November 27, 2023

इस मांसाहार से कैसे बचें

 हैल्लो फ्रेंडस दुख के साथ बताने पड़ रहा है कि आज से खुद को शाकाहारी होने की लिस्ट से बाहर निकाल रहें हैं 😔

बहुत साल पहले एक दम ताजा बढ़ियां दिख रहा टमाटर काटें तो अंदर ढोले बिलबिला रहें थें । तब का दिन है और आज का टमाटर चाहे उबालना हो पकाना भूनना बिना  चार टुकड़ा काटे, देखे गैस पर ना चढ़ातें । 

कल टमाटर काटे तो देखा बस एक काला सा बीज था अंदर । वो हिस्सा काट कर फेक दिया । फिर लगा चश्मा लगा कर एक बार देखते है सारे बीज को हटा । टमाटर के सारे बीज हटाया तो अंदर मेहीन मेहीन सफेद वाले किड़े के बच्चे । 

इतने मेहीन थें कि रेंगते नही तो चश्मे के बाद भी देखना संभव ना था । ये देखते पूरे शरीर के रोयें गिनगिना गया । लगा बीज को हटा कर तो टमाटर कभी चेक ही ना किया अब तक कितनो को खा चुके होगें। 

जन्मदिन पर बिटिया मेरी लिए कुछ खास बना रहीं थीं बकायदा मैदा डाल कर बनाया । अगले दिन वही नया खरीद कर लाया मैदा हमने थाली मे पलटा तो उसमे भी ढोले । 

ये सोच कि कल ही इस मैदो को खाया है माँ बेटी को तो उलटी आने लगी । एक बार तो सोचे जा कर बनियें का खून कर देतें है ऐसा मैदा देने के लिए।  फिर लगा दिवाली , मैच के बीच कहां कोर्ट कचहरी के चक्कर मे फसेंगें तो जाने देतें हैं । 

वैसे बचपन मे एक बार चीटी का स्वाद भी ले चुकें है । हमारे यहां तीज पर गुजिया बनता था कंडाल भर। हफ्तो उसे खाया जाता । जब कोई बच्चा लेते समय ढक्कन ठीक से बंद करना भूल जाता तो चिटियों की पार्टी हो जाती । 

चिटियां एक छोटा छेद कर गुजिया के अंदर घुस जाती और बाहर से पता ही ना चलता । हमने गुजिया निकाल कर खाया और अचानक से कुछ तेज खट्टा सा स्वाद आया । 

हमने जैसे ही ये बात सबको बतायी दोनो दादा लोग हमको चिढ़ा चिढ़ा बताने लगे वो खट्टी चीज चीटी थी । हमने गुजिया फोड़ी और उसमे से दो तीन जिन्दा चिटियां निकल कर भागी । 

गुजिया हम तुरंत ही प्लेट मे वापस रख दिये । जिसे झाड़ फूक छोटका दादा खा गये । तब का दिन है और आज का गुजिया देखते हमे खट्टी चीटी का स्वाद मुंह मे आ जाता है  और तीसरे दिन के बाद उसको ना खातें । 

अब हाल मे हुए एक के बाद एक हुए घटना से लग रहा है कि अब क्या ही अपने आपको शाकाहारी कहें  🙄

November 18, 2023

जस्ट शट अप

 

विश्व कप के अपने पहले ही मैच मे पांच विकेट लेने के बाद  जब मोहम्मद शमी प्रेस कांप्रेंस मे आयें तो एक पत्रकार ने पूछा की पिछले चार मैच मे आपको टीम मे नही लिया गया था तब आपको कैसा लग रहा था । 

शमी बोले अच्छा लग रहा था क्योंकि अपनी टीम जीत रही थी । चाहे मै टीम मे था या नही था टीम जीत रही थी और अपनी टीम को जीतते देखना अच्छा ही लगता है । 

तीन मैच खेलने और चौदह विकेट लेने के बाद एक बार फिर मैच के बाद कमेंटेटर पूछने लगे कि एक चार सौ विकेट  ( टेस्ट वनडे मिला कर ) लेने वाला बेंच पर बैठा था चार मैचो तक तो क्या सोच रहें थें । 

बोले मेरे साथ छ सौ विकेट लेने वाला ( अश्विन) भी बेंच पर बैठा था । मुझे लेने के लिए टीम से किसी छ सौ विकेट लेने वाले को निकाला जाता तब मेरा नंबर आता । इस समय भारत के पास प्रतिभान खिलाड़ियों की कमी नही है । तो किसी ना किसी बड़े खिलाड़ी को बेंच पर तो बैठना ही पड़ेगा । 

अफसोस की  बात है कि शमी के उन फर्जी फैन और खुद को फैन होने का दावा करने वालों को समझ नही आ रही हैं जो खुद शमी ने पहले ही कह दी है । 

हर मैच के बाद मुंह उठाये चले आतें हैं कि पहले चार मैच मे क्यों नही लिया । तुम लोग अपना सड़ा सा मुँह बंद क्यों नही कर लेते । 


November 17, 2023

क्रिकेट की गाॅसिप सोशल मीडिया वाली

 फिल्मी गाॅसिप बहुत सुना होगा आज क्रिकेट की गाॅसिप सुनाती हूँ । 

खिलाड़ियों के चौके छक्को या आउट करने पर स्टैंड मे बैठी उनकी पत्नियों को दिखाना लाज़मी है । शुभमन के चौके छक्के पर सारा को दिखाना भी एक बार समझ आता है । लेकिन श्रेयश अय्यर के शाॅट पर स्टैंड मे बैठी धनश्री को दिखाना , कुछ ज्यादा गाॅसिप हो गया । 

जिन्हे नही पता है उनके लिए धनश्री अपने चहल की पत्नी है । वो एक अच्छी डांसर है और यूट्यूब आदि पर बहुत प्रसिद्ध भी । ये प्रसिद्धी चहल से मिलने से पहले से उनके पास है । वो चहल और कई दूसरे खिलाड़ियों के साथ भी डांस विडियों बनाती रहतीं हैं । 

लेकिन सोशल मीडिया वाले छपरियों की बाई आँख उस दिन फड़कने लगी जिस दिन उन्होने अय्यर के साथ अपना डांस विडियो जारी किया क्योंकि उसमे साथ मे चहल नही थे । बाकि खिलाड़ियों के साथ विडियों बनाते चहल अक्सर साथ होते थें । 

कुछ ही दिनो बाद धनश्री ने अपनी सहेलियों के साथ एक सेल्फी पोस्ट की । वो किसी के घर के अंदर की थी और उस फोटो मे पीछे किनारे पर अय्यर भी जाते हुए दिख रहें थें । अब तो छपरियों की दोनो आंख फड़कने लगी कि अय्यर वहां क्या कर रहें हैं । 

दिनेश कार्तिक और उनकी पहली पत्नी का किस्सा पहले से ही वायरल हो चुका था और वो सबके दिमाग मे था । लोग इन दोनो को लेकर चटर पटर कर कुछ कुछ पकाने लगें । 

लेकिन इसके बाद हुआ उससे बड़ी चीज । धनश्री ने अपनी खिड़की से बाहर सामने कि बिल्डिंग की एक फोटो पोस्ट की । कुछ ही देर बाद अय्यर ने भी उसी तरह की मिलती जुलती फोटो पोस्ट कर दी । 

इसके बाद तो भाई साहब भुचाल आ गया सोशल मीडिया पर । ठुकरा के मेरा प्यार अंजाम देखेगी , मुझे छोड़ कर जो तुम जाओगें , अच्छा सिला दिया तुने मेरे प्यार का टाइप मीम सीम बनने लगे तीनो को लेकर । 

अपनी बहन पत्नी बेटी को किसी और पुरूष से मुस्करा कर बात करना भी भी बर्दास्त ना करने वाले समाज से उम्मीद भी क्या कर सकते हैं । 

खैर असल बात ये थी कि धनश्री और अय्यर की बहन सहेलियां हैं और दोनो का एक दूसरे के घर आना जाना भी । तो धनश्री अय्यर को दोनो तरफ से जानती हैं ।

 घर की किसी फोटो मे अय्यर का आ जाना या साथ मे डांस विडियो बनाना एक सामान्य बात है । बाकि बिल्डिंग वाली फोटो के समय अय्यर देश मे ही नही थें । 

ये सब तो सोशल मीडिया की पागलपंथी थी उस पर क्या ही बोलना। लेकिन दो मैचों के दौरान धनश्री चहल के साथ मैच देखने आयीं थी और अय्यर के चौके छक्को पर कैमरामैन उन्हे दिखा रहा था ।जिसमे कल का भी मैच था  । मतलब कुछ भी । 

पिछले मैच के बाद एक अखबार की हेडलाइन थी कि श्रेयस के इतने लंबे छक्के से डर कर भागीं धनश्री । असल मे उसका छक्का स्टेडियम की छत से टकरा कर वहां गिरा जहां सभी खिलाडियों की पत्नियां बैठी थीं । उसमे रोहित की पत्नी भी थीं लेकिन नाम धनश्री का लिखा गया । 

अभी कल कोई कमेंटेटर या कोई पत्रकार कोई बड़ा नाम था जिसने कहां हां हमे पता है कि श्रेयश एक बहुत अच्छे डांसर है । 

बात कहां की कहां पहुचते जा रही है । उम्मीद है तीनो समझदार हैं और ये सब सम्भाल लेगें । छपरियों को कुछ नया मिल जायेगा वो ये सब भूल उस तरफ मुड़ जायेगें । 









 

October 30, 2023

सत्तर घंटे काम - कम या ज्यादा


1- ज्यादा समय नही हुआ जब आईटी कंपनियों का टाॅप मैनेजमेंट इस बात की शिकायत कर रहा था कि उसके यहां काम करने वाले ऑफिस से जाने के बाद और वीकेंड पर कहीं और भी काम कर रहें है जो नैतिक रूप से सही नही है।

तब लोग उन पर भड़क गयें कि ऑफिस के बाद हम कही और काम करे इससे आपको क्या । हमे ज्यादा पैसा कमाने का मौका मिल रहा है तो आपको क्या । 

अब वही जनता अब हफ्ते के सत्तर घंटे काम करके अपनी प्रोडक्टीविटि बढ़ाने ग्रोथ बढ़ाने की बात पर भड़का हुआ है । हमे लगा लोग पैसा बढ़ाने की बात करेगें पिछली बार की तरह पर लोग इस बार कह रहें हैं कि हम काम क्यों करे इतना देर । 



2- हम बिजनेस वाले परिवार से आते है । हमने तो बिना छुट्टी ,संडे ,होली , दिवाली अपने घर या बोले तो हर बिजनेस , दुकान वाले को इससे भी ज्यादा काम करते  हमेशा देखा है और देख रहें है ।

 इसमे तो कुछ भी अनोखा और नया नही हैं । सब मान कर चलतें हैं ज्यादा पैसे कमाने के लिए अपने मन की करने के लिए इतना काम और मेहनत तो करना ही पड़ेगा । कभी इसके लिए शिकायत करते किसी को नही देखा है । 

3-हर नौकरीपेशा महिला सालों साल से ऑफिस घर बच्चे की तीन तीन फुल टाइम जिम्मेदारियां संभालते इससे कहीं ज्यादा समय काम करते बिताती है । कभी कोई उसकी तरफ देखता तक नही कोई बवाल नही होता कोई सवाल नही करता ।

और आज वही नौकरी पेशा , घर के अंदर आँखे बंद किया पुरूष सिर्फ बात कहने भर से ऐसे भड़क गयें हैं कि जैसे कोई ऐसी बात कह दी  गयी हो जो इस धरा पर हो ही नही रहा था ।  

4- वो किस्सा सुना है जब आदमी भीखारी से कहता है कि भाई इसकी जगह काम करो तो ज्यादा पैसा कमा पाओगे । एक घर गाडिय़ा, इज्जत होगी , परिवार और तुम खुश होगे । तो भीखारी कहता है तो खुश होने के लिए काम करने की क्या जरुरत है मै तो ऐसे भी खुश हूँ।  

अपने गांव छोटे शहरो और आसपास के उन बहुत  सारे लोगों को याद किजिए जो आपसे बहुत पीछे छुट गयें और आप अपनी मेहनत के बल पर उनसे कितना आगे बढ़ गयें । वो लोग जिनसे आप कहतें रहें कि भाई कुछ मेहनत कर लो , पढ़ लो , दिमाग  लगा लो , ढंग का काम कर ले और वो आपकी बात अनसुना कर कहते रहें उनके लिए उतना ही बहुत है । 

किस तरह देखते हैं आप उनका और खुद को , अपने और उनके जीवन का अंतर समझ आ रहा है । जब वो कहतें है कि वो अपनी स्थिति से खुश हैं तो आपको वो सच लगता है । 

5- जितना मुझे समझ आया युवाओं को प्रोत्साहित किया गया है कि बस पहली सफलता के बाद वही रूक मत जाओ । युवा हो जोश है यही समय है और मेहनत करों और अपनी ग्रोथ को अभी ही तेजी से बढ़ा लो । 

ये प्रोत्साहन भी ऐसे व्यक्तित्व से है जिसने खुद ये करके दिखाया हैं । लेकिन अंकिल जी लोग भड़क गये हैं । भाई आप काहें अपना बीपी बढ़ा रहें हैं ऑफिस हाॅवर बढ़ाने की बात नही हुयी है । 

6- बहुत से युवा बड़े शहरों मे काम करने जातें हैं । कुछ का सपना कुछ साल की नौकरी से पैसा जुटा आगे पढ़ाई करने का , कुछ को अपने खर्च के बाद पैसा घर भी भेजना होता है । कुछ को अपना लोन भी चुकाना है ,कुछ को आईफोन जैसी विलासितापूर्ण जीवन जीना है । 

 बड़े शहरों मे ना उनका कोई अपना होता है ना ऑफिस के बाद कुछ करने को उन सबको कहूंगी कि पैसे की बात करो पैसे की । काम सत्तर कर लेगें घंटे के हिसाब से पेमेंट भी करो । 

बाकि बांतें और भी बहुत है पर अभी ही बहुत कह दिया है तो बस करतें हैं । 
















October 17, 2023

रिश्ते और उसके सम्बोधन

 मुंबई आयी तो ससुराल की एक मजेदार बात पता चली कि मेरे चाचा ससुर के बच्चे अपने पापा को चाचा कहतें हैं । शुरू मे उन लोगों से बात करते बहुत कन्फ्यूजन होता था ।  लगा गांव से चाचा आयें हैं उनकी बात हो रही है । 

बाद मे पता चला मेरे ससुर बड़े थे उनके बड़े  बच्चे चाचा कहते उन्हे  देख चाचा के बच्चे भी उन्हे चाचा ही कहने लगें । 

ऐसी ही बनारस मे मेरी एक मित्र अपनी मम्मी को बाजी कहतीं थीं । बचपन से वो नानी के घर रहतीं थीं । उनकी मम्मी सबसे बड़ी, सात छोटे भाई बहन वो सब उन्हे बाजी बुलातें मेरी दोस्त भी वही सीख गयी और उन्हे किसी ने मना भी नही किया । 

हम लोग तो दो तीन सालों तक यही समझते रहें कि वो अपनी बड़ी बहन की बात करतीं रही थीं । तब लगता वाह इसकी बड़ी बहन तो बहुत अच्छी है इसके सारे काम करती है । 

इसी तरह हमारे बचपन मे एक किरायेदार रहते थी उनके बच्चे उन्हे बहु बुलातें थे। शुरू मे लगा कि शायद इनके गांव इलाके मे ऐसा बुलाया जाता होगा । 

फिर एक दिन जब गाँव से उनके ससुर आयें वो भी बहु कहने लगे उन्हे तब पता चला कि उनकी तरफ कुछ ऐसा पुकारा नही जाता । 

वास्तव मे उनके बड़े संयुक्त परिवार मे वो सबसे छोटी बहु थीं । पूरा घर ही उन्हे बहु कहता था तो जेठ जेठानी के बच्चो से लेकर उनके अपने बच्चे भी उन्हें बहु ही पुकारने लगें । 

मेरी नानी मेरे सबसे छोटी मौसी के दोनो बेटो पर बहुत गुस्सा करतीं थीं क्योंकि दोनो अपने दादाजी को नाना बुलातें थें । 

असल मे उन दोनो से बड़ी उनकी एक बुआ की बेटी थी जो उनके साथ रहती थी । वो नाना जी बुलाती तो उन दोनो ने भी सीख लिया ।   

जब छोटी मौसी की शादी हुयी थी तो नाना गुजर चुके थे । इसलिए नानी गुस्सा करती कि अपने दादा को नाना बोल कर इस उमर मे  मेरा रिश्ता उनसे खराब कर रहे हो 😂😂

October 09, 2023

सर्वे और तथ्य

 किसी अन्तर्राष्ट्रीय संस्थान के किये सर्वे तकनीकि रूप से कितने गलत हो सकते है वो इस सर्वे को देख कर समझा जा सकता है । 

हाल मे ही एक अन्तर्राष्ट्रीय संस्थान ने अपने सर्वे मे बताया कि स्कूली शिक्षा के स्तर मे भारत सबसे नीचे से दूसरे पायदान पर है । उसके अनुसार भारत के ग्रामीण इलाके के दूसरी तीसरी कक्षा के छात्र ठीक से किताब मे लिखा पढ़ नही पा रहे थे और दो और दो चार जैसे जोड़ घटाना भी नही कर पा रहे थें । 

ये खबर पढ पर ज्यादातर शहरी भारतीय भी इससे सहमत हो जायेंगें और सरकारी शिक्षा के स्तर को कोसने लगेंगे कि हमारे बच्चे तो दूसरी तीसरी तक फर्राटेदार किताबे पढ़तें है । गणित मे कहीं आगे के प्रश्न हल करने लगते हैं ये बच्चे कैसे नही कर पा रहे हैं । 

पर ज्यादातर लोग इस बात को भूल जाते हैं कि शहरी मध्यम और उच्च वर्गीय बच्चा दो से ढाई साल की आयु मे प्लेग्रूप फिर नर्सरी , एलकेजी , यूकेजी  के तीन साल के बाद पहली फिर दूसरी तीसरी कक्षा मे जाता है । 

दूसरी से तीसरी कक्षा तक उसकी स्कूलिंग के पांच से छः साल हो चुके होते हैं । प्लेग्रूप मे वो अक्षरो को बोलना , नर्सरी मे पढ़ना लिखना उसके बाद शब्दो को जोड़ कर पढ़ना आदि सीख लेता है । तब पांच छः साल बाद फर्राटेदार रिडिंग करता है । 

जबकि सरकारी स्कूल जाने वाले बच्चे खासकर ग्रामीण इलाके के बच्चे छः से सात साल की आयु मे पहली बार स्कूल जाते है पहली क्लास मे जहां उन्हे अक्षर ज्ञान दिया जाता है । 

अब आप सोचिये पहली क्लास मे अक्षर और अंक बोलना सिखने वाला बच्चा दूसरी क्लास या तीसरी मे भी धाराप्रवाह पढ़ कैसे सकता है । 

पांच से छः साल स्कूलिंग किये बच्चो का मुकाबला क्या दो या तीन साल स्कूल गये बच्चो से किया जा सकता है । उसकी भी पांच या छः साल की स्कूलिंग हो जाये फिर उसके स्तर को देखा जाना चाहिए। 


ये ठीक है कि आज भी सरकारी खासकर ग्रामीण क्षेत्र के स्कूलों मे पढाई का स्तर ठीक नही है । अध्यापक छात्र की संख्या कम , वो अनियमित है ,अध्यापको का ठीक से प्रशिक्षित ना होना , बीच मे स्कूल छोड़ देना जैसी हजारो समस्याएं है । लेकिन वो दूसरा विषय और समस्या है । 

शहरों के सरकारी स्कूल की स्थिति इतनी भी खराब नही है । हमारे समय के ना जाने कितने लोग सरकारी स्कूलों से पढ़ कर ही आये हैं । बनारस जैसे शहर मे स्कूल,  अध्यापक,  पढाई सब अच्छे थे उस जमाने मे भी । आज मुंबई जैसे बड़े शहर मे तो सरकारी स्कूलों मे कहीं कहीं क्लास मे प्रोजेक्टर आदि भी लगे हैं। दिल्ली मे भी स्कूल अच्छी हालत मे हैं ।

ऐसे सर्वे आदि मे यदि गलत जगह या इरादे के साथ से सैंपल लिया जायेगा तो ऐसे सर्वे कभी सही नही हो सकते हैं । 

ज्यादा समय की बात नही है जब अपना पड़ोसी पाकिस्तान एक सर्वे के अनुसार हैप्पीनेस इंडेक्स मे हमसे ऊपर था और पेट्रोल के दाम हमसे कम । पर आज उसकी स्थिति ये है कि वहां के नागरिक हर हाल मे वहां से भागने की सोच रहे हैं । 

October 06, 2023

नकरातमकता से बचें

दुनियां के कुछ क्रिकेट स्टेडियम मे दर्शको के बैठने की क्षमता । गुगल के अनुसार 

मेलबर्न आस्ट्रेलिया 100000

लार्ड इंग्लैंड 31180 

पर्थ आस्ट्रेलिया 61266

एडिलेड ओवल आस्ट्रेलिया 53583

सिडनी 80000

ईडन पार्क न्यूजीलैंड 42000

प्रेमादासा और महेन्द्रा राजपक्षे  श्रीलंका 42000  और 40000

बाकि पचास हजार से ऊपर वाले सब भारत मे है और दुनियां के बाकी क्रिकेट मैदान की क्षमता पचास हजार से कम दर्शकों की है । 

कल अहमदाबाद मे खेले गये विश्व कप के पहले मैच मे साढ़े सैतालिस हजार लोग आये थे । वो भी सप्ताह के बीच यानी कामकाजी समय मे इसलिए शायद दर्शक धीरे धीरे मैदान मे आये , अपना काम जल्दी खत्म कर । दुनियां के ज्यादातर मैदान इतने दर्शकों के साथ पूरा या लगभग भरा होता । 

फिर  समझ ना आ रहा है लोग ये सवाल क्यों कर रहें है कि पहले मैच मे दर्शक कहां हैं । भाई अहमदाबाद स्टेडियम की क्षमता एक लाख बत्तीस हजार की है । उसे पूरा भरने के लिए भारत का मैच होना चाहिए। 

कल की दो टीमो मे से एक भी भारत क्या एशियाई टीम भी नही थी उसके बाद भी इतनी बड़ी संख्या मे दर्शक ना केवल मौजूद थे बल्कि ज्यादातर न्यूजीलैंड को सपोर्ट भी कर रहे थे । शायद मेरी ही तरह पिछले विश्व कप के फाइनल मे जिस तरह न्यूजीलैंड को हारा घोषित किया गया उसके कारण । 

कम से कम क्रिकेट के विश्व कप मे भी मेजबान और भारत तथा  पाकिस्तान के मैचों के अलावा ज्यादातर मैदान खाली ही रहता है । फुटबॉल की तरह लाखो दर्शक टीम के साथ आयोजित देश नही जाते । 

कौन है ये लोग कहां से आते हैं । इतनी निगेटिवीटि के साथ  कैसे जीते है । हर बात मे बुराई खोज लेना हर बात मे राजनीति डाल देना कैसे कर लेते हो आप लोग । चैन से सो और खा भी नही पाते होंगे ये लोग । 

जो पत्रकार क्रिकेट का क भी नही जानते जिनको ये भी नही पता की एक टीम मे खिलाड़ी कितने होते है वो भी दर्शकों को संख्या पर सवाल बस इसलिए कर रहे है ताकि अमित शाह के बेटे जय शाह को गरिया सकें । 

माने हद है भाई तुम लोगों क्रिकेट को बख्श दो अपनी गंदी राजनीति और नकारात्मक सोच से । 

October 04, 2023

दवाओं के सहारे जीवन

 

कल रात इमारत मे  किसी की हार्ट अटैक से मृत्यु हो गयी । 65  के करीब थें ।  कुछ साल पहले मुंह के कैंसर से पीड़ित थें पर अब उससे छुटकारा पा चुकें थे । 

बस दो दिन से अपने हाई बीपी की दवा नही खा रहें थें और बीपी बढ़ गया था । कल शाम ही बीपी नापा तो वो बहुत हाई निकला । 

घर आये पड़ोसी से इस बात का अफसोस भी जाहिर किया कि दवा नही खाया तो देखो कितना बीपी बढ़ गया है । कुछ समय बाद ही जब घर मे अकेले थे तो शायद हार्ट अटैक आया और बच नही पायें । 

इन्होनें तो दो दिन दवा नही खाया था । दो साल पहले हमारे फ्लोर के एक बुजुर्ग तो बस रात मे दवा नही खाया और अगली सुबह गुजर गयें। 

 उन्हे बहुत सारी समस्याएं थी , दवा खा खा कर तंग आ गये थे । उस रात जिद्द पकड़ ली कि अब से दवा नही खायेंगे जब मौत आनी है आ जाये । पत्नी बेटे से इस बात को लेकर झगड़ा भी हो गया । 

अगली सुबह ही तबियत बिगड़ गयी अस्पताल ले जाने के लिए बिल्डिंग के बाहर निकलते ही मौत हो गयी । 

हमारी अपनी छोटी चाची पचास से भी कम आयु मे पैरालाइसिस के अटैक का शिकार हो गयी बस दो तीन दिन दवा छोड़ने पर । हाई ब्लडप्रेशर और और पैरालाइसिस उनका फैमली इतिहास था । 

यही कारण था कि चाचा उनकी दवा का हमेशा ध्यान रखते थे । भाई दूज पर मायके गयी और दवा को लेकर लापरवाही बरत दी । तीन दिन बाद घर आयी तो दवा फिर से ले लिया था लेकिन शरीर के लिए देर हो चुका था । 

मंदिर मे सुबह पूजा करते गिर गयी । वो तो चाचा को फैमली हिस्ट्री उनकी पता थी तो तुरंत समझ गये । सीधा स्पेशलिस्ट हास्पिटल गये और डाॅक्टर को खुद बता दिया कि पैरालाइसिस का अटैक है । 

समय से इलाज मिल गया और लंबी फिजियो थेरपी से  धीरे धीरे इतना रिकवर कर लिया कि आराम से चल फिर सकती है घर और अपना काम कर लेती है । लेकिन उलटे हाथ से कुछ पकड़ नही सकतीं और कहीं भी अकेले नही जाने दिया जाता है । 

अब आधा दर्जन दवा चार पांच सालों से रोज खा रहीं । कुछ कुछ महीनों मे हाथ पैर मे अकड़न और दर्द की समस्या अलग से । 

एक महीने पहले मेरी कामवाली अचानक स्टेशन पर चलते हुए एकदम से बेहोश हो कर पटरियों पर गिर गयी । बहुत ज्यादा चोट आ गयी थी एक महीना लगा उसे ठीक होने मे । 

डाॅक्टर ने बताया सुगर बहुत ज्यादा हाई हो गया था । उसे अपनी बीमारी के बारे मे पता ही नही था । वो तो शुक्र था कोई ट्रेन नही आ रही थी और लोगो ने उसे तुरंत पटरी से हटाया । 

दो दिन से काम पर आ रही है मैने उसे ढेर सारी हिदायते दी । परहेज को लेकर और दवा के प्रति लापरवाही ना करने को लेकर।  

तो भाई दवाओं और स्वास्थ्य को लेकर लापरवाही जरा भी ना बरते । अपने लिए नही तो अपने अपनों का सोचें । ठीक है मौत तो जब आनी  है तब आयेगी ही लेकिन ये सोच कर कोई बीच सड़क से चलना या नदी मे छलांग तो नही लगाता ना । 

तो ख्याल रखिये अपना भी और अपने अपनो का भी । 

October 01, 2023

इस अधर्म को कौन रोके




अपने देवता के साथ ऐसा  व्यवहार करने का महान कार्य अपना हिन्दू उर्फ सनातन धर्म ही कर सकता है । तस्वीरे देखिये,  जिस गणपति को दस दिन भक्तिभाव से पूजा और रोते खुश होते नाचते गाते विदा किया । उसे किस दुर्दशा मे समुद्र किनारे छोड़ आये हैं । 

कल बिटिया बीच की सफाई के लिए गयी थीं जो दृश्य देखा वो उनसे भी बर्दास्त नही हो रहा था । गन्दगी की पराकाष्ठा देख बहुत दुखी हुयी और  देवता की मूर्तियों की ऐसी हालत कि ईश्वर मे विश्वास ना होने के बाद भी उन्हे आश्चर्य रूपी दुख हो रहा था ।

समुद्र अपने पास कुछ ना रखता सब लौटा देता है नतिजा विसर्जन के दूसरे दिन मुर्तियां रेत पर टुटी फूटी खराब हालत मे पड़ी थी । बड़ी मूर्तियों को जेसीबी मशीन से तोड़ा जा रहा था ताकि उन्हे आसानी से निस्तारण किया जा सके। 

ये देख उनकी एक मित्र तो रोने लगी क्योंकि उसके घर गणपति आये थे और एक दिन पहले वो विसर्जन के लिए आयी थी । गणपति से उसकी श्रद्धा प्रेम के कारण ये सब उसके लिए असहनीय हो रहा था । 

सालों से पर्यावरण प्रेमी से लेकर समझदार वर्ग कहता आ रहा है कि मूर्तियों का आकार छोटा किया जाये और उन्हे मिट्टी से बनाया जाये । लेकिन श्रृद्धा कम बाजारवाद मे डूबे पूजा पंडाल इसको मानने को तैयार नही होते है । बीस से चालीस फिट ऊंची मूर्तियां बनायी जाती हैं । 

यही सारे मंडल तब चुपचाप सरकारी फरमान को मान रहे थें जब कोविड के कारण मूर्ति का आकार सिर्फ पांच फिट निर्धारित था । लेकिन उसके बाद सब अपने ढर्रे पर वापस आ गया । 

जिस धर्म के मानने वाले ही जब ऐसा व्यवहार अपने ही देवता की मूर्ति से करे तो उस धर्म को क्या किसी और से खतरा हो सकता है । 

खैर हम अ-धार्मिक लोगों का क्या बिटिया सब पूजनियों को कचरे की तरह साफ करने का सहयोग कर घर आ गयीं । 




September 29, 2023

तीसरी कसम


 जब सी फेस पर टहलने जाती थी तो इनसे मिलती थी । चारो पैरो मे इनके जूतें से हर किसी की नजर इन पर उठ ही जाती । अपनी नौकरानी के साथ आते बस एक दिन ही अपने मालिक के साथ इन्हे देखा ।

 नौकरानी भी टहलाने के बजाये एक बेंच पर बैठ कर मोबाइल चलाती और ये उसके बगल मे बैठे आते जाते अपनी नस्ल वालों को देख बीच बीच मे भौंक लेतें । 

एक दिन देखा अपने से चार पांच गुना बड़े पर भौके जा रहें है । बदले मे उसने भी भौकना शुरू किया । इन्हे गुस्सा आ गया ये बेंच से कुद पड़ें और तेज से भौकने लगे । शुक्र है कि बेल्ट मे थे तो उसके पास तक नही जा सके , थोड़े दूर से ही चिल्लाते रहें । 

बड़े वाले के साथ उसके मालिक थे दो यंग लड़का लड़की । दोनो आगे जाने के बजाये एक सुरक्षित दूरी पर अपने कुत्ते का बेल्ट पकड़ खड़े हो इस दृश्य का मजा लिये जा रहें है ।

अब छुटकु के नौकरानी को गुस्सा आ गया । उसके शान्ती से मोबाइल देखने में खलल पड़ रहा था । वो भी गुस्से से उठी अपने  छुटकु को गोद मे उठाया और आगे चली गयी । 


हम पीछे से आते हुए ये सब देख रहे थें । इतने मे देखा कि अच्छे खासे भरे बदन की नौकरानी का कुर्ता उनके पृष्ठ भाग मे फंस गया है । सोचा जल्दी से आगे बढ़ कर उसे बता देतीं हूं । छुटकु के चक्कर मे मेरी कई बार उससे बात हुयी थी । 

फिर सोचा कि बतायें की ना बतायें क्योकि एक विडियो मे देखा था कि किसी लड़की के ब्रा की पट्टी दिखे तो आंटी बन कर उसे टोकना नही है । दिख रहा है तो दिखने देना चाहिए उसे बताना रूढ़ीवादी सोच और आंटीगीरी है । 

समझ ना आ रहा था कि यही नियम कुर्ते के पृष्ठ भाग मे फंसने पर लागू होगा की नही । फिर लगा आगे जा रही महिला लड़की नही मेरी उमर की आंटी ही है तो हमारे जमाने वाली है । निश्चित रूप से ये चाहेगी  मेरी ही तरह कि इसे कपड़े को ठीक करने के लिए बता दिया जाये । 

इतना सोचते विचारते हम उसके पास तक आ गये थें । तो हमने कहा रिस्क ले लेते है अब आंटी की ऊमर मे आ कर आंटीगीरी तो की ही जा सकती है । 

तो उसे बताने के लिए उसके पास तक गयें कि धीरे से बोल दूंगी ताकि कोई और ना सुने । अपने कान से इयरफोन भी निकाल दिया ताकि बातचीत कान बंद होने के कारण तेज से ना हो और वो धन्यवाद कहे तो मै मुस्कराहट के साथ जवाब भी दे दूं । उसे ना लगे कि नौकरानी है तो मैने भाव ना दिया । 

उसके पास गयी और धीरे से कहा अपना कुर्ता ठीक कर लो । उसने मेरी तरफ देखा नाक सिकोड़े , भौवे ऊपर कर बुरा सा मुँह बनाते बोली  " मै क्यों अपना कुत्ता ठीक करूं वो अपना कुत्ता ठीक करे । उनका कुत्ता ज्यादा भौक रहा था । वो टहल रहे थें आगे क्यों नही गये ----

पहले तो हम हक्का बक्का हुए फिर बात समझ आ गयी कि उसने कुछ का कुछ सुना है । उसे बीच मे टोकते हमने कहा कि मै कुत्ते नही कुर्ते की बात कर रही थी । 

लोग अपनी दुनियां , सोच , विचारों और समस्याओं मे उलझे रहते हैं । इतने मे आप उन्हे जा कर कुछ कहें तो वो सुनते वो है जिसमे वो उलझे हैं या जो वो सुनना चाहते है  । नतिजा सही बात समझे बिना आप पर भौकना शुरू कर देते है । 

उसी दिन हमने अपनी तीसरी कसम खायी कि आज के बाद किसी के ब्रा की पट्टी दिखे , किसी का चेन खुला हो या किसी का कुर्ता गलत जगह फंस गया हो हम अब किसी को ना बतायेंगे ।

 पहली और दूसरी कसम फिर कभी बताते हैं । 

#तीसरीकसम 

December 07, 2022

लैंगिक भेदभाव


 हाल ही मे न्यूजीलैंड की पीएम जैसिंडा अर्डर्न और फिनलैंड की पीएम सना मरीन से एक संयुक्त प्रेस कांप्रेंस मे एक पत्रकार पूछ बैठा कि लोग कह रहे है कि आप दोनो इसलिए मिली क्योकि आप दोनो हमउम्र है और दोनो एक जैसा सोचती है । इस तरह के सवाल पर दोनो महिला पीएम हैरान हो गयी ।

अर्डर्न ने उलटा पत्रकार से सवाल किया कि क्या ओबामा और  जाॅन , न्यूजीलैंड के पूर्व प्रधानमंत्री , जब मिले थे तब भी ये सवाल हुआ  था कि वो हमउम्र है इसलिए मिल रहे है । हम इसलिए मिले है क्योंकि  हम दो देशो के प्रधानमंत्री है । 

ये नया नही है जब महिलाओ के साथ चाहे वो किसी भी पद पर हो उनके साथ लैंगिक भेदभाव किया जाता है उनकी बातो को गम्भीरता से नही लिया जाता और उनके स्त्री होने को उनके पद और कार्य से अलग नही किया जाता और ये सब लगभग दुनियां के हर कोने मे हो रहा है । 

सालो पहले जब पाकिस्तान की विदेश मंत्री हिना रब्बानी भारत आयी थी तो यहां कि मिडिया उनके पर्स, कपड़ो , सुंदरता पर बात ज्यादा कर रहा था बजाये विदेश नीति के । जबकि शायद ही  कभी ऐसा हुआ हो कि किसी दूसरे देश से पुरुष मंत्री के सूट शर्ट जूतो पर उनके ब्रांड पर चर्चा हुयी हो । काम दोनो एक ही कर रहें है । 


सिर्फ राजनीति ही नही लगभग हर क्षेत्र की यही हालत है । याद होगा पत्रकार राजदीप सरदेसाई सानिया मिर्जा से पूछ बैठे थे कि आप सेटेल कब होंगी । सानिया ने पलट कर जवाब दिया ग्रैंड स्लैम जीत लिया , डबल मे रैकिंग नंबर वन हो गयी , दस साल से ज्यादा से खेल रही हूँ,  शादी हो गयी अब और कितना सेटेल होना है । वास्तव मे पत्रकार महोदय पुछना चाह रहें थे कि वो बच्चे कब पैदा करेंगी । 

आप ही सोचिए कोई  महिला शादी के बाद बिना बच्च पैदा किये कैसे सेटेल कहला सकती है । जबकि  आपने कभी नही सुना होगा कि किसी पुरुष खिलाड़ी से ये पूछा गया हो कि आप बच्चे कब पैदा करेगे या सेटेल कब होंगे । 

महिलाओ के साथ लैंगिक भेदभाव मे उनकी बातो को गम्भीरता से ना लेना , उनकी शादी-ब्याह, बच्चे की हर समय चर्चा के बाद नंबर आता है उनका चरित्र हरण करना । 

किसी महिला पत्रकार की पत्रकारिता पसंद नही आयी तो कार्टूनिस्ट ने उनकी वर्जीनिटी पर सवाल वाला कार्टून बना दिया । पुरुष पत्रकार को रीढविहिन कहा जाता है उसके वर्जीनिटी,  चरित्र पर सवाल नही किये जाते । रीढविहिन कहना उसके कार्य पर प्रहार है लेकिन स्त्री की बात आते ही हमला कार्य पर नही उसके चरित्र उसके स्त्री होने पर किया जाता है । 

आम जीवन मे हर आम आदमी ये भेदभाव रोज करता है । हम सड़क पर रोज सैकड़ो लोगो को खराब ड्राइविंग करते दुर्घटना होते देखते है लेकिन दो चार महिने मे एक बार भी किसी महिला को खराब ड्राइविंग करते किसी पुरुष ने देखा । फटाफट उसका विडियों फोटो लेकर वायरल  किया जाता है या पोस्ट लिख कर उपहास उड़ाया जाता है । रोज सैकड़ो पुरूषो को खराब ड्राइविंग करते देखने की बात भूल जाते सब । 

सड़क दुर्घटनाओ के आकड़े निकाल कर देख लिजिए दुर्घटना करने वाले  सब पुरुष ही होगें महिलाए नाम मात्र की होगीं । लेकिन कहा ये जायेगा कि महिलाएं खराब ड्राइविंग करती है । मजेदार बात ये है कि ये कहने वाले पुरूष उस मौलाना पर हँसेगें जिसने महिला पायलट होने के कारण विमान मे सफर करने से इंकार कर दिया था । जबकि दोनो ही जगह एक ही स्तर की बात हो रही है । 

बचपन से सिखाया पढ़ाया गया है कि महिलाए अक्षम है कमतर है ।  घरो मे लोगों के जुबान पर रहता है हर छोटी बात पर , अरे तुम औरतों से हो क्या सकता है , तुम लेडिज को कुछ आता भी है । वही बाहर भी आ जाता है किसी महिला को कुछ करते देखते । वो उसके काम पर कमेंट करने की जगह उसके महिला होने पर   कमेंट  करने लगते है । 

और ये सब सिर्फ कम पढे लिखे लोग , छोटे शहरो के लोग , पुरुषवादी सोच रखने वाले ही नही सब करते है । पढे लिखे समझदार भी , फेमिनिस्ट सोच रखने वाले भी । कभी कोई जानबूझकर कर करता है तो कभी आदत है , तो कभी अनजाने मे कर देते है । कुछ टोकने पर इस लैंगिक भेदभाव को समझ जाते है और कुछ समझाने पर भी नही समझते । आप किस वर्ग मे है खुद सोच लिजिए।  

वैसे  एक खास प्रकार  का लैंगिक भेदभाव पुरूषो के साथ भी होता है इस पर भी कभी बात करेंगे । 

November 29, 2022

दृश्यम 2- फिल्म समीक्षा



जिन लोगो को गांधी और उनकी जयंती से समस्या है उनके लिए सलाह है कि दृश्यम थ्री फोर के प्रड्यूसर बन जाये ।  कुछ सालो बाद दो और तीन अक्टूबर का जिक्र आते लोगो को ये फिल्म पहले याद आयेगी ना की गाँधी जयंती । 

इस फिल्म की टिकट रविवार के लिए मिलना आसान नही है पता था लेकिन लोग सोशल मीडिया पर फिल्म के रहस्य खोले जा रहे थे तो मजबूरी मे टिकट खरीदना पड़ा । हमने कहा ज्यादा से ज्यादा क्या ही होगा गर्दन दुखेगी  इतने आगे की सीट पर , इस फिल्म के लिए सह लेगें थोड़ा । 

घर बैठ कर न्यूजीलैंड का मौसम का हाल देखते हुए समय बिताने से तो अच्छा ही है । एकदम कार्नर की सीट मिली लेकिन ऐसी फिल्म जो  स्क्रिन से नजर हटाने ना दे उसमे कार्नर सीट पर बैठ कर रोमांस की कौन सोचेगा । तब तो और भी नही जब फिल्म का सुबह का शो भी हाउसफुल हो । 

भाई साहब फिल्म की तो बात ही क्या करे । अब आप ये सोचिये कि एक सस्पेंस वाली फिल्म की मूल कहानी दर्शक को पहले से पता है । एक हत्यारा है और  पुलिस को उसे पकड़ना है । वो बस ये देखने आया है कि फिल्मकार ने उसे बनाया कैसा है । उसके बाद भी अंत मे फिल्म की पूरी टीम दर्शक को चकित करके वाह , गजब , तालियाँ वाला रिएक्शन निकलवा लेती है । 

  कहानी फिर से शुरू कैसे होगी ,  ऐसी फिल्म के दूसरे पार्ट मे दिखायेगें क्या का जवाब पहले ही दृश्य मे उस  मिल जाता है  । फिल्म एकदम वही से शुरू होती जंहा खत्म हुयी थी । 

सबसे मजेदार ये है कि पहले ही दृश्य मे फिल्म दर्शकों को एक सुबूत दे देती है और उन्हे जासूस बनने के लिए मजबूर कर देती है । दर्शक सोचता है कि पुलिस से ज्यादा सुबूत उसके पास है पहले वो केस हल कर लेगी  । 
आखिर सालो साल सीआईडी और एकता के डेलीसोप मे बहुओ को जासूसी करते  देखने के बाद  इतना असर तो आता ही है ।  लेकिन दर्शक जो सोचता है बाद मे पता चलता है कहानी उससे अलग है । इससे दर्शक का रोमांच और बढ़ जाता है । 

पता नही क्यो लोग फिल्म के पहले हिस्से को धीमा बोल रहे है  मुझे तो बिल्कुल नही लगा । बल्कि इंटरवल होने पर लगा कि अरे फिल्म आधी हो भी गयी । क्योकि अंत मे पता चलता है उन एक एक दृश्य का क्या मतलब था । पहला हिस्सा ध्यान से देखा हो तब अंत मे रहस्य खुलने पर आप कहते है अच्छा तो वो ये था , तो उसका मतलब ये था । 

फिल्म अच्छी बनी उसके लिए पूरी टीम प्रयास दिखता है।  कहानी अच्छी  , उस पर लिखा स्क्रीनप्ले अच्छा ,  निर्दशन अच्छा , फिर अभिनय अच्छा अंत मे एडिटिंग अच्छी। कहानी के लिए श्रेय हिन्दी मलयालम दोनो वर्जन को जाता है । दक्षिण का रीमेक बनाना हो तो ऐसा बनाना चाहिए।  

"परिवार के लिए सबकुछ करूंगा" वाली फिल्म मे "अपने तो अपने होते है" वाला मेलोड्रामा इमोशन की भरमार नही है , जबरदस्ती का रोमांस और  गाना बजाना नही है और ना ही डर जाने और बहुत स्मार्ट होने की ओवर एक्टिंग।  

अक्सर किसी फिल्म का दूसरा भाग पहले भाग से कमतर होता है लेकिन मुझे ये फिल्म पहले भाग से बीस ही लगती है । मै अपराधियों के हिरोकरण वाली फिल्मे नही देखती , वो पसंद नही । लेकिन विजय सालगांवकर अपराधी नही है भाई , ऐसे के साथ तो मै भी ऐसा ही करती , ऐसा मैने बिटिया को समझाया जब वो कहने लगी विजय गलत है । 

November 23, 2022

पापा की परी

 बिटियां सातवीं मे थी जब उनकी पाॅकेट मनी शुरू किया ।  बड़े अरमान कि चलो अब पैसा बचाना खर्चना मैनेज करना सीखेंगी । लेकिन कुल अरमानो पर उनके पापा जी ने पानी फेर दिया ।

 पापा जी जब नीचे कुछ लेने जाते या ऑफिस से आते फोन करते तो फर्माइश कर देतीं पापा मेरे लिए ये ले आना वो ले आना । हम कहते पाॅकेट मनी मिली है उससे ले आओ , तो कहतीं पापा ले आओ मै पैसे  दे दूंगी । अब आप लोग ही अंदाजा लगा लो कि पापा चॉकलेट चिप्स ला कर उनसे पैसे लेतें ।

बचा खुचा एक साल  बाद लाॅकडाउन ले बिता । ना बाहर जाना आना ना बाहर का खाना पीना । सब ऑनलाइन आ रहा था तो उनके जरुरत का सामान भी हम मंगा देते । पैसे तो उनके सारे बस दोस्तो को गिफ्ट मे खर्च होते । लाॅकडाउन के बाद भी पापा ना सुधरे ना बिटियां पैसे मैनेज करना सीखी । 

पापा की परी का कुछ अलग ही मतलब ये आजकल के पापा लोग निकालते है । जब वैन से स्कूल जाती थी तब उनका बैग नुक्कड़ तक पापा उठा कर ले जाते थे । हम चिल्लाते नौवी मे आ गयी तुम क्यो बैग उठा रहे हो उसको लेकर जाने दो । लेकिन मेरी कौन सुनता है । 

लगभग सब पापा लोगो की यही हालत है । रोज सुबह देखते है बेटा छोटा है तो बैग मम्मी पापा लेते बस स्टाॅप तक लेकिन बड़े होते बेटे अपना बैग खुद  उठाना शुरू कर देते । लेकिन बेटियां बड़ी हो गयी है पर स्कूल बैग पापा लोग ले जा रहे है । 

सातवीं तक तो पापा जी उन्हे जुते मोजे तक पहनाते थे । रोज सुबह उठने मे नाटक करती और देर होने लगती स्कूल के लिए।  वो नाश्ता कर रही होती मै बाल बना रही होती तो बोलती पापा जूते पहना दो नही तो वैन छूट जायेगी । 

हमारे लाख मना करने के बाद भी कि तुम ऐसे ही करते रहे तो ये  जिम्मेदार कैसे बनेगी सीखेगी कैसे ।  लेकिन पापा जी लोगो को इससे मतलब ही क्या है । नतीजा बिटियां उलटा पापा को बोलती पापा पहना दो नही तो तुम्हे ही स्कूल तक छोड़ने जाना होगा। अब स्कूल  पापा छोड़ने जाते है और बिल्डिंग के नीचे तक भी बैग पापा ले जाते है । हमारी कोई ना सुनता ना समझता । 

अभी दशहरे को एक पड़ोसी अपने बेटे के साथ मिलकर उसकी नयी बुलट धो चमका रहे थे । दशहरे पर अपनी गाड़ी साफ कर उस पर माला चढ़ाने का रिवाज है यहां । तभी पतिदेव ने दिखाया देखो चौथी मंजिल वाले की  बेटी ने जाॅब शुरू किया है तो उसके पापा ने स्कूटी दिलाया है लेकिन वो स्कूटी पिता जी अकेले धो रहे थे । 

हमने कहा ये क्या बात हुयी जब बेटा अपना बुलेट साफ कर रहा है तो बेटी स्कूटी साफ करने क्यो नही आयी । ये सच है कि अपनी कार साफ करने हम कभी नही गये लेकिन स्कूटी साफ करने पानी लेकर हमी जाते और ये भी देखते कि लोग मुझे ऐसा करता देख अजीब नजर से देख रहें ।

पापा की परी का मतलब बेटी को सपोर्ट करना होना चाहिए उसका बैसाखी बन अपाहिज ना बनाइये । जब स्कूटी या कोई भी गाड़ी दिला रहे है तो उससे जुड़ी जिम्मेदारी भी उसे दिजिए और उससे जुड़ी जानकारी भी । ताकि कोई छोटी मोटी समस्या आने पर उसे ठीक कर सके कोई  डिसीजन ले सके  ना कि मदद के लिए दूसरो का मुंह ताके। 

इतने सालो से अपनी कार हो या स्कूटी सर्विस सेंटर लेकर गयी पर रेयरली ही कोई लड़की महिला वहां आती थी । स्कूटी का तो कितनी ही बार रंग देख समझ आ जाता लड़की या महिला की है पर लेकर पुरुष आया है । कई बार लोग फोन करके पुछते है कि और क्या क्या समस्या बताया था । 

ऐसी ऐसी महिलाओ लड़कियो से मीली हूं जिन्हे अपनी कार मे ईधन खत्म होने का इन्डीकेटर समझ नही आया या किक करके स्कूटी स्टार्ट कैसे करना है ये पता नही होता । टायर बदलना तो बहुत दूर की बात है । 

हमारा पालन पोषण एक मातृसत्तात्मक परिवार मे हुआ है । जहां हम लोगो को राजकुमारियों की तरह नजाकत से कतई ना पाला गया । बेटियां लक्ष्मी होती उनसे पैर नही छुआते जैसे चोचले हमारे घर कभी हुए नही । पैर छुना बड़ो के अभीवादन का तरिका है तो बेटी वो क्यो नही करेगी । 

जब पितृसत्ता मे बेटे नाजुक नही मजबूत बनाये जाते है आगे के संघर्ष,  नेतृत्व के लिए  तैयार किये जाते है । तो मातृ सत्ता वाले परिवार मे भी हम बेटियां को शुरू से जिम्मेदार और मजबूत बनाया गया । हम लोग अपने अंदर बाहर के काम के लिए कभी घर के पुरूषो पर निर्भर ना रहे । यहां तक कि भारी सामान को उठाने के लिए भी हम लोग कभी भाई लोगो का मुंह ना देखते । 

किसी के चिढ़ाने , टांग खिचने , गिरने पर रोना ना शुरू करते बल्कि मुंह तोड़ जवाब देते । कोई लड़का परेशान कर रहा जैसी समस्याएं हम लोगो को कभी घर लेकर आने की जरूरत ना पड़ी । पढ़ाई क्या करना है कैरियर क्या चुनना से जुड़ी काम खुद ही किये । पापा लोगो को तो ये भी पता नही होता कि हम लोग किस क्लास मे है । 

पर आजकल के नये नये पापा लोग परी बना बना बिटिया लोगो का भविष्य ही डांवाडोल कर रहे है । यही हर जरूरी अनुभव जिम्मेदारी से दूर रहने वाली बेटिया अकेले पढ़ने जाॅब करने जायेगी तो परेशान होगीं या गलत निर्णय लेती जायेगी ।  कैरियर मे भी और जीवन मे भी । 

तो ऐसा है पापा जी लोग्स अपनी अपनी परियों को बचपन से ही कल के गलाकाट प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार किजिए।  किसी ट्रोलिंग का जवाब देने लायक मजबूत बनाइये । मुसीबतों और असफलताओं से लड़ना सिखाइये। सही निर्णय लेना जिम्मेदारी उठाना सिखाइएये । योद्धा बनाइये नाजुक सी परी ना बनाइये । 

November 18, 2022

लक्ष्यभेदी पोस्ट

 राजू पढने मे बहुत होशियार था । लेकिन वो अपने पिता के जुआ खेलने की आदत से घर मे हो रही तमाम दिक्कतों से परेशान रहता था । एक दिन मास्टर साहब ने दीवाली पर निबंध लिखने के लिए कहा । उसने लिखा दीवाली हमारा एक प्रमुख त्यौहार है । इस दिन हम घर को दीये से सजाते है । लेकिन  कुछ लोग इस दिन जुआ खेलते है । जुआ खेलना एक खराब बात है । जुआ  खेलने से घर बर्बाद होते है  । घर मे आर्थिक तंगी आ जाती है ----- । आगे पूरा जुआ पर निबंध था । 

मास्टर जी ने कहा बढ़ियां है । फिर एक दिन होली पर निबंध लिखने को कहा गया । राजू ने लिखा , होली हमारा प्रमुख त्यौहार है । उस दिन हम रंग खेलते है । लेकिन  कुछ लोग इस दिन जुआ खेलते है । जुआ खेलना एक खराब बात है । जुआ  खेलने से घर बर्बाद होते है  । घर मे आर्थिक तंगी आ जाती है ----- । 

मास्टर जी ने कहा ये क्या बला है । फिर उन्होने होशियार दिखाते कहा तु पेड़ पर निबंध लिख। राजू ने लिखा , पेड़ हमारे लिए बहुत जरूरी है । पेड़ से हमे ऑक्सीजन मिलता है । लेकिन कुछ लोग पेड़ के नीचे बैठ कर  जुआ खेलते है । जुआ खेलना एक खराब बात है । जुआ  खेलने से घर बर्बाद होते है  । घर मे आर्थिक तंगी आ जाती है ----- । 

बस ऐसे ही आज सबके पास पहले से ही दोषी , अपराधी कौन है का जवाब तैयार है अपनी अपनी सोच , वाद और विचारधारा के हिसाब से । फिर कोई भी मुद्दा , अपराध,  खबर सामने आने दिजिए । दो लाइन के बाद उनका लेकिन आयेगा और हर बार  दोषी अपराधी उसी को साबित करेगे जिसे वो साबित करना चाह रहे है , नेता , सरकार,  विपक्ष, ये धर्म वो धर्म वाले ,समाज ,पुरुष , स्त्री ,बुजुर्ग,  युवा पीढ़ी,  माता पिता आदि इत्यादि।

आप लाख दलीले , तर्क दिजिए किन्तु आप ठीक कह रहे/रही है के बाद एक लेकिन आयेगा और वही जुआ पर निबंध शुरू हो जायेगा । 

राजू गाय पर निबंध लिखो । राजू , गाय एक पालतू जानवर है गाय हमे दूध देती है । लेकिन कुछ लोग गाय का दूध बेच कर उन पैसो से  जुआ खेलते है । जुआ खेलना एक खराब बात है । जुआ  खेलने से घर बर्बाद होते है  । घर मे आर्थिक तंगी आ जाती है ----- । 

राजू पर्यावरण पर निबंध लिखो । राजू , स्वच्छ पर्यावरण बहुत जरूरी है ।  हमे पर्यावरण का संरक्षण करना चाहिए  लेकिन -------

November 17, 2022

प्रेम का ये कैसा खौफनाक अंत

 दो खतरनाक खबरे दो दिन मे सुनी जो पहले प्रेम फिर हत्या मे बदल गयी। पहली घटना पाकिस्तान की है जहां एक माँ ने अपनी नाबालिग बेटी के हत्यारे पति को पन्द्रह साल बाद पकड़वाया । पन्द्रह साल की बेटी अपने ट्यूशन टीचर के साथ भाग गयी । माँ बाप इज्जत के डर से पुलिस मे खबर नही की ।

 बेटी ने कभी संपर्क नही किया लेकिन दस साल बाद माँ ने लड़के से संपर्क किया । कई बार फोन करने के बाद भी बेटी से जब बात नही हो पायी तो माँ अकेले उस शहर चली गयी जहां ट्यूशन टीचर ने अपने होने की बात की थी । शहर के हर स्कूल के चक्कर लगाती रही और  एक दिन वो मिल गया । पहले वो उन्हे टरकाता रहा फिर  जब भाग गया तब माँ ने पुलिस मे खबर की और वो पकड़ा गया । 

तब पता चला कि उसने पन्द्रह साल पहले ही लड़की की हत्या कर दी थी गला दबाकर और फिर उसके टुकड़े कर कुर्बानी के जानवरो के कुड़े मे मिला दिया । 

वो तलाकशुदा दो बच्चो का पिता था और  घर से भागते समय उसके बच्चे भी साथ थे । उसी बच्चो को लेकर झगड़ा हुआ और लड़की की हत्या कर दी गयी । अब माँ सोच रही है कि तभी इज्जत की परवाह ना करके पुलिस मे रिपोर्ट कर देती तो शायद बेटी जिन्दा मिल जाती । 

दूसरी कल दिल्ली वाली खबर । लड़के के साथ पहले से ही मारपीट हो रही थी और लड़की माँ के पास वापस मुंबई भी लौट गयी थी । माँ बाप ने वापस ना लौटने के लिए समझाया भी लेकिन लड़के के माफी मांगने पर लड़की लौट गयी और नतीज उसकी हत्या । 

पहली खबर में दक्षिण एशिया की एक खराब सच्चाई है जिसमे इज्जत के नाम पर या तो घरवाले ही लड़की को मार देते है या उनके भागने पर उनकी कोई खोजखबर नही लेते । इन लड़कियों मे से बहुतो की इस तरह हत्या भी होती है और उन्हे वैश्यावृति के लिए बेच  भी दिया जाता है । 

नेपाल बंग्लादेश से लेकर छत्तीसगढ,  झारखंड और  बिहार बंगाल के गरीब इलाको से प्रेम जाल मे फंसा कर बड़ी संख्या मे लड़कियो को घर से भगा कर लाया जाता है और बेच दिया जाता है । ज्यादातर केस मे ना तो उनके भागने पर पुलिस रिपोर्ट होती है और ना परिवार कभी खोजने या संपर्क करने की कोशिश  करता है । 

करीब आठ दस साल पहले दिल्ली मे एक बड़े सैक्स रैकेट का खुलासा हुआ था । उसमे एक लड़कि मुंबई मे रह रहे सेना के एक बड़े अधिकारी की बेटी निकली । ब्वॉयफ्रेंड के साथ परिवार की मर्ज़ी के खिलाफ भाग कर दिल्ली आ गयी और यहां आते ही उसे पता चला कि जिस घर मे रह रही है असल मे वहां वो कैद है । लड़का उसे बेच कर भाग चुका है । नशीले पदार्थ और मारपीट से धंधे मे डाल दिया गया शर्म के मारे उसने फिर कभी परिवार से संपर्क की कोशिश ही नही की । फिर दिल्ली पुलिस ने उसके पिता के घर भेजा । 

और भगायी गयी खासकर कम आयु की लड़कियो कि हत्या और आत्महत्या पुराना अपराध है । भागने के कुछ समय बाद ही प्रेम का भूत भी उतरता है तब समझ आता कि प्रेम नही उमर का असर था बस। एक दूसरे की असली सच्चाई भी सामने आती है और आटे दाल का भाव भी पता चलता । परिवार संपर्क मे रहता है तो बात संभल जाती है । कितनी ही लड़किया वापस भी आती हैं । लेकिन परिवार से परवाह ना दिखायी और  लड़का जरा सा दुष्ट प्रवृति का हुआ तो अपराध होते देर ना होती । 

 किसी भी माँ बाप को कभी भी अपने बच्चो को ऐसे नही छोड़ना चाहिए । भले कल को रिश्ता ना रखे लेकिन उनकी सही सलामती की खबर लेते रहे पुलिस की सहायता ले या किसी और की । ताकि कल को कोई अफसोस ना हो कि बेटी की सही समय पर खोज खबर क्यो ना ली ।  

दूसरा किस्सा आज की आधुनिकता के दौड़ मे शामिल लड़कियों की आधुनिकता कि कलई खोलती है । हम अब तक सवाल करते रहे है कि पत्नी मारपीट कर रहे पति के साथ क्यो रही है । समाज  के बंधन को तोड़े और विवाह से अलग हो जाये । 

लेकिन  ये तो समझ के परे है कि आप लिव-इन रिलेशन मे मारपीट की शिकार है फिर भी आप ना केवल उसके साथ रह रही है बल्कि विवाह भी उसी के साथ करना चाहती है। क्यो आखिर क्यो ऐसा करना चाहती है । 

 यहां कौन सा सामाजिक बंधन था जिसे लड़की तोड़कर निकल नही सकती थी । जिस  दिन पहला थप्पड़ पड़ा उसी दिन समझ जाना चाहिए था कि व्यक्ति सही नही है रिश्ता रखने के लिए  । जिस दिन ये सब दुबारा तीबारा हुआ  समझ जाना चाहिए वो अपराधी प्रवृति का है ।

ये किस तरह की आधुनिकता थी जिसमे उन्हे टिंडर और मैरिज डाट काॅम का फर्क समझ ना आ रहा था । जिसमे ये समझ ना आ रहा था कि जब एक बार लड़के ने शादी के लिए ना कह दिया तो वो कभी आपसे शादी नही करना चाहता । वो सिर्फ अपनी जरूरतो के लिए आपसे जुड़ा है रिश्तो के प्रति गंभीर नही है ।

समस्या ये है कि ऊपर से आधुनिक बन गये है लेकिन अंदर से भारतीयपना गया नही है । झूल रहे है बीच मे , ना इधर के है ना उधर के है  । ऐप से  डेटिंग करना शुरू कर दिया लेकिन समझदारी से ब्रेकअप करना नही आया । ये समझ नही आया डेटिंग करना , लिव-इन शादी की गारंटी नही होती । ये समझ नही आता कि सामने वाला सिर्फ आपका फायदा उठा रहा है वो आपके साथ गंभीर नही है । 

बाकि लास्ट मे दो बाते पहली ये प्रेम मे हत्या और फायदा उठाना कुछ लड़को के साथ भी हो रहा है और  दूसरी लव जेहाद की पागलपंथी से बाहर आइये और हर खबर को जरा ध्यान से देखीये । ये सब हर जाति , धर्म, वर्ग मे हो रहा है और  आये दिन हो रहा है । अपनी राजनैतिक सोच के हिसाब से बस आप लोग किसी खास खबर पर हल्ला मचाते है बाकि पर चुप रह जाते है । माॅब लिचिंग की तरह एक सामाजिक अपराध बनता जा रहा है । 

बच्चो से बात किजिए और  इस बारे मे समझाना शुरू किजिए।  लोगो को पहचानना सीखाईये और  सबसे जरूरी व्यवहारिक बनना और दिमाग प्रयोग करना सीखाईये । ना प्रेम खत्म हुआ है और  प्रेम  विवाह मे कोई  समस्या है । 

September 19, 2022

पितृपक्ष पितर और मुंबई के कौवें


                  शायद मुंबई ऐसी जगह है जहां पितृपक्ष मनाने की जरुरत नही है क्योंकि यहां सालभर लोग अपने पितृ रूपी  कौवों को खाना खिलाते है । जैसे बाकि जगहो पर  गली मे घुमते गाय , कुत्ता , कबूतर आदि कोई एक घर पकड़ लेते है और  रोज वहां आ कर खाना खाते है ऐसे ही मुंबई मे कौवे किसी घर की खिड़की पकड़ लेते है और  रोज आ कर खाना मांगते है । घर वालो को बकायदा आवाज दे कर बुलाते है और उस घर के लोग रोज उन्हे कुछ खाने को भी देते है । 

                          हमारे पड़ोसी के रसोई की खिड़की पर भी आते है । जब कोई नही रहता और  आवाज देने पर भी नही आता तो वहां रखा कोई बर्तन चोच से पकड़ कर से नीचे गिरा देते है । एक बार कांच का ग्लास उनका ऐसे ही तोड़ दिया नीचे गिरा कर । हमारे घर भी आते थे बिटिया दो चार बार खाना दे दी तो रोज का नियम बना लिया । अगर हम ड्राइंग रूम मे ना दिखे या आवाज  देने पर ना आये तो समझ जाता बेडरूम मे है और  उसकी खिड़की पर आ कर कान खाना शुरू कर देता । 

                    लेकिन  खाने के नखरे है भाई खाली रोटी दे दो तो ऐसा रिएक्शन देते की पूछो मत । एक बार उसके आने पर  रोटी दे दिया , काश की उस दिन विडियो निकालती तो आप लोग हँसते उसे देख कर । रोटी का टुकड़ा देख बिल्कुल 🙄 वाला रिएक्शन  था उसका । फिर चोच से उठा कर पटका और  कौव कौव चिल्ला जैसे मुझे चार बाते सुना रहा हो । हमने रोटी उठा कर फिर ऊपर रख दिया और  बोला खाना है तो खाओ वरना जाओ और कुछ नही है । फिर पानी मे डुबा कर एक बार  खाता फिर मुझे देख दो कौव कौव सुनाता और  फिर खाता 😄

                              मांस मछली के बाद इनको भुजिया सेव पसंद है । मांस तो हमारे यहां मिलता नही , सेव के बारे मे बाप बिटिया को जैसे ही पता चला , किलोभर आया भुजिया सेव दोनो जने पन्द्रह दिन मे इनको खिला दिये । बस उसी दिन इनको घर निकाला मिल गया । 

                             दुष्ट तो कितने थे आपलोग ही देख लिजिए । पंक्षियों के लिए  पानी रखती और  बाद मे देखती कि वो गिरा हुआ  है । लगा ग्रील के वजह से गिर जाता होगा फिर  एक दिन खुद देखा पानी पीया महराज ने और चोच से पकड़ कर डब्बा गिरा दिया पानी का जानबूझकर।  उस दिन मै फोटो ले रही थी तो सबूत के साथ रंगे चोच पकड़े गये । फिर हमने इस फोटो का प्रयोग किया पतिदेव को सुनाने के लिए  , देख रहे हो ना तुम्हारे पितर लोग क्या क्या कर रहे है । खुद  की चिंता है उन्हे  बाकियो की नही 😂😂😂

दुष्टई यहां नही रूकी चिड़िया के दानो के लिए लटकाये फिडर को चोच से हिला हिला उसका दाना नीचे गिरा देता था । बाहर पानी रखा तो अपना खाना ला कर उसमे डूबा कर उसको गंदा कर देता ।  कौवों को खाना छुपाने की आदत है । कहीं से अतिरिक्त खाना पाता तो हमारे गमले या उसके नीचे छुपा जाता कुछ दिन तो हमने कुछ  ना कहा फिर मांस मच्छी हड्डी ला कर छुपाना शुरू किया तब हमने इनका खाना वहां से फेकना शुरू किया । कौवे वैसे भी बहुत समझदार होते है दो बार  मे ही समझ गये कि जगह सुरक्षित नही तो बंद कर दिया । 


                            लेकिन कल तो हद ही हो गयी छोटे गमले मे सफेद पत्थर रखे थे पता नही शायद जुकाम था इनको सो महक ना आयी इनको और  अंडा समझ कर चोच से उठा ले गये । एक तो नीचे गिरा दिया शायद  दूसरा हमारी ही दूसरी खिड़की के नीचे पड़ा देखा । कम से कम तीस चालीस ग्राम का एक पत्थर था और  चार पांच फिट दूर दूसरी खिड़क पर हमे दिखा । कल फिर पतिदेव को सुनाया पितृपक्ष चल रहा है तुम्हारे पितरों को  लगा होगा तुमने उनके लिए  अंडे रखे है दावत के लिए  । तुम्हारी ही तरह है सबके सब , अंडे और  पत्थर का फर्क ना समझ आ रहा । देखो कही उनको कोरोना तो ना हो गया महक ना आ रही होगी । उनका किया तुम भुगतो निकालो वहां से मेरा पत्थर 😂😂😂



August 15, 2022

प्रतिकात्मक देश भक्ति से आगे

एक समय था जब हर किसी को झंडा फहराने का अधिकार नही था । ये साल का दो सरकारी कार्यक्रम और क्रिकेट मैच के समय मैदान ती सीमित था । झंडे के प्रति इतनी संवेदनशीलता होती और साथ मे इतने नियम कानून , मान अपमान की पूछिये मत । 

तब अमेरिकन को देख कर लगता ये तो अपने झंडे का पजामा बिकनी तक पहन लेते इनके झंडे का अपमान ना होता ,ये संवेदनशील नही होते उसके प्रति।  ये और इनका झंडा तो सबसे ताकतवर है फिर ऐसा क्यो है । लेकिन अच्छा लगता कि झंडे पर सबका अधिकार है ।

फिर वो समय भी आया जब हम सब को भी तीरंगा फहराने हाथ मे ले कर चलने का अधिकार मिला । आप सभी को भी याद होगा क्या उत्साह था उस समय आम लोगो मे । हर घर तीरंगा तब भी था और  स्वतः था । लेकिन देश  के प्रति  कोई  कर्तव्य याद हो ना हो झंडे के प्रति बहुत सारे लोगो की संवेदनशीलता बनी रही और  वो इसके मान अपमान  कोड कंडक्ट आदि को लेकर विरोध नाराजगी दिखाते रहे । 

शुरू मे मुझे भी लगता था फिर  धीरे धीरे लगा झंडे के प्रति प्रतिकात्मक संवेदनशीलता , प्रतिकात्मक देशभक्ति से आगे की सोचना चाहिए। ब्याह के बाद कोई  दस साल तक साल मे दो बार अपने घर मे झंडा जो लगाती थी वो बंद कर दिया । 

देश के नियम कानून ना मान रहे । देश को बढ़ाने मे कोई सहयोग ना कर रहे तो इन सब प्रतिकात्मक देशभक्ति का कोई मतलब नही है । झंडा लगाइये राष्ट्रीय पर्व धूमधाम से मनाइये लेकिन साथ मे खुद को और आगे आने वाली पीढ़ी को असली देशभक्ति भी सीखिये और  सिखाये । बस झंडे फहराने तक सीमित मत रहिये । तभी इन सब का कोई  अर्थ है वरना बस छुट्टी का दिन  है मौज मस्ती आराम मे निकल जाना है । 

बकिया झंडे पर सबका बराबर का अधिकार है क्या ऊंची अट्टालिका और  क्या हमारा कबूतर खाना । उनका भी झंडा ऊँचा रहे और  हमारा भी लहराता फहराता ऊँचा  रहे । 

अब बिटिया ने  अपने घर मे फिर से शुरू किया है झंडा  लगाना देखते है ये हवा बस इस साल का देखा देखी है या आगे भी याद रहता उन्हे ।  


  


August 14, 2022

मुंबई की बारिश

                        मुंबई आते ही बरसात के मौसम का असली मतलब समझ आया  और गृहस्थी की गठरी खुलते ही इस मौसम ने उसमे घुन भी लगा दिया । जब घर से चली तो अपने भारतीय रिवाज अनुसार माता जी ने खाने पीने की चीजे साथ भेजा । जिसमे मेरे ब्याह के बचे डेढ़ दो किलो मूंग के पापड़ और अच्छी किस्म का बासमती चावल भी था । 

                        बात बीस साल पुरानी है एक मिडिल क्लास वाली खास मानसिकता की भी । जिसके अनुसार खास चीजे मेहमानो ,खास लोगो या खास दिन के लिए रख देना चाहिए।  रोज रोज खुद खा कर  उसे खत्म नही करना चाहिए।  मठरी सेव नमकीन आदि तो खत्म कर दिये गये लेकिन पापड़ और चावल धर दिये गये खास के लिए  । 

                       मुंबई के मौसम से अनजान बस महिना डेढ़ महीने बाद ही पापड़ मे फंगस लग गया और चावल मे घुन । मायके से आयी एक एक चीज कैसे दिल के करीब होती है ये सब स्त्रियां ही समझ सकती है । पापड़ और चावल की हालत देख इतना दुख हुआ  कि  समझ लिजिए बस रोये भर नही । 

                        उस दिन पतिदेव ने समझाया कि मुंबई मे बारिश मे अनाज ऐसे ही खराब होते है या तो  ज्यादा खरीदो मत या फ्रिज मे रखो । वो दिन है और  आज का दिन बारिश आते ही फ्रिज अलमारी बन जाती है यहां ।  जैसे जैसे पता चलता गया , खराब होने या किड़े लगने के बाद  , कि ये भी खराब हो सकता है सब फ्रिज मे जाता गया । 

                        मूंग , राजमा , उरद, रवा , मैदा, काॅफी , मूंगफली और ना जाने क्या क्या । जब बिटिया हुयी तो घर मे नमकीन बिस्किट ज्यादा आना शुरू हुआ  । उसके लिए अलग से खास एयर टाइट डब्बे आदि खरीदे गये । यहां तो ये हालत है खाने के साथ दो मूंग के पापड़ लेकर बैठते है दूसरे वाले का नंबर आते वो मुलायम हो लटकना शुरू हो जाता है बारिश के इस मौसम मे । 

                         अब वो खास डब्बे खराब हो गये तो बिस्किट का पैकेट तभी खुलता है जब तीनो साथ घर मे हो ताकि एक ही बार मे उसे खत्म कर दिया जाये । घ॔टे भर मे ही वो मेहरा जाता है । चिप्स कुरकुरे के पैकेट लेते समय चेक किया जाता है हवा जरा भी कम ना हो उसमे , नही तो अंदर सब मेहराया मिलेगा । 

                         नमकीन का वही पैकेट लिया जाता है जिसमे बंद करने के लिए  जिपर हो भले बड़ा पैकेट लेना पड़े । क्योकि डब्बे भी उन्हे सुरक्षित नही रख पाते । बाकि बरसात मे मौसम चटर पटर खाने की इच्छा जाग्रीत कर डायटिंग की वाट लगवाता है वो अलग मुसीबत है । यहां तो चार महीने बरसात होती वो भी लगातार । खुद पर काबू कर भी लो तो बाकि दो ना मानते । 

August 13, 2022

अश्लीलता तो दिमाग मे होती है

छ साल की छोकरी,

भर लाई टोकरी

टोकरी में आम हैं,

नहीं बताती दाम है

दिखा-दिखाकर टोकरी,

हमें बुलाती छोकरी,

हमको देती आम है,

नहीं बुलाती नाम है

नाम नहीं अब पूछना

हमें आम है चूसना!”

 पहले ही चेतावनी दे दूँ कि इस पोस्ट में ढेर सारे अश्लील शब्द हैं अर्थात पोस्ट ही बड़ी अश्लील हैं , अपने रिस्क पर पढ़े | 

कुछ  समय पहले ज्ञान मिला कि  ऊपर लिखी बाल कविता अश्लील हैं | चार बार कविता हर कोण से पढ़ा कुछ भी अश्लील नजर नहीं आया | अपना अश्लीलता ज्ञान ट्यूबलाइट जैसा हैं और थोड़ा कमजोर हैं | 

हमने कविता पतिदेव को सुनाते  कहा  जरा अपना अश्लील मर्दाना दिमाग लगाते बताओ की मैं क्या सोचूं की कविता अश्लील लगे | बोले बड़ा सामान्य सा हैं आम को लड़की का अंग समझ लो | हमने तुरंत उन्हें और पूरे  मर्द जाती को मन ही मन दण्डवत प्रणाम किया ऐसे शानदार अश्लील गंदे दिमाग के लिए  | 

लोग इसे अश्लील बोलते भूल गए की कविता छः साल के छोटे बच्चे के लिए हैं, जिसका दिमाग बातों का वही अर्थ निकालता हैं जी लिखा गया हैं | कविता अश्लील दिमाग रखने वाले उनके बाप के लिए नहीं है| इतने छोटे बच्चे के लिए साहित्य नहीं रचा जाता , कम मात्राओं वाला,  कैची तुकबंदी रची जाती हैं | इतना आसान की उसे पढ़ते ही वो उसका मतलब समझ जाए |  

दुनियां में कुछ भी अश्लील हो सकता हैं दोहरे अर्थों वाला हो सकता हैं बस आपके पास एक गंदा अश्लील दिमाग होना चाहिए | आम और उसे चूसना भी अश्लील हो सकता हैं अगर उसके साथ लड़की भी हो , ये तो दिमाग में कभी आया ही नहीं |

 

बड़ी शर्मिंदगी हुयी ये सोच शायद पिछले साल हमने एक चूसने वाले देशी आम के पोस्ट पर बड़े मजे ले कमेंट किया था कि आम चूसकर  खाना आनंद दायक होता था बचपन में सब मिल कर ऐसे ही खाते थे  | अब लग रहा हैं इस कमेंट को कितने ही ख़राब दिमागों ने कुछ और मजे  ले पढ़ा होगा | 

अब अश्लीलता के अपने ज्ञान की डिक्शनरी ( इतने साल लोगो ने इंटरनेट का सबसे बढियाँ महत्वपूर्ण उपयोग नॉनवेज चुटकुले के लिए  किया हैं तो आपके पास अश्लील शब्दों की डिक्शनरी तो बन ही जाती हैं )  निकालू तो इसकी जगह बहुत सारे शब्द होते तो वो भी अश्लील घोषित हो जाते , बस आपके सोचने का तरीका खराब होना चाहिए  | 

छोकरी लायी गेंद , छोकरा लाया  बल्ला , भयंकरतम अश्लील , दो छोटे बच्चे अगर लड़का लड़की हैं तो बैट बॉल नहीं खेल सकते वो अश्लील घोषित होगा | वैसे आप लड़की के साथ कुछ भी ला दीजिये अश्लील दिमाग उसका दूसरा अर्थ निकाल ही लेंगे | 

उन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि कि कविता की पहली लाइन में छः साल की छोकरी लिखा हो और बगल में एक प्यारी सी बच्ची की फोटो लगी हो | एक अध्ययन में सामने आया कि बच्चो का यौन शोषण करने वाले बच्चो को बच्चा नहीं समझते हैं , उनके लिए वो व्यस्क की तरह मात्र शरीर होते हैं और उन्हें बस वही दिखता हैं |

 जैसे बहुतों  को स्त्री मात्र स्त्री नहीं नहीं बस उसकी योनि दिखती हैं तभी तो --तिया बोल बोल  स्त्री के अंग की माला दिनभर लोग जपते रहते हैं | पता नहीं इन गंदे दिमागों को दिनभर स्त्री योनि का नाम ले उन्हें कौन सा चरमसुख मिलता हैं | 


वैसे दिमाग गंदा हो तो लडके  भी नहीं छूटेंगे | लड़का अकेला , उसने खाया केला , अश्लील |   लड़का  छोटा उसका तोता  खोटा ,  अश्लील |   ( मराठी में लडके को मुलगा कहते हैं ) प्यारा सा मुलगा उसने पाला मुर्गा , अश्लील | जिन  महिला मित्रो को ( पुरुषों को आ रहा होगा समझ  में )   इसमें भी अश्लीलता ना दिख रहा हो तो बता दूँ पुरुष अपने अंग विशेष की तुलना या नाम इस तरह के  बहुत सारे शब्दों से करता हैं | अब अश्लीलता आपके दिमाग डाल दी अब दुबारा ऊपर की लाइने पढेंगी तो वो अश्लील लगेगा | 

वैसे ये अपने अंग को नाम देना  ब्रेस्ट कैंसर के लिए  चलाये अभियान में  महिलाओं को अपने दोनों स्तनों को कोई नाम दे उनकी देखभाल करके उनका ध्यान रख ब्रेस्ट कैंसर से बचने का सन्देश वाला  महिलाहित का मामला नहीं हैं | ये पूरी तरह से गंदा ,  घटिया, ही ही ही करते मजे  लेने के लिए किया गया काम होता हैं | 

ऐसे लोग  ये समझ ही नहीं पातें  दुनियां से बहुत सारे साफ़ मासूम दिमाग उनके  गंदे दिमाग की तरह नहीं चलते हैं | इन घटिया दिमाग वालों ने वैसे अक्षरों को भी नहीं छोड़ा हैं | हाल में फैशन कंपनी मंत्रा के लोगो  का अंग्रेजी अक्षर M भी अश्लील लग रहा था | उनके हिसाब से ये लड़की की खुली टांगो जैसा दिख रहा हैं | पॉर्न देखते देखते इनकी  नजर सब कुछ उन्हें वैसा ही दिखाने लगती हैं , बेचारे करे भी तो क्या | 

 एक महिला मित्र ने एक रोमांटिक गाना पोस्ट किया   " प्यार का दर्द हैं , मीठा मीठा प्यारा प्यारा " कोई आ कर कह जाता हैं गाना अश्लील हैं | दिमाग सोच में पड़ गया इसमें क्या अश्लील हैं ये तो बड़ी सामान्य सी बात हैं कि प्यार में दर्द भी मिलता हैं और लोग प्रेम की चाहत में उसे सहते भी हैं | फिर पुरुष  की तरह सोचना पड़ता हैं कि भी प्रेम का और क्या मतलब हो सकता हैं किसी पुरुष के लिए , जवाब तुरंत मिलता हैं "सेक्स" | समझ आ गया और हो गया गाना अश्लील | कहा था ना दिमाग गंदा होना चाहिए सब अश्लील बन जायेगा | 


एक महिला मित्र ने लिखा बिटिया विदेश जॉब के लिए गयी और पहले दिन ही ढेर सारा काम मिल गया , पेलाई शुरू हो गयी बिटिया की | समझ गयी उन्हें इसका आजकल जिन अर्थों में प्रयोग होता हैं  नहीं पता | उन्हें तुरंत इनबॉक्स में मैसेज किया कि पेराई , पेलाई आदि का मतलब भले हमारे लिए निचोड़ना , घिसना अर्थात मेहनत से होता हो लेकिन गंदे दिमागों ने इसका अर्थ भी घटिया बना दिया हैं | उन्होंने तुरंत  उस शब्द को बदला | 


आज आम और उसे चूसना भी अश्लील शब्दों की   डिक्शनरी में चला गया  | अब लग रहा हैं ये सोशल मिडिया की दुनिया अश्लील दिमाग वाले गंदे लोग चला रहें हैं क्योकि जैसे ही वो किसी शब्द को अश्लील तरीके से प्रयोग करते हैं बाकी भी मूर्खों की तरह उसके हा में हां मिला उसे अश्लील घोषित कर देतें हैं  | देखियेगा ये एक दिन ये  हमारे सारे शब्दों को चुरा कर हमें शब्दहीन कर देंगे या हमें भी अश्लील घोषित कर देंगे  | 

August 12, 2022

सरकार का तुगलगी फरमान

बीच बीच मे कोरोना काल वाली यादे भी ताजा कर लेनी चाहिए , ताकि सनद रहे ।   एक व्यंग्य लिखा था कोरोना की दूसरी लहर के बाद कि कैसे सोशल मीडिया पर हम सभी डाॅक्टर बन सभी को हर तरह की सलाह दिये जा रहे थे । 


इंडिया अब आपने घबराना हैं क्योकि सरकार का एक तुगलगी फरमान आ गया हैं और वो हमारी बातें नहीं सुन रही हैं | सरकार का कहना हैं कि एमबीबीएस कोर्स  पंचा साल की पढाई के बाद ही पूरा होता हैं उसके बाद ही डॉक्टर (मेडिकल वाला ) माना जाएगा | 


सरकार का कहना हैं कि एक साल में कोरोना से जुड़े तमाम इलाज, दवा,  ट्रीटमेंट आदि की सारी सोशल मिडिया वाली जानकारी होने के बाद भी हम आम लोगों को सोशल मिडिया वाला डॉक्टर की मान्यता नहीं देगी | मतलब ऐसे कैसे चलेगा | कोरोना मतलब  कोविड 19 जब से शुरू हुआ हैं हम सभी ने बहुत गंभीरता से उसे फॉलो  किया हैं |  


अब तक हमें कोरोना कैसे होता हैं ,  क्यों होता हैं , किसको होता हैं , उससे बचने के उपाय क्या क्या हैं , उसकी तमाम दवाएं , हाइड्रोक्विन से लेकर फैबिफ्यू , रेमडेसिविर तक की जानकारी हैं | हां ठीक हैं हाइड्रोक्विन और  रेमडेसिविर जैसो का उच्चारण करने में शुरू शुरू में समस्या होती थी लेकिन अब तो सीख ही गए हैं | ठीक हैं स्पेलिंग नहीं पता हिंदी मीडियम वालों को , लेकिन हमें कौन सा अंग्रेजी में नाम लिखना हैं | सोशल  मिडिया पर तो हिंदी  में ही सबको सलाह देनी हैं वो तो हम लोग  कर ही लेंगे | लेकिन सरकार मानने को तैयार नहीं हैं | 


हमने कहा हम लोगों ने खान सर की यूटुब क्लास भी की हैं हमें RT -PCR  टेस्ट क्या हैं , कोरोना कैसे हमारे फेफड़े में प्रोटीन कवर का  धोखा  दे कर घुसता हैं कैसे अपना फोटो कॉपी बनाता हैं , सब पता हैं | ऑक्सीमीटर से ऑक्सीजन पल्स नापने से लेकर ऑक्सीजन कब कम ज्यादा समझा जाए तक पता हैं | हमे तो प्रोन पोजीशन सोने के फायदे तक पता हैं | हम किसी डॉक्टर से ज्यादा बेहतर सलाह मरीजों को दे सकते  हैं और वो भी मुफ्त  लेकिन ये फांसीवादी सरकार सुनने और हमें मान्यता देने को तैयार  ही नहीं हैं | 



हमने कहा एक साल का कोर्स किया  हैं तो 20 % डॉक्टर मान लो | दूसरा साल तो हम लोगों का शुरू हो  भी हो गया हैं और बहुत कुछ नया हम लोगों ने सीख भी लिया हैं | अफ्रीकन वेरियंट , ब्राजीलियन वेरियंट , इंडियन वेरियंट , आंध्र वेरियंट , अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी वेरियंट तक की जानकारी हो चुकी हैं हम लोगों को | पांच साल का क्या  मुंह देखते हो | 

वो देखो सामने दिवाली , छठ और दिसंबर में शादियों का सीजन साफ़ दिख रहा हैं और साथ में हमारा तीसरे साल का कोर्स भी | हमें धीरे धीरे 20- 20 परसेंट की मान्यता साथ में देते चलो | तब तक हम लोग  अपनी सोशल मिडिया वाली डॉक्टरी सलाह से ना जाने कितनो की   जान सांसत में डालने  सॉरी सॉरी बचाने में मदद कर सकते हैं | लेकिन इस निकम्मी सरकार के कानू पर जूं भी नहीं रेंग रही | 

हमने कहा चलो हमें छोड़ दो लेकिन अपने देशी , शुद्ध भारतीय , लोकल - वोकल के नाम पर आयुर्वेदिक वैद्य की मान्यता हमारे अजवाइन , कपूर , लौंग , गठरी , नाक में अणु का तेल , निम्बू करने वाले मित्रो को तो दे दो | बेचारे कहाँ कहाँ से घर के मसालों के डिब्बों से , पूजाघर से आयुर्वेदिक इलाज खोज पर ला रहें हैं | कम से कम आयुर्वेद के नाम पर उन्हें वैद्य की मान्यता दे दो लेकिन सरकार इस पर भी तैयार नहीं हैं | 


हाई स्कूल फेल हो कर भी घर बैठे डॉक्टर बनिये वाला कोर्स करके होम्योपैथ के डॉक्टर बन मीठी गोलियां की सलाह बांटने वालों को भी सरकार मान्यता नहीं  दे रही हैं  | कोई बात नहीं,  ना दे मान्यता सरकार,  एकबार हम सभी का कोरोना कोर्स पूरा होने दीजिये हम सभी कोरोना टेस्ट देंगे | अरे नहीं आरटी पीसीआर टेस्ट नहीं लिखित टेस्ट मिल कर देंगे कोरोना से जुडी जानकारियों पर | फिर हम सब खुद एक दूसरे को ५७ सत्तावन   ( सांत्वना ) पुरुष्कार ले दे लेंगे | 

तब तक सोशल मिडिया पर बैठ कर सबको अपनी मुफ्त डॉक्टरी    सलाह  देते रहिये भले  कोई लाख मना करे |