही गई थी , क्या वाकई माफ़ी मांगने वाले का अपराध इतना छोटा और कम है की उसे बिना विचार के ही तुरंत माफ़ कर दिया जाये , शायद नहीं,  वो विद्वानजन और बुद्धिजीवि लोग ये सोचने की जहमत नहीं उठाते होंगे,  उनके हिसाब से जबानी मांफी मांग लेना और उसे माफ़ कर देना ही बड़ी बात है और सभी बड़े होने की होड़ में शामिल हो जाते है | 
                                                                    

                                                                                    ये मुद्दा जितना छोटा आप सोच रहे है उतना है नहीं , क्योकि जो समाज की सोच और रवैया होता है वही सोच उसके कानून में भी झलकता है | सब ने खबर पढ़ी होगी की राष्ट्रपति ने ( तकनीकि रूप शायद इसके पीछे केंद्रीय गृह मंत्रालय है )  एक दो नहीं कुल ३५ फांसी की सजा पाये अपराधियों की सजा को मांफ करके आजीवन कारावास में बदल दिया | ये पढ़ कर घोर निराश हुई कि इन माफ़ी पाने वालो में वो अपराधी भी शामिल है जिसने एक छोटी सी मासूम बच्ची के साथ बलात्कार  कर उसकी हत्या कर दी थी और सामूहिक हत्याकांड को अंजाम देने वाले भी माफ़ी पा गये है यहाँ तक की ५ साल पहले ही अपनी प्राकृतिक मौत पा चूका अपराधी भी माफ़ी पा गया ( ये एक चुक हो सकती है ) | सोचिये उन परिवारों का जो सालो तक हमारी पेचीदा और लम्बे समय तक चलने वाली क़ानूनी लड़ाई को लड़ने के बाद अपने अपराधी को सजा दिला पाये थे अब वो कैसा महसूस कर रहे होंगे ,निश्चित रूप से खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे होंगे | उन्होंने अपराधी को सजा दिलाने के लिए तन मन और धन तीनो तरीके से बहुत कुछ सहा होगा तब कही जा कर उस अपराधी को सजा मिली होंगी किन्तु सरकार ने एक झटके में उन सभी के सारे संघर्ष पर पानी फेर दिया |  सरकारों को इस तरह के निर्णय लेने में जरा भी हिचक नहीं होती होगी क्योकि समाज का रवैया ये है की जब अपराधी अपने अपराध का प्रायश्चित करे उसकी माफ़ी मांगे तो उसे माफ़ कर देना चाहिए ( अब वो सारे लोग जो यहाँ वहा सामाजिक अपराधियों को अपनी तरफ से फटाफट माफ़ कर देते है इस पर सोचे की उन्होंने सही किया या गलत ) क्योकि माफ़ी मांगने वाला बड़ा होता है , महान होता है , उसे प्रायश्चित का सुधरने का मौका मिलना चाहिए आदि आदि आदि के ढेर सारे प्रवचन | सरकारों को पता है की समाज में उसके इन फैसलों से कोई फर्क नहीं पड़ेगा कोई भी इनका विरोध नहीं करेगा, तो वो अपने सोच के हिसाब से जो चाहे निर्णय ले ले | अपनी सोच के हिसाब से इस  लिए कह रही हूँ क्योकि कानून के हिसाब से तो जो सजा उसे मिलनी चाहिए थी वो तो पहले ही उसे देश के सबसे बड़े न्यायाधीस ने दे दिया है ,  निश्चित रूप से सरकार का फैसला कानून की नजर से तो नहीं ही होता होगा ( जहा तक मेरी जानकारी है इसमे भी कोई क़ानूनी पक्ष है तो जानकर बताये  ) | सरकारे अपनी सोच के हिसाब से फैसले लेती होंगी और सरकार में बैठे लोग इस समाज से ही तो जाते है उनका फैसला भी समाज की सोच को ही दिखायेगा | यदि कोई समाज अपराध और अपराधियों के प्रति एक कड़ा रुख अपनाता है तो कभी भी सरकारे समाज की सोच के खिलाफ खासकर इस तरह के मामलों में नहीं जा सकती है | मै तो नीजि रूप से इस बात के भी खिलाफ हूँ की जब देश के सबसे बड़ी अदालत ने किसी व्यक्ति को उसके अपराध की देश के कानून के मुताबिक सजा दे दी है तो उसे कोई और माफ़ी दे , खासकर कानून से इतर जा कर, ( पता नहीं राष्ट्रपति से माफ़ी की अपील का कानून बना  ही क्यों है,  क्या उन्हें लगता है की इतना कानून का जानकर न्यायाधीश भी गलती कर सकता है या  अपराधियों को भी मानवीयता से देखना चाहिए , कम से कम फाँसी की सजा पाया अपराधी तो इस लायक नहीं ही होता है की उसके प्रति कोई मानवीयता दिखाई जाये |)   नतीजा क्या होगा की अब इस आधार पर उन सभी अपराधियों की हिम्मत बढ़ेगी जो इस तरह का अपराध कर चुके है और उनकी भी जो इस तरह के अपराध करने के बाद फायदे में रहेंगे ( अपने देश में संपत्ति, जाति, धर्म और यहाँ तक की इज्जत के नाम पर पूरे परिवार या कहे सामूहिक हत्याओ का इतिहास भी है और भविष्य में कई सम्भावनाये भी और महिलाओ के प्रति किये जा रहे अपराध की तो कोई गिनती है नहीं है  ) उनका तो मन इस तरह के माफियो से और भी बढेगा |  पर समाज और सरकारे इन बातो की परवाह नहीं करती है और न ही उन्हें उन मांफियो के परिणामो और पीडितो के दर्द से मतलब होता है वो अपनी मर्जी और अपने बेमतलब के तर्क से काम करती है |
                                                                               अब सवाल ये है की क्या समाज में सामाजिक,  व्यक्तिगत अपराध करने वालो को माफ़ ही नहीं किया जाये तो जवाब सीधा सा है की ये तो व्यक्ति की माफ़ी मांगने के तरीके से ही पता चला जाता है की उसकी असल मंसा क्या है खाकर सामाजिक अपराध करने वाले | जैसे उदहारण देती हूँ  जब अपराध किसी व्यक्ति के प्रति किया गया है नाम ले कर तब माफ़ी मंगाते समय व्यक्ति का नाम न ले कर केवल समाज से माफ़ी मांगी जाये तो शक होता है कि निश्चित रूप से अपराधी मांफी की जगह केवल समाज में अपना सम्मान पाने की इच्छा रखता है उसको कोई माफ़ी नहीं चाहिए और न ही वो अपने अपराध के प्रति जरा भी शर्मिंदा है और न उसे इस बात की जरा भी फ़िक्र है की उसके किये से उस व्यक्ति को कितनी पीड़ा पहुंची है | अपराधी सीधे समाज में उन लोगो से मांफी मांगता है जो उसे माफ़ कर देंगे, बड़ी आसानी से और उनकी माफ़ी पा कर अपराधी संतुष्ट भी हो जाये उसे जरा भी इस बात कि परवाह न हो कि उसे उन लोगो ने माफ़ किया की नहीं जिसके प्रति उसने अपराध किया है,जिन लोगो को उसने पीड़ा पहुंचाई है | तो ऐसे अपराधी मांफी के लायक नहीं होते है और उन्हें क्षमा कर हर तरह के सामाजिक अपराधो को बढ़ावा ही मिलता है समाज सुधरता नहीं है |
                                             

June 15, 2012

क्या गरीब आदमी को उसके किये अपराध की सजा नहीं मिलनी चाहिए - - - - -mangopeople


                   विषय को समझने के लिए पहले अपने साथ हुए किस्से को बताती हूं | दो दिन पहले एक टैक्सी ( २०- २२ साल पुरानी फियट उन्हें पता होता है कि उनकी गाड़ी का तो कुछ ख़राब होगा नहीं बाकि साथ चलने वालो को अपनी गाड़ी की फिक्र है तो वो अपनी गाड़ी बजाये वो तो जैसे चाहेगा वैसे अपनी गाड़ी कही भी घुसायेगा )  वाले ने मेरी गाड़ी में बगल से टक्कर मारते हुए मेरी गाड़ी का बम्पर तोड़ते हुए आगे निकल गया चुकि सड़क पर भयंकर ट्रैफिक था और गाड़िया बस रेंगे भर रही थी इसलिए वो भाग नहीं सका , मैंने कुछ आगे जा कर ही उसे पकड़ लिया | उस समय यदि वो अपनी गलती मान लेता तो शायद मै उसे जाने देती किन्तु वो गलती मानने के बजाये कहने लग की आप की भी गलती है मैंने उसे जब उसकी गलती बताई तो कहने लग चलिये थाने चलिये | थाने चलने की बात वो ऐसे कर रहा था जैसे की गलती मेरी थी और वो मुझे धमकी दे रहा था | उसे अच्छे से अंदाजा था की एक तो मै महिला हूं उस पर से मेरे साथ गाड़ी में सो रही बच्ची भी थी , ये मेरा एरिया तो होगा नहीं और मै कहा उसे ले कर थाने जाउंगी | पर उसका अंदाजा गलत था वो मेरा ही घर का एरिया था और चार इमारतों के बाद मेरा घर था |  उसके इस अंदाज पर मेरा गुस्सा और बढ़ा गया मैंने तुरंत पतिदेव को घर से बुला लिया वो दो मिनट में वहा हाजिर हो गये और हमने पुलिस स्टेशन जा कर उसके खिलाफ रिपोर्ट लिखवाई ( वैसे उसका ये अंदाजा सही था कि मुझे सच में ही अपने ही क्षेत्र के पुलिस स्टेशन का पता नहीं पता था पति तो उसके साथ चले गये पर मुझे दो लोगों से पुलिस स्टेशन का पता पूछना पड़ा जो बस मेरे घर से कुछ ही दूरी पर था ) | जब मैंने उसकी टैक्सी को रोका तो अच्छा खासा मजमा भी जुट गया था और कई आवाजे यही आ रही थी कि " मारो साले को ये सब ऐसे ही होते है कही भी टैक्सी घुसा देते है , तो एक बूढी सी महिला ने मुझसे कहा की अरे अरे इसे मारो मत बेचारा गरीब है जाने दो मैंने उन्हें कहा की अभी तक तो मैंने इसे कोई गाली भी नहीं दी है मै मार कहा रही हूं ये गरीब है तो ठीक है पर जो मेरी कार को बनवाने में हजारो का खर्च आयेगा उसे कौन देगा ( बिमा तो गाड़ी का होता है और उसे क्लेम करने के लिए और टूटे सामानों का कुछ प्रतिशत हमें ही देना होता है साथ ही क्लेम करते ही अगले साल बिमा पर मिलने वाली छुट भी हाथ से चली जाती है तो बिमा के बाद भी अपना खर्च हजारो में पहुँच ही जाता है )
                   ये मेरा किस्सा है अब जरा कल रेखा जी की लिखी इस पोस्ट को पढ़िये जिसमे वो बता रही है की किस तरह जब डाकिये ने उन्हें टेलीग्राम नहीं दिया पैसा ना देने पर और उन्होंने उसकी शिकायत कर दी जब विभागीय कार्यवाही की बारी आई तो उन्होंने उस पर दया करके उसे पहचानने से इनकार कर दिया ताकि उसकी नौकरी बच जाये किन्तु जब उन्हें दूसरे मोहल्ले में वही डाकिया मिला तो वो सुधरने के बजाये उनसे बदल लेने लग उन्हें कभी उनके पत्र नहीं दिया यहाँ तक की उनके पिता की मृत्यु पर भाई द्वारा भेजा टेलीग्राम तक नहीं दिया जिसकी वजह से वो अपने पिता के अंतिम दर्शन भी नहीं कर पाई |

                                                       हमारी भारतीय संस्कृति में गरीबो के प्रति दया दिखाने और लोगों को माफ़ कर देने को बहुत अच्छा माना जाता है किन्तु अक्सर देखा गया है की गलती के लिए दया दिखाने और माफ़ी देने से ज्यादातर लोग सुधरते नहीं है बल्कि वो उसे बहुत हल्के में लेते है और बार बार उसी गलती को दोहराते रहते है कई बार तो वो उसके लिए बदला भी लेते है जैसा की रेखा जी के केस में हुआ  | जब कभी कोई गरीब हमारा कोई नुकशान कर देता है तो लोग बार बार ये कहते है की अरे बेचारा गरीब है जाने दो वो क्या कर सकता है वो तो तुम्हारे नुकशान की भरपाई भी नहीं कर सकता है तो क्या फायदा जाने दो और हम सभी दया दिखा कर उन्हें छोड़ देते है, नतीजा ये होता है की वो उसे अपने लिए इसे अपने सुधरने के लिए अच्छा मौका मानने की जगह , अच्छी किस्मत की बच गया मान कर सुधरने के बजाये उस  पर ध्यान नहीं देते है और वैसे ही बने रहते है | किसी को भी सजा देने का अर्थ केवल पीडिता को न्याय देना ही नहीं होता है बल्कि गलती करने वाले को सबक भी सीखना होता है ताकि आगे से वो उस गलती को ना दोहराये और सजा भी इस तरह की कि उसे एक सबक मिले, पर वास्तव में होता क्या है शायद ही कोई भी छोटी मोटी टक्कर के लिए टैक्सी  वालो को लेकर थाने जाता हो ज्यादातर तो उसे वही दो चार हाथ मार कर जाने देते है क्योकि उन्हें भी पता है की टैक्सी वाले से उसे शायद ही कुछ मिले उलटे पुलिस के चक्कर में अपना खुद का दिमाग और समय ख़राब होगा |  इस केस में भी उसने मेरे पति को कहा की साहब मारना है तो मार लो अब थाने क्या चलते हो,  तो पति ने कहा  तुम्हे ही शौक था थाने जाने का ना पीछे जो आ रही है वो तुमको किसी भी हाल में छोड़ने वाली नहीं है | हमारे साथ ये तीसरा केस था इसके पहले भी दो बार पति ने वही बेचारा गरीब है क्या देगा जाने दो कह कर छोड़ दिया था | जिसमे एक बार तो एक बाईक वाले ने पीछे से आ कर सिग्नल पर खड़ी हमारी गाड़ी को जोरदार टक्कर दे मारी थी आफिस की जल्दी में पतिदेव ने उस समय बस उसका मोबाईल लिया और उसे बाद में काल करने को कह  चले आये थे मैंने जब मोबाइल देखा तो सर पिट लिया उसकी कीमत तो कोई हमें सौ रु भी ना देता वो क्या कॉल करेगा  खर्चा हमारे सर पर था | किन्तु उस मोबाइल को भी वो अपनी गरीबी का रोना रो कर बाद में मेरे पतिदेव से ले कर चला गया कहा बाइक उसकी नहीं मालिक की है और वो अभी अभी मुंबई आया है | उस समय भी मैंने पति से कहा था की तुम्हे कम से कम उसका मोबाइल नहीं लौटना था उसे एक सबक तो मिलता इस तरह तो वो कभी भी नहीं सुधरेगा  | यही कारण था की इस बार मैंने तय कर लिया था की इस तरह की कोई भी वारदात होती है तो मै उसे पुलिस तक जरुर ले कर जाउंगी और उस पर बाद में कोई कार्यवाही हो या ना हो ,कम से कम उन सब में ये डर तो बैठे की हो सकता है की सामने वाला मुझे बस मार कर ना छोड़े और सच में मेरे खिलाफ रिपोर्ट लिखवा दे और मुझे पुलिस के चक्कर में पड़ना पड़े इसलिए आगे से सावधानी से गाड़ी चलाऊ | ये हमारी अ- व्यवस्था का ही नतीजा है की यहाँ पीड़ित ही पुलिस से ज्यादा डरता है अपराध करने वाले की जगह , अपराधी ताव में कहता है की चलो चलो ले चलो थाने जैसे वो हमें डरा रहा हो कि तुम में ही हिम्मत नहीं है पुलिस तक जाने की,  वो अपराधी पीड़ित को ही पुलिस का डर दिखाता है जैसा मेरे साथ हुआ बार बार टैक्सीवाला ही मुझे घमकी देने के अंदाज में पुलिस स्टेशन चलने को कहा रहा था वो भी तब जबकि गलती उसकी थी |
                                                         
              ज्यादातर  हमें कहा जाता है की छोटी छोटी बातो को ज्यादा महत्व नहीं देना चाहिए या उसे बड़ा नहीं बनना चाहिए उसे भूल जाने में ही ठीक है , किन्तु ये रवैया सही नहीं है , जब हम दूसरो की छोटी छोटी गलतियों को भूलते है तो अक्सर हम बड़ी गलतियों को करने की या उसी गलती को बार बार करने की सामने वाले को प्रेरणा देते है | फिर ये बात तो मेरे समझ के बिल्कुल बाहर है की क्या किसी को उसके गरीब होने के कारण उसके किये गए अपराध के लिए कोई भी छुट दे देनी चाहिए | क्या अमीर या गरीब के किये गए अपराधो में फर्क हो जाता है किसी अमीर को माफ़ी देने की बात उसे छोड़ देने की बात तो कभी नहीं की जाती है ऐसा क्यों है | क्या गरीब होना आप के अपराध के प्रभावों को कम कर देता है बिल्कुल भी नहीं अपराध कोई भी करे उससे प्रभावित होने वाले पर इस बात से कोई भी फर्क नहीं पड़ता है तो फिर सजा में उसे छुट देने या उस पर दया दिखाने का भाव क्यों जगाया जाता है |  कई बार ये भी देखा है की जब कोई चोर या हत्यारा अपनी गरीबी का  दुख भरी कहानी सुना देता है अपनी कोई मजबूरी बता देता है तो लोगों के मन में तुरंत ही उसके प्रति दया भाव जाग जाती है और कहने लगते है की बेचारे ने मजबूरी में ये किया सजा देते समय उसकी मजबूरी को भी ध्यान में रख कर उसे छुट दी जानी चाहिए ( कानून की नजर में भले सब एक हो मै यहाँ आम लोगों के भावना की बात कर रही हूं ) क्या यही भाव हम किसी अमीर के लिए ला सकते है | याद कीजिये सत्यम के मालिक राजू ( यदि मेरी यादास्त सही है तो यही नाम था फ़िलहाल यही उदाहरन याद आ रहा है ) वो भी बोले की मैंने जो किया वो कंपनी और उसे से जुड़े हर व्यक्ति के भले के लिए किया और मेरे किये से शायद ही किसी को कोई नुकशान हुआ हो हा फायदा जरुर मेरे कर्मचारियों का हुआ है तो क्या उसके द्वारा किये गये अपराध पर भी हम वही दया के भाव मन में ला पाएंगे,  नहीं , शायद ही किसी के मन में दया आये हा गुस्सा जरुर बढ़ जाता है और हम और कड़ी सजा की बात करते है | हद तो तब हो जाती है की जब हम अमीर के जायज बातो पर भी अपराधियों सा व्यवहार करने लगाते है है और गरीब के अपराध को अपराध तक मानने से इंकार कर देते है |  मुकेश अम्बानी अपने पैसे से अपना शानदार अपनी हैसियत के हिसाबा से रहने लायक घर बनवाते है तो हजारो लोगो को बुरा लगता है , किन्तु उससे भी ज्यादा कीमती और हजारो गुना बड़ी सरकारी और निजी जमीनों पर लोग अवैध झोपड़े कब्ज़ा कर बना कर रहते है उसके प्रति हम सब दया का भाव अपनाने लगाते है  ऐसा क्यों है की किसी अमीर के किये छोटी सी छोटी गलती पर भी हम कड़ा रुख अपनाने की बात करते है पर गरीब की बात आते ही हम में दया आ जाती है | ना भूलिए की अमीरों को अपराध करने की आदत नहीं होती है वो भी बस उसी अपने फायदे के लालचा में अपराध करते है जिस लालचा में कोई अन्य गरीब करता है जब अपराध करने का कारण एक है तो समाज का रवैया अपराधियों के प्रति अलग अलग क्यों होता है | क्या ऐसा कर के हम कही ना कही अपराध को ही बढ़ावा नहीं दे रहे है क्या हमें छोटे अपराधो और बड़े अपराधो को दो दृष्टि से देखना चाहिए ( लो जी इतनी बार "क्या क्या " लिखने के बाद सतीश पंचम जी की क्यावाद पोस्ट की याद आ गई ) |
                                                                 मै ऐसा नहीं मानती हूँ की हमें अपराध के पीछे जो मजबूरी है उस पर ध्यान ही नहीं देना चाहिए किन्तु एक आम सी गलतियों और अपराधो पर जिसके पीछे कोई मजबूरी नहीं बल्कि लापरवाही या लालच हो उसे तो कतई माफ़ नहीं किया जाना चाहिए चाहे वो कोई गरीबा करे या अमीर | गरीबी कभी भी किसी अपराधी या गलती करने वाले को मिलने वाली सजा में छुट का कारण नहीं हो सकती है | जब तक हम अपराधी के गरीब होने के कारण उसकी गलती को नजर अंदाज करने की आदत और गलत करने वालो को सजा देना की शुरुआत नहीं करेंगे ये समाज और व्यवस्था दुरुस्त नहीं होगी |
                                                कई बार सुना है की क्षमा और माफ़ी देने से इन्सान का कद बढ़ जाता है पर मै कभी भी इस को सही नहीं मानती हूँ नीजि जीवन में भी मै ये मानती हूँ की पहली गलती को माफ़ कर हम हमेसा दूसरी गलती हो बढ़ावा देते है मेरी छोटी बेटी ही क्यों ना हो किन्तु कोई ना कोई साकेंतिक ही सही सजा उसकी गलती पर जरुर देती हूँ जो उसे सबक जैसा लगे | अपनी गलती मान ले तो छोटी सजा या पहले ही मुझे आ कर बता दे तो सख्त लहजे में आगे ऐसा ना करने की चेतावनी ही उसके लिए काफी है | वो अभी भले ही इस बात को ना समझे पर बड़ी होने के साथ ही वो उसे समझाने लगेगी | वैसे मै उसे सजा क्या देती हूँ :) आज पूरे दिन तुम्हारा चैनल नहीं लगेगा बड़ी गलती पर दो चार दिन तक तुम अपना चैनल नहीं देख सकोगी क्या करे उसके लिए तो यही सजा है सो व्यक्ति को सजा वही दी जानी चाहिए जिसे वो सजा माने |


चलते चलते
               कुछ चीजो को लेकर समाज और लोग हमें पहले से इतना डरा देता है की हम डर की बात ना होने के बाद भी डरने लगते है | कुछ साल पहले मेरा मोबाईल घूम गया था , नये सिम कार्ड के लिए हमें पुलिस स्टेशन में जा कर कुछ एन ओ सी जैसा लेना पड़ता है पतिदेव को पुलिस स्टेशन भेजते मुझे डर लगा रहा था क्या करे पुलिस स्टेशन की छवि ही ऐसी बना दी गई थी | किन्तु इस बार ना जाने क्यों एक बार भी मुझे इस बात का डर नहीं लगा की मै महिला हो कर पुलिस स्टेशन जा रही हूँ वहा का माहौल भी फ़िल्मी पुलिस स्टेशनों से अलग एक आफिस की तरह का था जहा एक कमरे में चार आलग अलग काउंटर जैसा था बस सब खाकी यूनिफार्म में थे पहले पुलिस ने मेरी बात ध्यान से सुना फिर कहा बस १० मिनट लगेंगे आप के कागजो से नंबर नोट करना है फिर आ पा जा सकती है दूसरे ने मेरी रिपोर्ट लिखी यहाँ तक की उसे निर्देश दिया गया की हमारे साथ छोटी बच्ची है जल्दी किया जाये और जब मै हड़बड़ी में अपनी कर का नंबर ठीक से बता नहीं पाई ( डर नहीं लगा थोड़ी हडबडाहट थी क्योकि घटना का ठीक से ब्यौरा देना था जो उसकी मराठी और मेरी हिंदी से गड़बड़ हो जा रही थी ) तो उसने आर सी बुक से देख खुद ही नोट कर लिया , सब ने ठीक से अच्छे से बात सुनी और अच्छे से बात की भी |  नहीं नहीं कोई जल्द बाजी ना कीजिये  आप लोग पुलिस स्टेशन के बारे में अपने कोई राय बनाने में क्योकि अभी घटना के बस दो दिन ही हुए है अभी आगे क्या होगा मुझे भी नहीं पता है मै तो वापस नहीं जाने वाली हूँ पर उधर से क्या होगा पता नहीं क्या पता फिर से एक पोस्ट लिखू की ये मैंने क्यों गलती कर दी पुलिस स्टेशन जा कर :( और हा मेरे साथ अच्छा व्यवहार कर रहे पुलिस वालो का रुख जरा टैक्सी वाले के प्रति देखिये "क्यों तेरा बैच  कहा है ' " साहब जेब में है " थोडा तेज आवाज में  " तुझे बैच जेब में रखने के लिए मिलता है क्या,  बाहर निकाल टांगने नहीं आता है क्या " मेरी दया कुछ जागने लगी थी | रिपोर्ट लिखवाने से पहले पति से कहा की जरा उससे पूछो नुकशान की भरपाई कर दे तो क्या रिपोर्ट लिखवाऊ जाने दो और पतिदेव ने क्या कहा वही  " अरे वो इतना गरीब है वो क्या देगा तुम देख लो क्या करना है " |  ऊफ ऊफ ऊफ हम सब ऐसे ही है पर हमें बदलना होगा रिपोर्ट तो मैंने लिखवा ही दी दिल पर बस छोटा सा कंकण रखना पड़ा |

March 05, 2012

टिपण्णी जो पोस्ट ही बन गई - - - - -- mangopeople

                  

    लो जी लिखने बैठी थी तो टिपण्णी लेकिन इतनी लम्बी हो गई की एक पोस्ट ही बन जाये फिर मेरी बनिया बुद्धि ने कहा की इतनी मेहनत से टिपण्णी लिखी है बस एक ही व्यक्ति क्यों पढ़े अपनी पोस्ट बना कर डाल देती हूँ आम के आप गुठलियों के दाम मेरी पोस्ट पर पाठको की आवाजाही भी हो जाएगी थोड़ी टी आर पी भी मिल जाएगी  ।
                   टिपण्णी नारी  ब्लॉग  के  इस  पोस्ट  पर  दी  है  पूरा माजरा जानने के लिए तो उस पोस्ट पर ही जाना होगा क्योकि नारी ब्लॉग के कुछ कापी कर नहीं सकते :)




                
              जीतनी बनिया बुद्धि है उसी हिसाब से आप के सवालो का जवाब देने का प्रयास कर रही हूँ शायद मेरा जवाब आप की उच्च श्रेणी की बुद्धि के समझ में आ जाये ।
        मै भी नहीं मानती की ताजमहल से ले कर पिरामिड तक किसी का भी अस्तित्व नहीं है , क्योकि उन सब को मैंने निजी रूप से नहीं देखा है किसी और ने देखा है तो मुझे क्या जब मैंने नहीं देखा तो मेरे लिए दुनिया में उनका कोई भी अस्तित्व नहीं है कोई और कुछ भी बकता रहे मुझे क्या,  इस हिसाब से आप की बात सही है की आप ने टी वी पर नहीं दिखा तो उस घटना का कोई अस्तित्व नहीं है  :)
                                                             क्या निचली कोर्ट के फैसले किसी घटना को सही ये गलत साबित करने के लिए काफी है तो फिर तो रुचिका से ले कर जेसिका और मट्टू तक के केस में निचली अदालतों ने अपराधियों को बाइज्जत बरी कर दिया था तो क्या माना जाये वो सब निर्दोष थे और बाद में जो उपरी अदालतों ने फैसलों को पलटा वो सब चालबाजिया थी झूठ के बल पर केस जीते गएऔर इस तरह के हजारो केस होते है ।
                                 आप ने दहेज़ के बिना विवाह किया बहुत ही अच्छा काम किया सभी युवाओ को आप से प्रेरणा लेनी चाहिए किन्तु क्या आप के मना करने के बाद भी आप के ससुराल वालो ने आप को जबरजस्ती दहेज़ दे दिया था । निश्चित रूप से उन्होंने आप को उपहार के रूप में सामान लेने की पेशकश की होगी और आप के मना करने पर नहीं दिया होगा या आप ने दृढ़ता से मना कर दिया होगा । क्या आप को लगता है की लडके वाले दहेज़ न मागे और लड़की वाला जबरजस्ती लोगो को दहेज़ देता है ।
                         रही बात पैसे वाला लड़का खोजने की तो हर व्यक्ति अपनी लड़की के वर के  लिए दो चीजे ध्यान में रख कर चलता है एक तो दोनों परिवारों की सामजिक हैसियत एक बराबर हो और ये केवल बनिया परिवारों में ही नहीं होता है बल्कि समाज के हर तबके में यही रिवाज है की सम्बन्ध हमेसा अपने बराबर वालो से ही बनाया जाता है ( विवाह तो बहुत बड़ी चीज है कई जगह तो मित्रता का सम्बन्ध और परिचय तक बराबर वालो या खुद से बड़े सामाजिक हैसियत वालो से ही बनाया जाता है ) ये समाजका एक रूप है आप ख़राब कहे या अच्चा पर समाज में यही प्रचलित है । विवाह के लिए दूसरी बात होती है वर की योग्यता जिसे देखा कर कई बार लोग लडके से जुडी दूसरी बातो को अनदेखा कर देते है ।
                                                            आप की इस बात से कोई भी सहमत नहीं होगा की यदि कोई गरीब  लड़का दहेज़ न ले रहा हो तो किसी को भी अपनी लड़की का विवाह उससे कर देना चाहिए,  क्यों कर देना चाहिए किस आधार पर , बस इसलिए की वो दहेज़ नहीं ले रहा है विवाह का ये आधार नहीं होता है सबसे बड़ा आधार होता है की लड़का मानसिक , शारीरिक और आर्थिक रूप से विवाह से जुडी  जिम्मेदारियों को निभा सके । हर व्यक्ति देखेगा की दहेज़ तो नहीं ले रहा है कितु वह लड़की से विवाह करने के कितने योग्य है तीनो ही रूप में यदि योग्य हुआ तो कोई भी इंकार नहीं करता है जैसे की आप के ससुराल वालो ने अपनी लड़की से आप का विवाह किया । हम सभी तो सब्जी लेने भी जाते है तो सस्ता की जगह अच्छी सब्जी को महत्व देते है भले वो महँगी मिले तो फिर कोई भी अपनी लड़की के विवाह के लिए दहेज़ नहीं लेना कैसे आधार बना सकता है ।
                                                     रही बात पैसे वालो के घर शादी करने की या लड़की वालो के पैसे के बल पर लड़का खोजने की तो ये बात तो केवल पैसे वालो के घर होता है जरा माध्यम वर्ग और गरीब तबके की और देखिये जिसके घरो की लड़कियों के जन्म के साथ ही उसके दहेज़ की चिंता सर पर आ जाती है जन्म के साथ पैसा जुटा रहा पिता ये विवाह के समय देखता है की सालो से जुटाया पैसा भी विवाह के समय लड़को वालो की मांग के आगे कम पड़ रहा है चप्पले घिस जाती है उसकी एक लड़की के विवाह में फिर उनकी सोचिये जिनकी कई लड़किया होती है माध्यम वर्ग तो फिर भी मरते जीते कर लेता है गरीब तबके की हालत तो और बुरी है योग्य से अयोग्य लड़का भी भारी दहेज़ मांगता है उनके हैसियत के हिसाब से । माध्यम और गरीब घरो में तो घरो में महंगे सामान ही लडके के विवाह में मांगने के लिए छोड़ दिया जाता है । कोई भी माध्यम या गरीब वर्ग की लड़की का पिता आप को नहीं मिलेगा जो योग्य वर होने के बाद भी दहेज़ न लेने वाले लड़को को इंकार कर दे ।
                 अब आते है दहेज़ केस को साबित करने की तो कोई भी लड़की वाला ये सोच कर विवाह नहीं करता है की कल को उसकी लड़की को सताया जायेगा और दहेज़ माँगा जायेगा और मै इन पर केस करूँगा तो मुझे अभी से दहेज़ देने के सरे साबुत जुटा लेना चाहिए हा एक लिस्ट होती है सादे कागज पर उसे भी ज्यादा दिन संभाल कर नहीं रखा जाता है और न ही क़ानूनी रूप से उसका ज्यादा महत्व नहीं होता है । रही बात दहेज़ के पैसो को चेक या ड्राफ़ के रूप में देने की तो मै बस इतना ही कहूँगी हा हा हा हा हा हा हा इस बात पर मै बस हंस सकती हूँ :) ।
                  अब निशा के केस पर आते है वो ये केस किस आधार पर हारी मुझे नहीं पता है  मै कानून की जानकर नहीं हूँ किन्तु जब ये केस हुआ था तो तभी जानकारों ने बताया था की ये केस साबित करना बहुत ही मुश्किल होगा क्योकि भारतीय कानून के मुताबिक दहेज़ केस विवाह के बाद ही बन सकता है विवाह के पूर्व नहीं, जबकि निशा ने कहा है की मनीष के साथ  विवाह नहीं हुआ है और कुछ दिन बाद ही उसने दूसरा विवाह कर लिया था,  यदि अब वो कहती है की विवाह हुआ था तो उसकी दूसरी शादी गलत और अपराध साबित हो जायेगा और विवाह नहीं कहने पर मजबूत केस नहीं बनेगा । इसके साथ ही ये भी कहना चाहूंगी की कानून का दुरुपयोग आम लोग नहीं कानून के जानकर, क़ानूनी सलाह देने वाले और केस को अदालत में लड़ने वाले कर्त६ए है आप आदमी नहीं जनता की उसे इंसाफ के लिए किस धरा के तहत केस करना चाहिए वो तो कोई जानकारी ही बताता है हा एक दो केस जरुर हो सकते है जहा जबरजस्ती वकील को अपने बताये केस पर लड़ने को कहा जाता है ।
                          ९०% वाली बात मैंने इसलिए कही क्योकि जब आप कही पर कोई आंकड़े देते है तो आप को उसका स्रोत भी बताना चाहिए वरना "ज्यादातर" या " बहुत सारे " जैसे शब्दों का प्रयोग करना चाहिए । आप किस आधार पर कह रहे है की ९०% केस झूठे होते है ।
                                                              लड़कियों को विवाह ही नहीं करनी चाहिए ये क्या बात हुए ज्यादातर  नेता चोर है इसलिए वोट देने मत जाओ , ज्यादातर पुलिस वाले भ्रष्ट है तो कोई शिकायत पुलिस वाले के पास मत ले जाओ आदि आदि क्या समाज में इस तरह से रहा जाता है ऐसा नहीं होता है । लड़कियों के विवाह नहीं करना इस समस्या का समाधान नहीं है और ना ही उनके कमाने से ये समस्या जाएगी क्योकि दहेज़ कमाने वाली लड़कियों से भी माँगा जाता है ये बात आप टिपण्णी में दूसरो ने भी कही है ।
   " अमीर लडके से शादी करके लड़की मौज कर सके "
                निहायत ही घटिया और बकवास बात लिखी है आप ने ये "मौज" करना क्या होता है । लड़की वाले मोटी रकम दे कर अमीर लडके से अपनी लड़की की शादी करते है ये आप को ख़राब लगता है किन्तु अमीर हो कर भी  पैसा ले कर किसी से भी  शादी कर लेने वाला लड़का आप को अच्छा लगता है मुझे तो लगता है की ऐसे केस में यदि कोई घटिया है तो लड़का ही ज्यादा घटिया है , क्योकि लड़की का पिता तो जो कर रहा है वो अपनी बेटी के अच्छे और आर्थिक रूप से अच्छे भविष्य के लिए ऐसा कर रहा है ।
                                  और मैंने अपने बनिया और बनिया बिरादरी की बात इसलिए की क्योकि मै केवल अपने आस पास, अपने आँखों देखी  और करीब हुए घटनाओ के बारे में ही बताना चाह रही थी ना की समाज में बस प्रचलित किसी बात का दोहराने का प्रयास कर रही थी ताकि लोगो को लगे की मै सच बात कर रही हूँ ना की बस यु ही कोई आंकड़े फेक रही हूँ । हा पर जिस तरह आप ने उस पर अपने पैजामे से निकल कर  टिपण्णी की है उसके आप की सोच समझ और बुद्धि किस बिरादरी की है ये जरुर पता चला गया । आप की बिरादरी तो मुझे नहीं पता क्योकि बनिया कभी किसी की बिरादरी नहीं देखता है उसे तो बस अपना लाभ देखना है सामने कोई भी बिरादरी का जाति का व्यक्ति हो हा  आप की उच्च कोटी की बुद्धि से ही मुझे पता चला की अपना लाभ देखना तो केवल हम बनियों को ही आती है बाकि दुनिया तो संत होता है । :))))
                 

चलते चलते  
                        जब मुझे और मेरी बनिया बुद्धि और सोच का वाह वाही की गई तो सोचा जवाब में मै भी सामने वाले की बिरादरी की वाह वाही जरा अपने ढंग से कर दूँ  क्या है की दूसरो की जाति बिरादरी और आर्थिक स्थिति पर उंगली उठा कर कुछ कहने और सामने वाले को निचा दिखने में जितना आन्नद "मजा"  "मौज" आता है उसकी तो बात ही कुछ और होती है दिमाग में दो चार उनके नाम से झलक रहे जाति से दो चार वाह वाही सोच भी ली पर फिर मेरी बनिया सोच ने मुझसे कहा की उन्होंने मेरी बिरादरी के बारे में कुछ कहा फिर मै उनके बारे में कहूँगी फिर वो पलट के मेरे बारे में कहेंगे और मै उनके फिर ये सिलसिला लम्बा हो जायेगा और जब उसे जोड़ा घटाया तो पता चला की सौदा फायदे का नहीं घाटे का है समय अपने पास है नहीं बिटिया रानी ने महीनो पहले ही अपनी छुट्टियों के लिए मुझे बुक कर लिया था इसमे फंस गई तो उधर से नुकशान हो जायेगा तो ये सौदेबाजी यही छोड़ दी । क्योकि जिस काम में बनिए का फायदा ना हो वो नहीं करता है बाकि लोगो की तरह थोड़े ही की किसी को कुछ कहने के लिए,  अपने बुरे अनुभवों की खुन्नस निकालने के लिए , अपने संबंधियों को ब्लॉग पर सारे आप बेइज्जती करने के लिए अपना कीमती समय और दिमाग लगाये । कहते है की जहा फायदा ना हो वह तो गली देना क्या  थूकना भी नहीं चाहिए  :)))))
 

January 13, 2012

ये विज्ञापन जरुर देखिये ,यदि आप के भी राज्य में कोई चुनाव हो रहे है - - - - - mangopeople
















                                                              यदि आप के भी राज्य में कोई चुनाव हो रहे है तो ये विज्ञापन जरुर देखिये और जानिए अपने क्षेत्र से लड़ रहे चुनावी उम्मीदवारों  के बारे में और सोच समझ कर वोट करे | विज्ञापन जरुर देखे और सुविधा का प्रयोग  करे |

 

January 04, 2012

इसे पढ़ने के बाद पता चलेगा की राष्ट्रीय प्रतिको के बारे में आप की जानकारी कितनी कम है - - - -mangopeople

लिस्ट के ऊपर क्लिक कर बड़ा कर ले फिर पढ़े  |
अब तो आप समझ गए होंगे की आप की जानकारी राष्ट्रीय  प्रतिको के प्रति कितनी कम है !
दिल पे ना ले महज हास्य और व्यग्य के लिए है ;) 
फेस बुक से प्राप्त ----

December 02, 2011

सरकारी ऑनर किलिंग - - - - - - mangopeople


                                                                           

                                                         सरकार के लिए किराने में विदेशी निवेश अब साख का सवाल है कहती है की अब कदम वापस नहीं ले सकते है हमारी इज्जत का सवाल है भले लोग कितना भी विरोध करे संसद ठप रहती है तो रहे उसे क्या | सरकार का व्यवहार बिलकुल परिवार में उस बाप की तरह है जो बेटी यानि की आम जनता को अपने इज्जत के नाम पर मारने पर तुली है | सरकार को जनता रूपी बेटी का पिता होना चाहिए  किन्तु वो बाप सा व्यवहार कर रही है | बाप और पिता शब्दों का अंतर तो समझते होंगे ही ना , पिता शब्द आते ही दिमाग में परिवार चलाने वाला परिवार की ख़ुशी का ध्यान रखने वाला उसकी जरूरतों के लिए कुछ भी कर गुजरने वाले का ध्यान आता है और बाप शब्द आते है दिमाग में अपनी बपौती ज़माने वाला हर समय अपनी ही चलाने वाला , सिर्फ परिवार पर बाप होने की धौस ज़माने वाले की छवि बनती है जो अधिकार तो सब रखता है और परिवार के प्रति अपना कोई कर्तव्य नहीं समझता है | बस सरकार भी जनता के पिता के बजाये उसकी बाप बन गई है जिसके लिए परिवार उसके हित से बड़ा उसकी इज्जत हो गई है और जनता यहाँ बेटी की तरह अपने खुशियों जरूरतों के लिए उसका मुंह ताक रही है | अब जब बाप जी ने कह दिया है की ये उसकी साख का सवाल है तो बेटी के हित की कुर्बानी तो होगी ही | इसे क्या कहेंगे खालिस सरकारी ऑनर किलिंग बाप के इज्जत के नाम पर बेटी के हत्या |
                               पर यहाँ भी सारी इज्जत बस बेटी का मामला होने पर ही ख़राब होता है जब मामला बेटो यानि सरकारी कर्मचारी या बड़े उद्योगपतियों का हो तो ये बाप को अपने कदम वापस खीचने में कोई गुरेज नहीं होता है , प्रधानमंत्री ने अन्ना को लिखित में आश्वाशन दिया था की उनके मुख्य तीन मांगे मान ली गई है यहाँ तक की संसद में भी सभी सांसदों ने हामी भर दी थी, हद तो तब हो गई जब स्थाई समिति ने भी इन मांगो को मान लिया था लेकिन दुसरे ही दिन पुत्र प्रेम जाग गया और फिर कदम वापस ले लिए गए क्योकि उसके कदमो से बेटो को परेशानी जो होती, फिर इन बाप लोगो को इज्जत का ख्याल नहीं आया की जो जबान दी है तो उसे कैसे वापस ले , पर कहते है न  बेटो के लिए सब कुछ, उनके तो सात खून भी माफ़ पर जब बात बेटी की हो तो एक कदम भी पीछे नहीं होगा | सोचती हूँ की इस विषय में अब उन लोगो का क्या मत होगा जो कुछ दिन पहले तक देश में संसद को ही सर्वोच्च मान रहे थे उनके अनुसार परिवार में माँ बाप ही सब कुछ है बच्चो की कोई कीमत नहीं है बच्चे होते ही इसलिए है की वो माँ बाप बना सके इसलिए घर में चलेगी तो माँ बाप यानि सत्ता पक्ष और विपक्ष को मिला कर संसद की | तो अब बताइए की जब ये हमारे माँ बाप ही अपनी बातो से पलट जाये बच्चो को सरेआम आश्वासन  दे कर बदल जाये तो उनका क्या करे क्या अब भी संसद को ही सर्वोच्च मानाने की दलील को वो सही बताएँगे | आम लोग,  देश हित  उसकी जान की कीमत तथाकथित बाप की इज्जत के सामने कुछ भी नहीं है | तो भाई इस देश की परम्परा रही है की बेटियों ने हमेशा अपने हित को बाप के इज्जत के नाम पर मार दिया है तो आम लोग भी तैयार रहे बलिदान के लिए |
                   तर्क तो कई दिए जा रहे है कहते है की दलाल दलाली खा खा कर,  सामान कई हाथो में जा जा कर महंगाई बढ़ा रहा है और सरकार को बदनाम कर रहा है | किसान से ६ रु का प्याज खरीदते है उसमे ट्रांसपोर्ट , दलाली,  व्यापारी ,मजदूरी, थोक, फुटकर सब मिला कर उपभोक्ता के पास २० रु में पहुंचता है , विदेशी आयेंगे तो ऐसा नहीं होगा वो सीधे किसानो से खरीद कर आप को देंगे बीच का सब खर्चा ख़त्म उस पर से कोल्ड स्टोरेज बनायेंगे सामान ख़राब नहीं होगा | सोचती हूँ क्या इन विदेशियों के पास कोनो जादू की छड़ी है क्या जो फसल खेत से उड़ा कर सीधे हमारे घर पहुंचा देगा और ट्रांसपोर्ट का खर्च बच जायेगा, कोल्ड स्टोरेज का खर्चा , बड़े बड़े मॉल खोलेगा जगह का खर्चा उसमे लगे ए सी का खर्चा कर्मचारी का खर्चा , सब राज्यों में लगा टैक्स और टीवी से लेकर अखबार तक में अपने बड़े बड़े विज्ञापन का खर्चा खुद उठाएगा , और अपना मुनाफा छोड़  हमको सस्ता सामान देगा | किसानो को भी फायदा होगा कंपनी साहब के लोग आयेंगे हरपत्तू, खरपत्तो , भोला,  माधव सभी के झोपड़ो में खुद जायेंगे और सबकी कुछ कुछ बीघे में उगी फसल खरीदेंगे कोई दलाल बीच में न होगा | क्या वाकई ऐसा होगा ,  काहे की कई बार पतिदेव से सुन चुकी हूँ की आफिस की स्टेशनरी से लेकर कोई भी सामान की खरीद में इ काम में लगा आफिसर हमेशा पहले अपना कमीशन तय करता है फिर सामान खरीदता है कंपनी के लिए , हा दलाली बंद हो जाएगी कमीशन शुरू होगा बिलकुल अंग्रेजी काम | सच्चो में इ में तो किसान और हम उपभोक्ता का बड़ा फायदा है ,  लगता है कोनो चैरिटेबल संस्था है इ वालमार्ट और का का , शायद सरकार महंगाई खुद से कम नहीं कर पा रही है तो इ संस्था को बुला रही है की लो भैया अब तुम ही यहाँ की महंगाई दूर करो हमरे बस की बात तो ना है ये |
                                                                 दसक पहले भी जब भारत के बड़े उद्योगिक घरानों को किराना कारोबार में लाया गया तब भी यही दलील दी गई थी की उपभोक्ता और किसान दोनों को फायदा होगा उपभोक्ता को कितना फायदा है सब जानते है जब इन शानदार मॉल में सामानों पर १० से ५० पैसे की भारी छुट दी जाती है और एक समय में एक के बजाये जबरजस्ती दो सामान बेच दिया जाता है एक लो दूसरे पर छुट पाओ सामान घर लाने पर पता चलता है की १०० की जगह २०० का दो सामान लाये और कुछ छुट मिली ५ रुपये का इतनी छुट तो थोक बाजार में हमेशा ही मिल जाती है कई सामानों पर और आज भी कोई भी कंपनी सीधे किसानो से शायद ही कुछ खरीदती हो | सस्ता सामान कैसे दे वो उनके भी तो हजार खर्चे है वो अपने जेब से थोड़े ही भरेंगे वो भी खरीदारों के ही जेब से जायेगा | पर यहाँ तो अब भी उपभोक्ता को सब्ज बाग दिखाया जा रहा है सस्ता सामान का महंगाई कम होने का | मंत्री जी कहते है की जब देशी लोगो को छुट दिया गया था तब भी हो हल्ला मचा था बाद में सब ठीक हो गया कोनो फर्क पड़ा किराना दुकान चलाने वालो को | मंत्री जी सही ही कह रहे है मंत्री जो है इन मॉल में जाने वाले तो शायद आसमान से टपके है उसके पहले तो वो किसी किराना दुकान पर जाते ही नहीं थे इसलिए छोटे दुकानदारो के ग्राहकी पर तो कोनो फर्क पड़ा ही नहीं आगे भी नहीं पड़ेगा बेकार में लोग हो हल्ला मचा रहे है | जैसे की कोनो शराबी ख़राब लड़का से बिया करने पर बिटिया पहले खूब चिल्लाती है बाद में "भयल बिया मोर करबो का"  की तर्ज पर मार खा कर रो कर गा कर निभाती ही है,  बाप के इज्जत का सवाल है तो एक बार आने दीजिये विदेशी दुकानदारो को उसके बाद किसान जनता सब झेलबे करेगी जाएगी कहा कोनो और ठोर ठिकाना तो है नहीं उनका,  दोनों जगह पराई ही होती है | तो हम आम लोग जब अपने ही देश की सरकार के लिए पराये हो गए है तो इ विदेशी हमको क्या अपना समझेंगे दोनों मिल कर खून चूसेंगे |
                                                  

November 24, 2011

नशा शराब में होता तो नाचती बोतल - - - - - - mangopeople

                                                                नशा शराब में होता तो नाचती बोतल क्या खूब लिखा है लिखने वाले ने पता नहीं लिखने वाला शराब और नशा  से कितना परिचित था पर जिसने भी लिखा है शराब पीने वालो को उसकी वकालत करने के लिए एक अच्छी लाइन दे  दी थी | शराबियो ( भाई शराब पीने वालो को शराबी ही कहेंगे न कितनी मात्रा में पीता है इस बात से क्या फर्क पड़ता है यदि आप के पास कोई और शब्द हो तो बताइए ) और उनसे सहानुभूति रखने वालो में हड़कंप मचा है सब अन्ना के शराबियो को पीट कर शराब छुड़ाने वाले बयान डरे है और उन्हें खुद के पीटे जाने का डर सता रहा है | सभी लगे है अपने अपने स्तर पर इस बात का विरोध करने में , कल को देश के युवराज के इस बयान पर की ,  मायावती सरकार किसानो की जमीने सस्ते में खरीद कर बिल्डरों को दे देती है और किसानो को दिए पैसे को वापस हड़पने के लिए उन किसानो के गांव में शराब का ठेका खोल देती है , पर जोरदार ताली बजाने वाले आज दुखी है परेशान है की हमारे युवराज के उठाये मुद्दों को कोई और हड़प रहा है और गरीबो के बीच से शराब हटाने की बात कहा रहा है न केवल कह रहा है बल्कि शराबियो के पीट पीट कर सुधार देने का दावा भी कर रहा है | लो जी हमारे मुद्दे कोई कैसे हड़प सकता है ये काम तो बस हमारा है हमने जनलोकपाल बिल का मुद्दा लोकपाल को एक अलग संवैधानिक  दर्जा देने की बात कर हड़पने और गड़पने का प्रयास किया असफल हो गया कोई बात नहीं पर ये हडपने का काम बस हमारा है हमें ही शोभा देता है |
                                       शराब और नशा  प्रेमी दुखी है अब क्या अन्ना हमारी पिटाई करके हमसे शराब छुड़वा देंगे क्या कही ऐसा न हो की अन्ना के भ्रष्टाचार के मुद्दे पर परिवार को होश और जोश में ला दिया था कही वो भी शराब का विरोध न करने लगे और शुरुआत घर से विरोध करने का न करने लगे | बड़ी मुश्किल से बीबी बच्चो को समझा कर रखा है की एक पैग शराब तो डाक्टर भी लेने को कहता है ( कम्बखत आज तक ऐसा कहने वाला डाक्टर मुझे मिला नहीं आप के पास उसका पता हो तो बताइयेगा )  शराब  तो  हम  बेचारे   ??? कभी खुशी, कभी गम, कभी थकान उतारने, कभी बोरियत मिटाने और कभी कुछ भी खास न होने की वजह से इस का सहारा लेते हैं." ( चुराई गई लाइन है काहे की हमें शराब पीने के कारणों का नहीं पता था :)) )  इसमे कोई बुराई नहीं है | बुराई तो तब है जब पत्निया, बेटिया और बहुए इन कारणों को बता कर एक पैग मारने की जिद करने लगे | शराब पीने का अच्छा और महान काम बस पुरुषो के लिए ही अच्छा है जब ये काम नारी करे तो वो बुराई और गलत बन जाता है | पीना तो छोडिये कोई महिला सेलेब्रेटी शराब बनाने वाली कंपनी के किसी भी उत्पाद का विज्ञापन भी करे तो वो गलत है पर हम अपने पीने पिलाने का हर जगह प्रचार प्रसार करते रहे तो वो सही है | वैसे महिलाओ का पीना भी सभी के लिए गलत नहीं है बस वो पुरुषो के कहने पर उनकी इच्छा पर उनकी इजाजत पर हो , वो खुद किसी की मर्जी इच्छा इजाजत की जरुरत समझते हो या नहीं किन्तु महिलाओ को इसकी जरुरत पड़ेगी | कभी समाज, सामाजिक स्तर, सामाजिक मेल मिलाप के नाम पर तो कभी बस कोई और नहीं मिला तो पति का साथ देने के नाम पर ही पत्निया शुरुआत कर सकती है या उन्हें इजाजत मिलती है या कभी कभी उन्हें मजबूर किया जाता है | किन्तु यही दृश्य उलटा हो पति न पिये और पत्नी की इच्छा हो तो वो नहीं कर सकती क्योकि शराब एक गन्दी चीज है ये स्वास्थ के लिए अच्छी नहीं है क्योकि महिलाए कोमल नाजुक होती है उन्हें माँ बनना है ( एक रिसर्च के अनुसार अल्कोहल पुरुषो के पिता बनने के सामर्थ को बहुत नुकशान पहुंचा रहा है , अब इसका लिंक न मगियेगा मेरे पास नहीं है खोजना है खुद खोज लीजिये  मानना है मानिये नहीं तो मत मानिये ) ब्ला ब्ला ब्ला | बहुत पहले टीवी पर एक रिपोर्ट देखी थी गांव के एक मजदूर पति पत्नी से बात की जा रही थी , पति से पूछा गया की भाई तुम शराब क्यों पीते हो मजदूरी करते हो सारे पैसे शराब में क्यों उड़ा देते हो तो उसका जवाब था की दिनभर मजदूरी करने के बाद शरीर इतना दुखता है की उसे भुलाने के लिए पीना पड़ता है , बगल में लगभग ५० साल की उसकी पत्नी ने तपाक से कहा की मजदूरी तो मै भी करती हूँ रोज तुम्हारे साथ , घर का काम और इतने साल बच्चो की भी देखभाल की है मैंने तो अपनी थकान मिटाने के लिए कभी शराब नहीं पी रिपोर्टर ने कहा जवाब दीजिये पति मुस्करा का रह गया | वैसे किसी के पास इसका जवाब हो और जवाब देने की हिम्मत हो ईमानदारी से तो हमें जरुर बताइयेगा जानने की इच्छा है :) |
                                                             सब कहेंगे की भाई ये तो गलत है गरीब को शराब का नशा नहीं करना चाहिए उसके पास पैसा नहीं है उसे अपने पैसे शराब में नहीं उड़ाना चाहिए | मतलब शराब में तो अब भी कोई खराबी नहीं है असल बुराई तो पैसा न होना है  जो पैसा हो तो जीतनी चाहो उतनी पीओ और पीने के बाद पत्नियों, माँ , बच्चे भाई बहन पडोसी , मित्र सभी को पीटो झगडा करो गरीब हो तो नाली में गिरो अमीर हो तो गाड़ी रास्ते में चल रहे,  फुटपाथ पर सोये लोगो पर चढ़ा दो  सब करो तुमको पूरी छुट है किन्तु शराबी को पीटने की बात मत करो ये तानाशाही है,  तुगलकी फरमान है,  तालिबानी ????( कल ही एक धर्म के भाई साहब इस शब्द पर आपत्ति कर रहे थे कहते है की हमारे धर्म में तो शराब हराम है कोई नहीं पीता है तो इस मामले में ये शब्द नकारात्मक रूप से क्यों प्रयोग किया जा रहा है बात तो सही लगाती है जी  ) सोच है हम सभी को इसका विरोध करना चाहिए |
                           शराब का नशा एक और जगह गलत हो जाता है वो तब जब ये हमारे बच्चे करे युवा करे तब ये गलत है गलत संस्कार है | युवाओ के ये नहीं करना चाहिए आज के युवाओ को शराब का लत पड़ गई है वो शराबी हो गए है वो बिगड़ गए है, युवा भटक गए है उन पर पश्चिमी संस्कृति का असर हो गया है उनमे बड़ो का लिहाज नहीं रहा है वो माँ बाप के पैसे उड़ा रहे है लेक्चर लेक्चर लेक्चर लेक्चर !!!! एक बात आज तक समझ नहीं आई जब थोड़ी मात्रा में शराब बुरी नहीं है , ये जोश को और बढ़ा देती है ये आन्नद देती है ये बुराई नहीं है तो पीने वाले परिवार के साथ मिल बैठ कर क्यों नहीं पीते कोई भी आन्नद सिर्फ खुद लेना और परिवार को उससे दूर रखना ये तो गलत बात है,  ठीक है भाई शारीरक रूप से आप सभी अलग है तो आप पटियाला पीजिये बीबी बच्चो को एक छोटा पैग बना कर दीजिये क्या बुराई है जितने ये आप के स्वस्थ पर असर करेगी उतना ही आप के बीबी बच्चो पर | कहते है जिस काम को पूरा परिवार मिल बैठ कर करे उसमे आन्नद दुगना हो जाता है पता नहीं क्यों लोग इस आन्नद को बढ़ाने से परहेज करते है कुछ लोग ये करते है और जीवन को भरपूर जीते है पर कुछ मिडिल क्लास भारतीय कभी भी अपनी वो मानसिकता नहीं छोड़ते है पता नहीं क्यों और पत्नी बच्चो को मना करते है | हम सभी समझदार है किसी को भी हमें ये बताने की जरुरत नहीं है कि एक स्वतंत्र देश में हमें शराब पीनी चाहिए की नहीं, ये हमारी मर्जी है हमें जो ठीक लगेगा हम करेंगे | हा ये अलग बात है की ये स्वतत्र  देश , समझदारी आदि आदि बाते बस पुरुषो , पढेलिखे , पैसे वाले , उम्र में बड़े लोगो पर ही लागु होती है महिलाए , युवा और गरीब इन सब में नहीं आते है न वो स्वतंत्र है न समझदार और ना ही अपनी मर्जी से कुछ भी करने का हक़ रखते है  |
                        कभी कभी लगता है  सरकार महँगी अंग्रेजी बेचे तो समझ आता है भाई पैसे वाले ही उसे लेते है लेकिन सरकार सस्ती देशी क्यों बेचती है उसे कौन खरीदेगा,  गरीब न और गरीब कहा से लायेगा पैसा , वही घर चलाने के पैसे से शराब पियेगा और बीबी बच्चे भूखे मरेंगे | पर सरकार ये काम भी गरीबो  के हित में ही करती है यदि सरकार गरीबो का ध्यान न रखे और उन्हें अच्छी सस्ती देशी शराब न मुहैया कराये तो बेचारे ?? नकली शराब जहरीले शराब अवैध शराब पी पी के मर जायेंगे और सरकार उन्हें मारती नहीं है उन्हें तो सस्ती अच्छी देशी शराब दे कर बचाती है |  सरकार नकली जहरीली शराब को बनाने और बिकने से नहीं रोक सकती है थोडा मुश्किल काम है और सरकारे इस तरह के मुश्किल काम नहीं करती है और फिर उनसे सरकार के राजस्व का भी घाटा होता है बस स्थानीय पुलिस अबकारी अधिकारी और नेता को ही हफ्ता या फायदा मिलता है उस पर से गैरकानूनी जबकि सरकारी ठेका वही काम और फायदा क़ानूनी तौर पर कराती है ,  बोलिए है ना बिलकुल सालिड सही तर्क |
                                                                    इस मामले में बेचारे शराबी से ज्यादा तो नेता , टीवी चैनल  और पत्रकार दुखी है | बेचारे मनीष तिवारी :) ( अब बेचारा न कहे तो क्या कहे सार्वजनिक के साथ ही लिखित में आन्ना से माफ़ी मागनी पड़ी थी पार्टी के कारण ) शराब प्रेमियों के गम से गमजदा हो कर कह रहे है की भाई शराबियो को पीटने की बात होगी  तो आधे केरल, तीन-चौथाई आंध्र प्रदेश और अस्सी फ़ीसदी पंजाब को कोड़े (???? अन्ना का डंडा नेताओ के कान तक पहुंचते पहुंचते कोड़ा बन गया )  लगाने होंगे... | बताइए ये सब तो नेताओ के वोटर है हर पञ्च साल बाद इनमे से लगभग आधे शराब की एक बोतले के बदले में हमें पूरा देश सौप देते है,  यदि इनसे यही छुट गई और ये होश में आगये तो हमारा क्या होगा , हमारी शराब खोरी के लिए पैसा कहा से आयेगा शराब से सरकारी खजाने में आ रहे पैसे का क्या होगा | पत्रकार और चैनल वाले तो ऊपर से दुखी दिख रहे है भाई ये तो गलत है आप शराब पर कैसे पाबन्दी लगा सकते है हम में से ज्यादातर को मुफ्त की शराब पीने कि आदत है लोगो ने देना बंद कर दिया गलत मान कर तो हमारा क्या होगा | अन्ना ने तीस साल पहले  अपने गांव का किस्सा बताया है इसका अभी से विरोध करो क्या पता यहाँ जनलोकपाल बिल पास और  वहा फिर अन्ना की हर सामजिक बदलाव को लागु करवाने की हवा चल गई तो , तो फिर हम क्या करेंगे और वो सब छोडो सबसे बड़ी बात ये है की हमारे चैनल को  सरकार ने इतने करोड़ का विज्ञापन दिया है यदि अन्ना टीम का विरोध करती खबर बहस लगातार नहीं दिखाया तो कही वो सारे महंगे विज्ञापन हमसे छीन ना जाये भाई कुछ चैनलों के कर्ता धर्ता के दूसरे कई बिजनेस है उन पर असर ना डाले सरकार या कुछ के ऊपर सी बी आई जाँच चल रही है जो सरकार की चमचागिरी करने से बंद डब्बे में पड़ी है कही वो ना खुल जाये सरकारों का क्या भरोसा वो कुछ भी कर सकती है | टी आर पी के लालच में खूब अन्ना टीम को फुटेज दी है अब मौका है की जरा हिसाब बराबर किया जाये और टी आर पी तो इसमे भी अच्छी मिल रही है |  फिर ये जरुरी तो नहीं आदमी पर हमेशा पत्रिकारिता की हावी रहे आखित पत्रकार भी तो इन्सान ही है न कभी कभी पत्रिकारिता पर निजी विचार भी तो हावी हो सकते है और बेचारा कब तक सीधे खड़ा रहे कभी कभी तो एक तरफ झुक कर टेक तो लगाना ही पड़ता है |
                             
                      कही पर ये टिपण्णी की थी यहाँ भी दे रही हूँ |
                       इस महान ??? काम शुरुआत एन डी टीवी ने किया और अब इसमे सभी विद्वान् लोग शामिल हो गए है जान कर अच्छा लगा :) चैनल खुद ही लिए अन्ना के साक्षत्कार को तोड़ मरोड़ कर टीवी पर बहस का मुद्दा बना दिया | अन्ना ये बात देश भर के शराबियो के लिए नहीं कह रह थे वो साक्षात्कार में तीस साल पहले अपने गांव में किये गए सुधारो की बात कर रहे थे और उसी क्रम में बता रहे थे की उन्होंने शराब को अपने गांव से कैसे दूर किया | जिसमे कहा गया की गांव से शराब हटाने के बाद भी जब कोई बाहर से पी कर आता था तो पहले उसे तीन बार समझाया जाता था फिर मंदिर में ले जा कर भगवन की कसम खिलाई जाती थी और उसके बाद भी वो न माने तो मंदिर के सममाने वाले खम्बे से बांध कर पिटा जाता था बिलकुल उसी तरह जैसे एक माँ अपने बच्चे की गलती पर उसे मारती है सुधारने के लिए | ( एन डी टीवी के उस बहस में शाहनवाज हुसैन ने भी इस तरफ ध्यान दिलाया था की अन्ना अपने गांव की बात कर रहे है पूरे देश की नहीं ) और ये सब तब किया जाता था जब शराबी के घरवाले आ कर शिकायत करते थे | ये बात उन्होंने पहली बार नहीं कही है इसके पहले वो ये बात कई बार अपने कई साक्षात्कारो में कह चुके है | अब आप बातो को तोड़ मरोड़ कर सभी से ये कहे की आन्ना ने ये बात सभी शराबियो के लिए कही है तो निश्चित रूप से सभी इसका विरोध ही करेंगे | भूषण , किरण , अरिविंद के बाद उन्ही का नंबर था बदनाम करने के लिए कुछ नहीं मिला तो बातो को तोड़ मरोड़ कर पेश कर दिया | उन्होंने शराब का विरोध किया था और क्यों इसके पहले वो कई बार कह चुके है |

१ क्योकि गरीब अपने पैसे शराब में उड़ा देते थे

२ शराब के साथ ही कई और सामाजिक बुराइया गांव में आ गई थी जिन्हें दूर करने के लिए सबसे पहले शराब को दूर करना जरुरी था |

३ शराब बनाने वालो को भी उनका काम छोड़ने के बाद उन्हें नए काम करने के लिए सहायता भी की |

४ शराब से सबसे ज्यादा महिलाए परेशान थी और उन्होंने महाराष्ट्र में ये कानून बनवाया की यदि किसी गांव की अधिकांश महिलाए ये मांग करे की उनके गांव में शराब का ठेका न हो तो वहा से सरकारी शराब के ठेके को हटाना होगा |

                                           उन्होंने ये बात बस अपने गांव में किये काम के लिहाज से कही थी पूरे देश के सम्बन्ध में नहीं और किसी गांव में किये जा रहे सुधारो के लिए किये गए काम और देश के लिए कहे जा रही बात के फर्क को आप तो समझाते होंगे बस ऐसे ही तिल का ताड़ बन जाता है | मिडिया से तो कोई उम्मीद नहीं बची थी अब तो ब्लॉग जगत से भी कोई उम्मीद नहीं दिखती है लोग बिना पूरी बात जाने फटाफट अपनी प्रतिक्रिया देने लगते है | 
              बिलकुल सही कहा मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए बात केवल उनके मुद्दे तक ही रखना चाहिए, क्यों बार बार मुद्दों से अलग चीजो की बात की जाती है | क्या अन्ना ने कभी कहा है की वो शराब छोड़वाने के लिए पूरे देश के शराबियो के पिट पिट कर उनकी शराब छोड़वाने का काम करने वाले है यदि उन्होंने ऐसा कहा होता तो आप जरुर उन पर चर्चा करते किन्तु यहाँ उन्होंने ऐसा कुछ कहा भी नहीं है तो इस बात पर चर्चा क्यों वो भी बात को तोड़ मरोड़ कर किया जा रहा है | वो अपने गांव का तीस साल पुराना किस्सा बता रहे है वो भी सवाल पूछे जाने पर और उसे गलत तरीके से रख कर मुद्दों को बदलने का प्रयास किया जा रहा है क्यों | एक गांव में दो या चार लोगो को पीटने की घटना की तुलना आप पूरे देश में सत्ता के नशे में चूर हो कर किये गए कामो से कैसे कर सकते है | आप ने यदि वो साक्षात्कार ठीक से देखा हो तो अन्ना ने ये भी कहा है की हिंसा का सहारा नहीं लेना चाहिए ये गलत था सामजिक और क़ानूनी रूप दोनों से ही किन्तु ये करना पड़ा बिलकुल वैसे ही जैसे एक माँ अपने बच्चो को सुधारने के लिए करती है वो खुद अपने पहले के किये काम को गलत बता रहे है क्या संजय में इतनी हिम्मत थी , आज संजय जिन्दा होते तो जो कांग्रेसी उसे गलत बताते है उनमे भी उसे गलत कहने ही हिम्मत नहीं होती | कई नवो की सवारी अन्ना नहीं कर रहे है वो और उनकी टीम तो लगातार ये कह रही है की आज के समय में बात भ्रष्टाचार और लोकपाल के बारीकियो पर होना चाहिए पर सभी लगे है एक दुसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाने में बेमतल के दुसरे मुद्दे उठाने में | 
                    

                                                          
           
 

October 24, 2011

हिंदी ब्लॉग जगत घुटन भरे जीवन से बाहर निकालने के लिए धन्यवाद - - - - mangopeople


                                                                          कहते है की दुनिया में सबसे ज्यादा अंदर से दुखी सबसे बड़ा हंसोडा होता है बाहर से वो भले हँसता मुस्कराता दिखता है पर अंदर बहुत दुःख घुटन भरा होता है और जब वो घुटन अपनों को द्वारा हो तो कष्ट कुछ और भी बढ़ जाता है | कुछ ऐसा ही था मेरे भी साथ,  आज भले ही हर बात पर एक मज़ाक करती टिप्पणी और उसके साथ इस्माइली लगा देती हूँ किंतु ब्लॉग में आने के पहले ऐसा नहीं था | जीवन में वो कुछ भी नहीं था जो मैंने जीवन से चाह था,  जिस तरह के परिवार से मैं आई थी,  ससुराल पति उससे कही ज्यादा विपरीत थे,  ऐसा नहीं था की विवाह के पहले कुछ मालूम ही नहीं था,  ससुराल के परिवार के बारे में जानकर कुछ तो अंदाजा था और ये समझौता तो अपनी ख़ुशी से मैंने ही किया था |  किंतु कहते है ना की समझौता तो समझौता ही होता है अपनी ख़ुशी से किया जाये या मज़बूरी में वो मन में कही ना कही सालता ज़रुर है | जीवन के सात कीमती साल मैंने बस कस्मसाते हुए गुजार दिए | आज व्यंग्य करती मज़ाक करती अंशुमाला को देख कर आप में से शायद ही किसी को कभी इस बात का अंदाजा हुआ हो की मैं अंदर से कितनी दुखी और परेशान थी |
                                     इन सब की शुरुआत तो विवाह के छ सात दिन बाद ही हो गया था जब पति देव की असलियत मेरे सामने आ गई ( वो अलग बात है की सदा उनकी बुराईयो को छुपा उनकी अच्छाई ही सब जगह कही है ) हमारी छोटी सी बहस को मैंने जब झगड़े का रूप दे दिया पर पति देव तो बस चार बार मुझे जवाब देने के बाद एक दम से- - - -- --  - - ---- - - -- - -- - - - - - चुप ही हो गए और मेरी बात मान कर कहा की अब इसे यही खत्म करो, उनका ये व्यवहार  मेरे लिए ये किसी आघात से कम नहीं था,  मैंने कहा की क्या बस इतना ही क्या आप को झगड़ा करना नहीं आता तो उन्होंने साफ मना कर दिया नहीं मुझे नहीं आता | आप तो अंदाजा भी नहीं लगा सकते की उस समय मुझ पर क्या गुज़री , विवाह के पहले ही पता था की मेरी सास नहीं है दिल को मना लिया की चलो झगड़ा करने और मोहल्ले भर में किसी और की बुराई बढ़िया लुंगी , ननदे जिठानी मुझसे दूर रहती थी तो क्या जब फोन पर बाते होंगी या कभी मिले तो उन्हें ताने मार लिया करुँगी कभी व्यंग्य बाण चला लिया करुँगीरोज न सही कभी कभी ही सही,  पर पति तो पास होगा झगड़ा तो हर दूसरे दिन कर खाना पचा लिया करुँगी , पर मेरी फूटी किस्मत की पति देव को झगड़ा ही नहीं करने आता था , हद तो तब हो गई जब मेरे सटायर , व्यंग्य तक पर प्यार से मुस्करा देते थे, हाय ! तब पता चला की इन्हें तो ये भी समझ नहीं आता है,  मुझे ही ये बताना पड़ता है की अजी मैंने आप पर ताना कसा है सटायर मारा है,  तो कहने लगे अच्छा मुझे तो पता ही नहीं चला | बोलो अब ऐसे लोगो के साथ जीना भी कोई जीना है बंधुओं | ये सब यही ख़त्म नहीं हुआ दर्द तब और बढ़ गया जब इमारत की सभी महिलाओ ने अपनी सास ननद निंदा समूह से मुझे दो महीने में ही बाहर निकाल दिया कहने लगी की ये नहीं चलेगा की हमारे ससुराल वालो की बुराई खूब रस ले ले कर सुनो और अपनी कुछ भी न कहो | जीवन बिना झगड़े , बिना किसी का मज़ाक, व्यंग्य किये , बिना सटायर,  बातों को उलटा बोले चल सकता है | अरे इन सब के बिना भी जीना कोई जीना था और वो भी मेरे जैसी लड़की ( अरे तब मैं तो लड़की ही थी ना,  वैसे भी आप क्या जाने इस उम्र में खुद के लिए लड़की लिखा जाना कितना सुहाता है )  के लिए जो उस परिवार से आई थी जहा बिना किसी भेद भाव , रंग रूप जाति पाति धर्म रिश्ता देखे सभी का एक सुर में मज़ाक उड़ाया जाता है सभी मिल कर किसी किसी की टाँग खीचते है | बचपन से ये देखती आई थी,  ये सब तो मेरे खून में था सोचा था बड़ी हो विवाह होगा तो अपने घर के ये महान काम को और आगे ले जाउंगी दूर दूर तक फैलाऊँगी , किंतु सब ख़त्म हो गया | 
                     पर कहते है ना भगवान के घर देर और अंधेर दोनों ही है, मेरी जोड़ी ऐसे व्यक्ति के साथ बना कर अंधेर करने वाले भगवान ने भी देर से ही सही मुझे इस घुटन से आज़ादी दिला दी और एक दिन मेरा परिचय हिंदी ब्लॉग जगत से करा दी | लगा जैसे कोई अपना सा मिल गया,  यही है वो जिसको मुझे वर्षो से इंतजार था |   हर तरफ लोगो के भड़ास बिखरे पड़े थे , मेरी तरह ही घुटे हुए लोगो की घुटन खुल कर बाहर आ रही थी , हर तरफ झगड़े विवाद चल रहा था | लगा जैसे मेरा ही परिवार, मेरा ही शहर यहाँ हो, वही खुद को सभी से समझदार समझना , वही सारी बुद्धि का ठेका खुद लेकर बैठे होने का दावा करना , वही दूसरों पर व्यंग्य कसना , वही किसी की टाँग खिचाई करना,  वही मिल कर किसी एक का मज़ाक उड़ाना ,नहा धो कर किसी के पीछे पड़ जाना , वही बस अपनी ही हर बात पर अड़े रहना , वही हर बात पर बहस करना , वही ताने कसना और ये कहना की हम महिलाओ की बड़ी इज़्ज़त करते है बस वो महिलाएँ मेरे घर की हो बाकी बाहर की महिलाओ को हम महिलाओ की गिनती में नहीं रखते है यदि वो हमारे खिलाफ या कहे की वो बोलने की भी हिम्मत करेंगी तो उनकी तो हम बीप बीप बीप ( श्री श्री अमिताभ बच्चन के मुख कमलो से लिए गए शब्द जहा आप अपने स्तर और स्वभाव जानकारी के अनुसार अपनी पसंद की गाली जोड़ कर पढ़ सकते है ) कर देंगे | धनभाग हमारे की हम हिंदी ब्लॉग जगत से जुड़े यहाँ आकर जिन जिन गलियों को हमने लिपि बध रूप में पढ़ा और अपने गालियों का ज्ञान बढाया वो कही और संभव नहीं था | क्या है की बचपन तो बनारस में गुजरा जहा परिवार में तो कोई गाली नहीं देता था किंतु आस पास सभी के मुख मंडल से प्रेम पूर्वक जो गाली रूपी पुष्प गिरते थे वो ठीक से समझ नहीं आते थे एक तो बिलकुल ठेठ भाषा की समस्या आती दूसरे उच्च स्वर में शुरू हुई गाली पता नहीं क्यों बाद में निम्न स्वर में आ जाती थी, जिससे गाली आधी की समझ आती थी यही कारण  था की हमारा गाली ज्ञान उतना अच्छा नहीं था | किंतु भला हो हमारे ब्लॉग जगत का जहा बाक़ायदा हर शब्दों का अच्छे से पढ़ने का मौका मिला बल्कि कई नई गलियों का भी ज्ञान हुआ धन्यवाद ब्लॉग जगत |  उसके बाद जो कलम ( असल में तो उंगलिया चली कहते तो कलम ही है ना ) चली की पूछो ही मत | कभी प्रवचन तो कभी जहर बुझे व्यंग्य के तीर , तो कभी लंबी लंबी हाकना पोस्ट तो पोस्ट टिप्पणियों की लम्बाई भी लंबी , तो कभी तीखे सटायर , तो कभी किसी की हर बात की ही आलोचना करते रहना हा कहे तब भी ना कहे तब भी ,  और लोगो को टिप्पणी देने का ऐसा चस्का लगा की पोस्ट भी लिखने की सुध नहीं रहती कभी कभी | ज्यादातर लोग तो मुझे टिप्पणीकार के रूप में ही जानते होंगे बजाये एक ब्लॉगर के | टिप्पणियों का अपना मजा है जा कर किसी के अच्छे खासे लेख का बेडा गर्क कर दो,  मेरे आने के पहले जिस पोस्ट में सब आप से सहमत है लिख कर जा चुके हो वह टिप्पणी में ऐसी बात लिख मारो की सब लेखक को छोड़ मुझे से ही सहमत हो कर चले जाये और लेखक जल भुन जाये  , या लेख का दिशा ही बदल दो कोई नई बात लिख कर की लोग पोस्ट के बजाये टिप्पणी पर ही वाह वाह कर बैठे , या पोस्ट पर ऐसा विवाद खड़ा कर दो टिप्पणी दे कर  की लेखक भी बार बार सोचे की आखिर विवाद हुआ क्यों था ,  जहा दिखे की पोस्ट लिखने वाला खुद को ज्यादा विद्वान समझ रहा है वहा पर कई पोस्ट पर विपरीत बाते लिख अपनी विद्वानिता झाड़ देती हूँ की बेचारे ब्लॉगर को अंत में मुझे विद्वान मान अपना पिंड छोड़ने के लिए कहना पड़ जाये और जहा पर ब्लॉगर की बड़ी बड़ी उच्च कोटि की हिंदी समझ ना आये तो टिप्पणी भी ऐसे कर दे की जब बात में मई खुद ही पढ़ो तो खुद ही समझ ना आये की आखिर इसका मतलब क्या है |   मतलब ये की जीवन में जो करने की इच्छा थी सब यहाँ पूरा होने लगा |
                                                  यहाँ आ कर मेरे मन को जो सुख चैन मिला वो सात सालों की घुटन को कुछ ही समय में भुला दिया | अब बुराई करने के लिए किसी सास की जरुरत नहीं इतने ब्लॉगर और उनकी करनी( पोस्ट ) है की आप बुराई करते करते थक जाये, पर ना तो  ब्लॉगर खत्म होंगे ना बुराई करने के लिए पोस्टे,  खुद का विषय सोचने की जरुरत ही नहीं है बस दूसरे की पोस्टो की बुराई लेकर बैठ जाइये देखिये कैसा पाठक खींचा चला आता है आप के पास निंदा रस का रस और बढ़ाने ले लिए , ताने कसने व्यंग्य बाण चलाने के लिए ननद , जिठानी की या नीचा दिखने के लिए किसी गरीब रिश्तेदार की जरुरत नहीं है लोगो के पोस्टो का विषय ही काफी है किसी का भी मज़ाक उड़ाने के लिए और नीचा दिखने के लिए हिंदी का ज्ञान ही काफी है |  वर्तनी से लेकर भाषा अलंकार समास आदि आदि जो मिले उसी की धज्जी उड़ा दे अच्छी खासी पोस्ट को हिंदी का निम्न स्तर की लेख बता दे और आगे बढे और ब्लॉगर को हिंदी ब्लॉग जगत का कलंक भी बताने से ना चुके  ,  और जलने के लिए किसी पड़ोसी की जरुरत नहीं है, हाय उसके ब्लॉग पर मेरे ब्लॉग से ज्यादा टिप्पणियाँ कैसे आती है , फलाने ब्लॉगर तो बस उन्ही को टिप्पणी करते है हमें नहीं , अजी वो महिला है ना इसलिए , अरे नहीं ये तो टिप्पणीकार ही फ़र्ज़ी है आदि इत्यादि |
                                                                        हिंदी ब्लॉग जगत को देख कर लगा की जैसे ये बस मेरे जैसो के  लिए ही तो बना है जो जीवन में सपने तो कई देखते है पर करते कुछ नहीं है , बाते बड़ी बड़ी और काम एक भी नहीं,  जो ज़मीन पर कुछ करने के बजाये बस लोगो के सामने लंबी लंबी फेंकने में उस्ताद होते है | काहे की जो काम करता है वो तो मैदान में जा कर लड़ा रहा होता है अपना सपना पूरा कर रहा होता है ना,  उसके पास दूसरों को सुनाने के लिए ना इतना कुछ होता है और ना ही इतना समय होता है बकबकाने के लिए |तो भाइयों और बहनों , जैसे की हर धार्मिक कथा के अंत में कहा जाता है,  की जैसे ब्लॉग मैया हमारा दुख दूर की हमें घुटन से आज़ादी दिलाई वैसे ही ब्लॉग मैया सभी का बेडा पार करे सभी को सुख चैन दे और सारा धन धान्य हमरे घरे भेज दे |
                                          ये सब आज क्यों ? 
 क्या आज मेरे ब्लॉग का साल पूरा हुआ है ?  अरे नहीं जी वो तो कब का हो गया , 
तो क्या सौ वी दोसौवी पोस्ट है ? लंबी लंबी उबाऊ टिप्पणी लिखने से फ़ुरसत मिले तब तो सौ पोस्ट लिखे |
 क्या ब्लॉग छोड़ कर जा रही है, और टंकी पर चढने वाली है ? अरे मालूम है की कोई टंकी से उतारने ना आएगा उलटा टंकी के नीचे लगा सीढ़ी भी हटा देंगे की कही उससे उतर कर वापस ब्लॉग जगत में ना आ जाये |
      तो फिर ??
               जी आज मेरा हैप्पी वाला बड्डे  है ,  सोचा पिछली बार आप लोगो से तोहफे की मांग की थी पर किसी ने ( राजेश जी की एक कविता को छोड़ ) कुछ नहीं दिया था ,एक सौ एक रुपये की तरह एक टिपण्णी थमा कर     १००० रुपये वाली प्लेट का खाना  खा के चल दिए थे !!  हूं  :)))  | किंतु उसके बाद एक साल में लगा की लोगो ने कितना कुछ दिया है मुझे  हिंदी ब्लॉग जगत का प्लेटफॉर्म दिया बकबकाने के लिए  , टिपियाने और अपनी भड़ास निकालने के लिए कितनी पोस्टे दी , मेरी पोस्टो पर आ कर मेरी हर उल जलूल लेखनी की वाह वाही की क्या ये किसी तोहफे से कम है तो सोचा इस  जन्मदिन पर आप सब के दिए तोहफे के लिए आप सभी का धन्यवाद कर दू
      तो हिंदी ब्लॉग जगत मुझे मेरे घुटन भरे जीवन से बाहर निकालने के लिए धन्यवाद !!!!!!
 

         अब मेरे जन्मदिन पर आये है तो केक का हक़ तो बनता है आप लोगो का |